रविवार, 26 सितंबर 2010

आईए अफ़वाह फ़ैला दें कि विष्णु नागर सांप्रदायिक हैं

अभी कहीं पढ़ा कि दारुल उलूम देवबंद ने कहा है कि कंडोम का इस्तेमाल ईश्वरीय नियमों के खि़लाफ़ है। मेरा ख़्याल है कि यह बात सही ही होगी, क्योंकि ख़ुदा, ईश्वर या गॉड उसे जो भी कह लो, उस बेचारे को (क्योंकि कहना आपको है, उसने तो अपना नाम किसी को बताया नहीं) क्या पता कि क्या उसके नियमों के खि़लाफ़ है और क्या अनुकूल, क्योंकि ये नियम उसने ख़ुद तो बैठकर बनाए नहीं।
अब जैसे कंडोम की ही बात करें। यह तो इतनी ताज़ा खोज है कि ऐसा कुछ भी बदमाश इंसान कर सकता है, इसकी तो उसे शायद आशंका भी नहीं रही होगी, तो वह इसके खि़लाफ़ नियम क्या ख़ाक बनाता ? और अगर ईश्वर-अल्लाह एक ही नाम है तो ऐसा तो वह कर ही नहीं सकता था कि हिंदुओं-ईसाईयों वगैरह के लिए अलग नियम बनाता और मुसलमानों के लिए अलग। उसने बनाए होते तो सबके लिए एक से ही नियम बनाए होते। उसकी नज़र में भेद नहीं हो सकता है, यह बात तो भेद करने वाले ख़ुद भी मानने को तैयार नहीं होते।

‘ईश्वरीय नियम’ शीर्षक वाला विष्णु नागर का यह व्यंग्य आज (26-09-2010) के जनसत्ता रविवारी में छपा है। यूं तो पूरा व्यंग्य ही दिलचस्प, पठनीय और जैसी कि नागर जी की पुरानी ‘कमी’ है, आसानी से समझ में आ जाने भाषा में है और तार्किकता से भरपूर है। मगर जैसी कि बदनीयती की बदौलत कुपाठ करके किसी को ‘कुछ’ घोषित कर देने की हमारी अमूर्त्त और पुरानी परम्परा है सो हम पूरा व्यंग्य पढ़ें ही क्यों !? जबकि दो ही पैराग्राफ़ों में नागर जी को सांप्रदायिक सिद्ध करने का भरपूर मसाला मौजूद है।

आईए कोशिश करें।

बोल्ड की गई शुरुआती पंक्तियां देखिए। हम कह सकते है कि वे दारुल उलूम देवबंद यानि मुसलमानों के पीछे क्यों पड़े हैं ? क्या उन्हें हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियां नहीं दिखाईं देतीं (यहां भाषा में थोड़ा बनावटी गुस्सा डाला जा सकता है)!? (अब थोड़ा अतिश्योक्ति में चले जाएं तो) नागर जी हर वक्त मुसलमानों के पीछे क्यों पड़े रहते हैं ? हद होती है सांप्रदायिकता की ! नागरजी, आपकी संवेदना के तंतु, जंगली जंतुओं जैसे हो गए हैं। (अब ज़रा धर्मनिरपेक्षता की अपनी महान मोटी समझ का इस्तेमाल करें) नागरजी ने कहा है कि दारुल उलूम देवबंद ने कहा है कि कंडोम का इस्तेमाल ईश्वरीय नियमों के खि़लाफ़ है। नागर जी ! आप दारुल उलूम देवबंद को ईश्वरीय नियमों के अधीन क्यों लाना चाहते हैं !? क्या आप चाहते हैं कि सारे मुसलमान हिंदू बन जाएं !? हद है !? (थोड़ा और बदमाशी पर उतर आएं) नागर जी, क्या आप हिंदू-मुसलमानों को लड़ाना चाहते हैं !? शर्मनाक ! शर्मनाक !
(बात बनी नहीं, थोड़ा और बदमाशी पर उतरें, बेशर्मी दिखाएं) नागर जी! अगली पंक्तियों में तो हद ही कर दी है आपने ! देखिए तो : हिंदुओं-ईसाईयों वगैरह के लिए अलग नियम बनाता और मुसलमानों के लिए अलग। क्या आप हिंदुओं-ईसाईयों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ एकजुट नहीं कर रहे! बाज आ जाईए।
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ऐसा नहीं है कि बाक़ी के व्यंग्य में ऐसी ‘संभावनाएं’ नहीं हैं। बल्कि इतनी हैं कि ‘संभावनाओं’ की तलाश में जुटी दुर्भावनाएं चाहें तो पूरा व्यंग्य ही ले उड़ सकती हैं। बहरहाल, मेरे लिए संभावना यह निकली कि कई दिन से इसपर लिखना चाह रहा था, नागर जी के लेख ने उकसा दिया। आप इसे ‘प्रेरित कर दिया’ भी पढ़ सकते हैं। यूं तो, जितना नागर जी को पढ़ा है, उनकी समझ के बारे में यही समझ बनी है कि यह लेख उनके हत्थे चढ़ भी गया तो पढ़ कर वास्तविक मंतव्य को तुरंत समझ जाएंगे और धीरे से मुस्करा भर देंगे। फ़िर भी संभावनाओं का क्या भरोसा, कब किसके सर चढ़कर बोलने लगें। कलको मुझपर कुछ लिख दिया तो !? ‘बड़े’ लेखक हैं, मेरी कौन सुनेगा ? मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि ’वही होगा जो ईश्वर को मंजूर होगा।’
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बहरहाल, मेरे लिए सवाल यह है कि मार नकली धर्मनिरपेक्षता जमाकर लेने के बावजूद कुछ लोगों का पेट और मन इतना क्यों नहीं भरता कि सामने वाले को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करना ज़रुरी हो जाता है !? मामला क्या है ? क्या इसके पीछे सिर्फ़ धर्मनिरपेक्षता की मोटी समझ ही कार्य करती है या चालाकी और अवसरवादिता की भी बड़ी भूमिका होती है ? जो जावेद अख़्तर और साजिद रशीद, हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथिओं की छातियों को एक ही ऊंगली से ठोंकते हैं वे हमारे तथाकथित धर्मनिरपेक्षों की समझ में कम क्यों आते हैं !?
अगले दो-चार दिन मैं आपसे इसी पर बतियाना चाहता हूँ, मगर छोटे-छोटे पैराग्राफ़ में। खुलकर अपनी बात कहें। न मुझे बख़्शें न किसी और को। और पिछले अनुभवों को देखते हुए मुझे आपसे यह निवेदन करने की ज़रुरत नहीं लगती कि भाषा अशालीन और भड़काऊ न हो। आप सभी समझदार लोग हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर

9 टिप्‍पणियां:

  1. समस्‍या धर्म (और अगर इस्‍लाम के लिये मज्‍़हब कहना जरूरी हो तो मज्‍़हब) की नहीं संस्‍कृति की है, उस संस्‍कृति की जो आज ठेकेदार बनी हुई है धर्म परिभाषित करने की। ये व्‍याख्‍यावीर और बयानवीर अगर धर्म को समझते होते तो न ऐसी व्‍याख्‍यायें प्रस्‍तुत करते न ऐसे बयान देते। इनके कृत्‍यों के जो परिणाम होते हैं वो किसे भुगतने होते हैं। नीरज भाई का एक खूबसूरत शेर है:
    आप तो सो जायेंगे महफ़ूज़ बंगलों में कहीं
    खाक कर देंगी शहर, अल्‍फाज़ की चिंगारियॉं।
    अब अगर अल्‍फ़ाज़ पर ऐसे लोगों का अधिकार हो जाये जो शहर जलाने में ही अपना स्‍वार्थ देखते हैं तो .......

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  2. अगले भाग का लिंक :

    http://samwaadghar.blogspot.com/2010/09/blog-post_3030.html

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  3. नागर जी न केवल बहुत अच्छे व्यंगकार हैं बल्कि बेहद संवेदंशील कवि भी हैं । और ज़माने से कुरितियों के खिलाफ लिखते आ रहे हैं । उनकी ईशवर की कहानियाँ आपने पढ़ी ही होंगी । अब उससे वे सांप्रदायिक सिद्ध नही हुए तो इससे क्या होंगे । बहरहाल आपका भी यह व्यंग्य अच्छा है ।
    और पूरा न पढने की बात तो पूरा कभी किसी को पढा ही नही गया , न चार्वाक को , न मार्क्स को , न बुद्ध को , न भिष्म साहनी को , न सआदत हसन मंटो को , न इस्मत चुगताई को , न ही धर्मग्रंथों को ... और भैया आजकल तो ब्लॉग भी पूरा नही पढते लोग ।

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  4. @शरद कोकास
    Aapki sabhi baatoN se sahmati hai...Pura na padhne ko lekar kiye gaye Maasum vyangya se bhi..:)

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  5. संजय भाई, आप दिन ब दिन बहुत शातिर होते जा रहे हो, धार्मिक लोगों का कुछ तो ख्याल किया करो। :)

    हुजूर, वह लघु कथा कहाँ है?

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  6. लेखको को लिखते वक्त समाज का ध्यान रखना चाहिये खासकर संप्रदाय के मामले में...उनके लेखन से समाज में सुधार हो न कि अव्यवस्था...

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  7. लेख मैने पढ़ा नहीं.मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कोई भी फतवा जारी करने वाले अधिकारी को अनावश्यक सवालों पर चाहे गये फतवों से पेर्हेज करना कहिये .वोह इंकार नहीं कर सकता परंतु स्वविवेक समझा कर मसले से टाल तो सकता है .जिसके कारण अनावश्यक विवाद ही पैदा ना हों.एक स्टिंग ऑपरेशन में फतवे बिकते हुवे भी दिखाए गये है.
    और भी गम हैं कोम में फतवे जारी करने के सिवा( साहिर साब से माफ़ी)

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  8. संजय की दिव्य दृष्टि ने क्या क्या न गुल खिलाये !

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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