TUMHARI KHOJ ME said...
बीमारी खोजन की खातिर तो हम यहां पहुंचल बा बबुआ। इ जो खिसियाए रहो हो, इ कि दरकार न बा। हम तुहार दुसमन न बा। और कीडा कव्वा हम तोहके न बोले रहिन इ तो मुहावरे हैं, अगर ठेस पहुंची हो तो बाइज्जत हम शर्मिंदा बा। पर बबुआ अब ऐंठ छोड दो और नाराजगी भी, क्योंकि हम इहां झगडा करन खातिर नहीं आइल। जब समय आइ तो पहचान भी हो जाइ और पोस्ट भी लग जाइ । और हम इहां अभिमन्यु को बचान खातिर आई शहीद करन खातिर नाहीं। अगर अब भी लगत है कि हम तो पे वार करत हैं तो इ तुहार बुद्वि, पर बबुआ आपन दिमाग और ऊर्जा अच्छे काम खातिर लगा। और ई गुल्लक, तिजोरी की बात छोडि के आपन हाथ फैलाओ और दुनिया को थोडे बडे चश्मे से देखन की कोसिस करो। इ दुनिया बहुत खूबसूरत बा।
(पिछली पोस्ट पर अब तक की आखि़री टिप्पणी)
No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
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बुधवार, 5 अगस्त 2009
शुक्रवार, 17 जुलाई 2009
‘‘वेलकम टू बिच्छू.काम ’’! पर आप हैं कौन !?
संजय ग्रोवर को गूगल में डालकर सर्च करता हूं। चैथे पृष्ठ पर एक पंक्ति दिखाई पड़ती है ‘दरबारी दमनकारियों के लिए पांच ग़ज़लें’। लिंक पर क्लिक करता हूं। एक पृष्ठ खुलता है। एक सज्जन का फोटो है और मेरी 5 ग़ज़लें मेरे नाम के साथ अपने संपादकीय के रुप में दी गयी हैं। ऊपर वाले बार में लिखा है ‘वैलकम टू बिच्छू. काम’। मगर उसके बाद का कोई लिंक नहीं खुलता। जैसे कि ‘काँटेक्ट अस’, ‘अबाउट अस’। उन साहब का नाम पता भी कहीं दिखाई नहीं देता। इस साइट में ही कुछ प्राॅबलम है या मेरा पी.सी. बिगड़ गया है !?क्या आप मेरी मदद करेंगे ? लिंक है:-http://74.125.153.132/search?q=cache:wg3ja_nMYrsJ:www.bichhu.com/index.php%3Fnews%3D1208+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%AF+%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%B0&cd=36&hl=en&ct=clnk&gl=in
हिम्मत से सच बात कहो तो बुरा मानते हैं लोग, रो-रो के कहने की हमें आदत नहीं रही। "बिच्छू डॉट कॉम" द्वारा लगातार सत्ता एवं व्यवस्था विरोधी खबरें एवं संपादकीय लिखने से सत्ता के दलालों और सत्ता के साकेत में बैठे लोगों के भाट और चारण लगातार मेरे बारे में विष वमन कर रहे हैं। कुछ लोगों को अखबार की आर्थिक व्यवस्था को लेकर चिंता है, तो कुछ महानुभावों को मेरे एवं मेरे परिवार के बारे में जानने की इच्छा है। मुख्यमंत्री निवास के एक अफसर को तो सिर्फ और सिर्फ मेरे बारे में जानने की जिज्ञासा है। ऐसे सभी महानुभावों के लिए संजय ग्रोवर की पांच गजलें प्रस्तुत हैं संपादकीय के रूप में...
एक...
कोई भी तयशुदा किस्सा नहीं हूं
किसी साजिश का मैं हिस्सा नहीं हूं
किसी की छाप अब मुझ पर नहीं है
मैं ज्यादा दिन कहीं रुकता नहीं हूं
तुम्हारी और मेरी दोस्ती क्या
मुसीबत में, मैं खुद अपना नहीं हूं
मुझे मत ढूंढना बाजार में तुम
किसी दुकान पर बिकता नहीं हूं
मुझे देकर न कुछ तुम पा सकोगे
मैं खोटा हूं मगर सिक्का नहीं हूं
तुम्हें क्यूं अपने जैसा मैं बनाऊं
यकीनन जब मैं खुद तुम सा नहीं हूं
लतीफा भी चलेगा गर नया हो
मैं हर इक बात पर हंसता नहीं हूं
जमीं मुझको भी अपना मानती है
कि मैं आकाश से टपका नहीं हूं
कोई भी तयशुदा किस्सा नहीं हूं
किसी साजिश का मैं हिस्सा नहीं हूं
किसी की छाप अब मुझ पर नहीं है
मैं ज्यादा दिन कहीं रुकता नहीं हूं
तुम्हारी और मेरी दोस्ती क्या
मुसीबत में, मैं खुद अपना नहीं हूं
मुझे मत ढूंढना बाजार में तुम
किसी दुकान पर बिकता नहीं हूं
मुझे देकर न कुछ तुम पा सकोगे
मैं खोटा हूं मगर सिक्का नहीं हूं
तुम्हें क्यूं अपने जैसा मैं बनाऊं
यकीनन जब मैं खुद तुम सा नहीं हूं
लतीफा भी चलेगा गर नया हो
मैं हर इक बात पर हंसता नहीं हूं
जमीं मुझको भी अपना मानती है
कि मैं आकाश से टपका नहीं हूं
दो...
जाने मैं किस डर में था
फिर देखा, तो घर में था
जो ढब कट्टर लोगों का है
वही कभी बंदर में था
लोग नए थे बात पुरानी
क्या मैं किसी खण्डहर में था
बच निकला उससे, तो जाना
वो भी इसी अवसर में था
उनके जख्म सजे थे तन पर
मेरा दर्द जिगर में था
जाने मैं किस डर में था
फिर देखा, तो घर में था
जो ढब कट्टर लोगों का है
वही कभी बंदर में था
लोग नए थे बात पुरानी
क्या मैं किसी खण्डहर में था
बच निकला उससे, तो जाना
वो भी इसी अवसर में था
उनके जख्म सजे थे तन पर
मेरा दर्द जिगर में था
तीन...
जिस समाज में कहना मुश्किल है बाबा
उस समाज में रहना मुश्किल है बाबा
तुम्हीं हवा के संग उड़ो पत्तों की तरह
मेरे लिए तो बहना मुश्किल है बाबा
जिस गरदन में फंसी हुई हों आवाजें
उस गरदन में गहना मुश्किल है बाबा
भीड़ हटे तो हम भी देखें सच का बदन
भीड़ को तुमने पहना, मुश्किल है बाबा
अंधी श्रद्धा को, भेड़ों को, तोतों को
गर विवेक हो, सहना मुश्किल है बाबा
गिरे उठें, फिर चलें कि चलते ही जाएं
रुकें, सड़े तो सहना मुश्किल है बाबा
जिस समाज में कहना मुश्किल है बाबा
उस समाज में रहना मुश्किल है बाबा
तुम्हीं हवा के संग उड़ो पत्तों की तरह
मेरे लिए तो बहना मुश्किल है बाबा
जिस गरदन में फंसी हुई हों आवाजें
उस गरदन में गहना मुश्किल है बाबा
भीड़ हटे तो हम भी देखें सच का बदन
भीड़ को तुमने पहना, मुश्किल है बाबा
अंधी श्रद्धा को, भेड़ों को, तोतों को
गर विवेक हो, सहना मुश्किल है बाबा
गिरे उठें, फिर चलें कि चलते ही जाएं
रुकें, सड़े तो सहना मुश्किल है बाबा
चार...
लड़के वाले नाच रहे थे लडक़ी वाले गुमसुम थे
याद करो उस वारदात में अक्सर शामिल हम-तुम थे
बोलचाल और खाल-बाल जो झट से बदला करते थे
सोच-समझ की बात करें तो अभी भी कुत्ते की दुम थे
बाबा, बिक्री, बड़बोलेपन, चमत्कार थे चौतरफा
तर्क की बातें करने वाले सच्चे लोग कहां गुम थे!
उनपे हंसो जो बुद्ध कबीर के हश्र पे असर हंसते हैं
ईमां वाले लोगों को तो अपने नतीजे मालुम थे
अपनी कमियां झुठलाने को तुमने हमें दबाया था
जब हम खुद को जान चुके तब हमने जाना या तुम थे
लड़के वाले नाच रहे थे लडक़ी वाले गुमसुम थे
याद करो उस वारदात में अक्सर शामिल हम-तुम थे
बोलचाल और खाल-बाल जो झट से बदला करते थे
सोच-समझ की बात करें तो अभी भी कुत्ते की दुम थे
बाबा, बिक्री, बड़बोलेपन, चमत्कार थे चौतरफा
तर्क की बातें करने वाले सच्चे लोग कहां गुम थे!
उनपे हंसो जो बुद्ध कबीर के हश्र पे असर हंसते हैं
ईमां वाले लोगों को तो अपने नतीजे मालुम थे
अपनी कमियां झुठलाने को तुमने हमें दबाया था
जब हम खुद को जान चुके तब हमने जाना या तुम थे
पांच..
तुम देखना पुरानी वो चाल फिर चलेंगे
जिसकी लुटी है इज्जत उसको ही सजा देंगे
इक बेतुकी रवायत ऊपर से उनकी फितरत
तकलीफ भी वो देंगे, बदला भी वही लेंगे
वरना वो तुझको हंसके कमजोर ही करेंगे
उन पर जरूर हंसना जो आदतन हंसेंगे
जब आएगी मुसीबत टीवी के शहर वाले
झांकेंगे खिड़कियों से, घर से नहीं निकलेंगे
ये शे"र क्या हैं प्यारे, सब भर्ती का सामां हैं
गर पांच नहीं होंगे तो कैसे ये छपेंगे
वो ही है नूर वाले जो अक्ल के है अंधे
जलवा भी वही लेंगे फतवा भी वही देंगे।
तुम देखना पुरानी वो चाल फिर चलेंगे
जिसकी लुटी है इज्जत उसको ही सजा देंगे
इक बेतुकी रवायत ऊपर से उनकी फितरत
तकलीफ भी वो देंगे, बदला भी वही लेंगे
वरना वो तुझको हंसके कमजोर ही करेंगे
उन पर जरूर हंसना जो आदतन हंसेंगे
जब आएगी मुसीबत टीवी के शहर वाले
झांकेंगे खिड़कियों से, घर से नहीं निकलेंगे
ये शे"र क्या हैं प्यारे, सब भर्ती का सामां हैं
गर पांच नहीं होंगे तो कैसे ये छपेंगे
वो ही है नूर वाले जो अक्ल के है अंधे
जलवा भी वही लेंगे फतवा भी वही देंगे।
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साजिश
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साभार
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साहस
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साहित्य
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हिंदी
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हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद
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हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद
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हिंसा
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