व्यंग्य
दोस्त ने अचानक गाड़ी रोकी।
एक शानदार शोरुम। नीचे छोटा-छोटा लिखा है ‘आंदोलन का सामान’।
दुकान के नाम के नीचे यह भी लिखा है, ‘दिस इज़ नॉट अ शॉप, दिस इज़ अ मूवमेंट’
‘यार, बेटा कई दिन से ज़िद कर रहा है, आंदोलन करना है।’
‘अच्छा ! पहले नही बताया ? पहले भी करता है ?’
‘नहीं यार...... कहता है पापा, सारे दोस्त करते है, बस मै ही.......मुझे भी बड़ा सॉरी फ़ील हुआ यार.....’
‘करोगे कहां ? इतनी जगह है...
‘छत पर कर लेगे यार, खुल्ली छत है, इसके दोस्तों ने ही तो आना है बस...
‘अच्छा, जहां पिछले साल इल्लीगल कमरा डाला था !?’
‘चल आ सामान लें लें, भीड़ बहुत है.......’
‘जी सर, कितना बड़ा आंदोलन करना है, सामान लिखा दीजिए लड़के को’, दुकानदार को फुरसत नही है।
‘भाईसाहब, बड़ा आदोलन करना हो तो कितनी देर मे सामान मिल जाएगा ?’, एक ग्राहक पूछ रहा है।
‘कितने लोग हैं, कहां करना है, एरिया कितना बड़ा है?’
‘कम से कम बीस हज़ार तो होंगे..... ग्राहक डिटेल देता है।
'दो घण्टे मे सब मिल जाएगा...’
‘पचास टोपी, पचास झण्डे, टैटू का सामान, दो डीजे.....’दोस्त लिखवा रहा है।
सामने सुंदर, बड़े-से शोकेस में ग़ज़ब की हलचल है।
‘यह क्या भाईसाहब, ये सचमुच के आदमी हैं या कठपुतलियां हैं ?’, मैं डरते-डरते पूछता हूं।
‘खा गए न चक्कर, भाईसाहब, ये ऐसी कठपुतलियां हैं जो सारा आदोलन ख़ुद ही कर लेतीं हैं, आपको कुछ नहीं करना, बस चाबी भरनी है। कोई कह दे नकली आंदोलन है तो पैसा वापिस।’
‘इसमे मीडिया भी है, भाईसाहब ?’
‘लो जी ! मीडिया के बिना कैसे चलेगा ? आप भी यार....अरे मीडिया ही तो वो चाबी है जिससे पूरा आंदोलन चलता है।’
दोस्त ने सामान ले लिया है।
हम लौट रहे हैं।
‘यह नोट नहीं चलेगा’, दुकानदार एक नोट लौटा रहा है।
'क्यों!?'
‘यह देखिए, इस आदमी ने टोपी नहीं लगा रखी, अब यह नोट नहीं चलते,’ वह कारण बताता है, ‘नोट में टोपी साफ़ दिखनी चाहिए, आदमी भले कम दिखे’ वह समझाता भी है।
हम लौट रहे हैं।
‘चलो कुछ तो चेंज आएगा, यार।’
‘मोटिव क्या है आंदोलन का ?’
‘वो तो मैने पूछा नही यार....आज-कल बहुत लोग करते हैं, होली-दीवाली की तरह हो गया है......बच्चों का मन आता है तो कर लेते हैं मिल-जुलके.....’
‘बेटी क्या कर रही है आज-कल ?’
‘बेटी को भी करवाएगे, एकदम से आंदोलन तो नहीं, अभियान से शुरु कराएंगे.....लड़कियों के आंदोलन पर तो अब सरकार भी फैसिलिटी दे रही है। बड़ा भारी डिस्काउंट है।’
गाड़ी धीमी होती है...एक शोरुम के सामने भीड़ जमा है, पास जाकर पता चलता है कि लोग छोटे-बड़े सामान लेकर चुपचाप अपने घर जा रहे है...
‘क्या कोई सेल लगी है?’, मै पूछता हूं...
‘अरे भाई, अदंगा चल रहा है...’
‘अ-दंगा ! यह क्या होता है !’
‘नया कांसेप्ट आया है, लोग दुकान को घेरकर बैठ जाते हैं, सारे रास्ते बंद कर देते हैं, खाना-पीना छोड़ देते हैं, दुकानदार से कहते हैं कि अपना सारा सामान अपनी मर्ज़ी से शांति और अहिंसा के साथ हमें दे दो। हमारे बताए समय के अंदर अगर न दिया तो इस दुकान पर वो होगा जो पहले कभी नही हुआ....’
दोस्त दुनियादार आदमी है, उसके पास सारी नवीनतम सूचनाएं रहतीं हैं।
‘फिर वह बेमन से सामान निकालकर अपनी मर्ज़ी से दे देता है....’ दोस्त बात पूरी करता है।
‘चेंज तो आ रहा है, यार....’
‘मझे चक्कर आ रहा है यार, चल घर चलकर थोड़ा आराम करते हैं।’
-संजय ग्रोवर

आन्दोलन?…
ReplyDeleteवाह! यह पूंजीवाद आंदोलन को भी उद्योग बना डालता है।
ReplyDeleteBahut achchha vyangy ! dipavali ki hardik shubkamnayen...
ReplyDeletenice
ReplyDeleteवाह संजय भाई बहुत ही खूबसूरत.
ReplyDeleteप्रकाश
prakash Hindustani
(VIA EMAIL)
सज गयी दूकान हर सामान की
ReplyDeleteऔर मेरा काम है बस बेचना।
पूँजीवादी व्यवस्था में सब कुछ संभव है, आंदोलन कराना या न होने देना; यहॉं तक कि गंभीर आंदोलन का टेंटुआ मसकना भी; और तो और आंदोलनकारियों को उसी कृत्य में लिप्त सिद्ध कर देना जिसके विरुद्ध आंदोलन हो रहा हो। और इस सब में मीडिया की भूमिका- एक एक शब्द बोलता है कि मुँह में डाला गया है कीमत देकर।
आप भी खूब ये विषय छेड़ बैठे।
बहरहाल इस रोचक प्रस्तुति के लिये बधाई।
मस्ती से भरा हुआ ब्लॉग है
ReplyDeleteबढ़िया...इस व्यंग्य भरे विज़न में ऐसा कुछ है जिससे पेशेवर आंदोलनकारी जरूर कुछ सीख सकते हैं....
ReplyDeletebahut badhiya vyang hai.
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