शनिवार, 23 जनवरी 2016

सनातन, हास्यास्पद और दयनीय



‘हम तुम्हे मंदिर में नहीं घुसने देंगे’ 
वे बोले

मैं हंसा

कुछ वक़्त ग़ुज़रा
कई लोग हंसने लगे

वे फ़िर आए और बोले-
‘हम तुम्हे मंदिर पर हंसनेवालों में शामिल नहीं करेंगे’

मैं हंसा

कुछ वक़्त और ग़ुज़रा
और कई लोग हंसे

वे फिर चले आए
अबके बोले 
‘हमसे घृणा मत करो’

मैं हंसा

बोले-
‘घृणा पर हंसते हो’

मैं हंसा

वे हंसने लगे, बोले-
‘हम भी हंस सकते हैं, देखो
ज़्यादा ऊंची आवाज़ में हंस सकते हैं
हम तुम्हे अपने नये लाफ़्टर क्लब में नहीं आने देंगे’

मैं हंसा

‘तुम किसीसे प्रेम नहीं करते’
वे बोले

मैं हंसा

‘वे हमारे दुश्मन हैं’
वे बोले

मैं हंसा

‘हम तुम्हें उनमें शामिल कर देंगे’
वे बोले

मैं हंसा

‘हम सब एक हैं’
वे बोले 

मेरी हंसी छूट गई

‘हम तुमसे घृणा करते हैं’
वे अंततः बोले

मैं हंसा
हंसता रहा
हंस रहा हूं

-संजय ग्रोवर
23-04-2016


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-01-2016) को "कुछ सवाल यूँ ही..." (चर्चा अंक-2231) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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