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बुधवार, 8 अगस्त 2012

पागल है क्या!


व्यंग्य




मानसिक रोगों का इतिहास शायद उतना पुराना तो होगा ही जितना इंसानियत, धर्म, सभ्यता, संस्कृति, नस्लवाद, वर्ण व्यवस्था आदि का है। यह तो इतिहासकार ही बता सकते हैं कि मनोरोग पहले आए या धर्मग्रंथ पहले आए। ‘ऊंच-नीच’ और ’छोटा-बडा़’ पहले आए या पागलपन पहले आया। कृपया इस सबमें मुर्गी और अंडे का संबंध न ढूंढा जाए। वरना बात वाद और धारा पर भी आ सकती है। 

अपने यहां मानसिक रोगों को लेकर समाज का रवैय्या काफ़ी उदार रहा है। मैं बचपन से ही देखता आया हूं कि जिन लोगों से किसी बदमाश या बेईमान का बाल भी बांका नहीं हो पा़ता, सड़क पर बाल बिखराए घूमती किसी पगली औरत के कपड़े खींचने में पूरी वीरता के साथ संकोच नहीं करते। एक बार एक ऐसे ही सामूहिक-चीत्कार के दौरान एक विदेशी ने पूछा, ‘हू इज़ मैड? दिस वुमॅन ऑर द मॉब?’ मैं छोटा था, मैंने सोचा कि विदेशी पागल है, फ़ालतू सवाल पूछ रहा है! बाद में मैंने देखा कि यहां पागलपन इतना बड़ा पागलपन नहीं है जितना उसके बारे में गंभीरता से बात करना। आप किसीसे कहके देखिए कि ‘यार मनोचिकित्सक के पास जा रहा हूं या वहां से आ रहा हूं’ या ‘कई महीनों से डिप्रेशन है’ या ‘यार, मुझे फ़लां चीज़ से फ़ोबिया है’ बस....ऐसा आदमी जिसकी मामूली और जेनुइन बातों पर भी समाज का विरोध करने में टट्टी निकलती है, एकदम क्रांतिकारियों वाली मुद्रा में आ जाएगा कि ‘बेट्टा! अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे’। बुद्धिजीवी या समाजसेवी क़िस्म का आदमी हुआ तो छुपाएगा और हमदर्दी जताएगा। मगर आप भी बेशर्मी से उसकी आंखों में झांकिए, आप पाएंगे कि वहां ख़ुशी का समंदर ठाठें मार रहा है और एक पत्थरमार बड़ी तेज़ी से पत्थर इकट्ठे कर रहा है। वह हड़बड़ी में है क्योंकि उसे जाकर ये पत्थर आपके और अपने दोस्तों में भी बांटने हैं।

शायद यह उदारवादी समाजों की ही ख़ासियत होती होगी कि एक बड़ा पागल जो अपने पागलपन को लेकर बिलकुल बेहोश है, न सिर्फ़ एक सफ़ल और ‘स्वस्थ’ ज़िंदगी गुज़ार सकता है बल्कि छोटे मगर अपने पागलपन को लेकर होशमंद पागलों को बड़ा पागल घोषित करके निर्विकार भाव से उनका ख़ून भी चूस सकता है। यह एक सहिष्णु और सर्वोदयी समाज में ही संभव है कि अधिकांश बुद्धिजीवी मनोरोगी को लगभग उसी नज़रिए से देखता है जैसे गांव का ओझा डायन घोषित कर दी गयी औरत को। इतना फ़र्क ज़रूर है कि ज़्यादा सयाना ओझा भी झाड़-फूंक पर पत्रिका या विशेषांक नहीं निकालता। यह अलग बात है कि शहरी बुद्धिजीवी को मनोरोग और मनोचिकित्सा पर पत्रिका निकालने का साहस और प्रेरणा भी परंपरा और पुराने ग्रंथों से मिलते हैं। बाज दफ़ा लगता है कि यह समाज सोचने से डर कर भागे हुए लोगों का चिंतन शिविर है।

पीले पड़ गए पन्नों वाला वह ‘हंस’ मेरे घर में आज भी कहीं पड़ा होगा जिसके ‘आत्म तर्पण’ नामक स्तम्भ में उदयप्रकाश नाम के लेखक ने अपने मनोरोग का भी ज़िक्र किया था। मैंने तब भी सोचा था कि यह आदमी वाक़ई पागल है। यहां एक से एक धुरंधर बैठे हैं और यह अपनी छोटी-मोटी उपलब्धियों का ज़िक्र कर रहा है। क्या जीते-जी अपने आस-पास पत्थरों का मकबरा बनवाना चाहता है ! पोंगा-प्रगतिशीलों और बरसाती-बौद्धिकों के देश में यह कौन-सा राग छेड़ रहा है!? कुछ वक्त बाद इसीकी ख़ुदकी दी जानकारियों को कई महापराक्रमी और पुरुषार्थी ऐसे पेश करेंगे जैसे ब्रह्मांड की खुदाई करके किसी रहस्य का मौलिक उत्तर खोज लाए हैं। वही हुआ। मगर आरोपों, आक्षेपों और अफ़वाहों के पत्थर खा-खाकर भी वह पागलों का प्रिय लेखक बन गया।

कई बार तो ऐसा लगता है कि सामाजिकता के सारे नियम और लक्षण पागलों ने तय किए हैं। अगर आपको एक स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति कहलाना है तो सब कुछ तयशुदा मान्यताओं और परिभाषाओं के दायरे में करना होगा। यहां तक कि चिंतन के लिए भी खांचे और ढांचे तय हैं। कोई ऐसी बात जो पहले किसीने सोची नहीं या सोची तो बोलने-लिखने की हिम्मत नहीं की, आपने अगर लिख-बोल दी तो फ़िर देखिए तमाशा! प्रगतिशील से प्रगतिशील भी लट्ठ लेकर आपके पीछे दौड़ेगा, आपको पागल घोषित करेगा। कई बार लगता है कि कथित स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जिसे परिभाषा रूपी पापा और मान्यता रूपी मम्मी ताउम्र गोद में उठाकर हल्की-हल्की सीटी बजाकर सुस्सू कराया करतीं हैं। उन्हें पता है कि ज़रा हम इधर-उधर हुए नहीं कि यह ग़लत जगह गंदगी मचा देगा। यह कभी मेच्योर ही नहीं होता। किसीको मारकस मामा बताया करते हैं कि बाएं हाथ कैसे चलना है तो किसी को गोलमोलकर चाचा निर्देशित करते हैं कि दाहिनी ओर चलने के क्या फ़ायदे हैं। ज़िंदगी क्या है कि बस धर्मों, वादों, गुटों, राष्ट्रों, सभ्यताओं, संस्कृतियों, मर्यादाओं, परिभाषाओं जैसी छोटी-बड़ी ख़ापों का जोड़ है। शादी-ब्याह जैसे बड़े मुद्दे तो छोड़िए, वृहत्तर समाज को छोड़िए, अगर किसी परिवार में दही और दाल साथ-साथ खाने चलन नहीं है मगर अचानक एक दिन घर का कोई सदस्य दाल के साथ दही खाना शुरू कर देता है तो यह लगभग असंभव है कि घर के बाक़ी सदस्य उसे उस नज़र से न देखें जिससे किसी पागल को देखा जाता है। 

आप सोचते होंगे कि पागलपन पर इतनी गंभीरता से लिख रहा यह आदमी भी छोटा-मोटा पागल होगा।
मैं कहूंगा छोटा और मोटा को जोड़ लीजिए।
-संजय ग्रोवर


सोमवार, 10 जनवरी 2011

आत्मविश्वास की खोज

एक वक्त था जब आत्मविश्वास का ज़िक्र आते ही मैं घबरा जाता था। तब तक मुझे यही पता था कि यह कोई ऐसी दुर्लभ शय है जो मेरे पास नहीं है और इसके बिना ज़िंदगी जो है बेकार है। जो भी मुझसे कहता कि तुममें आत्मविश्वास नहीं है मैं मान लेता कि ज़रुर इसमें बहुत आत्मविश्वास है इसलिए बेधड़क ऊंगली उठा रहा है। तब तक मुझे यही ग़लतफ़हमी थी कि यह कोई ऐसा विश्वास है जो ‘आत्म’ से यानि अपने भीतर से आता है। मैं क़िताबें बहुत पढ़ता था। क़िताबों से जो ‘आत्मविश्वास’ मिलता वह घर से बाहर निकलते ही डगमगाने लगता और मैं कन्फ्यूज़ हो जाता। मैं और ज़्यादा क़िताबें पढ़ता। परेशानी की चरमावस्था में मुझे कुछ ऐसी क़िताबें मिली जिनमें आत्मविश्वास बढ़ाने के नुस्ख़े थे। जहां तक मुझे याद है कोई क़िताब ऐसी नहीं थी जिसमें व्याख्या की गयी हो कि आत्मविश्वास होता क्या है। अकसर यही सलाहें होतीं कि आईने के सामने खड़े होकर 10 बार बोलो कि ‘मुझमें आत्मविश्वास है’ या कॉपी पर बीस बार लिखो कि ‘मुझमें आत्मविश्वास है’। मैं फिर कन्फ़्यूज़ हो जाता कि जो चीज़ मुझे पता ही नहीं कि होती क्या है उसके बारे में कैसे कहूं कि मुझमें है! यह तो सरासर झूठ होगा।
संकट जानलेवा ही नहीं ईमानलेवा भी था।
उन्हीं दिनों मैंने उस आदमी को देखा जो अपनी धुन में मस्त रास्ते से गुज़रता, अकसर किसीको भी सलाम-नमस्ते किए बिना। कुछेक दफ़ा कर भी लेता। अकसर लोग कहते कि देखो कितना अहंकारी है। कुछ लोग यह भी कहते कि इसमें आत्मविश्वास की कमी है। मैं जो कि कुछ मामलों में बचपन से ही बिगड़ैल था, लोगों की बातों पर न जाकर यह सोच बैठता कि किसीको नमस्ते न करके यह आदमी किसी का लेता क्या है! नमस्ते न करना आवश्यक रुप से किसी का अपमान नहीं है, विरोध नहीं है। अहंकारी तो यह तब होता जब यह चाहता कि हर कोई मुझे सलाम करे, इज़्ज़त दे। मैं सोचता कि आखि़र लोग अपनी बात पर इतने दृढ़ और एकमत क्यों हैं कि यही अहंकारी है। सोचते-सोचते मुझे लगने लगा कि यह दृढ़ता इस बात से आ रही है कि ऐसा सोचने वालों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत ज़्यादा है और वह अकेला है। मुझे लगा कि वह आदमी अहंकारी या आत्मविश्वासहीन है, यह तो पता नहीं मगर इतना ज़रुर तय है कि लोग अकसर अहंकारी हैं और उनका आत्मविश्वास अपनी समझ से कम और भीड़ की स्वीकृति या सहमति से ज़्यादा आता है।
क्या यही आत्मविश्वास होता है ! यह तो बड़ी अजीब-सी चीज़ है ! मैं फिर परेशान, फिर कन्फ्यूज़ड्। संतोष बस इतना कि चलो मुझे पता तो है कि मैं कन्फ्यूज़ड् हूं और अपने कन्फ्यूज़न को किसी सिद्धांत का (पा) जामा पहनाने की कोशिश नहीं कर रहा।
आगे चलकर तो यह लगने लगा कि अपने आप में विश्वास पूरी तरह खो देना और भीड़ की स्वीकृति की आशा में ख़ुदको बहुमत के रंग में रंगते चले जाना ही आत्मविश्वास का स्रोत और समझ है। आत्मविश्वास चाहे जो भी होता हो मगर दो आत्मविश्वासियों में फ़र्क शायद इतना ही होता है कि उनका भीड़ का चुनाव अलग होता है। किसी को आत्मविश्वास राष्ट्रवादी भीड़ से मिलता है तो किसीको मार्क्सवादी भीड़ से। एक तरह की भीड़ है जो क़ानूनविरोधी खाप पंचायतों के सरपंचो को आत्मविश्वास देती है तो दूसरी तरह की भीड़ है जो दहेज विरोधी और पर्यावरण समर्थक कानूनों को सरेआम तोड़ने वाली शहरी शादियों में शामिल होने वाले प्रगतिशीलों को। वैसे थोड़ा आत्मविश्वास बढ़ाकर सोचें तो क्या ये दो तरह की भीड़ और दो तरह के लोग हैं या एक ही तरह के हैं!
भीड़ की ही ‘प्रेरणा’ है कि बेईमान उस चीज़ से भरा-पूरा है जिसे आत्मविश्वास कहते हैं। ईमानदार इस मामले में अकसर ‘हैंड टू माउथ’ भी नहीं हो पाते। मैंने कभी किसी को कहते नहीं सुना कि दाऊद-वाऊद, हर्षद-वर्षद, राटा-टाडिया-इरला-विरला-फ़लानी-खंुबानी आदि-आदि में आत्मविश्वास की कमी है (कम्बख्तमारे नाम तक नहीं याद रहते मुझे तो)। बहरहाल नाम जो भी हों इन महानात्माओं का आत्मविश्वास शायद यहीं से आता है कि पट्ठे ऊपर से चाहे जो कुछ दिखाएं पर अंदर से ज़्यादातर लोग हैं हमारे ही जैसे।
कई लोगों को आत्मविश्वास पुराने या स्थापित विचारकों के उद्धरणों से मिलता है। हम लेखक जब तक बीस-पच्चीस विचारकों के विचारों के टुकड़े जहां-तहां न ठूंस दें, हमें अपना लेख, लेख ही नहीं लगता। पुराने या स्थापित विचारक का टुकड़ा लेख में सजाते ही लेख को तार्किक माना जाने लगता है भले उस टुकड़े में रत्ती-भर तार्किकता न हो। इसी तरह कई लोगों को पुरानी कहावतों/मुहावरों से आत्मविश्वास मिलता है। एक कहावत अकसर इस्तेमाल होती है-‘प्रेम और जंग में सब जायज़ है।’ मैं सोचता हूं कि अगर प्रेम में सब जायज़ है तो फिर एम. एम. एस. बनाना, प्रेमी की हत्या कर देना और प्रेमिका के मुंह पर तेज़ाब डाल देना भी जायज़ ही है। उसपर इतनी हाय-तौबा क्यों !?
एक मित्र का कहना है कि आत्मविश्वासियों की श्रेणी में वे लोग भी रखे जाते हैं जो दूसरों के बारे में तो सब कुछ जानते हैं या उन्हें लगता है कि जानते हैं मगर अपने और अपने अंधे समर्थकों के बारे में कुछ भी नहीं जानते। उन्हें लगता है दूसरे भी उनके बारे में कुछ नहीं जानते।
कई बार तो लगता है कि मूर्खता, ढिठाई, बेशर्मी, तोतारटंत और आत्मविश्वास पर्यायवाची शब्द हैं।
इस कथन के लिए मैं ख़ुदसे भी उतना ही क्षमाप्रार्थी हूं जितना आपसे, अन्यथा न लें।
आप यह तो नहीं सोच रहे कि अब मुझमें आत्मविश्वास आ गया है ! सच्ची बताऊं तो मुझे अभी तक नहीं पता कि आत्मविश्वास होता क्या है। इतना ज़रुर पता है कि लिखूंगा वही जो महसूस करता हूं।
खुलकर कहूं तो आत्मविश्वास कही जाने वाली चीज़ को मैंने अकसर जिस तरह के लोगों में देखा है, डर लगता है कहीं मुझमें भी न आ जाए !
-संजय ग्रोवर

बुधवार, 25 नवंबर 2009

मोहे अगला जनम ना दीजो-2



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भला किसी को ग़ज़लें भी फ़ुल वॉल्यूम पर सुनते देखा है कभी !

सरल सुनता है कि पूरे मोहल्ले को सुनाता है !?

‘‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,

वे काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।’’

जगजीत सिंह की आवाज़ जैसे कोई डोर है। सरल उसपर चढ़ता है और पतंग बन जाता है। यूं मुक्त आकाश में लहराना कितना अच्छा लगता है सरल को।

25 का हुआ सरल। 30 का हुआ सरल। 35 का हुआ सरल।

मगर वही कमरा। वही बंद दरवाज़ा। वही ऊंची आवाज़ में ग़ज़लें। कभी जगजीत की जगह मेंहदी हसन ले लेते हैं तो कभी हरिहरन। कभी ग़ुलाम अली आ जाते हैं तो कभी हुसैन बंधु। कभी-कभार भूपेन हज़ारिका भी आते हैं। लता, रफ़ी, किशोर भी आते हैं...

’’कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.......’’

मगर जगजीत की आवाज़ में आवाज़ मिलाना इतना अच्छा क्यों लगता है सरल को !

‘‘ न दुनिया का डर था न रिश्तों के बंधन’’

और तेज़ ! और ऊंचा। बात-बेबात झेंपने, शरमाने, डरने और घबराने वाला सरल बंद कमरे में अपनी आवाज़ को एकदम खुला छोड़ देता है। कमरा एक स्टेज बन जाता है। अब उसमें और जगजीत सिंह में कोई फ़र्क नहीं। साथ-साथ बैठे कोरस गा रहे हों जैसे।

खुले में जितना छुपना पड़ता है, बंद में ख़ुदको उतना ही खोल देना चाहता है सरल।

‘‘मैं भी कुछ हंू, देखो कितनी कलाएं हैं मुझमें, सुनो...!’’

कैसी है ख़ुदको अभिव्यक्त करने की यह जानलेवा छटपटाहट !?

क्या बाहर कोई मुझे सुन रहा होगा !

‘‘मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी.......’’



एकाएक कुछ याद आ जाता है सरल को। कोई चीज़ है जो कचोट रही है भीतर से।



यह किसके बचपन के बारे में बात चल रही है आखि़र ! ऐसा क्या था जिसे लौटाने के लिए दुआएं, प्रार्थनाएं हो रही हैं ! गिड़गिड़ाया जा रहा है ! होगा यह जगजीत सिंह का बचपन। होगा यह तलत अजीज़ और सुदर्शन फ़ाकिर का बचपन। सरल क्यों इसके गुणगान में इस कदर लीन है ! सरल का बचपन तो नहीं यह। क्या सरल की भी इच्छा होती है अपने बचपन में लौटने की !

सिहर उठता है सरल। धुंधली यादों में मकड़ी के जालों से भरे कमरें हैं। अदृश्य दीमकें हैं जो भीतर-भीतर सारे बचपन को कुतर जाती थीं और बाहर किसी को पता भी नहीं चलता था। अपने ही लिजलिजे अस्तित्व की सीलन से भरे बिस्तर हैं। वे आक्रमणकारी छींकें हैं जो 50-50 की संख्या में एक साथ हमला करतीं थीं और सरल की कमर के साथ मनोबल को भी तोड़ देतीं थीं। और 5-10 घंटों के इंतेज़ार की यादें हैं कि अब बस अब मेहमान जाएंगे और सरल अपनी झेंप को पोंछता-छुपाता कमरे से बाहर निकलेगा। उम्मीद करेगा कि मां ख़ुदबख़ुद ही कुछ खाने को दे दे, उसे कोई याचक मुद्रा न बनानी पड़े। न मां पर हमलावर होना पड़े। फ़िलहाल तो मां से लड़ना ही उसके लिए मर्दानगी है। जिसके लिए सौ-पचास कोड़े अपने-आपको भी मारने होते हैं अंधेरे बंद कमरों में।

और क्या-क्या है सरल के बचपन में।



‘‘ ांडू आ गया। ांडू आ गया।’’

मोहल्ले के बच्चे सरल के पीछे-पीछे आ रहे हैं।

सरल के पैरों में पसीना है। चप्पलें उतर-उतर जाती हैं। क़दम-क़दम पर, गिर जाने के डर से शरीर कांप रहा है। ऊपर छतों पर खड़े लोग उस पर हंस रहे हैं, सरल को लगता है। सात घरों वाली यह गली पार करने में न जाने कितनी उम्र बीत जाएगी। ऊपर से ये बच्चे पीछे लगे हैं,

‘‘ ांडू है।’’ ं

‘‘ ांडू है।’’

कौन हैं ये बच्चे ! क्यों सरल के पीछे लगे हैं !? क्या कह रहे हैं सरल को !?



(जारी)



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शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

दमित-विमर्श


सुना है कि वक्त बदल गया है।पुरुष भी अब आज़ाद हो रहे हैं। मगर मैं कहता हूं कि फ़िर कहां है वो लड़की जो मेरा हाथ पकड़कर जबरन मुझे घर से बाहर खींच ले जाए। झिड़के कि कहां रसोई में घुसे रहते हो दिन-भर, देखो अब मर्द भी बाहर घूम रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, मंचों पर कहानी-कविता पढ़ रहे हैं।

लो, यह नेकर पहनो। अनकमफर्टेबल होने की ज़रुरत नहीं। लो पहनो पहनो हाफ शर्ट, पहनो सैण्डो बनियान। और किसी लड़की ने तुम्हारी तरफ़ बुरी निगाहों से देखा या अश्लील फिकरा कसा तो मैं उसकी आंखें निकाल लूंगी, ज़ुबान खींच लूंगी। चलो बैठो मोपेड पर मेरे पीछे। चलो छोड़ो इसे, आज गाड़ी तुम ड्राइव करो, हौसला रखो, मैं बैठी हूं न तुम्हारे पास।



कहां है वो लड़की !? मैं उसके साथ घिसटता चला जाऊंगा।


--एक्स वाई ज़ेड

(फेसबुक/संवादघर से निवेदन है कि मेरा असली नाम न छापें। मर्दों के लिए ज़माना अभी इतना भी नहीं बदला। लड़कियों और उनकी बाप-मांओं को पता चल गया तो मेरे लिए अच्छे घर की खाती-कमाती लड़की मिलनी मुश्किल हो जाएगी।)

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

मोहे अगला जनम ना दीजो ।


क्या करे इन हाथों का ? काट डाले इन्हें ? फेंक आए कहीं जाकर ? या हरदम ढंक कर रखे कहीं ? छुपा दे ! या किसी खुरदुरी चीज़ पर तब तक रगड़ता रहे जब तक दूसरे लड़कों की तरह मर्दाने, खुरदुरे, सख्त या गंठीले ना हो जाएं। तनहाई के छोटे से छोटे वक्फ़े में भी ये हीन भावनाएं, ये अपराध-बोध सरल का पीछा नहीं छोड़ते। किसी से हाथ मिलाने से भी डरता है, बचता है सरल। बीच-बीच में सुनने को मिल जो जाता है- ‘अरे यार, तुम्हारे हाथ तो लड़कियों से भी ज़्यादा मुलायम हैं।’'अगर रात अंधेरे में तेरा चेहरा देखे बगैर कोई तुझसे हाथ मिलाए तो यही समझेगा किसी लड़की का हाथ पकड़ लिया है।'


तिस पर दुबला-पतला-पीला शरीर। शर्मीला स्वभाव। तरह-तरह के फोबिया। ज़रा कुछ खट्टा या तला हुआ खाले तो खांसी, ज़ुकाम, पेटदर्द । महीने में 15 दिन बिस्तर पर गुज़रते हैं। धैर्य नाम की चीज़ से सरल का कोई वास्ता है नहीं। लोग उसकी चुप्पी और अवसाद को ही उसका धैर्य समझ लेते हैं तो उसका क्या कसूर। अशांति का महासागर ठाठें मारता रहता है सरल की छोटी-सी खोपड़ी में। बिस्तर में रहता है तो तरह-तरह की अच्छी बुरी कल्पनाएं और फंतासियां भी साथ रहती ही हैं।



कैसी-कैसी कल्पनाएं हैं सरल की ! एक ऐसी पोशाक बनवाए जिसमें से उसकी तो एक उंगली तक न दिखे पर वह सबको समूचा देख सके। कोई ऐसी कार मिल जाए उसे कि वह तो अंदर से सबको देखले पर उसकी किसी को झलक तक न मिले।



एक तो पड़ा-पड़ा जासूसी उपन्यास पढा करता है ऊपर से जाने किसने दे दिए हैं उसे ये फोबियाओं के उपहार। कहां से क्यों आ गया यह जानलेवा अपराध-बोघ! भयानक असुरक्षा की भावना। इस तरह लोगों से छुपकर, डरकर, शरमा कर अंधेरे कमरों की ओट में कैसे काटेगा वह अपनी ज़िंदगी !

(जारी)
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देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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