ईमानदारी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ईमानदारी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

मैं पशोपेश में रहा

ग़ज़ल


मैं अपने देश में रहा
मैं पशोपेश में रहा

सदा तक़लीफ़ में रहा
ज़रा आवेश में रहा

वही होगा मेरा रक़ीब
जो कई वेश में रहा

मैं क्यों ईमानदार हूं
बहुत वो तैश में रहा

न मैं अमीर में रहा
न ही दरवेश में रहा



-संजय ग्रोवर
15-03-2019


मंगलवार, 16 सितंबर 2014

पैंतरे

छोटी कहानी


जंगल में सब ठीक-ठाक चल रहा था।
शेर बकरियों को खा रहे थे। हिरनों को खा रहे थे। जो भी खाने का मन हो, खाए जा रहे थे।
भेड़िए भेड़ों को चबा रहे थे।
मतलब शांति ही शांति थी, अनेकता में एकता थी।
एकाएक पता नहीं क्या हवा चली!
एक बकरी ने शेर का हाथ पकड़ लिया,‘‘बहुत हुआ, अब तुम मुझे नहीं खा सकते.’’
शेर पहले तो एकदम सकपका गया, उसे लगा कुछ प्रकृति-विरुद्ध हो रहा है। जंगल के धर्म के विरुद्ध कुछ हो रहा है।
उसने ज़ोर-ज़बरदस्ती की कोशिश जारी रखी।
‘यह नहीं चलेगा’....
शेर ने मुड़कर देखा ; पीछे एक और बकरी खड़ी थी।
‘जानवर जानवर को कैसे खा सकता है!‘ सामने से कुछ भेड़ें आ रहीं थीं।
और फ़िर ख़रगोश.....फ़िर हिरन....फ़िर दूसरे निरीह जानवर और पक्षी.....
‘‘यह नहीं चलेगा, नहीं चलेगा.....’’
शेर चकरा गया। यह तो उसने कभी सोचा ही नहीं था।
थोड़ा घबरा भी गया....
‘तुम सबको हुआ क्या है..... पहली बार उसकी आवाज़ में नरमी देखी गई, ‘‘आओ बैठकर बात कर लेते हैं’.....पहली बार उसे तर्क की ज़रुरत महसूस हुई।
‘‘कैसी निगेटिव बातें कर रहे हो आज तुम लोग!? अगर मैं तुम्हे नहीं खाऊंगा तो सृष्टि कैसे चलेगी, जंगल कैसे चलेगा?’’ उसने दलील रखी।
‘‘जंगल आप चला रहें हैं ? लगता आपको कुछ ग़लतफ़हमी हुई है! बाई द वे आप क्या करते हैं जंगल को चलाने के लिए?’’ एक छोटे-से मेमने ने पूछा।
‘‘हर्रामज़ा.....! इसकी इतनी हिम्मत!!‘‘शेर के तनबदन में आग़ लग गई, ‘‘बहुत अच्छा सवाल उठाया तुमने’’ प्रकटतः उसने कहा।
‘‘एक जानवर दूसरे को खाए यह कौन-सा धर्म है?‘‘एक ख़रगोश बोला।
‘‘कल तक मेरे सामने मूतता था मगर आज....यह इन सबको हुआ क्या है!...‘‘वैरी गुड, इंटेलीजेंट क्वेश्चन....ऊपर-ऊपर उसने कहा,‘‘फ़िर मैं खाऊंगा क्या....क्या मैं भूखा मरुंगा....
‘‘हमें क्या पता क्या खाओगे, तुमने कब हमारे खाने की चिंता की?,’’ एक छोटी भेड़ ने पूछ लिया।
‘‘तुम्हें मालूम है जंगल में शहर से कुछ आदमी आते हैं जो तुम्हे पकड़-पकड़कर ले जाते हैं, मैं मर गया तो उनसे तुम्हे कौन बचाएगा?’’शेर ने पैंतरा फेंका।
‘‘वो तो तुम्हे भी पकड़कर ले जाते हैं। जाने कितने भालू-चीते उन्होंने पिंजरों में बंद कर रखे हैं’’,,ऊपर पेड़ पर एक छोटा बंदर लटका था ; वही बोल रहा था,‘‘क्या मज़ाक़ कर रहे हो अंकल?’’
शेर ने पहली बार अपने बदन पर पसीना महसूस किया,‘‘ठीक है, मुझे थोड़ा वक्त दो.....तुम भी सोच लो हम भी सोच लें....आज मैं तुम्हारे लिए भूखा रहूंगा...तुम्हारे लिए ही सोचूंगा.....रात बहुत हो गई है, अब तुम जाओ......’’


दूसरे दिन जंगल के जानवरों ने देखा कि जंगल के बीचोंबीच एक स्टेज बना है जिसपर शेर, चीता, भालू, भेड़िए, सांप जैसे हिंसक और ख़तरनाक जानवर शांत मुद्रा में बैठे हैं। तरह-तरह के बैनर लगे हैं जिनपर क़िस्म-क़िस्म के नारे लिखे हैं-

भ्रष्टाचार मिटाएंगे, नई रोशनी लाएंगे!
जतिवाद मुर्दाबाद! मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!
समाज नहीं टूटने देंगे! जंगल नहीं लूटने देंगे!
जानवरों पर अत्याचार, बंद करो! बंद करो!
अहिंसा खोज हमारी है, शेर की ईमानदारी है!
समझ में उनकी दोष है, हम भी तो ख़रग़ोश हैं!
...........
इधर मेमने, ख़रगोश, हिरन, बकरी वगैरह एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे।


-संजय ग्रोवर
16-09-2014


देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

#girls #rape #poetry #poem #verse # लड़कियां # बलात्कार # कविता # कविता #शायरी (1) अंतर्द्वंद (1) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अकेला (3) अनुसरण (2) अन्याय (1) अफ़वाह (1) अफवाहें (1) अर्थ (1) असमंजस (2) असलियत (1) अस्पताल (1) अहिंसा (3) आंदोलन (4) आकाश (1) आज़ाद (1) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (2) आत्मकथा (1) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आभास (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (4) इतिहास (2) इमेज (1) ईक़िताब (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (2) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उर्दू (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचा (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (2) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरपंथी (1) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कन्फ्यूज़न (1) कमज़ोर (1) कम्युनिज़्म (1) कर्मकांड (1) कविता (68) कशमकश (2) क़ागज़ (1) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) काव्य (5) क़िताब (1) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) ख़ाली (1) खीज (1) खेल (2) गज़ल (5) ग़जल (1) ग़ज़ल (28) ग़रीबी (1) गांधीजी (1) गाना (7) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (7) गुंडे (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (4) चलती-फिरती लाशें (1) चांद (2) चालाक़ियां (1) चालू (1) चिंतन (2) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छंद (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) छोटापन (1) छोटी कहानी (1) छोटी बहर (1) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जयंती (1) ज़हर (1) जागरण (1) जागरुकता (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) झूठ (3) झूठे (1) टॉफ़ी (1) ट्रॉल (1) ठग (1) डर (4) डायरी (2) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ड्रामा (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज (1) तंज़ (10) तमाशा़ (1) तर्क (2) तवारीख़ (1) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (1) तालियां (1) तुक (1) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दिशाहीनता (1) दुनिया (2) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (2) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) द्वंद (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) धोखेबाज़ (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़रिया (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नफरत की राजनीति (1) नया (3) नया-पुराना (1) नाटक (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नारा (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (3) निष्पक्षता (1) नींद (1) न्याय (1) पक्ष (1) पड़़ोसी (1) पद्य (3) परंपरा (5) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (8) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुण्यतिथि (1) पुरस्कार (2) पुराना (1) पेपर (1) पैंतरेबाज़ी (1) पोल (1) प्रकाशक (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फंदा (1) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) फ़ॉलोअर (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बच्चा (1) बच्चे (1) बजरंगी (1) बड़ा (2) बड़े (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बयान (1) बहस (15) बहुरुपिए (1) बात (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (2) बेईमानी (2) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (2) भगवान (2) भांड (1) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भाषणबाज़ (1) भीड़ (5) भ्रष्ट समाज (1) भ्रष्टाचार (5) मंज़िल (1) मज़ाक़ (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (5) ममता (1) मर्दानगी (1) मशीन (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) महापुरुष (1) महापुरुषों के दिवस (1) मां (2) मातम (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मायना (1) मासूमियत (1) मिल-जुलके (1) मीडिया का माफ़िया (1) मुर्दा (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रस (1) रहस्य (2) राज़ (2) राजनीति (5) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) रात (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (10) लघुव्यंग्य (4) लालच (1) लेखक (1) लोग क्या कहेंगे (1) वात्सल्य (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (87) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) व्याख्यान (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (55) शायरी ग़ज़ल (1) शेर शायर (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संजयग्रोवर (1) संदिग्ध (1) संपादक (1) संस्थान (1) संस्मरण (2) सकारात्मकता (1) सच (4) सड़क (1) सपना (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (37) सर्वे (1) सवाल (2) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साजिश (1) साभार (3) साहस (1) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (6) साहित्य में आतंकवाद (18) सीज़ोफ़्रीनिया (1) स्त्री-विमर्श के आस-पास (18) स्लट वॉक (1) स्वतंत्र (1) हमारे डॉक्टर (1) हयात (1) हल (1) हास्य (4) हास्यास्पद (1) हिंदी (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (2) हिन्दुस्तानी (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) हिम्मत (1) हुक्मरान (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) alone (1) ancestors (1) animal (1) anniversary (1) applause (1) atheism (1) audience (1) author (1) autobiography (1) awards (1) awareness (1) big (2) Blackmail (1) book (1) buffoon (1) chameleon (1) character (2) child (2) comedy (1) communism (1) conflict (1) confusion (1) conspiracy (1) contemplation (1) corpse (1) Corrupt Society (1) country (1) courage (2) cow (1) cricket (1) crowd (3) cunning (1) dead body (1) decency in language but fraudulence of behavior (1) devotee (1) devotees (1) dishonest (1) dishonesty (2) Doha (1) drama (3) dreams (1) ebook (1) Editor (1) elderly (1) experiment (1) Facebook (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) gandhiji (1) ghazal (20) god (1) gods of atheists (1) goons (1) great (1) greatness (1) harmony (1) highh (1) hindi literature (4) Hindi Satire (11) history (2) history satire (1) hollow (1) honesty (1) human-being (1) humanity (1) humor (1) Humour (3) hypocrisy (4) hypocritical (2) in the name of freedom of expression (1) injustice (1) inner conflict (1) innocence (1) innovation (1) institutions (1) IPL (1) jokes (1) justice (1) Legends day (1) lie (3) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lonely (1) love (1) lyrics (4) machine (1) master (1) meaning (1) media (1) mob (3) moon (2) mother (1) movements (1) music (2) name (1) neighbors (1) night (1) non-violence (1) old (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppotunism (1) oppressed (1) paper (2) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) perspective (1) plagiarism (1) poem (12) poetry (29) poison (1) Politics (1) poverty (1) pressure (1) prestige (1) propaganda (1) publisher (1) puppets (1) quarrel (1) radicalism (1) radio (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) reality (1) rituals (1) royalty (1) rumors (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (2) SanjayGrover (1) satire (30) schizophrenia (1) secret (1) secrets (1) sectarianism (1) senseless (1) shayari (7) short story (6) shortage (1) sky (1) sleep (1) slogan (1) song (10) speeches (1) sponsored (1) spoon (1) statements (1) Surendra Mohan Pathak (1) survival (1) The father (1) The gurus of world (1) thugs (1) tradition (3) trap (1) trash (1) tricks (1) troll (1) truth (3) ultra-calculative (1) unemployed (1) values (1) verse (6) vicious (1) violence (1) virtual (1) weak (1) weeds (1) woman (2) world (2) world cup (1)