पहला भाग
शब्दों को छोड़कर आइए अब ज़रा विज्ञापन की दुनिया का जायज़ा लें । नारी शरीरों की निर्वस्त्रता पर नारी संगठन और संस्कृतिदार पुरूष अपना विरोध कई तरह से प्रकट करते आए हैं व कर रहे हैं । मगर, कई बैंको और फाइनेंस कंपनियों के दर्जनों ऐसे विज्ञापन पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी पर देखने-सुनने-पढ़ने को मिलते हैं, जिनमें प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से दहेज व अन्य स्त्री विरोधी कुप्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता है ।
फिल्मों में देखिए । वहां भी यही हाल है । हमारा नायक अक्सर बहन, बेटी या पड़ोसन के लिए कहीं-न-कहीं से दहेज जुटाकर समस्या की जड़ में जाने की बजाय उसे टालने में अपनी सार्थकता समझता है । इक्का-दुक्का फिल्मों में ही लालची वर-पक्ष को दुत्कार कर किसी आदर्श पुरूष से कन्या का विवाह करने के उदाहरण देखने को मिलते हैं । मुझे याद नहीं कि कभी किसी नारी संगठन ने ऐसे विज्ञापनों या ऐसी फिल्मों का विरोध किया हो । स्त्री का आंचल पौन इंच भर ढलक जाने पर हाय-तौबा मचाने वाले सभ्यजनों को उक्त दृश्यों का विरोध करने के नाम पर क्यों सांप सूंघ जाता है ? क्या कभी किसी नारी संगठन का ध्यान इस ओर नहीं गया कि फिल्मों में किस तरह नारी के अंतर्वस्त्र ब्रेज़ियर को मज़ाक की वस्तु बनाया जाता रहा है (ताजा उदाहरण दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे) । नारी का अंतर्वस्त्र आखिर हास्य का साधन क्यों और कैसे हो सकता है ? क्या यह सोच अश्लील और विकृत नहीं है ?
इसके अलावा कई फिल्मों में दिखाया जाता है कि नायक नायिका के कम कपड़ों पर ऐतराज करता है और उसके भावुकतापूर्ण भाषण से प्रभावित होकर नायिका तुरंत अगले ही दृश्य में साड़ी में लिपटी दिखाई देती है । मगर, अगले गाने में ही वह नायक के साथ ही, और भी कम, लगभग नाममात्र के वस्त्रों में नायक से लिपटती-चिपटती और कामुकतापूर्ण झटके मारती दिखाई पड़ती है । तब न तो नायक ऐतराज करता है, न दर्शक बुरा मानते हैं । एक अन्य आम दृश्य में नायक द्वारा शरीर की मांग करने पर नायिका अपनी सभ्यता-संस्कृति को लेकर लंबा-चैड़ा भाषण देती है । तब नायक प्रभावित होता है और दोनों में ‘सच्चा प्रेम’ हो जाता है । अगले गाने में वे लगभग वस्त्रहीन नाचने लगते हैं । अब तक नायिका तो अपनी सभ्यता-संस्कृति को भूल ही चुकी होती है, दर्शक भी इसको लगभग धार्मिक फिल्म की ही तरह श्रद्वापूर्वक देखने लगते हैं । ज्यादातर फिल्मों में, नायक अक्सर कई दूसरी स्त्रियों के साथ लिपटता-चिपटता रहता है और नायिका अकेली पड़ी उसका इंतजार करती रहती है । जिन दूसरी स्त्रियों के साथ नायक लगभग केलिक्रीड़ा जैसे दृश्य प्रस्तुत करता है, क्या वे किसी की बहन-बेटियां नहीं होतीं ?
क्या हमारी सभ्यता-संस्कृति यही कहती है कि बस अपनी मां-बहन-बेटी को ही कै़द में बंद कर दो और फिर बाकी सभी स्त्रियों को अपनी जायदाद समझो । इन दृश्यों को देखकर हमारे धर्मध्वजियों व नारी संगठनों के माथे पर शिकन तक नहीं आती । उक्त तीनों नियमित दृश्यों में मौजूद विरोधाभास ही इस साज़िश की पोल खोल देते हैं कि किस तरह सभ्यता, संस्कृति, परिवार, धर्म आदि बडे़-बडे़ शब्दों की आड़ में स्त्री को गुलाम बनाए रखने की चालाकी खेली जा रही है । दिलचस्प बात यह है कि परिवार, मर्यादा इत्यादि का सारा ठेका देवी स्त्री को दिया गया है और दुनिया भर के अच्छे-बुरे सभी आनंद लेने की ’ज़िम्मेदारी ’देवता पुरूष को दी गई है ।
नारी मुक्ति के संदर्भ में एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि बहुत से पुरूष यह मानते और कहते हैं कि नारी तो मुक्त हो चुकी । अब बचा क्या है । वह नौकरी करती है, घूमती है, खाती-पीती है, फिल्म देखती है । पुलिस में, हवाई जहाज में, पानी के जहाज़ पर काम करती है अर्थात् पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है । ज़ाहिर है कि पुरूष इसे पूर्ण मुक्ति के संदर्भ में देखने की बजाय उसकी पूर्व स्थिति की तुलना में बेहतर वर्तमान स्थिति को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं । पहली बात तो यह है कि जब भी होगी नारी मुक्ति पुरूष वर्चस्व पर सिर्फ प्रतिक्रिया मात्र नहीं होगी । हां, जब नारी पुरूष से मुक्त हो जाएगी, तब ही वह अपने लिए वास्तविक मुक्ति की तलाश और कोशिश शुरू कर पाएगी। और इस प्रक्रिया में अभी खासा लंबा समय लगने वाला है ।
फिर भी, यहां हम पुरुष की तुलना में नारी की सही स्थिति को जानने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। क्या नारी आज भी अकेली फिल्म देखने जा सकती है? क्या वह पुरुष की तरह बेधड़क पार्क में घूम सकती है? क्या वह किसी अजनबी शहर में कमरा लेकर अकेली रह सकती है? क्या वह लड़कों की तरह बेतकल्लुफी से अपनी मित्रों के गले में हाथ डाले ‘हा हा हू हू’ करते हुए शहर की सड़कों-चौराहों पर घूम सकती है? क्या तपती-सुलगती गर्मी में पुरुष की ही तरह स्त्री भी वस्त्र उतार कर दो-घड़ी चैन की सांस ले सकती है? उक्त में से कोई भी कार्य करने पर समाज द्वारा उसे चालू, चरित्रहीन, वेश्या, सनकी, पागल या संदिग्ध-चरित्र करार दे दिए जाने की पूरी-पूरी संभावना है। सुनने-पढने में यह सब अटपटा, अजीब या अश्लील लग सकता है। मगर स्त्री भी उसी हांड़-मांस की इंसान है और बिलकुल पुरुष की तरह ही उसकी भी इच्छाएं और तकलीफें हैं। वह कोई मशीन या जानवर नहीं है, जिस पर सर्दी-गर्मी का कोई असर ही न होता हो।
मगर प्रतिक्रियावाद हमेशा ही अपने साथ कई विसंगतियों को भी लाता है। ऐसी ही एक ख़तरनाक विसंगति है यह कहा जाना कि ‘तुम स्त्री होकर भी स्त्री का विरोध करती हो’। यह एक नए किस्म का जातिवाद है। स्त्री भी एक इंसान है और पुरुष की तरह वह भी कभी सही तो कभी ग़लत होगी ही, मगर हम हमेशा नई-नई जातियां या वर्ण गढ़ते रहते हैं। यथा डाॅक्टर हमेशा डाॅक्टर को सही कहे, व्यंग्यकार व्यंग्यकारों पर व्यंग्य न लिखें, पत्रकार एकता ज़िन्दाबाद, दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, दलित दलित को ग़लत न कहें, वगैरहा-वगैरहा। पहले ही जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के झगड़ों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। मगर हम हैं कि मानते ही नहीं।
स्त्री की मुक्ति के साथ-साथ हमारे सामाजिक-नैतिक मानदंडों, साहित्यिक प्रतिबद्धताओं, कला संबंधी प्रतिमानों सहित हर क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव आ जाएंगे, जिसका फिलहाल हमें ठीक से अंदाज़ा भी नहीं है। हो सकता है कि आने वाले समय में हमें यह जानने को मिले कि जिसे हम स्त्री का स्वभाव समझ रहे थे, उसमें से अधिकांश उस पर जबरन थोपा गया था। ‘लोग क्या कहेंगे’ या ‘समाज क्या कहेगा’ आदि डरों की वजह से इन प्रक्रियाओं में अनुपस्थित रहने के बजाय हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने विवेक और तर्कबुद्धि से ही इस बाबत निर्णय लेने होंगे। इतिहास गवाह है कि जो लोग इन सामाजिक परिवर्तनों और सुधारों को धर्म व शास्त्र विरुद्ध कहकर इनकी आलोचना करते हैं, बदलाव आ चुकने और समाज के बहुलांश द्वारा इन्हें अपना चुकने के बाद वही लोग अगुआ बनकर इसका ‘क्रेडिट’ लेने की कोशिश भी करते हैं। विरोध, आलोचना और अकेले पड़ जाने के डर से अगर सभी चिंतक अपने चिंतन और उस पर पहलक़दमी करने के इरादों को कूड़े की टोकरी में डालते आए होते तो आदमी आज भी बंदर बना पेड़ों पर कूद रहा होता।
-संजय ग्रोवर
(समाप्त)
पहला भाग
{7 मार्च 1997 को अमरउजाला (रुपायन) में प्रकाशित}
शब्दों को छोड़कर आइए अब ज़रा विज्ञापन की दुनिया का जायज़ा लें । नारी शरीरों की निर्वस्त्रता पर नारी संगठन और संस्कृतिदार पुरूष अपना विरोध कई तरह से प्रकट करते आए हैं व कर रहे हैं । मगर, कई बैंको और फाइनेंस कंपनियों के दर्जनों ऐसे विज्ञापन पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी पर देखने-सुनने-पढ़ने को मिलते हैं, जिनमें प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से दहेज व अन्य स्त्री विरोधी कुप्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता है ।
फिल्मों में देखिए । वहां भी यही हाल है । हमारा नायक अक्सर बहन, बेटी या पड़ोसन के लिए कहीं-न-कहीं से दहेज जुटाकर समस्या की जड़ में जाने की बजाय उसे टालने में अपनी सार्थकता समझता है । इक्का-दुक्का फिल्मों में ही लालची वर-पक्ष को दुत्कार कर किसी आदर्श पुरूष से कन्या का विवाह करने के उदाहरण देखने को मिलते हैं । मुझे याद नहीं कि कभी किसी नारी संगठन ने ऐसे विज्ञापनों या ऐसी फिल्मों का विरोध किया हो । स्त्री का आंचल पौन इंच भर ढलक जाने पर हाय-तौबा मचाने वाले सभ्यजनों को उक्त दृश्यों का विरोध करने के नाम पर क्यों सांप सूंघ जाता है ? क्या कभी किसी नारी संगठन का ध्यान इस ओर नहीं गया कि फिल्मों में किस तरह नारी के अंतर्वस्त्र ब्रेज़ियर को मज़ाक की वस्तु बनाया जाता रहा है (ताजा उदाहरण दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे) । नारी का अंतर्वस्त्र आखिर हास्य का साधन क्यों और कैसे हो सकता है ? क्या यह सोच अश्लील और विकृत नहीं है ?
इसके अलावा कई फिल्मों में दिखाया जाता है कि नायक नायिका के कम कपड़ों पर ऐतराज करता है और उसके भावुकतापूर्ण भाषण से प्रभावित होकर नायिका तुरंत अगले ही दृश्य में साड़ी में लिपटी दिखाई देती है । मगर, अगले गाने में ही वह नायक के साथ ही, और भी कम, लगभग नाममात्र के वस्त्रों में नायक से लिपटती-चिपटती और कामुकतापूर्ण झटके मारती दिखाई पड़ती है । तब न तो नायक ऐतराज करता है, न दर्शक बुरा मानते हैं । एक अन्य आम दृश्य में नायक द्वारा शरीर की मांग करने पर नायिका अपनी सभ्यता-संस्कृति को लेकर लंबा-चैड़ा भाषण देती है । तब नायक प्रभावित होता है और दोनों में ‘सच्चा प्रेम’ हो जाता है । अगले गाने में वे लगभग वस्त्रहीन नाचने लगते हैं । अब तक नायिका तो अपनी सभ्यता-संस्कृति को भूल ही चुकी होती है, दर्शक भी इसको लगभग धार्मिक फिल्म की ही तरह श्रद्वापूर्वक देखने लगते हैं । ज्यादातर फिल्मों में, नायक अक्सर कई दूसरी स्त्रियों के साथ लिपटता-चिपटता रहता है और नायिका अकेली पड़ी उसका इंतजार करती रहती है । जिन दूसरी स्त्रियों के साथ नायक लगभग केलिक्रीड़ा जैसे दृश्य प्रस्तुत करता है, क्या वे किसी की बहन-बेटियां नहीं होतीं ?
क्या हमारी सभ्यता-संस्कृति यही कहती है कि बस अपनी मां-बहन-बेटी को ही कै़द में बंद कर दो और फिर बाकी सभी स्त्रियों को अपनी जायदाद समझो । इन दृश्यों को देखकर हमारे धर्मध्वजियों व नारी संगठनों के माथे पर शिकन तक नहीं आती । उक्त तीनों नियमित दृश्यों में मौजूद विरोधाभास ही इस साज़िश की पोल खोल देते हैं कि किस तरह सभ्यता, संस्कृति, परिवार, धर्म आदि बडे़-बडे़ शब्दों की आड़ में स्त्री को गुलाम बनाए रखने की चालाकी खेली जा रही है । दिलचस्प बात यह है कि परिवार, मर्यादा इत्यादि का सारा ठेका देवी स्त्री को दिया गया है और दुनिया भर के अच्छे-बुरे सभी आनंद लेने की ’ज़िम्मेदारी ’देवता पुरूष को दी गई है ।
नारी मुक्ति के संदर्भ में एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि बहुत से पुरूष यह मानते और कहते हैं कि नारी तो मुक्त हो चुकी । अब बचा क्या है । वह नौकरी करती है, घूमती है, खाती-पीती है, फिल्म देखती है । पुलिस में, हवाई जहाज में, पानी के जहाज़ पर काम करती है अर्थात् पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है । ज़ाहिर है कि पुरूष इसे पूर्ण मुक्ति के संदर्भ में देखने की बजाय उसकी पूर्व स्थिति की तुलना में बेहतर वर्तमान स्थिति को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं । पहली बात तो यह है कि जब भी होगी नारी मुक्ति पुरूष वर्चस्व पर सिर्फ प्रतिक्रिया मात्र नहीं होगी । हां, जब नारी पुरूष से मुक्त हो जाएगी, तब ही वह अपने लिए वास्तविक मुक्ति की तलाश और कोशिश शुरू कर पाएगी। और इस प्रक्रिया में अभी खासा लंबा समय लगने वाला है ।
फिर भी, यहां हम पुरुष की तुलना में नारी की सही स्थिति को जानने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। क्या नारी आज भी अकेली फिल्म देखने जा सकती है? क्या वह पुरुष की तरह बेधड़क पार्क में घूम सकती है? क्या वह किसी अजनबी शहर में कमरा लेकर अकेली रह सकती है? क्या वह लड़कों की तरह बेतकल्लुफी से अपनी मित्रों के गले में हाथ डाले ‘हा हा हू हू’ करते हुए शहर की सड़कों-चौराहों पर घूम सकती है? क्या तपती-सुलगती गर्मी में पुरुष की ही तरह स्त्री भी वस्त्र उतार कर दो-घड़ी चैन की सांस ले सकती है? उक्त में से कोई भी कार्य करने पर समाज द्वारा उसे चालू, चरित्रहीन, वेश्या, सनकी, पागल या संदिग्ध-चरित्र करार दे दिए जाने की पूरी-पूरी संभावना है। सुनने-पढने में यह सब अटपटा, अजीब या अश्लील लग सकता है। मगर स्त्री भी उसी हांड़-मांस की इंसान है और बिलकुल पुरुष की तरह ही उसकी भी इच्छाएं और तकलीफें हैं। वह कोई मशीन या जानवर नहीं है, जिस पर सर्दी-गर्मी का कोई असर ही न होता हो।
मगर प्रतिक्रियावाद हमेशा ही अपने साथ कई विसंगतियों को भी लाता है। ऐसी ही एक ख़तरनाक विसंगति है यह कहा जाना कि ‘तुम स्त्री होकर भी स्त्री का विरोध करती हो’। यह एक नए किस्म का जातिवाद है। स्त्री भी एक इंसान है और पुरुष की तरह वह भी कभी सही तो कभी ग़लत होगी ही, मगर हम हमेशा नई-नई जातियां या वर्ण गढ़ते रहते हैं। यथा डाॅक्टर हमेशा डाॅक्टर को सही कहे, व्यंग्यकार व्यंग्यकारों पर व्यंग्य न लिखें, पत्रकार एकता ज़िन्दाबाद, दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, दलित दलित को ग़लत न कहें, वगैरहा-वगैरहा। पहले ही जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के झगड़ों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। मगर हम हैं कि मानते ही नहीं।
स्त्री की मुक्ति के साथ-साथ हमारे सामाजिक-नैतिक मानदंडों, साहित्यिक प्रतिबद्धताओं, कला संबंधी प्रतिमानों सहित हर क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव आ जाएंगे, जिसका फिलहाल हमें ठीक से अंदाज़ा भी नहीं है। हो सकता है कि आने वाले समय में हमें यह जानने को मिले कि जिसे हम स्त्री का स्वभाव समझ रहे थे, उसमें से अधिकांश उस पर जबरन थोपा गया था। ‘लोग क्या कहेंगे’ या ‘समाज क्या कहेगा’ आदि डरों की वजह से इन प्रक्रियाओं में अनुपस्थित रहने के बजाय हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने विवेक और तर्कबुद्धि से ही इस बाबत निर्णय लेने होंगे। इतिहास गवाह है कि जो लोग इन सामाजिक परिवर्तनों और सुधारों को धर्म व शास्त्र विरुद्ध कहकर इनकी आलोचना करते हैं, बदलाव आ चुकने और समाज के बहुलांश द्वारा इन्हें अपना चुकने के बाद वही लोग अगुआ बनकर इसका ‘क्रेडिट’ लेने की कोशिश भी करते हैं। विरोध, आलोचना और अकेले पड़ जाने के डर से अगर सभी चिंतक अपने चिंतन और उस पर पहलक़दमी करने के इरादों को कूड़े की टोकरी में डालते आए होते तो आदमी आज भी बंदर बना पेड़ों पर कूद रहा होता।
-संजय ग्रोवर
(समाप्त)
पहला भाग





