मंगलवार, 21 मई 2019

‘कोई ट्रॉल करो न प्लीज़’

व्यंग्य



क्या आपने ट्रॉल को देखा है ?
तो उनके बारे में सुना तो होगा !
सुना है आजकल काफी मशहूर हो चले हैं।
कई सेलेब्रिटीं कहती रहतीं हैं-‘क्या बताऊं यार, मेरे पीछें तो आजकल ट्रॉल पड़े हैं:(
कहने का मन होता है-‘फिर तो काफ़ी मशहूर हों आप!’
ट्रॉल बदतमीज़ी करते होंगे पर कई साल से मुल्क़ में जो वातावरण बना है, ट्रॉल्स ही कई लोगों को हीरो/शहीद भी बनाते हैं।
कभी-कभी ट्रॉल्स के नाम भी दिलचस्प होते हैं, जैसे-‘आई लव यू’, ‘रोटी-रोज़ी’, ‘एक्स-वाई-ज़ेड’........

एक मित्र ने दिखाया, ‘देखो आजकल कितने लोग मुझे ट्रॉल कर रहे हैं...........’
दूसरा मित्र ट्रॉल्स के नाम देखकर सोच में पड़ गया, बोला-‘सच बतईयो, कहीं नाम बदल-बदलकर तू ख़ुद ही ख़ुदको  ट्रॉल तो नहीं कर लेता......’
बताइए कितना गड़बडझाला मचा दिया है इंटरनेट की दुनिया में ट्रॉल्स ने।

लेकिन कइयों का कैरियर भी तो यहीं से चमकता है।
मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि हर मशहूर आदमी की मशहूरी में ट्रॉल्स का योगदान होता है। पर कइयों के में होता भी होगा। तिकड़मबाज़ी से हम परहेज़ भी कहां करते हैं।

मैं कल्पना करता हूं कि आप गाड़ी में जा रहें हैं। अगले ही स्टेशन पर ट्रॉल करवाने का शौक़ीन एक जत्था, कोट-पैंट-टाई पहने, गाड़ी में घुस आता है,  ट्रॉल के कुछ शौक़ीन खिड़कियों पर खड़े हैं।
‘ए भाई साहब, ए बहिनजी, ए मैडम, थोड़ा ट्रॉल करो न बाबा, टी आर पी का सवाल है.....’
‘आजकल चैनल बहुत हो गए, भैया, काम करनेवाले भी बहुत हो गए, अपने हिस्से में ज़्यादा ट्रॉल नहीं आता, मुन्नी, मैं क्या करुं ?’
‘यह बच्चा किसका है?’ खिड़की में से आवाज़ आती है, वहां भी ट्रॉल करवाने के इच्छुक खड़े हैं, उन्हीं में से एक कह रहा है-‘बच्चे से थोड़ा सुस्सू ही करा दो न आंटी, हम अपने हिसाब से पेश कर देंगे कि देखो बच्चे भी किस तरह से ट्रॉल करते हैं, कितना सताते हैं अत्याचारी....’
‘लेकिन आपका सूट तो बिलकुल नया है,-आप कहते हैं,--‘इसपे सुस्सू कैसे करा दें.......’
‘अरे बस, करा दो आंटी, नया सूट सिलवाया ही इसीलिए है।’

आजकल कई संस्थायें फ़ॉलोअर्स बेचती हैं, क्या पता ट्रॉल्स भी बिकते हों ! सोचिए, आप आटा मल रहें हैं या पकौड़े तल रहे हैं कि कॉलबैल बजती है! आप जैसे-तैसे दरवाज़ा खोलते हैं कि एक व्यक्ति कहता है-‘भाई साहब ट्रॉल्स ले लो, सस्ते लगा दूंगा। बिलकुल सच्चे ट्रॉलों जैसे ट्रॉल करते हैं।’
‘काम ही सस्ता करते हैं, सस्ते तो बिकेंगे ही’-आप सोचते हैं।

मंगल बाज़ार लगा है, रात के ग्यारह-बारह बजे हैं। ट्रॉल्स् पड़े-खड़े सड़ रहे हैं। ठेलीवाला कहता है-‘रात का बखत है, एक किलो ले लो, जितने बचे हैं सब डाल दूंगा।’

कोई दोस्त आपसे मिलता है। उसके साथ एक और व्यक्ति है जिसका परिचय वह यह कहकर आपसे कराता है-‘इनसे मिलिए, हमारे पुराने मित्र हैं, क्या ज़बरदस्त ट्रॉल करते हैं, कई लोगों का कैरियर बनाया है इन्होंने।’

एक पुरानी परिचित महिला कहती है-‘मेरे बेटे की जॉब लग गई। आजकल एक विशेष पद का सृजन किया गया है-‘ट्रॉल’, बड़े-बड़ों को ट्रॉल करेगा मेरा बेटा। छोटों को ट्रॉल करके बड़ा बनाएगा।’

एक दिन आएगा जब लोग अपने बच्चों का नाम भी ऐसा ही रखेंगे-‘ये मेरी लड़की ट्रॉली, और ये मेरी बुआ का लड़का ट्रालू। कित्ते प्यारे लगते हैं न!’

एक भिखारी किसीसे कहता है-‘अरे भीख नहीं देते तो थोड़ा ट्रॉल ही कर दो !’
‘हट बे! हमारे पास फ़ालतू टाइम नहीं कि मुफ्त में लोगों को ट्रॉल करतें फिरें’-जवाब मिलता है। पता चलता है कि भिखारी से कम तो ये भी नहीं है।

ट्रॉल के शौक़ीन लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। कोई उन्हें ट्रॉल नहीं करता] इस नाराज़गी में उन्हानें लोगों को ट्रॉल करना शुरु कर दिया है।

-संजय ग्रोवर
21-05-2019

रविवार, 14 अप्रैल 2019

कहो भीड़ बन जाऊं क्या

ग़ज़ल

मैं भी प्यार ‘जताऊं’ क्या
झूठों में मिल जाऊं क्या

15-03-2019

जिस दिन कोई नहीं होता
उस दिन घर पर आऊं क्या

जीवन बड़ा कठिन है रे

फिर जीकर दिखलाऊं क्या

इकला हूं मैं बचपन से 

कहो भीड़ बन जाऊं क्या

जब खाता तब खाता हूं

तुमको कुछ मंगवाऊं क्या

जो-जो मैंने काम किए

तुमको भी दिखलाऊं क्या

यूंही जलती रहती है

बत्ती सुनो बुझाऊं क्या

मैं दुनिया से नहीं मिला

तो मैं जां से जाऊं क्या

कभी-कभी डर लगता है

सुनो अभी मर जाऊं क्या
14-04-2019
       -संजय ग्रोवर 



देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंतर्द्वंद (1) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अकेला (3) अनुसरण (1) अफ़वाह (1) अफवाहें (1) अर्थ (1) असमंजस (2) असलियत (1) अस्पताल (1) अहिंसा (3) आंदोलन (4) आकाश (1) आज़ाद (1) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (2) आत्मकथा (1) आत्मविश्वास (1) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आभास (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (3) इतिहास (2) इमेज (1) ईक़िताब (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (2) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचा (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (2) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरपंथी (1) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कन्फ्यूज़न (1) कमज़ोर (1) कम्युनिज़्म (1) कर्मकांड (1) कविता (65) कशमकश (2) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) काव्य (5) क़िताब (1) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) ख़ाली (1) खीज (1) खेल (1) गज़ल (5) ग़जल (1) ग़ज़ल (28) ग़रीबी (1) गांधीजी (1) गाना (7) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (7) गुंडे (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चांद (2) चालाक़ियां (1) चालू (1) चिंतन (2) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छंद (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) छोटापन (1) छोटी बहर (1) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) ज़हर (1) जागरण (1) जागरुकता (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) झूठ (3) झूठे (1) टॉफ़ी (1) ट्रॉल (1) ठग (1) डर (4) डायरी (2) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ड्रामा (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज (1) तंज़ (9) तमाशा़ (1) तर्क (2) तवारीख़ (1) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (1) तुक (1) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दिशाहीनता (1) दुनिया (2) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (2) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) द्वंद (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) धोखेबाज़ (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़रिया (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नफरत की राजनीति (1) नया (3) नया-पुराना (1) नाटक (1) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (3) निष्पक्षता (1) नींद (1) पक्ष (1) पड़़ोसी (1) पद्य (3) परंपरा (5) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (8) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पुराना (1) पैंतरेबाज़ी (1) पोल (1) प्रकाशक (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फंदा (1) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बच्चा (1) बच्चे (1) बजरंगी (1) बड़ा (2) बड़े (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बयान (1) बहस (14) बहुरुपिए (1) बात (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (2) बेईमानी (2) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (2) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भाषणबाज़ (1) भीड़ (4) भ्रष्ट समाज (1) भ्रष्टाचार (5) मंज़िल (1) मज़ाक़ (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (4) ममता (1) मर्दानगी (1) मशीन (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) महापुरुष (1) मां (2) मातम (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मायना (1) मासूमियत (1) मिल-जुलके (1) मीडिया का माफ़िया (1) मुर्दा (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रस (1) रहस्य (2) राज़ (2) राजनीति (5) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) रात (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (8) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लेखक (1) लोग क्या कहेंगे (1) वात्सल्य (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (81) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) व्याख्यान (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (54) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संपादक (1) संस्थान (1) संस्मरण (2) सकारात्मकता (1) सच (4) सड़क (1) सपना (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (35) सर्वे (1) सवाल (2) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साजिश (1) साभार (3) साहस (1) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (6) साहित्य में आतंकवाद (18) सीज़ोफ़्रीनिया (1) स्त्री-विमर्श के आस-पास (18) स्लट वॉक (1) स्वतंत्र (1) हमारे डॉक्टर (1) हयात (1) हल (1) हास्य (4) हास्यास्पद (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (2) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) हिम्मत (1) हुक्मरान (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) alone (1) ancestors (1) animal (1) atheism (1) audience (1) author (1) autobiography (1) awards (1) awareness (1) big (2) Blackmail (1) book (1) chameleon (1) character (1) child (2) comedy (1) communism (1) conflict (1) confusion (1) conspiracy (1) contemplation (1) corpse (1) Corrupt Society (1) country (1) courage (2) cow (1) cricket (1) crowd (2) cunning (1) dead body (1) decency in language but fraudulence of behavior (1) devotee (1) devotees (1) dishonest (1) dishonesty (2) Doha (1) drama (2) dreams (1) ebook (1) Editor (1) elderly (1) experiment (1) Facebook (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) gandhiji (1) ghazal (19) god (1) gods of atheists (1) goons (1) great (1) greatness (1) harmony (1) highh (1) hindi literature (3) Hindi Satire (9) history (2) history satire (1) hollow (1) honesty (1) human-being (1) humanity (1) humor (1) Humour (3) hypocrisy (4) hypocritical (2) in the name of freedom of expression (1) inner conflict (1) innocence (1) innovation (1) institutions (1) IPL (1) jokes (1) lie (3) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lonely (1) love (1) lyrics (4) machine (1) master (1) meaning (1) mob (3) moon (2) mother (1) movements (1) music (2) name (1) neighbors (1) night (1) non-violence (1) old (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppotunism (1) oppressed (1) paper (1) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) perspective (1) plagiarism (1) poem (11) poetry (29) poison (1) Politics (1) poverty (1) pressure (1) prestige (1) publisher (1) puppets (1) quarrel (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) reality (1) rituals (1) royalty (1) rumors (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (26) schizophrenia (1) secret (1) secrets (1) sectarianism (1) senseless (1) shayari (7) short story (5) shortage (1) sky (1) sleep (1) song (10) speeches (1) sponsored (1) spoon (1) statements (1) Surendra Mohan Pathak (1) survival (1) The father (1) The gurus of world (1) thugs (1) tradition (3) trap (1) trash (1) tricks (1) troll (1) truth (3) ultra-calculative (1) unemployed (1) values (1) verse (5) vicious (1) violence (1) virtual (1) weak (1) weeds (1) woman (2) world (2) world cup (1)