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सोमवार, 29 मार्च 2010

दोबारा में : 8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

Saturday, March 7, 2009
8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

व्यंग्य

**मर्दों वाली बात**

वातावरण मर्दांनगी से भरपूर था। इतना कि भरी हुई टोकरी से मरी हुई मछलियो की तरह मर्दानगी फिसल-फिसल जाती थी। मर्दानगी के कई रूप थे। कही घनी मूंछों में थी, तो कहीं बांहों की फड़कती पेशियों में। चढ़ी हुई आंखों में थी, तो मस्तानी चाल में थी। बच्चों को गरियाते हुए थी और मां-बहनों को सुरक्षियाते हुए थी। अखबारी कागज़ पर कूद-फांद भी मचा रही थी और धर्म के दंगल में कुश्ती भी लड़ रही थी।
एक खास किस्म के चिंतन की कृपा से एक खास किस्म की पूर्व-निर्धारित शैली में जीने वाले सभी जन मर्द थे। हालांकि वे गैस का सिलिंडर लाने से लेकर बिजली का बिल जमा कराने तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘एडजस्ट‘ कर लेते थे, मगर फिर भी मर्द बने रहते थे, क्योंकि औरतों के साथ ‘एडजस्ट‘ नहीं कर पाते थे। वे सब इसलिए भी मर्द थे कि वे माइकल जैक्सन नहीं थे। हालांकि उनमें से कई कवि, लेखक और कलाकार थे, जो लंबे बाल भी रखते थे और पान से होंठ लाल भी किए रहते थे। मंच पर सांस्कृतिक हरकतें मचाने में वे माइकल से उन्नीस भी नहीं पड़ते थे, पर वे सुमित्रानंदन पंत भी नहीं थे कि अपनी सुकुमारता को मर्दानगी से स्वीकार पाते। हाय कि मर्द होते हुए भी वे सब कितने लाचार थे।
उनमे से कुछ लोग लंबे बाल रखने की बजाय दाढ़ी बढ़ाए रखते थे, तो कुछ, कुछ और प्रतीकें। ये सब उनके पूर्वजो की पुस्तकों में मर्दानगी के चिन्ह घोषित किए गए थे और मर्दानगी सिर्फ प्रतीकों में ही बची रह गई लगती थी। अपने पूर्वजों की पुस्तकों और उनमें तय किए जा चुके मर्दानगी के मानदंडों में लिथड़े हुए वे आंखें बंद किए पड़े रहते थे। यह उनकी मर्दानगी का एक और प्रकार था। अपनी टोटल मर्दानगी के बावजूद वे मर्दानगी के सभी प्रतीकों का खुलकर प्रदर्शन न कर पाने की अपनी सांस्कृतिक मजबूरी पर मन मसोस कर रह जाते थे।
लगभग सभी मर्द लोग बदलाव के हामी थे, मगर धीरे-धीरे। वे कमीज-धोती से शर्ट-पतलून तक तब आते थे, जब दूसरे (कम मर्द या नामर्द) लोग छींटदार कपड़ों पर पहुंच जाते थे। इस तरह वे एक बदलाव लाते हुए भी, बड़े धैयपूर्वक, एकाध सीढ़ी का ‘गैप‘ बनाए रखते थे। वे चाहते थे कि देश-समाज-सभ्यता-संस्कृति को धक्का एकदम से न लगे बल्कि धीरे-धीरे लगे। हालांकि यह युक्ति किसी असाध्य रोग को झेल रहे वृद्ध रोगी को दयामृत्यृस्वरूप ‘स्लो प्वाइज़न‘ देने जैसे थी, मगर उनकी मर्दानगी के अनुकूल पड़ती थी।
एक दिन उन सबने उन पुरस्कारों पर हाय-तौबा मचा दी, जो उन्हें नहीं दिए गए थे। हालांकि माइकल जैक्सन कोई इधर का उद्योगपति नहीं था। फिर भी उसे न जाने क्या सूझी कि उसने इधर के मर्दों के लिए कुछ लंबे-मोटे पुरस्कारों की घोषणा कर दी।
इसके बाद क्या हुआ? क्या उन्होंने माइकल जैक्सन की भावनाओं का आदर करते हुए पुरस्कार ग्रहण कर लेने की सहृदयता व सहिष्णुता दिखाई? या पुरस्कार लौटा देने का क्रांतिकारी कदम उठाया? पाठक-श्रोता-दर्शक-आलोचक अपने-अपने अंदाजें मारते हुए अपने-अपने नतीजों पर पहुंच गए थे।
इधर मेरे लिए वक्त आ गया था कि हर लेख के अंत की तरह एक बार फिर डरूं। अतः जैसा कि नहीं होना चाहिए, पर अक्सर होता है, मैंने घोषणा की कि यह सब तो एक सपना था।

यह हुई ना मर्दों (ना+मर्दों?) वाली बात।




-संजय ग्रोवर

(जनवरी, 1997 को हंस में प्रकाशित)

+
‘अनुभूति’ पर कविताएं ‘स्त्री थी कि हंस रही थी’ और ‘हमारी किताबों में हमारी औरतें’

‘संवादघर’ पर कार्टून ‘‘कार्टूनखाना में स्कर्टस्’’

‘अमर उजाला’ में ग़ज़ल

‘संवादघर’ में कविता ‘मर्दानगी’

प्रस्तुतकर्ता sanjaygrover पर 2:32 PM
(लेबल: कविता, कार्टून, व्यंग्य, स्त्री-विमर्श के आस-पास, ग़ज़ल)

प्रतिक्रियाएँ:

3 टिप्पणियाँ:

प्रेम सागर सिंह said...
ग्रोवरजी,
शानदार आलेख है, आभर।
March 8, 2009 8:30 PM

amarpathik said...
Sanjay bhai apka lekh sachmuch krantikaari hai....
March 26, 2010 2:51 PM

mukti said...
हा हा हा हा !!! ये इतना अच्छा व्यंग्य कैसे मुझसे छूट गया. अच्छा हुआ फ़ेसबुक पर आपने लिंक दिया.
March 26, 2010 6:15 PM

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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