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बुधवार, 8 अगस्त 2018

जाने कैसा ख़ालीपन है ख़ानदानों में

ग़ज़ल

भागते फिरते हैं वो सुंदर मकानों में
ठग कहीं टिकते नहीं अपने बयानों में

शादियों में नोंचते हैं फूल अलबत्ता
प्यार की भी कुछ तड़प होगी सयानों में

नम्र लहज़ों के लिफ़ाफ़ों में जदीदे-मुल्क़
पकड़े जाते हैं हमेशा कन्यादानों में

भीड़ में इनका गुज़र है, भीड़ में आनंद
जाने कैसा ख़ालीपन है ख़ानदानों में

जाने क्या सिखलाया ख़ुदने व्याख्यानों में
आजकल डरते हैं ख़ुदके संस्थानों में

हमको भी सच्चा कहो, हमको भी ईमांदार
यह हवस देखी गई है बेईमानों में

मैं किसीको हुक्म देता हूं, न लेता हूं
इसलिए पाया न जाता हुक्मरानों में



-संजय ग्रोवर
08-08-2018

अलबत्ता = इसके बावजूद, हालांकि, फिर भी,  however, nevertheless, । जदीदे-मुल्क़ = देश का (तथाकथित) प्रगतिशील, (so-called) progressive people of nation । कन्यादान = एक शर्मनाक़ रस्म जिसमें कन्या को वस्तु की तरह दान किया जाता है,  an embarrassing ceremony/ritual in which the girl is donated like an object । हुक्मरान = शासक, तानाशाह, rulers, dictators

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

पुरस्कार प्रकरण: खोखले सवाल पोपले जवाब

पुरस्कार क्यों लिए-दिए जाते हैं, इसपर किसीने भी सवाल नहीं उठाया, कोई उठाएगा इसकी उम्मीद भी न के बराबर ही है।

इस देश में लेखकों की रचनाएं, संपादक और प्रकाशक, चाहे वे वामपंथीं हों या संघी, किस आधार पर छापते हैं, इसपर भी सवाल कम ही उठते हैं, कम ही उठेंगे।

एक बहस में देखा कि यह सवाल उठानेवाले लोग तो थे कि चौरासी के दंगों पर किसीने क्यों पुरस्कार नहीं लौटाया (और यह बिलकुल जायज़ सवाल है) मगर दलित वर्ग जिनके ऊपर आए दिन अत्याचार होता है, का कोई प्रतिनिधि वहां दिखाई नहीं दिया। बुलाया ही नहीं गया होगा।

यह सवाल भी नहीं उठा कि एक सरकार से लिए गए पुरस्कार दूसरी सरकार को कैसे लौटाए जा सकते हैं !?
क्या आप मानते हैं सभी सरकारें एक जैसी होतीं हैं ? एक ही होती हैं ? फ़िर तो सभी सरकारों को एक ही माना जाए, और तब तो स्पष्ट है कि पुरस्कार किसी भी सरकार से नहीं लेने चाहिए। तब तो पूरे देश में इन्हें सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए कि हम सरकार से पुरस्कार नहीं लेंगे।


वैसे तो साहित्यकार को किसीसे भी पुरस्कार क्यों लेने चाहिए ? क्या कोई इनके घर अपील करने गया था कि आप ज़रुर लेखक बनना, वरना हम जी नहीं पाएंगे, आत्महत्या कर लेंगे !? बहुत सारे लोग हैं भारत में जो दिन-भर काम करते हैं, मज़दूरी करते हैं, मैला ढोते हैं, क्लर्क हैं, सब्ज़ी बेचते हैं, खेती करते हैं...... कोई भी तो पुरस्कार नहीं मांगता, फ़िर साहित्यकार ऐसा क्या किए दे रहे हैं !? विदशी लेखकों को कोट कर-करके अख़बारों से हज़ारों के चेक ले लेते हैं, मेरी समझ में तो अगर स्वाभिमान और ईमान है तो वो पैसा भी वापिस करना चाहिए जो दूसरों के लेखन को अपना बना या बताकर ऐंठा गया है। और आप जो नौकरियां और व्यवसाय करते हैं वो आपको पूरा नहीं पढ़ता क्या ? आपको क़लम-पैन-निक्कर-कमीज़ सब सरकार से क्यों चाहिए !?


ये सवाल कोई नहीं उठाएगा। ज़ाहिर है कि पुरस्कार और मुफ़्त में मिलनेवाली सभी सुविधाओं का लालच सभी दलों के लिक्खाड़ों का बिलकुल एक जैसा है। ज़ाहिर है कि इन्हें आगे भी पुरस्कार और बाक़ी सभी सुविधाएं लेनी हैं और ये उसी अंदाज़ में बात भी कर रहे हैं। इनमें से कुछ लोग धर्म पर कुछ बोलने वालों पर लाठी लेकर दौड़ पड़ते हैं तो कुछ धर्मनिरपेक्षता पर कुछ बोलने पर। दोनों (या तीनों या चारों.....) की अपने नेताओं, महापुरुषों, आयकनों आदि को लेकर भक्ति का स्तर बिलकुल एक जैसा है। यहां सोचने की बात है कि धर्म की तो सभी चालाक़ियों से हम परिचित हैं (और नास्तिक ग्रुप में हमने इसके खि़लाफ़ नये से नये तर्क दिए हैं) मगर धर्मनिपेक्षता पर पर्याप्त बातचीत हमने क़तई नहीं की है। अगर मार्क्स ने कहा कि धर्म अफ़ीम का नशा है तो क्या किसी एक धर्म के लिए कहा होगा !? नशे का अर्थ बेहोशी और बुराई के अलावा और क्या हो सकता है ? अगर सभी धर्म बुरे हैं, हास्यास्पद हैं तो धर्मनिरपेक्षता की क्या ज़रुरत हुई !? फिर तो एक बुराईनिरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक गुंडानिरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक अंधविश्वासनिरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक कट्टरपंथनिरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक कालाजादूनिरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक कचरानिरपेक्षता भी होनी चाहिए....

सही बात यह है कि जिस तरह साकार भगवान से आगे की चालाक़ी निराकार भगवान है उसी तरह धर्म से आगे की चालाक़ी धर्मनिरपेक्षता है। 

इस नज़रिए से सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि जो लोग आर एस एस को कट्टरपंथी (जोकि आर एस एस सौ प्रतिशत है) कहकर प्रगतिशील बनना चाहते हैं, क्या ख़ुद वे वाक़ई प्रगतिशील हैं ?
ये बहसें किसी शादी में जमा हुए रिश्तेदारों की अंत्याक्षरी जैसी क्यों लग रहीं हैं !?

इन सारी बहसों में एक ही पक्ष को बुलाया जा रहा है जो कि पुरस्कार का समर्थक है। दूसरा पक्ष जो पुरस्कार का विरोधी हो सकता है, उसका तो दूर-दूर तक नामोनिशान तक नहीं है। 

19-10-2015

2.
सवाल यह है कि हमारे तथाकथित प्रगतिशीलों को प्रगतिशीलता के नाम पर बार-बार आर एस एस का संदर्भ क्यों लाना पड़ता है!? जहां तक मुझे याद आता है, जब तक मैं विवाह और इसी तरह के अन्य समारोहों में जाता था, लोग अपनी मर्ज़ी से सारे रीति-रिवाज़ किया करते थे। मैंने तो कभी नहीं देखा कि कोई आर एस एस या कोई राजनेता किसी पर दहेज लेने के लिए दबाव डाल रहा हो। क्या अंगूठा काटनेवाले द्रोणाचार्य को नायक की तरह हमारी पढ़ाई की क़िताबों में आर एस एस ने घुसाया ? उस वक़्त तो कांग्रेस और वामपंथ के ही हाथों में सब कुछ था। उन्हें क्यों नहीं हैरानी या आपत्ति हुई जब कबीरदास की जीवनी में लाश पर से कपड़ा हटाने पर फूल निकल आए ? 

उस वक़्त मैं वामपंथ और वामपंथी बुद्धिजीवियों से प्रभावित हुआ करता था जब बाबा रामदेव मशहूर हुए। कम्युनिस्ट नेत्री वृंदा करात ने रामदेव के खि़लाफ़ कोई मामला उठाया। जब सभी न्यूज़-चैनलों पर बहस गर्म थी और रामदेव कह रहे थे कि इनका क्या है, ये तो हैं ही नास्तिक...तो मैं सोच रहा था कि अब कम्युनिस्ट दमदार तार्किक जवाब देंगे, अच्छा मौक़ा है सारे राष्ट्र को अपने बारे में बताने का...। मगर मुझे यह देखकर भारी निराशा हुई कि वे टीवी स्क्रीन से ऐसी ग़ायब हुईं कि महीनों तक नज़र नहीं आईं। अब तो ख़ैर मेरा चीज़ों को समझने 
का ढंग काफ़ी बदल गया है मगर उस वक़्त दुखी होना स्वाभाविक था।

वामपंथियों ने नास्तिकता के संदर्भ में कोई ढंग की कोशिश की हो, मुझे तो नहीं लगता। पं. बंगाल में 20-30 साल ज्योति बसु मुख्यमंत्री रहे, उस दौरान वहां धर्म और अंधविश्वास को लेकर समाज/लोगों की सोच में कितना परिवर्तन आया, पता लगाना चाहिए। 


एक वक़्त तक बहुत-सारे न्यूज़- चैनलों पर वामपंथ का प्रभाव बताया जाता रहा मगर कहीं भी नास्तिकता का नाम तक सुनने में नहीं आता था तो यह किसकी ग़लती रही ? यह किस तरह की प्रगतिशीलता रही ?


प्रगतिशीलता का इनका दायरा तो इसीसे समझा जा सकता है कि पीके नाम की मनोरंजक फ़िल्म को भारत के तथाकथित प्रगतिशीलों ने एक महान क्रांतिकारी फ़िल्म की तरह पेश किया जबकि प्रगतिशीलता, बदलाव और अंधविश्वास कम करने के संदर्भ में फ़िल्म का अंत क़तई शर्मनाक़ था।


अब आप लोग ख़ुद सोचें कि ये लोग प्रगतिशीलता के नाम पर एक भ्रम को ही चलाए रखना चाहते हैं या असली प्रगतिशीलता से डरते हैं ? समस्या क्या है ? क्या आर एस एस की आड़ लेने और लेते रहने से समस्याएं हल हो जाएंगी ?


प्रगतिशीलता को लेकर इनकी नीयत क्या इसीसे नहीं समझी जा सकती कि इनके पसंदीदा केजरीवाल मंच पर चढ़ते ही भगवान-भगवान, चमत्कार-चमत्कार करना शुरु कर देते हैं। ऐसे में आर एस एस से तुलना कर-करके आप कब तक अपनी तसल्ली करते रहोगे ? 


अभी-अभी पढ़ा कि श्री ग़ुलज़ार ने कहा है कि लेखक क्यों राजनीति करेंगे, लेखक तो समाज के ज़मीर को संभालते हैं।


क्या आपको लगता है कि ग़ुलज़ार की इस बात में किसी तरह का तर्क भी है !? क्या ग़ुलज़ार यह मानते हैं कि सभी लेखक बिलकुल एक जैसे होते हैं !? फ़िर तो सभी लेखकों को ग़ुलज़ार की तरह फ़िल्मों में ही लिखना चाहिए, उतना ही पैसा कमाना चाहिए। तर्क और आकाशवाणी में आखि़र कुछ तो फ़र्क होना चाहिए ? क्या ग़ुलज़ार साहब ने लेखकों के वे संस्मरण नहीं पढ़े हैं जिनमें वे ख़ुद ही एक-दूसरे की टांग-खिंचाई, धकेला-धकेली के बारे में लिखते रहते हैं। अगर सभी लेखक एक जैसे महान होते हैं तो उदयप्रकाश ने ‘पीली छतरीवाली लड़की’ और ‘मोहनदास’ में किन ब्राहमणवादी महानुभावों का वर्णन/ज़िक्र किया है ?


अगर सभी लेखक एक ही जैसे हैं तो संघी लेखकों और वामपंथी लेखकों का झगड़ा क्या है !?

(अगर कोई कहता कि मौक़ापरस्ती और मुफ़्त की सुविधाओं/पुरस्कारों के, मशहूरी की हवस के मामले में लेखक एक जैसे ‘महान’ हैं तो ज़रुर विचार किया जा सकता था।)

24-10-2015

3.
लेखक भी लालची होते हैं, कट्टरपंथी होते हैं, बेईमान होते हैं, राजनीति करते हैं...... ठीक वैसे ही जैसे व्यापारी होते हैं, राजनेता होते हैं या अन्य कोई भी इंसान होता है।

बिना किसी तार्किक आधार के आप लेखकों को मसीहा, देवता, महान बनाएंगे और फ़िर यह भी जताएंगे कि लेखकों को सरस्वतीपुत्र बतानेवाले ब्राहमणवाद, कट्टरपंथ और आर एस एस से आप अलग हैं!? क्या बात है !?  

तथ्य और तर्क के बिना लेखकों, कलाकारों, गायकों, संगीतकारों को पवित्र और महामानव बनाने की कोशिशें, बाबाओं के भगवान बनकर मौज करने या फ़िल्मस्टारों की एक गढ़ी गई इमेज के ज़रिए ऐश करने की मानसिकता से किस तरह अलग हैं ? लेखकों को ख़ामख़्वाह सबके सर पर बिठाने के प्रयत्न जातिवादी और श्रेष्ठतावादी मानसिकता का ही एक नमूना है, और कुछ भी नहीं है।

और बाबाओं पर निशाना साधने में भी पूरी चालाक़ी बरती जाती है। कुछ ख़ास वर्गों से संबंधित बाबाओं पर वह ब्राहमणवाद आधुनिकता/प्रगतिशीलता का चोला पहनकर हमले करता है जिसके द्वारा रचित तथाकथित अध्यात्म से ही बाबावाद का जन्म हुआ। जिनके लोग चाहे आर एस एस में हों चाहें वामपंथ में, हर वक़्त चालू धर्मों और वर्णों को बचाने में सारी जान लगाए रहते हैं। वरना एक वह भी फ़ोटो जगह-जगह देखा गया जिसमें सफ़ेदवस्त्रधारी साईंबाबा की मृतदेह शीशे के चमकते बक्से में रखी थी और श्रीमती सोनिया गांधी, सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर जैसे ‘प्रगतिशील‘ और ‘एडुकेटेड’ लोग वहां श्रद्धारत बैठे थे। ये वे साईंबाबा थे जो लोगों को आर्शीवाद स्वरुप सफ़ेद पाउडर और सफ़ेद गोले अपनी बाहों और मुंह से निकाल-निकालकर बांटते थे। इन्होंने अपने मुंह से कभी एक शब्द नहीं बोला था। क्या सफ़ेद कपड़ों और ‘एडुकेटेड’ भक्तों की वजह से इन्हें प्रगतिशील माना जाए ? क्या बाबाओं और उनकी कट्टरताओं और अंधविश्वासों में फ़र्क़ उनके कपड़ों के रंग या भक्तों की इलीटनेस में फ़र्क़ के आधार पर किया जाएगा ? क्या दाढ़ी और बालों से आदमी के चरित्र का पता लगाया जा सकता है ? क्या इस समाज में क्लीनशेवन बाबा और बाबियां घर-घर और चैनल-चैनल नहीं बैठे हुए हैं ? ये सबके सब अपना अब तक का सारा किया-धरा छुपाकर सारा दोष एक-दो लोगों पर मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जैसे एकाध आदमी ने इस देश में चला आ रहा सारा पाखंड पैदा किया हो!? करवाचौथ भी उसी ने बनाया हो और एकलव्य का अंगूठा भी उसीने काटा हो। यह सिवाय मौक़ापरस्ती, ग़ैरज़िम्मेदारी और अपना दोष दूसरे के सर मढ़ने के अलावा कुछ भी नहीं है। क्या कांग्रेसी, वामपंथी, समाजवादी इस देश में दहेज नहीं लेते-देते, शादियों व अन्य कर्मकांडों में फ़िज़ूलख़र्ची और वक़्त की बरबादी नहीं करते ? फ़ेसबुक की ही तसवीरें ठीक से देख ली जाएं तो सब समझ में आने लगेगा।  

आपकी लार पुरस्कार पर टपकेगी तो आप कहेंगे कि मुझे ‘क्रश’ आ गया है, दूसरे को ‘क्रश‘ आ जाए तो आप कहेंगे कि लार टपक रही है अगले की !? क्या भाषा और मुद्रा ( पोज़, जेस्चर ) की चालाक़ियों से प्रगतिशीलता और कट्टरता के फ़र्क़ तय किए जाएंगे !?

इस देश के तथाकथित प्रगतिशीलों की बातें सुनकर हंसी आती है ? कोई पुरस्कारों की हंसी उड़ाए तो पहले तो वे उस आदमी को इस या उस वाद से जोड़ने लगते हैं। उसके बाद उनके मुंह से तर्क के रुप में कुछ फूटता भी है तो इस तरह की शर्मनाक़ बातें कि अगला/अगली पुरस्कार का विरोध इसलिए कर रहा होगा/होगी कि इसको ख़ुदको कभी पुरस्कार नहीं मिला होगा ! तो ये रहे हमारे प्रगतिशील लोग! पुरस्कार के विरोधियों को फ्रस्ट्रेटेड और सनकी वग़ैरह बताने में ये एक मिनट भी तो नहीं लगाते! इनसे पूछिए कि एक आदमी एक मिट्टी की मूर्ति को नहलाता-धुलाता है, पूजा करता है, आप कहते हैं कि कट्टरपंथी है। ठीक कहते हैं। मगर आप अपने ड्राइंगरुम में पड़ी ट्रॉफ़ियों को रोज़ आंखों से नहलाते-धुलाते हैं तो आप क्या कर रहे होते हैं !? अगर आपके लिखने से समाज में कोई बदलाव आया है, समाज को कोई फ़ायदा हुआ है तो वह आपको अपने अनुभव से पता होना चाहिए, कि पुरस्कार उसके बारे में बताएगा !? अगर आपके लेखन से कुछ नहीं हुआ तो चाहे जितने पुरस्कार जमा करते रहिए, इनसे आपकी आत्ममुग्धता के अलावा और किसी भी चीज़ का पता नहीं चलेगा। इससे तो यही पता चलेगा कि आपमें इतना भी आत्मविश्वास नहीं कि ख़ुद अपने किए-धरे का सही-सही आकलन कर सकें। 

क्या गंगा-जमुना, गंगा-जमुना रटते रहना ही प्रगतिशीलता है !? चलो पिछले एक-डेढ़ साल में बड़ा फ़ासीवाद आ गया है, मगर उससे पहले कितने शेर आपने ब्राहमणवाद पर लिखे और कितने दलित-दमन पर लिखे ? क्या शायरी की सारी उपलब्ध क़िताबों में से 250 शेर दलित-दमन पर और 500 शेर ब्राहमणवाद पर आप ढूंढकर दे सकते हैं ? 


इतना भयानक फ़ासीवाद आ गया है तो विरोधी लेखकों की इतनी बड़ी-बड़ी रंगीन तसवीरें और पुराने मुशायरों की रिकॉर्डिंग कैसे हर चैनल पर दिखाई जा रहीं हैं ?

यह तो बड़ा मज़ेदार फ़ासीवाद है।

-संजय ग्रोवर

25-10-2015

(जारी)  



सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

वो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थे

ग़ज़ल

बिलकुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थे
वो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थे

तहज़ीब की तराज़ू भी तुमने ही गढ़ी थी
ईमान जिसपे अपना तुम्ही तोल रहे थे

अमृत तो फ़क़त नाम था, इक इश्तिहार था
अंदर तो सभी मिलके ज़हर घोल रहे थे

वो तितलियां भी तेज़ थीं, भंवरे भी गुरु थे
मिल-जुलके, ज़र्द फूल पे जो डोल रहे थे

-संजय ग्रोवर
12-10-2015



गुरुवार, 25 जून 2015

शातिर है तू ख़ातिर तिरी होगी जगह-जगह

ग़ज़ल

ग़ायब का तू वक़ील है तो मुझको माफ़ कर
साज़िश तेरी दलील है तो मुझको माफ़ कर
24-06-2015

चेहरे पे तेरे होगी कबूतर-सी इक अदा
आंखों में तेरी चील है तो मुझको माफ़ कर

औरों की तरह गिरने को मैं भी कहूं उठना!
ऐसी तेरी अपील है तो मुझको माफ़ कर

बदनामी से बचने को बेईमान बन गया!
अब डर से ख़ुद ज़लील है तो मुझको माफ़ कर

माना पतंग तेरी बहुत ऊंची उड़ गई
उसमें लगी कंदील है तो मुझको माफ़ कर

शातिर है तू ख़ातिर तिरी होगी जगह-जगह
लोगों की दी ये ढील है तो मुझको माफ़ कर

लोगों ने तुझपे चोट की, तू मुझमें धंस गया!
ऐसी अगर तू कील है तो मुझको माफ़ कर



-संजय ग्रोवर
25-06-2015

ग़ायब=छुपा हुआ, निराकार, अप्रकट,invisible
दलील=तर्क, कारण, युक्ति,
साज़िश=षड्यंत्र, बदनीयत, कमज़ोर, दोमुंहे और घुन्ने लोगों द्वारा किसीकी ग़ैरजानकारी में उसे गिराने, मारने या बदनाम करने का सामूहिक प्रयत्न, 
ज़लील=अपमानित, 
शातिर=धूर्त्त, काईयां,cunning

बुधवार, 3 जून 2015

ब्लैकमेल और हम

छोटे थे तो फ़िल्मों से पता चलता था कि ब्लैकमेल नाम की भी एक क्रिया होती है और बहुत ही घिनौने लोग इसे
अंजाम देते हैं। बड़े होते-होते, समझ आते-आते समझ में आया कि इस महानता में तो जगह-जगह, तरह-तरह से लोग हाथ बंटा रहे हैं। ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ के मुहावरे से तो आज बहुत-से लोग परिचित हैं। सही बात तो यह है कि ब्लैक-मेलिंग सिर्फ़ ब्लैक-मेल करनेवाले व्यक्ति या समाज के बारे में ही नहीं बताती, होनेवाले के बारे में भी बताती है।

मुझे जहां तक समझ में आता है, पाखंडी समाजों में और पाखंडी व्यक्तियों के साथ ब्लैक-मेल की संभावनाएं दूसरों की तुलना में अधिक होतीं हैं। एक व्यक्ति अगर दूसरों से कहता है कि मर्यादा वाले पुरुष बनो, मगर ख़ुद वह मर्यादा तोड़ने से मिलनेवाले सभी आनंद लेना चाहता है तो ज़ाहिर है कि ऐसा करते जब वह पकड़ा जाएगा तो डरेगा ही कि सबको पता चल गया तो क्या होगा ?

ऐसे समाजों की स्त्रियां भी ऐसे ही पुरुषों को पसंद करेंगीं जो उनके और अपने ‘परिवारों की प्रतिष्ठाओं’ को बचाते-छुपाते हुए संबंधों को ‘गरिमापूर्वक’ निभाए। और पुरुष भी यही चाहेंगे। प्रतिष्ठा (!) और गरिमा(!) अगर झूठ से पैदा होतीं हों तो आदमी सच का गला काटने में एक मिनट नहीं लगाता। पाखंडी समाज का बहुमत पाखंडी के पक्ष में जाएगा ही। पाखंडी समाज में यह बहुत आसानी से संभव है कि रात को आप नास्तिकता पर कविताएं सुनाएं और सुबह ढोल बजा-बजाकर किसी प्रार्थना-स्थल पर चले जाएं और दोनों तरफ़ से पैसा और प्रतिष्ठा पीट लें। जो इस पाखंड को पूरी तरह नहीं साध पाता या साधना नहीं चाहता या उसकी सामाजिक स्थिति ऐसी नहीं बन पाई है, उसे अकसर क़दम-क़दम पर ख़तरे और नुकसान उठाने पड़ते हैं।

पाखंडी व्यक्ति की मानसिकता अगर ऐसी है कि वह फ़ायदे तो लेना चाहता है पर नुकसान या ख़तरे नहीं झेलना चाहता तो स्थिति फंसने जैसी बन सकती है। पाखंडी पुरुष या स्त्री, अगर उसे लगता है कि आठ, दस या बीस स्त्रियो या पुरुषों से संबंध दिखाने से उसकी छवि ‘विद्रोही’, ‘आवारा’ या ‘प्रगतिशील’ की बनेगी और इससे उसे फ़ायदा होगा तो वह चिल्ला-चिल्लाकर इसे बताना चाहता है। मगर जैसे ही उसे लगता है कि इससे उसके परिवार, प्रतिष्ठा, छवि, कैरियर आदि को नुकसान होगा तो वह छुपाने के लिए हाथ-पैर मारने लगता है। पाखंडी समाजों में पाखंडियों द्वारा अपनी सुविधाओं के अनुसार बनाया गया ‘सामाजिक’ और व्यक्तिगत’ का फ़ासला भी इसकी वजह हो सकता है।

सभी जानते हैं कि आपके घर का शयनकक्ष आपके सोने के लिए है, बाथरुम नहाने के लिए है, पाख़ाना टट्टी करने के लिए है। आप अपने शयनकक्ष में सो रहे हैं, कोई इसकी तसवीर उतार ले तो इसमें आपको डरने की क्या ज़रुरत है भला !? आप मेरे टॉयलेट में मेरे टट्टी करने का वीडियो बना लें और इंटरनेट पर डाल दें, मुझे तो रत्ती-भर फ़र्क नहीं पड़ता। लोग न जाने कैसी-कैसी बातों पर ब्लैकमेल हो जाते हैं !! अगर कोई मेरे बाथरुम में मेरे नहाने की तसवीर देखकर हंसता है तो यह उसकी मानसिक समस्या है, मेरी नहीं। ऐसे दस करोड़ लोग भी हंसें तो मुझे तो अक़्ल होनी चाहिए कि अपने बाथरुम में नहाना कोई अपराध नहीं है। बाथरुम में भी  आदमी कपड़े पहनकर नहाएगा क्या!?

अगर कोई किसीसे कहता है कि मरने के बाद कहीं (न जाने कहां!) पहुंचकर तुम्हारे साथ बहुत बुरा व्यवहार हो सकता है, उससे बचना है तो मेरी पेटी में कुछ पैसे डालो, तो यह भी ब्लैकमेलिंग का ही एक रुप है। अगर कोई तथाकथित प्रेमी या प्रेमिका किसीसे कहता है कि मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुम्हारे पत्र (आजकल ईमेल या एस एम एस) लोगों को दिखा दूंगा/दूंगी, तो यह तो ब्लैकमेलिंग है ही। एक और संभावना यह भी होती है कि प्रेमसंदेशों के आदान-प्रदान के दौरान ऐसे व्यक्ति ने दूसरे पक्ष को ऐसे द्विअर्थीय/बहुअर्थीय संदेश भेजे हों जिनके बाद में उसकी सुविधानुसार अर्थ निकाले जा सकें। ऐसे लोग आदतन ब्लैकमेलर हो सकते हैं या किसी व्यवस्थित (और प्रतिष्ठित भी) रैकेट का हिस्सा भी हो सकते हैं। अपने मन की बात साफ़ शब्दों में कहनेवाला व्यक्ति अपेक्षाकृत ज़्यादा विश्वसनीय है। वह या तो अपने किए की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार ही है, नही तो मजबूरी में तो उसे लेनी ही पड़ेगी। और ऐसे लोग तो जगह-जगह मिलते हैं जो, जब तक दूसरा उनके अनुकूल चले, उसकी ग़लतियों पर भी शाबाशियां देते हैं, जिस दिन विरुद्ध जाए, डराना शुरु कर देते हैं कि अगर नहीं मानोगे तो बता दूंगा, खोल दूंगा, ऐसा-वैसा कुछ कर दूंगा। मगर फ़िर भी, जो व्यक्ति अपने किए के प्रति समझपूर्ण है या अपने किए की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार है, उसे आसानी से ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता।

मगर जिस समाज में पाखंड को ही चरित्र में बदल देनेवाले लोग कुछ नए पाखंडों की रचना करके, पुराने पाखंडों से छुटकारा दिलाकर उसे ‘सुधारने’ की कोशिशों में लगे होंगे, वहां ब्लैकमेलिंग के बढ़ते जाने की संभावनाएं ही ज़्यादा होंगीं।

-संजय ग्रोवर

15-10-2013
(on FaceBook)



शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार

व्यंग्य

पता नहीं भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार का क्या रिश्ता है पर पिछले कुछ सालों से इन तीनों का नाम कई बार एक साथ सुनने में आया है। आप भी सुनना चाहते हैं तो यह वार्त्तालाप सुनिए-

‘देखिए, मैं ज़रुर भ्रष्टाचार दूर कर दूंगा, यह अच्छा मौक़ा है, भगवान भी अब यही चाहता है, लगता है कि उसीने मुझे इसके लिए चुना है, ज़रुर कोई चमत्कार होने वाला है।’

‘यह तो बहुत अच्छी बात है, सभी परेशान हैं, लेकिन मुझे एक बात समझ में नहीं आई।’ भगवान क्या आपके बड़े होने का इंतज़ार कर रहा था ?’

‘यह क्या बात हुई ?’

‘मतलब इतने सालों से अपने यहां भ्रष्टाचार भगवान की इच्छा से था ? भगवान क्या भ्रष्टाचार दूर करने के लिए आप पर डिपेंड करता है? वह ख़ुद भी तो दूर कर सकता था। या किसी और को चुन सकता था ?‘

‘यह भी कोई प्रश्न है ?’

‘नहीं, मतलब इतने सालों से भगवान को भ्रष्टाचार बुरा नहीं लग रहा था, आपके बड़े होते ही बुरा लगने लगा ? लगता है भगवान आपसे डरता है !’

‘हा हा हा, आप भी क्या बात कर रहे हैं, हम तो बहुत साधारण आदमी हैं।’

‘आपकी इसी विनम्रता का मैं क़ायल हूं, आप बुरा न मानें तो कृपया बताएं कि इतने सालों से भगवान भ्रष्टाचार के साथ मज़े से रह रहा था तो एकाएक उसे हुआ क्या ? कहीं आपने तो उसे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए नहीं राज़ी किया !?’

‘क्या यार.....आप भी कमाल करते हैं....’

‘नहीं नहीं, अब तो आपको बताना ही पड़ेगा कि आपकी टीम ने भगवान को कैसे तैयार किया ? प्लीज़ अपनी टीम से बात करवाएं, लोग आपकी स्ट्रेटजी जानना चाहेंगे, लीजिए माइक लीजिए, सब आप ही के तो हैं.....’

‘नहीं नहीं, सब जनता के हैं, देखिए अभी टीम के सदस्य थके हुए हैं, एक-दो की तबीयत भी ख़राब है....’

‘ओह! तो भगवान उनकी तबियत कब तक ठीक करेगा ? क्या भगवान की तबियत आप पता करेंगे कि कब उसकी तबियत आएगी और वह उनकी तबियत ठीक करेगा ?’

‘हा हा हा, आप भी ना......, चलिए दूसरे लोगों को भी टाइम दे रक्खा है....’

‘चलिए, नमस्कार, भगवान को भी मेरी नमस्ते दीजिएगा।’

‘हा हा हा।‘

-संजय ग्रोवर 
14-02-2015


गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

ग़ज़ल

अपने हक़ में अक्स बदल देने के आदी निकले रे
आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

जिनका मक़सद-ए-आज़ादी था औरों की ग़ुलामी
वही बारहा बनके मसीहा-ए-आज़ादी निकले रे

ज़ालिम ने मज़लूमों को हर तरह से यूं बेदख़ल किया
उनका हक़ भी ख़ुद लेने को बन फ़रियादी निकले रे

भरम को जिनने कहा हक़ीक़त, छोटेपन को ऊंचाई
वो रंगीन-मिज़ाज, ओढ़कर शक़्लें सादी, निकले रे

पहले क्या-क्या होता होगा, लोगों ने कुछ यूं जाना
जिनको आंदोलन समझा, सब कूदा-फ़ांदी निकले रे


-संजय ग्रोवर

04-12-2014

शुक्रवार, 27 जून 2014

एक कुर्सी पे तोंद रक्खी है

ग़ज़ल
रेखाकृति: संजय ग्रोवर


कई सदियों की गोंद रक्खी है
एक कुर्सी पे तोंद रक्खी है

तोंद पर लटकी एक दाढ़ी है
झाड़ ने दुनिया रौंद रक्खी है

ज़हर में रंग की न फ़िक़्र करो
हमने तो आंख मूंद रक्खी है

तेज है उनका तेल के जैसा
बासी बातों में सौंध रक्खी है

बदन आता है, ज़हन आएगा
चौंध में उनके लौंद रक्खी है
27-06-2014

(लौंद=छलांग leap,  सौंध=बासी की बदबू  ill-smelling, musty, चौंध=a very harsh, bright, dazzling light, तेज=आभा aura)

2.
अकसर साजिश करते भी हैं
खुले तो थोड़ा डरते भी हैं

असल तो कुछ भी नहीं है ज़िंदा
रस्मन अब भी मरते भी हैं

ख़ार, चढ़ावा मिले, तो मुंह से
फूल-वूल कुछ झरते भी हैं

सदियों से हैं ज़हर के मालिक़
दास के दिल में भरते भी हैं

ख़ुद ही ख़ुदको बोलके ऊंचा
दम तहज़ीब का भरते भी हैं
17-06-2014


-संजय ग्रोवर



देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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