ग़ज़लख़ुदको फिर से खंगालते हैं चलो,
आज क़ाग़ज़ संभालते हैं चलो
गर लगे, हो गए पुराने-से
ख़ुदको रद्दी में डालते हैं चलो
क्यूं अंधेरों को अंधेरा न कहा
रौशनी इसपे डालते हैं चलो
ज़हन जाना तो मार डालोगे
बात को कल पे टालते हैं चलो
सुन न पाओगे, कह न पाएंगे
एक फ़ोटो निकालते हैं चलो
30-11-2015
आदमी जैसी किसमें है श्रद्धा!
आदमी को ही पालते हैं चलो
02-12-2015
सच को मांगेगा! कौन पूछेगा?
फिर भी सिक्का उछालते हैं चलो
फिर भी सिक्का उछालते हैं चलो
कोई मुद्दा उछालते हैं चलो
यूंही अरमां निकालते हैं चलो
03-12-2015
-संजय ग्रोवर