No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
मंगलवार, 19 जनवरी 2010
व्यंग्य-कक्ष में *****राष्ट्रप्रेम*****
कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है, मगर हम आजकल के राष्ट्रप्रेमियों को देखें, तो लगता है कि राष्ट्रप्रेम कहीं ज्यादा अंधा होता है, और कथित राष्ट्रप्रेमियों को प्रेम करने वाले कितने अंधे हो सकते है, इसका अंदाजा तो कोई अंधा भी नहीं लगा सकता। अगर आपने देश की जेब, कूटनीतिज्ञों के कान और देशवासियों के गले काटने हों तो ‘राष्ट्रप्रेम‘ एक अनिवार्य शर्त है। राष्ट्रप्रेम ऐसा चुंगीनाका है, जहां सत्ता की ओर सरकने वाली हर गाड़ी को मजबूरन चुंगी अता करनी पड़ती है। राष्ट्रप्रेम ऐसी दुकान है, जहां प्रेम की चाशनी चढ़ा कर ज़हर भी अच्छे दामों पर बेचा जाता है। राष्ट्रप्रेम एक ऐसी सात्विक जिल्द है, जिसके पीछे छुपकर नंगी कहानियां भी ससम्मान पढ़ी जा सकती है। राष्ट्रप्रेम ऐसी चाबी है, जिसकी मदद से शोहरत और दौलत का कोई भी खज़ाना ‘सिमसिम‘ की तरह खोला जा सकता है। राष्ट्रप्रेम अभिनय की वह चरम अवस्था है जहां बी और सी ग्रेड के कलाकारों का कोई काम नहीं है। राष्ट्रप्रेम रूपी मुर्गी को जो धैर्यपूर्वक दाना चुगाता है, वह रोज़ाना एक स्वर्ण-अण्डा पा सकता है। जो अधीर होकर इसका पेट काटता है, उसके हाथ से अण्डे तो जाते ही हैं, मुर्गी भी मारी जाती है।
अपने-अपने ढंग से सभी लोग राष्ट्र को प्रेम करते हैं। जनता कुछ इस अंदाज़ में प्रेम करती है कि ‘जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां‘। अर्थात् जल में रह कर मगरमच्छ से वैर क्या करना। जब रहना ही यहीं है, तो बिगाड़ कर क्यों रहें? पटाकर क्यों न रखें। अर्थात् जिस अंदाज़ में वह पुलिस, डाकू, माफिया, आयकर अधिकारी और आसमानी सत्ता से प्रेम करती है, कुछ-कुछ उसी तरह का ‘ट्रीटमेन्ट‘ राष्ट्र को भी देती है। आज से कुछ पंद्रह-बीस साल पहले तक लोग ‘राष्ट्रप्रेम‘ में इतने भीगे रहते थे कि सिनेमाघरों में फिल्म खत्म होते ही राष्ट्रगान के सम्मान में उठ खड़े होते थे। कुछ डटे रहते तो बाकी हौले-हौले, खामोश कदमों से हाॅल से बाहर सरक लेते थे। इस तरह भीड़ छंट जाती और रास्ता साफ हो जाता। तब बाकी पंद्रह-बीस लोग भी बाहर आ जाते थे। बाहर आकर वे दो मिनट रूकते, अपनी सांसों को व्यवस्थित करते और गंतव्य की ओर चल देते, जहां एक कई गुना बड़ा राष्ट्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा होता था। इस राष्ट्र में प्रेम की मात्रा इतनी अधिक होती थी कि लोग काली मिर्च की जगह पपीते के बीज और वनस्पति तेल की बजाय मोबिल आॅयल में तले समोसे श्रद्धापूर्वक गटक जाते थे। कहा भी है कि प्रेम से अगर कोई जहरीली शराब भी पिलाए, तो भी गनीमत होती है। यही क्या कम है कि आपके पैसे के बदले में उसने आपको कुछ दिया। न देता, तो आप क्या कर लेते?
बाज लोग मनोज कुमार की तरह फिल्में बनाकर भी राष्ट्रप्रेम को अभिव्यक्ति देते हैं। ‘पूरब और पश्चिम‘ में सायरा बानो, ‘रोटी, कपड़ा और मकान‘ में ज़ीनत अमान और ‘क्रांति‘ में हेमा मालिनी की मार्फत मनोज कुमार दर्शकों को संदेश देते हैं कि राष्ट्रप्रेम में अगर कपड़े उतार कर बरसात में भीगना पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए। राष्ट्रप्रेम में अगर हम थोड़ा-सा जुकाम भी नहीं अफोर्ड कर सकते, तो लानत है हम पर। देशप्रेम की उक्त पद्धति से प्रभावित दर्शकों की आँंखें भीग जाती है और मुंह से लार टपकने लगती है।
राष्ट्रप्रेम में डूब कर लोग क्या नहीं करते। नेता दंगे करवाते हैं। पब्लिक दुकानें लूटती है। खेलप्रेमी पिच खोद देते हैं। लड़कियां ‘प्लेब्वाॅय‘ टाइप पत्रिकाओं का सहारा बनती हैं। संगीतकार धुनें चुरा लेते हैं। विद्यार्थी बसंे जला देते हैं। पुलिस व सेना बलात्कार करती हैं। प्रोफेसर ट्यूशन पढ़ाते हैं। दूरदर्शन नंगे कार्यक्रम दिखाता है। मां-बाप बच्चों को ठोंक-पीटकर अच्छा नागरिक बनाते हंै। बच्चे मां-बाप को गालियां देकर क्रांति की नींव रखते हैं। साधु-सन्यासी तस्करी, ठगी और बलात्कार करते है। देशद्रोही गद्दारी करते हैं।
बेरोजगारी युवक-युवतियों से मेरी अपील है कि वे आलतू-फालतू चक्करों में न पड़ें। वे राष्ट्रप्रेम करें। इससे बढ़िया धंधा कोई नहीं। अब प्रश्न उठता है कि राष्ट्रप्रेम किस विधि से करें, ताकि यह दूसरों को भी राष्ट्रप्रेम लगे और आप इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सकें। बहुत आसान है। राष्ट्र की कमियों को भूलकर भी कमियां न कहें, बल्कि खूबियां कहें। अंधविश्वासों और कुप्रथाओं को सांस्कृतिक धरोहर बताएं। राष्ट्र के शरीर पर उगे फोड़े-फुंसियों को उपलब्धियां बताएं। आनुवंशिक और असाध्य रोगों को अतीत का गौरव कहें। अपनी सभ्यता और संस्कृति में भूलकर भी कमियां न निकालें। भले ही विदेशी वस्तुओं और तौर-तरीकों पर मन ही मन मरे जाते हों, पर सार्वजनिक रूप से इन्हें गालियां दें। बच्चों को पढ़ाएं तो अंग्रेजी स्कूलों में, मगर उन बच्चों के नाम संस्कृत में रखें। स्त्रियों का भरपूर शोषण करें, मगर उन्हें ‘देवी‘ कह-कह कर।
दलितों-शोषितों-पिछड़ों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार करें, मगर ऊपर-ऊपर मानवता के गीत गाएं। तबीयत से काले धंधे करें, मगर लोगों को दिखा-दिखाकर, सुना-सुना कर राष्ट्र, धर्म और भगवान के नाम पर दान करते रहें। रात में अगर दस नाबालिग लड़कियों के साथ सोएं, तो सुबह बीस विधवाओं की शादी करवा दें। आॅफिस भले ही आठ घंटे लेट जाएं, मगर मंदिर में मत्था टेकने सुबह चार बजे ही जा धमकें।
उक्त सभी उपाय आज़मा कर देखें। फिर देखता हूं कि कौन माई का लाल आपको राष्ट्रप्रेमी नहीं मानता। कोई क्यों नहीं मानेगा! सभी तो राष्ट्रप्रेमी हंै।
-संजय ग्रोवर
(नवंबर, 1997 को हंस में प्रकाशित)
मंगलवार, 26 मई 2009
आध्यात्मिकता अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.

आध्यात्मिकता अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है
हमारे समय के बड़े कवि-कहानीकार श्री कुमार अम्बुज ने मेल से यह ज़बरदस्त और ज़रूरी दस्तावेज़ भेजा है. बहुत सारे सवाल खड़े करता जावेद अख़्तर का यह सम्भाषण इत्मीनान से पढ़े जाने की दरकार रखता है. इस के लिए श्री कुमार अम्बुज और डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का बहुत बहुत आभार. (जावेद अख्तर के इण्डिया टुडे कॉनक्लेव में दिनांक 26 फरवरी, 2005 को ‘स्पिरिचुअलिटी, हलो ऑर होक्स’ सत्र में दिए गए व्याख्यान का डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद)मुझे पूरा विश्वास है देवियों और सज्जनों कि इस भव्य सभा में किसी को भी मेरी स्थिति से ईर्ष्या नहीं हो रही होगी. श्री श्री रविशंकर जैसे जादुई और दुर्जेय व्यक्तित्व के बाद बोलने के लिए खड़ा होना ठीक ऐसा ही है जैसे तेंदुलकर के चमचमाती सेंचुरी बना लेने के बाद किसी को खेलने के लिए मैदान में उतरना पड़े. लेकिन किन्हीं कमज़ोर क्षणों में मैंने वादा कर लिया था. कुछ बातें मैं शुरू में ही साफ कर देना चाहता हूं. आप कृपया मेरे नाम –जावेद अख्तर- से प्रभावित न हों. मैं कोई रहस्य उजागर नहीं कर रहा. मैं तो वह बात कह रहा हूं जो मैं अनेक बार कह चुका हूं, लिखकर, टी वी पर या सार्वजनिक रूप से बोलकर, कि मैं नास्तिक हूं. मेरी कोई धार्मिक आस्थाएंनहीं हैं. निश्चय ही मैं किसी खास किस्म की आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं करता. खास किस्म की!एक और बात! मैं यहां बैठे इस भद्र पुरुष की आलोचना करने, इनका विश्लेषण करने, या इन पर प्रहार करने खड़ा नहीं हुआ हूं. हमारे रिश्ते बहुत प्रीतिकर और शालीन हैं. मैंने हमेशा इन्हें अत्यधिक शिष्ट पाया है. मैं तो एक विचार, एक मनोवृत्ति, एक मानसिकता की बात करना चाहता हूं, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं.मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब राजीव ने इस सत्र की शुरुआत की, एक क्षण के लिए मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह पर आ गया हूं. इसलिए कि अगर हम कृष्ण, गौतम और कबीर, या विवेकानन्द के दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं तो मुझे कुछ भी नहीं कहना है. मैं इसी वक़्त बैठ जाता हूं. मैं यहां उस गौरवशाली अतीत पर बहस करने नहीं आया हूं जिस पर मेरे खयाल से हर हिन्दुस्तानी को, और उचित ही, गर्व है. मैं तो यहां एक सन्देहास्पद वर्तमान पर चर्चा करने आयाहूं.इण्डिया टुडे ने मुझे बुलाया है और मैं यहां आज की आध्यात्मिकता पर बात करने आया हूं. कृपया इस आध्यात्मिकता शब्द से भ्रमित न हों. एक ही नाम के दो ऐसे इंसान हो सकते हैं जो एक दूसरे से एकदम अलग हों. तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की. रामानंद सागर ने टेलीविज़न धारावाहिक बनाया. रामायण दोनों में है, लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुलसीदास और रामानंद सागर को एक करके देख लेना कोई बहुत अक्लमन्दी का काम होगा. मुझे याद आता है कि जब तुलसी ने रामचरितमानस रची, उन्हें एक तरह से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था. भला कोई अवधी जैसी भाषा में ऐसी पवित्र पुस्तक कैसे लिख सकता है? कभी-कभी मैं सोचता हूं कि किसम-किसम के कट्टरपंथियों में, चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के क्यों न हों, कितनी समानता होती है! 1798 में, आपके इसी शहर में, शाह अब्दुल क़ादिर नाम के एक भले मानुस ने पहली बार क़ुरान का तर्ज़ुमा उर्दू में किया. उस वक़्त के सारे उलेमाओं ने उनके खिलाफ एक फतवा ज़ारी कर डाला कि उन्होंने एक म्लेच्छ भाषा में इस पवित्र पुस्तक का अनुवाद करने की हिमाक़त कैसे की! तुलसी ने रामचरितमानस लिखी तो उनका बहिष्कार किया गया. मुझे उनकी एक चौपाई याद आती है :”धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ जौलाहा कहौ कोऊ.काहू की बेटी सौं बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारन सोऊ..तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु कोऊ.मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबो एकू न दैबो को दोऊ..”रामानंद सागर ने अपने धारावाहिक से करोड़ों की कमाई की. मैं उन्हें कम करके नहीं आंक रहा लेकिन निश्चय ही वे तुलसी से बहुत नीचे ठहरते हैं. मैं एक और उदाहरण देता हूं. शायद यह ज़्यादा स्पष्ट और उपयुक्त हो. सत्य की खोज में गौतम महलों से निकले और जंगलों में गए. लेकिन आज हम देखते हैं कि वर्तमान युग के गुरु जंगल से निकलते हैं और महलों में जाकर स्थापित हो जाते हैं. ये विपरीत दिशा में जा रहे हैं. इसलिए हम लोग एक ही प्रवाह में इनकी बात नहीं कर सकते. इसलिए, हमें उन नामों की आड़ नहीं लेनी चाहिए जो हर भारतीय के लिए प्रिय और आदरणीय हैं. जब मुझे यहां आमंत्रित किया गया तो मैंने महसूस किया कि हां, मैं नास्तिक हूं और किसी भी हालत में बुद्धिपरक रहने की कोशिश करता हूं. शायद इसीलिए मुझे बुलाया गया है. लेकिन, उसी क्षण मैंने महसूस किया कि एक और खासियत है जो मुझमें और आधुनिक युग के गुरुओं में समान रूप से मौज़ूद है. मैं फिल्मों के लिए काम करता हूं. हममें काफी कुछ एक जैसा है. हम दोनों ही सपने बेचते हैं, हम दोनों ही भ्रम-जाल रचते हैं, हम दोनों ही छवियां निर्मित करते हैं. लेकिन एक फर्क़ भी है. तीन घण्टों के बाद हम कहते हैं – “दी एण्ड, खेल खत्म! अपने यथार्थ में लौट जाइए.” वे ऐसा नहीं करते. इसलिए, देवियों और सज्जनों मैं एकदम स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यहां उस आध्यात्मिकता के बारे में बात करने आया हूं जो दुनिया के सुपरमार्केट में बिकाऊ है. हथियार, ड्रग्स और आध्यात्मिकता ये ही तो हैं दुनिया के तीन सबसे बड़े धन्धे. लेकिन हथियार और ड्रग्स के मामले में तो आपको कुछ करना पड़ता है, कुछ देना पड़ता है. इसलिए वह अलग है. यहां तो आप कुछ देते भी नहीं.इस सुपर मार्केट में आपको मिलता है इंस्टैण्ट निर्वाण, मोक्ष बाय मेल, आत्मानुभूति का क्रैश कोर्स – चार सरल पाठों में कॉस्मिक कांशियसनेस. इस सुपर मार्केट की चेनें सारी दुनिया में मौज़ूद हैं, जहां बेचैन आभिजात वर्गीय लोग आध्यात्मिक फास्ट फूड खरीद सकते हैं. मैं इसी आध्यात्मिकता की बात कर रहा हूं.प्लेटो ने अपने डायलॉग्ज़ में कई बुद्धिमत्तापूर्ण बातें कही हैं. उनमें से एक यह है कि किसी भी मुद्दे पर बहस शुरू करने से पहले शब्दों के अर्थ निश्चित कर लो. इसलिए, हम भी इस शब्द- ‘आध्यात्मिकता’ का अर्थ निश्चित कर लेने का प्रयत्न करते हैं. अगर इसका अभिप्राय मानव प्रजाति के प्रति ऐसे प्रेम से है जो सभी धर्मों, जतियों, पंथों, नस्लों के पार जाता है, तोमुझे कोई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं उसे मानवता कहता हूं. अगर इसका अभिप्राय पेड़-पौधों, पहाड़ों, समुद्रों, नदियों और पशुओं के प्रति, यानि मानवेत्तर विश्व से प्रेम से है, तो भी मुझे क़तई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं इसे पर्यावरणीय चेतना कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का मतलब विवाह, अभिभावकत्व, ललित कलाओं, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रति हार्दिक सम्मान का नाम है? मुझे भला क्या असहमति हो सकती है श्रीमान? मैं इसे नागरिक ज़िम्मेदारी कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ अपने भीतर उतरकर स्वयं की ज़िन्दगी का अर्थ समझना है? इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मैं इसे आत्मान्वेषण या स्व-मूल्यांकन कहता हूं. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ योग है? पतंजलि कीकृपा से, जिन्होंने हमें योग, यम, यतम, आसन, प्राणायाम के मानी समझाए, हम इसे किसी भी नाम से कर सकते हैं. अगर हम प्राणायाम करते हैं, बहुत अच्छी बात है. मैं इसे हेल्थ केयर कहता हूं. फिजीकल फिटनेस कहता हूं. तो अब मुद्दा सिर्फ अर्थ विज्ञान का है. अगर यही सब आध्यात्मिकता है तो फिर बहस किस बात पर है? जिन तमाम शब्दों का प्रयोग मैंने किया है वे अत्यधिक सम्मानित और पूरी तरह स्वीकार कर लिए गए शब्द हैं. इनमें कुछ भी अमूर्त या अस्पष्ट नहीं है. तो फिर इस शब्द- आध्यात्मिकता- पर इतनी ज़िद क्यों? आखिर आध्यात्मिकता शब्द में ऐसा क्या है जो इन शब्दों में नहीं सिमट आया है? वो ऐसा आखिर है क्या?पलटकर कोई मुझी से पूछ सकता है कि आपको इस शब्द से क्या परेशानी है? क्यों मैं इस शब्द को बदलने, त्यागने, छोड़ देने, बासी मान लेने का आग्रह कर रहा हूं. आखिर क्यों? मैं आपको बताता हूं कि मेरी आपत्ति किस बात पर है. अगर आध्यात्मिकता का अर्थ इन सबसे है तो फिर बहस की कोई बात नहीं है. लेकिन कुछ और है जो मुझे परेशान करता है. शब्द कोष में आध्यात्मिकता शब्द, -स्पिरिचुअलिटी- की जड़ें आत्मा, स्पिरिट में हैं. उस काल में जबइंसान को यह भी पता नहीं था कि धरती गोल है या चपटी, तब उसने यह मान लिया था कि हमारा अस्तित्व दो चीज़ों के मेल से निर्मित है. शरीर और आत्मा. शरीर अस्थायी है. यह मरणशील है. लेकिन आत्मा, मैं कह सकता हूं, बायोडिग्रेडेबल है. आपके शरीर में लिवर है, हार्ट है, आंतें हैं, दिमाग है. लेकिन क्योंकि दिमाग शरीर का एक हिस्सा है और मन दिमाग के भीतर रहता है, वह घटिया है क्योंकि अंतत: शरीर के साथ दिमाग का भी मरना निश्चित है. लेकिन चिंता न करें, आप फिर भी नहीं मरेंगे, क्योंकि आप तो आत्मा हैं और क्योंकि आत्मा परम चेतस है, वह सदा रहेगी, और आपकी ज़िन्दगी में जो भी समस्याएं आती हैं वे इसलिए आती हैं कि आप अपने मन की बात सुनते हैं. अपने मन की बात सुनना बन्द कर दीजिए.. आत्मा की आवाज़ सुनिए – आत्मा जोकॉस्मिक सत्य को जानने वाली सर्वोच्च चेतना है. ठीक है. कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि पुणे में एक आश्रम है, मैं भी वहां जाया करता था. मुझे वक्तृत्व कला अच्छी लगती थी. सभा कक्ष के बाहर एक सूचना पट्टिका लगी हुई थी: “अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़ कर आएं”. और भी गुरु हैं जिन्हें इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं होता है कि आप जूते बाहर नहीं छोड़ते. लेकिन दिमाग?.....नहीं.अब, अगर आप अपना दिमाग ही बाहर छोड़ देते हैं तो फिर क्या होगा? आपको ज़रूरत होगी ऐसे गुरु की जो आपको चेतना के अगले मुकाम तक ले जाए. वह मुकाम जो आत्मा में कहीं अवस्थित है. वह सर्वोच्च चेतना तक पहुंच चुका है. उसे परम सत्य ज्ञात है. लेकिन क्या वह आपको बता सकता है? जी नहीं. वह आपको नहीं बता सकता. तो, अपना सत्य आप खुद ढूंढ सकेंगे?. जी नहीं. उसके लिए आपको गुरु की सहायता की ज़रूरत होगी. आपको तो उसकी ज़रूरत होगी लेकिनवह आपको इस बात की गारण्टी नहीं दे सकता कि आपको परम सत्य मिल ही जाएगा... और यह परम सत्य है क्या? कॉस्मिक सत्य क्या है? जिसका सम्बन्ध कॉस्मॉस यानि ब्रह्माण्ड से है? मुझे तो अब तक यह समझ में नहीं आया है. जैसे ही हम अपने सौर मण्डल से बाहर निकलते हैं, पहला नक्षत्र जो हमारे सामने आता है वह है अल्फा सेंचुरी, और वह हमसे केवल चार प्रकाश वर्ष दूर है. उससे मेरा क्या रिश्ता बनता है? क्यों बनता है?तो, राजा ने ऐसे कपड़े पहन रखे हैं जो सिर्फ बुद्धिमानों को ही दिखाई देते हैं. और राजा लगातार बड़ा होता जा रहा है. और ऐसे बुद्धिमानों की संख्या भी निरंतर बढती जा रही है जिन्हें राजा के ये कपड़े दिखाई दे रहे हैं और जो उनकी तारीफ करते हैं. मैं सोचता था कि आध्यात्मिकता दरअसलधार्मिक लोगों की दूसरी रक्षा पंक्ति है. जब वे पारम्परिक धर्म से लज्जित अनुभव करने लगते हैं, जब यह बहुत चालू लगने लगता है तो वे कॉस्मॉस या परम चेतना के छद्म की ओट ले लेते हैं. लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है. इसलिए कि पारम्परिक धर्म और आध्यात्मिकता के अनुयायीगण अलग-अलग हैं. आप ज़रा दुनिया का नक्शा उठाइए और ऐसी जगहों को चिह्नित कीजिए जो अत्यधिक धार्मिक हैं -चाहे भारत में या भारत के बाहर- एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप.... कहीं भी. आप पाएंगे कि जहां-जहां धर्म का आधिक्य है वहीं-वहीं मानव अधिकारों का अभाव है, दमन है. सब जगह. हमारे मार्क्सवादी मित्र कहा करते थे कि धर्म गरीबों की अफीम है, दमित की कराह है. मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता. लेकिन आजकल आध्यात्मिकता अवश्य ही अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.आप देखेंगे कि इनके अनुयायी खासे खाते-पीते लोग है, समृद्ध वर्ग से हैं. ठीक है. गुरु को भी सत्ता मिलती है, ऊंचा कद और पद मिलता है, सम्पत्ति मिलती है..(जिसका अधिक महत्व नहीं है), शक्ति मिलती है और मिलती है अकूत सम्पदा. और भक्तों को क्या मिलता है? जब मैंने ध्यान से इन्हें देखा तो पाया कि इन भक्तों की भी अनेक श्रेणियां हैं. ये सभी एक किस्म के नहीं हैं. अनेक तरह के अनुयायी, अनेक तरह के भक्त. एक वह जो अमीर है, सफल है, ज़िन्दगी में खासा कामयाब है, पैसा कमा रहा है, सम्पदा बटोर रहा है. अब, क्योंकि उसके पास सब कुछ है, वह अपने पापों का शमन भी चाहता है. तो गुरु उससे कहता है कि “तुम जो भी कर रहे हो, वह निष्काम कर्म है. तुम तो बस एक भूमिका अदा कर रहे हो, यह सब माया है, तुम जो यह पैसा कमा रहे हो और सम्पत्ति अर्जित कर रहे हो, तुम इसमें भावनात्मक रूप से थोड़े ही संलग्नहो. तुम तो बस एक भूमिका निबाह रहे हो.. तुम मेरे पास आओ, क्योंकि तुम्हें शाश्वत सत्य की तलाश है. कोई बात नहीं कि तुम्हारे हाथ मैले हैं, तुम्हारा मन और आत्मा तो शुद्ध है”. और इस आदमी को अपने बारे में सब कुछ अच्छा लगने लगता है. सात दिन तक वह दुनिया का शोषण करता है और सातवें दिन के अंत में जब वह गुरु के चरणों में जाकर बैठता है तो महसूस करता है कि मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूं.लोगों का एक और वर्ग है. ये लोग भी धनी वर्ग से हैं. लेकिन ये पहले वर्ग की तरह कामयाब लोग नहीं हैं. आप जानते हैं कि कामयाबी-नाकामयाबी भी सापेक्ष होती है. कोई रिक्शा वाला अगर फुटपाथ पर जुआ खेले और सौ रुपये जीत जाए तो अपने आप को कामयाब समझने लगेगा, और कोई बड़े व्यावसायिक घराने का व्यक्ति अगर तीन करोड भी कमा ले, लेकिन उसका भाई खरबपति हो, तो वो अपने आप को नाकामयाब समझेगा. तो, यह जो अमीर लेकिन नाकामयाब इंसान है, यह क्या करता है? उसे तलाश होती है एक ऐसे गुरु की जो उससे कहे कि “कौन कहताहै कि तुम नाकामयाब हो? तुम्हारे पास और भी तो बहुत कुछ है. तुम्हारे पास ज़िन्दगी का एक मक़सद है, तुम्हारे पास ऐसी संवेदना है जो तुम्हारे भाई के पास नहीं है. क्या हुआ जो वह खुद को कामयाब समझता है? वह कामयाब थोड़े ही है. तुम्हें पता है, यह दुनिया बड़ी क्रूर है. दुनिया बड़ी ईमानदारी से तुम्हें कहती है कि तुम्हें दस में से तीन नम्बर मिले हैं. दूसरे को तो सात मिले हैं. ठीक है. वे तुम्हारे साथ ऐसा ही सुलूक करेंगे.” तो इस तरह इसे करुणा मिलती है, सांत्वना मिलती है. यह एक दूसरी तरह का खेल है. एक और वर्ग. मैं इस वर्ग के बारे में किसी अवमानना या श्रेष्ठता के भाव के साथ बात नहीं कर रहा. और न मेरे मन में इस वर्ग के प्रति कोई कटुताहै, बल्कि अत्यधिक सहानुभूति है क्योंकि यह वर्ग आधुनिक युग के गुरु और आज की आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा अनुयायी है. यह है असंतुष्ट अमीर बीबियों का वर्ग.एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी सारी निजता, सारी आकांक्षाएं, सारे सपने, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व विवाह की वेदी पर कुर्बान कर दिया और बदले में पाया है एक उदासीन पति, जिसने ज़्यादा से ज़्यादा उसे क्या दिया? कुछ बच्चे! वह डूबा है अपने काम धन्धे में, या दूसरी औरतों में. इस औरत को तलाश है एक कन्धे की. इसे पता है कि यह एक अस्तित्ववादी असफलता है. आगेभी कोई उम्मीद नहीं है. उसकी ज़िन्दगी एक विराट शून्य है; एकदम खाली, सुविधाभरी लेकिन उद्देश्यहीन. दुखद किंतु सत्य! और भी लोग हैं. ऐसे जिन्हें यकायक कोई आघात लगता है. किसी का बच्चा चल बसता है, किसी की पत्नी गुज़र जाती है. किसी का पति नहीं रहता. या उनकीसम्पत्ति नष्ट हो जाती है, व्यवसाय खत्म हो जाता है. कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उनके मुंह से निकल पड़ता है: “आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?” किससे पूछ सकते हैं ये लोग यह सवाल? ये जाते हैं गुरु के पास. और गुरु इन्हें कहता है कि “यही तो है कर्म. लेकिन एक और दुनिया है जहां मैं तुम्हें ले जा सकता हूं, अगर तुम मेरा अनुगमन करो. वहां कोई पीड़ा नहीं है. वहां मृत्यु नहीं है. वहां है अमरत्व. वहां केवल सुख ही सुख है”. तो इन सारी दुखी आत्माओं से यह गुरु कहता है कि “मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूं जहां कोई कष्ट नहीं है”. आप मुझे क्षमा करें, यह बात निराशाजनक लग सकती है लेकिन सत्य है, कि ऐसा कोई स्वर्ग नहीं है.ज़िन्दगी में हमेशा थोड़ा दर्द रहेगा, कुछ आघात लगेंगे, हार की सम्भावनाएं रहेंगी. लेकिन उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है. आपमें से कोई मुझसे पूछ सकता है कि अगर इन्हें कुछ खुशी मिल रही है, कुछ शांति मिल रही है तो आपको क्या परेशानी है? मुझे अपनी पढ़ी एक कहानी याद आती है. किसी संत की कही एक पुरानी कहानी है. एक भूखे कुत्ते को एक सूखी हड्डी मिल जाती है. वह उसी को चबाने की कोशिश करने लगता है और इसी कोशिश में अपनी जीभ काट बैठता है. जीभ से खून आने लगता है. कुत्ते को लगता है कि उसे हड्डी से ही यह प्राप्त हो रहा है. मुझे बहुत बुरा लग रहा है. मैं नहीं चाहता कि ये समझदार लोग ऐसा बर्ताव करें, क्योंकि मैं इनका आदर करता हूं. मानसिक शांति या थोड़ा सुकून तो ड्रग्स या मदिरा से भी मिल जाता है लेकिन क्या वह आकांक्ष्य है? क्या आप उसकी हिमायत करेंगे? जवाब होगा, नहीं. ऐसी कोई भी मानसिक शांति जिसकी जड़ें तार्किक विचारों में न हो, खुद को धोखा देने के सिवा और कुछ नहीं हो सकती. कोई भी शांति जो आपको सत्य से दूर ले जाए, एक भ्रम मात्र है, महज़ एक मृग तृष्णा है. मैं जानता हूं कि शांति की इस अनुभूति में एक सुरक्षा-बोध है, ठीक वैसा ही जैसी तीन पहियों की साइकिल में होता है. अगर आप यह साइकिल चलाएं, आप गिरेंगे नहीं. लेकिन बड़े हो गए लोग तीन पहियों की साइकिलें नहीं चलाया करते. वे दो पहियों वाली साइकिलें चलाते हैं, चाहे कभी गिर ही क्यों न जाएं. यही तो ज़िन्दगी है.एक और वर्ग है. ठीक उसी तरह का जैसा गोल्फ क्लब जाने वालों का हुआ करता है. वहां जाने वाला हर व्यक्ति गोल्फ का शौकीन नहीं हुआ करता. ठीक उसी तरह हर वह इंसान जो आश्रम में नज़र आता है, आध्यात्मिक नहीं होता. एक ऐसे गुरु के, जिनका आश्रम दिल्ली से मात्र दो घण्टे की दूरी पर है, घनघोर भक्त एक फिल्म निर्माता ने एक बार मुझसे कहा था कि मुझे भी उनके गुरु के पास जाना चाहिए. वहां मुझे दिल्ली की हर बड़ी हस्ती के दीदार हो जाएंगे. सच तो यह है कि वे गुरु जी निर्माणाधीन दूसरे चन्द्रास्वामी हैं. तो, यह तो नेटवर्किंग के लिए एक मिलन बिन्दु है. ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में अगाध सम्मान है जो आध्यात्मिक या धार्मिक हैं और फिर भी भले इंसान हैं. इसकी वजह है. मैं मानता हूं कि किसी भी भाव या अनुभूति की तरह आपकी भी एकसीमा होती है. आप एक निश्चित दूरी तक ही देख सकते हैं. उससे आगे आप नहीं देख सकते. आप एक खास स्तर तक ही सुन सकते हैं, उससे परे की ध्वनि आपको सुनाई नहीं देगी. आप एक खास मुकाम तक ही शोक मना सकते हैं, दर्द हद से बढ़ता है तो खुद-ब-खुद दवा हो जाता है. एक खास बिन्दु तक आप प्रसन्न हो सकते हैं, उसके बाद वह प्रसन्नता भी प्रभावहीन हो जाती है. इसी तरह, मैं मानता हूं कि आपके भलेपन की भी एक निश्चित सीमा है. आप एक हद तक ही भलेहो सकते हैं, उससे आगे नहीं. अब कल्पना कीजिए कि हम किसी औसत इंसान में इस भलमनसाहत की मात्रा दस इकाई मानते हैं. अब हर कोई जो मस्जिद में जाकर पांच वक़्त नमाज़ अदा कर रहा है वह इस दस में से पांच इकाई की भलमनसाहत रखता है, जो किसी मदिर में जाता है या गुरु के चरणों में बैठता है वह तीन इकाई भलमनसाहत रखता है. यह सारी भलमनसाहत निहायत गैर उत्पादक किस्म की है. मैं इबादतगाह में नहीं जाता, मैं प्रार्थना नहीं करता. अगर मैं किसी गुरु के पास, किसी मस्जिद या मंदिर या चर्च में नहीं जाता तो मैं अपनेहिस्से की भलमनसाहत का क्या करता हूं? मुझे किसी की मदद करनी होगी, किसी भूखे को खाना खिलाना होगा, किसी को शरण देनी होगी. वे लोग जो अपने हिस्से की भलमनसाहत को पूजा-पाठ में, धर्म या आध्यात्म गुरुओं के मान-सम्मान में खर्च करने के बाद भी अगर कुछ भलमनसाहत बचाए रख पाते हैं, तो मैं उन्हें सलाम करता हूं.आप मुझसे पूछ सकते हैं कि अगर धार्मिक लोगों के बारे में मेरे विचार इस तरह के हैं तो तो फिर मैं कृष्ण, कबीर या गौतम के प्रति इतना आदर भाव कैसे रखता हूं? आप ज़रूर पूछ सकते हैं. मैं बताता हूं कि क्यों मेरे मन में उनके प्रति आदर है. इन लोगों ने मानव सभ्यता को समृद्ध किया है. इनका जन्म इतिहास के अलग-अलग समयों पर, अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ. लेकिनएक बात इन सबमें समान थी. ये अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए. ये दलितों के लिए लड़े. चाहे वह रावण हो, कंस हो, कोई बड़ा धर्म गुरु हो या गांधी के समय में ब्रिटिश साम्राज्य या कबीर के वक़्त में फिरोज़ शाह तुग़लक का धर्मान्ध साम्राज्य हो, ये उसके विरुद्ध खड़े हुए. और जिस बात पर मुझे ताज़्ज़ुब होता है, और जिससे मेरी आशंकाओं की पुष्टि भी होती है वह यह कि ये तमाम ज्ञानी लोग, जो कॉस्मिक सत्य, ब्रह्माण्डीय सत्य को जान चुके हैं, इनमें से कोई भी किसी सत्ता की मुखालिफत नहीं करता. इनमें से कोई सत्ता या सुविधा सम्पन्न वर्ग के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं करता. दान ठीक है, लेकिन वह भी तभी जब कि उसे प्रतिष्ठान औरसत्ता की स्वीकृति हो. लेकिन आप मुझे बताइये कि कौन है ऐसा गुरु जो बेचारे दलितों को उन मंदिरों तक ले गया हो जिनके द्वार अब भी उनके लिए बन्द हैं? मैं ऐसे किसी गुरु का नाम जानना चाहता हूं जो आदिवासियों के अधिकारों के लिए ठेकेदारों से लड़ा हो. मुझे आप ऐसे गुरु का नाम बताएं जिसने गुजरात के पीड़ितों के बारे में बात की हो और उनके सहायता शिविरों में गया हो. ये सब भी तो आखिर इंसान हैं. मान्यवर, यह काफी नहीं है कि अमीरों को यह सिखाया जाए कि वे सांस कैसे लें. यह तो अमीरों का शगल है. पाखण्डियों की नौटंकी है. यह तो एक दुष्टता पूर्ण छद्म है. और आप जानते हैं कि ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में इस छद्म के लिए एक खास शब्द है, और वह शब्द है: होक्स(HOAX). हिन्दी में इसे कहा जा सकता है, झांसे बाजी!.धन्यवाद.
गुरुवार, 19 मार्च 2009
व्यंग्य-कक्ष में *****एक संपूर्ण पुरूष*****
वह एक संपूर्ण पुरूष था।‘अ कंपलीट मैन‘। मर्दों में मर्द। पतियों में पति। दोस्तों में दोस्त। रिश्तेदारों में रिश्तेदार। स्वस्थों में स्वस्थ। बीमारों में बीमार। लेखकों में लेखक। कलाकारों में कलाकार। प्रगतिशीलों में प्रगतिशील। रूढ़िवादियों में रूढ़िवादी। आधुनिक। परंपरावादी। देशप्रेमी। सहिष्णु। तेजतर्रार। विनम्र। आक्रामक। नाराज़। संतुष्ट। सभी कुछ। एक संपूर्ण पुरूष। ‘अ कंपलीट मैन‘ं।
पत्नी उससे खुश थी। चूंकि वह पत्नी को खुश रखता था, इसलिए पत्नी को खुश रहना पड़ता था। पत्नी के अलावा भी वह कई पत्नियों और दूसरी स्त्रियों को खुश रखता था। इस संबंध में उसके अपने तर्क भी थे। जब वह दूसरी स्त्रियों के बीच होता तो कहता कि मैं मर्द हूं। स्मार्ट हूं। लड़कियां मुझ पर मरती हैं। मैं कितना प्रगतिशील हूं। जब दूसरे मर्द दूसरी स्त्रियों या उसके घर की स्त्रियों के साथ होते तो वह परंपरावादी हो जाता। कहता कि वे जनानियां हैं। औरतों में घुसे रहते हैं। दूसरी स्त्रियों से अपनी घनिष्ठता के बीच आने वाले उनके पतियों, भाइयों और दूसरे लोगों को वो किसी-न-किसी तरह पटाए-फुसलाए-बहलाए रखता। जबकि अपनी स्त्रियों से घनिष्ठता बनाने वाले हर पुरूष को कोई-न-कोई चाल चलकर संबंध तोड़ने पर मजबूर कर देता।
वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।
समाज में उसकी इज़्ज़त थी, प्रतिष्ठा थी, सम्मान था। किसी के घर बच्चा पैदा होता तो वह किलकारियां मारता सबसे पहले बधाई देने पहुंच जाता। बच्चे के मां-बाप को भेंट देता, शाबासी देता, हर तरह से प्रोत्साहित करता। बाहर निकलकर दूसरे लोगों से कहता कि साले, मूर्ख और गंवार कहीं के, बच्चे पैदा किए चले जा रहे हैं। न देश का खयाल है, न समाज का, न बच्चों के भविष्य का। लोग सुनकर खुश होते कि देखो अगले को सभी की कितनी चिंता है। कोई मरता तो सबसे पहले लटकने वाला चेहरा उसी का होता। अर्थी को दिए जाने वाले चार कंधों में एक उसका होना लगभग निश्चित था। जैसे वह रोज इंतजार ही कर रहा होता कि कोई मरे और वह दुःख बांटने जाए। आदमी से प्रेम करने की बजाय समाज को खुश रखना उसका दर्शन था।
वह एक संपूर्ण पुरूष था। अ कंपलीट मैन।
लोगों से बाते करते हुए उसकी ‘स्मार्टनेस‘ देखते ही बनती थी। वह जानता था कि ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान‘। अर्थात् ‘प्रैक्टिस मेक्स अ मैन परफैक्ट‘। सो दिन-रात अभ्यास करके उसने कमीनेपन, दोमुंहेपन, पाखंड, नीचता, लंपटता, लुच्चई जैसे अत्यावश्यक चारित्रिक गुणों का विकास अपने अंदर कर लिया था। अपनी वाक्पटुता को वह तर्क कहकर खुश रहता, तो दूसरों के तर्कों को वाग्जाल कहकर भी वह ही खुश रहता। ‘फूट डालो और राज करो‘ इस स्वर्णिम सूक्ति ने उसे दोस्तों, रिश्तेदारों व सहकर्मियों के बीच पाॅपुलर व अमर बना दिया था। उसके संबंध मूलतः दो तरह के लोगों से थे। एक तो वे जिनकी चमचागिरी वह कर सके। दूसरे वे जो उसकी चमचागिरी कर सकें। दूसरों के बिना वह इसलिए नहीं रह पाता था कि बिना उन्हें छोटा किए खुद को बड़ा नहीं मान पाता था। यूं वह महान था कि अपने महान होने के लिए उसने दूसरों को इतना महत्व दे दिया था।
वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।
जब वह लिखने पर उतारू हो जाता तो एक-से-एक चीज लिख मारता। ऐसे-ऐसे लेख जो दूसरे लिखें तो किसी अखबार में संपादक के नाम पत्र में भी न छपें। मगर उसके व्यावहारिक स्वभाव व सामाजिक संबंधों के चलते संपादकीय पृष्ठ पर बतौेर मुख्य लेख छप जाते।
आदमी को सामाजिक जानवर बनाने वाली सभी किताबें उसने घोंट रखी थीं। सो जानता था कि ‘आॅफेंस इज़ द बेस्ट डिफेंस‘ यानी ‘आक्रमण में ही सुरक्षा है‘। अतः किसी की रचना चुराता तो साथ ही उस पर चोरी का आरोप भी लगा देता। ऐसा जो कुछ भी करता सब दूसरों पर थोप देता। कवि सम्मेलनों के अलावा भी कवि सम्मेलन कर लेता।
जन्मोत्सवों में बधाई गायन और विवाहों में सेहरा गायन आदि के साथ-साथ मुर्दनी के माहौल को कवि मेले में बदल देने का हुनर भी उसमें था। अतः मुर्दों समेत सभी उससे खुश थे। यही उसकी कलाकारी थी कि वह कलाकार न होते हुए भी कलाकार था।
एक संपूर्ण पुरूष। अ कंपलीट मैन। जो कि वह था।
मगर जो शेर उसकी संपूर्णता में बाधक था, अभी भी हैः-
ये चलती-फिरती सूरतें जो देखते हैं आप,/
कितने हैं इनमें वाकई इंसा न पूछिए।
-संजय ग्रोवर
(25 अप्रैल, 1997 में को अमर उजाला में प्रकाशित)
रविवार, 1 मार्च 2009
व्यंग्य-कक्ष में*****ऐतिहासिक भावनाएं*****
पिछले कुछ महीनों से इतिहास ने मेरे दैनिक जीवन में खलबली मचा दी है। मन का चैन और आँखों की नींद उड़ गयी है। जब भी कुछ खाता हूँ, पीता हूँ या करता हूँ तो मन में आशंकाएं घिरने लगती हैं कि हज़ार साल बाद या पाँच सौ साल बाद या पचास साल बाद इसे लेकर क्या सोचा जाएगा ? क्या इससे लोगों की भावनाएं तो नहीं आहत हो जाएंगी ? क्या इससे कोई अपने आपको उपेक्षित, अपमानित, उपहासित, हास्यास्पद हुआ तो नहीं महसूस करेगा ? लगने लगा है कि अब सब कुछ इसे लेकर तय करना पड़ेगा कि पचास/पाँच सौ/पाँच हज़ार सालों बाद उसके कैसे और कितने अर्थ व निष्कर्ष निकाले जाएंगे!फिलहाल भावनाओं की वो किस्म ज़्यादा प्रचलन में है जो बात-बात पर आहत हो जाती है। भावनाओं पर इतना और ऐसा ही ज़ोर रहा तो डर है कि जल्दी ही भावनाएं भी ऐतिहासिक न हो जाएं!
सोमवार, 23 फ़रवरी 2009
बुधवार, 18 फ़रवरी 2009
व्यंग्य-कक्ष में *****महान देश के महान लोग*****
यह असम्भव ही लगता है कि किसी को हमारे देश की महानता के बारे में पता न हो। फिर भी कोई भूल न जाए इसलिए 15 अगस्त और 26 जनवरी के अलावा भी कई अन्य उपयुक्त अवसरों पर बताया जाता है कि देश महान है। रेडियो, टीवी, अखबारादि अक्सर घोषणा करते रहते हैं कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, परम्पराएं वगैरह सब महान हैं। शायद इस तरह की घोषणाएं भी हमारी परम्परा का एक हिस्सा है। वैसे भी अच्छी बातें बताने वालों को बस अवसर मिलना चाहिए, उपयुक्त तो वे उसे बना ही लेते हैं। बल्कि अवसर मिलने का भी इन्तज़ार नहीं करते और ऐसी स्थितियां पैदा कर देते हैं कि अवसर खुद-ब-खुद निकल आता है। तो जब इतने सालों से और इतने तरीकों और तरक़ीबों से समझाया जा रहा हो कि देश महान है तो मान ही लेना चाहिए कि देश महान है। वैसे भी व्यक्ति का फर्ज़ यह है कि जिस देश में वो पैदा हो जाए उसी को महान मानने लगे। दुनिया के सभी लोग ऐसा ही करते हैं। फिर हम क्या कोई आसमान से टपके हैं!देश के महान होने का कोई निश्चित वक़्त नहीं होता। यह महानता सुबह-सवेरे ही शुरू हो जाती है। सुबह-सुबह ही हलवाई की दुकान पर पारम्परिक पकवान जलेबी, कचैड़ी या समोसा खाने पधारे ‘न्यू प्राचीन एण्ड कं.‘ के मालिक लाला लपेटचंद जी सभ्यता और संस्कृति की चिन्ता में सूखना शुरू हो जाते हैं। वे एक ‘देशद्रोही’ अंग्रेजी फिल्मी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ममता कुलकर्णी द्वारा अपने निर्लज्ज नग्न चित्र छपवाने के कारण उससे बहुत नाराज हैं। लाला जी नितांत प्राकृतिक वेषभूषा में सुबह की हवाखोरी के हल्के मूड में इधर को निकल आए हैं। अपवादस्वरूप उन्होंने कमर के निचले हिस्से में एक अधोवस्त्र पहना हुआ है जोकि उनके घुटनों से नीचे के इलाके को ढकने में किन्हीं अपरिहार्य कारणों से असमर्थ हैं। बोलचाल की भाषा में इस अधोवस्त्र को कच्छा, जांघिया या कभी कभार घुटन्ना भी कहते हैं। ऐसी दशा में लाला की यह चिन्ता स्वाभाविक ही लगती है कि ममता को पुरूषों के बारे में नहीं तो कम से कम देश की बहू-बेटियों के भविष्य के बारे में तो सोचना चाहिए।
लाला बैंच पर बैठे हुए हैं। विवाद खड़ा हुआ है। लोग हां, हूं करते हुए सुन रहे हैं। और कचैड़ियां खाते जा रहे हैं। तिस पर भी लाला तैश में आ जाते हैं और पास खड़े मरियल कुत्ते पर लात जमा कर दोना बीच सड़क पर फेंक देते हैं। साथ ही धुर्र, फटाक की पारम्परिक आवाज़ के साथ सड़क पर ज़ोेर से थूकते हैं और सभ्यता और संस्कृति की चिंता में दो और वाक्य बोलकर घर के लिए प्रस्थान करते हैं।
लाला जल्दी में हैं। उन्हें अपनी पत्नी की चिंता है। जब तक वे घर नहीं पहुंचेंगे, पत्नी नाश्ता छुएगी तक नहीं, भले ही उन्हें लौटने, नहाने, धोने में कितना ही वक़्त लग जाए। पत्नी भूखी न रह जाए, इसी वजह से उन्हें रोेज़ इसी तरह दो-दो बार नाश्ता करना पड़ता है।
ऐसा भी नहीं कि लाला अकेले ही सभ्यता और संस्कृति के लिए परेशान हैं। दरअसल ऐसे लोग तो बहुत सारे हैं, अनगिनत। अक्सर देखने में आता है कि लोगों को कितनी भी जोर से ‘लगी‘ हुई हो मगर वे कोई दीवार या गली नज़र आ जाने तक धैर्य बनाए रखते हैं और जल वितरण नहीं करते। शायद सभ्यता और संस्कृति की खातिर ही वे इस जल वितरण में ज्यादा देर तक रूकावट डालने से होने वाले शारीरिक और मानसिक कष्ट को पी जाते हैं और बीच सड़क पर कोई ऐसी हरकत नहीं करते जिससे कि आम ज़ुबान में ‘पेशाब करना‘ या ‘मूतना‘ कही जाने वाली इस नैसर्गिक क्रिया पर कोई आंच आए। अनेकानेक पर्यावरण प्रेमी सड़क किनारे लगे पेड़ों को इस परोपकारी क्रिया से नवाज कर पुण्य प्राप्त करते हैं। कुछ अत्यन्त उत्साही युवा जन तो रात-बिरात ही इतने जोश में आ जाते हैं कि पक्की सड़क पर ही ‘बर्फ में आग लगा देंगंे‘ के अंदाज़ में धारा-प्रवाह करना शुरू कर देते हैं।
हमारे परम्परा भी बड़ी समृद्ध है। सारे अविष्कार एवं खोजें हमारे यहां प्राचीन काल में ही किए जा चुके हैं। चूंकि इन आविष्कारों व खोजों को करने में हमें काफी श्रम करना पड़ा सो हम काफी थक गए हैं और पिछले कई सालों से आराम कर रहे हैं। अब करने को कुछ बचा भी नहीं। सिवाय इसके कि जब भी दुनिया में कोई अविष्कार होता है हम अपने प्राचीन ग्रंथों में से तुरन्त ढूंढ-ढांढ कर बता देते हैं कि फलां पन्ने की फलां पंक्ति में फलां व्यक्ति ने यह आविष्कार पहले ही कर लिया है। तत्पश्चात् हम विदेश में हुए किसी ताज़ा आविष्कार को अपने किसी नए नाम से घटिया और नकली पुर्जों के सहारे बनाने की तिकड़म सोचने लगते हैं। जिसमें कि हम अक्सर सफल होते हैं। और सिद्ध कर देते हैं कि हम अपने प्राचीन कालिक आविष्कार की आधुनिक विदेशी नकल की नकल करते हुए भी उतने ही मौलिक बने रहते हैं।
इस सब के अलावा अपने यहां स्त्रियों का भी बहुत सम्मान किया जाता है। उन्हें देवी माना जाता है। इसलिए अधिकाँश पुरूष चाहते हैं स्त्रियां मंदिर में स्थित देवी की मूर्ति की तरह शांत व स्थिर एक कोने में पड़ी रहें। ज्यादातर पुरूष जब अन्यान्य तरीकों से स्त्रियों का सम्मान करते रहने के बावजूद भी असंतुष्ट रह जाते हैं और उनमें महानता की भावना और भी बलवती हो उठती है तब वे विवाह कर लेते हैं। और स्त्रियों को व्यक्तिगत तौैर पर सम्मान प्रदान करते हैं। इससे उनका यह डर भी कम हो जाता है कि कोई अन्य व्यक्ति उनके लिए आरक्षित स्त्री का सम्मान न कर डाले। पर इधर सुनने में आया है कि स्त्रियां अब सम्मान करवाते-करवाते थक गई हैं। वे चाहती हैं कि अब उन्हें मौका दिया जाए। जिससे कि वे पुरूषों का यथोचित सम्मान करके यह कर्ज़ा उतार सकें।
इस प्रकार सभ्यता, संस्कृति, परम्परा, मर्यादा वगैरह से लबालब हमारे देश में कहने-सुनने को बहुत कुछ है। परन्तु एक ही लेख में सब कुछ कहते हुए तो मैं असभ्य ही दिखाई पड़ूंगा। और मेरी समझ में असभ्य होना इतनी बुरी बात नहीं जितना कि असभ्य दिखना। आपका क्या ख्याल है?
-संजय ग्रोवर
(12 अगस्त, 1994 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

