बुधवार, 14 दिसंबर 2011

नाथूराम, अहिंसा और इतिहास

लघुकथा


जब तक अंग्रेज भारत में रहे, नाथूराम का आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहा। इतना कि देश में किसी को पता भी नहीं था कि यहा कोई नाथूराम रहता है।
अंग्रेजों के जाते ही और भारत के आज़ाद होते ही नाथूराम मुखर होकर आंदोलित हो गया। उसकी पिस्तौल एकाएक जागरुक हो गयी। गोलियां आज़ादी के गीत गाने लगीं। जिस नाथूराम ने कभी किसी अंग्रेज का बाल भी बांका नहीं किया था उसने बिना किसी सुरक्षा के चलने वाले निहत्थे बूढ़े पर गोलियां दाग़ दीं।
इस तरह नाथूराम इतिहास में शामिल हो गया।
नाथूराम के जीवन से हमें शिक्षा मिलती है कि इतिहास तो कमज़ोर आदमी का मकान है, इसमें कभी भी घुसपैठ की जा सकती है।
यह शिक्षा भी मिलती है कि इतिहास में शामिल होने के लिए हमें कुछ भी कर डालना चाहिए।
नाथूराम का जीवन बहुत शिक्षाप्रद रहा। संभवतः आज भी बहुत-से आंदोलनकारी उसके जीवन से शिक्षा लेते होंगे।

किसी ताज़ा आंदोलन में कोई नाथूराम गांधी टोपी लगाए अहिंसा पर उपदेश देता मिल जाए तो भी कोई हैरानी की बात न होगी।



-संजय ग्रोवर

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

‘दिस इज़ नॉट अ शॉप, दिस इज़ अ मूवमेंट’


व्यंग्य

दोस्त ने अचानक गाड़ी रोकी।
एक शानदार शोरुम। नीचे छोटा-छोटा लिखा है ‘आंदोलन का सामान’।
दुकान के नाम के नीचे यह भी लिखा है, ‘दिस इज़ नॉट अ शॉप, दिस इज़ अ मूवमेंट’
‘यार, बेटा कई दिन से ज़िद कर रहा है, आंदोलन करना है।’ 
‘अच्छा ! पहले नही बताया ? पहले भी करता है ?’
‘नहीं यार...... कहता है पापा, सारे दोस्त करते है, बस मै ही.......मुझे भी बड़ा सॉरी फ़ील हुआ यार.....’
‘करोगे कहां ? इतनी जगह है...
‘छत पर कर लेगे यार, खुल्ली छत है, इसके दोस्तों ने ही तो आना है बस...
‘अच्छा, जहां पिछले साल इल्लीगल कमरा डाला था !?’
‘चल आ सामान  लें लें, भीड़ बहुत है.......’
‘जी सर, कितना बड़ा आंदोलन करना है, सामान लिखा दीजिए लड़के को’, दुकानदार को फुरसत नही है।
‘भाईसाहब, बड़ा आदोलन करना हो तो कितनी देर मे सामान मिल जाएगा ?’, एक ग्राहक पूछ रहा है।
‘कितने लोग हैं, कहां करना है, एरिया कितना बड़ा है?’
‘कम से कम बीस हज़ार तो होंगे..... ग्राहक डिटेल देता है।
'दो घण्टे मे सब मिल जाएगा...’
‘पचास टोपी, पचास झण्डे, टैटू का सामान, दो डीजे.....’दोस्त लिखवा रहा है।
सामने सुंदर, बड़े-से शोकेस में ग़ज़ब की हलचल है।
‘यह क्या भाईसाहब, ये सचमुच के आदमी हैं या कठपुतलियां हैं ?’, मैं डरते-डरते पूछता हूं।
‘खा गए न चक्कर, भाईसाहब, ये ऐसी कठपुतलियां हैं जो सारा आदोलन ख़ुद ही कर लेतीं हैं, आपको कुछ नहीं करना, बस चाबी भरनी है। कोई कह दे नकली आंदोलन है तो पैसा वापिस।’
‘इसमे मीडिया भी है, भाईसाहब ?’
‘लो जी ! मीडिया के बिना कैसे चलेगा ? आप भी यार....अरे मीडिया ही तो वो चाबी है जिससे पूरा आंदोलन चलता है।’
दोस्त ने सामान ले लिया है।

‘यह नोट नहीं चलेगा’, दुकानदार एक नोट लौटा रहा है।
'क्यों!?'
‘यह देखिए, इस आदमी ने टोपी नहीं लगा रखी, अब यह नोट नहीं चलते,’ वह कारण बताता है, ‘नोट में टोपी साफ़ दिखनी चाहिए, आदमी भले कम दिखे’ वह समझाता भी है।

हम लौट रहे हैं।
‘चलो कुछ तो चेंज आएगा, यार।’
‘मोटिव क्या है आंदोलन का ?’
‘वो तो मैने पूछा नही यार....आज-कल बहुत लोग करते हैं, होली-दीवाली की तरह हो गया है......बच्चों का मन आता है तो कर लेते हैं मिल-जुलके.....’
‘बेटी क्या कर रही है आज-कल ?’
‘बेटी को भी करवाएगे, एकदम से आंदोलन तो नहीं, अभियान से शुरु कराएंगे.....लड़कियों के आंदोलन पर तो अब सरकार भी फैसिलिटी दे रही है। बड़ा भारी डिस्काउंट है।’
गाड़ी धीमी होती है...एक शोरुम के सामने भीड़ जमा है, पास जाकर पता चलता है कि लोग छोटे-बड़े सामान लेकर चुपचाप अपने घर जा रहे है...
‘क्या कोई सेल लगी है?’, मै पूछता हूं...
‘अरे भाई, अदंगा चल रहा है...’
‘अ-दंगा ! यह क्या होता है !’
‘नया कांसेप्ट आया है, लोग दुकान को घेरकर बैठ जाते हैं, सारे रास्ते बंद कर देते हैं, खाना-पीना छोड़ देते हैं, दुकानदार से कहते हैं कि अपना सारा सामान अपनी मर्ज़ी से शांति और अहिंसा के साथ हमें दे दो। हमारे बताए समय के अंदर अगर न दिया तो इस  दुकान पर वो होगा जो पहले कभी नही हुआ....’
दोस्त दुनियादार आदमी है, उसके पास सारी नवीनतम सूचनाएं रहतीं हैं।
‘फिर वह बेमन से सामान निकालकर अपनी मर्ज़ी से दे देता है....’ दोस्त बात पूरी करता है।
‘चेंज तो आ रहा है, यार....’
‘मझे चक्कर आ रहा है यार, चल घर चलकर थोड़ा आराम करते हैं।’

-संजय ग्रोवर 

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

दहेज नहीं होती दुलहन


अरसा हुआ ‘संवादघर’ ने औरतो की ख़बर नहीं ली।
परसों जब जगजीत सिंह पर लिखे अपने एक लेख को ढूंढ रहा था तो यह कटिंग भी मिल गयी।
दिए गए विषय या मांग पर लिखना मेरे लिए बहुत मुश्क़िल काम रहा है। प्रस्तुत लेख एक ऐसी ही रचना है। फ़िलहाल टाइपिंग का मन नहीं है तो सीधे कटिंग लगा रहा हूं:









मंगलवार, 23 अगस्त 2011

एक आज़ाद ग़ज़ल



हुकूमत करना चाहो हो..तो हिम्मत क्यूं नहीं करते ?
सियासत तुमको करनी है तो सीधे क्यूं नहीं करते ?

अगर बदमाश है राजा, तो तुम ही कौन-से कम हो ?
कभी फ़रियाद करते हो, कभी छाती पे चढ़ते हो

ये कैसी हड़बड़ी के गड़बड़ी का इल्म होता है !
ठहर के कैसे सोचोगे ? बहुत जल्दी में लगते हो

कभी घुसते हो चिलमन में, कभी चढ़ते हो टोपी पर
जो समझाया है औरों को, कहो ख़ुद भी समझते हो !

बग़ावत लफ्ज़ सुनने में, बहुत अच्छा तो लगता है
फिर उसके बाद जो होता है उसको भी समझते हो ?

हमारा नाम आगे करके हमसे ही नहीं पूछा
कभी इसके अलावा और कुछ तुम कर भी सकते हो ?

किसी की जान जाती है, तुम्हारी शान की ख़ातिर
ज़रा भी ख़ुद नहीं बदले, न जाने क्या बदलते हो !

-संजय ग्रोवर

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

आह आरक्षण! वाह मेरिट!

क्या हम 20-30 मिनट के लिए उनका गला छोड़ सकते हैं जिन्हें नौकरियों और कुछ दूसरी जगहों पर आरक्षण मिलता है ? मेरा ख़्याल है इतना तो हम अफ़ोर्ड कर ही सकते हैं। जीवन के दूसरे क्षेत्रों में आईए ज़रा। याद करेंगे तो ज़रुर आपको ऐसा कोई न कोई संगी-साथी, जान-पहचान वाला याद आ जाएगा जो मुश्क़िल से पास होता था मगर आज सफ़ल बिज़नेसमैन है। या कोई ऐसा जो पढ़ाई में बस ठीक-ठाक था मगर आज नामी-गिरामी वक़ील है। सवाल है कि जीवन के दूसरे क्षेत्रों में जिनका कि फ़लक आरक्षण वाले क्षेत्रों से बहुत बड़ा है, वहां ‘मेरिट’ किस तरह काम करती है ? सिर्फ़ मेरिट ही काम करती है या कुछ और भी काम करता है ? या वहां सफ़लता को ही ‘मेरिट’ मान लिया जाना चाहिए ?
साहित्य में आईए। पत्र-पत्रिका में छपने के लिए किसीको अपनी मार्कशीट नहीं दिखानी होती। फ़िर क्या योग्यता है पत्र-पत्रिका में छपने की ? कया आप यह मानने को तैयार हैं कि वे सभी लोग जो रोज़ाना पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं, उन सभी लोगों से ज़्यादा ‘मेरिटवान’ होते हैं जो कभी-कभार छपते हैं ?
फ़िल्म बनाने के लिए कौन-सी ‘मेरिट’ आवश्यक है ? आखि़र सभी निर्देशक पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट से तो नहीं आए होते ! अगर ‘मेरिट’ का पंगा खड़ा कर दिया जाए तो बहुत-से सफ़ल निर्देशकों को घर बैठना नहीं पड़ जाएगा ? फ़िल्म सिर्फ़ 'मेरिट’ से नहीं, तरह-तरह के संबंधों, जुगाड़ों और पैसा जुटाने की क्षमता की वजह से भी बनती है। और पूरी बन चुकने के बाद सेंसर के पास जाती है। अगर ज़िंदगी में 'मेरिट’ ही सब कुछ हुआ करती तो कई बड़े अभिनेताओं के बच्चे इण्डस्ट्री छोड़ चुके होते।
क्या आप मानते हैं कि आज के जितने सफ़ल उद्योगपति हैं सबके सब वाणिज्य विषय में अच्छे नंबरों के साथ पास हुए होंगे !? एक सफ़ल उद्योगपति या एक सफ़ल राजनेता की सफ़लता में ‘मेरिट’ का कितना हाथ होता है और छल-कपट-प्रबंधन का कितना, इस विषय में हम कुछ देर बैठकर सोच लेंगे तो आसमान नहीं टूटकर गिर जाएगा !
नौकरियों में कौन-सी ‘मेरिटरानी’ सारी दौड़ें जीतती आयी है ? चमचे तरक्की पा जाते हैं और मेरिटचंद पप्पू बने देखते रहते हैं। किसीके पास अप्रोच है, किसीके पास पैसा है, किसीके पास और कुछ है, आप पड़े रटते रहो ‘मेरिट-मेरिट’। जिनके पास ‘मेरिट’ के नाम पर डिग्रियां हैं भी, कैसे पता करोगे, असली हैं कि नकली ? पढ़कर मिली हैं या नकलकर के ?
और बाबागण ! इन्हें प्रवचन देने के लिए किस डिग्री-डिप्लोमा की दरकार है ?
रोज़ना धरने-प्रदर्शन-अनशन वगैरह होते हैं। इसके लिए कौन-सा डिप्लोमा ज़रुरी है ? जिसे चार लोग स्वीकृत कर लेते हैं वही जाकर बैठ जाता है। और तो और पूरे देश की जनता का प्रतिनिधित्व करनेवाली सिविल सोसायटी में भी जो पांच लोग बिठाए जाते हैं, उनके जैसी ‘मेरिट’ वाले पूरे देश में तो क्या उनके आस-पास ही काफ़ी निकल सकते हैं। बताओ, ‘मेरिट’ को कौन-से थर्मामीटर से नापोगे ?
क्या अपने यहां ‘मेरिट’ का सफ़लता से इतना ही साफ़-सीधा संबंध  है जैसा दिखाने की कोशिश की जा रही है !?

-- संजय ग्रोवर

शनिवार, 30 जुलाई 2011

मेरिट-स्थान और पलट-वॉक

दो व्यंग्य

1. मेरिट-स्थान

मेरे सपनों में एक जगह है साहब। सपनों में ही होगी साहब। मुझे तो बिलकुल विश्वास नहीं होता कि ऐसी जगह, ऐसी व्यवस्था हक़ीकत में भी हो सकती है। वहां मैं देखता हूं कि कई चैनल हैं और बड़ी-बड़ी बहसें चलतीं हैं। वक्ता डायस ठोंक-टोंक कर बोल रहे हैं। कह रहे हैं कि मेरिट के आधार पर नियुक्तियां होंगी तो उस जगह सब ठीक हो जाएगा। आज-कल उन्हें बिछुड़ी हुई मेरिट बहुत याद आने लगी है। 10-20 साल पहले मैंने सपने में देखा था कि आरक्षण नाम का एक जलजला उस जगह आया था और बहुत-से लोगों के विचार अचानक से शीर्षासन करने लगे थे। मेरिट और मानवता की बातें शुरु हो गयीं। उससे पहले जितने भी सपने मैंने देखे उनमें होता यही था कि लोग दफ्तरों में जाते और बिना संबंध या रिश्वत के अगर अपना काम कराने की कोशिश करते तो अकसर मुह की खाकर और अपना-सा मुंह लेकर लौट आते। वजह क्या बताऊं, कोई विश्वास ही नहीं करेगा। उन दफ्तरों में सारा स्टाफ़ मेरिट वालों का होता था। मेरिट के अलावा कोई और योग्यता वहां दाखि़ल हो सकती थी तो वो ‘डोनेशन’ थी, वो ‘पहुंच’ थी। रिज़र्वेशन नाम की चिड़िया उस वक्त सिर्फ़ ख़्यालों, सपनों और अनुमानों में उड़ा करती थी। एक दिन अक्ल का मारा एक ऐसा शासक सत्ता में आ गया कि पट्ठे ने रिज़र्वेशन को हक़ीकत में बदल दिया। सत्यानाश हो उसका कि सपनों में भी हमारे सपनों की झण्ड हो गई।
फिर मुझे सपना आता है कि रोल बदल दिए गए हैं। मेरिट की बात करने वालों को झोपड़-पट्टियों में रहने को भेज दिया गया है। जहां सड़ा पानी भी उपलब्ध हो जाए तो पहले सोचना पड़ता है कि इससे नहाएं या पीकर पहले प्यास बुझाएं ! जहां सुअरों और नालियों के साथ सोना पड़ता है। पहले वे अपने पाखाने भी साफ़ नहीं करते थे अब दूसरों के भी करने पड़ते हैं। बदले में उन्हें मार, ग़ालियां और जूठन मिलती है। उनकी स्त्रियों के साथ रोज़ाना.....। धर्मस्थलों में तो छोड़िए, उन्हें विद्यालयों में भी घुसने नहीं दिया जाता। उनके पास कोई पढ़ाई की डिग्रीयां नहीं हैं। ज़्यादा क्या लिखूं, सपने में भी ऐसी बातें सोचकर डर लगता है। साल-भर तक मैं इस सपने को यूंही छोड़ देना चाहता हूं...
उसके बाद जो सपना आएगा, उसमें देखेंगे कि क्या वे तब भी मेरिट की बात इतने ही ज़ोर-शोर से करते हैं। क्या वे तब भी इतनी ही दिलदारी से डायस ठोंकते हैं! क्या तब भी इस ठोकन पर भाड़ेदार और मलाईमार तालियां इतनी ही ज़ोर से पिटतीं हैं.....
दूसरे संवादघर में ‘मेरिट-स्थान’


2. पलट-वॉक


लड़कियां बौरा गयी हैं। कहतीं हैं स्लट वॉक करेंगीं। कर रियो तो करो इतना ढोल काहे पीट रियो ? भीड़ लगाना चाह रियो क्या ? पगलियो, ये जो विरोध कर रए हैं, इन्हें बुलाना चाह रियो क्या ? बावरी हो का ? इन्हें तो भनक लगने की देर है, ये तो सबसे पहले आवेंगे। इनने तो अब तक इतनी पब्लिसिटी कर दी होगी तुम्हारी कि जितनी तुम पैसा-गहना खर्च करके भी ना कर पातीं सात जनम में। ये तो लाइव भी देखेंगे, टी वी कवरेज पे जुटेंगे, अखबार में ढूंढेंगे, ब्लॉग पे छांटेंगे तुम्हे। मोहे याद है जितने ज़्यादा जो अखबार सभ्यता-संस्कृति पे संपादकीय लेख लिखा करे थे, उतने ही ज़्यादा उनमें हीरोइनों के बड़े-बड़े रंगीन फोटू छपा करे थे। अभी मैं बताऊं का कि कैसे फोटू छपा करे थे ! तुम भी सब जानो हो री। और तुम नया का कर री हो ? हम मर्द लोग सब कर चुके। विश्वास ना है तुम्हे ! तो आओ मैं तुम्हे अपनी टाइम-मशीन में 30-35 साल पुराने अपने कस्बे में ले चलूं।
देखो, सुबह के सात बज रे हैं। हलवाई सब खुले पड़े हैं। कोई चड़ढी में है तो कोई साथ में बनियान भी डाले है। तुम तो कहोगी कि टू-पीस पहन राखा है इनने। कहो, कहो। देखो तो कैसी ताजी-ताजी कचौड़ी, जलेबी, पूड़ी बन री हैं। ग्राहक आ रे हैं आंख मलते हुए। कोई लुंगी में आ रिया है, कोई धोती में आ रिया है, कोई प्लस बनियान में भी है तो कोई विद अंगोछा भी है। पर देखो, कैसे सहज भाव से आ रे हैं, खा रे हैं और जा रे हैं। कोई घमंड नहीं, कोई पब्लिसिटी नहीं और का कहें हैं उसे कि कोई आत्म-मुग्धता नहीं कि हम कुछ स्पेशल कर रे हैं। कुछ ऐसा कर रे हैं जिसे कलको स्लट वाक भी कहा जा सके है। देखी है ऐसी सहजता, ऐसी सादगी, ऐसी विनम्रता ? तुम काहे इत्ती फूल री हो री लड़कियो !
अखाड़े देखोगी, पहलवान देखोगी हमारे कस्बे के ? सब स्लट वाक भूल जाओगी री। तुम्हारी जिम में लड़की एलाउ तो है, यहां तो जो करना हो, सब लड़के ही कर लेंवे करे हैं। अरे, अब छोड़ो भी, लड़कईयो।
ना मन भरा अभी ! आओ फिर महानगर में लौट आओ। ये देखो जो सर्कस जैसा पंडाल लगा है। देखो बाबा कैसी कूद-फांद कर रे हैं टू-पीस में। ज़्यादा जोश आ जाया करे है तो ऊपर का वन पीस भी उतार के हवा में घुमा दिया करे हैं। अरे हटो जाओ लड़कियों, बड़ीं आयीं स्लट वॉक करने वालीं। अभी नागा बाबा का जुलूस दिखाऊं का ? हैं ? डर गयीं !
अरे हम मर्दुए बहुत बदमाश हैं रे। पहले तो तुम्हें कुछ करने ना देंगे, रोड़े अटकावेंगे, डरावेंगे, फिर भी तुम ना मानोगी, कर ही दिखलाओगी तो हम बोल देंगे ई में नया का है, ई तो हम पहले ही कर चुके, कई बार कर चुके, तुम तो प्रतिक्रिया कर री हो, पलट वार कर री ओ, माने कि पलट-वॉक कर री हो। हमारा कोई इंट्रेस्ट इसमें ना है।
वैसे चीफ़ गैस्ट बनाके बुलाओ तो मैं आ भी लूंगा।

दूसरे संवादघर में 'पलट-वॉक'

--संजय ग्रोवर

बुधवार, 29 जून 2011

ग़ज़लों की चोरी: पार्ट टू

मेरी दो ग़ज़लें नेट पर कई शौकीनों/कद्रदानों ने अपनी साइटस् पर लगा रखीं हैं। पर चूंकि मेरे नाम के साथ थीं इसलिए मैंने सामान्य भाव से लिया। आज देखता हूं तो इन्हीं दो ग़ज़लों को किसी-किसी ने बिना मेरे नाम के भी लगाया है। ये दो ग़ज़लें हैं:
1. मंज़िलों की खोज में तुमको जो चलता सा लगा
2. वो मेरा ही काम करेंगे
क्या करना चाहिए ?

सारे लिंक एक साथ दे रहा हूं:



http://anupam.mywebdunia.com/2008/03/14/1205469720000.html

http://webcache.googleusercontent.com/search?q=cache:vsIRrZxhUjAJ:toostep.com/insight/4740--+%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A5%9B%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%82+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%9C+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A5%8B+%E0%A4%9C%E0%A5%8B+%E0%A4%9A%E0%A4%B2%E0%A4%A4%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%BE+%E0%A4%B2%E0%A4%97%E0%A4%BE&cd=1&hl=hi&ct=clnk&gl=in&client=firefox-a&source=www.google.co.in

http://webcache.googleusercontent.com/search?q=cache:aikf5ZfjIz8J:www.gustakhimaaf.com/forums/index.php%3Faction%3Dvthread%26forum%3D2%26topic%3D764%26page%3D3+%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A5%9B%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%82+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%9C+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A5%8B+%E0%A4%9C%E0%A5%8B+%E0%A4%9A%E0%A4%B2%E0%A4%A4%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%BE+%E0%A4%B2%E0%A4%97%E0%A4%BE&cd=9&hl=hi&ct=clnk&gl=in&client=firefox-a&source=www.google.co.in

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रविवार, 19 जून 2011

मुश्क़िल

व्यंग्य
वह एक-एकसे पूछ रहा था।
जनता से क्या पूछना था, वह हमेशा से भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ थी।
विपक्षी दल से पूछा,
‘‘मैंने ही तो सबसे पहले यह मुद्दा उठाया था।’’ उनके नेता ने बताया।
उसने शासक दल से भी पूछ लिया,
‘‘हम आज़ादी के बाद से ही इसके खि़लाफ़ कटिबद्ध हैं। जल्द ही हम एक बिल ला रहे हैं।’’
शासक दल विपक्ष से कम उत्साहित नहीं दिख रहा था।
उसने गठबंधित दलों से पूछ मारा,
‘‘भ्रष्टाचार का ख़ात्मा होना ही चाहिए।’’ सबने एक स्वर से कहा।
उसने सेना से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।
पुलिस से पूछा, वह खि़लाफ़ थी।
उसने चोर से पूछा, वह भी खि़लाफ़ था।
उसने सीमेंट से पूछा, वह खि़लाफ़ था।
उसने बालू से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।
उसने करेंसी से पूछा, वह खि़लाफ़ थी।
उसने जाली करेंसी से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।
क्या ठोस, क्सा द्रव्य, क्या गैस.......सारा देश भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ धरने पर था।
‘कमाल का माहौल क्रिएट हुआ है !’ वह बुदबुदाया।

‘आप भी आईए न भाईसाहब, क्या आप भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ नहीं हैं !?’ एक धरनाकारी ने उससे कहा।
’’बिलकुल हूं, मैं क्या देश से अलग हूं, आपसे अलग हूं।’’ उसने पूरी विनम्रता से कहा।
‘‘हां, लगते तो बिलकुल हमारे जैसे हो। आओ बैठो न हमारे साथ।’ लोगों ने मनुहार की।
वह आराम से उनके बीच जा बैठा। बात-चीत होने लगी। उसने कुछ नए स्लोगन भी सुझाए। थोड़ी ही देर में लगने लगा कि वह उनसे अलग कभी था ही नहीं।
‘‘आपका नाम क्या है भाईसाहब ?’’ यूंही किसीने पूछ लिया।
‘‘भ्रष्टाचार’’ उसने निर्विकार भाव से बताया।
पहले तो किसीने ध्यान न दिया।
‘‘क्या’’ एकाएक कोई चौंका।
‘‘यह वक्त इन बातों को सोचने का नहीं कि कौन क्या है, हर किसीका समर्थन क़ीमती है’’ किसीने कहा और बहस शुरु हो गई।
‘‘नहीं, नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है !? निकालो साले को यहां से’’, रोष से जिसने यह कहा था वही हैरानी से बोला, ‘‘अरे! पर वह गया कहां ?’’
‘‘अभी तो यहीं था!’’
‘‘मैंने अभी उसे विपक्षी दल के पास बैठे देखा था।’’
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ! बिलकुल अभी मैंने उसे मंच पर देखा।’’
‘‘पागल हुआ है क्या ? वह सत्ताधारियों के बीच है, जाकर पकड़ उसे!’’
‘‘नहीं है वहां, वे कह रहे हैं कि वह ठेकेदारों के बीच जाकर बैठ गया है।’’
‘‘हट! अभी तो मैंने उसे मीडिया में देखा।’’
‘‘ओफ्फ़ो, साला कहां छुप गया जाकर !?’’
‘‘ढूंढो, किसी तरह ढूंढो उसे।’’
‘‘कैसे ढूंढूं ? उस कोने में जाता हूं तो वहां से वह इसी कोने में दिखाई देता है। यहां आता हूं तो आप कहते हैं वहां चला गया !’’
‘‘पर इतना तो पक्का है कि वह है हमारे ही बीच। सामने तो कहीं दिख नहीं रहा।’’

अब मुश्क़िल यह हो गयी थी कि सारा देश जिसके खि़लाफ़ धरने पर बैठा था वह सामने कहीं दिख नहीं रहा था और अपने बीच उसे ढूंढ पाने में लोग सक्षम नहीं थे।

-संजय ग्रोवर

गुरुवार, 19 मई 2011

जिन्हें नाज़ है...

नज़्म

जिन्हें नाज़ है उनके क्या राज़ खोलूं  
जो तोल के बोलूं तो कुछ भी न बोलूं

ये तहज़ीब की बन ज़ुंबां बोलते हैं
ये बनके तेरे मेहरबां बोलते हैं
ये ईमान पर, बेईमां बोलते हैं

जिन्हें नाज़ है उनके ......

ये चाहें तो तुझको तुझीसे लड़ा दें
तेरे घर में घुसकर ये बेघर बना दें
ये साज़िश करें और मुकद्दर बता दें

जिन्हें नाज़ है उनके ......

ये बढ़ते हुए माफ़िया ज़िंदगी के
ये रटते हुए, काफ़िया ज़िंदगी के
ये बन जाते हैं रहनुमां ज़िंदगी के

जिन्हें नाज़ है उनके ......

कोई टोपियों से कबूतर निकाले
क़िताबों से कोई है अक्षर निकाले
कोई जादूगर कफ्न से सर निकाले

जिन्हें नाज़ है उनके ......

अदू औरतों के, चले दोस्त बनकर
निशाना ये उनपर लगाएंगे छुपकर
उन्हीं के इक हमदर्द कंधे पे रखकर

जिन्हें नाज़ है उनके ......

ये मां बहन बेटी की माला जपे हैं
दिखे है जो औरत, ये सर नोंच ले हैं
ये उसपर हंसे हैं कि ख़ुदपर हंसे हैं

जिन्हें नाज़ है उनके.....

वो औरत भी ख़ुदको अजब ढूंढती है
वो मज़हब ही में अपना सब ढूंढती है
वो तब ढूंढती थी न अब ढूंढती है

जिन्हें नाज़ है उनके.....

इसे जिस धरम ने कहीं का न छोड़ा
उसे इसने अपना सबब मान छोड़ा
इस औरत ने ख़ुद अपना पीछा न छोड़ा

जिन्हें नाज़ है उनके क्या राज़ खोलूं  
जो तोल के बोलूं तो कुछ भी न बोलूं

-संजय ग्रोवर

अदू=दुश्मन

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार: व्यवहार और इतिहास

‘‘चल ना यार ! मैं तो जा रहा हूं।’’ 

‘‘हां तू जा। मेरे पास इतना वक्त नहीं है।’’

‘‘तू मूर्ख है क्या ? यही तो वक्त है। तू नहीं गया तो माना जाएगा तू नपुंसक है, भ्रष्टाचार का समर्थक है।’’
‘‘अच्छा ! तू दो घण्टे वहां बैठ जाएगा तो तू भ्रष्टाचार का विरोधी हो जाएगा ? मैं क्या जानता नहीं तुझे ? अच्छा ये बता जितने लोग जुट रहे हैं उतने वाकई भ्रष्टाचार के विरोधी होते तो क्या किसी आंदोलन की ज़रुरत भी पड़ती ? ’’
‘‘तू यार फ़ालतू के तर्क करता है, करता-धरता कुछ है नहीं। समझ ले कनाट प्लेस जा रहा है घूमने। दो-तीन घण्टे नहीं निकाल सकता ? बड़े-बड़े नेता-अभिनेता आ रहे हैं, कोई बात तो होगी !’’
‘‘बात जितनी है उतनी मुझे पता है। तेरी तरह नहीं हूं। आने वालों को बख़ूबी पता है कि जंतर-मंतर कोई जलियांवाला बाग़ नहीं है और इस वक्त वहां होने में शायद कोई फ़ायदा हो तो हो रिस्क तो बिलकुल भी नहीं है। वहां जाने के नाम पर ख़ुदको शहीद मत समझ।’’
‘‘साले, हर दल के नेता, हर तरह के व्यापारी समर्थन कर रहे हैं।’’
‘‘क्या नयी बात है ? स्वाभाविक है। तू तो हर शादी में फोटो खिंचाने को आगे-आगे भागता है। बेटा, भ्रष्टाचार के विरोध में अगर सारे भ्रष्टाचारी फ़टाफ़ट जाकर तख़्त पर आगे-आगे बैठ जाते हैं तो यह भी उनके भ्रष्टाचार का ही विस्तार है। ’’
‘‘ऐसी-तैसी करा। वैसे करना क्या है आज तुझे ?’’
‘‘बैंक की पेटी में चैक डाला था, खो गया। उसका पता करना है। एक उद्योगपति जिसे भरत-रत्न मिलने की पूरी उम्मीद है, की कंपनी ने मेरी सिक्योरिटी मार ली है। उसपर केस डाला है, वहां जाना है। एक कोरियर वाले ने पैसे ज़्यादा लेकर भी कोरियर नहीं पहुंचाया, वहां जाना है। एक पड़ोसी जो शायद तुझे वहीं बैठा मिलेगा, मेरे कोर्टयार्ड के बराबर में नाजायज़ कमरा बना रहा है, उस सिलसिले में वकील के पास जाना है, एक संपादक ने स्वीकृत रचना तीन साल बाद लौटा दी, उससे बात करनी है, एक बिना मीटर के पड़ोसी ने तार हमारे कनेक्शन में डाल दिया था, उसके पैसे हमारे बिल में लगकर आ गए, उसका निपटारा कराना है, जल विभाग ने बिल में हज़ार रुपए ज़्यादा लगाके भेज दिए हैं वहां जाना है, प्रोपर्टी टैक्स का झूठा नोटिस आया हुआ है वहां जाना है........’’
‘‘हो सकता है ये सब तुझे वहीं बैठे मिल जाएं!’’
‘‘वहां नहीं तो और कहां मिलेंगे !’’
‘‘ओ बस कर यार ! यही करता रहता है कि कुछ काम भी करता है ?
‘‘यही करता हूं। काम तू कर ना। जाके दर्ज़ हो इतिहास में, तुझे क्या रोक रहा हूं ? ’’
‘‘तू भी यही करता रह। पर एक बात बता दूं, इतिहास में कभी दर्ज़ नहीं हो पाएगा।’’
‘‘अरे, मेरे पास टाइम नहीं दर्ज होने का। तू जा ना। एक बात बता, कोई सारी ज़िंदगी भ्रष्टाचार से लड़ता रहा हो पर वो इस आंदोलन में न जा पाए, तो क्या उसका सारा किया-धरा, अनकिया हो जाएगा !?’’
‘‘फिर वही बेवकूफ़ी की बातें!’’
‘‘मैं तो ऐसी ही बातें करता हूं, तू निकलता क्यों नहीं !?’’
‘‘हां, ठीक है, जाता हूं।’’
‘‘ठीक है!’’
‘‘ठीक है तो ठीक है।’’

-संजय ग्रोवर

अंत में एक प्रश्न और: एक अखबार वाले मित्र ने सामयिक व्यंग्य मांगे थे। शनिवार को उन्हें यह भेजा तो उन्होंने बताया कि सोम या मंगल को छप जाएगा। आज दोपहर को मेल करके पूछा क्या हुआ तो अभी तक जवाब नहीं आया। हो सकता है कि वे मित्र किसी परेशानी में हों या मुझमें धैर्य की कमी हो।
उनके पास मेरा फ़ोन नंबर है, मेरे पास उनका नहीं है।
फिर भी आपको क्या लगता है, वे मित्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थक होंगे या विरोधी !?

मंगलवार, 22 मार्च 2011

फिर उसी कमरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

ग़ज़ल

अब तलक सदमे में हूँ मैं क्या करुं ?
मैं बहुत ग़ुस्से में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो मुझे सोने नहीं देता कभी
मैं उसी सपने में हूँ, मैं क्या करुं ?

तुमसा होके तुमसे मिल सकता नहीं
राज़ इक गहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो कभी भी लौटकर आता नहीं
मैं उसी वक्फ़े में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो कबूतर-मार, शाखे-अम्न पे जलवानुमां
उसके मैं पहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

साल चौदह, बाल ख़ुशबू, बाग़े-जिस्म
फिर उसी कमरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

यूं तो पूरा घर है मेरे बाप का
मैं भी इक कोने में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो किसी विरसे का हिस्सा ही नहीं
मैं उसी विरसे में हूँ, मैं क्या करुं ?

दूसरों की बात कर सकता नहीं
आज फिर अपने में हूँ, मैं क्या करुं ?

-संजय ग्रोवर

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

हवाएं टपकी तो लपके ठूंठ...

ग़ज़लें

1.
किसी का कुछ भी पता नहीं
किसी से कोई गिला नहीं

जो शख़्स समझा हो शख़्सियत
वो शख़्स अब तक मिला नहीं

वो शख़्स राहें बता गया  
जो शख़्स घर से चला नहीं

जड़ें तो क्या इन हवाओं से
वो पीला पत्ता हिला नहीं

हवाएं टपकी तो लपके ठूंठ
कमाल ये भी बुरा नहीं

इस आग़े-दिल को भी जांच लो
दिया अभी तक जला नहीं

वहीं पे ढूंढो तो कुछ मिले
यहां तो कुछ भी हुआ नहीं

ख़ुमार है तो उतार भी
दुआ से कुछ भी हुआ नहीं

उलझ गए मेरे रातो-दिन
ख़्याल का तो सिरा नहीं

वो शख़्स राहों में खो गया
जो अपनी जड़ से हिला नहीं 

2.

मकसद उसका जाने क्या था
यूं वो मेरे साथ खड़ा था

मेरा तन-मन कांप रहा था
सर पर उसका हाथ रखा था

जिनको भी वह कोस रहा था
सबको उसने साध रखा था

बेसिर-पैर की बातें करके
सर पर चढ़कर नाच रहा था

मैंने उसका काम न पूछा
मैं तो नीयत देख रहा था

सही वक्त पर सब कहना था
फिर क्या मेरे बाद रखा था

-संजय ग्रोवर

सोमवार, 10 जनवरी 2011

आत्मविश्वास की खोज

एक वक्त था जब आत्मविश्वास का ज़िक्र आते ही मैं घबरा जाता था। तब तक मुझे यही पता था कि यह कोई ऐसी दुर्लभ शय है जो मेरे पास नहीं है और इसके बिना ज़िंदगी जो है बेकार है। जो भी मुझसे कहता कि तुममें आत्मविश्वास नहीं है मैं मान लेता कि ज़रुर इसमें बहुत आत्मविश्वास है इसलिए बेधड़क ऊंगली उठा रहा है। तब तक मुझे यही ग़लतफ़हमी थी कि यह कोई ऐसा विश्वास है जो ‘आत्म’ से यानि अपने भीतर से आता है। मैं क़िताबें बहुत पढ़ता था। क़िताबों से जो ‘आत्मविश्वास’ मिलता वह घर से बाहर निकलते ही डगमगाने लगता और मैं कन्फ्यूज़ हो जाता। मैं और ज़्यादा क़िताबें पढ़ता। परेशानी की चरमावस्था में मुझे कुछ ऐसी क़िताबें मिली जिनमें आत्मविश्वास बढ़ाने के नुस्ख़े थे। जहां तक मुझे याद है कोई क़िताब ऐसी नहीं थी जिसमें व्याख्या की गयी हो कि आत्मविश्वास होता क्या है। अकसर यही सलाहें होतीं कि आईने के सामने खड़े होकर 10 बार बोलो कि ‘मुझमें आत्मविश्वास है’ या कॉपी पर बीस बार लिखो कि ‘मुझमें आत्मविश्वास है’। मैं फिर कन्फ़्यूज़ हो जाता कि जो चीज़ मुझे पता ही नहीं कि होती क्या है उसके बारे में कैसे कहूं कि मुझमें है! यह तो सरासर झूठ होगा।
संकट जानलेवा ही नहीं ईमानलेवा भी था।
उन्हीं दिनों मैंने उस आदमी को देखा जो अपनी धुन में मस्त रास्ते से गुज़रता, अकसर किसीको भी सलाम-नमस्ते किए बिना। कुछेक दफ़ा कर भी लेता। अकसर लोग कहते कि देखो कितना अहंकारी है। कुछ लोग यह भी कहते कि इसमें आत्मविश्वास की कमी है। मैं जो कि कुछ मामलों में बचपन से ही बिगड़ैल था, लोगों की बातों पर न जाकर यह सोच बैठता कि किसीको नमस्ते न करके यह आदमी किसी का लेता क्या है! नमस्ते न करना आवश्यक रुप से किसी का अपमान नहीं है, विरोध नहीं है। अहंकारी तो यह तब होता जब यह चाहता कि हर कोई मुझे सलाम करे, इज़्ज़त दे। मैं सोचता कि आखि़र लोग अपनी बात पर इतने दृढ़ और एकमत क्यों हैं कि यही अहंकारी है। सोचते-सोचते मुझे लगने लगा कि यह दृढ़ता इस बात से आ रही है कि ऐसा सोचने वालों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत ज़्यादा है और वह अकेला है। मुझे लगा कि वह आदमी अहंकारी या आत्मविश्वासहीन है, यह तो पता नहीं मगर इतना ज़रुर तय है कि लोग अकसर अहंकारी हैं और उनका आत्मविश्वास अपनी समझ से कम और भीड़ की स्वीकृति या सहमति से ज़्यादा आता है।
क्या यही आत्मविश्वास होता है ! यह तो बड़ी अजीब-सी चीज़ है ! मैं फिर परेशान, फिर कन्फ्यूज़ड्। संतोष बस इतना कि चलो मुझे पता तो है कि मैं कन्फ्यूज़ड् हूं और अपने कन्फ्यूज़न को किसी सिद्धांत का (पा) जामा पहनाने की कोशिश नहीं कर रहा।
आगे चलकर तो यह लगने लगा कि अपने आप में विश्वास पूरी तरह खो देना और भीड़ की स्वीकृति की आशा में ख़ुदको बहुमत के रंग में रंगते चले जाना ही आत्मविश्वास का स्रोत और समझ है। आत्मविश्वास चाहे जो भी होता हो मगर दो आत्मविश्वासियों में फ़र्क शायद इतना ही होता है कि उनका भीड़ का चुनाव अलग होता है। किसी को आत्मविश्वास राष्ट्रवादी भीड़ से मिलता है तो किसीको मार्क्सवादी भीड़ से। एक तरह की भीड़ है जो क़ानूनविरोधी खाप पंचायतों के सरपंचो को आत्मविश्वास देती है तो दूसरी तरह की भीड़ है जो दहेज विरोधी और पर्यावरण समर्थक कानूनों को सरेआम तोड़ने वाली शहरी शादियों में शामिल होने वाले प्रगतिशीलों को। वैसे थोड़ा आत्मविश्वास बढ़ाकर सोचें तो क्या ये दो तरह की भीड़ और दो तरह के लोग हैं या एक ही तरह के हैं!
भीड़ की ही ‘प्रेरणा’ है कि बेईमान उस चीज़ से भरा-पूरा है जिसे आत्मविश्वास कहते हैं। ईमानदार इस मामले में अकसर ‘हैंड टू माउथ’ भी नहीं हो पाते। मैंने कभी किसी को कहते नहीं सुना कि दाऊद-वाऊद, हर्षद-वर्षद, राटा-टाडिया-इरला-विरला-फ़लानी-खंुबानी आदि-आदि में आत्मविश्वास की कमी है (कम्बख्तमारे नाम तक नहीं याद रहते मुझे तो)। बहरहाल नाम जो भी हों इन महानात्माओं का आत्मविश्वास शायद यहीं से आता है कि पट्ठे ऊपर से चाहे जो कुछ दिखाएं पर अंदर से ज़्यादातर लोग हैं हमारे ही जैसे।
कई लोगों को आत्मविश्वास पुराने या स्थापित विचारकों के उद्धरणों से मिलता है। हम लेखक जब तक बीस-पच्चीस विचारकों के विचारों के टुकड़े जहां-तहां न ठूंस दें, हमें अपना लेख, लेख ही नहीं लगता। पुराने या स्थापित विचारक का टुकड़ा लेख में सजाते ही लेख को तार्किक माना जाने लगता है भले उस टुकड़े में रत्ती-भर तार्किकता न हो। इसी तरह कई लोगों को पुरानी कहावतों/मुहावरों से आत्मविश्वास मिलता है। एक कहावत अकसर इस्तेमाल होती है-‘प्रेम और जंग में सब जायज़ है।’ मैं सोचता हूं कि अगर प्रेम में सब जायज़ है तो फिर एम. एम. एस. बनाना, प्रेमी की हत्या कर देना और प्रेमिका के मुंह पर तेज़ाब डाल देना भी जायज़ ही है। उसपर इतनी हाय-तौबा क्यों !?
एक मित्र का कहना है कि आत्मविश्वासियों की श्रेणी में वे लोग भी रखे जाते हैं जो दूसरों के बारे में तो सब कुछ जानते हैं या उन्हें लगता है कि जानते हैं मगर अपने और अपने अंधे समर्थकों के बारे में कुछ भी नहीं जानते। उन्हें लगता है दूसरे भी उनके बारे में कुछ नहीं जानते।
कई बार तो लगता है कि मूर्खता, ढिठाई, बेशर्मी, तोतारटंत और आत्मविश्वास पर्यायवाची शब्द हैं।
इस कथन के लिए मैं ख़ुदसे भी उतना ही क्षमाप्रार्थी हूं जितना आपसे, अन्यथा न लें।
आप यह तो नहीं सोच रहे कि अब मुझमें आत्मविश्वास आ गया है ! सच्ची बताऊं तो मुझे अभी तक नहीं पता कि आत्मविश्वास होता क्या है। इतना ज़रुर पता है कि लिखूंगा वही जो महसूस करता हूं।
खुलकर कहूं तो आत्मविश्वास कही जाने वाली चीज़ को मैंने अकसर जिस तरह के लोगों में देखा है, डर लगता है कहीं मुझमें भी न आ जाए !
-संजय ग्रोवर
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