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बुधवार, 7 दिसंबर 2022

खेल

मेला मशहूर था.

कई दुकाने लगी होती थी. कुछ दुकानों पर प्लास्टिक के टुकड़ों से बना एक चौखटा जैसा बिकता था. ये टुकड़े चौखटे के भीतर ही सरकते थे. इन पर एक नक्शा सा बना होता था. दंकानदार उस बिगड़े हुए नक्शे को दिखाकर बताता था कि इन टुकड़ों को सरकाकर नक्शा वापस बिठाना है. नक्शा सही हो गया समझो आप जीत गए.

क्या उस समय भी कोई होता था जो समझता हो कि उसने नक्शा जोड़ लिया मतलब समाज को जोड़ लिया !

ताली बजानेवाले तब भी होते थे.

-संजय ग्रोवर






बुधवार, 9 मार्च 2016

विश्वगुरु बनने के उपाय

व्यंग्य

विश्वगुरु बनने का एक ही तरीक़ा है- दूसरे सभी देशों को अपने देश से भी बुरी स्थिति में ले आओ।

इसके लिए आवश्यक है कि-



दुनिया में ज़्यादातर देश खाने-पीने में मिलावट शुरु कर दें।

किसी भी देश में बिना दहेज के लड़कियों की शादी न हो पाए।

सभी देशों के लोग अच्छे काम करना बंद कर दें, अच्छाई के नाम पर कर्मकांड करें, अभिनय करें।


सभी देशों के साहित्यकार मौलिक कुछ न लिखें, देशी-विदेशी पुराने विद्वानों को कोट करके काम चलाएं।


सभी देशों में कट्टरपंथिओं और प्रगतिशीलों में इमेज और बैनर के अलावा कोई भी फ़र्क़ न हो। पढ़े-लिखे प्रोफ़ेसरों-ऐंकरों और अनपढ़ लोगों के तर्क और विवेक बिलकुल एक जैसे हों। प्रगतिशील लोग अंधविश्वास की बुराई तभी करें जब उन्हें पूरी गारंटी हो जाए कि इससे उनके सुननेवालों और अंधविश्वासियों पर रत्ती-भर भी असर नहीं पड़ेगा।


सभी देशों के नागरिकों को अपने आसपास की ज़मीनें क़ब्ज़ानी चाहिएं, मंज़ूरशुदा नक्शे के अलावा मकान में कमरे, छज्जे, टॉयलेट बाथरुम निकालने चाहिए। पड़ोसी कुछ बोले तो सभी नाजायज़ क़ब्ज़ाधारक मिल-जुलकर उसका सर उदारतापूर्वक फोड़ डालें।


सभी देश आदमियों से ज़्यादा महत्व पशुओं, पेड़-पौधों, पहाड़ों और नदियों को दें। उनके लिए, मारना पड़े तो आदमियों को मार-मार कर ख़त्म कर दें। अपनी नदियों को ख़ुद ही इतना गंदा कर दें कि दूसरे दूर से ही देख-देखकर भाग जाएं।


सभी देशों के वे लोग जो ब्लैकमनी के बिना एक करवट तक न ले सकते हों, ईमानदारी पर डिबेट-आंदोलन आदि चलाएं।


इसके अलावा जो भी उपाय याद आएंगे, समय-समय पर दर्ज़ कर दिए जाएंगे। कई उपाय आप भी जानते होंगे।


वैसे विश्वगुरु बनने से हो क्या जाएगा !?


-संजय ग्रोवर
09-03-2016


बुधवार, 2 दिसंबर 2015

एक फ़ोटो निकालते हैं चलो

ग़ज़ल

ख़ुदको फिर से खंगालते हैं चलो,
आज क़ाग़ज़ संभालते हैं चलो

गर लगे, हो गए पुराने-से
ख़ुदको रद्दी में डालते हैं चलो

क्यूं अंधेरों को अंधेरा न कहा
रौशनी इसपे डालते हैं चलो

ज़हन जाना तो मार डालोगे
बात को कल पे टालते हैं चलो

सुन न पाओगे, कह न पाएंगे
एक फ़ोटो निकालते हैं चलो
30-11-2015

आदमी जैसी किसमें है श्रद्धा!
आदमी को ही पालते हैं चलो
02-12-2015


सच को मांगेगा! कौन पूछेगा?
फिर भी सिक्का उछालते हैं चलो

कोई मुद्दा उछालते हैं चलो
यूंही अरमां निकालते हैं चलो

03-12-2015

-संजय ग्रोवर






रविवार, 19 अप्रैल 2015

तो यह वह चीज़ है प्यारे!

एक बड़ा-सा मैदान, चारों तरफ़ भीड़, शोर ही शोर, चीख़-चिल्लाहट।

कहीं एक कोने से दो आदमी निकलते हैं। आराम-आराम से चलते हुए। लगता नहीं कि भीड़ और शोर का उनपर कुछ असर हो रहा है। ख़ासे शांत और एकाग्रचित्त मालूम होते हैं। बीच मैदान में पहुंचकर आपस में कुछ बुदबुदाने लगते लगते हैं। फिर झुक-झुककर ज़मीन को देखते हैं, कहीं-कहीं हाथ भी मारते हैं, लगता है जैसे इनका कुछ खो गया है, ढूंढ रहे हैं। इस ढूंढा-ढांढी के बाद फिर सीधे खड़े हो जाते हैं। अब वे हवा में हाथ हिला रहे हैं, लगता है जैसे दूर कहीं किसीको कुछ सिगनल दे रहे हैं।

अब एक कोने से एक आदमी निकलता है। उसके पीछे एक और आदमी निकलता है। उसके पीछे कई आदमी निकलते हैं। ये कुल मिलाकर बहुत ज़्यादा तो नहीं हैं पर उतने ज़रुर हैं जितना राजनीति में नये-नये आए, असमंजस में पड़े नेता का छोटा-मोटा मंत्रिमंडल होता है। इनमें से एक आदमी ने हाथों और पैरों में कुछ भारी-भारी चीज़ें पहन रखीं हैं, जैसे पुराने सामानों के साथ नये ज़माने की कोई लड़ाई लड़ने जा रहा हो। एक और आदमी है जिसके आसपास बाक़ी सब घूम रहे हैं, उससे कुछ सुन रहे हैं, कुछ-कुछ कह भी रहे हैं। ये सब उस तरफ़ जा रहे हैं जहां वे दोनों पहले से मौजूद हैं। चलते-चलते ये अचानक उछलने लगते हैं, हाथ-पैर हवा में हवा में घुमाने-पटकने लगते हैं। ये सब करते-कराते ये भी वहीं पहुंच जाते हैं जहां वे दोनों खड़े हैं। अब ये सब मिलजुल कर कुछ बुदबुदा रहे हैं, कुछ कूदा-फ़ादी कर रहे हैं। वक़्त बीत रहा है। ये कूदा-फ़ांदी न भी करें तो भी उसे तो बीतना ही है।

फिर एक कोने से दो और आदमी निकलते हैं। दोनों ने अपने हाथों में कुछ उठा रखा है, लगता है जैसे कोई पाषाणकालीन हथियार हों। ये दोनों उन हथियारनुमां चीज़ों से बीच-बीच में ज़मीन को ठोंकते जाते हैं। ‘जल’ नाम की फ़िल्म याद आ जाती है जिसमें एक आदमी ज़मीन पीट-पीटके अंदाज़ा लगाता है कि पानी कहां से निकलेगा। इन दोनों ने भी वैसे ही कुछ सामान अपने तन पर लाद रखे हैं जैसे उनमें से एक ने लाद रखे हैं। ये दोनों अपना सर झुकाए हैं, बात भी करते हैं तो एक-दूसरे को देखते हैं, इधर-उधर नहीं देखते। ऐसा लग रहा है जैसे इन्हें मालूम ही नहीं है कि यहां इनके अलावा भी कोई और है। जबकि पहलेवाले लोग इन दोनों को देखकर इधर-उधर खि़सकना शुरु हो गए हैं। ख़रामा-ख़रामा चलते हुए ये दोनों भी उन दोनों के पास पहुंच जाते हैं जो सबसे पहले आए थे। अब ये मिलकर कई आदमी हो गए हैं। ये क्या करनेवाले हैं!? वैसे अभी तक होने जैसा कुछ हुआ नहीं है। दो और दो आपस में कुछ बातचीत कर रहे हैं। बाक़ी पूरे मैदान में फ़ैल गए हैं और उछल-कूद जारी रखे हैं।

अब आप कहेंगे कि मैं आपको बोर कर रहा हूं। जी नहीं, मैंने तो जो देखा, वही बता रहा हूं। आप ठीक समझे, यह आपका एक पसंदीदा खेल है। अभी तो इसमें और बहुत कुछ होना है, हालांकि मेरा धैर्य चुक गया हैं। मगर आप तो देखेंगे। अभी लकड़ी के बल्लेवाला आदमी बल्ले को कभी एक टांग के आगे रखेगा, कभी लकड़ी की तीन डंडियों के आगे रख-रखकर अंपायर से सहमति मांगेगा। अंपायर जब सहमति देगा तो किस बात पर देगा, यह आपको समझ में न आए तो भी आप पूछेंगे नहीं। फिर दो बनाम ग्यारह का खेल शरु होगा। फिर बॉलर नाम का आदमी बॉलिंग मार्क लगाएगा, छः बार उछल-कूद करेगा, अपने ही किसी साथी को तीन बार फेंक के देखेगा। अब यह उधर को जाएगा जहां इसे बॉल नहीं फेंकनी। फिर यह ज़ोर-ज़ोर से अपनी हिप पर बॉल को रगड़ेगा, इतनी ज़ोर से कि पतलून अगर महंगे कपड़े की न हो तो उसमें से खिड़िकयां निकल आएं। फिर जितनी लंबी इसे बॉल फेंकनी है उससे ज़्यादा लंबाई से ये भागता हुआ आएगा। उससे पहले ये अंपायर को अपना टोपा, पसीनेवाला रुमाल, पसीनेदार स्वेटर, कुछ भी पकड़ा सकता है। अब ये एक तरफ़ से छै बार गेंद फेंकेगा। तब जाकर ओवर ख़त्म होगा। उसके बाद छै गेंदें दूसरे छोर से फेंकी जाएंगीं। सारे ग्यारह खिलाड़ी अपनी-अपनी पोज़ीशन बदलेंगे, इधर से उधर जाएंगे। और यह हर छै गेंदो के बाद होगा। जितनी देर में यह होगा उससे कम देर में तो लोग नई पार्टी बना लेते हैं।

आप अभी भी देख रहे हैं! मेरा तो लिखते-लिखते दिमाग़ दुख गया।

बुरा मत मानिएगा, मैं तो जो है वही लिख रहा हूं। जी हां, यह वही चीज़ है जिसपर आप जान देते हैं-क्रिकेट। इसे कहते रहे हैं जेंटलमैंन्स्‘गेम। इस शरीफ़ खेल के जजों को अंपायर कहा जाता है। पहले ये जज उसी देश के हुआ करते थे जहां टेस्ट मैच खेले जा रहे हों। बाद में जाकर समझ में आया कि पवित्रता (यह जो भी होती हो) का संबंध खेलों, बिल्डिंगों और संस्थाओं से नहीं, व्यक्तियों से होता है। तब तीसरे देश के जज बुलाने शुरु किए गए। अब तो कपड़े रंगीन हो गए हैं, चीयर-गर्ल्स आ गईं हैं (चीयर-ब्वॉएज़ भी आ ही जाएंगे), सट्टा पारंपरिक हो गया है, खिलाड़ियों पर बोली लगती है।

आप देखते रहिए। मैं जाते-जाते इतना ज़रुर कहूंगा कि आदमी ही शरीफ़ नहीं हो पा रहा तो खेल कैसे हो जाएंगे?

वे तो आदमी तक नहीं हैं।


-संजय ग्रोवर
19-04-2015


मंगलवार, 31 मार्च 2015

बचकाने बच्चे और पुरस्कार की टॉफ़ियां

पुरस्कार टॉफ़ियों की तरह होते हैं, देनेवाले अंकल की तरह होते हैं, लेनेवाले बच्चों की तरह। बल्कि बचकाने।


अंततः तसल्ली यही बचती है कि हमने कौन-से वाले अंकल से टॉफ़ी ली, तथाकथित अच्छे अंकल से या तथाकथित बुरे अंकल से। ज़्यादा लालची बच्चे यह सावधानी भी नहीं रख पाते, कई बार वे झोंक में आकर उन अंकलों से भी टॉफ़ी ले लेते हैं जिन्हें वे सार्वजनिक रुप से बुरा घोषित कर चुके होते हैं। ऐसे बच्चे एक-दूसरे का लालच छुपा लेते हैं। इनके लिए यह विषय व्यंग्य का नहीं होता।

जो भी अंकल टॉफ़ी देते हैं वे थोड़ा सिर पर हाथ फिराते हैं, बाल सहलाते हैं, गोद में उठाते हैं, कई बार कुछ काम भी बता देते हैं करने को।

जो बचकाने बच्चे टॉफ़ी के पीछे पगलाए रहते हैं, उन्हें इसकी या उसकी में से एक गोद चुननी होती है।

उनकी सारी लड़ाई ‘तेरेवाले अंकल अ़च्छे या मेरेवाले अंकल अच्छे’ की होती है। गोद में बैठने का शौक़ दोनों को बराबर होता है।

कभी-कभी कोई बच्चा ऐसा आ जाता है जो कहता है कि मुझे किसी भी अंकल से टॉफ़ी नहीं लेनी तो दोनों तरह के बच्चे हैरान और परेशान हो जाते हैं। पहले ये पूरी कोशिश करते हैं कि उसको भी किसी न किसी अंकल से टॉफ़ी दिला दें। अगर वह नहीं लेता तो ये कोशिश करते हैं कि किसी भी तरह यह प्रचारित कर दें कि वह भी टॉफ़ी लेता है। या कि उसे टॉफ़ी नहीं मिली इसलिए वह टॉफ़ी के खि़लाफ़ है।

समझनेवाले समाज की हालत देखकर ही समझ जाते हैं कि टॉफ़ियां भले बदल जाएं मगर बचकाने बच्चे और उनके अंकल लोग ज़रा नहीं बदलते।

किसीने ठीक ही कहा है कि आत्मविश्वास से हीन और अपनी ही नज़र में संदिग्ध लोग पुरस्कार लेकर ख़ुदको ख़ुदके लिए विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं।

किसीने क्या मैंने ही कहा है।


-संजय ग्रोवर

31-03-2015



शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार

व्यंग्य

पता नहीं भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार का क्या रिश्ता है पर पिछले कुछ सालों से इन तीनों का नाम कई बार एक साथ सुनने में आया है। आप भी सुनना चाहते हैं तो यह वार्त्तालाप सुनिए-

‘देखिए, मैं ज़रुर भ्रष्टाचार दूर कर दूंगा, यह अच्छा मौक़ा है, भगवान भी अब यही चाहता है, लगता है कि उसीने मुझे इसके लिए चुना है, ज़रुर कोई चमत्कार होने वाला है।’

‘यह तो बहुत अच्छी बात है, सभी परेशान हैं, लेकिन मुझे एक बात समझ में नहीं आई।’ भगवान क्या आपके बड़े होने का इंतज़ार कर रहा था ?’

‘यह क्या बात हुई ?’

‘मतलब इतने सालों से अपने यहां भ्रष्टाचार भगवान की इच्छा से था ? भगवान क्या भ्रष्टाचार दूर करने के लिए आप पर डिपेंड करता है? वह ख़ुद भी तो दूर कर सकता था। या किसी और को चुन सकता था ?‘

‘यह भी कोई प्रश्न है ?’

‘नहीं, मतलब इतने सालों से भगवान को भ्रष्टाचार बुरा नहीं लग रहा था, आपके बड़े होते ही बुरा लगने लगा ? लगता है भगवान आपसे डरता है !’

‘हा हा हा, आप भी क्या बात कर रहे हैं, हम तो बहुत साधारण आदमी हैं।’

‘आपकी इसी विनम्रता का मैं क़ायल हूं, आप बुरा न मानें तो कृपया बताएं कि इतने सालों से भगवान भ्रष्टाचार के साथ मज़े से रह रहा था तो एकाएक उसे हुआ क्या ? कहीं आपने तो उसे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए नहीं राज़ी किया !?’

‘क्या यार.....आप भी कमाल करते हैं....’

‘नहीं नहीं, अब तो आपको बताना ही पड़ेगा कि आपकी टीम ने भगवान को कैसे तैयार किया ? प्लीज़ अपनी टीम से बात करवाएं, लोग आपकी स्ट्रेटजी जानना चाहेंगे, लीजिए माइक लीजिए, सब आप ही के तो हैं.....’

‘नहीं नहीं, सब जनता के हैं, देखिए अभी टीम के सदस्य थके हुए हैं, एक-दो की तबीयत भी ख़राब है....’

‘ओह! तो भगवान उनकी तबियत कब तक ठीक करेगा ? क्या भगवान की तबियत आप पता करेंगे कि कब उसकी तबियत आएगी और वह उनकी तबियत ठीक करेगा ?’

‘हा हा हा, आप भी ना......, चलिए दूसरे लोगों को भी टाइम दे रक्खा है....’

‘चलिए, नमस्कार, भगवान को भी मेरी नमस्ते दीजिएगा।’

‘हा हा हा।‘

-संजय ग्रोवर 
14-02-2015


गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

ग़ज़ल

अपने हक़ में अक्स बदल देने के आदी निकले रे
आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

जिनका मक़सद-ए-आज़ादी था औरों की ग़ुलामी
वही बारहा बनके मसीहा-ए-आज़ादी निकले रे

ज़ालिम ने मज़लूमों को हर तरह से यूं बेदख़ल किया
उनका हक़ भी ख़ुद लेने को बन फ़रियादी निकले रे

भरम को जिनने कहा हक़ीक़त, छोटेपन को ऊंचाई
वो रंगीन-मिज़ाज, ओढ़कर शक़्लें सादी, निकले रे

पहले क्या-क्या होता होगा, लोगों ने कुछ यूं जाना
जिनको आंदोलन समझा, सब कूदा-फ़ांदी निकले रे


-संजय ग्रोवर

04-12-2014

गुरुवार, 29 मई 2014

प्लांटिंग, पवित्रता और प्रतिबद्धता


बात दिलचस्प है इसलिए बता रहा हूं।

देखता हूं कि जो लोग किसी तथाकथित महान विचारधारा और गुट से जुड़े होते हैं वे अकेले और स्वतंत्र व्यक्ति का विरोध करने में कुछ हिचकिचाते हैं। वजह तो पता नहीं, अंदाज़ा लगाना चाहें तो कोई आफ़त भी नहीं आ रही-शायद उन्हें विश्वास ही नही हो पाता कि आदमी अकेले भी स्वतंत्र हो सकता है, बिना ऊपर से आए ऑर्डर के भी कुछ कर सकता है। उनकी ग़लती भी नहीं है, जैसी ज़िंदग़ी आदमी जीता है, उससे अलग या आगे की कल्पना उसके लिए मुश्क़िल होती होगी।

उन्हें अगर अकेले विचारक का विरोध करने की ट्रेनिंग नहीं मिली तो करें क्या ? फिर ऐसा क्यों न किया जाए कि उसे किसी विरोधी गुट से जुड़ा दिखा दिया जाए जिससे दिखावटी या वास्तविक लड़ाई में वे प्रशिक्षित किए गए हैं। हांलांकि यह तरीक़ा कुछ ऐसा ही है जैसे आप पहले किसीके घर में जाकर स्मैक का पाउच प्लांट कर दें फिर दूसरे दिन अख़बार में ख़बर निकले कि ‘नशे का ख़तरनाक़ तस्कर गिरफ्तार, भारी मात्रा में स्मैक बरामद’। यह विधि है तो शर्मनाक़ पर धर्म और धारा की भलाई की ख़ातिर कब क्या न करना पड़ जाए, कुछ मालूम नहीं।

वैसे गुटधारियों की ज़िंदगी होती इतनी मनोरंजक है कि कई बार ज़रुर अकेले आदमी का भी मन होता होगा कि इन्हीं के बीच जाके पसर जाए। भिन्न-भिन्न तरीक़ों से ये लोग संबोधनों, विशेषणों, अवसरों और परिस्थितियों का उपयोग करते हैं। जैसे कि इनका विरोधी गुट अफ़वाहें उड़ाए तो ये एकदम पवित्रता का धुंआ छोड़ने लगते हैं, नाक सिकोड़ने लगते हैं कि देखो कैसे-कैसे षड्यंत्र ये लोग करते हैं, बेहूदे कहीं के। मगर जब ये ख़ुद अफ़वाहें उड़ातें तो भारी मजबूरी में उड़ाते हैं-क्या करें कोई और रास्ता ही नहीं था, कुछ न कुछ रणनीति तो बनानी ही पड़ती है, आखि़र हमारी लड़ाई सच की लड़ाई है, हमारी कोई उनके जैसी थोड़ी है।

मज़े की बात है जब मरज़ी ये सच का ठेका ले लेते हैं और जब दिल करे झूठ में सहजता ढूंढने लगते हैं। बहुत ही मतलब कमिटेड लोग होते हैं, विरोधी गुट की भाषा में प्रतिबद्ध। कभी, अभी अपने नये मकान में चिलगोज़े खाने का अपना फ़ोटो दिखाकर बताते हैं कि कैसे मेरा संघर्ष सफ़ल हुआ तो कभी अचानक रोना-धोना शुरु कर देते हैं कि यार सारी ज़िंदग़ी फ़क़ीरी में बीत गई, कुछ हासिल नहीं हुआ, तुम्ही कुछ करवाओ न यार।
कहने में डर रहा हूं मगर लगता यही है कि इनका सिद्धांत एक ही होता है कि जब जहां जिससे फ़ायदा हो, जिधर को भीड़ जाती दिखे, तुरंत उसी रंग में आ जाओ। दारु पी रहे हो तो आवारग़ी को महान साबित करने में हाथ-पैर तोड़ लो, परिवारों के साथ बैठे हो तो कहो कि मैं तो शुरु से कहता था कि एक दिन तो तुम्हे यह करना ही पड़ेगा। इसके अलावा रास्ता भी क्या था।

सत्ता से इनकी लड़ाई हमेशा रहती है। हम जैसे तो वैसे भी कया लड़ेंगे सत्ता से, हमें तो मालूम भी नहीं कि रहती किधर है, हमारी तो ज़िंदग़ी ऐसे छोटे-मोटे झंझटों से निपटते बीत जाती है जिनमें लोकल अख़बारों को भी कोई ग्लैमर नहीं दिखता। सत्ता के बारे में हमें तो तभी जानने को मिलता है जब किसी सत्ता-विरोधी को कोई पुरस्कार, कोई वजीफ़ा, कोई ग्रांट, कोई यात्रा मिलने की ख़बर आती है। ख़बर देने वाले चैनल भी सत्ता-विरोधी ही होते हैं। सत्ता का मूड भी क्या ग़ज़ब होता है कि इसे जब अपने विरोधियों पर ज़्यादा ग़ुस्सा आता है तो ग़ुस्से में यह उन्हें पुरस्कार और सम्मान फ़ेक-फ़ेंक कर मारती है।

मैं ऐसे लोगों को सीरियसली इसलिए लेता हूं कि ये आपस में मिल जाएं तो किसीको कुछ भी साबित कर सकते हैं, किसीको भी सीरियस हालत में पहुंचा सकते हैं। वैसे इन्हें मिलना पड़ता भी नहीं है, ये मिले-मिले से ही होते हैं। उसदिन सड़कपर परस्पर-विरोधी दो प्रतिबद्धों की बातें सुनने को मिल गई-

कई साल बाद मिले यार, कैसा चल रहा है?

बस, सब सैट हैं, एक लड़का डॉक्टर हो गया है, एक इंजीनियर है, एक बामपंथ में डाल दिया है, एक जॉनसंघ में लग गया है, बस मिल-जुलके बढ़िया चला रहे हैं ऊपरवाले की कृपा से।

अच्छा, सुना तो था कि आपने एक गोद भी लिया था जिसे सफ़ाई का क्रेज़ हो गया था....?

अरे! वो तो....कहने लगा पापा, सफ़ाई की एक्टिंग अलग बात है, परफ़ॉर्मेंस अलग बात है पर ज़िंदगी-भर येई थोड़े ना करता रहूंगा, मैं क्या इसके लिए पैदा हुआ हूं.....मुझे भी रहम आ गया, मैंने कहा कि सारी समानता के ठेका हमींने थोड़े ले लिया है, तू कुछ अफ़सरी वगैरह कर ले, जा जी ले अपनी ज़िंदग़ी....

तो साथित्रो, हांलांकि स्टेज पर तो ये लड़ते ही रहते हैं, मगर ये लेख पढ़कर कहीं ये न कह दें कि यह आदमी हमारे समाज को तोड़ रहा है, फूट डाल रहा है....

इसलिए इस लेख को चुपचाप पढ़ लें और भूल जाएं।

-संजय ग्रोवर
29-05-2014


शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

सड़क-बहादुर

पिछले दो-तीन सालों से अपने यहां सड़क ख़ासी चर्चा में है। लोग एक-दूसरे को अहिंसापूर्ण ढ्रंग से ललकारते
मिलते हैं कि बेट्टा सड़क पर नहीं उतरे तो ज़िंदगी में किया क्या !? अगला एकदम से घबरा जाता है कि सड़क पर जाकर दो-चार नारे नहीं मारे, मोमबत्ती की गरमी में हाथ शहीद नहीं किए, किसी बिल्डिंग को नहीं घेरा, किसीको चपत मारकर नहीं भागे तो मानो आदमी को डूबकर मर जाना चाहिए। और सिर्फ़ सड़क से काम नहीं चलता, सड़क पर संघर्ष करते हुए आपके विज़ुअल्स् और स्टिल फ़ोटोग्राफ़ भी हर एंगल से पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए।

आप ज़रा मेरी बेशर्मी देखिए ; मुझे ऐसे तानों से रत्ती-भर काँपलैक्स नहीं होता। जैसे कई लोग कैमरा-संकोची होते हैं, मैं सड़क-संकोची हूं। बचपन से ही हूं। उस वक्त भी ऐसे लोग पर्याप्त से ज़्यादा मात्रा में पाए जाते थे जो सड़क पर किसी भी तरह के संघर्ष को लेकर अत्यंत मुखर होते थे। बिजली चली जाए तो मर्द लोग सड़क पर ही कमीज़-बनियान उतारकर हवा करना शुरु कर देते थे। घर में नल होते हुए भी कई संघर्ष-पसंद मर्द सड़क के नल पर इस मस्त अंदाज़ में बोल्डली नहाते थे कि मैं अपने बाथरुम में भी उनका मुक़ाबला नहीं कर सकता था। आपको तो मालूम है अपने यहां सड़के भले ग़रीब मिल जाएं, नालियां बराबर कीचड़-संपन्न रहतीं हैं। प्रकृति को सड़क पर प्रदर्शित करती नालियां प्रकृति-प्रेमी मर्दों का एक तरीके से अपरोक्ष आह्वान करतीं हैं कि आओ, कुछ कर जाओ। संघर्षवान मर्द आहलादित् हो उठते। कई बार तो वे नालियों का भी वेट नहीं करते। कुछ तो ऐसे साहसी कि पेड़ की आड़ या छोटी-सी झाड़ के भी मोहताज नहीं। ‘घटाओ तुम्हे साथ देना पड़ेगा ; मैं फिर आज........’।  क्या तो चौराहा, क्या मैदान और क्या मेला.....

लोग थे और हैं कि सड़क पर ही बिना किसीकी परमिशन लिए गड्ढे-वड्ढे खोदकर तम्बू-बम्बू तान देते हैं, कई बार तो रास्ते-वास्ते भी बंद कर देते रहे। और कोई कुछ पूछ ले तो, अबे स्साल्ले, रिक्शा पीछेवाली सड़क से निकाल्ले ना, देखता नहीं कथा चल्लई है, आया बड़ा रिक्शेवाला.....। सड़क पर मंडप लगे हैं और वहीं आग़ जल्लई है और वहीं पवित्र रोशनी में लेना-देना भी चल रहा है। कल्लो क्या कल्लोगे ? कन्नेवाले ख़ुद ही दोस्तों और रिश्तेदारों में शामिल हैं। सड़क पर लेन-देन करना क्या मज़ाक़ है ? आंदोलन से कम नहीं लगता।

सड़क पर साहसपूर्ण अहिंसात्मक संघर्ष के हम आदी रहे।

झूठ नहीं बोलूंगा, उस वक़्त बड़ा अपराध-बोध होता था। कई बार लगता कि मैं मर्द ही नहीं हूं, मुझे जीने का हक़ क्या है, वगैरह...। बाद में पता नहीं कैसे, उल्टा-सीधा पढ़ते-सोचते, अपराध-बोध और शर्म-संकोच वगैरह कम होते गए।

लेकिन दुनिया ? उसका क्या करोगे ? देखता हूं कि सड़क को लेकर विद्वानों और आंदोलननुमांकारियों की अवधारणाएं आज भी उठान पर हैं। पर मुझे समझ में नहीं आता कि जो काम आप अपने घरों और दुकानों में कर सकते हैं उसके लिए सड़क पर क्यों नाचते हैं !? मान लीजिए आप एक अभिनेता हैं और आप ईमानदारी पर अपनी जान न्यौछावर कर देना चाहते हैं। तो सीधा उपाय है कि जो भी प्रोड्यूसर/डायरेक्टर/फ़ायनेंसर आपको बुक करने आया है उसको अपने ड्रॉइंग-रुम में ही बोल दीजिए न कि मैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ व्हाइट मनी वाली फ़िल्म में ही काम करुंगा, भले आप मेहनताना कम दे दें, पर मैं ब्लैक मनी किसी भी हालत में नहीं लूंगा। मेरे कई बंगले हैं, कई ज़मीनें हैं, पीढ़ियों का इंतज़ाम हो चुका है, अब मैं ईमानदारी से जीना चाहता हूं। अगर आप दहेज की बीमारी दूर करना चाहते हैं तो कार्ड लेकर आई सहेली से अपनी किचेन में ही धीरे से कहके देखिए कि बहिना, मैंने तो दहेजवाली शादियों में जाना बंद कर दिया है, कहीं तू भी इसी तरह की शादी तो नहीं कर रही ? अगर आपकी दिलचस्पी इक्वैलिटी में यानि कि जातिवाद को हटाने में है तो आप कह सकते हैं कि जिन्होंने अपने वैवाहिक विज्ञापन में अपनी जाति का ज़िक्र किया है, इन्वीटेशन कार्ड में भी जाति का ज़िक्र किया है, जो अपने वैवाहिक आयोजन या दूसरे समारोह जाति-आधारित रीति-रिवाज़ों पर चढ़कर गर्व से मनाते हैं, वे मुझसे ऐसी कोई कोई उम्मीद न रखें कि मैं मूर्खों की तरह, ख़ामख्वाह ही तुम्हें जाति-विरोधी या इक्वैलिटी-समर्थक मान लूंगा। होंगे दूसरे अक्ल के अंधे, मैं पाखण्ड को समझने में कोई भेद-भाव नहीं बरतता।

इस बात की गारंटी कोई भी ले सकता है कि जब आप ऐसा करेंगे तो कोई पुलिस आपको पकड़ने नहीं आएगी, कोई आप पर अश्रु-गैस के गोले नहीं छोड़ेगा, पानी की बौछार नहीं करेगा, लाठी चार्ज नहीं करेगा, जेल में बंद नहीं करेगा। यह सब आप घर बैठे बड़े मज़े से कर सकते हैं।

करके देखिए, तब समझ में आएगा कि सड़क पर ज़्यादा हिम्मत चाहिए कि घर में ज़्यादा चाहिए ?

अगर आप घर के कमरे में नहीं कर सकते तो सड़क से कैसे कर लेंगे ?

-संजय ग्रोवर

07-02-2014


शनिवार, 30 जुलाई 2011

मेरिट-स्थान और पलट-वॉक

दो व्यंग्य

1. मेरिट-स्थान

मेरे सपनों में एक जगह है साहब। सपनों में ही होगी साहब। मुझे तो बिलकुल विश्वास नहीं होता कि ऐसी जगह, ऐसी व्यवस्था हक़ीकत में भी हो सकती है। वहां मैं देखता हूं कि कई चैनल हैं और बड़ी-बड़ी बहसें चलतीं हैं। वक्ता डायस ठोंक-टोंक कर बोल रहे हैं। कह रहे हैं कि मेरिट के आधार पर नियुक्तियां होंगी तो उस जगह सब ठीक हो जाएगा। आज-कल उन्हें बिछुड़ी हुई मेरिट बहुत याद आने लगी है। 10-20 साल पहले मैंने सपने में देखा था कि आरक्षण नाम का एक जलजला उस जगह आया था और बहुत-से लोगों के विचार अचानक से शीर्षासन करने लगे थे। मेरिट और मानवता की बातें शुरु हो गयीं। उससे पहले जितने भी सपने मैंने देखे उनमें होता यही था कि लोग दफ्तरों में जाते और बिना संबंध या रिश्वत के अगर अपना काम कराने की कोशिश करते तो अकसर मुह की खाकर और अपना-सा मुंह लेकर लौट आते। वजह क्या बताऊं, कोई विश्वास ही नहीं करेगा। उन दफ्तरों में सारा स्टाफ़ मेरिट वालों का होता था। मेरिट के अलावा कोई और योग्यता वहां दाखि़ल हो सकती थी तो वो ‘डोनेशन’ थी, वो ‘पहुंच’ थी। रिज़र्वेशन नाम की चिड़िया उस वक्त सिर्फ़ ख़्यालों, सपनों और अनुमानों में उड़ा करती थी। एक दिन अक्ल का मारा एक ऐसा शासक सत्ता में आ गया कि पट्ठे ने रिज़र्वेशन को हक़ीकत में बदल दिया। सत्यानाश हो उसका कि सपनों में भी हमारे सपनों की झण्ड हो गई।
फिर मुझे सपना आता है कि रोल बदल दिए गए हैं। मेरिट की बात करने वालों को झोपड़-पट्टियों में रहने को भेज दिया गया है। जहां सड़ा पानी भी उपलब्ध हो जाए तो पहले सोचना पड़ता है कि इससे नहाएं या पीकर पहले प्यास बुझाएं ! जहां सुअरों और नालियों के साथ सोना पड़ता है। पहले वे अपने पाखाने भी साफ़ नहीं करते थे अब दूसरों के भी करने पड़ते हैं। बदले में उन्हें मार, ग़ालियां और जूठन मिलती है। उनकी स्त्रियों के साथ रोज़ाना.....। धर्मस्थलों में तो छोड़िए, उन्हें विद्यालयों में भी घुसने नहीं दिया जाता। उनके पास कोई पढ़ाई की डिग्रीयां नहीं हैं। ज़्यादा क्या लिखूं, सपने में भी ऐसी बातें सोचकर डर लगता है। साल-भर तक मैं इस सपने को यूंही छोड़ देना चाहता हूं...
उसके बाद जो सपना आएगा, उसमें देखेंगे कि क्या वे तब भी मेरिट की बात इतने ही ज़ोर-शोर से करते हैं। क्या वे तब भी इतनी ही दिलदारी से डायस ठोंकते हैं! क्या तब भी इस ठोकन पर भाड़ेदार और मलाईमार तालियां इतनी ही ज़ोर से पिटतीं हैं.....
दूसरे संवादघर में ‘मेरिट-स्थान’


2. पलट-वॉक


लड़कियां बौरा गयी हैं। कहतीं हैं स्लट वॉक करेंगीं। कर रियो तो करो इतना ढोल काहे पीट रियो ? भीड़ लगाना चाह रियो क्या ? पगलियो, ये जो विरोध कर रए हैं, इन्हें बुलाना चाह रियो क्या ? बावरी हो का ? इन्हें तो भनक लगने की देर है, ये तो सबसे पहले आवेंगे। इनने तो अब तक इतनी पब्लिसिटी कर दी होगी तुम्हारी कि जितनी तुम पैसा-गहना खर्च करके भी ना कर पातीं सात जनम में। ये तो लाइव भी देखेंगे, टी वी कवरेज पे जुटेंगे, अखबार में ढूंढेंगे, ब्लॉग पे छांटेंगे तुम्हे। मोहे याद है जितने ज़्यादा जो अखबार सभ्यता-संस्कृति पे संपादकीय लेख लिखा करे थे, उतने ही ज़्यादा उनमें हीरोइनों के बड़े-बड़े रंगीन फोटू छपा करे थे। अभी मैं बताऊं का कि कैसे फोटू छपा करे थे ! तुम भी सब जानो हो री। और तुम नया का कर री हो ? हम मर्द लोग सब कर चुके। विश्वास ना है तुम्हे ! तो आओ मैं तुम्हे अपनी टाइम-मशीन में 30-35 साल पुराने अपने कस्बे में ले चलूं।
देखो, सुबह के सात बज रे हैं। हलवाई सब खुले पड़े हैं। कोई चड़ढी में है तो कोई साथ में बनियान भी डाले है। तुम तो कहोगी कि टू-पीस पहन राखा है इनने। कहो, कहो। देखो तो कैसी ताजी-ताजी कचौड़ी, जलेबी, पूड़ी बन री हैं। ग्राहक आ रे हैं आंख मलते हुए। कोई लुंगी में आ रिया है, कोई धोती में आ रिया है, कोई प्लस बनियान में भी है तो कोई विद अंगोछा भी है। पर देखो, कैसे सहज भाव से आ रे हैं, खा रे हैं और जा रे हैं। कोई घमंड नहीं, कोई पब्लिसिटी नहीं और का कहें हैं उसे कि कोई आत्म-मुग्धता नहीं कि हम कुछ स्पेशल कर रे हैं। कुछ ऐसा कर रे हैं जिसे कलको स्लट वाक भी कहा जा सके है। देखी है ऐसी सहजता, ऐसी सादगी, ऐसी विनम्रता ? तुम काहे इत्ती फूल री हो री लड़कियो !
अखाड़े देखोगी, पहलवान देखोगी हमारे कस्बे के ? सब स्लट वाक भूल जाओगी री। तुम्हारी जिम में लड़की एलाउ तो है, यहां तो जो करना हो, सब लड़के ही कर लेंवे करे हैं। अरे, अब छोड़ो भी, लड़कईयो।
ना मन भरा अभी ! आओ फिर महानगर में लौट आओ। ये देखो जो सर्कस जैसा पंडाल लगा है। देखो बाबा कैसी कूद-फांद कर रे हैं टू-पीस में। ज़्यादा जोश आ जाया करे है तो ऊपर का वन पीस भी उतार के हवा में घुमा दिया करे हैं। अरे हटो जाओ लड़कियों, बड़ीं आयीं स्लट वॉक करने वालीं। अभी नागा बाबा का जुलूस दिखाऊं का ? हैं ? डर गयीं !
अरे हम मर्दुए बहुत बदमाश हैं रे। पहले तो तुम्हें कुछ करने ना देंगे, रोड़े अटकावेंगे, डरावेंगे, फिर भी तुम ना मानोगी, कर ही दिखलाओगी तो हम बोल देंगे ई में नया का है, ई तो हम पहले ही कर चुके, कई बार कर चुके, तुम तो प्रतिक्रिया कर री हो, पलट वार कर री ओ, माने कि पलट-वॉक कर री हो। हमारा कोई इंट्रेस्ट इसमें ना है।
वैसे चीफ़ गैस्ट बनाके बुलाओ तो मैं आ भी लूंगा।

दूसरे संवादघर में 'पलट-वॉक'

--संजय ग्रोवर

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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