बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

असलियत

लघुकथा


मैंने सोचा किसीसे असलियत पता लगाऊं।

मगर चारों तरफ़ सामाजिक, धार्मिक, सफ़ल, महान और प्रतिष्ठित लोग रहते थे।

फिर मुझे ध्यान आया कि असलियत तो मैं कबसे जानता हूं।


-संजय ग्रोवर
05-10-2016




बुधवार, 7 सितंबर 2016

कहीं जाना नहीं था...

ग़ज़ल

य़क़ीं होता नहीं था
कभी सोचा नहीं था
19-08-2016

सफ़र अच्छा ही ग़ुज़रा
कहीं जाना नहीं था
25-08-2016

लगी तन्हाई बेहतर
कोई परदा नहीं था
26-08-2016

बड़ा या छोटा, कुछ भी-
मुझे ‘बनना’ नहीं था
27-08-2016

न अब डर है न चिंता,
क्यूं तब सूझा नहीं था
07-09-2016


-संजय ग्रोवर

रविवार, 17 जुलाई 2016

दोस्त और दुनिया

कविता

मैंने उन्हें दुनिया के बारे में बताया
वे सोचने लगे

दुनिया ने उन्हें मेरे बारे में बताया
वे मान गए


-संजय ग्रोवर

17-07-2016

सोमवार, 28 मार्च 2016

तुम कैसे हो इससे इनको क्या लेना





मुर्दाघर की रौशन दुनिया कर देंगे
तुम जागे तो मुर्दे हत्या कर देंगे

लाशें, मोहरे, कठपुतली या भाषणबाज़
बड़ा बनाकर तुमको क्या-क्या कर देंगे

ठगों के झगड़ों में क्या सच क्या झूठ भला
ये तो बस हर रंग को धुंधला कर देंगे

तुम सोचोगे तुम्हे प्रकाशित कर डाला
चारों जांनिब घुप्प अंधेरा कर देंगे

जिनके लिए अच्छाई है सिर्फ़ अदाकारी
वो हर बढ़िया चीज़ को घटिया कर देंगे

तुम कैसे हो इससे इनको क्या लेना
सोचो तुमको घोषित क्या-क्या कर देंगे

-संजय ग्रोवर
28-03-2016

बुधवार, 9 मार्च 2016

विश्वगुरु बनने के उपाय

व्यंग्य

विश्वगुरु बनने का एक ही तरीक़ा है- दूसरे सभी देशों को अपने देश से भी बुरी स्थिति में ले आओ।

इसके लिए आवश्यक है कि-



दुनिया में ज़्यादातर देश खाने-पीने में मिलावट शुरु कर दें।

किसी भी देश में बिना दहेज के लड़कियों की शादी न हो पाए।

सभी देशों के लोग अच्छे काम करना बंद कर दें, अच्छाई के नाम पर कर्मकांड करें, अभिनय करें।


सभी देशों के साहित्यकार मौलिक कुछ न लिखें, देशी-विदेशी पुराने विद्वानों को कोट करके काम चलाएं।


सभी देशों में कट्टरपंथिओं और प्रगतिशीलों में इमेज और बैनर के अलावा कोई भी फ़र्क़ न हो। पढ़े-लिखे प्रोफ़ेसरों-ऐंकरों और अनपढ़ लोगों के तर्क और विवेक बिलकुल एक जैसे हों। प्रगतिशील लोग अंधविश्वास की बुराई तभी करें जब उन्हें पूरी गारंटी हो जाए कि इससे उनके सुननेवालों और अंधविश्वासियों पर रत्ती-भर भी असर नहीं पड़ेगा।


सभी देशों के नागरिकों को अपने आसपास की ज़मीनें क़ब्ज़ानी चाहिएं, मंज़ूरशुदा नक्शे के अलावा मकान में कमरे, छज्जे, टॉयलेट बाथरुम निकालने चाहिए। पड़ोसी कुछ बोले तो सभी नाजायज़ क़ब्ज़ाधारक मिल-जुलकर उसका सर उदारतापूर्वक फोड़ डालें।


सभी देश आदमियों से ज़्यादा महत्व पशुओं, पेड़-पौधों, पहाड़ों और नदियों को दें। उनके लिए, मारना पड़े तो आदमियों को मार-मार कर ख़त्म कर दें। अपनी नदियों को ख़ुद ही इतना गंदा कर दें कि दूसरे दूर से ही देख-देखकर भाग जाएं।


सभी देशों के वे लोग जो ब्लैकमनी के बिना एक करवट तक न ले सकते हों, ईमानदारी पर डिबेट-आंदोलन आदि चलाएं।


इसके अलावा जो भी उपाय याद आएंगे, समय-समय पर दर्ज़ कर दिए जाएंगे। कई उपाय आप भी जानते होंगे।


वैसे विश्वगुरु बनने से हो क्या जाएगा !?


-संजय ग्रोवर
09-03-2016


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

अब पता चला ग़ुलाम क्यों ग़ुलाम है

मालिक़ के जैसा होने में उसको आराम है 
अब पता चला ग़ुलाम क्यों ग़ुलाम है

मुर्दों के जैसी ज़िंदगी चुनते हैं बार-बार
फिर पूछते हैं क्यों यहां जीना हराम है

ऊंचाईओं की चाह को मरना ही एक राह
अब मर ही गए हो तो देखो कितना नाम है
10-02-2016

जब काम नहीं था तो मैं बारोज़गार था
फिर छोड़ दिया उसको मुझे इतना काम है
11-02-2016

देखा ख़ुली नज़र से तो पाया कि आसमां

अपनी गढ़ी ऊंचाईयों में ख़ुद ग़ुलाम है 
16-02-2016

-संजय ग्रोवर

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

बचके ज़रा, इन दिलों में बड़े ख़तरनाक़ दिमाग़ हैं-

व्यंग्य

कई लोग, बहुत सारे लोग कहते हैं कि हम तो भई दिल से जीते हैं।

मेरा मन होता है कि इन्हें ले जाकर सड़क पर छोड़ दूं कि भैय्या, लेफ़्ट-राइट देखे बिना, दिमाग़ का इस्तेमाल किए बिना, ज़रा दिल से चलकर दिखाओ तो।


क्या ये लोग महीने के आखि़री दिन अपनी तनख़्वाह बिना गिने ही ले आते होंगे !? क्या घर आने के बाद भी नहीं गिनते होंगे !? 


क्या दिल से चलनेवाले फ़िल्मस्टार बिना किसी रेट के साइनिंग अमाउंट ले लेते हैं ? वैसे जहां तक दिल की बात है साइनिंग अमाउंट भी क्यों लेना चाहिए ? कहानी भी क्यों पढ़नी चाहिए ? डायरेक्टर भी क्यों देखना चाहिए ? स्टार-कास्ट भी क्यों पता लगानी चाहिए ? पहले महीने क्या कमाया, उससे भी क्यों मतलब रखना चाहिए ? जितना मिल जाए चुपचाप, आंख मूंद के ले लो; आप लोग तो दिलवाले ठहरे, ये सब तो दिमाग़ के सौदे हैं रे भैय्या।


हां, जब ब्लैकमनी और व्हाइटमनी में फ़र्क़ की बात आती होगी तब ज़रुर कई लोगों के दिल अत्यंत सक्रिय हो जाते होंगे। लगता है, दिल होते ही इसीलिए हैं, बेईमानियों, बदकारियों, लापरवाहियों, बदमाशियों, दोमुंहेपनों पर परदा डालने के लिए....


शादियों जैसे तथाकथित ‘पवित्र’ बंधनों के वक़्त लिफ़ाफ़ों का लेन-देन करनेवालें और बाक़ायदा उनकी लिस्टें बनानेवाले लोग दिल से जीते हैं !?


आप बुरा न मानें तो मैं ज़रा-सा हंस लूं ? मानें तो मानें, हंसने की बात पर क्यों न हंसूं ?


पड़ोसियों को परेशान करके नाजायज़ कमरे बनानेवाले लोग दिल से जीते हैं !?


मैं हंस रहा हूं। आप बुरा मानिए। मुझे मज़ा आएगा।


दफ़्तर से स्टेशनरी चुरानेवाले लोग, टीए-डीए मारनेवाले लोग दिल से जीते हैं !?


मैं फिर हंस रहा हूं। हिम्मत हो तो आप भी साथ में हंस सकते हैं।


दोस्ती, जान-पहचान, जाति, धर्म, पद, प्रतिष्टा, ‘तू मुझे सहला, मैं तुझे सहलाऊं’ के आधार पर कई-कई जगह एक साथ छपने और प्रसरनेवाले लोग दिल से जीते हैं !?


मैं हंस रहा हूं। मुझे गणित के पट्ठे याद आ रहे हैं।


क्या दिमाग़ से जीना वाक़ई इतना बुरा है ?


सवाल नीयत का है, सवाल बचपन से मिली दिशा का है ; दिल और दिमाग़ दोनों उसीसे संचालित होते हैं।  अगर नीयत ठीक है तो दिल भी क़ाबू में रहता है और दिमाग़ भी सही दिशा में काम करता है।


वरना बेईमानों और कमज़ोरों को कोई न कोई बहाना तो चाहिए ही-दिल और दिमाग़ ही सही।


-संजय ग्रोवर

05-01-2016

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ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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