व्यंग्यक्या आपने कभी ऐसी गाय देखी है जो कहती हो कि आदमी मेरा बेटा है ? मैंने तो नहीं देखी। बचपन से सुना ख़ूब है कि गाय हमारी माता है, गाय हमारी माता है। कमाल की माता है कि माता को ख़ुद ही नहीं पता कि वह माता है, है तो किसकी माता है! कभी आपने कोई क़िताब ही पढ़ी हो जिसमें लिखा हो मैं फ़लां-फ़लां तरह के आदमियों की माता हूं-लेखिका सुश्री गाय देवी इत्यादि। अब ऐसी भी क़िताब आ जाए तो बड़ी बात नहीं, क्योंकि वर्त्तमान को भी इतिहास की तरह लिखने और जीने में हम मनुष्य ऐक्सपर्ट रहे हैं। इतिहास में ही घुसने और घुसे रहने की हमें ऐसी बीमारी है जिसे अभी मनोचिकित्सा कोई नाम नहीं दे पाई है। हमने कई जानवरों से ज़बरदस्ती के रिश्ते बना रखे हैं। हम आदमी को ही नहीं छोड़ते तो गाय, भैंस, हाथी, कुत्ता, सुअर, बिल्ली, चूहा, सांप वगैरह क्या बेचते हैं !?
गाय हमारी माता होती तो कभी तो हमारा हाल़चाल पूछने आती-कि बेटे कैसे हो, सुबह का नाश्ता लिया कि नहीं, रात खांसी की आवाज़ बाहर तक आ रही थी, कुछ लेते क्यों नहीं ? मगर हाल पूछना तो दूर, बाज़ार में कहीं मिल जाए तो देखती तक नहीं, पता नहीं पहचानती भी है या नहीं। न गाय की शक्ल किसी आदमी से मिलती है। कई आदमी ज़रुर कई बार घर के चाबी के छेद से झांकते मिल जाते हैं। गाय हमारी माता होती तो कुछ आदतें तो उसकी हमसे मिलती-जुलती होतीं ? गाय तो मैंने कभी खिड़की से झांकती भी नहीं देखी। कभी आपने सुना हो, गाय का किसी बैंक मैनेजर को फ़ोन आया हो कि मेरे बच्चों ने मेरे नाम से जो खाते खुला रखे हैं, उनका बैलेंस कितना हुआ है ?
अगर गाय हमारी मां है तो हमें उसे उतना सब तो देना ही चाहिए जो मां को देते हैं। घर में एक कमरा, एक डबल या सिंगल बैड, सुविधानुसार टॉयलेट और बाथरुम वगैरह। अगर हमारा घर ऊपर के किसी फ्लोर पर है तो आकारानुसार लिफ्ट वगैरह भी बनवानी चाहिए।
मगर सही बात तो यह है कि मां के बारे में अच्छी-अच्छी शायरी भी हम तभी तक करते हैं जब तक मां चुपचाप रसोई में पोंछा मारती है और हमारे लिए हलवा-परांठा वग़ैरह सेंकती है। जिस दिन मां भी हमारी तरह ज़िंदगी को ‘इंजॉय’ करने लगेगी, हमारी क़लम लड़खड़़ा जाएगी।
हे आदमी! हे तथाकथित महान आदमी! हे इतिहास में दर्ज़ होने के लालच में वर्त्तमान की ऐसी-तैसी करने में लगे, आदमी! कुछ तो असली काम भी करो। हर चीज़ को तमाशा, हर बात को कर्मकांड, हर क्रिया को अभिनय में मत बदलो! आदमी हो या गाय-भैंस-सुअर-बकरी.......किसी से भी ज़बरदस्ती या एकतरफ़ा रिश्ता बनाना लोकतंत्र और इंसानियत, किसीकी भी सेहत को माफ़िक नहीं आता।
जानवर और मनुष्य के रिश्ते की बात चली तो मुझे एक मशहूर मुहावरा याद आ गया - ‘मतलब के लिए तो हम गधे को भी बाप बना लेते हैं’।
-संजय ग्रोवर
02-10-2015