Monday, July 13, 2009

ग़ज़ल,काफ़िया,माफ़िया.....


ग़ज़ल

अपनी तरह का जब भी उन्हें माफ़िया मिला
बोले उछलके देखो कैसा काफ़िया मिला

फ़िर नस्ल-वर्ण-दल्ले हैं इंसान पे काबिज़
यूँ जंगली शहर में मुझे हाशिया मिला

मुझ तक कब उनके शहर में आती थी ढंग से डाक
यां ख़बर तक न मिल सकी, वां डाकिया मिला

जब मेरे जामे-मय में मिलाया सभी ने ज़ह्र
तो तू भी पीछे क्यों रहे, आ साक़िया, मिला

मुझको जहाँ पे सच दिखा, हिम्मत दिखी, ग़ज़ब-
उनको वहीं पे फ़ोबिया.....सिज़ोफ्रीनिया मिला

-संजय ग्रोवर

Wednesday, June 24, 2009

व्यंग्य-कक्ष में ‘आदरणीय जीजाजी’

सभ्य समाज में आदर झटकने के जो कुछेक तरीके मुझे जंचे हैं उनमें से एक है किसी का दामाद हो जाना। जिस घर के आप दामाद हो गए, अगर थोड़ी देर के लिए उस घर को हम राष्ट्र मान लें तो समझिए कि उस घर में आपकी हैसियत राष्ट्रपति जितनी हो जाती है। भारत के राष्ट्रपति जैसी नहीं कि जिसके पास ताम-झाम तो होता है पर काम-धाम नहीं होता। आप तो कम से कम अगला दामाद आ जाने तक, अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह होते हैं जिसे कि भरे-पूरे अधिकार भी प्राप्त होते हैं।
आप सिर्फ दामाद ही नहीं होते, आप जीजाजी भी होते हैं। भारत में जीजाजी होना यानि कि हवा के घोड़े पर सवारी गांठना। यानि कि जलवों के हलवों पर जीभ लपोरते रहना। यानि कि भले ही पूरी दुनिया में आपको कोई न पूछे मगर एक घर सदा ऐसा होता है जो लाल कालीन बिछाए आपके स्वागत को सूखता रहता है। वहां घुसते ही आप महान हो जाते हैं। क्रिकेट की भाषा में कहें तो पिद्दी से पिद्दी बल्लेबाज के लिए भी दुनिया में कम से कम एक पिच तो ऐसी होती है जहां खेलना शुरू करते ही उसके जीवन की पारी जम जाती है।
जीजाजी होने की सुविधापूर्ण स्थिति को तो बड़े-बड़े कवियों ने भी कल्पनाओं तक के कद्दू-कस में कस कर खूब लच्छे बनाए भी हैं और बेचे भी हैं। भारतीय सभ्यता संस्कृति के अनुसार नारी की मर्यादा की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर देने वाले कई बुजुर्ग कवियों ने सालियों की सुंदरता, उनके स्वभावों की चपलता, उनके साथ अपने सभी प्रकार के सम्बन्धों की स्वायत्तता, स्वतंत्रता, उनकी विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों में कर्मठता, अपने जीजाओं के प्रति उनकी कत्र्तव्यनिष्ठा आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए अत्यन्त सुन्दर व सार्थक साहित्य का सृजन किया है।
यानि कि साली न हुई आपकी गली के पिछवाड़े की दीवार हो गई। जिस पर बड़े-बड़े शब्दों में आपने ही लोगों के सामने लिखा है ‘यहां पोस्टर लगाना मना है‘। फिर अकेले में आप ही हैं कि लगाए जा रहे हैं। तिस पर साहित्य में सार्वजनिक रूप से अपने दुष्ट-कर्म का महिमा-मण्डन भी कर रहे हैं। इधर लोग भी आपके लिखने और आपके लगाने पर समान भाव से तालियां बजा रहे हैं।
लगता है कि आपके भीतर के लिखने वाले को भी पता है कि कितना भी लिख लो मगर लगाने वाला लगाने से बाज नहीं आएगा। और अपने व्यवहार के इश्तहार से इस लिखे को मेट कर ही दम लेगा। और इधर लगाने वाला भी जानता है कि यह लिखने वाला फिर-फिर लिखता रहेगा और मैं बार-बार लगाता रहूंगा। यही इस दीवार की नियति है।
वहां पर चार दीवारें एक खास स्थिति में इकट्ठी खड़ी होने के कारण एक घर जैसा बन गया है जहां कि मैं रहता हूं। एक दिन, जब सोचने को और कुछ न बचा तो मैंने सोचा कि एक महिला कर्मचारी रख लूं जो खाना बना दे, कपड़े धोए, बर्तन मांजे व अन्य छोटे-मोटे काम कर दे। पर जब मित्रमल से बात हुई तो कहने लगे कि क्यों दो-चार सौ रूपये महीने खर्चते हो। इससे तो अच्छा है शादी कर लो। पत्नी के पद पर नियुक्त महिला मुत में सारा काम तो करेगी ही साथ में दहेज लाएगी सो अलग। ऊपर से ससुरालियों से रोज़ाना मिलने वाली भेंटे, नकदी, आदर, सम्मान, जलपान वगैरह ... .... ...।
बात मेरी समझ में आई और मैं तैयार हुआ। पत्नी पद की उम्मीदवार से बातचीत चली तो मैंने बताया कि कैसे मित्रमल के सुझाव पर मैं इस नेक ख्याल पर अमल के लिए तैयार हुआ। इतना सुनना था कि वे हत्थे से उखड़ र्गइं। कहने लगी कि आप पत्नी और नौकरानी में कोई फर्क नहीं मानते। मेरे भी पसीने छूटने लगे। कि तभी मेरे दिमाग में एक पुराने विचार का नवीनीकरण हुआ और स्थिति संभल गई। मैंने उन्हे समझाया कि मशहूर अंगे्रज विद्वान जॅर्ज बर्नाड शा के विचार भी पत्नियों के बारे में ऐसे ही थे। इतना सुनना था कि उनका हृदय परिवर्तन हो गया और वे बड़े आदर भाव से मुझे निहारने लगीं।
यही वह पल था जब मेरे दिल में यह ख्याल आया कि आदर हथियाने का यह उपाय भी कोई बुरा नहीं कि अपने लूले-लंगड़े विचारों को भी महापुरूषों के उद्धरणों की बैसाखियों के सहारे पार करा दिया जाए।
वैसे इन दोनों के अलावा भी अन्य कई तरकीबों से मैंने आदर बटोरा है। अगर साथ ले जा सका तो इसे साथ ले जाऊंगा नहीं तो वसीयत में अपने आदरणीय संबंधियों, मित्रों को बराबर-बराबर बांट जाऊंगा।
आपको इस लेख में कोई बात अटपटी या आपत्तिजनक न लगे इसके लिए बता दूं कि यह लेख कई बड़े लेखकों के साहित्य और महापुरूषों की जीवनियों में से कांट-छांट कर बड़ी मेहनत व लगन से लिखा है।
क्या अब भी आप इस लेख को व मुझे आदर नहीं देंगे?

-संजय ग्रोवर

(१८-०३-1994 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)


Tuesday, June 16, 2009

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?


यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।


पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?


दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।


इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !


क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?


ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!


वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?

(नयी पोस्ट लगा रहा हूं इसका मतलब यह नहीं कि पिछली पोस्ट पर बहस खत्म हो गयी।)

Tuesday, May 26, 2009

आध्यात्मिकता अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.


जावेद अख्तर को मैं जब भी देखता-सुनता हूं, खुश भी होता हूं, हैरान भी। चाहे कोई रिएलिटी शो हो या कोई डिबेट। किस साहस और तार्किकता के साथ यह आदमी अपनी बात रखता है। तिसपर अंदाज़े-बयां ! ग़ज़ब ! अभी-अभी मैंने भाई अशोक कुमार पाण्डेय के ब्लाग पर उनका यह व्याख्यान पढ़ा। मुझे लगा कि अगर मुझमें ज़रा-सी भी मानवता, सामाजिकता, व्यवहारिकता और देशप्रेम है तो मुझे तुरंत ही इसे अपने ब्लाग पर पोस्ट करना चाहिए। ‘कबाड़खाना’ http://kabaadkhaana.blogspot.com से इसे मैं साभार ले रहा हूं।


Tuesday, May 26, 2009

आध्यात्मिकता अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है
हमारे समय के बड़े कवि-कहानीकार श्री कुमार अम्बुज ने मेल से यह ज़बरदस्त और ज़रूरी दस्तावेज़ भेजा है. बहुत सारे सवाल खड़े करता जावेद अख़्तर का यह सम्भाषण इत्मीनान से पढ़े जाने की दरकार रखता है. इस के लिए श्री कुमार अम्बुज और डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का बहुत बहुत आभार. (जावेद अख्तर के इण्डिया टुडे कॉनक्लेव में दिनांक 26 फरवरी, 2005 को ‘स्पिरिचुअलिटी, हलो ऑर होक्स’ सत्र में दिए गए व्याख्यान का डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद)मुझे पूरा विश्वास है देवियों और सज्जनों कि इस भव्य सभा में किसी को भी मेरी स्थिति से ईर्ष्या नहीं हो रही होगी. श्री श्री रविशंकर जैसे जादुई और दुर्जेय व्यक्तित्व के बाद बोलने के लिए खड़ा होना ठीक ऐसा ही है जैसे तेंदुलकर के चमचमाती सेंचुरी बना लेने के बाद किसी को खेलने के लिए मैदान में उतरना पड़े. लेकिन किन्हीं कमज़ोर क्षणों में मैंने वादा कर लिया था. कुछ बातें मैं शुरू में ही साफ कर देना चाहता हूं. आप कृपया मेरे नाम –जावेद अख्तर- से प्रभावित न हों. मैं कोई रहस्य उजागर नहीं कर रहा. मैं तो वह बात कह रहा हूं जो मैं अनेक बार कह चुका हूं, लिखकर, टी वी पर या सार्वजनिक रूप से बोलकर, कि मैं नास्तिक हूं. मेरी कोई धार्मिक आस्थाएंनहीं हैं. निश्चय ही मैं किसी खास किस्म की आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं करता. खास किस्म की!एक और बात! मैं यहां बैठे इस भद्र पुरुष की आलोचना करने, इनका विश्लेषण करने, या इन पर प्रहार करने खड़ा नहीं हुआ हूं. हमारे रिश्ते बहुत प्रीतिकर और शालीन हैं. मैंने हमेशा इन्हें अत्यधिक शिष्ट पाया है. मैं तो एक विचार, एक मनोवृत्ति, एक मानसिकता की बात करना चाहता हूं, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं.मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब राजीव ने इस सत्र की शुरुआत की, एक क्षण के लिए मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह पर आ गया हूं. इसलिए कि अगर हम कृष्ण, गौतम और कबीर, या विवेकानन्द के दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं तो मुझे कुछ भी नहीं कहना है. मैं इसी वक़्त बैठ जाता हूं. मैं यहां उस गौरवशाली अतीत पर बहस करने नहीं आया हूं जिस पर मेरे खयाल से हर हिन्दुस्तानी को, और उचित ही, गर्व है. मैं तो यहां एक सन्देहास्पद वर्तमान पर चर्चा करने आयाहूं.इण्डिया टुडे ने मुझे बुलाया है और मैं यहां आज की आध्यात्मिकता पर बात करने आया हूं. कृपया इस आध्यात्मिकता शब्द से भ्रमित न हों. एक ही नाम के दो ऐसे इंसान हो सकते हैं जो एक दूसरे से एकदम अलग हों. तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की. रामानंद सागर ने टेलीविज़न धारावाहिक बनाया. रामायण दोनों में है, लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुलसीदास और रामानंद सागर को एक करके देख लेना कोई बहुत अक्लमन्दी का काम होगा. मुझे याद आता है कि जब तुलसी ने रामचरितमानस रची, उन्हें एक तरह से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था. भला कोई अवधी जैसी भाषा में ऐसी पवित्र पुस्तक कैसे लिख सकता है? कभी-कभी मैं सोचता हूं कि किसम-किसम के कट्टरपंथियों में, चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के क्यों न हों, कितनी समानता होती है! 1798 में, आपके इसी शहर में, शाह अब्दुल क़ादिर नाम के एक भले मानुस ने पहली बार क़ुरान का तर्ज़ुमा उर्दू में किया. उस वक़्त के सारे उलेमाओं ने उनके खिलाफ एक फतवा ज़ारी कर डाला कि उन्होंने एक म्लेच्छ भाषा में इस पवित्र पुस्तक का अनुवाद करने की हिमाक़त कैसे की! तुलसी ने रामचरितमानस लिखी तो उनका बहिष्कार किया गया. मुझे उनकी एक चौपाई याद आती है :”धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ जौलाहा कहौ कोऊ.काहू की बेटी सौं बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारन सोऊ..तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु कोऊ.मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबो एकू न दैबो को दोऊ..”रामानंद सागर ने अपने धारावाहिक से करोड़ों की कमाई की. मैं उन्हें कम करके नहीं आंक रहा लेकिन निश्चय ही वे तुलसी से बहुत नीचे ठहरते हैं. मैं एक और उदाहरण देता हूं. शायद यह ज़्यादा स्पष्ट और उपयुक्त हो. सत्य की खोज में गौतम महलों से निकले और जंगलों में गए. लेकिन आज हम देखते हैं कि वर्तमान युग के गुरु जंगल से निकलते हैं और महलों में जाकर स्थापित हो जाते हैं. ये विपरीत दिशा में जा रहे हैं. इसलिए हम लोग एक ही प्रवाह में इनकी बात नहीं कर सकते. इसलिए, हमें उन नामों की आड़ नहीं लेनी चाहिए जो हर भारतीय के लिए प्रिय और आदरणीय हैं. जब मुझे यहां आमंत्रित किया गया तो मैंने महसूस किया कि हां, मैं नास्तिक हूं और किसी भी हालत में बुद्धिपरक रहने की कोशिश करता हूं. शायद इसीलिए मुझे बुलाया गया है. लेकिन, उसी क्षण मैंने महसूस किया कि एक और खासियत है जो मुझमें और आधुनिक युग के गुरुओं में समान रूप से मौज़ूद है. मैं फिल्मों के लिए काम करता हूं. हममें काफी कुछ एक जैसा है. हम दोनों ही सपने बेचते हैं, हम दोनों ही भ्रम-जाल रचते हैं, हम दोनों ही छवियां निर्मित करते हैं. लेकिन एक फर्क़ भी है. तीन घण्टों के बाद हम कहते हैं – “दी एण्ड, खेल खत्म! अपने यथार्थ में लौट जाइए.” वे ऐसा नहीं करते. इसलिए, देवियों और सज्जनों मैं एकदम स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यहां उस आध्यात्मिकता के बारे में बात करने आया हूं जो दुनिया के सुपरमार्केट में बिकाऊ है. हथियार, ड्रग्स और आध्यात्मिकता ये ही तो हैं दुनिया के तीन सबसे बड़े धन्धे. लेकिन हथियार और ड्रग्स के मामले में तो आपको कुछ करना पड़ता है, कुछ देना पड़ता है. इसलिए वह अलग है. यहां तो आप कुछ देते भी नहीं.इस सुपर मार्केट में आपको मिलता है इंस्टैण्ट निर्वाण, मोक्ष बाय मेल, आत्मानुभूति का क्रैश कोर्स – चार सरल पाठों में कॉस्मिक कांशियसनेस. इस सुपर मार्केट की चेनें सारी दुनिया में मौज़ूद हैं, जहां बेचैन आभिजात वर्गीय लोग आध्यात्मिक फास्ट फूड खरीद सकते हैं. मैं इसी आध्यात्मिकता की बात कर रहा हूं.प्लेटो ने अपने डायलॉग्ज़ में कई बुद्धिमत्तापूर्ण बातें कही हैं. उनमें से एक यह है कि किसी भी मुद्दे पर बहस शुरू करने से पहले शब्दों के अर्थ निश्चित कर लो. इसलिए, हम भी इस शब्द- ‘आध्यात्मिकता’ का अर्थ निश्चित कर लेने का प्रयत्न करते हैं. अगर इसका अभिप्राय मानव प्रजाति के प्रति ऐसे प्रेम से है जो सभी धर्मों, जतियों, पंथों, नस्लों के पार जाता है, तोमुझे कोई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं उसे मानवता कहता हूं. अगर इसका अभिप्राय पेड़-पौधों, पहाड़ों, समुद्रों, नदियों और पशुओं के प्रति, यानि मानवेत्तर विश्व से प्रेम से है, तो भी मुझे क़तई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं इसे पर्यावरणीय चेतना कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का मतलब विवाह, अभिभावकत्व, ललित कलाओं, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रति हार्दिक सम्मान का नाम है? मुझे भला क्या असहमति हो सकती है श्रीमान? मैं इसे नागरिक ज़िम्मेदारी कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ अपने भीतर उतरकर स्वयं की ज़िन्दगी का अर्थ समझना है? इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मैं इसे आत्मान्वेषण या स्व-मूल्यांकन कहता हूं. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ योग है? पतंजलि कीकृपा से, जिन्होंने हमें योग, यम, यतम, आसन, प्राणायाम के मानी समझाए, हम इसे किसी भी नाम से कर सकते हैं. अगर हम प्राणायाम करते हैं, बहुत अच्छी बात है. मैं इसे हेल्थ केयर कहता हूं. फिजीकल फिटनेस कहता हूं. तो अब मुद्दा सिर्फ अर्थ विज्ञान का है. अगर यही सब आध्यात्मिकता है तो फिर बहस किस बात पर है? जिन तमाम शब्दों का प्रयोग मैंने किया है वे अत्यधिक सम्मानित और पूरी तरह स्वीकार कर लिए गए शब्द हैं. इनमें कुछ भी अमूर्त या अस्पष्ट नहीं है. तो फिर इस शब्द- आध्यात्मिकता- पर इतनी ज़िद क्यों? आखिर आध्यात्मिकता शब्द में ऐसा क्या है जो इन शब्दों में नहीं सिमट आया है? वो ऐसा आखिर है क्या?पलटकर कोई मुझी से पूछ सकता है कि आपको इस शब्द से क्या परेशानी है? क्यों मैं इस शब्द को बदलने, त्यागने, छोड़ देने, बासी मान लेने का आग्रह कर रहा हूं. आखिर क्यों? मैं आपको बताता हूं कि मेरी आपत्ति किस बात पर है. अगर आध्यात्मिकता का अर्थ इन सबसे है तो फिर बहस की कोई बात नहीं है. लेकिन कुछ और है जो मुझे परेशान करता है. शब्द कोष में आध्यात्मिकता शब्द, -स्पिरिचुअलिटी- की जड़ें आत्मा, स्पिरिट में हैं. उस काल में जबइंसान को यह भी पता नहीं था कि धरती गोल है या चपटी, तब उसने यह मान लिया था कि हमारा अस्तित्व दो चीज़ों के मेल से निर्मित है. शरीर और आत्मा. शरीर अस्थायी है. यह मरणशील है. लेकिन आत्मा, मैं कह सकता हूं, बायोडिग्रेडेबल है. आपके शरीर में लिवर है, हार्ट है, आंतें हैं, दिमाग है. लेकिन क्योंकि दिमाग शरीर का एक हिस्सा है और मन दिमाग के भीतर रहता है, वह घटिया है क्योंकि अंतत: शरीर के साथ दिमाग का भी मरना निश्चित है. लेकिन चिंता न करें, आप फिर भी नहीं मरेंगे, क्योंकि आप तो आत्मा हैं और क्योंकि आत्मा परम चेतस है, वह सदा रहेगी, और आपकी ज़िन्दगी में जो भी समस्याएं आती हैं वे इसलिए आती हैं कि आप अपने मन की बात सुनते हैं. अपने मन की बात सुनना बन्द कर दीजिए.. आत्मा की आवाज़ सुनिए – आत्मा जोकॉस्मिक सत्य को जानने वाली सर्वोच्च चेतना है. ठीक है. कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि पुणे में एक आश्रम है, मैं भी वहां जाया करता था. मुझे वक्तृत्व कला अच्छी लगती थी. सभा कक्ष के बाहर एक सूचना पट्टिका लगी हुई थी: “अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़ कर आएं”. और भी गुरु हैं जिन्हें इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं होता है कि आप जूते बाहर नहीं छोड़ते. लेकिन दिमाग?.....नहीं.अब, अगर आप अपना दिमाग ही बाहर छोड़ देते हैं तो फिर क्या होगा? आपको ज़रूरत होगी ऐसे गुरु की जो आपको चेतना के अगले मुकाम तक ले जाए. वह मुकाम जो आत्मा में कहीं अवस्थित है. वह सर्वोच्च चेतना तक पहुंच चुका है. उसे परम सत्य ज्ञात है. लेकिन क्या वह आपको बता सकता है? जी नहीं. वह आपको नहीं बता सकता. तो, अपना सत्य आप खुद ढूंढ सकेंगे?. जी नहीं. उसके लिए आपको गुरु की सहायता की ज़रूरत होगी. आपको तो उसकी ज़रूरत होगी लेकिनवह आपको इस बात की गारण्टी नहीं दे सकता कि आपको परम सत्य मिल ही जाएगा... और यह परम सत्य है क्या? कॉस्मिक सत्य क्या है? जिसका सम्बन्ध कॉस्मॉस यानि ब्रह्माण्ड से है? मुझे तो अब तक यह समझ में नहीं आया है. जैसे ही हम अपने सौर मण्डल से बाहर निकलते हैं, पहला नक्षत्र जो हमारे सामने आता है वह है अल्फा सेंचुरी, और वह हमसे केवल चार प्रकाश वर्ष दूर है. उससे मेरा क्या रिश्ता बनता है? क्यों बनता है?तो, राजा ने ऐसे कपड़े पहन रखे हैं जो सिर्फ बुद्धिमानों को ही दिखाई देते हैं. और राजा लगातार बड़ा होता जा रहा है. और ऐसे बुद्धिमानों की संख्या भी निरंतर बढती जा रही है जिन्हें राजा के ये कपड़े दिखाई दे रहे हैं और जो उनकी तारीफ करते हैं. मैं सोचता था कि आध्यात्मिकता दरअसलधार्मिक लोगों की दूसरी रक्षा पंक्ति है. जब वे पारम्परिक धर्म से लज्जित अनुभव करने लगते हैं, जब यह बहुत चालू लगने लगता है तो वे कॉस्मॉस या परम चेतना के छद्म की ओट ले लेते हैं. लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है. इसलिए कि पारम्परिक धर्म और आध्यात्मिकता के अनुयायीगण अलग-अलग हैं. आप ज़रा दुनिया का नक्शा उठाइए और ऐसी जगहों को चिह्नित कीजिए जो अत्यधिक धार्मिक हैं -चाहे भारत में या भारत के बाहर- एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप.... कहीं भी. आप पाएंगे कि जहां-जहां धर्म का आधिक्य है वहीं-वहीं मानव अधिकारों का अभाव है, दमन है. सब जगह. हमारे मार्क्सवादी मित्र कहा करते थे कि धर्म गरीबों की अफीम है, दमित की कराह है. मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता. लेकिन आजकल आध्यात्मिकता अवश्य ही अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.आप देखेंगे कि इनके अनुयायी खासे खाते-पीते लोग है, समृद्ध वर्ग से हैं. ठीक है. गुरु को भी सत्ता मिलती है, ऊंचा कद और पद मिलता है, सम्पत्ति मिलती है..(जिसका अधिक महत्व नहीं है), शक्ति मिलती है और मिलती है अकूत सम्पदा. और भक्तों को क्या मिलता है? जब मैंने ध्यान से इन्हें देखा तो पाया कि इन भक्तों की भी अनेक श्रेणियां हैं. ये सभी एक किस्म के नहीं हैं. अनेक तरह के अनुयायी, अनेक तरह के भक्त. एक वह जो अमीर है, सफल है, ज़िन्दगी में खासा कामयाब है, पैसा कमा रहा है, सम्पदा बटोर रहा है. अब, क्योंकि उसके पास सब कुछ है, वह अपने पापों का शमन भी चाहता है. तो गुरु उससे कहता है कि “तुम जो भी कर रहे हो, वह निष्काम कर्म है. तुम तो बस एक भूमिका अदा कर रहे हो, यह सब माया है, तुम जो यह पैसा कमा रहे हो और सम्पत्ति अर्जित कर रहे हो, तुम इसमें भावनात्मक रूप से थोड़े ही संलग्नहो. तुम तो बस एक भूमिका निबाह रहे हो.. तुम मेरे पास आओ, क्योंकि तुम्हें शाश्वत सत्य की तलाश है. कोई बात नहीं कि तुम्हारे हाथ मैले हैं, तुम्हारा मन और आत्मा तो शुद्ध है”. और इस आदमी को अपने बारे में सब कुछ अच्छा लगने लगता है. सात दिन तक वह दुनिया का शोषण करता है और सातवें दिन के अंत में जब वह गुरु के चरणों में जाकर बैठता है तो महसूस करता है कि मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूं.लोगों का एक और वर्ग है. ये लोग भी धनी वर्ग से हैं. लेकिन ये पहले वर्ग की तरह कामयाब लोग नहीं हैं. आप जानते हैं कि कामयाबी-नाकामयाबी भी सापेक्ष होती है. कोई रिक्शा वाला अगर फुटपाथ पर जुआ खेले और सौ रुपये जीत जाए तो अपने आप को कामयाब समझने लगेगा, और कोई बड़े व्यावसायिक घराने का व्यक्ति अगर तीन करोड भी कमा ले, लेकिन उसका भाई खरबपति हो, तो वो अपने आप को नाकामयाब समझेगा. तो, यह जो अमीर लेकिन नाकामयाब इंसान है, यह क्या करता है? उसे तलाश होती है एक ऐसे गुरु की जो उससे कहे कि “कौन कहताहै कि तुम नाकामयाब हो? तुम्हारे पास और भी तो बहुत कुछ है. तुम्हारे पास ज़िन्दगी का एक मक़सद है, तुम्हारे पास ऐसी संवेदना है जो तुम्हारे भाई के पास नहीं है. क्या हुआ जो वह खुद को कामयाब समझता है? वह कामयाब थोड़े ही है. तुम्हें पता है, यह दुनिया बड़ी क्रूर है. दुनिया बड़ी ईमानदारी से तुम्हें कहती है कि तुम्हें दस में से तीन नम्बर मिले हैं. दूसरे को तो सात मिले हैं. ठीक है. वे तुम्हारे साथ ऐसा ही सुलूक करेंगे.” तो इस तरह इसे करुणा मिलती है, सांत्वना मिलती है. यह एक दूसरी तरह का खेल है. एक और वर्ग. मैं इस वर्ग के बारे में किसी अवमानना या श्रेष्ठता के भाव के साथ बात नहीं कर रहा. और न मेरे मन में इस वर्ग के प्रति कोई कटुताहै, बल्कि अत्यधिक सहानुभूति है क्योंकि यह वर्ग आधुनिक युग के गुरु और आज की आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा अनुयायी है. यह है असंतुष्ट अमीर बीबियों का वर्ग.एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी सारी निजता, सारी आकांक्षाएं, सारे सपने, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व विवाह की वेदी पर कुर्बान कर दिया और बदले में पाया है एक उदासीन पति, जिसने ज़्यादा से ज़्यादा उसे क्या दिया? कुछ बच्चे! वह डूबा है अपने काम धन्धे में, या दूसरी औरतों में. इस औरत को तलाश है एक कन्धे की. इसे पता है कि यह एक अस्तित्ववादी असफलता है. आगेभी कोई उम्मीद नहीं है. उसकी ज़िन्दगी एक विराट शून्य है; एकदम खाली, सुविधाभरी लेकिन उद्देश्यहीन. दुखद किंतु सत्य! और भी लोग हैं. ऐसे जिन्हें यकायक कोई आघात लगता है. किसी का बच्चा चल बसता है, किसी की पत्नी गुज़र जाती है. किसी का पति नहीं रहता. या उनकीसम्पत्ति नष्ट हो जाती है, व्यवसाय खत्म हो जाता है. कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उनके मुंह से निकल पड़ता है: “आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?” किससे पूछ सकते हैं ये लोग यह सवाल? ये जाते हैं गुरु के पास. और गुरु इन्हें कहता है कि “यही तो है कर्म. लेकिन एक और दुनिया है जहां मैं तुम्हें ले जा सकता हूं, अगर तुम मेरा अनुगमन करो. वहां कोई पीड़ा नहीं है. वहां मृत्यु नहीं है. वहां है अमरत्व. वहां केवल सुख ही सुख है”. तो इन सारी दुखी आत्माओं से यह गुरु कहता है कि “मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूं जहां कोई कष्ट नहीं है”. आप मुझे क्षमा करें, यह बात निराशाजनक लग सकती है लेकिन सत्य है, कि ऐसा कोई स्वर्ग नहीं है.ज़िन्दगी में हमेशा थोड़ा दर्द रहेगा, कुछ आघात लगेंगे, हार की सम्भावनाएं रहेंगी. लेकिन उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है. आपमें से कोई मुझसे पूछ सकता है कि अगर इन्हें कुछ खुशी मिल रही है, कुछ शांति मिल रही है तो आपको क्या परेशानी है? मुझे अपनी पढ़ी एक कहानी याद आती है. किसी संत की कही एक पुरानी कहानी है. एक भूखे कुत्ते को एक सूखी हड्डी मिल जाती है. वह उसी को चबाने की कोशिश करने लगता है और इसी कोशिश में अपनी जीभ काट बैठता है. जीभ से खून आने लगता है. कुत्ते को लगता है कि उसे हड्डी से ही यह प्राप्त हो रहा है. मुझे बहुत बुरा लग रहा है. मैं नहीं चाहता कि ये समझदार लोग ऐसा बर्ताव करें, क्योंकि मैं इनका आदर करता हूं. मानसिक शांति या थोड़ा सुकून तो ड्रग्स या मदिरा से भी मिल जाता है लेकिन क्या वह आकांक्ष्य है? क्या आप उसकी हिमायत करेंगे? जवाब होगा, नहीं. ऐसी कोई भी मानसिक शांति जिसकी जड़ें तार्किक विचारों में न हो, खुद को धोखा देने के सिवा और कुछ नहीं हो सकती. कोई भी शांति जो आपको सत्य से दूर ले जाए, एक भ्रम मात्र है, महज़ एक मृग तृष्णा है. मैं जानता हूं कि शांति की इस अनुभूति में एक सुरक्षा-बोध है, ठीक वैसा ही जैसी तीन पहियों की साइकिल में होता है. अगर आप यह साइकिल चलाएं, आप गिरेंगे नहीं. लेकिन बड़े हो गए लोग तीन पहियों की साइकिलें नहीं चलाया करते. वे दो पहियों वाली साइकिलें चलाते हैं, चाहे कभी गिर ही क्यों न जाएं. यही तो ज़िन्दगी है.एक और वर्ग है. ठीक उसी तरह का जैसा गोल्फ क्लब जाने वालों का हुआ करता है. वहां जाने वाला हर व्यक्ति गोल्फ का शौकीन नहीं हुआ करता. ठीक उसी तरह हर वह इंसान जो आश्रम में नज़र आता है, आध्यात्मिक नहीं होता. एक ऐसे गुरु के, जिनका आश्रम दिल्ली से मात्र दो घण्टे की दूरी पर है, घनघोर भक्त एक फिल्म निर्माता ने एक बार मुझसे कहा था कि मुझे भी उनके गुरु के पास जाना चाहिए. वहां मुझे दिल्ली की हर बड़ी हस्ती के दीदार हो जाएंगे. सच तो यह है कि वे गुरु जी निर्माणाधीन दूसरे चन्द्रास्वामी हैं. तो, यह तो नेटवर्किंग के लिए एक मिलन बिन्दु है. ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में अगाध सम्मान है जो आध्यात्मिक या धार्मिक हैं और फिर भी भले इंसान हैं. इसकी वजह है. मैं मानता हूं कि किसी भी भाव या अनुभूति की तरह आपकी भी एकसीमा होती है. आप एक निश्चित दूरी तक ही देख सकते हैं. उससे आगे आप नहीं देख सकते. आप एक खास स्तर तक ही सुन सकते हैं, उससे परे की ध्वनि आपको सुनाई नहीं देगी. आप एक खास मुकाम तक ही शोक मना सकते हैं, दर्द हद से बढ़ता है तो खुद-ब-खुद दवा हो जाता है. एक खास बिन्दु तक आप प्रसन्न हो सकते हैं, उसके बाद वह प्रसन्नता भी प्रभावहीन हो जाती है. इसी तरह, मैं मानता हूं कि आपके भलेपन की भी एक निश्चित सीमा है. आप एक हद तक ही भलेहो सकते हैं, उससे आगे नहीं. अब कल्पना कीजिए कि हम किसी औसत इंसान में इस भलमनसाहत की मात्रा दस इकाई मानते हैं. अब हर कोई जो मस्जिद में जाकर पांच वक़्त नमाज़ अदा कर रहा है वह इस दस में से पांच इकाई की भलमनसाहत रखता है, जो किसी मदिर में जाता है या गुरु के चरणों में बैठता है वह तीन इकाई भलमनसाहत रखता है. यह सारी भलमनसाहत निहायत गैर उत्पादक किस्म की है. मैं इबादतगाह में नहीं जाता, मैं प्रार्थना नहीं करता. अगर मैं किसी गुरु के पास, किसी मस्जिद या मंदिर या चर्च में नहीं जाता तो मैं अपनेहिस्से की भलमनसाहत का क्या करता हूं? मुझे किसी की मदद करनी होगी, किसी भूखे को खाना खिलाना होगा, किसी को शरण देनी होगी. वे लोग जो अपने हिस्से की भलमनसाहत को पूजा-पाठ में, धर्म या आध्यात्म गुरुओं के मान-सम्मान में खर्च करने के बाद भी अगर कुछ भलमनसाहत बचाए रख पाते हैं, तो मैं उन्हें सलाम करता हूं.आप मुझसे पूछ सकते हैं कि अगर धार्मिक लोगों के बारे में मेरे विचार इस तरह के हैं तो तो फिर मैं कृष्ण, कबीर या गौतम के प्रति इतना आदर भाव कैसे रखता हूं? आप ज़रूर पूछ सकते हैं. मैं बताता हूं कि क्यों मेरे मन में उनके प्रति आदर है. इन लोगों ने मानव सभ्यता को समृद्ध किया है. इनका जन्म इतिहास के अलग-अलग समयों पर, अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ. लेकिनएक बात इन सबमें समान थी. ये अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए. ये दलितों के लिए लड़े. चाहे वह रावण हो, कंस हो, कोई बड़ा धर्म गुरु हो या गांधी के समय में ब्रिटिश साम्राज्य या कबीर के वक़्त में फिरोज़ शाह तुग़लक का धर्मान्ध साम्राज्य हो, ये उसके विरुद्ध खड़े हुए. और जिस बात पर मुझे ताज़्ज़ुब होता है, और जिससे मेरी आशंकाओं की पुष्टि भी होती है वह यह कि ये तमाम ज्ञानी लोग, जो कॉस्मिक सत्य, ब्रह्माण्डीय सत्य को जान चुके हैं, इनमें से कोई भी किसी सत्ता की मुखालिफत नहीं करता. इनमें से कोई सत्ता या सुविधा सम्पन्न वर्ग के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं करता. दान ठीक है, लेकिन वह भी तभी जब कि उसे प्रतिष्ठान औरसत्ता की स्वीकृति हो. लेकिन आप मुझे बताइये कि कौन है ऐसा गुरु जो बेचारे दलितों को उन मंदिरों तक ले गया हो जिनके द्वार अब भी उनके लिए बन्द हैं? मैं ऐसे किसी गुरु का नाम जानना चाहता हूं जो आदिवासियों के अधिकारों के लिए ठेकेदारों से लड़ा हो. मुझे आप ऐसे गुरु का नाम बताएं जिसने गुजरात के पीड़ितों के बारे में बात की हो और उनके सहायता शिविरों में गया हो. ये सब भी तो आखिर इंसान हैं. मान्यवर, यह काफी नहीं है कि अमीरों को यह सिखाया जाए कि वे सांस कैसे लें. यह तो अमीरों का शगल है. पाखण्डियों की नौटंकी है. यह तो एक दुष्टता पूर्ण छद्म है. और आप जानते हैं कि ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में इस छद्म के लिए एक खास शब्द है, और वह शब्द है: होक्स(HOAX). हिन्दी में इसे कहा जा सकता है, झांसे बाजी!.धन्यवाद.

Saturday, May 2, 2009

आईए, मिलकर लिखें एक व्यंग्य.....


थोडी देर को मान लीजिए कि सरकार लालवाणी जी की बन गई है।

मगर इसबार विदेशी बहू की तरह कुर्बानी लालवाणी जी ने ही दे डाली है।

उनका कहना क़ाबिले-ग़ौर है कि पड़ोस में जींस रोकने वाले और जज़िया लगाने वाले कट्टरपंथी आ गए हैं और हमारा तो जीना-मरना सब पड़ोस की वजह से है तो ज़ाहिर है कि प्रधान भी कोई उन्हीं के टाइप का होना चाहिए। लालवाणी जी ने बाबा बयानदेव जी को प्रधान-संत्री और बाबा धांसूराम पोपू को राष्ट्राचार्य बना दिया है। बाक़ी कैबिनेट पर आप अंदाज़े मारिए।

मेरी दूर-दृष्टि अनुसार देश का भावी दृश्य कुछ इस प्रकार बनता है:-
मनोचिकित्सकों को पकड़कर ओझाओं और बाबाओं के हवाले कर दिया गया है। बाबा उन्हें पेड़ो से लटकाकर, नीचे से लाल मिर्चों की धूनी देकर इन पश्चिम-परस्तों का ‘इलाज’ कर रहे हैं।
सभ्यता और संस्कृति को शीघ्र पतन से बचाने के लिए स्त्रिओं के लिए एक बोरानुमा पोशाक का निर्माण किया गया है। माना गया है कि चूंकि इस का रंग काला नहीं है इसलिए इसकी तुलना दूसरी पोशाकों से करना अपने देश और धर्म से गद्दारी करना होगा।

अभी-अभी पता चला है कि युद्ध-स्थल पर दुश्मन देश ने हमारी सेनाओं के सामने बिल्ली छोड़ दी है। बिल्ली द्वारा रास्ता काट जाने के चलते हमारी सेनाएं हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। पुरोहितजन इस अनोखी रणनीति की काट ढंूढ रहे हैं। इस बीच दुश्मन हमारी ज़मीन कब्जाता चला जा रहा है।
इससे आगे का व्यंग्य आप पूरा करें---------
(संजय ग्रोवर)

Thursday, April 30, 2009

नयी गजल में नये शेर का ‘उदय’


ग़ज़ल

पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी

उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी

भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी

छोटे शहरों, छोटे लोगों को मदद मिलनी तो थी
हाकिमों के रास्ते में राजधानी पड़ गयी

कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओगी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी

दिल में फ़िर उट्ठे ख्याल ज़हन में ताज़ा सवाल
आए दिन कुछ इस तरह मुझपर जवानी चढ़ गयी

‘वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ-
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी

-संजय ग्रोवर

कैसा संयोग है कि मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ अभी-अभी ‘देशकाल’ पर प्रकाशित हुई है जिसका कि लिंक मैं यहां लगा रहा हूं।


एक और संयोग ! आमिर खान पहली बार हॉलिवुड की किसी फिल्म में काम करने जा रहे हैं। femalefirst।co।uk के मुताबिक, यह इंटरनैशनल फिल्म सआदत हसन मंटो की भारत-पाक विभाजन पर लिखी गई मशहूर कहानी 'टोबा टेक सिंह' पर बनने वाली है। कहा जा रहा है कि आमिर स्क्रिप्ट से काफी प्रभावित हुए हैं। इसमें वह पागल की भूमिका निभाएंगे। हो सकता है इस फिल्म में वह केट विंसलेट के साथ कॉम्बिनेशन बनाएं। नवभारत टाइम्स में छपी इस खबर का लिंक भी मैं यहीं लगा रहा हूं।

23-05-2009

Monday, April 20, 2009

व्यंग्य-कक्ष में *****क्रिकेट अपना-अपना*****

बचपन में क्रिकेट खेलने का शौक मुझे भी उतना ही था, जितना कि ज्यादातर हिंदुस्तानियों को होता है। रबर की गेंद और कपड़े धोेने-कूटने की ‘डमड़ी‘ (यह पंजाबी भाषा का शब्द है। इससे हिंदी साहित्य समृद्ध होगा। हर कूटने वाली चीज से हिंदी साहित्य समृद्ध होता है।) से अपने घरेलू आंगन में खेलते-खेलते हम मोहल्ले की पिच और काॅर्क की गंेद तक तरक्की कर गए।
बचपन में हम कहीं अधिक प्रगतिशील थे। सो महिला-पुरूष का भेद नहीं करते थे। लड़कियां मजे़ से हमारे साथ खेला करतीं। लड़कियांे के साथ तो मैं खेल लेता था, पर उनकी भावनाओं और इज़्ज़त आबरू के साथ खेलना नहीं जानता था। तब इतनी समझ नहीं थी। अब समझ आई है, तो हिम्मत साथ नहीं देती। जब हिम्मत साथ देती है, तो लड़कियां नहीं होतीं! खैर! जो लड़कियां उस वक्त तेज़ गेंदबाजी किया करती थीं या चैके छक्के लगाया करती थीं, वो आज अपने-अपने पतियों के यहां चैका बर्तन कर रही हैं। पति लोग ड्राइंग-रूम में सोफे पर बैठे टीवी पर मैच देख रहे हैं। बचपन की प्रगतिशीलता ने जवानी मेें परम्परा के आगे हथियार डाल दिए हैं।


मैं शुरू से ही आॅंल-राउंडर था। जैसी बैटिंग करता था, वैसी ही बाॅलिंग भी कर लेता था। खुलकर कहूं, तो न तो ढंग से गेंदबाजी कर पाता था न बल्लेबाजी। फलस्वरूप अधिकतर समय फील्डिंग ही करता रहता। धैर्य का अभाव मुझमें नहीं था। जब गेंद सीमा रेखा के बाहर जाकर अपने आप रूक जाती या कोई संभावित कैच धरती पर गिरकर शांत हो जाता, तब मैं गेंद उठाकर बीच में खड़े खिलाड़ियों की मार्फत बाॅलर या कप्तान तक पहुंचा देता।


अपवाद-स्वरूप कई दफा ऐसा भी होता कि हमारी टीम को जीतने के लिए दस-बारह रनों की जरूरत होती और आखिरी विकेट के रूप में मैं ही बचा होता। ऐसे मौकों पर अकसर यह होता कि मुझे गेंद फेंकने वाले तेज़ गंेदबाज के अपना रन-अप पूरा कर लेने से पहले ही मेरी माताजी मैदान में आ जातीं। वे हमारे कप्तान को डांट कर कहतीं कि क्या तुम्हारी जीत मेरे बच्चे की जिन्दगी से बड़ी है। इस पर सभी खिलाड़ी वक्ती तौर पर शर्मिंदा हो जाते। ममता, वात्सल्य और भावुकता के मिलेजुले भावों के साथ माता जी ज़बरदस्ती मुझे दर्शकों में बिठा देतीं। तेज़ गेंदबाज़ को अपनें बाॅलिंग-मार्क से राॅकेट की तरह छूटते देख, बुरी तरह घबराया, कंपकंपाया हुआ मैं मन ही मन माता जी को कई कई धन्यवाद देता, मगर ऊपर ऊपर कहता कि आज आपने रोक न लिया होता, तो मैं इन सालों की मिट्टी पलीत करके रख देता।


लेकिन यहीं से मेरे खेल जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ। दर्शकों में बैठा हुआ मैं एक निष्कासित की तरह चिढ़ते हुए, खिलाड़ियों पर छींटाकशी करता। उनके खेल में मीनमेख निकालता। यह तो बाद में आकर पता चला कि इस छींटाकशी को कलमबद्ध करके कागज़ पर उतार दिया जाए, तो साहित्य में इसे कई बार व्यंग्य का दर्जा दिया जाता है।


बहरहाल, इस अध्याय की अगली पंक्तियों में हुआ यह कि धीरे-धीरे हमारे मोहल्ले के सभी खिलाड़ी खेलने के बजाय मैच को सुनने और देखने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे। इस मुकाम पर आकर मेरे और उनके बीच का फर्क खत्म हो गया। हम सब एक ही स्तर पर उतर आए। टीवी पर मैच देखते समय हम सब एक ही ढंग से चिल्लाते, हंसते, उछलते, तालियां पीटते या गालियां बकते। अब हमारी गणना देश के उन लोगों में होने लगी, जो मैच को खेलने के बजाय देखते हैं , मगर उस पर सट्टा आदि खेलते हैं।


फिर हमारे देखते-देखते पता नहीं कब यह हुआ कि टैस्ट मैचों को लगभग घूरे पर पटक दिया गया और उनकी जगह वन-डे मैचों की ताजपोशी कर दी गई। काफी कुछ बदला, मगर कुछ चीजें वैसे की वैसी रहीं। मसलन आज तक हमारे खिलाड़ी ठीक से तय नहीं कर पाए कि उन्हें जीतने के लिए खेलना चाहिए या खेलने के लिए जीतना चाहिए।


वैसे तो अपनी-अपनी तरह से सभी देश जीतने के लिए खेलते हैं। सभी खिलाड़ी भी जीतने के लिए यथासंभव योगदान देते हैं। मैं अकसर टी।वी। पर देखता हूं कि जब भारत दो जमे हुए बल्लेबाजों में से एक के आउट हो जाने पर संकट में आ जाता है, तो नया बल्लेबाज़ आकर पहले जमे हुए बल्लेबाज़ के साथ विकेटों के बीच कुछ देर मंत्रणा करता है। मैं अकसर मान लेता हूं कि कप्तान ने कोई बढ़िया तरकीब सुझाता हुआ संदेश भेजा होगा और अब ये दोनों मिलकर भारत को संकट से निकाल लेंगे। मगर देखता क्या हूं कि अगले ही ओवर में जमा हुआ बल्लेबाज आउट हो जाता है। संकटपूर्ण मौकों पर जब भी ऐसा होता है, तो मुझे अपने बचपन की क्रिकेट याद आ जाती है। तब मुझे लगता है कि जरुर इस जमे हुए बल्लेबाज की माताजी ने संदेश भिजवाया होगा कि बेटा, जब हमारे सारे बल्लेबाज़ ही एक-एक करके ढेर होते जा रहे हैं तो तू ही इकला क्यों लगा पड़ा है। देश क्या तेरे इकले का है। मेहनत तू करे और खाएं सब! ये कोई बात है! भाड़-चूल्हे में जाने दे रनों को। मैं घर से तेरे लिए गरमागरम हलवा बनाकर लाई हूं। आ जा जल्दी-जल्दी । खा जा।


हम दर्शकों का मनोविज्ञान भी हार और जीत के साथ बदलता रहता है। उदाहरण के लिए कल्पना कीजिए कि हमारा धांसू बल्लेबाज तेजप्रकाश बहुत बढ़िया खेल रहा है। अर्द्धशतक पूरा कर चुका है। शतक की ओर बढ़ रहा है। तभी एक तेज गेंद पर और भी तेजी से बैट घुमाता है, मगर लपक लिया जाता है। तेजप्रकाश आउट। अब पहली स्थिति देखिए, जबकि बाद में भारत मैच हार जाता हैः-

‘तेज प्रकाश वो शाॅट बिल्कुल गलत खेला।

‘‘ये तो हमेशा ही ऐसा करता है।

‘‘कम-से-कम शतक तो पूरा कल्लेता‘

‘उसे इस बाॅल को छूने की जरूरत ही क्या थी!?

‘‘क्यों? सीधी बाॅल थी। बोल्ड हो जाता तो।?

‘‘हो जाता तो हो जाता। पर ऐसे वक्त पर ऐसी बाॅल को छेड़ना बेवकूफी है।‘

‘हां यार! हमारी टीम ही फुसफसी है। तेज प्रकाश को तो अब टीम से निकाल ही देना चाहिए। अपने आप अक्ल ठिकाने आ जाएगी।‘


दूसरी स्थिति वह है, जब भारत इसी मैच को जीत जाता हैः-

‘मज़ा आ गया यार! कमाल कर दिया हमारी टीम ने।

‘‘मैं कहता था न हमारी टीम दुनिया की नंबर एक की ठीम है।

‘‘एक-एक खिलाड़ी ने ग़ज़ब के हाथ दिखाए। भुस भर के रख दिया।

‘‘तेज प्रकाश ने तो यार गजब कर दिया। अकेला ही उनकी पूरी टीम पर भारी पड़ गया।

‘‘पर यार, जिस शाॅट पर वो आउट हुआ, वो उसने थोड़ा ठीक नहीं खेला।

‘‘अरे छोड़ यार, वो तो गेंद बल्ले पर पूरी तरह आई नहीं, नहीं तो सीधा छक्का ही होता।‘


आखिर में एक कपोल-कल्पित किस्सा (आप चाहें, तो इसे हकीकत भी मान सकते हैं)ः एक फील्डर से एक आसान कैच छूट गया। बाद में उसकी टीम वो मैच भी हार गई। साथी खिलाड़ियों ने पूछा कि जब गेंद सीधी ही तेरे हाथ में आ रही थी, तो तूने गेंद की तरफ पीठ करके उसे कैच करने जैसी अजीबोगरीब हरकत क्यों की। फील्डर बोला कि अगर वो ऐसा न करता, तो उसका पचास हजार रूपये का नुकसान हो जाता। जिस प्रायोजक ने अपना विज्ञापन उसकी छाती पर छापा था, उसने करार किया था कि टीवी के पर्दे पर जितनी बार तेरी शर्ट के सामने वाले हिस्से पर छपा हमारा विज्ञापन दिखाई देगा, उतनी बार के हिसाब से हम तुझे पचास हजार रूपये (प्रति झलक) देंगे। कब से मैं टीवी कैमरा की ओर पीठ किए खड़ा था। इतने लंबे इंतजार के बाद यह गेंद आई और मुझे पचास हजार कमाने का मौका मिला। भाई लोग, कैच लपकने का मौका तो जिंदगी भर मिलता रहेगा, मगर ये पचास हजार मैं अपने हाथ से कैसे स्लिप हो जाने देता। इस तरह व्यवसायिकता क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा सकती है।

-संजय ग्रोवर
(3 जुलाई, 1998 को अमर उजाला में प्रकाशित)

Thursday, April 9, 2009

वही ज़िल्ले-सुब्हानी सामने है


ग़ज़ल

लो अब सारी कहानी सामने है
तुम्हारी ही जु़बानी, सामने है

तुम्हारे अश्व खुद निकले हैं टट्टू
अगरचे राजधानी सामने है

गिराए तख़्त, उछले ताज फिर भी
वही ज़िल्ले-सुब्हानी सामने है

मेरी उरियानियां भी कम पड़ेंगीं
बशर इक ख़ानदानी सामने है

तेरे माथे पे फिर बलवों के टीके-
बुज़ुर्गों की निशानी सामने है !

अभी जम्हूरियत की उम्र क्या है
समूची ज़िन्दगानी सामने है


-संजय ग्रोवर

(‘द सण्डे पोस्ट’ में प्रकाशित)


(कार्टून गूगल सर्च की बदौलत, आंध्रान्यूज़.नेट से साभार)

Saturday, March 28, 2009

अगूंठा कटवा दिया, चश्मों ने फतवा दिया

ग़ज़ल



राहगीरों को तुम्हारे रास्तों ने क्या दिया/
मंज़िलों को और गहरी गर्त में पहुंचा दिया//
***********************************
जिन मचानों पर सुरक्षित था अंधेरों का वजूद/
उन मचानों को ही तुमने मंज़िलें ठहरा दिया//
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एक झूठे सच की खातिर कितने सच झुठला दिए/
आपकी दानाईयों ने मेरा दिल दहला दिया//
*************************************
नन्हीं आशाओं के अंकुर धूप में कुम्हला गए/
रोशनी ने सूरजों को जाने क्या समझा दिया//
**************************************
डर है वो उठने से पहले उंगली भी ना मांग ले/
दक्षिणा में जिसने अगूंठा मेरा कटवा दिया//
***************************************
जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से/
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया//
**********************************************


-संजय ग्रोवर




(18 दिसंबर, 1994 को दैनिक जागरण में प्रकाशित)

Thursday, March 19, 2009

व्यंग्य-कक्ष में *****एक संपूर्ण पुरूष*****

वह एक संपूर्ण पुरूष था।

‘अ कंपलीट मैन‘। मर्दों में मर्द। पतियों में पति। दोस्तों में दोस्त। रिश्तेदारों में रिश्तेदार। स्वस्थों में स्वस्थ। बीमारों में बीमार। लेखकों में लेखक। कलाकारों में कलाकार। प्रगतिशीलों में प्रगतिशील। रूढ़िवादियों में रूढ़िवादी। आधुनिक। परंपरावादी। देशप्रेमी। सहिष्णु। तेजतर्रार। विनम्र। आक्रामक। नाराज़। संतुष्ट। सभी कुछ। एक संपूर्ण पुरूष। ‘अ कंपलीट मैन‘ं।


पत्नी उससे खुश थी। चूंकि वह पत्नी को खुश रखता था, इसलिए पत्नी को खुश रहना पड़ता था। पत्नी के अलावा भी वह कई पत्नियों और दूसरी स्त्रियों को खुश रखता था। इस संबंध में उसके अपने तर्क भी थे। जब वह दूसरी स्त्रियों के बीच होता तो कहता कि मैं मर्द हूं। स्मार्ट हूं। लड़कियां मुझ पर मरती हैं। मैं कितना प्रगतिशील हूं। जब दूसरे मर्द दूसरी स्त्रियों या उसके घर की स्त्रियों के साथ होते तो वह परंपरावादी हो जाता। कहता कि वे जनानियां हैं। औरतों में घुसे रहते हैं। दूसरी स्त्रियों से अपनी घनिष्ठता के बीच आने वाले उनके पतियों, भाइयों और दूसरे लोगों को वो किसी-न-किसी तरह पटाए-फुसलाए-बहलाए रखता। जबकि अपनी स्त्रियों से घनिष्ठता बनाने वाले हर पुरूष को कोई-न-कोई चाल चलकर संबंध तोड़ने पर मजबूर कर देता।


वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।


समाज में उसकी इज़्ज़त थी, प्रतिष्ठा थी, सम्मान था। किसी के घर बच्चा पैदा होता तो वह किलकारियां मारता सबसे पहले बधाई देने पहुंच जाता। बच्चे के मां-बाप को भेंट देता, शाबासी देता, हर तरह से प्रोत्साहित करता। बाहर निकलकर दूसरे लोगों से कहता कि साले, मूर्ख और गंवार कहीं के, बच्चे पैदा किए चले जा रहे हैं। न देश का खयाल है, न समाज का, न बच्चों के भविष्य का। लोग सुनकर खुश होते कि देखो अगले को सभी की कितनी चिंता है। कोई मरता तो सबसे पहले लटकने वाला चेहरा उसी का होता। अर्थी को दिए जाने वाले चार कंधों में एक उसका होना लगभग निश्चित था। जैसे वह रोज इंतजार ही कर रहा होता कि कोई मरे और वह दुःख बांटने जाए। आदमी से प्रेम करने की बजाय समाज को खुश रखना उसका दर्शन था।


वह एक संपूर्ण पुरूष था। अ कंपलीट मैन।


लोगों से बाते करते हुए उसकी ‘स्मार्टनेस‘ देखते ही बनती थी। वह जानता था कि ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान‘। अर्थात् ‘प्रैक्टिस मेक्स अ मैन परफैक्ट‘। सो दिन-रात अभ्यास करके उसने कमीनेपन, दोमुंहेपन, पाखंड, नीचता, लंपटता, लुच्चई जैसे अत्यावश्यक चारित्रिक गुणों का विकास अपने अंदर कर लिया था। अपनी वाक्पटुता को वह तर्क कहकर खुश रहता, तो दूसरों के तर्कों को वाग्जाल कहकर भी वह ही खुश रहता। ‘फूट डालो और राज करो‘ इस स्वर्णिम सूक्ति ने उसे दोस्तों, रिश्तेदारों व सहकर्मियों के बीच पाॅपुलर व अमर बना दिया था। उसके संबंध मूलतः दो तरह के लोगों से थे। एक तो वे जिनकी चमचागिरी वह कर सके। दूसरे वे जो उसकी चमचागिरी कर सकें। दूसरों के बिना वह इसलिए नहीं रह पाता था कि बिना उन्हें छोटा किए खुद को बड़ा नहीं मान पाता था। यूं वह महान था कि अपने महान होने के लिए उसने दूसरों को इतना महत्व दे दिया था।


वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।


जब वह लिखने पर उतारू हो जाता तो एक-से-एक चीज लिख मारता। ऐसे-ऐसे लेख जो दूसरे लिखें तो किसी अखबार में संपादक के नाम पत्र में भी न छपें। मगर उसके व्यावहारिक स्वभाव व सामाजिक संबंधों के चलते संपादकीय पृष्ठ पर बतौेर मुख्य लेख छप जाते।


आदमी को सामाजिक जानवर बनाने वाली सभी किताबें उसने घोंट रखी थीं। सो जानता था कि ‘आॅफेंस इज़ द बेस्ट डिफेंस‘ यानी ‘आक्रमण में ही सुरक्षा है‘। अतः किसी की रचना चुराता तो साथ ही उस पर चोरी का आरोप भी लगा देता। ऐसा जो कुछ भी करता सब दूसरों पर थोप देता। कवि सम्मेलनों के अलावा भी कवि सम्मेलन कर लेता।


जन्मोत्सवों में बधाई गायन और विवाहों में सेहरा गायन आदि के साथ-साथ मुर्दनी के माहौल को कवि मेले में बदल देने का हुनर भी उसमें था। अतः मुर्दों समेत सभी उससे खुश थे। यही उसकी कलाकारी थी कि वह कलाकार न होते हुए भी कलाकार था।


एक संपूर्ण पुरूष। अ कंपलीट मैन। जो कि वह था।


मगर जो शेर उसकी संपूर्णता में बाधक था, अभी भी हैः-


ये चलती-फिरती सूरतें जो देखते हैं आप,/

कितने हैं इनमें वाकई इंसा न पूछिए।


-संजय ग्रोवर



(25 अप्रैल, 1997 में को अमर उजाला में प्रकाशित)

Sunday, March 15, 2009

‘ एक दिल बच्चों के जैसा है तुम्हारी खोज में ’

ग़ज़ल

कितनी उम्मीदें लगाकर आगईं फिर तितलियां

काग़ज़ी फूलों से धोखा खा गईं फिर तितलियां


मैंने सोचा फूल बन महकूँ जो उनकी राह में

खुशबू बन ख्वाबों में मेरे छा गईं फिर तितलियां


‘ एक दिल बच्चों के जैसा है तुम्हारी खोज में ’

इतना सुनना था कि बस शरमा गईं फिर तितलियां


कुदरती तानों की रौ में मैं जो इक दिन बह चला

मेरे सुर में सुर मिला कर गा गईं फिर तितलियां


इस चमन से उस चमन इस फूल से उस फूल तक

ज़िन्दगी के बीज कुछ बिखरा गईं फिर तितलियां

-संजय ग्रोवर

Monday, March 9, 2009

‘‘होली विशेषांक’’

दोस्तो, होली-विशेषांक के लिए काफी तैयारी करनी पड़ी। दिल में धुकुर-धुकुर मची थी कि सही वक्त पर निकाल पाएंगे या नहीं ! पर अंतत: हम इसमें कामयाब हुए। लीजिए, अब यह आपके हाथों में है। पढ़िए, मज़ा लीजिए और टीपें छोड़िए कि कैसा लगा -
















अनावश्यक निर्देश:-
अगर फांट की दिक्कत हो रही हो तो कीबोर्ड उठाकर सिर में मारिए।


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अनावश्यक निर्देश:-
अगर अभी भी पढ़ने को कुछ मिला हो तो सी।पी.यू. खोलकर उसमें घुस जाईए।


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अंतिम निर्देश:-अगर अभी भी कुछ नहीं मिलता तो समझ लीजिए आपको बु/फु/कुद्धू (तरंग में सही शब्द भूल गया हूं) बनाया गया है।


BURA NA MAANO HOLI HAI!

एक मूर्खतापूर्ण लेख


कई बार लगता है कि मैं मूर्ख हूं। फिर लगता है कि मैं कैसे मूर्ख हो सकता हूूं। क्या मैं इतना मूर्ख हूं कि यह भी न समझ सकूं कि मैं मूर्ख हूं या नहीं? अगर मैं मूर्ख हूं तो दूसरे मुझे विद्वान क्यों समझते हैं? क्या दूसरे मूर्ख हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे मुझे मूर्ख समझ कर ही विद्वान कहते हांे। क्या वे सभी विद्वानों को मूर्ख समझते है? क्या सभी विद्वान मूर्ख होते हैं? क्या मूर्ख लोग ही आगे चल कर विद्वान बन जाते हैं? मैं कितना मूर्ख हूं कि खुद को विद्वान कह रहा हूूं।

अगर मैं मूर्ख न होता तो क्या होता? क्या तब भी मैं लेखक होता? क्या सिर्फ लेखक होना ही मूर्ख होने के लिए काफी है? या फिर इसके लिए स्वतंत्र लेखक होना भी जरूरी है।

एक मित्र अर्से बाद मिले। पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो आजकल? ‘‘मैंने कहा, ‘‘लिखता हूं।‘‘ वे तड़ से भांप गए। बोले, ‘‘लिखते तो हो, पर कर क्या रहे हो?‘‘ मैं भी समझ गया कि वे क्या समझ रहे हैं।
‘‘कहीं-कहीं से पैसे भी आते हैं।‘‘ मैंने बताया। ‘‘चलो ठीक है’’, उन्होंने ढांढस बंधाया। फिर बोले, ‘‘कोई काम भी करो साथ में। लिखना-शिखना ठीक है शौक-मौज के लिए पर एक उम्र तक ही अच्छा लगता है। अब तुम छोटे थोड़े ही हो। समझ रहे हो न।‘‘

‘‘समझ रहा हूं। ‘‘मैंने मूर्खतापूर्ण ढंग से सिर हिलाया। तब कहीं जाकर उनकी संतुष्टि हुई। मगर बात फिर भी वहीं की वहीं रही। वे मुझे मूर्ख सिद्ध करके चले गए। और उनके जाने के बाद मेरे दिल में यह ख्याल और पक्का हो गया कि, ‘‘ये लोग साहित्य-वाहित्य क्या जानें, मूर्ख कहीं के।‘‘

मूर्ख की अक्लमंदी देखिए कि अक्लमंद की हंसी उड़ाने में पल-भर नहीं लगाता। जबकि अक्लमंद इतना मूर्ख होता है कि मूर्ख की हंसी उड़ाने से पहले भी सौ बार सोचता है।

आइए, अब जरा टोन बदलें।

मूर्खता सर्वोपरि है। सर्वत्र विद्यमान है। कहा भी गया है (नहीं कहा गया तो अब कहा जाएगा) कि ‘जहां न पहुंचे सूरज, वहां पहुंच जाए मूरख।‘ कहते हैं कि अधिकांश कुंवारी लड़कियां एक धनवान मगर मूर्ख पति की कामना करती है। सभी लड़के (या पुरूष) पहले से ही माने होते हैं कि स्त्रियां तो होती ही मूर्ख हैं। राजनीतिज्ञ इस विचार के साथ पले-बढ़े होते है कि अधिकांश जनता मूर्ख है। जो इसे और ज्यादा मूर्ख बना सकता है वही सफल हो सकता है। मगर जनता इतनी भी मूर्ख नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि शरीफ और बुद्धिमान लोग कभी भी राजनीति में आने जैसी मूर्खतापूर्ण हरकत नहीं करते।

रचना लौट आने पर लेखक समझता है कि सम्पादक मूर्ख है जो इस कालजयी रचना का महत्व नहीं समझ पाया। उधर सम्पादक सोचता है कि ये लेखक इतने मूर्ख क्यों होते हैं कि अपनी हर मूर्खता को अखबार में छपने भेज देते हैं। मगर इसके बावजूद भी लेख तो छपते ही हैं। बड़े लेखक भी पैदा होते ही हैं। क्या पता कल को किसी सम्पादक और मेरी मूर्खताएं मिल कर कोई ऐसा मूर्खतापूर्ण चमत्कार कर दें कि मैं बड़ा लेखक बन जाऊं।

चलिए, उसी टोन में लौटें।

क्या लिखना एक मूर्खतापूर्ण हरकत है? क्या लिखने से कुछ होता है? हो सकेगा? समाज, व्यवस्था वगैरह सुधरेंगे? कभी सुधरे हैं? क्या पाठक मूर्ख हैं जो लेखक की बातों में आ जाएंगे! पाठक से मेरा मतलब है आप यानी जो इस लेख को पढ़ रहे हैं। क्या आपको मेरी बात बुरी लगी। यदि हां तो कृपया मुझे मूर्ख समझ कर माफ कर दें। मैंने तो आपको पहले ही माफ कर दिया है। हिसाब बराबर।

और अंत में एक प्रार्थना जो इसी विशेष अवसर के लिए खुद चचा ग़ालिब मुझे लिखकर दे गए थे:-
बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ,कुछ न समझे खुदा करें कोई।

-संजय ग्रोवर

(‘पंजाब केसरी’ में प्रकाशित)

और अब इंतज़ार करें ’संवादघर’ के धमाकेदार ‘‘होली विशेषांक’’ का

Saturday, March 7, 2009

8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

व्यंग्य


**मर्दों वाली बात**




वातावरण मर्दांनगी से भरपूर था। इतना कि भरी हुई टोकरी से मरी हुई मछलियोें की तरह मर्दानगी फिसल-फिसल जाती थी। मर्दानगी के कई रूप थे। कही घनी मूंछों में थी, तो कहीं बांहों की फड़कती पेशियों में। चढ़ी हुई आंखों में थी, तो मस्तानी चाल में थी। बच्चों को गरियाते हुए थी और मां-बहनों को सुरक्षियाते हुए थी। अखबारी कागज़ पर कूद-फांद भी मचा रही थी और धर्म के दंगल में कुश्ती भी लड़ रही थी।




एक खास किस्म के चिंतन की कृपा से एक खास किस्म की पूर्व-निर्धारित शैली में जीने वाले सभी जन मर्द थे। हालांकि वे गैस का सिलिंडर लाने से लेकर बिजली का बिल जमा कराने तक जीवन के सभी क्षेत्रों मेंएडजस्टकर लेते थे, मगर फिर भी मर्द बने रहते थे, क्योंकि औरतों के साथएडजस्टनहीं कर पाते थे। वे सब इसलिए भी मर्द थे कि वे माइकल जैक्सन नहीं थे। हालांकि उनमें से कई कवि, लेखक और कलाकार थे, जो लंबे बाल भी रखते थे और पान से होंठ लाल भी किए रहते थे। मंच पर सांस्कृतिक हरकतें मचाने में वे माइकल से उन्नीस भी नहीं पड़ते थे, पर वे सुमित्रानंदन पंत भी नहीं थे कि अपनी सुकुमारता को मर्दानगी से स्वीकार पाते। हाय कि मर्द होते हुए भी वे सब कितने लाचार थे।




उनमे से कुछ लोग लंबे बाल रखने की बजाय दाढ़ी बढ़ाए रखते थे, तो कुछ, कुछ और प्रतीकें। ये सब उनके पूर्वजो की पुस्तकों में मर्दानगी के चिन्ह घोषित किए गए थे और मर्दानगी सिर्फ प्रतीकों में ही बची रह गई लगती थी। अपने पूर्वजों की पुस्तकों और उनमें तय किए जा चुके मर्दानगी के मानदंडों में लिथड़े हुए वे आंखें बंद किए पड़े रहते थे। यह उनकी मर्दानगी का एक और प्रकार था। अपनी टोटल मर्दानगी के बावजूद वे मर्दानगी के सभी प्रतीकों का खुलकर प्रदर्शन कर पाने की अपनी सांस्कृतिक मजबूरी पर मन मसोस कर रह जाते थे।




लगभग सभी मर्द लोग बदलाव के हामी थे, मगर धीरे-धीरे। वे कमीज-धोती से शर्ट-पतलून तक तब आते थे, जब दूसरे (कम मर्द या नामर्द) लोग छींटदार कपड़ों पर पहुंच जाते थे। इस तरह वे एक बदलाव लाते हुए भी, बड़े धैयपूर्वक, एकाध सीढ़ी कागैपबनाए रखते थे। वे चाहते थे कि देश-समाज-सभ्यता-संस्कृति को धक्का एकदम से लगे बल्कि धीरे-धीरे लगे। हालांकि यह युक्ति किसी असाध्य रोग को झेल रहे वृद्ध रोगी को दयामृत्यृस्वरूपस्लो प्वाइज़नदेने जैसे थी, मगर उनकी मर्दानगी के अनुकूल पड़ती थी।




एक दिन उन सबने उन पुरस्कारों पर हाय-तौबा मचा दी, जो उन्हें नहीं दिए गए थे। हालांकि माइकल जैक्सन कोई इधर का उद्योगपति नहीं था। फिर भी उसे जाने क्या सूझी कि उसने इधर के मर्दों के लिए कुछ लंबे-मोटे पुरस्कारों की घोषणा कर दी।




इसके बाद क्या हुआ? क्या उन्होंने माइकल जैक्सन की भावनाओं का आदर करते हुए पुरस्कार ग्रहण कर लेने की सहृदयता सहिष्णुता दिखाई? या पुरस्कार लौटा देने का क्रांतिकारी कदम उठाया? पाठक-श्रोता-दर्शक-आलोचक अपने-अपने अंदाजें मारते हुए अपने-अपने नतीजों पर पहुंच गए थे।


इधर मेरे लिए वक्त गया था कि हर लेख के अंत की तरह एक बार फिर डरूं। अतः जैसा कि नहीं होना चाहिए, पर अक्सर होता है, मैंने घोषणा की कि यह सब तो एक सपना था।




यह हुई ना मर्दों (ना+मर्दों?) वाली बात।




-संजय ग्रोवर


(जनवरी, 1997 को हंस में प्रकाशित)
+
अनुभूतिपर कविताएं स्त्री थी कि हंस रही थीऔरहमारी किताबों में हमारी औरतें


संवादघरपर कार्टून ‘‘कार्टूनखाना में स्कर्टस्’’


अमर उजालामें ग़ज़ल


संवादघरमें कविता मर्दानगी

Wednesday, March 4, 2009

ग़ज़ल है हटके, कह बेखटके

ग़ज़ल-1

वो गरचे बोलता बिलकुल नहीं था
मगर खामोश भी लगता नहीं था


वही तो बोलता रहता था हरदम
कि जिसपर बोलने को कुछ नहीं था


जो टहनी पत्तियों से भर गई थी
उसी का पेड़ थर-थर काँपता था


नज़र उतनी ही ज़्यादा बेहया थी
बदन को जितना ज़्यादा ढाँपता था


बगल की जिस गली से रास्ता था
पड़ोसी की बगल में इक छुरा था


वो जब लाशें गिरा कर हंस रहे थे
खुदा कोने में बैठा रो रहा था


कहीं गाएं बचाईं जा रहीं थीं
कहीं इंसान ज़िन्दा जल रहा था


वो जब लोगों से मिल कर लौटता था
उसे अपना पता मिलता नहीं था


मेरे दुश्मन से उसकी दोस्ती थी
यकीनन उसका सरमाया यही था


ग़ज़ल-2


ताज़ा कौन क़िताबें निकलीं
उतरी हुई ज़ुराबें निकलीं


शोहरत के संदूक में अकसर
चोरी की पोशाकें निकलीं


संबंधों का कलफ लगा कर
सीना तान उम्मीदें निकलीं


मैले जिस्म घरों के अंदर
बाहर धुली कमीज़ें निकलीं


दुनिया को सच्चाई बताने
चेहरे ओढ़, नक़ाबें निकलीं


चेहरे कितने चमकदार थे
कितनी घटिया बातें निकलीं


पानी का भी जी भर आया
यूँ बेजान शराबें निकलीं


-संजय ग्रोवर

Sunday, March 1, 2009

व्यंग्य-कक्ष में*****ऐतिहासिक भावनाएं*****

पिछले कुछ महीनों से इतिहास ने मेरे दैनिक जीवन में खलबली मचा दी है। मन का चैन और आँखों की नींद उड़ गयी है। जब भी कुछ खाता हूँ, पीता हूँ या करता हूँ तो मन में आशंकाएं घिरने लगती हैं कि हज़ार साल बाद या पाँच सौ साल बाद या पचास साल बाद इसे लेकर क्या सोचा जाएगा ? क्या इससे लोगों की भावनाएं तो नहीं आहत हो जाएंगी ? क्या इससे कोई अपने आपको उपेक्षित, अपमानित, उपहासित, हास्यास्पद हुआ तो नहीं महसूस करेगा ? लगने लगा है कि अब सब कुछ इसे लेकर तय करना पड़ेगा कि पचास/पाँच सौ/पाँच हज़ार सालों बाद उसके कैसे और कितने अर्थ व निष्कर्ष निकाले जाएंगे!

मान लीजिए सौ साल बाद आदमी कम्प्यूटर की फ्लौपियां, सीडियां आदि खाना शुरु कर दे तो उस फ्लौपी-खाऊ समुदाय की भावनाएं इस तथ्य को जानकर कितनी आहत होंगीं कि सौ साल पहले हमारे लोग रोटी जैसी कोई पिलपिली, खुरदुरी और नरम चीज़ खाकर गुज़ारा करते थे। उनमें से कई लोगों को यह भी लगेगा कि यह एक ऐतिहासिक झूठ है। ऐसा सम्भव ही नहीं कि सीडी-खाऊ और सेलफोन-पीऊ हमारी महान जाति ने कभी रोटी-सब्ज़ी-दाल जैसी निकृष्ट व अर्द्धविकसित डिशें खाईं होें। इसलिए इन दुष्ट तथ्यों को इतिहास से निकाला जाए और हमारी नरमो-नाजु़क भावनाओं को आहत होने से बचाया जाए।

सौ/पचास/पाँच सौ साल बाद जब आदमी आदमी को खाने लगेगा (हो सकता है मैं ग़लत होऊँ और दस साल बाद ही ऐसा हो जाए। हो सकता है आज भी ऐसा हो रहा हो। ) तो यह जान कर उसके जज़्बात को कितनी ठेस पहुँचेगी कि कुछ साल पहले हमारे पुरखे पशुओं के माँस जैसी गलीज़ चीजें़ खाया करते थे। एकाध अपवाद ने कभी-कभार एकाध औरत को तंदूर में भूना ज़रुर पर खाने का पराक्रम नहीं दिखा पाया। अन्यथा मानव-भक्षण से ज़्यादा ‘ग्रेसफुल’ कार्य और क्या हो सकता था। अगर पशु को खाने से इंसान पशुवत हो जाता था तो मानव को खाने से ज़्यादा मानवीय क्यों नहीं हो जाएगा भला!

कई बार अपने देसी पाखाने में उंकडँ़ू बैठा मैं यह सोच-सोच कर काँप उठता हूँ कि जब सुलभ शौचालयों समेत हमारे सारे पाखाने विदेशी ढंग की सीटों से सुसज्जित हो उठेंगे तो मेरी भावी पीढ़ियों को यह जान कर कितना दुख होगा कि उनके पितर पाखाने में भद्दे स्टाइल में बैठ कर शौच-क्रिया का संचालन किया करते थे। पाठकगण, आप बात को हल्के ढंग से न लें। बहरहाल, मैं तो समझ गया हँू कि आज की हल्की-सी भी हरकत का सरोकार कल की भारी-भरकम भावुकताओं से है। आज कुछ भी करने से पहले यह नहीं देखना होगा कि आज स्थितियां क्या हैं, ज़रुरतें क्या हैं, उपलब्धताएं क्या हैं। बल्कि यह देखना होगा कि कल इसके क्या ऐतिहासिक अर्थ निकाले जाएंगे! सदियों बाद लोगों की भावनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा!

आगे की तो मैं पहले भी सोचता था पर अब कुछ ज़्यादा ही सोचने लगा हँू। मसलन जब गाता हँू तो दस साल आगे की सोचता हँू। जब जागता हँू तो पचास साल आगे की सोचता हँू। जब सोता हँू तो हज़ार साल आगे की सोचता हूँ।

जब बेईमानी करता हूँ तो कुछ नहीं सोचता!

पर सोचता हूँ कि कभी इन बातों पर भी हमारी आने वाली पीढ़ियों की भावनाएं आहत हुआ करेंगी जब उन्हें पता लगेगा कि हम बात-बात में झूठ बोलते थे, तिकड़म भिड़ाते थे, भ्रष्टाचार में सिर से पाँव तक लिप्त थे, चारा और ताबूत तक में कमीशन खा जाते थे, औरतों को नंगा घुमाते थे, आदमी तक से पशुवत् व्यवहार करते थे, किडनियां निकाल कर बेच देते थे, एक-दूसरे का खून पीने पर उतारु रहते थे!?
फिलहाल भावनाओं की वो किस्म ज़्यादा प्रचलन में है जो बात-बात पर आहत हो जाती है। भावनाओं पर इतना और ऐसा ही ज़ोर रहा तो डर है कि जल्दी ही भावनाएं भी ऐतिहासिक न हो जाएं!

-संजय ग्रोवर


(‘समयांतर’ में प्रकाशित)

Saturday, February 28, 2009

'व्यंग्य-कक्ष' में *****प्रोजेक्ट डॉक्टर*****


अर्सा पहले एक अखबार में एक कार्टून छपा था। कार्टून के ऊपरी कोने में पिछले दिन के अखबार की कटिंग लगी थी,‘‘एक डाॅक्टर की लापरवाही से एक प्रोफेसर की मौत‘‘। और नीचे कार्टून के नायक के माध्यम से कार्टूनिस्ट ने इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया इस वाक्य में व्यक्त की थी,‘‘... .... ... और जब एक प्रोफेसर की लापरवाही से इतने लोग डाॅक्टर बन जाते हैं तब ... ... ...‘‘

इस पर बहुत से लोग कह सकते हैं कि उस डाॅक्टर ने ऐसे ही बने सारे डाॅक्टरों की तरफ से बाकी सारे लापरवाह प्रोफेसरों की ग़लतियों की सज़ा उस एक प्रोफेसर को देकर कोई बुरा नहीं किया। कुछ और लोग इस पर ‘‘जैसे कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान‘‘ का दार्शनिक मूड अपना कर निर्लिप्त बने रह सकते हैं। और कुछ ‘‘जैसे को तैसा‘‘ के अंदाज़ में ले सकते है। पर अगर हम कार्टूनकार के नज़रिए को गंभीरता से लें और उसे सच मानें तो देश में आए दिन होने वाली डाॅक्टरों की हड़तालों को देखकर हमें मानना पड़ेगा कि हमारे देश के प्रोफेसर अतीत में तो ज़रूरत से (और इस देश की ग़ज़ब की सहन शक्ति से) ज्यादा ग़लतियां कर ही चुके हैं अभी भी ऐसा करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। इसकी एक वजह शायद यह हो सकती है कि बहुत सारे प्रोफेसर भी अपने प्रोफेसरों की लापरवाहियों की बदौलत ही प्रोफेसर बन पाए होते हैं।

हड़ताल पर गए सरकारी डाॅक्टर अक्सर यह दावा करते हैं कि उन्होंने सरकार की सारी स्वास्थ्य मशीनरी को ठप्प कर दिया है। दरअसल यह दावा सरकार के ही हित में जाता है। क्यों कि इससे तो साफ-साफ पता चलता है कि हड़ताल से पहले सरकारी स्वास्थ्य मशीनरी कार्य भी कर रही थी। क्या सरकार के लिये उसकी अब तक की स्वास्थ्य संबंधी उपलब्धियों को नकारने वाले विरोधियों पर चढ़-दौड़ने के लिये हड़ताली डाॅक्टरों का यह बयान काफी नहीं होना चाहिए?

डाॅक्टरों की दो किस्में हमारे देश में पायी जाती हैं - सरकारी और प्राईवेट। लोग इनके बारे में तरह-तरह की बातें करते हैं। कहते हैं कि बहुत से सरकारी डाॅक्टर ऐसे भी होते हैं और इसलिए भी होते हैं कि वे अपने दाखिले के वक्त इतना डोनेशन दे चुके होते हैं कि उनके पास अपना क्लीनिक खोलने के लिये पर्याप्त पैसे ही नहीं बचे होते। जो थोड़े बहुत पैसे बच रहते हैं उनका ‘‘यथोचित‘‘ उपयोग करके वे सरकारी हो जाते हैं। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि प्राईवेट डाॅक्टर इसलिये कभी हड़ताल नहीं करते या अपनी दुकान (अर्थात् क्लीनिक) बन्द नहीं करते क्योंकि उन्हें अपने मनमाफिक तरीके से अपना व्यापार करने की आज़ादी हासिल होती है। सरकार अगर सरकारी डाॅक्टरों को ड्यूटी टाइम में भी ‘प्रैक्टिस‘ करने की छूट दे दे तो उनके द्वारा की जाने वाली हड़तालों की संख्या में कमी आ जाएगी। ऐसा कुछ लोगों का सुझाव है।

लोग और जो कुछ कहें, पर जब वे प्राईवेट डाॅक्टर की तुलना व्यापारी से करते हैं तो बिलकुल अच्छा नहीं लगता। अगर ऐसा है तो गाँवों के लोग आज भी डाॅक्टर को भगवान क्यों मानते हैं? शहरों और कस्बों के पढ़े-लिखे लोग मरीज देखने आए डाॅक्टर के रिक्शे से उतरते ही कुलियों की तरह उनकी अटैचियाँ क्यों ढोते हैं? ‘‘गारन्टी पीरियड‘‘ में पंखों, मशीनों या घड़ियों के खराब हो जाने पर विक्रेता व्यापारी से पैसा वापिस मांगने वाले लोग मरीज़ के ठीक न हो पाने की दशा में पिछले डाॅक्टर को यूं ही बख्श कर अगले की ओर क्यों बढ़ जाते हैं?

पर चूंकि समाज ऐसा करता है इसलिए स्पष्ट है कि डाॅक्टर भगवान का दूसरा रूप होता है। उसका हर काम निर्विवाद है, इंसानी मान्यताओं और धारणाओं से ऊपर है। हो सकता है कि कुछ लोग यहाॅँ-वहाँॅं मौजूद भगवान के ऐसे रूपों को देखकर पूजा करना ही छोड़ दें, पर इससे तथ्यों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।

अब उस दिन का किस्सा ही लीजिए। कलम कुमार जब डाॅ. अधपके की दुकान पर पहूॅँुंचा तो देखता क्या है कि डाॅ. अधपके मरीज़ों से घिरे बैठे हैं। सामने बैठे मरीज़ के मँुॅंह में थर्मामीटर लगा है। उसके बराबर बैठे मरीज़ से डाॅं0 अधपके हालचाल पूछ रहे हैं। तीसरा मरीज डा0 अधपके की बगल में बैठा है। डाॅ0 साहिब उसकी आॅंँखों का चैक अप करते हैं। पेट को टटोल कर देखते हैं। नब्ज़ देखते हैं। फिर जब पर्चे पर दवा लिखने लगते हैं तो मरीज़ टोकता है ‘‘डा0 साहब आपने मेरा गला तो देखा ही नहीं जिसे दिखाने मैं यहाॅंँ आया था‘‘।

कोई बात नहीं। डाॅ. अधपके की यह भूल क्षम्य है। सभी जानते है कि जब ग्राहक ज्यादा हों, दुकानदार अकेला हो और वक्त कम हो तो ग्राहकों को जल्दी-जल्दी निपटाने में ऐसी गड़बड़ियां आम तौर पर हो ही जाती है।

बुजुर्ग लोग फरमाते हैं कि हमारा समाज आज भी डाॅक्टरों की इतनी इज़्ज़त इसलिये करता है कि किसी जमाने में डाॅक्टर से बड़ा समाज सेवक दूसरा नहीं होता था। चूंकि हमारे समाज ने निस्वार्थ सेवा करने वालों को हमेशा सम्मान दिया है। और परम्पराओं को यथासम्भव व यथाशक्ति निभाया है तो इसका फायदा डाॅक्टरों को आज भी मिल रहा है।

पर समाज सेवा करने वाले डाॅक्टरों की यह तीसरी किस्म भारतीय चीतों की नस्ल की तरह इतनी तेजी से लुप्त क्यों होती जा रही हैं? कुछ अर्सा पहले सरकार ने चीतों की नस्ल को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाईगर नामक एक योजना शुरू की थी। क्या हम अपने समाज की खुशहाली के लिए महत्वपूर्ण अंग समझे जाने वाले समाज सेवी डाॅक्टरों की लुप्त होती नस्ल को बचाने के लिये भी सरकार से ‘‘प्रोजेक्ट डाॅक्टर‘ जैसी किसी योजना की उम्मीद करें?


इससे पहले कि कोई चीते के पंजों और डाॅक्टर के स्टेथस्कोप में समानता देखना शुरू करें, मैं इस लेख को यहीं खत्म किये देता हूं।
-संजय ग्रोवर


(6 अक्तूबर, 1995 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

(‘कस्बा‘ पर रवीश जी और ‘मेरे आस-पास’ पर मनविंदर भिंबर जी के अनुभव पढ़े तो अपने कई नए-पुराने अनुभव और यह व्यंग्य याद आ गया।)

Friday, February 27, 2009

'मर्दानगी' पर दो कविताएं

1. मर्दानगी
.............................

गर्वीले चेहरे पर
अकड़ी हुई मूँछें
बाहों पर उछलती हुई मछलियां
गरज़दार आवाज़



मर्दानगी
रखी है इतिहास के शोकेस में
चाबी भरने पर आवाज़ भी करती है
जब जम जाती है इस पर धूल
तो क्रेज़ी स्त्रीत्व अपने कोमल हाथों से
इसे झाड़-बुहार कर
फिर रख देता है शोकेस में



जब पुरानी पड़ जाती है
याकि मर जाती है
तो पुरानी की जगह नई सजा दी जाती है



मर्दानगी
खुश है अपने सजने पर



साल दर साल
पीढ़ी दर पीढ़ी
शोकेस में सजती आ रही है
मर्दानगी

(तकरीबन 14-15 साल पहले ‘कतार’ नामक लघुपत्रिका में प्रकाशित)
.............................

2 . यहाँ भी मैं
........................

अब स्त्रियां पूछ रही हैं
पुरुष एक और
स्त्री को चाह सकता है
तो स्त्री
एक और पुरुष मित्र को
क्यों नहीं चाह सकती
......................................






मैंने भरोसा दिलाया
बिलकुल चाह सकती है
बशर्ते कि
वह पुरुष मित्र
मैं होऊं।
..........................




(रचना तिथि: 23-02-२००९)
.............................



-संजय ग्रोवर

Wednesday, February 25, 2009

गज़ल पुरानी, लगे सुहानी


ग़ज़ल

वो समझाने आ जाएंगे
जी को जलाने आ जाएंगे

गर यूँ ही बेहोश रहे तो
होश ठिकाने आ जाएंगे

बात तुम्हारी जब बिगड़ी, वो
बात बनाने आ जाएंगे

दिया जलाने की कह कर वो
आग लगाने आ जाएंगे

नए दोस्त जब-जब आएंगे
दर्द पुराने आ जाएंगे

प्यार पुराना जागेगा तो
नए ज़माने आ जाएंगे

मय को बुरा कहेंगे वाइज़
ज़हर पिलाने आ जाएंेगे


-संजय ग्रोवर

Monday, February 23, 2009

‘‘कार्टूनखाना’’ में आज स्कर्टस् !


(**मेरे ब्लॉग पर मेरा पहला कार्टून,
**ठीक से देखना हो तो पिक्चर पर क्लिक करो-)

Thursday, February 19, 2009

गज़ल जो अब तक छपी नहीं/पढ़ो कहीं तो पढ़ो यहीं...........


कल जब सुनील भाई ने कहा कि टापिक बदलो और अनुराग भाई ने कहा हमें आपके स्वास्थ्य की चिंता होने लगी है। तो मुझे भी लगा कि माहौल बदला जाए। आज एक नयी और अप्रकाशित गज़ल पोस्ट कर रहा हूं:-

ग़ज़ल

उसको मैं अच्छा लगता था
मैं इसमें क्या कर सकता था

एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
रोते-रोते हंस सकता था

नज़र थी उसपे जिसके लिए मैं
फ़कत गली का इक लड़का था

जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था

मेरा ख़ुदको सच्चा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था

मैं सब खुलकर कह देता था
कोई भी मुझ पर हंस सकता था

मेरा उसको अच्छा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था


बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था

ख़ानदान और वंश के झगड़े !
मै तो केवल हंस सकता था

-संजय ग्रोवर

Wednesday, February 18, 2009

व्यंग्य-कक्ष में *****महान देश के महान लोग*****

यह असम्भव ही लगता है कि किसी को हमारे देश की महानता के बारे में पता न हो। फिर भी कोई भूल न जाए इसलिए 15 अगस्त और 26 जनवरी के अलावा भी कई अन्य उपयुक्त अवसरों पर बताया जाता है कि देश महान है। रेडियो, टीवी, अखबारादि अक्सर घोषणा करते रहते हैं कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, परम्पराएं वगैरह सब महान हैं। शायद इस तरह की घोषणाएं भी हमारी परम्परा का एक हिस्सा है। वैसे भी अच्छी बातें बताने वालों को बस अवसर मिलना चाहिए, उपयुक्त तो वे उसे बना ही लेते हैं। बल्कि अवसर मिलने का भी इन्तज़ार नहीं करते और ऐसी स्थितियां पैदा कर देते हैं कि अवसर खुद-ब-खुद निकल आता है। तो जब इतने सालों से और इतने तरीकों और तरक़ीबों से समझाया जा रहा हो कि देश महान है तो मान ही लेना चाहिए कि देश महान है। वैसे भी व्यक्ति का फर्ज़ यह है कि जिस देश में वो पैदा हो जाए उसी को महान मानने लगे। दुनिया के सभी लोग ऐसा ही करते हैं। फिर हम क्या कोई आसमान से टपके हैं!
देश के महान होने का कोई निश्चित वक़्त नहीं होता। यह महानता सुबह-सवेरे ही शुरू हो जाती है। सुबह-सुबह ही हलवाई की दुकान पर पारम्परिक पकवान जलेबी, कचैड़ी या समोसा खाने पधारे ‘न्यू प्राचीन एण्ड कं.‘ के मालिक लाला लपेटचंद जी सभ्यता और संस्कृति की चिन्ता में सूखना शुरू हो जाते हैं। वे एक ‘देशद्रोही’ अंग्रेजी फिल्मी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ममता कुलकर्णी द्वारा अपने निर्लज्ज नग्न चित्र छपवाने के कारण उससे बहुत नाराज हैं। लाला जी नितांत प्राकृतिक वेषभूषा में सुबह की हवाखोरी के हल्के मूड में इधर को निकल आए हैं। अपवादस्वरूप उन्होंने कमर के निचले हिस्से में एक अधोवस्त्र पहना हुआ है जोकि उनके घुटनों से नीचे के इलाके को ढकने में किन्हीं अपरिहार्य कारणों से असमर्थ हैं। बोलचाल की भाषा में इस अधोवस्त्र को कच्छा, जांघिया या कभी कभार घुटन्ना भी कहते हैं। ऐसी दशा में लाला की यह चिन्ता स्वाभाविक ही लगती है कि ममता को पुरूषों के बारे में नहीं तो कम से कम देश की बहू-बेटियों के भविष्य के बारे में तो सोचना चाहिए।
लाला बैंच पर बैठे हुए हैं। विवाद खड़ा हुआ है। लोग हां, हूं करते हुए सुन रहे हैं। और कचैड़ियां खाते जा रहे हैं। तिस पर भी लाला तैश में आ जाते हैं और पास खड़े मरियल कुत्ते पर लात जमा कर दोना बीच सड़क पर फेंक देते हैं। साथ ही धुर्र, फटाक की पारम्परिक आवाज़ के साथ सड़क पर ज़ोेर से थूकते हैं और सभ्यता और संस्कृति की चिंता में दो और वाक्य बोलकर घर के लिए प्रस्थान करते हैं।
लाला जल्दी में हैं। उन्हें अपनी पत्नी की चिंता है। जब तक वे घर नहीं पहुंचेंगे, पत्नी नाश्ता छुएगी तक नहीं, भले ही उन्हें लौटने, नहाने, धोने में कितना ही वक़्त लग जाए। पत्नी भूखी न रह जाए, इसी वजह से उन्हें रोेज़ इसी तरह दो-दो बार नाश्ता करना पड़ता है।
ऐसा भी नहीं कि लाला अकेले ही सभ्यता और संस्कृति के लिए परेशान हैं। दरअसल ऐसे लोग तो बहुत सारे हैं, अनगिनत। अक्सर देखने में आता है कि लोगों को कितनी भी जोर से ‘लगी‘ हुई हो मगर वे कोई दीवार या गली नज़र आ जाने तक धैर्य बनाए रखते हैं और जल वितरण नहीं करते। शायद सभ्यता और संस्कृति की खातिर ही वे इस जल वितरण में ज्यादा देर तक रूकावट डालने से होने वाले शारीरिक और मानसिक कष्ट को पी जाते हैं और बीच सड़क पर कोई ऐसी हरकत नहीं करते जिससे कि आम ज़ुबान में ‘पेशाब करना‘ या ‘मूतना‘ कही जाने वाली इस नैसर्गिक क्रिया पर कोई आंच आए। अनेकानेक पर्यावरण प्रेमी सड़क किनारे लगे पेड़ों को इस परोपकारी क्रिया से नवाज कर पुण्य प्राप्त करते हैं। कुछ अत्यन्त उत्साही युवा जन तो रात-बिरात ही इतने जोश में आ जाते हैं कि पक्की सड़क पर ही ‘बर्फ में आग लगा देंगंे‘ के अंदाज़ में धारा-प्रवाह करना शुरू कर देते हैं।
हमारे परम्परा भी बड़ी समृद्ध है। सारे अविष्कार एवं खोजें हमारे यहां प्राचीन काल में ही किए जा चुके हैं। चूंकि इन आविष्कारों व खोजों को करने में हमें काफी श्रम करना पड़ा सो हम काफी थक गए हैं और पिछले कई सालों से आराम कर रहे हैं। अब करने को कुछ बचा भी नहीं। सिवाय इसके कि जब भी दुनिया में कोई अविष्कार होता है हम अपने प्राचीन ग्रंथों में से तुरन्त ढूंढ-ढांढ कर बता देते हैं कि फलां पन्ने की फलां पंक्ति में फलां व्यक्ति ने यह आविष्कार पहले ही कर लिया है। तत्पश्चात् हम विदेश में हुए किसी ताज़ा आविष्कार को अपने किसी नए नाम से घटिया और नकली पुर्जों के सहारे बनाने की तिकड़म सोचने लगते हैं। जिसमें कि हम अक्सर सफल होते हैं। और सिद्ध कर देते हैं कि हम अपने प्राचीन कालिक आविष्कार की आधुनिक विदेशी नकल की नकल करते हुए भी उतने ही मौलिक बने रहते हैं।
इस सब के अलावा अपने यहां स्त्रियों का भी बहुत सम्मान किया जाता है। उन्हें देवी माना जाता है। इसलिए अधिकाँश पुरूष चाहते हैं स्त्रियां मंदिर में स्थित देवी की मूर्ति की तरह शांत व स्थिर एक कोने में पड़ी रहें। ज्यादातर पुरूष जब अन्यान्य तरीकों से स्त्रियों का सम्मान करते रहने के बावजूद भी असंतुष्ट रह जाते हैं और उनमें महानता की भावना और भी बलवती हो उठती है तब वे विवाह कर लेते हैं। और स्त्रियों को व्यक्तिगत तौैर पर सम्मान प्रदान करते हैं। इससे उनका यह डर भी कम हो जाता है कि कोई अन्य व्यक्ति उनके लिए आरक्षित स्त्री का सम्मान न कर डाले। पर इधर सुनने में आया है कि स्त्रियां अब सम्मान करवाते-करवाते थक गई हैं। वे चाहती हैं कि अब उन्हें मौका दिया जाए। जिससे कि वे पुरूषों का यथोचित सम्मान करके यह कर्ज़ा उतार सकें।
इस प्रकार सभ्यता, संस्कृति, परम्परा, मर्यादा वगैरह से लबालब हमारे देश में कहने-सुनने को बहुत कुछ है। परन्तु एक ही लेख में सब कुछ कहते हुए तो मैं असभ्य ही दिखाई पड़ूंगा। और मेरी समझ में असभ्य होना इतनी बुरी बात नहीं जितना कि असभ्य दिखना। आपका क्या ख्याल है?
-संजय ग्रोवर
(12 अगस्त, 1994 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

Tuesday, February 17, 2009

आज हुआ मन गज़ल कहूं.....


गज़ल

ऐसा नहीं कि भीड़ में शामिल नहीं हूं मैं
लेकिन धड़कना छोड़ दूं वो दिल नहीं हूं मैं

कुछ बाँझ ख्यालात का खूनी हूं गर तो क्या
उगती हुई उम्मीद का क़ातिल नहीं हूं मैं

दिल को हो दिल से राह, कोई ऐसी राह हो
घर में दरो-दिवार से दाखिल नहीं हूं मैं

गो नन्हा सा चिराग हूं, हूं तो तुम्हारे पास
क्या हो गया जो तारों की झिलमिल नहीं हूं मैं

रखता हूं दूर प्यार से हिसाब की क़िताब
आखिर पढ़ा-लिखा कोई जाहिल नहीं हूं मैं

कानून ही को कटघरे में लाए ना तो फिर
ऐसे किसी गुनाह का क़ायल नहीं हूं मैं

खोले बिना ही रस्सियां खेते रहें जो नाव
उनकी हदों के पास का साहिल नहीं हूं मैं

रफ्तारे-ज़िन्दगी को हूं हरदम नया सवाल
हारे हुए जवाबों की महफिल नहीं हूं मैं

-संजय ग्रोवर

Sunday, February 15, 2009

ये ‘‘डीसैक्सुअलाइजेशन’’ क्या बला है ?


सुशांत जी, आपने पेड़ो के नीचे खड़े, दीवार पर चढ़े, खेत में खड़े, कई बार तो आधी रात के वक्त चैराहे पर खड़े ‘‘मर्दों’’ को पेशाब करते देखा है ? आपको क्या लगता है ये सब ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं ? आपने आदिवासियों को देखा है ? उनकी स्त्रियों की वेश-भूषा देखी है ? क्या वे दिन-रात यौन-क्रिया करते हैं और इसलिए ‘‘डीसैक्सुअलाइज़्ड’’ हैं ? मुझे याद आता है 20-30 साल पुराना माहौल जब कोई स्त्री किसी महफिल में स्लीवलैस पहनकर आ जाती थी तो पूरे वक्त न तो वो खुद सहज रह पाती थीं न पूरी महफिल। पूरे वक्त स्त्री बांहो को तरह-तरह से ढंकने की कोशिश करती रहती तो मर्द नज़रें चुराते। शोहदे घूर-घूर कर देखते। यानि सहज-सामान्य कोई न रह पाता। क्या आज भी ऐसा ही है ? यह बदलाव क्या ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ की वजह से आया है !? टीवी के रिएलिटी शोज़ में मध्यवर्गीय घरों की लड़कियां आज उन्मुक्त वेश-भूषा में सहज भाव से विचरती हैं। उनके साथ उनके माँ-बाप-भाई-बहिन भी होते हैं और वे भी उतने ही सहज होते हैं। क्या वे सब दिन-रात सैक्स कर-करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं इसलिए इतने सहज-सामान्य हो गए हैं ?
इसके अलावा भी अपने कुछ पुराने लेखों के टुकड़े यहाँ पेश करना चाहूंगा जिससे मुझे अपनी बात कहने में आसानी हो जाएगी और व्यर्थ के दोहराव और वक्तखर्ची से भी बच जाऊंगा:-
अश्लीलता को लेकर एक और मजेदार तथ्य यह है कि बढ़ते-बदलते समय के साथ-साथ इसको नापने-देखने के मापदंड भी बदलते जाते हैं। 1970 में जो फिल्म या दृश्य हमें अजीब लगते थे, अब नहीं लगते। आज बाबी पर उतना विवाद नहीं हो सकता, जितना ‘चोली के पीछे’ पर होता है। आज साइकिल, स्कूटर, कार चलाती लड़कियां उतनी अजीब नहीं लगतीं, जितनी पांच-दस साल पहले लगती थीं। मिनी स्कर्ट के आ जाने के बाद साधारण स्कर्ट पर एतराज कम हो जाते हैं। मध्यवर्गीय घरों में नौकरीशुदा स्त्रियों को लेकर तनाव व झगडे़ जितना पहले दिखते थे, उतना अब नहीं दिखते।
(6 दिसम्बर 1996 को अमरउजाला, रुपायन में प्रकाशित)
अब आप मेरे आलेख के उस अंश को दोबारा-तिबारा पढ़ लें जिसमें से न जाने कौन-सा गुणा-भाग करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ शब्द निचोड़ लिया गया है:-
‘‘स़्त्री को अपनी कई समस्याओं से जूझने-निपटने के लिए देह से मुक्त तो अब होना ही होगा और इसके लिए उसकी अनावृत देह को भी पुरूष अनावृत देह की तरह सामान्य जन की आदत में आ जाने वाली अनुत्तेजक अवस्था के स्तर पर पहुंचाना होगा ।‘‘
अगर अभी भी आपको समझ में नहीं आता तो मुझे कुछ बातें दोहरानी तो पड़ेंगी ही। वैसे भी अगर हम अतार्किक बातों को हज़ार-हज़ार साल दोहरा सकते हैं तो तार्किक को भी दो-चार बार दोहरा लेंगे तो ऐसी कौन सी आफत आ जाएगी ? पहले वे बातें मैंने टिप्पणी में कही थीं, अब संशोधन के साथ मुख्य पोस्ट में लगा रहा हूँ। मैं हर मसले पर चर्चा करुंगा। थोड़ा धीरज तो रखें। मगर आपको तो जय-पराजय के नतीजे की जल्दी मची है।
और आप मुद्वों से हटकर न जाने कौन-कौन से राग अलाप रहे हैं ? कि मैं अपने-आपसे नाराज़ हूँ। कि मुझे प्रशंसा सुनने की आदत नहीं है ! क्या आपको लगता है कि इन सब बातों का इंस बहस से कोई मतलब है ?
बाते अभी बहुत सी बाकी हैं ।
(जारी)

-संजय ग्रोवर

Friday, February 13, 2009

व्यंग्यात्मक टिप्पणी: वेलेंटाइन डे पर बजरंगी का प्रेम-पत्र, साभार


प्रिय सुनसुखिया,
हैप्पी वेलेंटाइन डे
(मुहब्बत दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं)
मैं प्रार्थना करता हूँ भगवान से कि हमारा प्यार सदियों तक अमर रहे....प्रिय तुम तो जानती ही हो कि मैं भगवा ब्रिगेड का सदस्य हूँ और हर साल की तरह इस साल भी हमारे संगठन ने प्यार करने वालों का विरोध करने का बीड़ा उठाया है....या फिर यूं कहूं कि समाज सुधार का ठेका।
इसलिए आजकल मैं काफी व्यस्त हूं....जिस कारण मैं तुम्हे दो दिन पहले ही अपना वेलेंटाइन डे प्रेम-पत्र लिख रहा हूं। आखिर समाज सुधार और धर्मरक्षा का भी तो ध्यान रखना है।
खैर, छोड़ो इन सारी बातों को। हर साल की तरह इस बार भी हम अपना वेलेंटाइन डे खूब धूम-धाम से मनाएंगे, जिसका कार्यक्रम इस प्रकार रहेगा:-
सुबह सात बजे मैं गुलाब के फूलों के साथ तुम्हारे घर के पिछवाड़े वेलेंटाइन डे विश करुंगा। (क्योंकि घर के मुख्य दरवाजे पर पिताजी का खतरा है।) तत्पश्चात मैं सुबह 7ः30 बजे परवाना चैक पर वेलेंटाइन डे के विरोध पर धरना-प्रदर्शन में भाग लूंगा। तब तक तुम तैयार होकर 10 बजे दीवाना पार्क में मिलना। ठीक वक्त पर आना क्योंकि 12ः00 बजे से हमारी ब्रिगेड के सदस्य यहां दीवाना पार्क में ‘छापामार-दीवाना मार’ अभियान चलाएंगे। जब दोपहर में सारे बजरंगी कुछ देर के लिए सुस्ताएंगे, तो इसी दौरान हम लोग फ्रैंडली रेस्टोरेंट में प्यार की पींगे बढ़ाएंगे। फिर शाम 3ः00 बजे सपना सिनेमा में पिक्चर देखेंगे ‘प्यार की होगी जीत’। फिल्म खत्म होते ही तुम अपने घर चली जाना, क्योंकि शाम 6ः00 बजे हमारी ब्रिगेड मुहब्बत करने वालों के सपनों को कुचलेगी। सात बजे एक खबरिया चैनल ‘टुक-टुक न्यूज़’ पर मेरा कार्यक्रम प्रसारित होगा जिसमें मैं भारतीय संस्कृति पर जोरदार भाषण दूंगा। रात 9ः00 बजे जब हमारी ब्रिगेड के सदस्य थक-हार कर अपने-अपने घरों को चले जाएंगे तब मैं चोर रास्ते से तुम्हारे कमरे में दाखिल रहूंगा फिर हम तुम अपने भविष्य के सपनों में खो जाएंगे।
तुम्हारा प्रेमी
बजरंगी


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संपर्क: अब्बास, नूर-ए-इलाही, घौंडा, दिल्ली-110053
(युद्धरत आम आदमी, अप्रैल-जून, 2008 से साभार )

Thursday, February 12, 2009

पंाच पोंगे-कट्टर-मुल्ले-पंथी बनाएंगे सारे समाज का खाने-पीने-पहनने-नाचने का मैन्यू !?




सुशांत जी आप तो नाराज़ हो गए। यह क्या बात हुई कि जब आप अपने लेख का अंत ‘‘‘वहीं जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना कर रहा है।’’’ जैसे वाक्यों से करते हैं तो वो आपको बड़ी धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक-सभ्य भाषा लगती है। ऐसा क्यों, भाई ?


ऊपर से आप मुझे नयी व्यवस्था का मिशन-स्टेटमेंट बनाने को कह रहे हैं जैसे कि पिछली व्यवस्था का आपने तैयार किया था ! सारे यथास्थ्तििवादियों की तान यहीं आकर टूटती है। कल को कोई मजदूर या एन.जी. किसी टाटा-बिरला के यहाँ चल रहे शोषण का विरोध करेगा तो आप तो उससे यह कहेंगे कि पहले तुम खुद टाटा-बिरला जैसा कारखाना लगाओ या उसका कोई नक्शा बनाकर दो तब विरोध करना। अपने से अलग विचारों के लोगों को आप किस तरह से जंगल में जा बैठने का आदेश जारी करते हैं जैसे सारा समाज आपका जरखरीद गुलाम हो सारे लोग आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हों और सारे देश का पट्टा आपके नाम लिखा हो। सब वही खाएं जो आप बताएं, वही पहनें जो आप कहें, वही बोलें जो आप उनके मुंह में डाल दें। वाह, कैसी हत्यारी भाषा, कितनी अहंकारी सोच (?), कितनी तानाशाह प्रवृत्ति मगर फिर भी धार्मिक ! फिर भी आध्यात्मिक ! फिर भी सामाजिक ! फिर भी सभ्य।आप कहते हैं कि मैं कोई व्यवस्था सुझाऊँ। मैं क्यों सुझाऊं भाई !?


हां, मुझे पता है कि एक दवा मुझे अत्यधिक नुकसान पहुँचा रही है। लेकिन क्या मै उसे सिर्फ इसलिए खाता जाऊं और तारीफ करता जाऊं कि बाज़ार में उसकी वैकल्पिक दवा उपलब्ध नहीं है और मैं खुद वह दवा बनाने में सक्षम नहीं हूँ ! मैं उस दवा के ज़हरीले असरात की बाबत आवाज़ उठाऊंगा तभी तो कुछ लोग नयी दवा बनाने के बारे में सोचेगे। तभी तो वे सब लोग भी आवाज़ उठाएंगे जो इंस दवा के ज़हरीले नतीजे तो भुगतते रहे हैं मगर सिर्फ इसलिए चुप हैं कि उन्हें लगता है कि वे अकेले हैं और उपहास के पात्र बन जाएंगे। स्त्री-विमर्श के मामले में ही देखिए, पहले विद्वान लोग कहते-फिरते थे कि ऐसी दो-चार ही सिरफिरी औरतें हैं जो धीरे-धीरे अपने-आप ‘‘ठीक’’ हो जाएंगी, नही ंतो हम कर देंगे। अब देखिए तो कहां-कहां से कितनी-कितनी आवाज़े उठ रही हैं। आरक्षण के मसले पर आप ही जैसे विद्वानों ने पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह को पागल तक कह डाला था। मगर आज सारी पार्टियां बढ़-चढ़कर आरक्षण दे रही हैं। इण्टरनेट के आगमन को लेकर आप ही जैसे लोगों ने तमाम हाऊ-बिलाऊ मचाई। मगर सबसे ज़्यादा फायदा भी आप ही जैसे लोग उठा रहे हैं। भले ही इंस नितांत वैज्ञानिक माध्यम का दुरुपयोग अपनी अवैज्ञानिक सोच को फैलाने के लिए कर रहे हों। इसलिए किसी भी नयी चीज़ का विरोध करने से पहले यह तो तय कर लीजिए कि अंत तक आप अपने स्टैण्ड पर कायम भी रह पाएंगे या नहीं !? और इंस ग़लतफहमी में तो बिलकुल मत रहिए कि सभी आपकी तरह सोचते (?) हैं और भेड़ों की तरह आप उन्हें जहां मर्ज़ी हांक ले जाएंगे।


कोई भी व्यवस्था तो एक दिन में बनती है और ही कोई एक आदमी उसे बनाता है। मगर आप मुझसे ऐसी ही उम्मीद रखते हैं। आप क्या समझते हैं कि मैं भी उन दस-पाँच पोंगापंथियों और कठमुल्लों की तरह अहंकारी और मूर्ख हूँ जो खुदको इतना महान विद्वान समझते हैं कि वही सारी दुनिया के लिए खाने-पीने-नाचने-पहनने का मैन्यू तय कर सकते हैं ! मेरी रुचि ऐसी किसी गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था में है ही नहीं कि सब मेरी तरह से जीएं। अगर मेरी टांगें पतली हैं और निक्कर मुझे सूट नहीं करता तो मै यह विधान बनवाने की कोशिश करुं कि सभी मेरी तरह फुलपैंट पहनेंगे। अरे जिसको जो रुचता है वो करे। आप कौन हैं तय करने वाले। दरअसल आपको किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने की आदत ही नहीं जिसमें सबके लिए जगह हो जब तक कि वह किसी तीसरे के जीवन में नाजायज घुसपैठ कर रहे हों। आपको सिर्फ वही व्यवस्था समझ में आती है जो या तो आपके अनुकूल पड़ती हो या मेरे ! आपके हिसाब से तो फिर सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-दमन, कन्या-भ्रूण-हत्या भी चलते रहने चाहिए थे क्योंकि फुलप्रूफ वैकल्पिक व्यवस्था तो मेरे पास थी आपके ! अगर सती-प्रथा हटानी है तो वैसी ही कोई और प्रथा होनी चाहिए हमारे पास। नही तो, आपकी सोच के हिसाब से ही, सती-प्रथा का विरोध करने का हमारा कोई हक ही नहीं बनता।


कई बातें तो आप ऐसी मुझे समझा रहे हैं जो खुद आपको समझनी चाहिएं। जैसे कि फुल वाॅल्यूम पर रेडियो चलाने का उदाहरण। अपने एक पुराने व्यंग्य की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना शायद बेहतर भी होगा और कारगर भी:- ‘‘क्यों! भावनाएं क्या सिर्फ आस्तिकों की होती हैं! हमारी नहीं!? हम संख्या में कम हैं इसलिए!? दिन-रात जागरण-कीर्तन के लाउड-स्पीकर क्या हमसे पूछकर हमारे कानों पर फोड़े जाते हैं? पार्कों और सड़कों पर कथित धार्मिक मजमे क्या हमसे पूछ कर लगाए जाते हैं? आए दिन कथित धार्मिक प्रवचनों, सीरियलों, फिल्मों और गानों में हमें गालियां दी जाती हैं जिनके पीछे कोई ठोस तर्क, तथ्य या आधार नहीं होता। हमनें तो कभी नहीं किए धरने, तोड़-फोड़, हत्याएं या प्रदर्शन!! हमारी भावनाएं नहीं हैं क्या? हमें ठेस नहीं पहुँचती क्या? पर शायद हम बौद्धिक और मानसिक रुप से उनसे कहीं ज्यादा परिपक्व हैं इसीलिए प्रतिक्रिया में बेहूदी हरकतें नहीं करते।’’


बाते अभी बहुत-सी बाक़ी हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर


Sunday, February 8, 2009

व्यंग्य-कक्ष में*****गज़-भर एक्सक्लूसिव*****


गज़-भर चैनल पर खबरों का सजीव प्रसारण चल रहा है। अचानक स्क्रीन के ऊपरी कोने में ‘ब्रेकिंग-न्यूज़’ की पट्टी चमकती है। तुरंत पश्चात् निचले कोने में गज़-भर ऐक्सक्लूसिव का पट्टा आ विराजता है।

अलसाई आवाज़ में खबरें पढ़ रहा चिकना-चमका न्यूज़-रीडर उत्साह से भर उठता है, ‘अभी-अभी खबर मिली है कि राजधानी के स्वतंत्रता-चैक पर सरे-आम,दिन-दहाड़े एक युवती के साथ बलात्कार किया जा रहा है।’

दड़ियल-तिनका न्यूज़-रीडर, ‘और आपको जान कर खुशी होगी कि आपके प्रिय चैनल का संवाददाता सबसे पहले वहां पहंुचा है। आईए ,सीधे, लाइव कवरेज के लिए आपको वहीं लिए चलते हैं जहां मोैजूद हैं हमारे रिपोर्टर मुखर खामोश। मुखर, हमारे दर्शकों को बताईए कि अब वहां क्या स्थिति है?’

मुखर,‘हां मैं इनसे पूछ रहा हूं, मैडम,आप यहां कबसे हैं?आपका नाम क्या है?पहले तो आप हमारे दर्शकों को अपना नाम बताएं! आप यहां क्यों आयी थीं?और अब आप कैसा महसूस कर रही हैं?’

युवती कराहती है.लगता है ‘कोई मुझे बचाओ’ जैसा कुछ बुदबुदा रही है।
दड़ियल-तिनका, ‘आप देख रहें हैं कि वे अपना नाम तक नहीं बता पा रहीं हैं। मुखर,हम आपसे फिर संपर्क करेंगंे.इस बीच स्टूडियो में हमारे बीच मौजूद हैं ‘नारी-उत्थान’ संस्था की प्रमुख प्रगति जी और ‘देवी-वाहिनी’ की सुश्री कंचनलता जी। प्रगतिजी पहले आप बताईए कि दिन-दहाड़े, इस तरह से एक देश की राजधानी में यह सब हो रहा है,सब चुपचाप देख रहे हैं.कानून-व्यवस्था की मौजूदा हालत और समाज के ऐसे नैतिक पतन पर आप क्या कहना चाहेंगी?’

प्रगति,‘मैं आपके सवाल का जवाब बाद में दूंगी। यह वक़्त सवाल-जवाब का नहीं है। पहले आप मुखर जी से कहें कि किसी तरह उस युवती को बचाएं। अन्यथा मुझे इस बारे में सोचना होगा।’

चिकना-चमका, ‘धन्यवाद प्रगति जी, इस पर विस्तार से बात हम आपसे बाद में करेंगे।फिलहाल वक्त है एक छोटे से ब्रेक का। ब्रेक के बाद एक बार फिर हम ले चलेंगे आपको स्वतंत्रता-चैक पर जहां कि यह बलात्कार हो रहा है,किया जा रहा है। तो तैयार रहें लाइव कवरेज के लिए।’


- ब्रेक -


मुखर, ‘तिनका, जैसा कि आप देख रहे हैं, यहां काफी भीड़ है। सभी लोग उतावले हैं।नजदीक से देखना चाहते हैं। पुलिस उन्हे पीछे हटाने की पूरी कोशिश कर रही है। मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं बलात्कारी युवक से बात करने की। और चमका, मैं पुलिस की मदद से यहां तक पहुंच गया हँूं। आईए, हम बलात्कारी युवक से थोड़ीे बातें करते हैंः



मुखर,‘क्या आप अपना नाम हमारे दर्शकों को बताएंगे?’
बलात्कारी, ‘दैट डज़न्ट मैटर।’
मुखर, ‘आपकी जाति?वर्ण?’
बलात्कारी, ‘बोला न दैट डज़न्ट मैटर।’
मुखर, ‘आप किसके लड़के हैं, किसी नेता, मंत्री, ब्यूरोक्रेट या व्यापारी के?’
बलात्कारी, ‘अरे!हट परे यार,एक बार में समझ नहीं आती क्या तेरे को!’

-बे्रक -


दड़ियल-तिनका, ‘इस बीच महिला संस्थाओं की प्रतिनिधि अभी भी हमारे बीच स्टूडियो में मौजूद हैं। कंचनलता जी, आप क्या कहना चाहेंगी इस पूरे प्रकरण पर!’


कंचनलता, ‘पहले तो जैसा प्रगति जी ने कहा हमें किसी तरह उस युवती को बचाना चाहिए, जैसी भी है हमारे देश की बेटी है। दूसरे, मैं कहूंगी कि दिन-दहाडे़ सड़क पर इस तरह के कपड़े पहन कर घूमना..........

चिकना-चमका, ‘इस बीच मैं अपने दर्शकों को बताना चाहंूगा कि आपके प्रिय चैनल का संवाददाता ही घटना-स्थल पर सबसे पहले पहुंचा............
तभी बिजली गुल हो जाती है.दर्शकों के लिए अब यही एकमात्र राहत है।या कहें कि स्त्रिओं के लिए राहत है और पुरूषों का मज़ा किरकिरा हो चुका है।

-संजय ग्रोवर

(हंस मई 2003 में प्रकाशित)

Friday, February 6, 2009

कौन है सामाजिक और कौन असामाजिक ?

शायद कहीं एक लघुकथा पढ़ी थी। बाद में उसमें मैंने थोड़ा-सा कुछ अपना भी जोड़ दिया। बज़रिए डार्विन हम इंस कहानी में पहुंचते हैं।




पृथ्वी पर तब बंदर ही बंदर थे। आदमी नामक महान जीव का आगमन तब तक नहीं हुआ था। पता नहीं एक बंदर को क्या हुआ कि पट्ठा विद्रोही होना शुरु हो गया। कभी अगले पैर ऊपर उठा लेता और निचले दोनों पैरों पर सारे शरीर का बैलेंस साधते, चलने की कोशिश करता। कभी पेड़ के पत्ते उठाकर शरीर को जगह-जगह ढंकने की कोशिश करता। हांलांकि इन कोशिशों के चलते कभी उसकी कमर में दर्द भी होता तो कभी बंदर समाज में जोरदार खिल्ली भी उड़ती। शुरु में तो बंदर-समाज उसकी हरकतों को ‘‘लाइटली’’ लेता रहा। जब पानी सिर से गुजरने लगा तो बंदरों के सामाजिक आकाओं ने उसे अपने यहाँ तलब किया और पूछा कि भई आखिर तुम्हे हुआ क्या है, ये क्या अजीबो-ग़रीब हरकतें करते रहते हो ! बंदर बोला सर एक ऐक्सपेरिमेंट कर रहा हूँ। क्या पता इंस में कामयाब हो जाऊँ।




‘‘उससे क्या होगा ?’’ बंदराधिपति ने धैर्य बनाए रखते हुए पूछा।




‘‘ तब शायद हम अगले दोनों हाथों से कुछ दूसरे काम कर पाएं जैसे खाना खाना, खाना बनाना, कलम पकड़कर लिखना, कपड़े बनाना-पहनना...वगैरहा.......‘‘




.......‘‘अच्छा तभी पत्ते उठा-उठाकर शरीर पर लपेटते फिरते हो.....’’ बंदराचार्य ने उपहास करते हुए कहा....।‘‘




‘‘सर ठंड के दिनों में शरीर कांपने लगता है ना, शरीर ढंकने से थोड़ी राहत मिलती है.....’’


‘‘चल पाखंडी, शरीर ढंकने के बहाने सैक्स का प्रचार कर रहा है।’’ बंदर-प्रमुख गुस्से में थर-थर कांपने लगे।




‘‘साला, समाज में अराजकता फैला रहा है, निकाल बाहर करो इसे‘‘ एक परंपरावादी बंदर चीखा।




‘‘हमारे धर्म-संस्कृति को भ्रष्ट कर रहा है।’’ एक संस्कृति-पसंद बंदर गुस्से में बाल नोच-नोंचकर कूदने लगा।




‘‘हां-हां, पेड़ से उतरना हमारी सभ्यता के खिलाफ है।’’‘‘सिर्फ दो पैरों पर चलते हुए साले को ज़रा शर्म नहीं आती।’’


‘‘हरामखोर, शरीर के पवित्र अंगों को पत्तों से ढंकता है।’’


‘‘मारो, साले को छोड़ना मत।’’और पत्थरों की बरसात शुरु हो गयी।




मगर वह भी अपनी तरह का एक ही बंदर था। चोट खाता रहा। हंसी उड़वाता रहा। मगर प्रयोग करना नहीं छोड़ा।आखिरकार एक दिन निचले दोनों पैरो पर खड़ा हो गया। हाथों से तरह-तरह के दूसरे काम करने लगा। और आदमी बन गया। देखा-देखी, हंसी उड़ाने वाले, पत्थर मारने वाले, अराजक कहने वालों में से भी कई बंदर उसके रास्ते पर चल पड़े और वे भी आदमी बन गए।




पुराना बंदर समाज अभी भी है और आज भी ‘‘माॅडर्न’’ बंदर-समाज की हंसी उड़ाता है।




बात कपड़े पहनने या उतारने की उतनी नहीं है सिंहल साहेब ! बात यथास्थ्तििवाद से विद्रोह और वक्त और ज़रुरत के हिसाब से खुदको और समाज को बदलने की है। भीड़ के पीछे चलने वाले, रुढ़िवादी और अपनी कोई सोच न रखने वालों ने तो विरोध ही करना होता है, चाहे वह कपड़े उतारना हो या पहनना। अभी सारी दुनिया के लोग कपड़े उतारकर घूमना शुरु कर दे और समाज इसे बहुत प्रतिष्ठा की बात मानने लगे तो यही नग्नता-विरोधी अपने सारे कपड़े फेंककर सबसे आगे खड़े हो जाएंगे और कह&#