देह और नैतिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
देह और नैतिकता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 11 मई 2010

पुरूष की मुट्ठी में बंद है नारी-मुक्ति की उक्ति-2

पहला भाग


शब्दों को छोड़कर आइए अब ज़रा विज्ञापन की दुनिया का जायज़ा लें । नारी शरीरों की निर्वस्त्रता पर नारी संगठन और संस्कृतिदार पुरूष अपना विरोध कई तरह से प्रकट करते आए हैं व कर रहे हैं । मगर, कई बैंको और फाइनेंस कंपनियों के दर्जनों ऐसे विज्ञापन पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी पर देखने-सुनने-पढ़ने को मिलते हैं, जिनमें प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से दहेज व अन्य स्त्री विरोधी कुप्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता है ।

फिल्मों में देखिए । वहां भी यही हाल है । हमारा नायक अक्सर बहन, बेटी या पड़ोसन के लिए कहीं-न-कहीं से दहेज जुटाकर समस्या की जड़ में जाने की बजाय उसे टालने में अपनी सार्थकता समझता है । इक्का-दुक्का फिल्मों में ही लालची वर-पक्ष को दुत्कार कर किसी आदर्श पुरूष से कन्या का विवाह करने के उदाहरण देखने को मिलते हैं । मुझे याद नहीं कि कभी किसी नारी संगठन ने ऐसे विज्ञापनों या ऐसी फिल्मों का विरोध किया हो । स्त्री का आंचल पौन इंच भर ढलक जाने पर हाय-तौबा मचाने वाले सभ्यजनों को उक्त दृश्यों का विरोध करने के नाम पर क्यों सांप सूंघ जाता है ? क्या कभी किसी नारी संगठन का ध्यान इस ओर नहीं गया कि फिल्मों में किस तरह नारी के अंतर्वस्त्र ब्रेज़ियर को मज़ाक की वस्तु बनाया जाता रहा है (ताजा उदाहरण दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे) । नारी का अंतर्वस्त्र आखिर हास्य का साधन क्यों और कैसे हो सकता है ? क्या यह सोच अश्लील और विकृत नहीं है ?

इसके अलावा कई फिल्मों में दिखाया जाता है कि नायक नायिका के कम कपड़ों पर ऐतराज करता है और उसके भावुकतापूर्ण भाषण से प्रभावित होकर नायिका तुरंत अगले ही दृश्य में साड़ी में लिपटी दिखाई देती है । मगर, अगले गाने में ही वह नायक के साथ ही, और भी कम, लगभग नाममात्र के वस्त्रों में नायक से लिपटती-चिपटती और कामुकतापूर्ण झटके मारती दिखाई पड़ती है । तब न तो नायक ऐतराज करता है, न दर्शक बुरा मानते हैं । एक अन्य आम दृश्य में नायक द्वारा शरीर की मांग करने पर नायिका अपनी सभ्यता-संस्कृति को लेकर लंबा-चैड़ा भाषण देती है । तब नायक प्रभावित होता है और दोनों में ‘सच्चा प्रेम’ हो जाता है । अगले गाने में वे लगभग वस्त्रहीन नाचने लगते हैं । अब तक नायिका तो अपनी सभ्यता-संस्कृति को भूल ही चुकी होती है, दर्शक भी इसको लगभग धार्मिक फिल्म की ही तरह श्रद्वापूर्वक देखने लगते हैं । ज्यादातर फिल्मों में, नायक अक्सर कई दूसरी स्त्रियों के साथ लिपटता-चिपटता रहता है और नायिका अकेली पड़ी उसका इंतजार करती रहती है । जिन दूसरी स्त्रियों के साथ नायक लगभग केलिक्रीड़ा जैसे दृश्य प्रस्तुत करता है, क्या वे किसी की बहन-बेटियां नहीं होतीं ?

क्या हमारी सभ्यता-संस्कृति यही कहती है कि बस अपनी मां-बहन-बेटी को ही कै़द में बंद कर दो और फिर बाकी सभी स्त्रियों को अपनी जायदाद समझो । इन दृश्यों को देखकर हमारे धर्मध्वजियों व नारी संगठनों के माथे पर शिकन तक नहीं आती । उक्त तीनों नियमित दृश्यों में मौजूद विरोधाभास ही इस साज़िश की पोल खोल देते हैं कि किस तरह सभ्यता, संस्कृति, परिवार, धर्म आदि बडे़-बडे़ शब्दों की आड़ में स्त्री को गुलाम बनाए रखने की चालाकी खेली जा रही है । दिलचस्प बात यह है कि परिवार, मर्यादा इत्यादि का सारा ठेका देवी स्त्री को दिया गया है और दुनिया भर के अच्छे-बुरे सभी आनंद लेने की ’ज़िम्मेदारी ’देवता पुरूष को दी गई है ।
नारी मुक्ति के संदर्भ में एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि बहुत से पुरूष यह मानते और कहते हैं कि नारी तो मुक्त हो चुकी । अब बचा क्या है । वह नौकरी करती है, घूमती है, खाती-पीती है, फिल्म देखती है । पुलिस में, हवाई जहाज में, पानी के जहाज़ पर काम करती है अर्थात् पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है । ज़ाहिर है कि पुरूष इसे पूर्ण मुक्ति के संदर्भ में देखने की बजाय उसकी पूर्व स्थिति की तुलना में बेहतर वर्तमान स्थिति को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं । पहली बात तो यह है कि जब भी होगी नारी मुक्ति पुरूष वर्चस्व पर सिर्फ प्रतिक्रिया मात्र नहीं होगी । हां, जब नारी पुरूष से मुक्त हो जाएगी, तब ही वह अपने लिए वास्तविक मुक्ति की तलाश और कोशिश शुरू कर पाएगी। और इस प्रक्रिया में अभी खासा लंबा समय लगने वाला है ।

फिर भी, यहां हम पुरुष की तुलना में नारी की सही स्थिति को जानने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। क्या नारी आज भी अकेली फिल्म देखने जा सकती है? क्या वह पुरुष की तरह बेधड़क पार्क में घूम सकती है? क्या वह किसी अजनबी शहर में कमरा लेकर अकेली रह सकती है? क्या वह लड़कों की तरह बेतकल्लुफी से अपनी मित्रों के गले में हाथ डाले ‘हा हा हू हू’ करते हुए शहर की सड़कों-चौराहों पर घूम सकती है? क्या तपती-सुलगती गर्मी में पुरुष की ही तरह स्त्री भी वस्त्र उतार कर दो-घड़ी चैन की सांस ले सकती है? उक्त में से कोई भी कार्य करने पर समाज द्वारा उसे चालू, चरित्रहीन, वेश्या, सनकी, पागल या संदिग्ध-चरित्र करार दे दिए जाने की पूरी-पूरी संभावना है। सुनने-पढने में यह सब अटपटा, अजीब या अश्लील लग सकता है। मगर स्त्री भी उसी हांड़-मांस की इंसान है और बिलकुल पुरुष की तरह ही उसकी भी इच्छाएं और तकलीफें हैं। वह कोई मशीन या जानवर नहीं है, जिस पर सर्दी-गर्मी का कोई असर ही न होता हो।

मगर प्रतिक्रियावाद हमेशा ही अपने साथ कई विसंगतियों को भी लाता है। ऐसी ही एक ख़तरनाक विसंगति है यह कहा जाना कि ‘तुम स्त्री होकर भी स्त्री का विरोध करती हो’। यह एक नए किस्म का जातिवाद है। स्त्री भी एक इंसान है और पुरुष की तरह वह भी कभी सही तो कभी ग़लत होगी ही, मगर हम हमेशा नई-नई जातियां या वर्ण गढ़ते रहते हैं। यथा डाॅक्टर हमेशा डाॅक्टर को सही कहे, व्यंग्यकार व्यंग्यकारों पर व्यंग्य न लिखें, पत्रकार एकता ज़िन्दाबाद, दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, दलित दलित को ग़लत न कहें, वगैरहा-वगैरहा। पहले ही जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के झगड़ों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। मगर हम हैं कि मानते ही नहीं।
स्त्री की मुक्ति के साथ-साथ हमारे सामाजिक-नैतिक मानदंडों, साहित्यिक प्रतिबद्धताओं, कला संबंधी प्रतिमानों सहित हर क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव आ जाएंगे, जिसका फिलहाल हमें ठीक से अंदाज़ा भी नहीं है। हो सकता है कि आने वाले समय में हमें यह जानने को मिले कि जिसे हम स्त्री का स्वभाव समझ रहे थे, उसमें से अधिकांश उस पर जबरन थोपा गया था। ‘लोग क्या कहेंगे’ या ‘समाज क्या कहेगा’ आदि डरों की वजह से इन प्रक्रियाओं में अनुपस्थित रहने के बजाय हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने विवेक और तर्कबुद्धि से ही इस बाबत निर्णय लेने होंगे। इतिहास गवाह है कि जो लोग इन सामाजिक परिवर्तनों और सुधारों को धर्म व शास्त्र विरुद्ध कहकर इनकी आलोचना करते हैं, बदलाव आ चुकने और समाज के बहुलांश द्वारा इन्हें अपना चुकने के बाद वही लोग अगुआ बनकर इसका ‘क्रेडिट’ लेने की कोशिश भी करते हैं। विरोध, आलोचना और अकेले पड़ जाने के डर से अगर सभी चिंतक अपने चिंतन और उस पर पहलक़दमी करने के इरादों को कूड़े की टोकरी में डालते आए होते तो आदमी आज भी बंदर बना पेड़ों पर कूद रहा होता।

-संजय ग्रोवर


(समाप्त)

पहला भाग

{7 मार्च 1997 को अमरउजाला (रुपायन) में प्रकाशित}

गुरुवार, 6 मई 2010

पुरूष की मुट्ठी में बंद है नारी-मुक्ति की उक्ति-1


प्रशंसा सुनकर गद-गद होना या झूठी तारीफ सुनकर दूसरों का काम तुरत-फुरत कर देना-एक ऐसी कमजोरी है, जो ज्यादातर लोगों में पाई जाती है । मगर जिस वर्ग को इस विधि से सर्वाधिक छला गया है, वो है-स्त्री वर्ग । सुंदर और मोटे-मोटे शब्दों का जाल बिछाकर स्त्री को इस तरह फंसाया गया है कि इस जाल को स्त्रियों ने अपनी नियति ही मान लिया है । मगर आश्चर्य और दुःख की बात तो यह है कि इस सदियों पुराने भारी-भरकम शब्दजाल मे फंसी अधिकांश स्त्रियां, खुद को गौरवान्वित महसूस करती हैं । यहां तक तो गनीमत है, मगर जब यही स्त्रियां, आजादी की ख्वाहिश-मंद और इसके लिए प्रयासरत कुछ दूसरी, थोड़ी-सी, साहसी महिलाओं को तरह-तरह से रोकने की, उनके नैतिक साहस को डिगाने की, उन पर उलजुलूल, मनगढंत लांछन लगाकर उनका चरित्र-हनन करने कोशिश करती हैं, तो उनका यह कृत्य आपत्तिजनक, निंदनीय व व्यक्तिगत आजादी पर हमला तो होता ही है, साथ ही पुरूषवादी समाज के अमानुषिक, तानाशाह तौर-तरीकों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा भी देता है । इज्जत, शील, मर्यादा, ममता, लज्जा आदि कितने ही ऐसे शब्द हैं, जो वर्षो से स्त्री को भरमाते आए हैं । ये शब्द और स्त्री संदर्भो में इनके प्रचालित अर्थ इस भयावह सचाई को बताते हैं कि महज चंद शब्दों की आड़ में एक बड़ी भीड़ का कितनी आसानी से शोषण किया जा सकता है । एक स्त्री व एक पुरूष विवाह से पहले या विवाह के बिना अगर संभोग कर लेते हैं, तो हमारा समाज व साहित्य बांग लगाता है कि हाय, बेचारी स्त्री का शील भंग हो गया । अब पूछिए इनसे कि ‘शील’ नामक इस सम्मान (?) से सिर्फ स्त्री को ही क्यों नवाजा गया है ? क्या पुरूष का ‘शील’ नहीं होता ?
एक अन्य उदाहरण में जब स्त्री के साथ बलात्कार होता है तो जबरन किए जाने वाले इस कृत्य के लिए बलात्कार एकदम उपयुक्त शब्द होता है । मगर, इससे सामाजिक संप्रभुओं का मतलब हल नहीं होता । सो वे कहते हैं कि स्त्री की इज्जत लुट गई, अस्मत लुट गई । कितनी हास्यास्पद है यह अलंकृत भाषा । जैसे कि आपके घर में डाका पडे़ और बजाय डाकुओं के हंसी भी आपकी ही उड़ाई जाए । आप शर्म के मारे घर से ही न निकलें, थाने में रिपोर्ट कराने न जाएं कि सब हंसेगे आप पर । लोग संदेहपूर्ण नज़रों से देखेंगे आपको कि आपके घर में डाका पड़ा, तो गलती भी आपकी रही होगी, आप ही चरित्रहीन होंगे ।
ऐसा ही एक और शब्द है ममता । इसका प्रचलित अर्थ है मां को अपने बच्चों (दरअसल बेटों) के लिए बेशर्त प्यार । यहां तक तो गनीमत है । अगर अधिकांश स्त्रियां अपने बच्चों पर ममता लुटाती हैं और उन्हें बच्चे पैदा करने और उन्हंे पालने में आनंद आता है तो निश्चय ही यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है और किसी को उन्हें रोकने का कोई हक नहीं है । मगर, जब यही स्त्रियां और समाज इस मातृत्व को जबरन किसी पर थोपने की कोशिश करते हैं और उसके इनकार करने पर उसे असामान्य करार देते हैं, चरित्रहीन करार देते हैं, तो निश्चय ही यह आपतिजनक है । व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है । अगर कुछ स्त्रियां मातृत्व से इनकार कर रही हैं तो यह कैसे कहा ज सकता है कि हर स्त्री मां बनना चाहती है । सिर्फ पुरानी धारणाओं या ‘आंचल में है दूध और आंखों में पानी’ जैसी उक्तियों पर जीती-जागती स्त्रियों और उनके सपनों को बलि चढ़ा देने का हक किसे हो और क्यों हो । कैसी विडंबना है कि एक कुंवारी स्त्री अगर अपनी मर्ज़ी से मां बनती है या बनना चाहती तो उसे भी सताया जाता है । और शादीशुदा स्त्री माँ नहीं बनना चाहती तो उसे तो प्रताड़ित किया ही जाता है। प्रंसगवश पंजाबी लेखिका अजीत कौर के उपन्यास ‘गौरी’ से कुछ पंक्तियां उद्धृत करना उपयोगी होगा-’ममता का भी वैसे कुछ ज्यादा ही आडंबर रचा हुआ है कवियों-ववियों ने । ममता कोई पहाड़ी झरना नहीं होता कि एक बार धारा फूटी तो बस बहती ही चली जाएगी । ममता भी शेष मानवी भावनाओं की तरह रोज़-रोज़ पानी देकर सींचने-पालने वाली चीज़ है । नहीं तो सूख जाती है यह भी ।’
फिर कुछ और शब्द हैं । स्त्री देवी है, मां-बहन और बेटी है । भारतीय संदर्भो में स्त्री की दुर्दशा को देखते हुए उसे देवी कहा जाना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे कि एक मुहावरे के अनुसार किसी को पोदीने के पेड़ पर चढ़ाकर उससे अपना काम निकलवा लेना । बार-बार स्त्री को मां-बहन-बेटी कहते रहने में जो अर्थ छुपा है, उसकी धुरी भी पुरूष है । निहितार्थ इसके भी यही हैं कि वो पुरूष की मां, बहन और बेटी है । उसकी परवरिश, सुरक्षा या परवाह चूकि पुरूष को ही करनी है, अतः हर मामले में उसे अनुमति या सलाह भी पुरूष से ही लेनी चाहिए । इस कारक ने भी स्त्री को बौद्विक या मानसिक रूप से अपंग बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है । अगर ऐसा न होता तो अकसर हमें यह भी सुनने को मिलता कि ‘पुरूष हमारा भाई है, बेटा है, देवता है, इसलिए उसे हमें घर में, एक कोने में संभालकर रखना चाहिए । स्त्री को देवी कहने वाला समाज वास्तव में उसे क्या मानता है, इसका पता हमें इसी बात से चल जाता है कि हमारे यहां प्रचलित लगभग सभी गालियां स्त्री को लक्ष्य करके कही गयी हैं। स्त्री की वास्तविक हैसियत बताने वाले ऐसे कितने ही शब्द हैं । जैसे अर्धान्गिनी । निहितार्थ है पुरूष का आधा भाग, वो भी अनिवार्य रूपेण स्त्री ही, क्योंकि पुरूष को तो ‘अर्धान्गिना’ हम कहते नहीं ।

-संजय ग्रोवर

{7 मार्च 1997 को अमरउजाला (रुपायन) में प्रकाशित}

(जारी)

अगला भाग

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

व्यंग्य-कक्ष में *****महान देश के महान लोग*****

यह असम्भव ही लगता है कि किसी को हमारे देश की महानता के बारे में पता न हो। फिर भी कोई भूल न जाए इसलिए 15 अगस्त और 26 जनवरी के अलावा भी कई अन्य उपयुक्त अवसरों पर बताया जाता है कि देश महान है। रेडियो, टीवी, अखबारादि अक्सर घोषणा करते रहते हैं कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, परम्पराएं वगैरह सब महान हैं। शायद इस तरह की घोषणाएं भी हमारी परम्परा का एक हिस्सा है। वैसे भी अच्छी बातें बताने वालों को बस अवसर मिलना चाहिए, उपयुक्त तो वे उसे बना ही लेते हैं। बल्कि अवसर मिलने का भी इन्तज़ार नहीं करते और ऐसी स्थितियां पैदा कर देते हैं कि अवसर खुद-ब-खुद निकल आता है। तो जब इतने सालों से और इतने तरीकों और तरक़ीबों से समझाया जा रहा हो कि देश महान है तो मान ही लेना चाहिए कि देश महान है। वैसे भी व्यक्ति का फर्ज़ यह है कि जिस देश में वो पैदा हो जाए उसी को महान मानने लगे। दुनिया के सभी लोग ऐसा ही करते हैं। फिर हम क्या कोई आसमान से टपके हैं!
देश के महान होने का कोई निश्चित वक़्त नहीं होता। यह महानता सुबह-सवेरे ही शुरू हो जाती है। सुबह-सुबह ही हलवाई की दुकान पर पारम्परिक पकवान जलेबी, कचैड़ी या समोसा खाने पधारे ‘न्यू प्राचीन एण्ड कं.‘ के मालिक लाला लपेटचंद जी सभ्यता और संस्कृति की चिन्ता में सूखना शुरू हो जाते हैं। वे एक ‘देशद्रोही’ अंग्रेजी फिल्मी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ममता कुलकर्णी द्वारा अपने निर्लज्ज नग्न चित्र छपवाने के कारण उससे बहुत नाराज हैं। लाला जी नितांत प्राकृतिक वेषभूषा में सुबह की हवाखोरी के हल्के मूड में इधर को निकल आए हैं। अपवादस्वरूप उन्होंने कमर के निचले हिस्से में एक अधोवस्त्र पहना हुआ है जोकि उनके घुटनों से नीचे के इलाके को ढकने में किन्हीं अपरिहार्य कारणों से असमर्थ हैं। बोलचाल की भाषा में इस अधोवस्त्र को कच्छा, जांघिया या कभी कभार घुटन्ना भी कहते हैं। ऐसी दशा में लाला की यह चिन्ता स्वाभाविक ही लगती है कि ममता को पुरूषों के बारे में नहीं तो कम से कम देश की बहू-बेटियों के भविष्य के बारे में तो सोचना चाहिए।
लाला बैंच पर बैठे हुए हैं। विवाद खड़ा हुआ है। लोग हां, हूं करते हुए सुन रहे हैं। और कचैड़ियां खाते जा रहे हैं। तिस पर भी लाला तैश में आ जाते हैं और पास खड़े मरियल कुत्ते पर लात जमा कर दोना बीच सड़क पर फेंक देते हैं। साथ ही धुर्र, फटाक की पारम्परिक आवाज़ के साथ सड़क पर ज़ोेर से थूकते हैं और सभ्यता और संस्कृति की चिंता में दो और वाक्य बोलकर घर के लिए प्रस्थान करते हैं।
लाला जल्दी में हैं। उन्हें अपनी पत्नी की चिंता है। जब तक वे घर नहीं पहुंचेंगे, पत्नी नाश्ता छुएगी तक नहीं, भले ही उन्हें लौटने, नहाने, धोने में कितना ही वक़्त लग जाए। पत्नी भूखी न रह जाए, इसी वजह से उन्हें रोेज़ इसी तरह दो-दो बार नाश्ता करना पड़ता है।
ऐसा भी नहीं कि लाला अकेले ही सभ्यता और संस्कृति के लिए परेशान हैं। दरअसल ऐसे लोग तो बहुत सारे हैं, अनगिनत। अक्सर देखने में आता है कि लोगों को कितनी भी जोर से ‘लगी‘ हुई हो मगर वे कोई दीवार या गली नज़र आ जाने तक धैर्य बनाए रखते हैं और जल वितरण नहीं करते। शायद सभ्यता और संस्कृति की खातिर ही वे इस जल वितरण में ज्यादा देर तक रूकावट डालने से होने वाले शारीरिक और मानसिक कष्ट को पी जाते हैं और बीच सड़क पर कोई ऐसी हरकत नहीं करते जिससे कि आम ज़ुबान में ‘पेशाब करना‘ या ‘मूतना‘ कही जाने वाली इस नैसर्गिक क्रिया पर कोई आंच आए। अनेकानेक पर्यावरण प्रेमी सड़क किनारे लगे पेड़ों को इस परोपकारी क्रिया से नवाज कर पुण्य प्राप्त करते हैं। कुछ अत्यन्त उत्साही युवा जन तो रात-बिरात ही इतने जोश में आ जाते हैं कि पक्की सड़क पर ही ‘बर्फ में आग लगा देंगंे‘ के अंदाज़ में धारा-प्रवाह करना शुरू कर देते हैं।
हमारे परम्परा भी बड़ी समृद्ध है। सारे अविष्कार एवं खोजें हमारे यहां प्राचीन काल में ही किए जा चुके हैं। चूंकि इन आविष्कारों व खोजों को करने में हमें काफी श्रम करना पड़ा सो हम काफी थक गए हैं और पिछले कई सालों से आराम कर रहे हैं। अब करने को कुछ बचा भी नहीं। सिवाय इसके कि जब भी दुनिया में कोई अविष्कार होता है हम अपने प्राचीन ग्रंथों में से तुरन्त ढूंढ-ढांढ कर बता देते हैं कि फलां पन्ने की फलां पंक्ति में फलां व्यक्ति ने यह आविष्कार पहले ही कर लिया है। तत्पश्चात् हम विदेश में हुए किसी ताज़ा आविष्कार को अपने किसी नए नाम से घटिया और नकली पुर्जों के सहारे बनाने की तिकड़म सोचने लगते हैं। जिसमें कि हम अक्सर सफल होते हैं। और सिद्ध कर देते हैं कि हम अपने प्राचीन कालिक आविष्कार की आधुनिक विदेशी नकल की नकल करते हुए भी उतने ही मौलिक बने रहते हैं।
इस सब के अलावा अपने यहां स्त्रियों का भी बहुत सम्मान किया जाता है। उन्हें देवी माना जाता है। इसलिए अधिकाँश पुरूष चाहते हैं स्त्रियां मंदिर में स्थित देवी की मूर्ति की तरह शांत व स्थिर एक कोने में पड़ी रहें। ज्यादातर पुरूष जब अन्यान्य तरीकों से स्त्रियों का सम्मान करते रहने के बावजूद भी असंतुष्ट रह जाते हैं और उनमें महानता की भावना और भी बलवती हो उठती है तब वे विवाह कर लेते हैं। और स्त्रियों को व्यक्तिगत तौैर पर सम्मान प्रदान करते हैं। इससे उनका यह डर भी कम हो जाता है कि कोई अन्य व्यक्ति उनके लिए आरक्षित स्त्री का सम्मान न कर डाले। पर इधर सुनने में आया है कि स्त्रियां अब सम्मान करवाते-करवाते थक गई हैं। वे चाहती हैं कि अब उन्हें मौका दिया जाए। जिससे कि वे पुरूषों का यथोचित सम्मान करके यह कर्ज़ा उतार सकें।
इस प्रकार सभ्यता, संस्कृति, परम्परा, मर्यादा वगैरह से लबालब हमारे देश में कहने-सुनने को बहुत कुछ है। परन्तु एक ही लेख में सब कुछ कहते हुए तो मैं असभ्य ही दिखाई पड़ूंगा। और मेरी समझ में असभ्य होना इतनी बुरी बात नहीं जितना कि असभ्य दिखना। आपका क्या ख्याल है?
-संजय ग्रोवर
(12 अगस्त, 1994 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

ये ‘‘डीसैक्सुअलाइजेशन’’ क्या बला है ?


सुशांत जी, आपने पेड़ो के नीचे खड़े, दीवार पर चढ़े, खेत में खड़े, कई बार तो आधी रात के वक्त चैराहे पर खड़े ‘‘मर्दों’’ को पेशाब करते देखा है ? आपको क्या लगता है ये सब ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं ? आपने आदिवासियों को देखा है ? उनकी स्त्रियों की वेश-भूषा देखी है ? क्या वे दिन-रात यौन-क्रिया करते हैं और इसलिए ‘‘डीसैक्सुअलाइज़्ड’’ हैं ? मुझे याद आता है 20-30 साल पुराना माहौल जब कोई स्त्री किसी महफिल में स्लीवलैस पहनकर आ जाती थी तो पूरे वक्त न तो वो खुद सहज रह पाती थीं न पूरी महफिल। पूरे वक्त स्त्री बांहो को तरह-तरह से ढंकने की कोशिश करती रहती तो मर्द नज़रें चुराते। शोहदे घूर-घूर कर देखते। यानि सहज-सामान्य कोई न रह पाता। क्या आज भी ऐसा ही है ? यह बदलाव क्या ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ की वजह से आया है !? टीवी के रिएलिटी शोज़ में मध्यवर्गीय घरों की लड़कियां आज उन्मुक्त वेश-भूषा में सहज भाव से विचरती हैं। उनके साथ उनके माँ-बाप-भाई-बहिन भी होते हैं और वे भी उतने ही सहज होते हैं। क्या वे सब दिन-रात सैक्स कर-करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं इसलिए इतने सहज-सामान्य हो गए हैं ?
इसके अलावा भी अपने कुछ पुराने लेखों के टुकड़े यहाँ पेश करना चाहूंगा जिससे मुझे अपनी बात कहने में आसानी हो जाएगी और व्यर्थ के दोहराव और वक्तखर्ची से भी बच जाऊंगा:-
अश्लीलता को लेकर एक और मजेदार तथ्य यह है कि बढ़ते-बदलते समय के साथ-साथ इसको नापने-देखने के मापदंड भी बदलते जाते हैं। 1970 में जो फिल्म या दृश्य हमें अजीब लगते थे, अब नहीं लगते। आज बाबी पर उतना विवाद नहीं हो सकता, जितना ‘चोली के पीछे’ पर होता है। आज साइकिल, स्कूटर, कार चलाती लड़कियां उतनी अजीब नहीं लगतीं, जितनी पांच-दस साल पहले लगती थीं। मिनी स्कर्ट के आ जाने के बाद साधारण स्कर्ट पर एतराज कम हो जाते हैं। मध्यवर्गीय घरों में नौकरीशुदा स्त्रियों को लेकर तनाव व झगडे़ जितना पहले दिखते थे, उतना अब नहीं दिखते।
(6 दिसम्बर 1996 को अमरउजाला, रुपायन में प्रकाशित)
अब आप मेरे आलेख के उस अंश को दोबारा-तिबारा पढ़ लें जिसमें से न जाने कौन-सा गुणा-भाग करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ शब्द निचोड़ लिया गया है:-
‘‘स़्त्री को अपनी कई समस्याओं से जूझने-निपटने के लिए देह से मुक्त तो अब होना ही होगा और इसके लिए उसकी अनावृत देह को भी पुरूष अनावृत देह की तरह सामान्य जन की आदत में आ जाने वाली अनुत्तेजक अवस्था के स्तर पर पहुंचाना होगा ।‘‘
अगर अभी भी आपको समझ में नहीं आता तो मुझे कुछ बातें दोहरानी तो पड़ेंगी ही। वैसे भी अगर हम अतार्किक बातों को हज़ार-हज़ार साल दोहरा सकते हैं तो तार्किक को भी दो-चार बार दोहरा लेंगे तो ऐसी कौन सी आफत आ जाएगी ? पहले वे बातें मैंने टिप्पणी में कही थीं, अब संशोधन के साथ मुख्य पोस्ट में लगा रहा हूँ। मैं हर मसले पर चर्चा करुंगा। थोड़ा धीरज तो रखें। मगर आपको तो जय-पराजय के नतीजे की जल्दी मची है।
और आप मुद्वों से हटकर न जाने कौन-कौन से राग अलाप रहे हैं ? कि मैं अपने-आपसे नाराज़ हूँ। कि मुझे प्रशंसा सुनने की आदत नहीं है ! क्या आपको लगता है कि इन सब बातों का इंस बहस से कोई मतलब है ?
बाते अभी बहुत सी बाकी हैं ।
(जारी)

-संजय ग्रोवर

बुधवार, 7 जनवरी 2009

औरत: दैहिक स्वतंत्रता और सामाजिक उपयोगिता के सवाल

मित्रों,ब्लाग का नाम संवादघर रखते समय मन में यही विचार था कि विभिन्न मुद्वों पर घरेलू माहौल में एक सार्थक संवाद चलाया जाए जिसमें बिना किसी भेदभाव के हर कोई हिस्सेदारी कर सके। कई संवेदनशील विषयों में से एक नारी-मुक्ति भी था जिसपर बात करते हुए मैं, एक समय में, जिहादी अंदाज़ में भावुक हो जाया करता था। कुछ लेख अमर उजाला में व कुछ कविताएं यत्र-तत्र छपीं भी थीं। ब्लाग बनाने के बाद तांका-झांकी और ढूंढा-ढांढी के तहत ‘‘चोखेर बाली’’ पर जा पहुँचा। किसी विषय पर बहस छिड़ी हुई थी। मैं भी घुस पड़ा और बहस में शामिल हो गया। पुराने दिन याद आ गए। बता दूं कि ‘‘चोखेर बाली’’ नामक ब्लाॅग की माॅडरेटर सुजाता हैं और बहुत ही कुशलता पूर्वक वे नारी-विमर्श से संबंधित मुद्वे उठाकर बहस का संचालन करती हैं। ‘‘बहस-स्थल’’ पर ही मैंने उनके सम्मुख प्रस्ताव रखाः-
सुजाता जी,नए साल में औरतों के मसअलों से जुड़ा एक स्तम्भ शुरु कर रहा हूँ ‘‘दुनिया बसाऊँगी तेरे घर के सामने।’’ चाहता हूँ कि इंस स्तम्भ का ‘‘उदघाटन’’ आप करें। यानि कि पहली टिप्पणी आप करें। क्या आप मेरा आमंत्रण स्वीकार करती हैं। मैं खुदको गौरवान्वित महसूस करुंगा।31।12।2008







कुछ प्रतीक्षा के बाद सुजाताजी का जवाब भी उभरा:-
संजय जी,
मुझे आमंत्रण देने के लिए धन्यवाद । ज़रूर टिप्पणी करूंगी ।
स्तम्भ के नाम को लेकर मन मे ज़रा संशय है। आप उस पर पुनर्विचार कर सकें तो बेहतर। इस शीर्षक में 'तेरे' कौन है यदि यह पुरुष के लिए है तो दिक्कत यह है कि स्त्री अपना संसार बसाती है तो उसका सन्दर्भ हमेशा पुरुष ही क्यों होगा । साथ ही यह एक प्रतिस्पर्द्धा की भावना भी दर्शाती है. 'तेरे घर के सामने' आमने.सामने वाली बात आ जाती है। दर असल स्त्री जो पाना चाहती है वह पुरुष की होड़ करने का अर्थ लगाकर कभी सही समझ नही जा सकता ऐसा मुझे प्रतीत होता है। इन कारणों पर गौर कर सकें तो बहुत अच्छा होगा।31.12.2008
तब मैंने उन्हें बताया:-
सुजाताजी,,मैं कोई बहानेबाज़ी नहीं करुंगा। ‘तेरे’ से मतलब पुरुष से ही है। मैं आपकी बात से सहमत भी हूँ। फ़िर भी मेरे मन में जो बात थी वो तो कह ही दंू। निहितार्थ यह भी था कि तुमने सिर्फ अपने तक सीमित रहकर घर बसाया है जो कि पितृसत्ता या पुरुष-सत्ता का प्रतीक है। मै एक खुली हुई दुनिया बसा दूंगी जहाँ सब बराबर होंगे। दूसरे, मेरे मन में अपने स्तम्भों के शीर्षकों को ब्लाॅग (संवादघर) के नाम से जोडे़ रखने का लालच भी था (मसलन व्यंग्य-कक्ष)। साथ ही मैंने उसके लिए एक लोगो (प्रतीक-चिन्ह/चित्र...वैसे मुझे यद नहीं आ रहा इसके लिए सही शब्द क्या होता है।) भी बना डाला है। पहले मैंने स्तम्भ के लिए ‘‘सीढ़ियों पर’’ और ’’हटी है चिलमन, खुला है आंगन’’ जैसे नाम भी सोचे थे। बहरहाल, फिलहाल अगर आप अन्यथा न लें तो, इसी शीर्षक से शुरु कर सकते हैं, बाद में आपकी सहमति से शीर्षक बदल लेंगे। इस पूरे प्रकरण में फायदे की बात यह है कि शुरुआत आपकी शीर्षक पर की गयी इसी टिप्पणी से की जा सकती है। बाद की आपकी टिप्पणी ‘‘समापन-उदघाटन’’ होगा। (वैसे क्या ऐसी बहसों का कभी समापन हो सकता है जो अभी ठीक से शुरु भी नहीं हुई!)तो क्या आप सहमत हैं ?
आमंत्रण स्वीकार करने के लिए धन्यवाद।31.12.2008
शुरुआत उस लेख से कर रहा हूँ जो अमर उजाला, रुपायन में 1996 में छपा था। इन 12-13 सालों में दुनिया कितनी बदली ? पुरुष की मानसिकता में कितना बदलाव आया और ख़ुद स्त्री की में कितना ? आया कि नहीं आया ? हम आगे गए या पीछे ? बता दंू कि मधु सप्रे और मिंलिंद सोमन तब के प्रसिद्ध माॅडल थे और दोनों साथ-साथ, एक विज्ञापन में लगभग वस्त्रहीन दृश्य देने की वजह से चर्चा में आ गए थे। लेकिन लगभग सभी संचार माध्यम हाथ धोकर सिर्फ मघु सप्रे के पीछे पड़ गये थे। यही मुद्दा मैंने इस लेख में उठाया था। अंजलि कपूर जो कि एक वकील थीं, भी ऐसे ही एक विज्ञापन की वजह से मुश्किल में पड़ गयीं थीं। सुजाताजी की टिप्पणी इन सवालों को शायद कुछ हल्का-गहरा करे या शायद कुछ नए सवाल उठाए। ख़ुद मैं वैचारिक रुप से तब कहाँ था और अब कहाँ हूँ, यह जानने में आपकी टिप्पणियों से भी मदद मिलेगी।
लेख
दैहिक स्वतंत्रता और सामाजिक उपयोगिता के सवाल
इस समय नारी देह के अनावरण और शोषण को लेकर चर्चा गर्म है । शायद पुरुष जानता है कि दैहिक पवित्रता, मर्यादा, यौनशुचिता के गीत गाकर ही अभी और कुछ दिन तक नारी का शोषण किया जा सकता है ।
प्रगतिशील महिलाएं तक इस शाब्दिक झांसे में फंसकर खुद को देह में कैद कर लेती है । सालो-साल पुराना लोगों का मानसिक अनुकूलन यथास्थितिवादी-सामंतवादी सोच के लोगों के पक्ष में चला जाता है ।
हालांकि जिन कारणों से नारी देह अनावृत होती है, लगभग उन्हीं कारणों से पुरुष देह भी अनावृत होती रही है, मगर आदत में आ जाने के कारण लोगों का ध्यान उस पर इस तरह से नहीं जाता । मजे की बात है कि कोई ममता कुलकर्णी या पूजा बेदी हमेशा अकेली वस्त्रहीन नहीं होती या चुंबन दृश्य नहीं देती । कोई-न-कोई संजय दत्त, सुनील शेट्टी या सनी देओल भी इनके साथ होते हैं । मगर हमारा ऐतराज अक्सर ममता या पूजा पर ही होता है ।
हमारे संस्कारित-अनुकूलित दिल-दिमाग में क्यों यह ख्याल तक नहीं आता कि स्त्री मन को उत्तेजना व सुख देने के लिए मर्दानी देह को भी वैसे ही बेचा जाता है । अगर नहीं तो राहुल राय, कुमार गौरव या दिलीप कुमार की तुलना में धर्मेद्र, जैकी श्राफ या मिथुन को ही क्यों ज्यादा नंगाया जाता है । विभिन्न व्यवसायों से जुडे़ बहुत से पुरुष भी मॉडलिंग करते हुए कपडे़ उतारते होंगे, मगर हम सिर्फ वकील अंजलि कपूर को फाड़ कर खा जाने पर आमादा हैं । कपडे़ मिलिंद सोमन ने भी उतारे थे, पर हमने सारी बहादुरी मधु सप्रे पर हमला करने में ही खर्च कर दी । दरअसल ये सभी घटनाएं साफ-साफ बताती हैं कि हम स्त्री को एक संपूर्ण इंसान के रूप में नहीं देख पा रहे हैं ।
तिस पर और मज़ा यह कि हमारे कथित धार्मिक-आध्यात्मिक सुसंस्कृतजन कहते आए हैं कि हमारे यहां देह से ज्यादा महत्व आत्मा (?) को दिया जाता है । जबकि स्त्री (व पुरूष) को सारी सजाएं देह की देहरी लांघने पर ही दी जाती हैं । मन के तहखाने में कोई स्त्री या पुरूष किसी पराए के साथ या हजार साथी बदलकर रहें, कथित धर्म को कुछ लेना-देना नहीं, मगर बात जैसे ही देह तक आई तो स्पर्श भी दंडनीय है । इससे ज्यादा देह को महत्व देना और क्या होगा ? सारे नीतिगत मानदंड ही देह के आचरण पर टिके हैं ।
स्त्री को अपनी कई समस्याओं से जूझने-निपटने के लिए देह से मुक्त तो अब होना ही होगा और इसके लिए उसकी अनावृत देह को भी पुरूष अनावृत देह की तरह सामान्य जन की आदत में आ जाने वाली अनुत्तेजक अवस्था के स्तर पर पहुंचाना होगा । यह जरूर है कि कौन स्त्री कैसे रहना चाहती है, इसके फैसले उसके अपने होने चाहिएं। मानसिक-शारीरिक रूप से नाबालिग लड़कियों की बात छोड़ दें तो ममता कुलकर्णी या अंजलि कपूर के जीवन को तय करने वाला मैं या कोई और क्यों हो ? मानसिक बालिगपन कैसे तय हो, यह अलग से एक विचारणीय मुद्दा है ।
जहां तक पुरूष केंन्द्रित व्यवस्था का सवाल है, पुरूष कैसे प्रभु बना-इस पर बहुत कहा-सुना गया। मगर अब वह शायद इसलिए भी प्रभु है कि हमारे सामाजिक ढांचे में माता-पिता के बहुत सारे स्वार्थ जैसे वंश चलाना, कमाकर खिलाना, माँ-बाप का नाम रोशन करना, बुढापे का सहारा बनना आदि पुत्र से ही पूरे होते हैं । यह पुत्र की अस्मिता से प्रेम नहीं, बल्कि उसकी तात्कालिक/दीर्घकालिक उपयोगिता का लालच है, जो हमारे स्वार्थपरक सामाजिक,व्यक्तिगत संबंधों की कलई भी खोलता है । बदलते परिवेश में ज्यों-ज्यों स्त्रियां इस दृष्ठि से उपयोगी होती जाएंगी, मां-बाप का ‘प्यार’ स्वतः ही उन पर भी उमड़ने लगेगा । अब भी कई घरों में देखने को मिलता है कि ‘अव्यावहारिक’ व ‘नाकारा’ पुत्र उपेक्षित व अपमानित होते रहते हैं व ‘प्रैक्टीकल’ व ‘सोशल’ लड़कियों के गीत गाए जाते हैं ।
हां, उन विद्वानों-आलोचकों से बहस करना अभी भी बहुत मुश्किल है, जो विचार को बकरा मानकर कसाई की तरह एक ही ‘झटके’ में तय कर देते हैं कि कौन-सी मानसिकता विकृत है और कौन-सी ‘सुकृत’।
और यह रही ‘चोखेर बाली’ की माडरेटर, हमारी विशेष सम्मानित अतिथि सुजाता जी की उदघाटक टिप्पणी:-
संजय जी,
आपका सवाल बहुत जायज़ है लगभग वैसा ही जो गालियों पर लिखी गयी चोखेर बाली की पोस्ट्स मे था। स्त्री शरीर के डीसेक्शुअलाइज़ेशन के बारे मे एक पोस्ट राजकिशोर जी की भी पढियेगा । जैसा कि आपने लिखा भी है कि लेख 12-13 साल पुराना है, वह झलक मिलती है । अगर हम ग्लैमर की दुनिया की बात करें तो इस तरह की बातें अब गम्भीर तूफान नही उठाती, समाज मे भी एक अलहदा वर्ग है जहाँ ये बातें मायने नही रखती । स्क्रीन पर बहुत कुछ है जो कि अब हैरानी की बात नही है ।
लेकिन सोचने की बात है कि देह मुक्ति का मतलब स्त्री के लिए क्या है ? आपने लिखा:-
यह जरूर है कि कौन स्त्री कैसे रहना चाहती है , इसके फैसले उसके अपने होने चाहिएं.. सही बात है, लेकिन अभी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह फैसला लेते हुए कोई स्त्री अपने समाज, संस्कृति, परम्परा, परिवेश, ट्रेनिंग वगैरह से बिलकुल निरपेक्ष होती है ?
उसके अपने फैसले जैसी टर्म दर असल धोखा है क्योंकि बहुत से कारक आपके निर्णयों को प्रभावित कर रहे होते हैं । यह स्थिति पुरुष के साथ, किसी भी समाजिक प्राणी के साथ है, दिक्कत यह है कि स्त्री के साथ बहुत गम्भीर और योजनाबद्ध तरीके से है।
हमारी बेटी क्या चाहती है इसे प्रभावित करने मे हमारी और बाहर की दुनिया की बहुत बड़ी भूमिका है । शिक्षा , औपचरिक व अनौपचारिक, की अहम भूमिका है।
जिस तरह हम जेन्डरिंग की प्रक्रिया मे बदलाव नही लायेंगे तब तक स्त्री को भी यह भ्रम रहेगा कि उसकी "मुिक्त" के मायने ममता कुलकर्नी या मल्लिका शेरावत हो जाने के रास्ते से हासिल होंगे । वह यह कैसे जान पाएगी कि वह कहाँ कहाँ सिर्फ मोहरा बन रही है और मान रही है कि वह मुक्त हो रही है। आपके लेख से भी यह भ्रम पैदा हो रहा है कि मधु सप्रे हो जाना मुक्त हो जाना है।
देह-मुक्ति क्या है स्त्री के लिए, यह एक बड़ा सवाल है । आशा है आपके इस कॉलम के माध्यम से हम सभी स्त्री मुक्ति के अन्य पहलू से परिचित हो सकेंगे ।
शुभकामनाएँ !
हाँ, आपके लेख मे और उससे पूर्व मेरी टिप्पणी मे कुछ फ़ॉंट की गलतियाँ दिखाई दे रही हैं, शायद आपके यहाँ ऐसा न दिख रहा हो।
सुजाता
मित्रों, अब आपकी बारी है(इसी दौरान मैं भी अपनी बात रखूंगा) :-

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

#girls #rape #poetry #poem #verse # लड़कियां # बलात्कार # कविता # कविता #शायरी (1) अंतर्द्वंद (1) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अकेला (3) अनुसरण (2) अन्याय (1) अफ़वाह (1) अफवाहें (1) अर्थ (1) असमंजस (2) असलियत (1) अस्पताल (1) अहिंसा (3) आंदोलन (4) आकाश (1) आज़ाद (1) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (2) आत्मकथा (1) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आभास (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (4) इतिहास (2) इमेज (1) ईक़िताब (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (2) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उर्दू (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचा (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (2) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरपंथी (1) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कन्फ्यूज़न (1) कमज़ोर (1) कम्युनिज़्म (1) कर्मकांड (1) कविता (68) कशमकश (2) क़ागज़ (1) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) काव्य (5) क़िताब (1) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) ख़ाली (1) खीज (1) खेल (2) गज़ल (5) ग़जल (1) ग़ज़ल (28) ग़रीबी (1) गांधीजी (1) गाना (7) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (7) गुंडे (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (4) चलती-फिरती लाशें (1) चांद (2) चालाक़ियां (1) चालू (1) चिंतन (2) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छंद (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) छोटापन (1) छोटी कहानी (1) छोटी बहर (1) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जयंती (1) ज़हर (1) जागरण (1) जागरुकता (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) झूठ (3) झूठे (1) टॉफ़ी (1) ट्रॉल (1) ठग (1) डर (4) डायरी (2) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ड्रामा (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज (1) तंज़ (10) तमाशा़ (1) तर्क (2) तवारीख़ (1) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (1) तालियां (1) तुक (1) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दिशाहीनता (1) दुनिया (2) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (2) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) द्वंद (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) धोखेबाज़ (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़रिया (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नफरत की राजनीति (1) नया (3) नया-पुराना (1) नाटक (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नारा (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (3) निष्पक्षता (1) नींद (1) न्याय (1) पक्ष (1) पड़़ोसी (1) पद्य (3) परंपरा (5) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (8) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुण्यतिथि (1) पुरस्कार (2) पुराना (1) पेपर (1) पैंतरेबाज़ी (1) पोल (1) प्रकाशक (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फंदा (1) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) फ़ॉलोअर (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बच्चा (1) बच्चे (1) बजरंगी (1) बड़ा (2) बड़े (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बयान (1) बहस (15) बहुरुपिए (1) बात (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (2) बेईमानी (2) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (2) भगवान (2) भांड (1) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भाषणबाज़ (1) भीड़ (5) भ्रष्ट समाज (1) भ्रष्टाचार (5) मंज़िल (1) मज़ाक़ (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (5) ममता (1) मर्दानगी (1) मशीन (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) महापुरुष (1) महापुरुषों के दिवस (1) मां (2) मातम (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मायना (1) मासूमियत (1) मिल-जुलके (1) मीडिया का माफ़िया (1) मुर्दा (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रस (1) रहस्य (2) राज़ (2) राजनीति (5) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) रात (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (10) लघुव्यंग्य (4) लालच (1) लेखक (1) लोग क्या कहेंगे (1) वात्सल्य (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (87) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) व्याख्यान (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (55) शायरी ग़ज़ल (1) शेर शायर (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संजयग्रोवर (1) संदिग्ध (1) संपादक (1) संस्थान (1) संस्मरण (2) सकारात्मकता (1) सच (4) सड़क (1) सपना (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (37) सर्वे (1) सवाल (2) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साजिश (1) साभार (3) साहस (1) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (6) साहित्य में आतंकवाद (18) सीज़ोफ़्रीनिया (1) स्त्री-विमर्श के आस-पास (18) स्लट वॉक (1) स्वतंत्र (1) हमारे डॉक्टर (1) हयात (1) हल (1) हास्य (4) हास्यास्पद (1) हिंदी (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (2) हिन्दुस्तानी (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) हिम्मत (1) हुक्मरान (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) alone (1) ancestors (1) animal (1) anniversary (1) applause (1) atheism (1) audience (1) author (1) autobiography (1) awards (1) awareness (1) big (2) Blackmail (1) book (1) buffoon (1) chameleon (1) character (2) child (2) comedy (1) communism (1) conflict (1) confusion (1) conspiracy (1) contemplation (1) corpse (1) Corrupt Society (1) country (1) courage (2) cow (1) cricket (1) crowd (3) cunning (1) dead body (1) decency in language but fraudulence of behavior (1) devotee (1) devotees (1) dishonest (1) dishonesty (2) Doha (1) drama (3) dreams (1) ebook (1) Editor (1) elderly (1) experiment (1) Facebook (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) gandhiji (1) ghazal (20) god (1) gods of atheists (1) goons (1) great (1) greatness (1) harmony (1) highh (1) hindi literature (4) Hindi Satire (11) history (2) history satire (1) hollow (1) honesty (1) human-being (1) humanity (1) humor (1) Humour (3) hypocrisy (4) hypocritical (2) in the name of freedom of expression (1) injustice (1) inner conflict (1) innocence (1) innovation (1) institutions (1) IPL (1) jokes (1) justice (1) Legends day (1) lie (3) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lonely (1) love (1) lyrics (4) machine (1) master (1) meaning (1) media (1) mob (3) moon (2) mother (1) movements (1) music (2) name (1) neighbors (1) night (1) non-violence (1) old (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppotunism (1) oppressed (1) paper (2) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) perspective (1) plagiarism (1) poem (12) poetry (29) poison (1) Politics (1) poverty (1) pressure (1) prestige (1) propaganda (1) publisher (1) puppets (1) quarrel (1) radicalism (1) radio (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) reality (1) rituals (1) royalty (1) rumors (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (2) SanjayGrover (1) satire (30) schizophrenia (1) secret (1) secrets (1) sectarianism (1) senseless (1) shayari (7) short story (6) shortage (1) sky (1) sleep (1) slogan (1) song (10) speeches (1) sponsored (1) spoon (1) statements (1) Surendra Mohan Pathak (1) survival (1) The father (1) The gurus of world (1) thugs (1) tradition (3) trap (1) trash (1) tricks (1) troll (1) truth (3) ultra-calculative (1) unemployed (1) values (1) verse (6) vicious (1) violence (1) virtual (1) weak (1) weeds (1) woman (2) world (2) world cup (1)