बुधवार, 11 जनवरी 2017

मातम भी तो मज़ाक़ है

ग़ज़ल                                                                                                                                                              


मैं से हम होते जाओ
लूटो, मिलजुलकर खाओ

सुबह को उठ-उठकर जाओ 
शाम को चुप-चुप लौट आओ

गगन पे गुंडों का क़ब्ज़ा
तुम भी जाकर छा जाओ

ये वो थे और वो ये हैं
बुरा ढूंढकर दिखलाओ

ऊंचेपन के चक्कर में
टुच्चेपन से भर जाओ

मोहरे हैं और कठपुतली
जाओ जाकर चुन लाओ

कमज़ोरों की राह यही
बुरे को अच्छा बतलाओ

बदनामी से बचना है
नाम करो, चुप हो जाओ

आखि़र ज़िंदा दिखना है-
पहले दिन से मर जाओ 

मातम भी तो मज़ाक़ है
आओ, थोड़ा हंस जाओ

बड़ा आदमी बनना है-
नहाओ, धोओ, सो जाओ

-संजय ग्रोवर
11-01-2017



बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

असलियत

लघुकथा


मैंने सोचा किसीसे असलियत पता लगाऊं।

मगर चारों तरफ़ सामाजिक, धार्मिक, सफ़ल, महान और प्रतिष्ठित लोग रहते थे।

फिर मुझे ध्यान आया कि असलियत तो मैं कबसे जानता हूं।


-संजय ग्रोवर
05-10-2016




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ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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