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रविवार, 13 नवंबर 2022

लैट द होल वर्ल्ड नो अर्थात् दुनिया को पता तो चले !

व्यंग्य 



 


इस देश में योग्यता, प्रतिभा, वीरता और मौलिकता की ठीक से कद्र कभी भी नहीं हुई। ख़ामख्वाह सारी तवज्जो नेताओं को दे दी जाती है। हैरानी है कि भ्रष्टाचार के गुणगान के मामले में भी यही हो रहा है और कोई बोलनेवाला नहीं है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया जिसे शायद चौथा खंबा कहते हैं, वह भी सिर्फ़ नेताओं के भ्रष्टाचार की आरती उतारने में लगा है। यूं तो ठीक भी है, खंबा नाम कुछ सोचकर ही दिया गया होगा। सारी दुनिया इधर से उधर हो जाए, खंबा कहां अपनी जगह से हिलता है ! ज़्यादा हुआ तो टूटकर अपने ही पैरों में घुस जाता है। यह जानते हुए भी कि खंबे हिलने के लिए नहीं होते, हम उन्हें हिलाने में लगे रहते हैं। और इन दिनों तो पक्षपात की हद हो रही है। जनता के टेलेंट पर पर्दा डाला जा रहा है। मैं पूछता हूं कि क्या भ्रष्टाचार की सारी योग्यता 100-50 नेताओं तक जाकर ख़त्म हो गयी है ?


अरे, कभी हमारे बीच आओं, एक-एक घर को देखो आकर, एक-एक नागरिक से मिलो, असलियत देखो, दिखाओ! ख़ामख्वाह नेता को सिर पर चढ़ा रखा है। क्षोभ होता है। जनता के यहां चप्पे-चप्पे पर वीरता की निशानियां भरी पड़ीं हैं। मौलिकता ठाठें मार रही है। क्या किसी राणा प्रताप की इतनी हिम्मत थी कि नक्शा कुछ हो और घर कुछ और बना दे !? घास की रोटियां खाने से कहीं संस्कृतियां बनतीं हैं? और उन गांधी जी को देखो! चल दिए आज़ादी की लड़ाई लड़ने ! भाई साहब! नीचे से ऊपर तक पूरा नेटवर्क बिठाना पड़ता है माफ़िया का, एक-एक विभाग में सैटिंग रखनी पड़ती है, पड़ोसियों को डराना-धमकाना और ‘समझाना’ पड़ता है तब जाकर एक नाजायज़ टॉयलेट या छोटा-सा कमरा बन पाता है। मज़ाक समझ रक्खा है क्या !? पड़ोसी ढीठ हो, असामाजिक हो, अधार्मिक हो, पिटकर भी न मानता हो तो मुश्क़िल हो जाती है। रात-रात भर जागकर काम करना पड़ता है।  


अरे तुम आओ तो सही। मैं तो कहता हूं विदेशी पर्यटको को भी यहीं भेजो। कहां बेचारों को आगरा के ताजमहल और हैदराबाद के मीनारों पर भटका रहे हो? हमारी असली संस्कृति तो यहां घर-घर में बिखरी पड़ी है। ये बढ़ी हुई बालकनियां, ये छज्जे, ये गटर के ऊपर बनाए कमरे हमारी सांस्कृतिक धरोहर नहीं हैं तो क्या हैं ? ये जो अपने चरित्र के परमानेंट ठोस सबूत हमने अपने हाथों से बनाए हैं, इनका क्या कोई मतलब नहीं है? विदेशियों को ठीक से पता तो चले कि राष्ट्रवाद की, धार्मिकता की, सामाजिकता की, इंसानियत की हमारी असली अवधारणाएं आखि़र हैं क्या ? हमारा घर-घर, दुकान-दुकान टूरिस्ट प्लेस है। इनपर टिकट लगाकर कमाई भी हो सकती है। आधा पैसा सरकार ले आधा घरवालों को दिया जाए। वो इसलिए कि मैंने अकसर देखा है कि इन सजे-संवरे-पत्थरथुपे फ्लैटों में अकसर ग़रीब लोग रहते हैं। इन बेचारों की कभी पूर्ति नहीं होती। छज्जा निकल जाए तो इन्हें बालकनी चाहिए, बालकनी बन गयी तो इन्हें लगता है यार, यहां तो कमरा होना चाहिए था। कमरा हो जाए तो याद आता है कि शर्माजी ने तो अपने में 3 आगे और 2 पीछे बना रखे हैं, उनसे आयडिया लेकर आता हूं। कल बच्चे की शादी भी होनी है, जगह कम न हो जाए। बच्चे इनके हैं, भुगतेगा पड़ोसी। टूरिस्टों को दिखाना चाहिए कि देखो ऐसा होता है ज़िम्मेदार और सामाजिक आदमी। कुछ सीखो इन जगदगुरुओं से। ईडियटस्!


देखो इनका कॉन्फ़िडेंस लेवल! क्या बच्चा, क्या बूढ़ा, क्या डॉक्टर, क्या वक़ील, क्या स्त्री, क्या पुरुष ! एक से एक हैं। इन्हें कहीं बिठा दो, कहीं भेज दो, हर जगह भ्रष्टाचार करके दिखा देंगे। मंदिर में रखवा दो, दुकान पे बिठा दो, ऑफ़िस में लिटा दो, प्राइवेट सेक्टर में भेज दो, सरकारी में ऐडजस्ट करा दो....कहीं से भी बिना भ्रष्टाचार किए लौट आएं तो आप मेरा नाम बदलकर ईमानदार रख देना। लानत भेजना मुझ पर अगर पता चले कि कि कोई विदेश में जाकर अपनी ‘संस्कृति के चिन्ह’ छोडे़ बिना लौट आया। फ़िर क्यों मीडिया नेताओं की मेरिट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है ? क्या उन्होंने मीडिया को कुछ डोनेशन वगैरह दे दिया है ? अरे हमें बताओ तो सही, हम और बढ़िया इंतज़ाम करके देंगे। टीवी पर दिखने के लिए हम मुंह पोतकर उछलने को भी तैयार रहते हैं तो फिर क्यों हमारी योग्यता को दबाया जा रहा है ?


मुझे लगता है कि सरकार और मीडिया इस मामले में कुछ नहीं करनेवाले। क्या सरकार को इस बात का अंदाज़ा नहीं कि पड़ोसी के मीटर में तार डालना और हर बार इस तरह मीटर बदल-बदलकर डालना कि पड़ोसी को सिर्फ़ इतना ही लगे कि ‘हां, यार कभी-कभी आ जाते हैं सौ-दो सौ रु. ज़्यादा, कोई बत्ती जलती छूट गयी होगी किसी दिन’ कुछ कम बड़ा हुनर है !?


मीडिया अगर साथ दे तो बहुत कुछ हो सकता है। रियल रिएलिटी शो बनाए जा सकते हैं जैसे-‘भ्रष्टाचार का आंचल’, बेईमानी की छांव में’, ‘ईमानदारी का नरक’, ‘खा-पी टीवी पर पहलीबार: असली जनता का असली भ्रष्टाचार’, ‘असली भ्रष्टाचारी कौन ?’, इनमें टीमें बनायी जा सकती हैं। टीमों को काम दिए जा सकते हैं कि जो सबसे पहले नाजायज़ कमरा बना कर दिखाएगा, विजेता होगा। डांसिंग-फ्लोरस् बनाकर उनके नाम रखे जा सकते हैं-'क़ानून की छाती',' इंसानियत का मलबा' आदि। सरप्राइज़ तत्व डाले जा सकते हैं जैसे कि ईमानदार या मजबूर पड़ोसी बेईमान कमरा निर्माताओं को ख़ुद आमंत्रित कर रहा है कि आईए सर, हे वीर पुरुष, हे महासामाजिक प्राणी, हे धर्म-धुरंधर, आओ, पचास-पचास के गुट बनाकर मुझे पीटो। मैं आपसे पिटकर पवित्र होना चाहता हूं। आप नहीं आएंगे तो मैं आपको निमंत्रण-पत्र भेजकर बुलाऊंगा। आखिर देश की असली सभ्यता-संस्कृति-परंपरा को टूटने से बचाने का सवाल है। देखो, कितने विदेशी दर्शक तुम्हारी योग्यता, वीरता और प्रतिभा का प्रदर्शन देखने दूर-दूर से आए हैं। देखने लायक दृश्य होगा कि ‘क़ानून की छाती’ पर चढ़कर पचास-पचास लोग एक आदमी को पीट रहे हैं, ‘इंसानियत के मलबे’ पर अपने-अपने षड्यंत्रों के साथ नाच रहे हैं। ‘सलाम ज़िंदगी’, ‘हलो ज़िंदगी’, ‘जीना इसीका नाम है’ जैसे कार्यक्रमों से प्रेरणा लेकर कुछ और दृश्य जोड़े जा सकते हैं। जैसे पीछे परदे पर पीटनेवाले जन-भ्रष्टाचारियों के संबंधियों-दोस्तों के साक्षात्कार चल रहे हों। लीजिए, एक बहिन कह रही है,‘भैया तो शुरु से ही बड़े स्मार्ट थे। बिना टिकट ही गाड़ी में भी घूम आते थे और फ़िल्म भी देख आते थे। और बचे पैसों के समोसे लाकर आधे मुझे खिला देते थे। हमारा नेचर बिलकुल एक जैसा है, इसलिए शुरु से ही बहुत पटती थी।’ और यह सुनकर इकले को पीटते-पीटते भैया की आंखें भर आतीं हैं। पीटना रोककर वह इकले की कमीज़ फ़ाड़ते हैं और अपने आंसू पोंछने लगते हैं। उधर परदे पर अंग्रेजी में सबटायटल्स भी चल रहे हैं ताकि विदेशी दर्शक हमारी सभ्यता-संस्कृति को क़रीब से अर्थात् ज़मीनी यानि ग्रासरुट लेवल पर समझ सकें और भ्रष्टाचार के संदर्भ में भारतीय राजनेताओं से उनका मोहभंग हो सके।  बड़े भ्रष्टाचारी बने फ़िरते हैं ससुरे। क्या औक़ात है इनकी भारत की जनता के सामने !?


 


अव्वल तो कोई पूछता नहीं मगर यह रिएलिटी शो है इसलिए एक आदमी आ गया है पूछने, ‘भाई साहब, आप सब इस आदमी को क्यों पीट रहे हैं !?


‘बड़ा ऐंटी-सोशल आदमी है जी, किसीसे मिल-जुलके नहीं चलता।’


‘अच्छा जी ! हुआ क्या ?’


एक छोटी-सी दुकान बना रहा हूं ज़रा-सी ज़मीन ऐनक्रोच करके, साला बनाने नहीं दे रहा, कहता है मेरे घर का रास्ता बंद होता है! हम कह रहे हैं तू भी बनाले कुछ, हम सहयोग कर देंगे पर मानता नहीं, साले ने अपने अलग ही क़ानून बना रक्खे हैं !’


‘बड़ा ग़लत आदमी है ! जरा मैं भी हाथ फरैरे कल्लूं।’


पीछे गाना बज रहा है,‘सारे बजाज और सारे दलाल, चाहते हैं अच्छा लुकपाल, जिन्नलुकपाल, जिन्नलुकपाल, चहिए हमको जिन्नलुकपाल....’


ठीक भी है, कम-अज़-कम जिन्न का ‘लुक’ तो ऐसा होना ही चाहिए जिसे ‘पाला’ जा सके!


और भारत में कैसी हैरत ! जो लोग अपने बीच क़ानून का पालन करनेवालों को बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें नेताओं के खि़लाफ़ एक कड़ा क़ानून चाहिए। 


 (जारी)


--संजय ग्रोवर


13-11-2011

बुधवार, 28 अगस्त 2013

एक नई जाति



हर आदमी चाहता है, जीवन में कुछ अच्छा काम करुं। इस चक्कर में कई लोग मंदिर-मस्ज़िद जाते हैं, दान-पुन्न वगैरह करते हैं, कई तरह से कई तरीक़े करते हैं। लेकिन कई बार फ़िर भी मन नहीं भरता। रात को नींद नहीं आती, जीवन खोखला-सा लगता है। इस चक्कर में मैंने भी काफ़ी सोचा और एक आयडिया निकल आया। अपने यहां प्रतीकात्मकता का बड़ा महत्व है। प्रतीकात्मकता नाम की इस महान अवधारणा में माना गया है कि आप बाहर कुछ प्रतीक सजा-धजा लेंगे तो ये आपके भीतर पवित्रता का सूखा हुआ सोता खोल डालेंगे। जैसे आप गांधी टोपी पहन लेंगे तो आप गांधीजी की तरह हो जाएंगे। टोपी में तो फिर भी पैसे लगते हैं। मुझे जो आयडिया सूझा है, उसमें कोई ख़र्चा भी नहीं है।

आप एक काम कीजिए। आजकल तो वैसे भी भ्रष्टाचार-विरोध का सीज़न है। मैं जो आयडिया दे रहा हूं, हर मौसम और हर काल में काम आएगा। आपको कुछ भी नहीं करना अपने नाम के साथ बस ईमानदार, सज्जन, शरीफ़, मासूम जैसा कोई शब्द लगा लेना है। फ़िर देखिए, किस तरह सब बदलने लगेगा। मान लीजिए आपने अपने नाम के आगे ईमानदार को जोड़ लिया। आप तो जानते ही हैं कि यहां लोग नाम से कम और उपनाम या सरनेम से ज़्यादा बुलाते हैं।

आप किसी मित्र के घर जाएंगे, वह दरवाज़े से झांकते ही बोलेगा, ‘अरे यार ईमानदार! बड़े दिन बाद आए।’ दोस्त के दोस्त भी कहेंगे कि हां यार, ईमानदारों की तो संख्या ही इतनी कम है, रोज़ाना आ भी कैसे सकते हैं, बड़े दिन बाद ही आएंगे। इस तरह आप देखेंगे कि पहले ही दिन से आपको एक राहत मिलनी शुरु हो जाएगी।
आप जहां से भी निकलेंगे, आपको जाननेवाले यही कहेंगे-‘देखो, ईमानदार आ रहा है। वो देख, ईमानदार जा रहा है।’

देखते-देखते यह उपनाम आपके बीवी-बच्चों के साथ जुड़ जाएगा। परंपरा जो ठहरी। लोग कहेंगे, ‘देखो, सबके सब ईमानदार हैं, बीवी-बच्चे सब। पहले भाईसाहब ईमानदार हुए, थोड़े दिन बाद भाभीजी और बच्चे भी ईमानदार हो गए।’ बात टैक्नीकली बिलकुल सही है। सुननेवाला कहेगा-‘कमाल का परिवार है, यार!’ इस तरह आपका एक स्टेटस बनना शुरु हो जाएगा।

इस जादू का असर ज़रुर आपके मित्रों, परिचितों, रिश्तेदारों पर भी पड़ेगा। उन्हें भी लगेगा यार ईमानदारी तो अच्छी चीज़ है, हमें भी बनना चाहिए। इस तरह समाज में ईमानदारों की संख्या बढ़ने लगेगी। यह आपका एक सामाजिक योगदान भी होगा। नींद ज़रा और अच्छी आने लगेगी।

जैसे-जैसे समाज की दशा बदलेगी और ईमानदारों की संख्या बढ़ेगी, दुर्घटनाओं पर लोग कुछ इस तरह बात करेंगे-

‘बॉस, रात एक आदमी ने दूसरे को ठग लिया ; ठगा हुआ बेचारा बहुत रो रहा था....’
‘अच्छा, किसने ठगा ?’
‘कोई ईमानदार था, बताते हैं।’
‘ईमानदार था! हुम....फ़िर तो ठीक ही ठगा होगा ; ईमानदार किसीको ग़लत क्यों ठगेगा।’

पोलिस थाने में पूछेगी,‘कौन हो भाई?’
‘जी, मैं तो ईमानदार हूं।’
‘कबसे ईमानदार है भाई ?’
‘जनम से ही हूं जी।’
बात यह भी टैक्नीकली सही है। अगले ने जबसे होश संभाला है, हर कोई उसे ईमानदार कहकर ही पुकारता है।
‘पिताजी, के बारे में बता।'
‘ईमानदार हैं जी’
टैक्नीकली बात यह भी ठीक है। सरनेम उनका भी ईमानदार है।

इस तरह समाज में ईमानदारों की संख्या तेजी से बढ़ती जाएगी। क्योंकि इनवेस्टमेंट तो कुछ है नहीं, फ़ायदा ठीक-ठाक है।

आप किसी चैनल पर डिबेट देखते होंगे। कितना अच्छा लगेगा जब देखेंगे कि अ पार्टी से बहस में भाग ले रहे हैं श्री ईमानदार, ब पार्टी से सुश्री ईमानदार, सामाजिक कार्यकर्त्ता श्री ईमानदार, अधिवक्ता श्री ईमानदार, फ़िल्म स्टार श्री ईमानदार और साथ में है वही आपका पुराना ऐंकर ईमानदार, जिसे आप करते हैं बहुत प्यार।
ज़ाहिर है कि आपके मुंह से ख़ुदबख़ुद निकलेगा,‘भई, मीडिया में तो ईमानदारी की कोई कमी नही; फ़िर भी जो हो रहा है पता नहीं क्यों हो रहा है!’

ज़्यादा बताने से क्या फ़ायदा, आप सब परिपक्व लोग हैं। आयडिया मेरा एकदम मौलिक है। फ़िर भी कई बार ऐसा होता है कि आप अपनी तरफ़ से मौलिक काम करते हैं मगर बाद में पता चलता है कि यह काम 2-4 या सौ या हज़ार-दस हज़ार साल पहले भी कोई कर चुका है। तो अगर यह स्कीम भी पहले से कहीं चल रही हो तो बता ज़रुर दीजिएगा। मैं विदड्रा कर लूंगा।

-संजय ग्रोवर

28-08-2013

बुधवार, 10 जुलाई 2013

भारत का चरित्र

13-07-2013
अकेले भारत में जितना चरित्र पाया जाता है शायद दुनिया के सारे देशों के चरित्रों को जोड़ लेने से भी उतना चरित्र न पैदा हो पाए। चप्पा-चप्पा चरित्र से भरा पड़ा है। भारत के चरित्र के साथ समस्या बस एक ही है--यह शर्मीला बहुत है, क़िताबों, अख़बारों, दीवारों, टीवियों से बाहर ही नहीं आता, वहीं छुपा, पड़ा रहता है। इसी शर्मीलेपन की वजह से यह व्यवहार में कहीं दिखाई नहीं पड़ता। लोग भी अपने यहां के बिज़ी बहुत हैं ; वे भी चरित्र की बातें ख़ाली वक्त में करते हैं। काम के वक्त काम करते हैं। वैसे भी काम से चरित्र का क्या लेना। या तो काम कर लो या चरित्र के पौधे में पानी लगा लो। लगभग सभी भारतीय जानते हैं कि ये दोनों काम एक साथ संभव नहीं हैं। आप उन दुकानों पे जाईए जो दुर्भाग्यवश लोकपाल जैसे पवित्र क़ानून के दायरे में न आ सकी, मगर फिर भी पवित्रता मेंटेन कर रहीं हैं; यहां आपको चरित्र सामने ही कहीं टंगा मिल जाएगा--‘क्या लेकर आए थे, क्या लेकर जाओगे’....ऐसे तरह-तरह के वाक्य आपको कील पे टंगे फड़फड़ाते मिलेंगे; जैसे कोई मसीहा सूली पे लटक रहा हो। जिस ग्राहक के पास फ़ालतू टाइम रहता है वह इन्हें देखकर ख़ुश होता है। कई ग्राहक अवचेतन मन में तो कई चेतन मन में यह जानते होते हैं कि यह सिर्फ़ देखकर ख़ुश होने की चीज़ है। असल में यहां लिखा होना चाहिए था--‘मूर्खो! अगर आए ख़ाली हाथ थे तो क्या जाओगे भी ख़ाली हाथ!! फिर तुमसे बड़ा उल्लू का चरख़ा कौन होगा!? अरे, किसलिए तुम्हे ख़ाली हाथ भेजा गया? इसीलिए कि कुछ भर-वरके लौटो।’ और थोड़ी देर बाद जब ग्राहक और दुकानदार में ख़ुसुर-पुसुर या घिसिर-घिसिर शुरु होती है तो चरित्र ख़ुद ही समझ जाता है कि अब मेरा रोल ख़त्म ; और वह साइड में हो जाता है।

कई दुकानों में जगह कम होती है इसलिए नौकर या दुकानदार बाहर स्टूल डालके बैठ लेते हैं, चरित्र अंदर ही अकसर सामने की दीवार पर चिपका रहता है। चरित्र को कोई बाहर नहीं बिठाता ; उठके न जाने किसके साथ चल पड़े। चरित्र के चरित्र पर कोई भरोसा नहीं करता। मालूम ही है कि अभिनय छोड़ अपनी पर आ गया तो नुकसान के सिवाय और तो कुछ होने नहीं वाला।

पिछले कुछ साल से मैंने चरित्र ख़रीदना बंद कर दिया है। लेकिन लोग आज भी काफ़ी मात्रा में चरित्र ले रहे हैं। सुबह का वक्त चरित्र के लिए इसलिए मुफ़ीद है कि इस वक्त भारत के कई संस्थान और एजेंसियां भारी मात्रा में चरित्र सप्लाई करते हैं। सुबह-सुबह अख़बारवाला लोगों के घरों में चरित्र फ़ेंक जाता है। अख़बार में तरह-तरह के नीतिवाक्य, संपादकीय, कार्टून, लेखादि डले रहते हैं। चरित्र के कई शौकीन इससे आनंद पाते हैं। सबको मालूम है कि चरित्र अख़बार में ढूंढना होता है, अख़बारवाले या संपादक वग़ैरह में नहीं। अगर ग़लत जगह चरित्र को सर्च किया तो भारी निराशा के साथ भारी मुसीबत का सामना भी करना पड़ सकता है। क्योंकि संपादकों के भी अपने चरित्र हैं। संपादक हो और उसका चरित्र न हो!! यह तो ऐसी ही बात होगी कि हाथी हो और उसके दांत न हों। बिना दांतों का हाथी क्या शोभा देगा!? वो भी ऐसी जगह पर जहां बहुत-से लोग तो चरित्र पालते ही शोभा के लिए हैं। चरित्र मुख्य द्वार पर ही जड़ा हो तो घर की सुंदरता ज़रा बैटर दिखाई पड़ती है। अब सोचिए कि संपादक के चरित्र के सामने आपका चरित्र क्या बेच लेगा! संपादकों के चरित्रों को अकसर तरह-तरह के दूसरे चरित्रों का भी सपोर्ट रहता है। इसलिए चरित्र ढूंढना वहीं ठीक रहता है जहां ढूंढने में कोई ख़तरा न हो। फ़िल्मों में आजकल थोड़ा कम हो गया है मगर टीवी में अभी भी काफ़ी चरित्र भरा रखा रहता है। सुबह ले लेना चाहिए क्योंकि दिन में तो व्यवहारिक ज़िंदगी शुरु हो जाती है। व्यवहारिक ज़िंदगी में नमक जितना चरित्र मिलाने पर भी सारा आटा बरबाद हो जाता है--मंचीय कवियों से लेकर..........(आप जो भी जोड़ना चाहें, जोड़ लें) तक सब जानते हैं। । चरित्र दिखाने की ज़्यादा खुजली उठे तो साल में एकाध बार स्टेज बांधकर चरित्र-चरित्र खेल लेना काफ़ी रहता है। इतने में ही चरित्र के लेन-देन के लिए अच्छा-ख़ासा स्पेस बन जाता है।

यह तो हुई चरित्र की प्रस्तावना। अब हम आते हैं मेन चरित्र पर। मेन चरित्र को अपने यहां स्त्रियों से जोड़ा गया है। अपने यहां पुरुष का बेचारे का अपना कोई चरित्र नहीं होता। घर की स्त्री क्या खा रही है, कहां जा रही है, किससे बात कर रही है, किसके साथ हंस रही है, कैसे कपड़े पहन रही है........इसीमें पुरुष और सारे परिवार का चरित्र, मर्यादा, शील, इज़्ज़त वगैरह सब इन्क्लूड कर दिए गए हैं। पुरुष बाज़ार में कच्छी पहनके घूमे तो भी भारत के चरित्र का बाल नहीं बांका होता। वह रात-भर होटल में न्यू ईयर मनाए, उसका चरित्र विद फ़ैमिली चौबीस कैरेट का रहता है। स्त्री नक़ाब उठाके भी झांके तो क़यामत आ जाती है-सारा कबीला हिलने लगता है, परिवारों की चूलें ढीली हो जातीं हैं, मर्यादा का बैंड बज जाता है, इज़्ज़त की खटिया खड़ी हो जाती है, धर्म पर संकट के बादल मंडराने लगते हैं, देश अस्थिर होने लगता है, लब्बो-लुआब यह कि काफ़ी कुछ ऐसा हो जाता है कि उसके बाद काफ़ी कुछ करने की गुंजाइश निकल आती है। इससे पता चलता है कि कुछ संस्कृतियों में स्त्रियों को कितनी भयानक जगह दी गयी है। इतनी जगह क्यों दी गयी है, नहीं देनी चाहिए थी। चरित्र जैसी अच्छी चीज़ का थोड़ा ठेका पुरुषों को भी लेना चाहिए था। सारा पुण्य स्त्रियों को क्यों लेने दे रहे हो!? थोड़ा तुम भी लो भाई। अच्छी चीज़ लेने में शरमाना कैसा!? इधर चरित्र के मामले में स्त्रियां भी खुल रहीं हैं। इक्का-दुक्का पहले भी निकल आया करतीं थीं। स्त्रियों को अलग़ समझना वैसे भी ग़लत था। जब संस्कृति के पूरे ही कुंएं में पाखण्ड की भांग पड़ी हो तो औरतें क्या कहीं और से पानी पीकर आएंगीं!? चरित्र की हमारे यहां कहीं कोई कमी नहीं है, बस मौक़ा मिलने या मौक़ा पैदा कर लेने की बात है।

इस सारे चारित्रिक सिलसिले में मुझे बस एक ही बात समझ में नहीं आती। जिस देश के आदमी के कण-कण में चरित्र भरा है, वहां व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन को अलग़-अलग़ रखने पर इतना ज़ोर क्यों दिया जाता है!? जब कहीं कुछ गंदगी है ही नही तो फ़िर क्या दिख जाने का डर है!? कहीं कुछ गड़बड़ है क्या!? छोड़ो यार, बहुत बात हो गई चरित्र पर।

जहां मुद्दे पर ख़ुलकर बात करनी चाहिए वहीं मुद्दे को छोड़कर भाग जाना.......

यह भी हमारा ही चरित्र है।

हर कहीं नहीं मिलता।

-संजय ग्रोवर


मंगलवार, 28 मई 2013

एक अलग़ तरह के सफ़ल का साक्षात्कार

व्यंग्य



परीक्षाओं के नतीज़े आ रहे हैं। सभी कुछ न कुछ दिखा रहे हैं। हमारी कोशिश रहती है कि कुछ अलग़, कुछ विशेष दिखाएं। आपने अन्य जगह उन सफ़ल छात्रों की कहानियां देखी होंगी जिनकी आंखें नहीं थीं, किसीका हाथ नहीं था, किसीकी टांग में समस्या थी, मगर अपनी इच्छा-शक्ति के बल पर उन सबने सफ़लता पाई। मगर हमारा आज का हीरो उन सबसे भी अलग़ है।
हमारे आज के हीरो श्री ने दिमाग़ न होते हुए भी ज्ञान के इम्तिहान में टॉप किया है। आईए हम श्री के मुख से ही जानते हैं उनकी सफ़लता की कहानी।
‘श्री, पहले तो वही घिसा-पिटा सवाल, आपको प्रेरणा कहां से मिलती है?’
‘जी.......मैं किसी एक का नाम लूंगा तो दूसरों के साथ अन्याय होगा, सच कहूं तो मुझे अपने आस-पास ऐसे लोग बहुत कम ही मिले जिनसे मैंने कुछ सीखा न हो.......आपको भी मैं अकसर देखता रहता हूं.........’
‘श्री, जब आप स्कूल में ऐडमिशन लेने गए होंगे तो काफ़ी परेशानी हुई होगी.....कैसे...मतलब कुछ बताएं........’
‘सच कहूं तो शुरु-शुरु में मैं बहुत डरा हुआ था मगर जब इंटरव्यू शुरु हुआ तो मेरे जवाब सुनकर वे आश्वस्त दिखने लगे। एक टीचर ने तो पापा से कहा भी कि यह तो बिलकुल हमारे जैसा है, एक-एक चीज़ इसे रटी हुई है....’
‘तो श्री यह बताएं कि आपको दिमाग़वाले बच्चों के साथ ही बिठाया गया?’
‘जी, मुझे उनके साथ ही बिठाया गया।’
‘वाह, स्कूल वालों के लिए तालियां तो बनतीं हैं, बच्चों का व्यवहार आपके साथ कैसा था?’
‘जी, एक-दो बच्चों को छोड़ दूं तो हमें कभी लगा ही नहीं कि हममें कोई फ़र्क है।’
‘यानि कभी किसी तरह की हीन-भावना महसूस नहीं की आपने?’
‘जी मुझे तो नहीं हुई पर वे लोग कभी-कभी गंभीर हो जाया करते थे ; कहते यार हमें लगता है हमारा भी नहीं है....’
‘आपको तब क्या लगता था?’
‘ठीक से नहीं कह सकता था कि इस्तेमाल नहीं करते थे या था ही नहीं !’
‘अच्छा जब आप बड़े हुए तो क्या आपकी सोच में.....बल्कि कहना चाहिए कि अ-सोच में लोगों के व्यवहार को लेकर कुछ बदलाव आया?’
‘मैं कहूंगा बाद के मेरे अनुभव ज़्यादा सुखद हैं, जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, दिमाग़ की ज़रुरत घटती जाती है। जो कुछ लोग मुझे बचपन में परेशान करते थे बाद में उनमें से भी कई लोग सम्मान करने लगे।’
‘श्री, यह आप किस आधार पर कह रहे हैं!?’
‘देखिए, पहले मां-बाप मुझे जो भी कहते थे, अड़ोसी-पड़ोसी जो कहते थे, बड़े जो कुछ कहते थे, टीचर जो क़िताबों में से बताते थे, मैं बिना सोचे-समझे करता जाता था। बाद में बिना दिमाग़ के ही मुझे समझ में आने लगा कि बिना सोचे-समझे कुछ करने के मामले में तो मैं ख़ुद ही आत्मनिर्भर हूं, मम्मी-पापा को परेशान करने की क्या ज़रुरत है! सीधी तो बात है-जो बड़ोंने बताया, जो सब कर रहे हैं वही करते जाओ। जैसे सब कैरियर बनाते हैं, सब शादी करते हैं, सब बच्चे पैदा करते है, सब शादी में जाते हैं, सब कमरा बनाते हैं.....बस वही करते चले जाना है, दिमाग़ का तो ख़ामख़्वाह नाम है, काम तो कुछ है ही नहीं! बस, मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया।’
‘अच्छा अभी आपको कैसा लगता है, आगे आपका भविष्य क्या है?’
‘देखिए जैसा मैंने अब तक देखा है, 50-100 साल तो कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। हां, इंटरनेट जैसी तकनीकें ज़रुर थोड़ा डरातीं हैं, अचानक बाहरी हवाएं कुछ वायरस वगैरह छोड़ दें और लोग अपने दिमाग़ इस्तेमाल करना शुरु कर दे तो बात अलग़ है।’
‘आपको लगता है कि ज़्यादातर लोग अपना दिमाग़ इस्तेमाल नहीं करते!? क्यों नहीं करते?’
‘हो सकता है वे दिमाग़ को इस्तेमाल न करना ही दिमाग़ का सबसे अच्छा इस्तेमाल समझते हों!’
‘अच्छा आप हमें यह बताएं कि पहली बार यह पता कैसे लगा कि आपके सर में दिमाग़ नहीं है?’
‘एक बार जब मैं बहुत छोटा था, हमारे घर कोई महापुरुष आए थे, पापा ने कहा कि इनके पांव छुओ, बट मैं उनके पांव पकड़कर लेट-सा गया। पापा बताते हैं कि उन्होंने उस वक्त तो कुछ नहीं कहा मगर थोड़ा डाउट उन्हें हो गया था कि यह तो कुछ ज़्यादा ही हो गया। जितना कह रहा हूं यह उससे ज़्यादा क्यों कर रहा हैं!? उन्होंने किसीको कुछ नहीं बताया बस वे चुपचाप मुझे अपने दोस्त डॉ. हक़ीम श्रेष्ठ के पास ले गए। उन्होंने ही सारे टैस्ट करके बताया।’
‘डॉ. हक़ीम इस अजीबोग़रीब टैस्ट के लिए राज़ी कैसे हुए?’
‘पापा कहते थे कि डॉ. हक़ीम भी बचपन से बेदिमाग़ थे। प्रैक्टिस उनकी बहुत अच्छी चलती थी। मम्मी को तो शक है कि उनको दिल भी नहीं था।’
‘अच्छा, हम वापस आते हैं आपके घर, आपके रिश्तेदार...दोस्त.....इनका क्या व्यवहार रहा, क्या योगदान रहा?’
‘मैं आपको क्या कहूं, मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं बेदिमाग़ हूं या वे दिमाग़दार हैं, सब बिलकुल अपने जैसे तो लगते थे, इतना अपनापन देते थे कि बस.....दिल की बात कहूं तो मुझे लग रहा है कि जैसे आप लोग बेकार ही मुझे इतना महत्व दे रहे हैं, मुझे तो लगता ही नहीं कि मैंने कुछ नया किया है, पता नहीं...ऐसा लगता है कि यहां हमेशा से ही ऐसा होता रहा है.....’
‘ठीक है श्री, हमारे पास इतना ही वक्त है; आगे वक्त मिला तो ज़रुर आपसे फ़िर बात करेंगे......’


-संजय ग्रोवर


गुरुवार, 7 मार्च 2013

वीपीसिंह, आरक्षण और पॉज़ीटिवता का ह्रास


इधर वीपी सिंह नाम के आदमी ने भारत को तबाह करके रख दिया। सब कुछ अच्छा-अच्छा पॉज़ीटिव चल रहा था कि टांग मार दी। परसांईं जी ‘हनुमान चालीसा’ लिख रहे थे, श्रीलाल शुक्ल ‘अहा! ग्राम्य-जीवन कित्ता पवित्र है’ लिख रहे थे, मनु महाराज ‘स्त्रियों और शूद्रों को प्रगतिशील बनाने के 501 उपाय’ बता रहे थे, उदयप्रकाश ‘ढीली कुर्त्ती वाली लड़की’ लिख रहे थे, राजेंद्र यादव पूरी रचनात्मकता के साथ, सकारात्मक ढंग से कलात्मक लोगों के बखिए उधेड़ रहे थे कि अचानक वीपी सिंह नाम का एक आदमी प्रकट हुआ और उसने सब तहस-नहस कर दिया। एकाएक सारे भारत की बुद्धि फिर गयी। फुलबगिया फ़ुल उजड़ गयी। लोग एकाएक भ्रष्टाचार, बलात्कार, अत्याचार वगैरह करने लगे। वरना इससे पहले भारत में किसीने इन चीज़ों का नाम तक नहीं सुना था। एकाएक सतीप्रथा शुरु हो गयी, लोग दहेज लेने लग पड़े, किसीके मरने तक में पूरी-कचौड़ी-लड्डू मांगने लगे। रातोंरात भारत बरबाद हो गया। बहुत सारे लोगों की थिंकिंग एकाएक निगेटिव हो गयी। जो लोग ज़्यादा सकारात्मक सोच के थे वे आत्महत्या और आत्मदहन वगैरह ट्राई कर-करके देखने लगे।
ख़ानदानी सोच के अनुसार इसके पीछे वीपी सिंह के छोड़े आरक्षण नाम के भूत का हाथ था।

असली पहेली यह है कि जब सब कुछ शुभ-शुभ, पवित्र-पवित्र चल रहा था तो इस आदमी को आरक्षण लगाने की सूझी ही क्यों? आरक्षण नाम का शब्द उस आदमी के ज़हन में आया ही कैसे? कहीं उस आदमी ने एक जाति के दूसरी जाति पर अत्याचार की कहानियां ख़ुदबख़ुद तो नहीं गढ़ लीं थीं!? भारत में जैसे लोगों को विद्वान कहा जाता है वैसे में से कई लोग अगर यह कहें कि ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दलित, ओ बी सी, आदिवासी आदि भी वी पी सिंह ने बनाए थे तो बच्चों को कोई हैरानी नहीं होगी।

बच्चे भी अब समझने लगे हैं कि ऐसे पॉज़ीटिव विद्वान दरअसल कैसे होते हैं!

-संजय ग्रोवर

इसी व्यंग्य को एक नए प्रयोग के रुप में यूट्यूब पर देखें :





मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

व्यंग्य : शेरनी क्यों ‘हमें’ दूध नहीं देती !?


भैंस हमें दूध देती है।
गाय हमें दूध देती हैं।
बकरी हमें दूध देती हैं।

दूध तो देती हैं पर यह कैसे पता चलता है कि ‘हमें’ देतीं हैं !

अगर हम जबरन बांध-बूंधकर इनका दूध न निकालें तो क्या वे हमारे घर पर देने आ जाएंगीं कि अंकल, जब तक दूध नहीं लोगे, कॉल-बैल से खुर नहीं हटाऊंगी।

कया ये इंसान से भी ज़्यादा मानवीय हैं ? इंसान तो अपना दूध किसी को देता नहीं।
इंसान तो बड़ा चालू है। भैंस का दूध कुत्ते को पिला देता है। मदरडेयरी का पूजास्थल पर चढ़ा देता हैं।
कभी बचपन में किसी निबंध तक में नहीं पढ़ा कि शेरनी ‘हमें’ दूध देती है!
रीछनी ‘हमें’ दूध देती है!
भेड़ियाइन ‘हमें’ दूध देती है!

बेचारी सीधी-सादी गाय-भैंस-बकरी!
कभी किसी मीडिया मैन ने भी जाकर उनसे नहीं पूछा कि ‘माताजी, यह दूध आप किसे देती हैं!? ज़रा टेस्ट कराओ तो ‘ख़ाना-पकाना भारतवाला’ में तुम्हारी भी रैसिपी दिखा देंगे।
‘कैसा बुद्धू है, कि घाघ है रे, यहां बिना रैसिपी दिखाए ही जान के लाले पड़े हैं और ये....... गाय-भैंस सोचेंगीं।

सोचने की बात है कि गाय-भैंस-बकरी अगर दूध हमें देतीं हैं तो अपने बछड़ों और मेमनों को क्या देतीं हैं ? उन्हें क्या कैश पकड़ा देतीं हैं कि ‘बेटा ये लो 20 रु., बाज़ार से मदर डेयरी की थैली लेकर सरकंडा लगाकर चूस लेना! अपन का दूध तुपन के लायक नहीं है, इंसान को ही माफ़िक आता है।’

शेरनी का दूध इंसान को सूट नहीं करता क्या!?
यू तो वह मुर्गी के अंडे भी झट से चट कर जाता है!
कल्पना कीजिए कि एक टूटे टिन शेड के नीचे एक पतली रस्सी से एक शेरनी बंधी है। नीचे भगौना तैयार है। एक श्वाला (ग्वाले का काल्पनिक दोस्त) दूध दुहने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है।
‘‘गगुर्रर्रर्रर्र...’’
कहां गया श्वाला? कहां गई रस्सी? कहां है दूध?

इंसान को गाय-भैंस-बकरी का दूध ही सूट करता है।


-संजय ग्रोवर

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

....और देश बच गया!


....और देश बच गया!
तीन दिन पहले भी बचा था। तीन दिन बाद फिर बचेगा। 47 में बचा। 77 में बचा। 2004 में बचा। 2009 में बचा। रामलीला ग्राउंड में बचा। जंतर-मंतर पे बचा।
आए दिन बचता है।
बचानेवाले बदल जाते हैं, देश वही रहता है।
बच-बचाकर काट रहा है किसी तरह।
इतनी गुज़र गयी, बाक़ी भी गुज़र जाएगी।
× × ×
लो, यह रखा है देश, आओ और बचा लो।
जो बचाएगा, उसीका हो जाएगा।
कोई भी बचा सकता है।
जिनसे इसे बचाना चाहिए, वे भी।
× × ×
भीड़ बहुत थी।
हर कोई देश बचाना चाहता था, किसी भी क़ीमत पर।
मगर देश कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।
मुझे मिल गया, अंधेरे कोने में, हांफ़ता-कांपता।
‘क्या हुआ !?’
‘कुछ नहीं, बचाने वालों से बचके खड़ा हूं।’
× × ×
मांग उठ रही है कि देश को राजनेताओं से बचना चाहिए।
संशय उठ रहा है कि यह भी नज़र बचाकर की जाने वाली राजनीति है।
यहां ‘बच-बचके कबड्डी खेलना’ वाला मुहावरा याद आ सकता है।
× × ×
अगर देश न बचता तो क्या होता !
फुर्र ! छूमंतर !
क्या एकदम से उड़ जाता ? कपूर की तरह !
भाप की तरह ग़ायब हो जाता !
या उतना और वैसा फिर भी बचा रहता जितना और जैसा आज है !
क्या बचने और न बचने में कोई फ़र्क़ है या सब मन का वहम है !


-संजय ग्रोवर

बुधवार, 8 अगस्त 2012

पागल है क्या!


व्यंग्य




मानसिक रोगों का इतिहास शायद उतना पुराना तो होगा ही जितना इंसानियत, धर्म, सभ्यता, संस्कृति, नस्लवाद, वर्ण व्यवस्था आदि का है। यह तो इतिहासकार ही बता सकते हैं कि मनोरोग पहले आए या धर्मग्रंथ पहले आए। ‘ऊंच-नीच’ और ’छोटा-बडा़’ पहले आए या पागलपन पहले आया। कृपया इस सबमें मुर्गी और अंडे का संबंध न ढूंढा जाए। वरना बात वाद और धारा पर भी आ सकती है। 

अपने यहां मानसिक रोगों को लेकर समाज का रवैय्या काफ़ी उदार रहा है। मैं बचपन से ही देखता आया हूं कि जिन लोगों से किसी बदमाश या बेईमान का बाल भी बांका नहीं हो पा़ता, सड़क पर बाल बिखराए घूमती किसी पगली औरत के कपड़े खींचने में पूरी वीरता के साथ संकोच नहीं करते। एक बार एक ऐसे ही सामूहिक-चीत्कार के दौरान एक विदेशी ने पूछा, ‘हू इज़ मैड? दिस वुमॅन ऑर द मॉब?’ मैं छोटा था, मैंने सोचा कि विदेशी पागल है, फ़ालतू सवाल पूछ रहा है! बाद में मैंने देखा कि यहां पागलपन इतना बड़ा पागलपन नहीं है जितना उसके बारे में गंभीरता से बात करना। आप किसीसे कहके देखिए कि ‘यार मनोचिकित्सक के पास जा रहा हूं या वहां से आ रहा हूं’ या ‘कई महीनों से डिप्रेशन है’ या ‘यार, मुझे फ़लां चीज़ से फ़ोबिया है’ बस....ऐसा आदमी जिसकी मामूली और जेनुइन बातों पर भी समाज का विरोध करने में टट्टी निकलती है, एकदम क्रांतिकारियों वाली मुद्रा में आ जाएगा कि ‘बेट्टा! अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे’। बुद्धिजीवी या समाजसेवी क़िस्म का आदमी हुआ तो छुपाएगा और हमदर्दी जताएगा। मगर आप भी बेशर्मी से उसकी आंखों में झांकिए, आप पाएंगे कि वहां ख़ुशी का समंदर ठाठें मार रहा है और एक पत्थरमार बड़ी तेज़ी से पत्थर इकट्ठे कर रहा है। वह हड़बड़ी में है क्योंकि उसे जाकर ये पत्थर आपके और अपने दोस्तों में भी बांटने हैं।

शायद यह उदारवादी समाजों की ही ख़ासियत होती होगी कि एक बड़ा पागल जो अपने पागलपन को लेकर बिलकुल बेहोश है, न सिर्फ़ एक सफ़ल और ‘स्वस्थ’ ज़िंदगी गुज़ार सकता है बल्कि छोटे मगर अपने पागलपन को लेकर होशमंद पागलों को बड़ा पागल घोषित करके निर्विकार भाव से उनका ख़ून भी चूस सकता है। यह एक सहिष्णु और सर्वोदयी समाज में ही संभव है कि अधिकांश बुद्धिजीवी मनोरोगी को लगभग उसी नज़रिए से देखता है जैसे गांव का ओझा डायन घोषित कर दी गयी औरत को। इतना फ़र्क ज़रूर है कि ज़्यादा सयाना ओझा भी झाड़-फूंक पर पत्रिका या विशेषांक नहीं निकालता। यह अलग बात है कि शहरी बुद्धिजीवी को मनोरोग और मनोचिकित्सा पर पत्रिका निकालने का साहस और प्रेरणा भी परंपरा और पुराने ग्रंथों से मिलते हैं। बाज दफ़ा लगता है कि यह समाज सोचने से डर कर भागे हुए लोगों का चिंतन शिविर है।

पीले पड़ गए पन्नों वाला वह ‘हंस’ मेरे घर में आज भी कहीं पड़ा होगा जिसके ‘आत्म तर्पण’ नामक स्तम्भ में उदयप्रकाश नाम के लेखक ने अपने मनोरोग का भी ज़िक्र किया था। मैंने तब भी सोचा था कि यह आदमी वाक़ई पागल है। यहां एक से एक धुरंधर बैठे हैं और यह अपनी छोटी-मोटी उपलब्धियों का ज़िक्र कर रहा है। क्या जीते-जी अपने आस-पास पत्थरों का मकबरा बनवाना चाहता है ! पोंगा-प्रगतिशीलों और बरसाती-बौद्धिकों के देश में यह कौन-सा राग छेड़ रहा है!? कुछ वक्त बाद इसीकी ख़ुदकी दी जानकारियों को कई महापराक्रमी और पुरुषार्थी ऐसे पेश करेंगे जैसे ब्रह्मांड की खुदाई करके किसी रहस्य का मौलिक उत्तर खोज लाए हैं। वही हुआ। मगर आरोपों, आक्षेपों और अफ़वाहों के पत्थर खा-खाकर भी वह पागलों का प्रिय लेखक बन गया।

कई बार तो ऐसा लगता है कि सामाजिकता के सारे नियम और लक्षण पागलों ने तय किए हैं। अगर आपको एक स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति कहलाना है तो सब कुछ तयशुदा मान्यताओं और परिभाषाओं के दायरे में करना होगा। यहां तक कि चिंतन के लिए भी खांचे और ढांचे तय हैं। कोई ऐसी बात जो पहले किसीने सोची नहीं या सोची तो बोलने-लिखने की हिम्मत नहीं की, आपने अगर लिख-बोल दी तो फ़िर देखिए तमाशा! प्रगतिशील से प्रगतिशील भी लट्ठ लेकर आपके पीछे दौड़ेगा, आपको पागल घोषित करेगा। कई बार लगता है कि कथित स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जिसे परिभाषा रूपी पापा और मान्यता रूपी मम्मी ताउम्र गोद में उठाकर हल्की-हल्की सीटी बजाकर सुस्सू कराया करतीं हैं। उन्हें पता है कि ज़रा हम इधर-उधर हुए नहीं कि यह ग़लत जगह गंदगी मचा देगा। यह कभी मेच्योर ही नहीं होता। किसीको मारकस मामा बताया करते हैं कि बाएं हाथ कैसे चलना है तो किसी को गोलमोलकर चाचा निर्देशित करते हैं कि दाहिनी ओर चलने के क्या फ़ायदे हैं। ज़िंदगी क्या है कि बस धर्मों, वादों, गुटों, राष्ट्रों, सभ्यताओं, संस्कृतियों, मर्यादाओं, परिभाषाओं जैसी छोटी-बड़ी ख़ापों का जोड़ है। शादी-ब्याह जैसे बड़े मुद्दे तो छोड़िए, वृहत्तर समाज को छोड़िए, अगर किसी परिवार में दही और दाल साथ-साथ खाने चलन नहीं है मगर अचानक एक दिन घर का कोई सदस्य दाल के साथ दही खाना शुरू कर देता है तो यह लगभग असंभव है कि घर के बाक़ी सदस्य उसे उस नज़र से न देखें जिससे किसी पागल को देखा जाता है। 

आप सोचते होंगे कि पागलपन पर इतनी गंभीरता से लिख रहा यह आदमी भी छोटा-मोटा पागल होगा।
मैं कहूंगा छोटा और मोटा को जोड़ लीजिए।
-संजय ग्रोवर


गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

आंदोलनों और युवाओं पर बेमन से एक व्यंग्य



आपने कभी आंदोलन किया ? करना चाहिए। आज-कल आंदोलन न करने वालों को समाज अच्छी नज़र से नहीं देखता। लोग मानने लगे हैं कि आंदोलन करने से समाज बदलता है। देश बदलता है। कहते हैं कि आज का युवा भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ हर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। हमारे युवा आज भी बहुत अनुशासित और सुसंस्कृत हैं। मुझे भी बात जंची। मैंने देखा कि आंदोलन को लेकर युवा एक साल तक वही दस-पांच सवाल नेताओं से पूछते रहे जो 10-5 आंदोलनकारी या 100-50 मीडियाकर्मी पूछ रहे थे। युवा इतने अनुशासित और संस्कार-बंद हैं कि उनके पास अपने सवाल तक नहीं हैं। सबसे ज़्यादा आशा उन युवाओं को देखकर बंधती थी जो बिना ड्राफ्ट पढ़े ही ‘मैं भी फ़लाना, तू भी ढिकाना’ मार्का नारों पर गला फ़ाड़ रहे थे। ऐसे ही युवा हर आंदोलन की जान होते हैं। सोचने-समझने वाले लोग आंदोलनों की गति को धीमा करते हैं। ले-देकर इन युवाओं के पास एक ही सवाल था जो कि ख़ुदबख़ुद जवाब भी था-लोकपाल कब आएगा ? मैं समझता था कि चमत्कार की आशा में सिर्फ़ बुज़ुर्ग और अनपढ़ लोग ही मरते हैं पर मैं ग़लत साबित हुआ। यहां आंदोलनकारी जिस तरह के चमत्कार दिखा रहे थे उन्हें निराकार और अंधविश्वासपूरक चमत्कार कहा जा सकता है। आंदोलन के केंद्रीय पात्र एक बुज़ुर्ग सज्जन बीच-बीच में दोहराते थे, ‘मेरे पीछे भगवान खड़ा है।’ अगर  वहां कोई सोचने वाला होता तो सोचता कि इतने सालों से भगवान किसके पीछे खड़ा था! अभी फिर भगवान तुम्हारे पीछे से हट गया तो क्या होगा!
बहरहाल आंदोलन-प्रमुख का कहना था कि युवाओं से उन्हें शक्ति मिलती है। इधर युवाओं को भी उनसे शक्ति मिल रही थी। यह म्युचुअल अंडरस्टैडिंग का मामला है, इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। मेरे साथ समस्या यह है कि मैं आंकड़ों को देखकर नहीं आदमी को देखकर राय बनाता हूं। आंदोलनकारियों के आंकड़ों को देखें तो 121 करोड़ लोग भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ हैं (जो कि अगली बार 242 करोड़ भी हो सकते हैं) और एक-एक आदमी को देखें तो लगता है कि सारे भारत की खुदाई कराई जाए तो ज़रुर 10-5 छंटाक ईमानदारी एकत्र की जा सकती है। इनके और लेटेस्ट आंकड़े देखें तो लगता है कि इस देश में 15 आईपीऐसों और दस आरटीआई ऐक्टीविस्टों के अलावा और कोई भ्रष्टाचार से लड़ते हुए मरा ही नहीं। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए इन महाशयों की हट्टी पर रजिस्ट्रेशन और मीडिया से मुंहदिखाई लेना ज़रुरी है। वरना आपकी लड़ाई सनक है, पागलपन है। युवाओं की हरकतें देखें तो लगता है कि ख़ुद मेरे ही अंदर ईमानदारी पहचानने की तमीज़ ख़त्म हो गयी है। एक युवा सड़क पर झाड़ की आड़ में मूत रहा है। मोबाइल बजता है। युवा तुरंत कहता है, ‘अभी बात करता हूं, ज़रुरी मीटिंग में हूं।’ युवा कहीं भी हो अकसर मीटिंग में होता है। बदलाव जब पूरा आ जाएगा तो वह शायद यह कहेगा, ‘‘जस्ट वेट, एक ज़रुरी आंदोलन में हूं।’’ इधर कई ईमानदार लड़कियां भी एक साथ दस-दस लड़कों को अटकाये रखतीं हैं साथ-साथ प्री-शादी करवाचौथ भी सेलिब्रेट करती रहतीं हैं। धर्म और ईमानदारी का यह अद्भुत कंबीनेशन है।
युवाओं की ईमानदारी में इन दिनों काफ़ी विविधता आ गयी है। लोन ले-लेकर ग़ैर-ज़रुरी सामान ख़रीदना, दुकानदारों के पैसे मारने की ताक में रहना, ट्रैफ़िक कांस्टेबल को जुर्माना देने के बजाय कैश थमाना जैसी ईमानदारी की पचासियों मिसालें रोज़ क़ायम हो रहीं हैं। हमारे युवाओं के अनुसार उनकी इन सब ईमानदारियों के लिए राजनेता जिम्मेदार हैं। यह निष्कर्ष ईमानदारी के कौन-से फ़ॉर्मूले से निकला है यह तो पता नहीं लेकिन इससे एक बात और पक्की होती है कि हमारा युवा ईमानदार के साथ-साथ ज़िम्मेदार भी कितना है! इस तरह के ईमानदार युवाओं से इस तरह के ईमानदार आंदोलनों को एक ख़ास क़िस्म की उम्मीदें बंधतीं होंगीं, बंधनी भी चाहिए।  
मैंने जब आंदोलन की पहली इनिंग्स की ओपनिंग देखी तो यही सोच-सोचकर पगलाता रहा कि कौन-सी महाशक्ति ने किस रास्ते से कैसा इंजेक्शन दे दिया है कि रातों-रात सारा मीडिया नहा-धोकर ईमानदार हो गया!? उसी इंजेक्शन का एक-एक डोज़ चुपके-से नेता और जनता को भी दिलवा दो, सारा लफ़ड़ा ही ख़त्म। काहे इतना नाच-गाना करना जिसे आंदोलन का नाम देना पड़े। कई बार तो लगा कि यह हिंदी और अंग्रेजी में साथ-साथ बनने वाली देश की पहली ऐसी फ़ीचर फ़िल्म है जिसकी शूटिंग में सारा देश इनवाइटेड है। इसीके समानांतर मीडिया द्वारा प्रज्वलित एक और बाबा एक और इंजेक्शन लेकर घूम रहे हैं। उनका नुस्ख़ा है कि विदेशों में जमा काला धन जब तक देश में वापसी नहीं करेगा, देश अपनी टांगों पर खड़ा नहीं हो पाएगा। इनकी और इनके भक्तों की करतूतें और आंकड़े देखें तो लगता है कि इन्हें भी उन्हीं विदेशी बैंकों की उन्हीं ब्रांचों में जमा करा देना चाहिए। जोड़ी अच्छी जमेगी।                                              
मैं बार-बार ईमानदारी को देखता हूं फ़िर युवाओं को देखता हूं फिर आंदोलनों को देखता हूं।  मुझे या तो ईमानदारी को लेकर अपनी सोच बदलनी चाहिए या फिर युवाओं को लेकर। युवाओं को देखकर मुझे समझ में आता है कि ईमानदारी का मतलब है जिम में जाना, अच्छे ब्रांडेड कपड़े पहनना, घर को सुंदर-साफ़-सुथरा रखना भले वह दूसरे की ज़मीन हथिया कर बनाया गया हो, अपना कूड़ा दूसरों के घर पर फ़ेंक देना, आंदोलनों में जाकर नारे लगाना, मुंह पर टैटू बनवाना, टी वी पर दिखने के लिए मुंह पर ईमानदारी की लिपस्टिक मल लेना और बालों को मीडिया-प्रदत्त क्रीम लगाकर विद्रोही कांटो जैसा खड़ा कर लेना, अपनी रचना छपवाने के लिए कुछ भी या सब कुछ या जो भी करने के लिए तैयार रहना (रचना पढ़ो तो लगे इससे बड़ा विद्रोही कोई नहीं है और छपाने के तौर-तरीके देखो तो लगे कि इतना बढ़िया छछूंदर कोई पैदा ही नहीं हुआ) और आंदोलनकारियों द्वारा बांटे गए सवाल पूछना और अपने को छोड़कर दूसरों ख़ासकर नेताओं से ईमानदारी की उम्मीद रखना और लोकपाल नामक किसी चमत्कारी जड़ी-बूटी को हर बीमारी की दवा मानना। लोकपाल कब आएगा, लोकपाल कब आएगा, ऐसा रटते रहना। कोई इस देश के आदमी से पूछे कि बेईमानी शुरु करने के लिए भी तुमने किसी क़ानून का इंतज़ार किया था जो ईमानदारी शुरु करने के लिए अहिल्या की तरह लोकपाल की राह में पलक-पांवड़े बिछाए बैठे हो !? माफ़ कीजिएगा (या नहीं कीजिएगा तो मत कीजिएगा) ये निष्कर्ष मैंने बिना किसी सर्वे के ही निकाल लिए हैं। बिना सर्वे के ही मुझे यह भी मालूम है कि सर्वे हुआ तो युवा वो तो बोलेगा नहीं जो वो ख़ुद करता है। ईमानदारी कोई सैक्स तो है नहीं कि युवा अति उत्साह में ही थोड़ा-बहुत सच बोल बैठे। इस तरह मैं मान लेता हं कि युवा ईमानदार है। क्यों कि सारा मामला ही मानने और न मानने पर टिका है। जैसे कई लोग मानते हैं कि हवन से वातावरण शुद्ध होता है उसी तरह बहुत से मानते हैं कि आंदोलनों से समाज बदलता है। हमारे यहां भी कुछेक बार हवन हुआ। उसके बाद भी घर पर चूहों, कॉकरोचों, मकड़ियों की संख्या ज्यों की त्यों रही। पर चूंकि हमने मान रक्खा था कि शुद्धि होती है इसलिए हमें चूहे, कॉकरोंच और छिपकलियां भी खिले-खिले और धुले-धुले से लगने लगे। वैसे भी आज-कल पॉज़ीटिव थिंकिंग पर बड़ा ज़ोर है। ऐसे-ऐसे युवा बाबा और बाबा युवा मार्केट में आ गए हैं जो फुटपाथ पर मरते नंगे आदमी से भी पॉज़ीटिव थिंकिंग करा लें।
कई लोग यह भी कहते हैं कि आंदोलनों से आदमी के भीतर की आग बनी रहती है। बात में दम है। मैं जब किसी ईमानदारी के आंदोलन में उन बेईमानों और चोट्टों जो हमेशा ईमानदारों का मज़ाक उड़ाते हैं, को बरातियों की तरह नाचते देखता हूं तो मेरे तन-बदन में आग लग जाती है। आग क्या मुझे तो मिर्ची भी लगती है। सुनते हैं हर आंदोलन कुछ न कुछ देकर जाता है। यह आंदोलन भी, एक नामवर-सुसभ्य आलोचक की भाषा से काम लूं तो, हमें कुछ लौंडे-लौंडिया देकर गया। जितना टाइम इलैक्ट्रॉनिक मीडिया बाबा लोगों को अच्छी-ख़ासी रक़म लेकर देता है, लौंडों को फ्री में दे रहा है। अब बाबा और लौंडे मिलकर प्रवचन कर रहे हैं।
आलोचक से याद आया कि इनमें से कई आज भी धोती पहनते हैं। इसमें पाजामा या पतलूून से कई गुना ज़्यादा कपड़ा लगता होगा मगर फिर भी यह टांगों को पूरा नहीं ढंक पाती। लेकिन इसमें परंपरा, सभ्यता, संस्कृति वगैरह बची रहती हैं।
बात वही है कि सारी बात मानने, न मानने पर टिकी है।


-संजय ग्रोवर

रविवार, 25 मार्च 2012

बस विचार के इक-दो फंदे ..


ग़ज़ल


बस विचार के इक-दो फंदे डालेगा
भाषा से वो पूरा स्वेटर बुन देगा


चित्त-पट्ट में बिल्ली का क्या बिगड़ेगा
चूहा-दौड़ में चूहे का दम निकलेगा


जब मंथन करने वाले ज़हरीले हों
अमृत निकलेगा भी तो क्या कर लेगा


ईमां की भी दुक्कानें खुल जाएंगीं
बेचने वाला हर इक शय को बेचेगा


घर-दफ़्तर में वो जो सोया रहता है
मिला जो मौक़ा, भीड़ में घुसकर नाचेगा


इन सारे लोगों को मैं पहचानता हूं
नयी शक्ल में अक्ल का मेला निकलेगा


गर मंथन करने वाला ज़हरीला है
ज़हर निकालेगा और अमृत कह देगा


यह सवाल और वह सवाल पूछेगा तुमसे
तुम पूछोगे तो वो उठकर चल देगा


इसे काटने वाले जाने किधर गए
वक्त हमें भी चुपके-चुपके काटेगा

-संजय ग्रोवर


देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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