ghazal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ghazal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

गाकर भीड़ लगा सकते हो ?









क्या तुम अच्छा गा सकते हो ?
गाकर भीड़ लगा सकते हो ?

भीड़ को सम्मोहित करके तुम

क्या नारा लगवा सकते हो ?

भीड़ तालियां भीड़ ही थप्पड़-

ख़ुदको यह समझा सकते हो ?

अब तक जो होता आया है

क्या फिर से करवा सकते हो ?

तुमसे क्या अब बात छुपाना- 

क्या तुम घर पर आ सकते हो ?

अपने दिल की बात बताकर

मेरे दिल तक आ सकते हो ?

क्या बोला, मैं नया-नया हूं

ठीक है फिर तुम जा सकते हो

-संजय ग्रोवर
14-02-2020

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

मैं पशोपेश में रहा

ग़ज़ल


मैं अपने देश में रहा
मैं पशोपेश में रहा

सदा तक़लीफ़ में रहा
ज़रा आवेश में रहा

वही होगा मेरा रक़ीब
जो कई वेश में रहा

मैं क्यों ईमानदार हूं
बहुत वो तैश में रहा

न मैं अमीर में रहा
न ही दरवेश में रहा



-संजय ग्रोवर
15-03-2019


सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

बात यूं है कि बात कुछ भी नहीं

गज़ल

हाथ आई हयात कुछ भी नहीं
बात यूं है कि बात कुछ भी नहीं
                                                        11-01-2013
यू तो मेरी औक़ात कुछ भी नहीं
काट लूं दिन तो रात कुछ भी नहीं
                                                        29-10-2018
मुझको, सच में, बयान कर न सके
वो तेरे इल्ज़ामात कुछ भी नहीं
                                                       12-09-2018
मुझसे दिनवाले लुटेरों ने कहा
अपने आगे बारात कुछ भी नहीं

झूठ बोलूंगा, ख़ुदसे हारुंगा
सच कहूंगा तो मात कुछ भी नहीं
                                                                  12-09-2018


-संजय ग्रोवर
29-10-2018

रविवार, 26 अगस्त 2018

सच बोलना है मुश्क़िल, लेकिन है गाना आसां

ग़ज़ल

जब खुल गई पहेली, तो है समझना आसां
सच बोलना है मुश्क़िल, लेकिन है गाना आसां 

पहले तो झूठ बोलो, ख़ुद रास्ता बनाओ

फिर दूसरों को सच का रस्ता बताना आसां

वैसे तो बेईमानी .. में हम हैं पूरे डूबे

माइक हो गर मुख़ातिब, बातें बनाना आसां

हालांकि यूं ही अकड़े, आखिर तो गए पकड़े

मौसेरा भाई पकड़े, है पकड़े जाना आसां

जो तुम तलक है पहुंचा, उन तक भी पहुंच जाए

तुम बन गए अगर तो, उनको बनाना आसां

मैं हर समय हूं जागा, है तब ही मैंने देखा

है जागने की कहकर, सबको सुलाना आसां

-संजय ग्रोवर
26-08-2018


बुधवार, 27 जून 2018

एक मुर्दा कहीं से ले आओ

photo by Sanjay Grover
ग़ज़ल


भीड़, तन्हा को जब डराती है
मेरी तो हंसी छूट जाती है

सब ग़लत हैं तो हम सही क्यों हों

भीड़ को ऐसी अदा भाती है

दिन में इस फ़िक़्र में हूं जागा हुआ

रात में नींद नहीं आती है

भीड़, तन्हा से करती है नफ़रत
और हक़ प्यार पे जताती है

एक मुर्दा कहीं से ले आओ

भीड़ तो पीछे-पीछे आती है

पूरी औरत को करके अंगड़ाई

शायरी कैसा सितम ढाती है

आज इक और बात कह डाली

देखिए किसको समझ आती है

-संजय ग्रोवर
27-06-2018


बुधवार, 20 जून 2018

है शुक्र कि मेरा कोई उस्ताद नहीं है

ग़ज़ल

हिंदू कि मुसलमां, मुझे कुछ याद नहीं है
है शुक्र कि मेरा कोई उस्ताद नहीं है

जो जीतने से पहले बेईमान हो गए
ऐसे, थके-हारों से तो फ़रियाद नहीं है

जो चाहते हैं मैं भी बनूं हिंदू, मुसलमां
वो ख़ुद ही करलें खाज, मुझपे दाद नहीं है

इंसान हूं, इंसानियत की बात करुंगा
आज़ाद है ज़हन मेरा, बरबाद नहीं है

-संजय ग्रोवर
12/20-06-2018



गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

किसीसे, बात छुपाओ, कभी कहा ही नहीं

ग़ज़ल


रा खुल जाने के डर में कभी रहा ही नहीं
किसीसे, बात छुपाओ, कभी कहा ही नहीं

मैंने वो बात कही भीड़ जिससे डरती है

ये कोई जुर्म है कि भीड़ से डरा ही नहीं !

जितना ख़ुश होता हूं मैं सच्ची बात को कहके

उतना ख़ुश और किसी बात पर हुआ ही नहीं

किसीने ज़ात से जोड़ा, किसीने मज़हब से

मगर मैं ख़ुदसे किसी झूठ से जुड़ा ही नहीं

बुतों ने बहुत दिखाईं तमाम ऊंची जगहें

मगर मैं हंसता रहा, झाड़ पर चढ़ा ही नहीं

-संजय ग्रोवर
26-04-2018


बुधवार, 25 अप्रैल 2018

कितने मिलते हैं मेरे दोस्त औ’ दुश्मन के ख़्याल

ग़ज़ल

या तो बेईमानी-भरी दुनिया से मैं कट जाऊं
या कि ईमान के चक्कर में ख़ुद निपट जाऊं

तुम तो चाहते हो सभी माफ़िया में शामिल हों
तुम तो चाहोगे (मैं) अपनी बात से पलट जाऊं 

न मैं सौदा हूं ना दलाल न ऊपरवाला
लोग क्यों चाहते हैं उनसे मैं भी पट जाऊं

मेरे अकेलेपन को मौक़ा मत समझ लेना
किसी भी तौर नहीं होगा, सच से कट जाऊं

कितने मिलते हैं मेरे दोस्त औ’ दुश्मन के ख़्याल
यही बेहतर है इनके बीच से मैं हट जाऊं

-संजय ग्रोवर

25-04-2018

बुधवार, 24 जनवरी 2018

उनकी ख़ूबी मुझे जब ख़राबी लगी

ग़ज़ल

उनकी ख़ूबी मुझे जब ख़राबी लगी
उनको मेरी भी हालत शराबी लगी

उम्र-भर उनके ताले यूं उलझे रहे
वक़्त पड़ने पे बस मेरी चाबी लगी

उनके हालात जो भी थे, अच्छे न थे
उनकी हर बात मुझको क़िताबी लगी

उनके पोस्टर पे गांधीजी चस्पां थे पर
उनके गुंडों की नीयत नवाबी लगी



मिलना-जुलना मुझे उनका अच्छा लगा 
भ्रष्ट थे सबके सब, ये ख़राबी लगी

-संजय ग्रोवर



गुरुवार, 7 सितंबर 2017

फिर ख़रीदी तुमने मेरी ई-क़िताब

ग़ज़लें

1.

फिर ख़रीदी तुमने मेरी ई-क़िताब
मुझको ख़ुदसे रश्क़ आया फिर जनाब
06-09-2017

वाह और अफ़वाह में ढूंढे है राह
मुझको तो चेहरा तेरा लगता नक़ाब

जिसने रट रक्खे बुज़ंुर्गोंवाले ख़्वाब
उसकी समझो आसमानी हर क़िताब

ख़ाप ताज़ा शक़्ल में फिर आ गई
जो है लाया उससे क्या पूछें हिसाब

फिरसे ख़ास हाथों में ख़ासे फूल हैं
उसके नीचे आम, कांटों का अज़ाब 

कौन समझेगा मैं अकसर सोचता था
तुम हो मुमक़िन वक़्त पर मुमक़िन जवाब
07-09-2017


2.


उनकी टक्कर उन्हींसे हो गई
वही बच गए, वही गिर पड़े

भीड़ थी तेरे सर में गरमी
देख कहीं अब तेरे सिर पड़े

बहुत लगाई बहुत बुझाई
ख़ुदपे आई ख़ुद ही गिर पड़े
      
मेरे संग ज़माना सारा
आंख में आंसू यूंही तिर पड़े

मैं उनसे बचना चाहता था
इस ख़ातिर वो मेरे सिर पड़े
07-09-2017


-संजय ग्रोवर


बुधवार, 23 दिसंबर 2015

अब तो काई-सी जमी है बस

ग़ज़ल

वो महज़ इक आदमी है बस
और उसमें क्या कमी है बस

उम्रे-दरिया के तजुर्बों पर
अब तो काई-सी जमी है बस

आंसुओं का बह चुका दरिया
आंख में थोड़ी नमी है बस

हर बरस आता है इक तूफ़ां
जोश सारा मौसमी है बस

इन डरे लोगों के हिस्से में
इक मरी-सी ज़िंदगी है बस

-संजय ग्रोवर



गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

बादलों की तर्ज़ पे...

ग़ज़ल 

ज़िंदगी की जुस्तजू में ज़िंदगी बन जा
ढूंढ मत अब रोशनी, ख़ुद रोशनी बन जा

रोशनी में रोशनी का क्या सबब, ऐ दोस्त!
जब अंधेरी रात आए, चांदनी बन जा

गर तक़ल्लुफ़ झूठ हैं तो छोड़ दे इनको
मैंने ये थोड़ी कहा, बेहूदगी बन जा

हर तरफ़ चौराहों पे भटका हुआ इंसान-
उसको अपनी-सी लगे, तू वो गली बन जा

कुंओं में जीते हुए सदियां गई ऐ दोस्त
क़ैद से बाहर निकल, फिर आदमी बन जा

गर शराफ़त में नहीं पानी का कोई ढंग
बादलों की तर्ज़ पे आवारगी बन जा

-संजय ग्रोवर


बुधवार, 2 दिसंबर 2015

एक फ़ोटो निकालते हैं चलो

ग़ज़ल

ख़ुदको फिर से खंगालते हैं चलो,
आज क़ाग़ज़ संभालते हैं चलो

गर लगे, हो गए पुराने-से
ख़ुदको रद्दी में डालते हैं चलो

क्यूं अंधेरों को अंधेरा न कहा
रौशनी इसपे डालते हैं चलो

ज़हन जाना तो मार डालोगे
बात को कल पे टालते हैं चलो

सुन न पाओगे, कह न पाएंगे
एक फ़ोटो निकालते हैं चलो
30-11-2015

आदमी जैसी किसमें है श्रद्धा!
आदमी को ही पालते हैं चलो
02-12-2015


सच को मांगेगा! कौन पूछेगा?
फिर भी सिक्का उछालते हैं चलो

कोई मुद्दा उछालते हैं चलो
यूंही अरमां निकालते हैं चलो

03-12-2015

-संजय ग्रोवर






सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

वो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थे

ग़ज़ल

बिलकुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थे
वो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थे

तहज़ीब की तराज़ू भी तुमने ही गढ़ी थी
ईमान जिसपे अपना तुम्ही तोल रहे थे

अमृत तो फ़क़त नाम था, इक इश्तिहार था
अंदर तो सभी मिलके ज़हर घोल रहे थे

वो तितलियां भी तेज़ थीं, भंवरे भी गुरु थे
मिल-जुलके, ज़र्द फूल पे जो डोल रहे थे

-संजय ग्रोवर
12-10-2015



गुरुवार, 25 जून 2015

शातिर है तू ख़ातिर तिरी होगी जगह-जगह

ग़ज़ल

ग़ायब का तू वक़ील है तो मुझको माफ़ कर
साज़िश तेरी दलील है तो मुझको माफ़ कर
24-06-2015

चेहरे पे तेरे होगी कबूतर-सी इक अदा
आंखों में तेरी चील है तो मुझको माफ़ कर

औरों की तरह गिरने को मैं भी कहूं उठना!
ऐसी तेरी अपील है तो मुझको माफ़ कर

बदनामी से बचने को बेईमान बन गया!
अब डर से ख़ुद ज़लील है तो मुझको माफ़ कर

माना पतंग तेरी बहुत ऊंची उड़ गई
उसमें लगी कंदील है तो मुझको माफ़ कर

शातिर है तू ख़ातिर तिरी होगी जगह-जगह
लोगों की दी ये ढील है तो मुझको माफ़ कर

लोगों ने तुझपे चोट की, तू मुझमें धंस गया!
ऐसी अगर तू कील है तो मुझको माफ़ कर



-संजय ग्रोवर
25-06-2015

ग़ायब=छुपा हुआ, निराकार, अप्रकट,invisible
दलील=तर्क, कारण, युक्ति,
साज़िश=षड्यंत्र, बदनीयत, कमज़ोर, दोमुंहे और घुन्ने लोगों द्वारा किसीकी ग़ैरजानकारी में उसे गिराने, मारने या बदनाम करने का सामूहिक प्रयत्न, 
ज़लील=अपमानित, 
शातिर=धूर्त्त, काईयां,cunning

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

ख़ज़ाने हमको यां इतने मिलेंगे.....






ख़ज़ाने हमको यां इतने मिलेंगे
सुबह से शाम तक हंसते रहेंगे

नया कह-कहके देते हो पुराना
हम अपने-आप ही अब ढूंढ लेंगे

डराने से ख़ुशी मिलती है तुमको !
डराओ हमको, हम हंसने लगेंगे

बदलती जाएगी ये सारी दुनिया
और हम बस पैंतरे बदला करेंगे

वो ख़ुद ही सीढ़ियां हैं, ख़ुद ही मंज़िल
वो अपने सर की चोटी पर चढ़ेंगे


-संजय ग्रोवर

17/21-10-2013

 

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

आईने सब ख़राब कर डाले

ग़ज़ल

दफ़्न बेहूदे ख़्वाब कर डाले
कुछ पुराने हिसाब कर डाले

एक मंज़िल तो तुमने पाई मगर
कितने रस्ते ख़राब कर डाले !

उसकी तस्वीर ज़रा धुंधली सही
सारे आंसू शराब कर डाले

रोने वाले बुरे न थे, तुमने
हंसते-हंसते ख़राब कर डाले

झूठ में सच को हमने यूं पाया-
सारे रिश्ते नक़ाब कर डाले

हर तरफ़ हाथ मारकर तुमने
आईने सब ख़राब कर डाले

-संजय ग्रोवर

28-09-2013

शनिवार, 15 जून 2013

तूने क्या-क्या न हमको दिखलाया

ग़ज़ल


मेरी आवारगी को समझेंगे
लोग जब ज़िन्दगी को समझेंगे

ऐसी शोहरत तुम्हे मुबारक हो
हमने कब तुमसे कहा हम लेंगे

गिरने वालों पे मत हंसो लोगो
जो गिरेंगे वही तो संभलेंगे

क्यूं खुदा सामने नहीं आता
जब मिलेगा, उसी से पूछेंगे

जब भी हिम्मत की ज़रुरत होगी
एक कोने में जाके रो लेंगे

वो अगर मौत से रहा डरता
लोग हर रोज़ उसको मारेंगे

तूने क्या-क्या न हमको दिखलाया
ऐ खुदा! हम तुझे भी देखेंगे


-संजय ग्रोवर

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

मुझको कुछ-कुछ गणित लगा..


ग़ज़ल

जो भी था सब अभिनय था
सब कुछ पहले से तय था


ख़ुद समझा हो, काफ़ी है
जो भी उसका आशय था


नीयत भी कुछ साफ़ न थी
भावुक भी वो अतिशय था


मुझको कुछ-कुछ गणित लगा
वो कहता है परिणय था



हम उसका करते भी क्या
उसको तो ख़ुदसे भय था



-संजय ग्रोवर

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

कि शायर अपनी बरबादी से ही आबाद होते हैं


ग़ज़ल

मिले हमको ख़ुशी तो हम बड़े नाशाद होते हैं
कि शायर अपनी बरबादी से ही आबाद होते हैं


ये सच्चाई का पारस इस तरह चीज़ें बदलता है
तुम्हारे संग मेरी ज़द में आकर दाद होते हैं


दिखे जो मस्लहत तो पल में सब कुछ भूल जाते हैं
वो जिनको ज़िंदगी के सब पहाड़े याद होते हैं


किसी दिन तुम ख़ुदी को, ख़ुदसे पीछे छोड़ जाते हो
वो सब जो तुमसे आगे थे, तुम्हारे बाद होते हैं


वो गिन-गिनकर मेरी नाक़ामियों को याद करते हैं
मुझे उनके तरक्क़ी के तरीक़े याद होते हैं


-संजय ग्रोवर


नाशाद= दुखी, संग=पत्थर, ज़द=दायरा, पहुंच, रेंज, मस्लहत=फ़ायदा,

(हांलांकि अलग़-अलग़ डिक्शनरियों में ज़द शब्द के अलग़-अलग़ अर्थ जैसे चुगना, चोट, प्रहार-सीमा, लक्ष्य आदि दिए गए हैं मगर जब आप वाक्य-प्रयोग देखेंगे तो वही अर्थ ज़्यादा नज़दीक पाएंगे जो ऊपर दिए गए हैं।)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

#girls #rape #poetry #poem #verse # लड़कियां # बलात्कार # कविता # कविता #शायरी (1) अंतर्द्वंद (1) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अकेला (3) अनुसरण (2) अन्याय (1) अफ़वाह (1) अफवाहें (1) अर्थ (1) असमंजस (2) असलियत (1) अस्पताल (1) अहिंसा (3) आंदोलन (4) आकाश (1) आज़ाद (1) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (2) आत्मकथा (1) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आभास (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (4) इतिहास (2) इमेज (1) ईक़िताब (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (2) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उर्दू (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचा (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (2) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरपंथी (1) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कन्फ्यूज़न (1) कमज़ोर (1) कम्युनिज़्म (1) कर्मकांड (1) कविता (68) कशमकश (2) क़ागज़ (1) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) काव्य (5) क़िताब (1) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) ख़ाली (1) खीज (1) खेल (2) गज़ल (5) ग़जल (1) ग़ज़ल (28) ग़रीबी (1) गांधीजी (1) गाना (7) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (7) गुंडे (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (4) चलती-फिरती लाशें (1) चांद (2) चालाक़ियां (1) चालू (1) चिंतन (2) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छंद (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) छोटापन (1) छोटी कहानी (1) छोटी बहर (1) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जयंती (1) ज़हर (1) जागरण (1) जागरुकता (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) झूठ (3) झूठे (1) टॉफ़ी (1) ट्रॉल (1) ठग (1) डर (4) डायरी (2) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ड्रामा (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज (1) तंज़ (10) तमाशा़ (1) तर्क (2) तवारीख़ (1) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (1) तालियां (1) तुक (1) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दिशाहीनता (1) दुनिया (2) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (2) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) द्वंद (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) धोखेबाज़ (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़रिया (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नफरत की राजनीति (1) नया (3) नया-पुराना (1) नाटक (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नारा (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (3) निष्पक्षता (1) नींद (1) न्याय (1) पक्ष (1) पड़़ोसी (1) पद्य (3) परंपरा (5) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (8) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुण्यतिथि (1) पुरस्कार (2) पुराना (1) पेपर (1) पैंतरेबाज़ी (1) पोल (1) प्रकाशक (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फंदा (1) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) फ़ॉलोअर (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बच्चा (1) बच्चे (1) बजरंगी (1) बड़ा (2) बड़े (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बयान (1) बहस (15) बहुरुपिए (1) बात (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (2) बेईमानी (2) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (2) भगवान (2) भांड (1) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भाषणबाज़ (1) भीड़ (5) भ्रष्ट समाज (1) भ्रष्टाचार (5) मंज़िल (1) मज़ाक़ (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (5) ममता (1) मर्दानगी (1) मशीन (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) महापुरुष (1) महापुरुषों के दिवस (1) मां (2) मातम (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मायना (1) मासूमियत (1) मिल-जुलके (1) मीडिया का माफ़िया (1) मुर्दा (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रस (1) रहस्य (2) राज़ (2) राजनीति (5) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) रात (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (10) लघुव्यंग्य (4) लालच (1) लेखक (1) लोग क्या कहेंगे (1) वात्सल्य (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (87) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) व्याख्यान (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (55) शायरी ग़ज़ल (1) शेर शायर (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संजयग्रोवर (1) संदिग्ध (1) संपादक (1) संस्थान (1) संस्मरण (2) सकारात्मकता (1) सच (4) सड़क (1) सपना (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (37) सर्वे (1) सवाल (2) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साजिश (1) साभार (3) साहस (1) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (6) साहित्य में आतंकवाद (18) सीज़ोफ़्रीनिया (1) स्त्री-विमर्श के आस-पास (18) स्लट वॉक (1) स्वतंत्र (1) हमारे डॉक्टर (1) हयात (1) हल (1) हास्य (4) हास्यास्पद (1) हिंदी (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (2) हिन्दुस्तानी (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) हिम्मत (1) हुक्मरान (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) alone (1) ancestors (1) animal (1) anniversary (1) applause (1) atheism (1) audience (1) author (1) autobiography (1) awards (1) awareness (1) big (2) Blackmail (1) book (1) buffoon (1) chameleon (1) character (2) child (2) comedy (1) communism (1) conflict (1) confusion (1) conspiracy (1) contemplation (1) corpse (1) Corrupt Society (1) country (1) courage (2) cow (1) cricket (1) crowd (3) cunning (1) dead body (1) decency in language but fraudulence of behavior (1) devotee (1) devotees (1) dishonest (1) dishonesty (2) Doha (1) drama (3) dreams (1) ebook (1) Editor (1) elderly (1) experiment (1) Facebook (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) gandhiji (1) ghazal (20) god (1) gods of atheists (1) goons (1) great (1) greatness (1) harmony (1) highh (1) hindi literature (4) Hindi Satire (11) history (2) history satire (1) hollow (1) honesty (1) human-being (1) humanity (1) humor (1) Humour (3) hypocrisy (4) hypocritical (2) in the name of freedom of expression (1) injustice (1) inner conflict (1) innocence (1) innovation (1) institutions (1) IPL (1) jokes (1) justice (1) Legends day (1) lie (3) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lonely (1) love (1) lyrics (4) machine (1) master (1) meaning (1) media (1) mob (3) moon (2) mother (1) movements (1) music (2) name (1) neighbors (1) night (1) non-violence (1) old (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppotunism (1) oppressed (1) paper (2) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) perspective (1) plagiarism (1) poem (12) poetry (29) poison (1) Politics (1) poverty (1) pressure (1) prestige (1) propaganda (1) publisher (1) puppets (1) quarrel (1) radicalism (1) radio (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) reality (1) rituals (1) royalty (1) rumors (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (2) SanjayGrover (1) satire (30) schizophrenia (1) secret (1) secrets (1) sectarianism (1) senseless (1) shayari (7) short story (6) shortage (1) sky (1) sleep (1) slogan (1) song (10) speeches (1) sponsored (1) spoon (1) statements (1) Surendra Mohan Pathak (1) survival (1) The father (1) The gurus of world (1) thugs (1) tradition (3) trap (1) trash (1) tricks (1) troll (1) truth (3) ultra-calculative (1) unemployed (1) values (1) verse (6) vicious (1) violence (1) virtual (1) weak (1) weeds (1) woman (2) world (2) world cup (1)