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सोमवार, 27 सितंबर 2010

क्षमा

रात भर इस कशमकश में रहा कि इस वक्त जैसी मनःस्थिति में हूँ, क्या ठीक से अपनी बात रख पा रहा हूँ !? एक अपराध-बोध ने और घेर लिया कि कहीं ब्लॉगिंग जैसे अत्यंत लोकतांत्रिक और संभावनाओं भरे माध्यम का कोई बेज़ा इस्तेमाल करके किसी तरह की ग़लत नज़ीर तो नहीं पेश कर रहा !?
इस लेख-श्रृंखला को यहीं समाप्त कर रहा हूँ ।


-संजय ग्रोवर

रविवार, 26 सितंबर 2010

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया

आईए.......2
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दलों, वादों, धाराओं आदि द्वारा बड़े किए गए, खड़े किए गए और पाले-पोसे गए बुद्विजीवियों की मजबूरी समझी जा सकती है। हाई कमांड के होते उन्हें ज़िंदगी-भर कार्य-कर्त्ता ही रहना होता है, वे कभी (अगर उनके अपने कुछ विचार हों भी) विचारकर्त्ता नहीं बन सकते। दल, वाद या धारा से कार्यकर्त्ता का रिश्ता कुछ-कुछ ऐसा होता है जैसा एक रुढ़ सोच के तहत चलने वाले परिवार में एक धाकड़-मर्द पति से एक पर्दानशीं पत्नी का होता है। पर्दे के भीतर से ‘हां’ मे सिर हिलाने की आज़ादी भर होती है।
विचित्र विडम्बना है कि दल, मठ, गुट आदि-आदि की सरपरस्ती या छत्रछाया में कोई यह तक मशहूर करने में सफ़ल हो जा सकता है कि तसलीमा नसरीन तो वास्तव में स्त्री-विरोधी हैं। सारा संघर्ष तो दरअसल हमने किया था 2010 में जबकि यह चालाक तसलीमा 2005 में ही क्रेडिट ले उड़ी। अब मौज-मजे की बारी आयी है तो तसलीमा का कहीं पता नहीं चल रहा और मजबूरी में हमें मज़े करने पड़ रहे हैं। इतनी धोखेबाज़ हैं तसलीमा।
कॉलोनी के बेईमान दुकानदार के लिए सुविधा हमेशा इसी में होती है कि उसके प्रतिद्वंदी दुकानदार भी बेईमान हों। ईमानदार प्रतिद्वंदी उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द होता है। उसके लिए रास्ता अकसर यही होता है कि या तो वो ईमानदार दुकानदार भी बेईमान बन जाए या फ़िर ‘सीधी तरह से न माने तो’, उसे किसी भी तरह बेईमान ‘घोषित’ और ‘सिद्व’ कर दिया जाए। फ़िर भी न माने तो और भी रास्ते हैं। (अपने समय की कई प्रखर प्रतिभाओं को ‘पागल’ सिद्ध कर दिए जाने को हमने सिर्फ़ सुना ही नही देखा भी है)
ठीक इसी तरह एक कट्टरपंथ का अस्तित्व भी दूसरे कट्टरपंथ के रहते ही संभव होता है। यह देखना दिलचस्प भी होता है और दुखद भी कि एक सांप्रदायिकता दूसरी सांप्रदायिकता (अगर प्रतिद्वंदी सांप्रदायिकता भी धर्मनिरपेक्षता का पोज़ बनाकर आ जाए तो और भी आसानी से) को तो स्वीकार करने पर तैयार हो जाती है मगर ‘इंसानियत’ शब्द का ज़िक्र भी आने से वह या तो हंसी उड़ाना शुरु कर देती है या इंसानियत की बात करने वाले को सांप्रदायिक सिद्ध करने पर तुल जाती है।
सुबह एफ एम पर मुझे अपना प्रिय गीत सुनने को मिला:

तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा

मगर मैं सोचता रहा कि हिंदी फ़िल्मी गीत जिनमें से हम पता नहीं कैसी-कैसी मिसालें ढूंढने में कामयाब हो रहते हैं, उस खज़ाने में उपरोक्त अर्थ वाले और कितने गीत हैं ?

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया

मुझे नहीं पता कि साहिर नास्तिक थे या आस्तिक और ‘मालिक’ का ‘अस्तित्व’ इस गीत में उन्हांेने अपनी मर्ज़ी से स्वीकार किया है या किसी मजबूरी में यह शब्द इस्तेमाल किया है मगर अपने अनुभव से इतना ज़रुर कह सकता हूं कि नास्तिक तो मुझे आज तक ऐसा कोई नहीं मिला जिसे यह गीत बुरा लगता हो।
मगर क्या आप इससे मिलते-जुलते अर्थ के भी पाँच और हिंदी फ़िल्मी गीत बता सकते हैं !?

इंसानियत जो सारे मसलों का हल बन सकती है उस पर बात करने में इतनी हिचकिचाहट क्यों !?

(जारी)

आईए अफ़वाह फ़ैला दें कि विष्णु नागर सांप्रदायिक हैं

अभी कहीं पढ़ा कि दारुल उलूम देवबंद ने कहा है कि कंडोम का इस्तेमाल ईश्वरीय नियमों के खि़लाफ़ है। मेरा ख़्याल है कि यह बात सही ही होगी, क्योंकि ख़ुदा, ईश्वर या गॉड उसे जो भी कह लो, उस बेचारे को (क्योंकि कहना आपको है, उसने तो अपना नाम किसी को बताया नहीं) क्या पता कि क्या उसके नियमों के खि़लाफ़ है और क्या अनुकूल, क्योंकि ये नियम उसने ख़ुद तो बैठकर बनाए नहीं।
अब जैसे कंडोम की ही बात करें। यह तो इतनी ताज़ा खोज है कि ऐसा कुछ भी बदमाश इंसान कर सकता है, इसकी तो उसे शायद आशंका भी नहीं रही होगी, तो वह इसके खि़लाफ़ नियम क्या ख़ाक बनाता ? और अगर ईश्वर-अल्लाह एक ही नाम है तो ऐसा तो वह कर ही नहीं सकता था कि हिंदुओं-ईसाईयों वगैरह के लिए अलग नियम बनाता और मुसलमानों के लिए अलग। उसने बनाए होते तो सबके लिए एक से ही नियम बनाए होते। उसकी नज़र में भेद नहीं हो सकता है, यह बात तो भेद करने वाले ख़ुद भी मानने को तैयार नहीं होते।

‘ईश्वरीय नियम’ शीर्षक वाला विष्णु नागर का यह व्यंग्य आज (26-09-2010) के जनसत्ता रविवारी में छपा है। यूं तो पूरा व्यंग्य ही दिलचस्प, पठनीय और जैसी कि नागर जी की पुरानी ‘कमी’ है, आसानी से समझ में आ जाने भाषा में है और तार्किकता से भरपूर है। मगर जैसी कि बदनीयती की बदौलत कुपाठ करके किसी को ‘कुछ’ घोषित कर देने की हमारी अमूर्त्त और पुरानी परम्परा है सो हम पूरा व्यंग्य पढ़ें ही क्यों !? जबकि दो ही पैराग्राफ़ों में नागर जी को सांप्रदायिक सिद्ध करने का भरपूर मसाला मौजूद है।

आईए कोशिश करें।

बोल्ड की गई शुरुआती पंक्तियां देखिए। हम कह सकते है कि वे दारुल उलूम देवबंद यानि मुसलमानों के पीछे क्यों पड़े हैं ? क्या उन्हें हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियां नहीं दिखाईं देतीं (यहां भाषा में थोड़ा बनावटी गुस्सा डाला जा सकता है)!? (अब थोड़ा अतिश्योक्ति में चले जाएं तो) नागर जी हर वक्त मुसलमानों के पीछे क्यों पड़े रहते हैं ? हद होती है सांप्रदायिकता की ! नागरजी, आपकी संवेदना के तंतु, जंगली जंतुओं जैसे हो गए हैं। (अब ज़रा धर्मनिरपेक्षता की अपनी महान मोटी समझ का इस्तेमाल करें) नागरजी ने कहा है कि दारुल उलूम देवबंद ने कहा है कि कंडोम का इस्तेमाल ईश्वरीय नियमों के खि़लाफ़ है। नागर जी ! आप दारुल उलूम देवबंद को ईश्वरीय नियमों के अधीन क्यों लाना चाहते हैं !? क्या आप चाहते हैं कि सारे मुसलमान हिंदू बन जाएं !? हद है !? (थोड़ा और बदमाशी पर उतर आएं) नागर जी, क्या आप हिंदू-मुसलमानों को लड़ाना चाहते हैं !? शर्मनाक ! शर्मनाक !
(बात बनी नहीं, थोड़ा और बदमाशी पर उतरें, बेशर्मी दिखाएं) नागर जी! अगली पंक्तियों में तो हद ही कर दी है आपने ! देखिए तो : हिंदुओं-ईसाईयों वगैरह के लिए अलग नियम बनाता और मुसलमानों के लिए अलग। क्या आप हिंदुओं-ईसाईयों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ एकजुट नहीं कर रहे! बाज आ जाईए।
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ऐसा नहीं है कि बाक़ी के व्यंग्य में ऐसी ‘संभावनाएं’ नहीं हैं। बल्कि इतनी हैं कि ‘संभावनाओं’ की तलाश में जुटी दुर्भावनाएं चाहें तो पूरा व्यंग्य ही ले उड़ सकती हैं। बहरहाल, मेरे लिए संभावना यह निकली कि कई दिन से इसपर लिखना चाह रहा था, नागर जी के लेख ने उकसा दिया। आप इसे ‘प्रेरित कर दिया’ भी पढ़ सकते हैं। यूं तो, जितना नागर जी को पढ़ा है, उनकी समझ के बारे में यही समझ बनी है कि यह लेख उनके हत्थे चढ़ भी गया तो पढ़ कर वास्तविक मंतव्य को तुरंत समझ जाएंगे और धीरे से मुस्करा भर देंगे। फ़िर भी संभावनाओं का क्या भरोसा, कब किसके सर चढ़कर बोलने लगें। कलको मुझपर कुछ लिख दिया तो !? ‘बड़े’ लेखक हैं, मेरी कौन सुनेगा ? मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि ’वही होगा जो ईश्वर को मंजूर होगा।’
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बहरहाल, मेरे लिए सवाल यह है कि मार नकली धर्मनिरपेक्षता जमाकर लेने के बावजूद कुछ लोगों का पेट और मन इतना क्यों नहीं भरता कि सामने वाले को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करना ज़रुरी हो जाता है !? मामला क्या है ? क्या इसके पीछे सिर्फ़ धर्मनिरपेक्षता की मोटी समझ ही कार्य करती है या चालाकी और अवसरवादिता की भी बड़ी भूमिका होती है ? जो जावेद अख़्तर और साजिद रशीद, हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथिओं की छातियों को एक ही ऊंगली से ठोंकते हैं वे हमारे तथाकथित धर्मनिरपेक्षों की समझ में कम क्यों आते हैं !?
अगले दो-चार दिन मैं आपसे इसी पर बतियाना चाहता हूँ, मगर छोटे-छोटे पैराग्राफ़ में। खुलकर अपनी बात कहें। न मुझे बख़्शें न किसी और को। और पिछले अनुभवों को देखते हुए मुझे आपसे यह निवेदन करने की ज़रुरत नहीं लगती कि भाषा अशालीन और भड़काऊ न हो। आप सभी समझदार लोग हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

लेखन में रामराज्य

‘रामराज्य‘ रोके से न रूकता था। आए ही जा रहा था। एक विशेष राजनीतिक दल को इसे लाने का ठेका दिया गया था। व्यंग्यकार चिंतित थे कि राम राज्य आ गया तो लिखने को क्या रह जाएगा। और इसी चिंता में लिखे जा रहे थे। ऐसी ही किसी ‘सिचुएशन‘ में एक महिला ने अपनी सहेली से पूछा कि वह स्वेटर इतनी तेज़ रफ्तार से क्यों बुन रही है। महिला ने जवाब दिया कि ऊन बहुत थोड़ी बची है। और इसके खत्म हो जाने के पहले ही वह स्वेटर पूरा कर लेना चाहती है। इसके अलावा भी व्यंग्यकारों ने देख लिया था कि महाकवि ने भी ग्रंथ रचते समय गर्भवती पत्नियों को फिंकवा देने या छल से राजाओं को मार गिराने जैसे ‘निगेटिव प्वांइट्स‘ को ज़्यादा तूल नहीं दिया था। जरूर ग्रंथ लिखते समय महाकवि की मानसिकता ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा‘ और ‘आप भला तो जग भला‘ वाली रही होगी। व्यंग्यकारों ने निर्णय लिया कि एक पहुंचे हुए व सफल लेखक की यही पहचान है।
ऊपर से एक बार एक बड़ी और पुरानी इमारत को गिराए जाने के पश्चात् एक बड़े संपादक के गांव में भैंसें पूर्ववत् पगुरा रही थीं। ऐसे में व्यंग्यकार धोबी बनकर भी अपनी धुलाई करवाने का झंझट क्यों पालते? उनमें लगभग सभी गणितवीर थे। राजा, उसके दरबारी विद्वानों और कागज़ी व्यवस्था पर उंगली उठाने से ज्यादा आसान उन्हें अकेले धोबी की गरदन पकड़ना लगा। अतः उन्होंने सारी दुनिया छोड़कर एक धोबी के पीछे पड़ जाने का साहसिक निर्णय लिया। साथ ही वे नवोत्सुकों को व्यंग्य की परिभाषा समझाने लग पड़े। इनके जीते जी नवोत्सुकों को सदा नवोत्सुक ही रहना पड़ता था बशर्ते कि वे (नवोत्सुक) जीते जी न मर जाएं।

इधर अखबारों की चोटियां और दाढ़ियां निकल आईं और मुखपृष्ठों के माथों पर अपनी-अपनी परंपराओं के प्रतीक-चिन्ह पोते जाने लगे। देश में राजनेता इतने हो गए थे कि व्यंग्यकारों को रोज़ एक नया राक्षस मार गिराने का आनंद आ रहा था। इसलिए उन्होंने बाकी सभी विषयों से ध्यान हटाकर सारा यहीं केंद्रित कर दिया था। राक्षस चींटियों की तरह मर रहे थे। कलम के ब्रह्मास्त्रों के आगे उनकी एक न चलती थी। फिर मरे हुए राक्षसों को बटोरकर उनके पुतले बनाए जाते और उनकी छाती पर पैर रखकर हंसते हुए खिंचाई गई शब्दों की फोटुएं अपने-अपने कालमों में चेप दी जातीं।

इधर किसी सिरफिरे ने बताया कि जिन चींटों से आप पुरस्कार, पैसा व प्रतिष्ठा खींच रहे हैं वे उन्हीं चींटियों के धुले व फूले हुए संस्करण हैं जिन्हें आपने मरा समझ लिया है। मगर फालतू वक्त किसके पास था जो ऐसी गैर-पारंपरिक बातों पर ध्यान देता। फिर भी उनमें से कुछेक जागरूक थे। उन सबने एक-एक व्यंग्य उस सिरफिरे पर लिखा और फिर से रामराज्य की कल्पनाओं में खो गए।

और इतना खोए कि सो गए।


-संजय ग्रोवर


(हंस जनवरी, 1996 में प्रकाशित एवं व्यंग्य-संकलन ‘बीसवीं सदी की चर्चित व्यंग्य-रचनाएं‘ में संकलित)

गुरुवार, 24 जून 2010

टीवी से पहले, टीवी के बाद


सारे के सारे बादल चाँद के पीछे जा छुपे थे। हर सितारा सूरज की तरह चमकता मालूम होता था। सुबह का सूरज आँखों को शीतलता प्रदान कर रहा था। लू के थपेड़े ऐसे लगते थे जैसे माँ बचपन में सुलाते वक्त लोरी गाते हुए थपकियाँ दिया करती थी। गली की लड़कियां जो मुझे दूर से आते देखकर प्रत्यक्षतः पिछली दीवार पर लगे राजेश खन्ना के फटे-पुराने फिल्मी पोस्टर को देखने को वरीयता देती थी आज मुझे नमकीन निगाहों से निहार रही थीं। मेरे पड़ोसी का पालतू कुत्ता जो प्रति पदचाप पाँच गुर्राहट की दर से मेरा मुकाबला करता था आज मेरी गन्ध मात्र पर ऐसे पूंछ हिला रहा था जैसे ऐतिहासिक फिल्मों के दृश्यों में राजा महाराजाओं के सिरहाने खड़ी दासियाँ पंखे झुलाया करती थीं।
यह एकाएक सबको क्या हो गया था?
दरअसल मैं कल रात पहली बार टीवी पर आया था।
कविताएं तो मैंने पहले भी बहुत कहीं थी। साहित्य सृजन तो मैंने हमेशा ही इसी तरह किया था। और कल रात टीवी पर जो रचनाएं मैंने पढ़ीं उन्हें कल से पहले लोगों तक पहुंचाने के लिये मुझ इतनी ही मेहनत करनी पड़ती थी जितनी एक फिक्रमंद बाप को अपने बीमार बच्चे के हाथ-पैर पकड़ कर, नाक बन्द करके कड़वी दवा पिलाने में करनी पड़ती है। लेकिन आज लोगों की बदली हुई (पोज़ीटिव) निगाहें देखकर ही अंदाजा हो गया था कि रचनाओं का रसास्वादन उन्होंने कैसे किया था। लगता था जैसे सभी रात को रसगुल्ला खाकर सोए हों।
फिर भी लोगों के मूड में एकाएक आया यह परिवर्तन बेहद रहस्यमयी था। यह कमाल मेरी रचनाओं का था या दूरदर्शन की साख का। हालांकि दोनों ही अपने-अपने रूपों में बिल्कुल पहले जैसे थे। न मैंने अपनी रचनाओं में कोई परिवर्तन किया था न दूरदर्शन ने अपनी दृष्टि में। फिर इन दोनों के विलय से ऐसा चमत्कारी रासायनिक परिवर्तन कैसे हो गया था। इस महत्वपूर्ण रासायनिक फार्मूले को मैं शीघ्रातिशीघ्र समझकर सुरक्षित रख लेना चाहता था।
फिर मैंने एक-एक कर इन सभी घटनाओं पर दोबारा दृष्टि डालना शुरू किया जो मेरे टीवी स्क्रीन की छत तक पहुँचने के दौराने-सफर बीच सीढ़ियों में घटी थी। मेरी स्मृति के पर्दे पर सारे दृश्य टीवी के बिना सेंसर किए गए विज्ञापनों की तरह तेजी से तैरने लगे। जैसे मंचीय मुद्राएं सीखते समय मुझे किन मुश्किलात और कैसी मानसिक जद्दोज़हद से गुजरना पड़ा था। कितनी उम्र गुज़र जाने पर मेरी समझ में आ सका था कि साहित्यकार होने के साथ-साथ साहित्यकार दिखना भी जरूरी है। तब कैसे-कैसे मैंने पता लगाया था कि साहित्यिक चेहरे को फोटोजेनिक-टच देने के लिए सौन्दर्य-प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियों (अर्थात् गुटों) में से किसके उत्पादन सबसे सस्ते, असरकारक और टिकाऊ हैं।

कैसे मैंने आम जनता का प्यारा कवि बने रहने के गुर सीखे थे और जहां जनता जैसा चाहती थी वहां वैसा ही कहना-लिखना शुरू कर दिया था। साथ ही नियमित अंतराल के बाद बात-बेबात जनता की तारीफ करना शुरू कर दिया था। कैसे मैंने पद-प्रतिष्ठा-पैसा-पहुँच-पौरूष-प्रचार इन छः तत्वों के संयोग से सम्मेलनों को सफल आयोजनों में ढालना सीखा और तब ‘‘तू मुझे बुला मैं तुझे बुलाऊँ‘‘ का सफल सूत्र मेरी बीमार होती साहित्यिक सेहत के लिये रामबाण औषधि सिद्ध हुआ था। मुझे यह भी याद है कि अपने विचारों और संवेदनाओं को स्थगित करना मैंने उन लोगों से सीखा था जिन्हें यह सब करने और सीखने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। (क्योंकि वहाँ न तो विचार थे न संवेदनाएं)।

शहर में अगर मेरे होने के बावजूद उभरता कोई साहित्यकार किसी बड़े प्रकाशन में अपनी रचना तीन साल के कड़े संघर्ष के बाद छपवा पाता तो मैं तीन दिन उसके साथ चैराहे -चैराहे घूमने जितनी मामूली मेहनत से ही मशहूर कर देता कि ‘‘ये आज जो कुछ है इन्हीं की (मेरी) बदौलत हैं।‘‘ जब कि अन्दर ही अन्दर खुद मैं मरा जा रहा होता था कि जल्द से जल्द इसकी स्थिति साहित्य में सचमुच सुदृढ़ हो जाए ताकि इसके सहारे मेरी भी दो-चार रचनाएं बड़े अखबार में स्थान पा सकें। खैर! जो संपादक मेरे दोस्त बन गए थे, ख़ुद ही बता देते थे कि आज तुम्हारी रचना के विरोध में 20-25 जो ख़त आए थे, हमने रद्दी में फिंकवा दिए हैं, अब तुम क्षतिपूर्ति के लिए इतने ही ख़त प्रशंसा में अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से लिखवाकर हमें दे दो। मैं कहता, मैं तो 50 लिखवा कर ले आया हूं, चलो आधे अगली बार लगा देना। इस मामले में जिन संपादकों के स्वभाव और विचार मुझसे भिन्न होते, उनके मैं स्टाफ़ को सैट कर लेता। स्टाफ भी अगर हरामी होता तो मैं कुछ और कमीनी तरकीबें इस्तेमाल कर लेता था। आपको नहीं बताऊंगा।
तत्पश्चात् कैसे मैंने नेताओं से सम्पर्क सांठा। कैसे अधिकारियों से रिश्ता गाँठा। कैसे लोगों, विचारों, किताबों और अखबारों को दलों, वादों, पंथों, सम्प्रदायों, धाराओं, धर्मों वगैरह के हिसाब से बाँटा। कैसे-कैसे उपायों से विरोधियों का पत्ता काटा। कैसे मैंने अपने से मिलती- जुलती विचारधारा के लोगों को छाँटा।
अर्थात् ऐसी तमाम तात्कालिक, त्वरित तपस्याओं के बाद मेरे मन के मुर्गे की बांग बुद्धत्व को प्राप्त हुई और उसने जब चाहे तब अपनी इच्छा पर साहित्यिक सुबह का सूर्योदय सुलगाने का हुनर हासिल कर लिया। यानि अब इतना हुआ कि मुझे व मेरी बातों को ‘‘बच्चा है‘‘ कहकर अपने अनुभवों की नाक पर से मक्खी की तरह उड़ा देने वाले ‘बाबागण‘ मुझ पर नज़र पड़ते ही ‘‘भाई साहब हम तो आपके ही बच्चे हैं। ज़रा नज़र रखना।‘‘ जैसे दूधिया वाक्यों की (दु)र्गन्ध से मुझे आकर्षित करने के उपाय खोजने लगते। रिश्तों के विलोमान्तर का मध्यान्तर अन्ततः अपनी मौत आप मर गया था।
इस प्रकार आपने देखा कि देखने में छोटी-छोठी लगने वाले बातें महसूस करने में कित्ती बड़ी-बड़ी हो सकती हैं। खुद मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या बताऊँ और क्या छोडूँ? क्यों बताऊँ या क्यों छोड़ूं! लेकिन एक बात साफ कर दूं। जो बालबुद्धि साहित्य-छौने बल खा-खाकर बौराए जा रहे हों कि सस्ते में सफलता के सूत्रों की सन्दूकची हाथ लग गई है, वे ज़रा अपने उत्साह की अंगीठी को ठंडा कर लें। ज़माना एक बार फिर आगे निकल चुका है। टाप-लेवल साहित्यिक स्थानों की आई.ए.एस. परीक्षाओं में उपरोक्त सूत्र अब प्रिलिमिनरी परीक्षा की कुंजी से ज्यादा महत्व नहीं रखते। वक्त और परिस्थितियों के साथ-साथ सफलता के सूत्र भी बदल जाते हैं। नई परिस्थितियों एवं नई चुनौतियों के लायक फार्मूले गढ़ने के लिये प्रतिभा और सृजनात्मकता की जरूरत होती है। जिसमें होती है उसे ऐसे लेख पढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती।
और जो साहित्यशावक ईमानदारी वगैरह के आले में पड़े हों उन्हें भी कहना ज़रूरी समझता हूं कि जो ‘‘मैं‘‘ टीवी में आता हूँ वह ‘‘मैं‘‘ वह ‘‘मैं‘‘ नहीं हूँ जो ‘‘मैं‘‘ अखबार में होता हूँ। इसलिये मेरे अखबार वाले ‘‘मैं‘‘ में मीन मेख निकालने से मेरे टीवी वाले ‘‘मैं‘‘ पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। बाकी फिर देख ही ली जाएगी। हाँ।
हाँ, होते हैं दो एक साहित्यकार ऐसे भी जो जैसे जीवन में रहते हैं वैसे ही अखबार में होते हैं और वैसे ही टीवी पर आते हैं। लेकिन उनकी आमद पर न तो गली की लड़कियाँ आभारी होती हैं न पड़ौसी का ‘‘पप्पी‘‘ ताली बजाता है। अब मेरी क्या मजाल कि मैं गली की लड़कियों या पड़ौसी के पप्पी के बारे में अखबार में भी कहूँ:

वो कि जिसकी अपनी कोई अहमियत बाक़ी नही,
उनकी नज़रों में उसी की अहमियत है दोस्तो।

-संजय ग्रोवर

(23.06.1995 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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