Wednesday, February 29, 2012

कि शायर अपनी बरबादी से ही आबाद होते हैं


ग़ज़ल

मिले हमको ख़ुशी तो हम बड़े नाशाद होते हैं
कि शायर अपनी बरबादी से ही आबाद होते हैं


ये सच्चाई का पारस इस तरह चीज़ें बदलता है
तुम्हारे संग मेरी ज़द में आकर दाद होते हैं


दिखे जो मस्लहत तो पल में सब कुछ भूल जाते हैं
वो जिनको ज़िंदगी के सब पहाड़े याद होते हैं


किसी दिन तुम ख़ुदी को, ख़ुदसे पीछे छोड़ जाते हो
वो सब जो तुमसे आगे थे, तुम्हारे बाद होते हैं


वो गिन-गिनकर मेरी नाक़ामियों को याद करते हैं
मुझे उनके तरक्क़ी के तरीक़े याद होते हैं


-संजय ग्रोवर


नाशाद= दुखी, संग=पत्थर, ज़द=दायरा, पहुंच, रेंज, मस्लहत=फ़ायदा,

(हांलांकि अलग़-अलग़ डिक्शनरियों में ज़द शब्द के अलग़-अलग़ अर्थ जैसे चुगना, चोट, प्रहार-सीमा, लक्ष्य आदि दिए गए हैं मगर जब आप वाक्य-प्रयोग देखेंगे तो वही अर्थ ज़्यादा नज़दीक पाएंगे जो ऊपर दिए गए हैं।)

Wednesday, December 14, 2011

नाथूराम, अहिंसा और इतिहास

लघुकथा


जब तक अंग्रेज भारत में रहे, नाथूराम का आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहा। इतना कि देश में किसी को पता भी नहीं था कि यहा कोई नाथूराम रहता है।
अंग्रेजों के जाते ही और भारत के आज़ाद होते ही नाथूराम मुखर होकर आंदोलित हो गया। उसकी पिस्तौल एकाएक जागरुक हो गयी। गोलियां आज़ादी के गीत गाने लगीं। जिस नाथूराम ने कभी किसी अंग्रेज का बाल भी बांका नहीं किया था उसने बिना किसी सुरक्षा के चलने वाले निहत्थे बूढ़े पर गोलियां दाग़ दीं।
इस तरह नाथूराम इतिहास में शामिल हो गया।
नाथूराम के जीवन से हमें शिक्षा मिलती है कि इतिहास तो कमज़ोर आदमी का मकान है, इसमें कभी भी घुसपैठ की जा सकती है।
यह शिक्षा भी मिलती है कि इतिहास में शामिल होने के लिए हमें कुछ भी कर डालना चाहिए।
नाथूराम का जीवन बहुत शिक्षाप्रद रहा। संभवतः आज भी बहुत-से आंदोलनकारी उसके जीवन से शिक्षा लेते होंगे।

किसी ताज़ा आंदोलन में कोई नाथूराम गांधी टोपी लगाए अहिंसा पर उपदेश देता मिल जाए तो भी कोई हैरानी की बात न होगी।



-संजय ग्रोवर

Friday, October 21, 2011

‘दिस इज़ नॉट अ शॉप, दिस इज़ अ मूवमेंट’


व्यंग्य

दोस्त ने अचानक गाड़ी रोकी।
एक शानदार शोरुम। नीचे छोटा-छोटा लिखा है ‘आंदोलन का सामान’।
दुकान के नाम के नीचे यह भी लिखा है, ‘दिस इज़ नॉट अ शॉप, दिस इज़ अ मूवमेंट’
‘यार, बेटा कई दिन से ज़िद कर रहा है, आंदोलन करना है।’ 
‘अच्छा ! पहले नही बताया ? पहले भी करता है ?’
‘नहीं यार...... कहता है पापा, सारे दोस्त करते है, बस मै ही.......मुझे भी बड़ा सॉरी फ़ील हुआ यार.....’
‘करोगे कहां ? इतनी जगह है...
‘छत पर कर लेगे यार, खुल्ली छत है, इसके दोस्तों ने ही तो आना है बस...
‘अच्छा, जहां पिछले साल इल्लीगल कमरा डाला था !?’
‘चल आ सामान  लें लें, भीड़ बहुत है.......’
‘जी सर, कितना बड़ा आंदोलन करना है, सामान लिखा दीजिए लड़के को’, दुकानदार को फुरसत नही है।
‘भाईसाहब, बड़ा आदोलन करना हो तो कितनी देर मे सामान मिल जाएगा ?’, एक ग्राहक पूछ रहा है।
‘कितने लोग हैं, कहां करना है, एरिया कितना बड़ा है?’
‘कम से कम बीस हज़ार तो होंगे..... ग्राहक डिटेल देता है।
'दो घण्टे मे सब मिल जाएगा...’
‘पचास टोपी, पचास झण्डे, टैटू का सामान, दो डीजे.....’दोस्त लिखवा रहा है।
सामने सुंदर, बड़े-से शोकेस में ग़ज़ब की हलचल है।
‘यह क्या भाईसाहब, ये सचमुच के आदमी हैं या कठपुतलियां हैं ?’, मैं डरते-डरते पूछता हूं।
‘खा गए न चक्कर, भाईसाहब, ये ऐसी कठपुतलियां हैं जो सारा आदोलन ख़ुद ही कर लेतीं हैं, आपको कुछ नहीं करना, बस चाबी भरनी है। कोई कह दे नकली आंदोलन है तो पैसा वापिस।’
‘इसमे मीडिया भी है, भाईसाहब ?’
‘लो जी ! मीडिया के बिना कैसे चलेगा ? आप भी यार....अरे मीडिया ही तो वो चाबी है जिससे पूरा आंदोलन चलता है।’
दोस्त ने सामान ले लिया है।

‘यह नोट नहीं चलेगा’, दुकानदार एक नोट लौटा रहा है।
'क्यों!?'
‘यह देखिए, इस आदमी ने टोपी नहीं लगा रखी, अब यह नोट नहीं चलते,’ वह कारण बताता है, ‘नोट में टोपी साफ़ दिखनी चाहिए, आदमी भले कम दिखे’ वह समझाता भी है।

हम लौट रहे हैं।
‘चलो कुछ तो चेंज आएगा, यार।’
‘मोटिव क्या है आंदोलन का ?’
‘वो तो मैने पूछा नही यार....आज-कल बहुत लोग करते हैं, होली-दीवाली की तरह हो गया है......बच्चों का मन आता है तो कर लेते हैं मिल-जुलके.....’
‘बेटी क्या कर रही है आज-कल ?’
‘बेटी को भी करवाएगे, एकदम से आंदोलन तो नहीं, अभियान से शुरु कराएंगे.....लड़कियों के आंदोलन पर तो अब सरकार भी फैसिलिटी दे रही है। बड़ा भारी डिस्काउंट है।’
गाड़ी धीमी होती है...एक शोरुम के सामने भीड़ जमा है, पास जाकर पता चलता है कि लोग छोटे-बड़े सामान लेकर चुपचाप अपने घर जा रहे है...
‘क्या कोई सेल लगी है?’, मै पूछता हूं...
‘अरे भाई, अदंगा चल रहा है...’
‘अ-दंगा ! यह क्या होता है !’
‘नया कांसेप्ट आया है, लोग दुकान को घेरकर बैठ जाते हैं, सारे रास्ते बंद कर देते हैं, खाना-पीना छोड़ देते हैं, दुकानदार से कहते हैं कि अपना सारा सामान अपनी मर्ज़ी से शांति और अहिंसा के साथ हमें दे दो। हमारे बताए समय के अंदर अगर न दिया तो इस  दुकान पर वो होगा जो पहले कभी नही हुआ....’
दोस्त दुनियादार आदमी है, उसके पास सारी नवीनतम सूचनाएं रहतीं हैं।
‘फिर वह बेमन से सामान निकालकर अपनी मर्ज़ी से दे देता है....’ दोस्त बात पूरी करता है।
‘चेंज तो आ रहा है, यार....’
‘मझे चक्कर आ रहा है यार, चल घर चलकर थोड़ा आराम करते हैं।’

-संजय ग्रोवर 

Wednesday, October 12, 2011

दहेज नहीं होती दुलहन


अरसा हुआ ‘संवादघर’ ने औरतो की ख़बर नहीं ली।
परसों जब जगजीत सिंह पर लिखे अपने एक लेख को ढूंढ रहा था तो यह कटिंग भी मिल गयी।
दिए गए विषय या मांग पर लिखना मेरे लिए बहुत मुश्क़िल काम रहा है। प्रस्तुत लेख एक ऐसी ही रचना है। फ़िलहाल टाइपिंग का मन नहीं है तो सीधे कटिंग लगा रहा हूं:









Tuesday, August 23, 2011

एक आज़ाद ग़ज़ल



हुकूमत करना चाहो हो..तो हिम्मत क्यूं नहीं करते ?
सियासत तुमको करनी है तो सीधे क्यूं नहीं करते ?

अगर बदमाश है राजा, तो तुम ही कौन-से कम हो ?
कभी फ़रियाद करते हो, कभी छाती पे चढ़ते हो

ये कैसी हड़बड़ी के गड़बड़ी का इल्म होता है !
ठहर के कैसे सोचोगे ? बहुत जल्दी में लगते हो

कभी घुसते हो चिलमन में, कभी चढ़ते हो टोपी पर
जो समझाया है औरों को, कहो ख़ुद भी समझते हो !

बग़ावत लफ्ज़ सुनने में, बहुत अच्छा तो लगता है
फिर उसके बाद जो होता है उसको भी समझते हो ?

हमारा नाम आगे करके हमसे ही नहीं पूछा
कभी इसके अलावा और कुछ तुम कर भी सकते हो ?

किसी की जान जाती है, तुम्हारी शान की ख़ातिर
ज़रा भी ख़ुद नहीं बदले, न जाने क्या बदलते हो !

-संजय ग्रोवर

ट्विटर पर ताज़ा टर्र-टर्र

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....