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शुक्रवार, 15 मार्च 2019

मैं पशोपेश में रहा

ग़ज़ल


मैं अपने देश में रहा
मैं पशोपेश में रहा

सदा तक़लीफ़ में रहा
ज़रा आवेश में रहा

वही होगा मेरा रक़ीब
जो कई वेश में रहा

मैं क्यों ईमानदार हूं
बहुत वो तैश में रहा

न मैं अमीर में रहा
न ही दरवेश में रहा



-संजय ग्रोवर
15-03-2019


रविवार, 26 अगस्त 2018

सच बोलना है मुश्क़िल, लेकिन है गाना आसां

ग़ज़ल

जब खुल गई पहेली, तो है समझना आसां
सच बोलना है मुश्क़िल, लेकिन है गाना आसां 

पहले तो झूठ बोलो, ख़ुद रास्ता बनाओ

फिर दूसरों को सच का रस्ता बताना आसां

वैसे तो बेईमानी .. में हम हैं पूरे डूबे

माइक हो गर मुख़ातिब, बातें बनाना आसां

हालांकि यूं ही अकड़े, आखिर तो गए पकड़े

मौसेरा भाई पकड़े, है पकड़े जाना आसां

जो तुम तलक है पहुंचा, उन तक भी पहुंच जाए

तुम बन गए अगर तो, उनको बनाना आसां

मैं हर समय हूं जागा, है तब ही मैंने देखा

है जागने की कहकर, सबको सुलाना आसां

-संजय ग्रोवर
26-08-2018


बुधवार, 27 जून 2018

एक मुर्दा कहीं से ले आओ

photo by Sanjay Grover
ग़ज़ल


भीड़, तन्हा को जब डराती है
मेरी तो हंसी छूट जाती है

सब ग़लत हैं तो हम सही क्यों हों

भीड़ को ऐसी अदा भाती है

दिन में इस फ़िक़्र में हूं जागा हुआ

रात में नींद नहीं आती है

भीड़, तन्हा से करती है नफ़रत
और हक़ प्यार पे जताती है

एक मुर्दा कहीं से ले आओ

भीड़ तो पीछे-पीछे आती है

पूरी औरत को करके अंगड़ाई

शायरी कैसा सितम ढाती है

आज इक और बात कह डाली

देखिए किसको समझ आती है

-संजय ग्रोवर
27-06-2018


शनिवार, 23 दिसंबर 2017

पत्थरों से न करो बोर किसी पागल को

 ग़ज़ल



ये शख़्स कितना पुराना है, बुहारो कोई
अभी भी चांद पे बैठा है, उतारो कोई

दिलो-दिमाग़ में उलझा है, उलझाता है
इसकी सच्चाई में सलवट है, सुधारो कोई

पत्थरों से न करो बोर किसी पागल को
सर में सर भी है अगर थोड़ा तो मारो कोई

ये तेरी ज़ुल्फ़ है, ख़म है कि है मशीन कोई
हो कोई रस्ता तो रस्ते में उतारो कोई

कभी निहारना लगता है घूरने जैसा
न कोई घूरे तो कहते हैं निहारो कोई




-संजय ग्रोवर
23-12-2017

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

फिर ख़रीदी तुमने मेरी ई-क़िताब

ग़ज़लें

1.

फिर ख़रीदी तुमने मेरी ई-क़िताब
मुझको ख़ुदसे रश्क़ आया फिर जनाब
06-09-2017

वाह और अफ़वाह में ढूंढे है राह
मुझको तो चेहरा तेरा लगता नक़ाब

जिसने रट रक्खे बुज़ंुर्गोंवाले ख़्वाब
उसकी समझो आसमानी हर क़िताब

ख़ाप ताज़ा शक़्ल में फिर आ गई
जो है लाया उससे क्या पूछें हिसाब

फिरसे ख़ास हाथों में ख़ासे फूल हैं
उसके नीचे आम, कांटों का अज़ाब 

कौन समझेगा मैं अकसर सोचता था
तुम हो मुमक़िन वक़्त पर मुमक़िन जवाब
07-09-2017


2.


उनकी टक्कर उन्हींसे हो गई
वही बच गए, वही गिर पड़े

भीड़ थी तेरे सर में गरमी
देख कहीं अब तेरे सिर पड़े

बहुत लगाई बहुत बुझाई
ख़ुदपे आई ख़ुद ही गिर पड़े
      
मेरे संग ज़माना सारा
आंख में आंसू यूंही तिर पड़े

मैं उनसे बचना चाहता था
इस ख़ातिर वो मेरे सिर पड़े
07-09-2017


-संजय ग्रोवर


बुधवार, 23 दिसंबर 2015

अब तो काई-सी जमी है बस

ग़ज़ल

वो महज़ इक आदमी है बस
और उसमें क्या कमी है बस

उम्रे-दरिया के तजुर्बों पर
अब तो काई-सी जमी है बस

आंसुओं का बह चुका दरिया
आंख में थोड़ी नमी है बस

हर बरस आता है इक तूफ़ां
जोश सारा मौसमी है बस

इन डरे लोगों के हिस्से में
इक मरी-सी ज़िंदगी है बस

-संजय ग्रोवर



गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

बादलों की तर्ज़ पे...

ग़ज़ल 

ज़िंदगी की जुस्तजू में ज़िंदगी बन जा
ढूंढ मत अब रोशनी, ख़ुद रोशनी बन जा

रोशनी में रोशनी का क्या सबब, ऐ दोस्त!
जब अंधेरी रात आए, चांदनी बन जा

गर तक़ल्लुफ़ झूठ हैं तो छोड़ दे इनको
मैंने ये थोड़ी कहा, बेहूदगी बन जा

हर तरफ़ चौराहों पे भटका हुआ इंसान-
उसको अपनी-सी लगे, तू वो गली बन जा

कुंओं में जीते हुए सदियां गई ऐ दोस्त
क़ैद से बाहर निकल, फिर आदमी बन जा

गर शराफ़त में नहीं पानी का कोई ढंग
बादलों की तर्ज़ पे आवारगी बन जा

-संजय ग्रोवर


गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

ग़ज़ल

अपने हक़ में अक्स बदल देने के आदी निकले रे
आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

जिनका मक़सद-ए-आज़ादी था औरों की ग़ुलामी
वही बारहा बनके मसीहा-ए-आज़ादी निकले रे

ज़ालिम ने मज़लूमों को हर तरह से यूं बेदख़ल किया
उनका हक़ भी ख़ुद लेने को बन फ़रियादी निकले रे

भरम को जिनने कहा हक़ीक़त, छोटेपन को ऊंचाई
वो रंगीन-मिज़ाज, ओढ़कर शक़्लें सादी, निकले रे

पहले क्या-क्या होता होगा, लोगों ने कुछ यूं जाना
जिनको आंदोलन समझा, सब कूदा-फ़ांदी निकले रे


-संजय ग्रोवर

04-12-2014

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

ख़ज़ाने हमको यां इतने मिलेंगे.....






ख़ज़ाने हमको यां इतने मिलेंगे
सुबह से शाम तक हंसते रहेंगे

नया कह-कहके देते हो पुराना
हम अपने-आप ही अब ढूंढ लेंगे

डराने से ख़ुशी मिलती है तुमको !
डराओ हमको, हम हंसने लगेंगे

बदलती जाएगी ये सारी दुनिया
और हम बस पैंतरे बदला करेंगे

वो ख़ुद ही सीढ़ियां हैं, ख़ुद ही मंज़िल
वो अपने सर की चोटी पर चढ़ेंगे


-संजय ग्रोवर

17/21-10-2013

 

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

आईने सब ख़राब कर डाले

ग़ज़ल

दफ़्न बेहूदे ख़्वाब कर डाले
कुछ पुराने हिसाब कर डाले

एक मंज़िल तो तुमने पाई मगर
कितने रस्ते ख़राब कर डाले !

उसकी तस्वीर ज़रा धुंधली सही
सारे आंसू शराब कर डाले

रोने वाले बुरे न थे, तुमने
हंसते-हंसते ख़राब कर डाले

झूठ में सच को हमने यूं पाया-
सारे रिश्ते नक़ाब कर डाले

हर तरफ़ हाथ मारकर तुमने
आईने सब ख़राब कर डाले

-संजय ग्रोवर

28-09-2013

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

एक आज़ाद ग़ज़ल



हुकूमत करना चाहो हो..तो हिम्मत क्यूं नहीं करते ?
सियासत तुमको करनी है तो सीधे क्यूं नहीं करते ?

अगर बदमाश है राजा, तो तुम ही कौन-से कम हो ?
कभी फ़रियाद करते हो, कभी छाती पे चढ़ते हो

ये कैसी हड़बड़ी के गड़बड़ी का इल्म होता है !
ठहर के कैसे सोचोगे ? बहुत जल्दी में लगते हो

कभी घुसते हो चिलमन में, कभी चढ़ते हो टोपी पर
जो समझाया है औरों को, कहो ख़ुद भी समझते हो !

बग़ावत लफ्ज़ सुनने में, बहुत अच्छा तो लगता है
फिर उसके बाद जो होता है उसको भी समझते हो ?

हमारा नाम आगे करके हमसे ही नहीं पूछा
कभी इसके अलावा और कुछ तुम कर भी सकते हो ?

किसी की जान जाती है, तुम्हारी शान की ख़ातिर
ज़रा भी ख़ुद नहीं बदले, न जाने क्या बदलते हो !

-संजय ग्रोवर

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

तुम्हारे हंसने पे आता है हंसना

ग़ज़ल


ज़ुबां तक बात गर आई नहीं है
कहूं क्या ! उसमें सच्चाई नहीं है


तुम्हारे हंसने पे आता है हंसना
ज़रा भी इसमें गहराई नहीं है


अदाकारी करे जो प्यार में भी
वो चालाकी है अंगड़ाई नहीं है


जो मेरी अक्ल को पत्थर बना दे
कि तुमने वो अदा पाई नहीं है


हैं मेरे पास सब नक्शों के नक्शे
तुम्हे आवाज़ तक आई नहीं है
तेरी आवारगी में भी गणित है
अक़ल ये हमको आज आई नहीं है


तू हिंदू हो या मुस्लिम, मैं ये जानूं
तुझे इंसानियत आई नहीं है


शुकर है कुछ तजुरबे काम आए
वगरना कौन हरजाई नहीं है


-संजय ग्रोवर

सोमवार, 30 अगस्त 2010

झूठ पहनकर...

ग़ज़लें


1.

झूठ पहनकर कितने अच्छे लगते हो
कपड़ों के अंदर से नंगे दिखते हो

गलियाना बाज़ार को भी अब पेशा है
बाद में गलियाते हो, पहले बिकते हो

झूठ, ढिठाई, तानाशाही, गाली, गुंडे-
इतनी बैसाखीं, पर बहस से डरते हो !

लगता है फिर आज किसी ने धोया है
टंगे-टंगे से, निचुड़े-निचुड़े लगते हो

अपने-आप से हार चुके हो, इसी लिए
बेध्यानी में ध्यान की बातें करते हो

झूठी जीत से झूठी ख़ुशियां पाते हो
औरों को कम, ख़ुदको ज़्यादा ठगते हो

अभी तुम्हारा कर्ज़ लदा है  सीने पर
अदा करुंगा, बचकर कहाँ निकलते हो

2.

तलघर में आयोजित सूरज
फिर निकला प्रायोजित सूरज

किरनें-विरनें गयी कहाँ पर !
हुआ कहाँ विनियोजित सूरज ?

ख़ुदकी गर्मी से जलता है
कैसे हो अनुशासित सूरज

चाँद-वाँद सब जल जाएंगे
हुआ अगर अनियंत्रित सूरज

आसमान के पाँव पकड़ कर
हो जाता अनुमोदित सूरज

पीछे साजिश का अंधियारा
आगे पूर्व-नियोजित सूरज


-संजय ग्रोवर

शनिवार, 3 जुलाई 2010

बात फैलानी ही हो तो.....

ग़ज़ल


चार दिन तो आप मेरे दिल में भी रह लीजिए
पाँचवें दिन फ़िर मेरे घर में बसेरा कीजिए




राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए




आपका-मेरा तआल्लुक अब समझ आया मुझे
कीजिए सब आप और इल्ज़ाम मुझको दीजिए




दोस्त बनके जब तुम्हारे पास ही वो आ गया
खुदको अपने आपसे अब तो अलग कर लीजिए




मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
जिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए

-संजय ग्रोवर

(‘समकालीन साहित्य’ में प्रकाशित)

बुधवार, 16 जून 2010

वाह रे वाह

ग़ज़ल

आन को दें ईमान पे तरजीह, वाह रे वाह
वहशी को इंसान पे तरजीह, वाह रे वाह


मात्रा मोड़ के, कायदे तोड़ के, बोले गुरजी
दीजो बहर को ज्ञान पे तरजीह, वाह रे वाह


ख़ुद तो ‘सुबहू’, ‘ईमां’, ‘सामां’ लिखके खिसके-
‘नादां’ को ’नादान’ पे तरजीह, वाह रे वाह


चार छूट जब तुमने ली, दो हम क्यंू ना लें !?
गुज़रे को उन्वान पे तरजीह, वाह रे वाह


संस्कृत बोलो, फ़ारसी बोलो, ख़ुश भी हो लो
मुश्किल को आसान पे तरजीह, वाह रे वाह


अढ़सठ तमग़े, साठ डिग्रियां, बातें थुलथुल
मैल को जैसे कान पे तरजीह, वाह रे वाह


अकादमिक बाड़े में अदब के साथ कबाड़े-
रट्टू को गुनवान पे तरजीह, वाह रे वाह


दुधमुही मूरत, मीठा साग़र, अफ़ीमी सीरत-
सूरत को विज्ञान पे तरजीह, वाह रे वाह


सूरत-मूरत, छबियां-डिबियां, मिलना-जुलना
ज़ाहिर को ईमान पे तरजीह, वाह रे वाह


गुरजी नुक्ते के क़ायल और मैं गुरजी का
सो नुक्ताचीं तान के तरजीह, वाह रे वाह

-संजय ग्रोवर

(गुरजी=गुरुजी=उस्ताद)

शुक्रवार, 11 जून 2010

....तो आएगी किस दिन क़यामत पता हो


ग़ज़ल




क्यूं करते हैं मेहनत ये नीयत पता हो
बीमारों की असली तबीयत पता हो


तुम्हे गर मेरे सच की जुर्रत पता हो
तो आएगी किस दिन क़यामत पता हो


पिता सर पे, पलकों पे माँ को रखेंगे
बशत्र्ते कि उनकी वसीयत पता हो


क्या तोड़ोगे आईना, कुचलोगे चेहरा?
करोगे भी क्या गर हक़ीकत पता हो


वो इज़हारे-उल्फ़त संभलकर करें, गर
जो है होने वाली वो ज़िल्लत पता हो



-संजय ग्रोवर



(‘द सण्डे पोस्ट, सहित्य वार्षिकी में प्रकाशित)

शनिवार, 22 मई 2010

मोहरा, अफवाहें फैला कर....

ग़ज़लें

1.
मोहरा, अफवाहें फैला कर
बात करे क्या आँख मिला कर

औरत को माँ-बहिन कहेगा
लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर

पर्वत को राई कर देगा
अपने तिल का ताड़ बना कर

वक्त है उसका, यारी कर ले
यार मेरे कुछ तो समझा कर

ख़ुदको ही कुछ समझ न आया
जब बाहर निकला समझा कर

(http://www.anubhuti-hindi.org/ में प्रकाशित)

2.

मेरी हंसी उड़ाओ बाबा
अपना दुःख बिसराओ बाबा

पहले मुझको समझ तो लो तुम
फिर समझाने आओ बाबा

मैं इक ज़िन्दा ताजमहल हूँ
आँखों में दिल लाओ बाबा

सच माफ़िक ना आता हो तो
अफ़वाहें फैलाओ बाबा

आग दूर तक फ़ैलानी है
दिल को और जलाओ बाबा

उपर वाला थक कर सोया
ज़ोर से मत चिल्लाओ बाबा

फिर आया ग़ज़लों का मौसम
फिर दिल की कह जाओ बाबा


(दैनिक ‘आज’ में प्रकाशित)


-संजय ग्रोवर

सोमवार, 29 मार्च 2010

दोबारा में : 8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

Saturday, March 7, 2009
8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

व्यंग्य

**मर्दों वाली बात**

वातावरण मर्दांनगी से भरपूर था। इतना कि भरी हुई टोकरी से मरी हुई मछलियो की तरह मर्दानगी फिसल-फिसल जाती थी। मर्दानगी के कई रूप थे। कही घनी मूंछों में थी, तो कहीं बांहों की फड़कती पेशियों में। चढ़ी हुई आंखों में थी, तो मस्तानी चाल में थी। बच्चों को गरियाते हुए थी और मां-बहनों को सुरक्षियाते हुए थी। अखबारी कागज़ पर कूद-फांद भी मचा रही थी और धर्म के दंगल में कुश्ती भी लड़ रही थी।
एक खास किस्म के चिंतन की कृपा से एक खास किस्म की पूर्व-निर्धारित शैली में जीने वाले सभी जन मर्द थे। हालांकि वे गैस का सिलिंडर लाने से लेकर बिजली का बिल जमा कराने तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘एडजस्ट‘ कर लेते थे, मगर फिर भी मर्द बने रहते थे, क्योंकि औरतों के साथ ‘एडजस्ट‘ नहीं कर पाते थे। वे सब इसलिए भी मर्द थे कि वे माइकल जैक्सन नहीं थे। हालांकि उनमें से कई कवि, लेखक और कलाकार थे, जो लंबे बाल भी रखते थे और पान से होंठ लाल भी किए रहते थे। मंच पर सांस्कृतिक हरकतें मचाने में वे माइकल से उन्नीस भी नहीं पड़ते थे, पर वे सुमित्रानंदन पंत भी नहीं थे कि अपनी सुकुमारता को मर्दानगी से स्वीकार पाते। हाय कि मर्द होते हुए भी वे सब कितने लाचार थे।
उनमे से कुछ लोग लंबे बाल रखने की बजाय दाढ़ी बढ़ाए रखते थे, तो कुछ, कुछ और प्रतीकें। ये सब उनके पूर्वजो की पुस्तकों में मर्दानगी के चिन्ह घोषित किए गए थे और मर्दानगी सिर्फ प्रतीकों में ही बची रह गई लगती थी। अपने पूर्वजों की पुस्तकों और उनमें तय किए जा चुके मर्दानगी के मानदंडों में लिथड़े हुए वे आंखें बंद किए पड़े रहते थे। यह उनकी मर्दानगी का एक और प्रकार था। अपनी टोटल मर्दानगी के बावजूद वे मर्दानगी के सभी प्रतीकों का खुलकर प्रदर्शन न कर पाने की अपनी सांस्कृतिक मजबूरी पर मन मसोस कर रह जाते थे।
लगभग सभी मर्द लोग बदलाव के हामी थे, मगर धीरे-धीरे। वे कमीज-धोती से शर्ट-पतलून तक तब आते थे, जब दूसरे (कम मर्द या नामर्द) लोग छींटदार कपड़ों पर पहुंच जाते थे। इस तरह वे एक बदलाव लाते हुए भी, बड़े धैयपूर्वक, एकाध सीढ़ी का ‘गैप‘ बनाए रखते थे। वे चाहते थे कि देश-समाज-सभ्यता-संस्कृति को धक्का एकदम से न लगे बल्कि धीरे-धीरे लगे। हालांकि यह युक्ति किसी असाध्य रोग को झेल रहे वृद्ध रोगी को दयामृत्यृस्वरूप ‘स्लो प्वाइज़न‘ देने जैसे थी, मगर उनकी मर्दानगी के अनुकूल पड़ती थी।
एक दिन उन सबने उन पुरस्कारों पर हाय-तौबा मचा दी, जो उन्हें नहीं दिए गए थे। हालांकि माइकल जैक्सन कोई इधर का उद्योगपति नहीं था। फिर भी उसे न जाने क्या सूझी कि उसने इधर के मर्दों के लिए कुछ लंबे-मोटे पुरस्कारों की घोषणा कर दी।
इसके बाद क्या हुआ? क्या उन्होंने माइकल जैक्सन की भावनाओं का आदर करते हुए पुरस्कार ग्रहण कर लेने की सहृदयता व सहिष्णुता दिखाई? या पुरस्कार लौटा देने का क्रांतिकारी कदम उठाया? पाठक-श्रोता-दर्शक-आलोचक अपने-अपने अंदाजें मारते हुए अपने-अपने नतीजों पर पहुंच गए थे।
इधर मेरे लिए वक्त आ गया था कि हर लेख के अंत की तरह एक बार फिर डरूं। अतः जैसा कि नहीं होना चाहिए, पर अक्सर होता है, मैंने घोषणा की कि यह सब तो एक सपना था।

यह हुई ना मर्दों (ना+मर्दों?) वाली बात।




-संजय ग्रोवर

(जनवरी, 1997 को हंस में प्रकाशित)

+
‘अनुभूति’ पर कविताएं ‘स्त्री थी कि हंस रही थी’ और ‘हमारी किताबों में हमारी औरतें’

‘संवादघर’ पर कार्टून ‘‘कार्टूनखाना में स्कर्टस्’’

‘अमर उजाला’ में ग़ज़ल

‘संवादघर’ में कविता ‘मर्दानगी’

प्रस्तुतकर्ता sanjaygrover पर 2:32 PM
(लेबल: कविता, कार्टून, व्यंग्य, स्त्री-विमर्श के आस-पास, ग़ज़ल)

प्रतिक्रियाएँ:

3 टिप्पणियाँ:

प्रेम सागर सिंह said...
ग्रोवरजी,
शानदार आलेख है, आभर।
March 8, 2009 8:30 PM

amarpathik said...
Sanjay bhai apka lekh sachmuch krantikaari hai....
March 26, 2010 2:51 PM

mukti said...
हा हा हा हा !!! ये इतना अच्छा व्यंग्य कैसे मुझसे छूट गया. अच्छा हुआ फ़ेसबुक पर आपने लिंक दिया.
March 26, 2010 6:15 PM

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

कुछ खुरदुरी-सी दो ग़ज़लें/लगभग बुरी-सी दो ग़ज़लें


ग़ज़ल


जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं है
उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है


यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना
इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है


दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना
जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नहीं है


वो जो सामने न आए, तू उसी से बचके रहना
वो ज़रुर काट लेगा कि जो भौंकता नहीं है


चालू से मिला चालू, साजिश को कैसे टालूं
यंूकि तुम भी बैठे गाफ़िल, वो कि पूछता नहीं है


उसे सर्द-गर्म कैसा, वो तो खा रहा है पैसा
उसे क्यूं पसीने छूटें, वो जो कांपता नहीं है


इसी रास्ते से मैं क्यों कोई रास्ता निकालूं !
मेरे वास्ते जगत में, क्या रास्ता नहीं है !?


2.


दिखा जो उनको कीचड़,
लिथड़ गए सब लीचड़


ठग-वग की जगमग से,
चमक रहा है प्रांगण


पढ़े-लिखे नंगों से
सहम गए हैं अनपढ़


फ्यूज़-उड़े-कट-आउट
कड़क रहे हैं कड़-कड़


ये रुटीन-रोज़ाना-
तुम कहते हो गड़बड़ !?


कथित 'उच्चता' गुड़-गुड़,
’योग्य’ मक्खियां भड़-भड़


रटो रदीफ़ो रट-रट,
सड़ो काफ़ियो सड़-सड़



-संजय ग्रोवर

सोमवार, 14 सितंबर 2009

ग़ज़ल जो अब तक छपी नहीं, पढ़ो कहीं तो पढ़ो यहीं

ग़ज़ल

हिन्दुस्तान में हिन्दी जैसी उसकी हालत अपने घर में
जैसे शीशा देख रहा हो अपनी सूरत इक पत्थर में


अपने-अपने समय को देखो अपनी-अपनी घड़ी चलाओ
यारो धोखा खा जाओगे देखोगे गर घंटाघर में



अपने पुरखे नहीं रहे अब ऐसा कहना ठीक न होगा
हमने अकसर देखा उनको घुड़की देते उस बंदर में




देश का सौदा करने वाले सारे लोग नहीं इक जैसे
बेच रहे कुछ इसे थोक में बेच रहे हैं कुछ फुटकर में



मंज़िल भी थी आँख के आगे और इरादे भी थे पक्के
फिर भी भटक गया मन यारों रस्ते इतने मिले सफर में





-संजय ग्रोवर

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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