लोगों के, दुनिया के डरों में
बेमतलब यूं उम्र गुज़ारी
चलो आज फिर अपनी बारी....
सोचता था कि क्या लिखूं तुमको
कि अक्षरों में सही, मैं भला दिखूं तुमको
लिखूं वो बात नयी जो तुम्हे हिला डाले
जो सो गया तुममें, उसको फ़िर जगा डाले
वो ग़लतियां वो ग़लतफ़हमियां जो थीं हममें
वो दूर हो नहीं सकती क्या बदले आलम में
तुम्हारे ज़हन में क्या अब भी ये न आया, गया !
जो मैंने कम कहा था, ज़्यादा वो दिखाया गया
तुम्हारी बदली हो, मेरी तो रोज़ बदली है
ये दौर बदला है, लोगों की सोच बदली है
और हम तो थे ज़माने से आगे पहले भी
ये सोच-सोचके थे दिल हमारे दहले भी
अब आओं दोस्ती की नींव इक नयी डालें
बदलते वक्त को हम भी ज़रा बदल डालें
तुम हाथ मुझपे रखो, मैं तुम्हारी बात बनूं
अगरचे रात तुम्हे दे ख़ुशी तो रात बनूं
दो घड़ी रोएं, हंसंे, बात करें दिन-दिन भर
कि खोल डालें सभी गांठें अपनी गिन-गिन कर
अहम को छोड़के मैंने ये बात रक्खी है
हमारे सामने फ़िर इक हयात रक्खी है
हमारे सामने फ़िर दोस्ती की जन्नत है
गिनो तो दो हैं, सोचो तो पूरी दावत है
जाने क्या मुझको हुआ जाने क्या ये लिख डाला
तुम इसको कुछ भी कहो मैंने तो कुछ लिख डाला
अब जो लिख डाला है मत पूछो क्यूं ये लिख डाला
-संजय ग्रोवर
