Wednesday, November 25, 2009

मोहे अगला जनम ना दीजो-2



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भला किसी को ग़ज़लें भी फ़ुल वॉल्यूम पर सुनते देखा है कभी !

सरल सुनता है कि पूरे मोहल्ले को सुनाता है !?

‘‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,

वे काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।’’

जगजीत सिंह की आवाज़ जैसे कोई डोर है। सरल उसपर चढ़ता है और पतंग बन जाता है। यूं मुक्त आकाश में लहराना कितना अच्छा लगता है सरल को।

25 का हुआ सरल। 30 का हुआ सरल। 35 का हुआ सरल।

मगर वही कमरा। वही बंद दरवाज़ा। वही ऊंची आवाज़ में ग़ज़लें। कभी जगजीत की जगह मेंहदी हसन ले लेते हैं तो कभी हरिहरन। कभी ग़ुलाम अली आ जाते हैं तो कभी हुसैन बंधु। कभी-कभार भूपेन हज़ारिका भी आते हैं। लता, रफ़ी, किशोर भी आते हैं...

’’कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.......’’

मगर जगजीत की आवाज़ में आवाज़ मिलाना इतना अच्छा क्यों लगता है सरल को !

‘‘ न दुनिया का डर था न रिश्तों के बंधन’’

और तेज़ ! और ऊंचा। बात-बेबात झेंपने, शरमाने, डरने और घबराने वाला सरल बंद कमरे में अपनी आवाज़ को एकदम खुला छोड़ देता है। कमरा एक स्टेज बन जाता है। अब उसमें और जगजीत सिंह में कोई फ़र्क नहीं। साथ-साथ बैठे कोरस गा रहे हों जैसे।

खुले में जितना छुपना पड़ता है, बंद में ख़ुदको उतना ही खोल देना चाहता है सरल।

‘‘मैं भी कुछ हंू, देखो कितनी कलाएं हैं मुझमें, सुनो...!’’

कैसी है ख़ुदको अभिव्यक्त करने की यह जानलेवा छटपटाहट !?

क्या बाहर कोई मुझे सुन रहा होगा !

‘‘मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी.......’’



एकाएक कुछ याद आ जाता है सरल को। कोई चीज़ है जो कचोट रही है भीतर से।



यह किसके बचपन के बारे में बात चल रही है आखि़र ! ऐसा क्या था जिसे लौटाने के लिए दुआएं, प्रार्थनाएं हो रही हैं ! गिड़गिड़ाया जा रहा है ! होगा यह जगजीत सिंह का बचपन। होगा यह तलत अजीज़ और सुदर्शन फ़ाकिर का बचपन। सरल क्यों इसके गुणगान में इस कदर लीन है ! सरल का बचपन तो नहीं यह। क्या सरल की भी इच्छा होती है अपने बचपन में लौटने की !

सिहर उठता है सरल। धुंधली यादों में मकड़ी के जालों से भरे कमरें हैं। अदृश्य दीमकें हैं जो भीतर-भीतर सारे बचपन को कुतर जाती थीं और बाहर किसी को पता भी नहीं चलता था। अपने ही लिजलिजे अस्तित्व की सीलन से भरे बिस्तर हैं। वे आक्रमणकारी छींकें हैं जो 50-50 की संख्या में एक साथ हमला करतीं थीं और सरल की कमर के साथ मनोबल को भी तोड़ देतीं थीं। और 5-10 घंटों के इंतेज़ार की यादें हैं कि अब बस अब मेहमान जाएंगे और सरल अपनी झेंप को पोंछता-छुपाता कमरे से बाहर निकलेगा। उम्मीद करेगा कि मां ख़ुदबख़ुद ही कुछ खाने को दे दे, उसे कोई याचक मुद्रा न बनानी पड़े। न मां पर हमलावर होना पड़े। फ़िलहाल तो मां से लड़ना ही उसके लिए मर्दानगी है। जिसके लिए सौ-पचास कोड़े अपने-आपको भी मारने होते हैं अंधेरे बंद कमरों में।

और क्या-क्या है सरल के बचपन में।



‘‘ ांडू आ गया। ांडू आ गया।’’

मोहल्ले के बच्चे सरल के पीछे-पीछे आ रहे हैं।

सरल के पैरों में पसीना है। चप्पलें उतर-उतर जाती हैं। क़दम-क़दम पर, गिर जाने के डर से शरीर कांप रहा है। ऊपर छतों पर खड़े लोग उस पर हंस रहे हैं, सरल को लगता है। सात घरों वाली यह गली पार करने में न जाने कितनी उम्र बीत जाएगी। ऊपर से ये बच्चे पीछे लगे हैं,

‘‘ ांडू है।’’ ं

‘‘ ांडू है।’’

कौन हैं ये बच्चे ! क्यों सरल के पीछे लगे हैं !? क्या कह रहे हैं सरल को !?



(जारी)



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Friday, November 13, 2009

दमित-विमर्श


सुना है कि वक्त बदल गया है।पुरुष भी अब आज़ाद हो रहे हैं। मगर मैं कहता हूं कि फ़िर कहां है वो लड़की जो मेरा हाथ पकड़कर जबरन मुझे घर से बाहर खींच ले जाए। झिड़के कि कहां रसोई में घुसे रहते हो दिन-भर, देखो अब मर्द भी बाहर घूम रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, मंचों पर कहानी-कविता पढ़ रहे हैं।

लो, यह नेकर पहनो। अनकमफर्टेबल होने की ज़रुरत नहीं। लो पहनो पहनो हाफ शर्ट, पहनो सैण्डो बनियान। और किसी लड़की ने तुम्हारी तरफ़ बुरी निगाहों से देखा या अश्लील फिकरा कसा तो मैं उसकी आंखें निकाल लूंगी, ज़ुबान खींच लूंगी। चलो बैठो मोपेड पर मेरे पीछे। चलो छोड़ो इसे, आज गाड़ी तुम ड्राइव करो, हौसला रखो, मैं बैठी हूं न तुम्हारे पास।



कहां है वो लड़की !? मैं उसके साथ घिसटता चला जाऊंगा।


--एक्स वाई ज़ेड

(फेसबुक/संवादघर से निवेदन है कि मेरा असली नाम न छापें। मर्दों के लिए ज़माना अभी इतना भी नहीं बदला। लड़कियों और उनकी बाप-मांओं को पता चल गया तो मेरे लिए अच्छे घर की खाती-कमाती लड़की मिलनी मुश्किल हो जाएगी।)

Thursday, October 29, 2009

मोहे अगला जनम ना दीजो ।



क्या करे इन हाथों का ? काट डाले इन्हें ? फेंक आए कहीं जाकर ? या हरदम ढंक कर रखे कहीं ? छुपा दे ! या किसी खुरदुरी चीज़ पर तब तक रगड़ता रहे जब तक दूसरे लड़कों की तरह मर्दाने, खुरदुरे, सख्त या गंठीले ना हो जाएं। तनहाई के छोटे से छोटे वक्फ़े में भी ये हीन भावनाएं, ये अपराध-बोध सरल का पीछा नहीं छोड़ते। किसी से हाथ मिलाने से भी डरता है, बचता है सरल। बीच-बीच में सुनने को मिल जो जाता है- ‘अरे यार, तुम्हारे हाथ तो लड़कियों से भी ज़्यादा मुलायम हैं।’'अगर रात अंधेरे में तेरा चेहरा देखे बगैर कोई तुझसे हाथ मिलाए तो यही समझेगा किसी लड़की का हाथ पकड़ लिया है।'


तिस पर दुबला-पतला-पीला शरीर। शर्मीला स्वभाव। तरह-तरह के फोबिया। ज़रा कुछ खट्टा या तला हुआ खाले तो खांसी, ज़ुकाम, पेटदर्द । महीने में 15 दिन बिस्तर पर गुज़रते हैं। धैर्य नाम की चीज़ से सरल का कोई वास्ता है नहीं। लोग उसकी चुप्पी और अवसाद को ही उसका धैर्य समझ लेते हैं तो उसका क्या कसूर। अशांति का महासागर ठाठें मारता रहता है सरल की छोटी-सी खोपड़ी में। बिस्तर में रहता है तो तरह-तरह की अच्छी बुरी कल्पनाएं और फंतासियां भी साथ रहती ही हैं।



कैसी-कैसी कल्पनाएं हैं सरल की ! एक ऐसी पोशाक बनवाए जिसमें से उसकी तो एक उंगली तक न दिखे पर वह सबको समूचा देख सके। कोई ऐसी कार मिल जाए उसे कि वह तो अंदर से सबको देखले पर उसकी किसी को झलक तक न मिले।



एक तो पड़ा-पड़ा जासूसी उपन्यास पढा करता है ऊपर से जाने किसने दे दिए हैं उसे ये फोबियाओं के उपहार। कहां से क्यों आ गया यह जानलेवा अपराध-बोघ! भयानक असुरक्षा की भावना। इस तरह लोगों से छुपकर, डरकर, शरमा कर अंधेरे कमरों की ओट में कैसे काटेगा वह अपनी ज़िंदगी !

(जारी)

Tuesday, October 27, 2009

कुंठा तू न गयी किसी मन से.......


कार्टून ठीक से न दिखता हो तो उसपर चूहे की चोंच से चिकोटी काटें-

Friday, October 16, 2009

अंधेरों का कोरस यानि कि एक लीचड़ पैरोडी यानिकि डों‘ट टेक सीरियसली......



यारों सब धुंआं करो



मिलकर धुआं करो


बचे-ख़ुचे पर्यावरण को


धकेलो, दफ़ा करो


यारों सब धुंआं करो......






लोगों को दमा करो


चाहे अस्थमा करो


कानों को फ़ाड़ो बम से


अमन प दावा करो


यारों सब धुंआं करो....






पार्क को तबाह करो


तिसपे वाह-वाह करो


रोशनी को आग़ में डालो


नाचो, स्वाह-स्वाह करो


यारों सब धुंआं करो....






ओज़ोन पे आह करो


मौजों पे वाह करो


शांति को तलाक दे दो


शोर से निकाह करो


यारों सब धुंआं करो....






मिठाई जमा करो


ठूंसो-ठांसो, ठां करो


सुबह फ़िर हवा करो


और फ़िर दवा करो


यारों सब धुंआं करो....






(बतर्ज़: यारों सब दुआ करो....)

Monday, September 28, 2009

मौलिकता ससुरी होती ही है अनगढ़



मौलिकता तो वो है मेरे दोस्त

जिसे जानकर तुम्हारे छक्के छूट जाएं

हवा ख़राब हो जाए

सारी दुनिया से तुम्हारा विश्वास उठ जाए



अपनी सारी ज़िन्दगी पर

दोबारा सोचने को मजबूर हो जाओ तुम



जिसे सुनते ही

पहले-पहल यही कहो तुम

कुतर्क करता है साला

अनगढ़ है इसका सारा सृजन



यहाँ तुम बिल्कुल सही हो मेरे दोस्त

सारे गढ़े गए को ध्वस्त करके ही

फ़ूटते हैं मौलिकता के अंकुर

जो दलीलें तुमने न कभी पढ़ी न सुनी

वही तुम्हे लगती हैं कुतर्क

( पर इसका क्या करें कि ज़्यादातर वही होती हैं मौलिक

और तर्क कुतर्क की परिभाषाएं आज तक नहीं बन पायीं )



दुनिया में

बिलकुल दुनिया की ही तरह

होकर और रहकर भी

दुनिया से अलग क्यों दिखना चाहते हो मेरे दोस्त

क्यों ओढ़ना चाहते हो सम्मानों की शाल

क्या छुपा लेगी तुम्हारे पुरस्कारों की ढाल

इनके बिना ख़ुदको निर्वस्त्र और अविश्वसनीय

क्यों समझते हो मेरे दोस्त



अपने लिए गढ़े गए सुरक्षित कोने में

यह कौन-सी बदबू है

जो तुम्हे तुम्हारी उपलब्धियों का मज़ा नहीं लेने देती



गढ़े गए मूल्य

गढी गयी साजिशें

गढ़ी गयी सफ़लता की कसौटियां

गढ़ी गयी मंज़िल की परिकल्पनाएं

गढ़ा गया सामाजिक ढांचा

गढ़े गए अच्छाई और बुराई के मानक

और गढ़े हुए तुम

आखि़र समझोगे भी कैसे

अपनी बेचैनी को

और इसकी अविश्वसनीयता को



पहले अनगढ़ तो बनो मेरे दोस्त

पर मुसीबत तो यह है कि

अनगढ़ तो बना भी नहीं जा सकता

और बनाया भी नहीं जा सकता

क्योंकि मौलिकता बहुत सारी

कथित सुंदर चीज़ों के ढेर से नहीं बनती

बल्कि

बहुत सारी असुंदर और गढ़ी गयी चीज़ों के

न होने से होती है



-संजय ग्रोवर



(‘युद्धरत आम आदमी’ में प्रकाशित)

रचना तिथि: 04-05-2007

Wednesday, September 16, 2009

छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां


कई बार अपने या दूसरों के ब्लागस् पर अपनी या दूसरों की कुछ टिप्पणियां ऐसी लगती हैं कि मन होता है इन्हें ज़्यादा महत्व देकर ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए। ‘छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां’ ऐसी ही टिप्पणियों का मंच बन रहा है। शुरुआत पूजा प्रसाद के ब्लाग ‘जो जारी है.....’ पर आस्तिक-नास्तिक की एक दोस्ताना बहस पर की गयी अपनी ही टिप्पणी से:-


पूजाजी, बुरा मत मानिएगा, मुझे ईश्वर को मानने वालों के तर्क हमेशा ही अजीबो-गरीब लगते हैं। और उनके पीछे फिलाॅस्फी ( ) भी ऐसी ही है जो उन्हें अजीबो-गरीब ही बना सकती है। एक शेर में यह मानसिकता बखूबी व्यक्त हो गयी है -



जिंदगी जीने को दी, जी मैंने,

किस्मत में लिखा था पी, तो पी मैंने,

मैं न पीता तो तेरा लिखा ग़लत हो जाता-

तेरे लिखे को निभाया, क्या ख़ता की मैंने !



अब हम शायर महोदय से विनम्रतापूर्वक पूछें कि आपको पता कैसे लगा कि आपकी किस्मत में यही लिखा था। अगर आप न पीते तो यही समझते रहते कि आपकी किस्मत में न पीना लिखा था। क्योंकि ऐसी कोई किताब तो कहीं किसी फलक पर रखी नहीं है कि जिसे हम पहले से पढ़ लें और जान लें और घटना के बाद संतुष्टिपूव्रक मान सकें कि हां, यही लिखा था, यही हुआ। भाग्य और भगवान के नाम पर चलने वाली यह ऐसी बारीक चालाकी है जिसके तहत जो भी हो जाए, बाद में आराम से कहा जा सकता है कि हां, यही लिखा था। आखिर कोई कहां पर जाकर जांचेगा कि यह लिखा था या नहीं !?



अब कुछ उन तर्कों पर आया जाए जिनके सहारे ‘भगवान’ को ‘सिद्ध’ किया जाता है। ये तर्क कम, तानाशाह मनमानियां ज़्यादा लगती हैं। इन्हीं को उलटकर भगवान का न होना भी ‘सिद्ध’ किया जा सकता है। देखें:-

1। चूंकि लाल फूल लाल ही रहता है, इसका मतलब भगवान नहीं है।


2। चूंकि दुनिया इतने सालों से अपनेआप ठीक-ठाक चल रही है इसलिए भगवान की कोई ज़रुरत ही नहीं है यानिकि वो नहीं है।


3। चूंकि दुनिया में इतना ज़ुल्म, अत्याचार, अन्याय और असमानता है जो कि भगवान के रहते संभव ही नहीं था अतः भगवान नहीं है।


4। भगवान को मानने वालों की भी न मानने वालों की तरह मृत्यु हो जाती है, मतलब भगवान नहीं है।


5। चूंकि अपने आप सही वक्त पर दिन और रात हो जाते हैं इसलिए भगवान नहीं है। आदि-आदि....



अब यह तर्क है कि ज़बरदस्ती कि आप चाहे कुदरत कहो पर है तो वो ईश्वर......



धर्म और तर्क एक ही चीज़ है.......


कैसे पूजाजी !?


इसे और विस्तार दूंगा। तब तक आप यह पोस्ट और प्रतिक्रियाएं पढ़ें:-


क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?


एक अन्य प्रासंगिक पोस्ट ‘ईश्वर किसे पुकारे’ का लिंक भी यहां लगा रहा हूं। इसे भी पढ़ें।



-संजय ग्रोवर

Monday, September 14, 2009

ग़ज़ल जो अब तक छपी नहीं, पढ़ो कहीं तो पढ़ो यहीं

ग़ज़ल

हिन्दुस्तान में हिन्दी जैसी उसकी हालत अपने घर में
जैसे शीशा देख रहा हो अपनी सूरत इक पत्थर में


अपने-अपने समय को देखो अपनी-अपनी घड़ी चलाओ
यारो धोखा खा जाओगे देखोगे गर घंटाघर में



अपने पुरखे नहीं रहे अब ऐसा कहना ठीक न होगा
हमने अकसर देखा उनको घुड़की देते उस बंदर में




देश का सौदा करने वाले सारे लोग नहीं इक जैसे
बेच रहे कुछ इसे थोक में बेच रहे हैं कुछ फुटकर में



मंज़िल भी थी आँख के आगे और इरादे भी थे पक्के
फिर भी भटक गया मन यारों रस्ते इतने मिले सफर में





-संजय ग्रोवर

Thursday, August 20, 2009

ग़ज़ल जो ढंग से नहीं छपी ! यहां छपी क्या खू़ब छपी !


ग़ज़ल

बह गया मैं भावनाओं में कोई ऐसा मिला
फ़िर महक आई हवाओं में कोई ऐसा मिला

खो के पाना पा के खोना खेल जैसा हो गया
लुत्फ़ जीने की सज़ाओं में कोई ऐसा मिला

खो गए थे मेरे जो वो सारे सुर वापिस मिले
एक सुर उसकी सदाओं में कोई ऐसा मिला

हमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी था
दर्द मीठा-सा, दवाओं में कोई ऐसा मिला

रेत में भी बीज बो देने का मन होने लगा
मेघ आशा का घटाओं में कोई ऐसा मिला

-संजय ग्रोवर

Saturday, August 15, 2009

क्या हमें ‘सच का सामना’ नहीं ‘सच का परदा’ चाहिए !?

नैतिकता पर बहस शायद आज की सबसे मुश्किल बहस है। क्योंकि ज़्यादातर लोग ‘चली आ रही नैतिकता’ पर अड़े रहते हैं, भले व्यवहार में इसका उल्टा करते हों। थोड़े-से लोग नैतिकता के नियमों को बदलने की कोशिश करते हैं। उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें पुराने नियम अमानवीय व अलोकतांत्रिक लग रहे होते हैं तो कुछेक ऐसे भी होते हैं जो व्यक्तिगत स्वार्थों या ‘नयी भीड़’में शामिल होने की खातिर ऐसा करते हैं। उनमें से कुछ की नैतिकता को लेकर अपनी एक तार्किक सोच भी हो सकती है। मुझे लगता है कि ‘जो करना वही कहना’ या ‘जो किया, कह दिया’ नैतिकता है। इस दृष्टि से मुझे ‘सच का सामना’ एक बेहद मामूली सीरियल लगता है जिसपर इतना हल्ला-गुल्ला होना हैरान करता है। मुझे याद आता है कि 25-30 साल पहले सरिता-मुक्ता जैसी आर्य-समाजी पत्रिकाओं में लगभग यही सब बातें ‘पाठकों की समस्याएं’ में बतौर प्रश्न छपा करती थीं। फ़र्क बस इतना है कि वहां पाठकों के नामों की जगह कखग वगैरह लिखा रहता था। ज़ाहिर है कि यह सब सरिता के संपादक गण अपने मन से बनाकर तो लिखते नहीं होंगे। एक दिलचस्प तथ्य मैं देख रहा हूं कि जहां भी इस कार्यक्रम पर टिप्पणी, लेख आदि आ रहे हैं हर जगह ऐतराज़ यही है कि यह सब पर्दे पर कहा क्यों जा रहा है ! ‘यह सब किया क्यों गया’ इसपर अभी तक कोई आपत्ति मेरे देखने में नहीं आयी। क्या नैतिकता यह है कि विनोद कांबली अपनी एक टीस, एक शिकायत को मन में दबाए रखकर झूठी दोस्ती बनाए रखें !? यह कैसी दोस्ती है जिसमें अपने दिल की बात दोस्त से कह देने भर का भी स्पेस नहीं !? और यह दबी हुई कुण्ठा इस दोस्ती के लिए आगे चलकर किसी और शक्ल में और ज़्यादा ख़तरनाक साबित नहीं हो सकती !? अगर एक महिला वहां जाकर झूठ बोलती है कि वह अपने पति के अलावा किसी अन्य से संबंध बनाने की ख्वाहिशमंद नहीं रही और वह झूठ पकड़ा जाता है तो सवाल यह भी तो उठता है कि क्या उस महिला को पता नहीं था कि वह ‘सच का सामना’ करने जा रही है ? वह क्यों गयीं वहां अगर उसमें सच का सामना करने की हिम्मत नहीं थी ? इसके अलावा कोई बेईमान आदमी ही यह कह सकता है कि 13-14 की उम्र तक आते-आते उसे विपरीतलिंगियों के प्रति आकर्षण होना (जिसे आज की प्रचलित भाषा में ‘क्रश आना’ कहते हैं) नहीं शुरु हो गया था। फिर हम क्यों चाहते हैं कि हम लगातार झूठ भी बोलते रहें ऊपर से अपने देश को ‘सच्चाई का पुजारी’, ‘नैतिकता की सबसे पुरानी/प्रतिष्ठत कर्मशाला’ भी कहते रहें !? या तो हम मान लें कि हम झूठे हैं। कम-अज़-कम एक यही सच बोल दें।

या फिर हम अपने सच का इस्ते माल वहीं तक करना चाहते हैं जहां तक वो हमारे झूठ का परदा बन सके !?