शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

लाफ्टर चेलेंज

मैं हिंदू के घर गया
कहा दीवाली की बधाई
दोनों ने मुस्कान बिखेरी

मैं मुसलमान के घर गया
कहा नया साल मुबारक़
दोनों हंसे

मैं ईसाई के घर गया
कहा मैरी क्रिसमस
दोनों ने स्माइल दी

मैं इंसान के पास गया
काफ़ी देर ढूंढना पड़ा मुझको

वह बेघर था
त्यौहार तो छोड़िए
तारीख़ तक याद न थी उसे

दोनों काफ़ी देर तक
रोते रहे

-संजय ग्रोवर

रविवार, 5 दिसंबर 2010

एक ही डिब्बी के

‘ओए, जो हमारे दल का नहीं
देशद्रोही है,
पीट-पीटकर मार डालूंगा’
इक्कू ने कहा

‘स्साल्ले ! हमारी हां में हां नहीं मिलाता !
सांप्रदायिक घोषित कर दूंगा
गाली देकर भगा दूंगा
नहीं मानेगा तो गोली भी चलवा दूंगा’
यह आया दुक्कू

तिक्कू की बात और भी मज़ेदार
‘हमारे गुट में नहीं आएगा
तो गुटबाज़ घोषित कर दूंगा’

हंसें तो फ़ंसें आप
ये सब तो हैं बहुत गंभीर

अभी देखना आएंगे कुछ हाथ
कुछ वाद कुछ पंथ कुछ संघ
कुछ खुले कुछ तंग
कुछ ये कुछ वो.. (उफ़ !)

इनसे खेलेंगे
इन्हें फ़ेंटेंगे
इन्हें फ़ेंकेंगे
तुरुप बनाएंगे

खेलते-खेलते
अंततः थक जाएंगे

इन्हें समेटकर
डाल देंगे एक डिब्बी में

और पता है फिर वे क्या करेंगे !
जाकर वे भी किसी डिब्बी में सो जाएंगे

आप हंसें तो फ़ंसें
सोचें तो सिर नोचें

चलिए आप और हम
उस डिब्बी का पता लगाएं

पर उसके लिए
हमें डिब्बी से बाहर निकलना होगा !

-संजय ग्रोवर

शनिवार, 13 नवंबर 2010

वे, मैं और इमेज

लघु-व्यंग्य-कथा



पहले उनकी इमेज आयी।
स्नेहपूर्वक मुझे खींचा, दरवाज़े से बाहर ले गई।
मंच पर खड़ा कर दिया। तत्पश्चात मेरी तारीफ़ों के पुल बंधे। सत्कार में गायन-वादन हुआ। विनम्रता देखते ही बनती थी। भीड़ जमा हुई। भीड़ विदा हुई।
‘बन गयी तुम्हारी भी, बना दी मैंने, अब अंदर चलें।’
अनमना-सा मैं, अंदर लौटते हुए कुछ सोच-समझ नहीं पा रहा था।
इमेज को उन्होंने बाहर ही छोड़ दिया, ख़ुद अंदर आ गए।
‘लाओ, निकालो’, वे बोले।
‘क्या ?’ मैं हैरान।
‘क़ीमत’
‘किस बात की ?’
‘अभी इमेज नहीं बनायी तुम्हारी ! मुफ्त में बनती है क्या ?’
मुझे एकाएक कुछ सूझा नहीं।
‘मैंने कहा था क्या !?’ बमुश्किल मेरे मुंह से बोल फूटे।
मेरा गिरेबान उनके हाथ में, ‘तुमने मना भी तो नहीं किया था।’ गोला मेरे सर पर लगा। कुछ पल को सोच की सांसें फिर रुकीं।

बल्कि यंूही कई साल गुज़र गए।

एकाएक मैंने उनको गले से पकड़ा, भड़ाक से दरवाज़ा खोला और बाहर लोगों की तरफ़ चला, ‘अभी सारा हिसाब बराबर किए देता हूं।’
उन्होंने मेरे हाथ झटके और अपनी इमेज के साथ ‘ये जा और वो जा’।

-संजय ग्रोवर

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

मोहे अगला जनम ना दीजो-3

(पिछला पन्ना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


‘‘ ांडू है।’’ ं
‘‘ ांडू है।’’
कौन हैं ये बच्चे ! क्यों सरल के पीछे लगे हैं !? क्या कह रहे हैं सरल को !?
‘‘ ांडू आ गया।’’
‘‘ओए ! ांडू आ गया।’’
पसीना-पसीना सरल अपने घर में घुसेगा और घर वालों की नज़रों से ख़ुदको बचाता हुआ बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ रहेगा। अपराधबोध का मारा करवटे बदलेगा।
क्या कोई अपराध किया है सरल ने ?
क्या पता ?
क्या सरल दलित है ?
क्या पता ?
क्या सरल स्त्री है ?
क्या पता ?
क्या सरल लैंगिक विकलांग है ?
क्या पता ?

सरल के दोस्त हैं ये सारे बच्चे। पर सरल के पास फ़िलहाल यह जानने का कोई उपाय नहीं कि हर बार ये सब उसीके खि़लाफ़ मिलकर एक क्यों हो जाते हैं ?

‘‘ ांडू है।’’
‘‘ ांडू आ गया।’’

क्या सरल की सारी ज़िन्दगी यूंही बीतने वाली है ! क्या हताशा, झेंप, अवसाद, कुण्ठा, तन्हाई और अपराधबोध ही उसके स्थाई दोस्त होंगे ?

‘‘पिंटू किसीसे नहीं बोलता, किसी के सामने नहीं आता, लड़की है लड़की।’’ ये सरल के मामा हैं। पढ़े लिखे हैं, ख़ुले दिमाग के हैं, प्यार करते हैं सरल को, बचपन में खिलौने लेकर आया करते थे, कहानियां सुनाते थे, मगर......
मेहमानों के सामने ऐसी बातें क्यों करते हैं मामाजी ? सरल का कलेजा चाक-चाक हो जाता है। मामाजी को क्या पता पहले से टूटे-बिखरे सरल की क्या हालत हो जाती है ऐसी बातें सुनकर ! उसे समझ नहीं आता अपना मुंह कहां जाकर छुपाए ? लाख कोशिश करे पर उसकी नज़रें नहीं उठतीं मेहमानों के सामने। सही बात तो यह है कि कोशिश करने से पहले ही हारा हुआ शख़्स है वह। तिसपर किसीने प्लेट से एक बिस्किट उठाने को कह दिया तो ! कैसे वह अपने हाथ को प्लेट तक ले जाएगा और कैसे हाथ की कंपकंपी को छुपाएगा ? उठा लेगा तो एक जन्म लग जाएगा खाने में। सरल की हालत पूछे कोई तो वह यह भी नहीं बता पाएगा कि बिस्किट मीठा था या नमकीन। मेहमानों के सामने एक पूरा बिस्किट खा लिया उसने यही क्या कम बड़ी बात है।
‘‘ ओ पिंटू, तेरी दाढ़ी-मंूछ कब आएगी यार ! इस उम्र में तो.....’’
नाईं के उस्तरे से भी क्रूर लगतीं हैं कई बार मामाजी की बातें। पर सरल कहे तो कहे क्या उनसे !
वह तो अपने ही अपराध-बोध में इस क़दर क़ैद है कि कभी ध्यान ही नहीं दिया कि ख़ुद मामाजी का दाढ़ी-मूंछ के साथ एक भी फ़ोटो नहीं है !
(जारी)

शनिवार, 6 नवंबर 2010

कट्टरपंथी खोपड़ी.....

दोहानुमा




कट्टरपंथी खोपड़ी, प्रगतिशील हैं केश
नीयत छिपती ही नहीं, कितना बदलो वेश




रंगों का आदर करें, रंगों का अपमान
चश्मे वालों को कहाँ दिखते हैं इंसान




भीड़ के ऊपर तू खड़ा, तेरे ऊपर भीड़
चाहे जितना ले सजा, कच्चा तेरा नीड़




नए तुझे और उसे पुराने, जकड़े रहते ग्रंथ
वो भी कट्टरपंथ है, तू भी कट्टरपंथ




नयी हवा ने बीच में, खेला ऐसा खेल
संस्कार की रेल में, मच गई रेलमपेल




उसके पास प्रचार है, तेरे पास विचार
उसके पौबारह हुए, तेरा पड़ा अचार


-संजय ग्रोवर

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

सांप्रदायिक धर्मनिरपेक्षता बनाम भैंसियत

व्यंग्य
(एक पत्रिका के अनुरोध पर आज 02-10-2010 को लिखा गया। ज़िक्र इसलिए किया कि व्यंग्य में इस तरह के संदर्भ आते हैं।)

मान लीजिए एक गांव है। भैंसों का गांव है, गुट है। क्यों नहीं हो सकता ? भैंसे मोटी बुद्धि की नहीं हो सकती क्या ? आदमी ने ही ठेका ले रखा है हर बात का ? व्यंग्य मैं लिख रहा हूं कि आप ? जितनी सत्ता मिली है उतना तानाशाह होने का हक़ है मुझे। कलको कॉलम लिखने को मिल गया तो छोड़ूंगा नहीं आपको। पटाके रखिए मुझसे।
ओके। तो मान लीजिए 80 भैंसे काली हैं 20 भूरी हैं। इससे पहले कि कोई शब्दपकड़ू मुझपर रंगवाद और नस्लवाद का आरोप चेपे, एक पेंच डाल देता हूं। समझ लीजिए कि मैं काली भैंसों को भूरी कह रहा हूं और भूरी को काली। काली भैंसों में एक भैंस ज़्यादा ही बदमाश है। उस पर आदमी सवार है। वह कालियों को भूरियों के खि़लाफ़ भड़काना शुरु कर देती है। हम बहुसंख्यक हैं, यह गांव हमारी दादियो-नानियों ने बसाया था, गुटबाज़ी की परंपरा हमारे चाचा के परनाना ने शुरु की थी, आज भूरियां अपनी आबादी बढ़ा रहीं हैं, हमारी परंपरा पर हक़ जता रहीं हैं, हमारे गांव पर कब्ज़ा करना चाहती हैं वगैरहा। और भी कई हथकंडे हो सकते हैं। आपको ज़्यादा आयडिया होगा। इसमें क्या शक हो सकता है कि यह काली भैंस सांप्रदायिकता पर उतर आयी है। यह सांप्रदायिक भैंस है। कट्टरपंथी है।
अब मान लीजिए कि इस काली भैंस का बाक़ी कालियों से कोई लफ़ड़ा हो जाता है। और यह भूरियों के गुट में चली जाती है। काफ़ी सामाजिक, कर्मठ और कर्त्तव्यपरायण भैंस है, खाली नहीं बैठ सकती। अब यह भूरियों को अपनी सामाजिकता में लपेट लेती है। यही हरकतें भूरियों के साथ शुरु कर देती है। तुम कम हो इस लिए कालियां तुम्हे दबातीं हैं, मैं तो उन्हीं के बीच रहकर आयी हूं असलियत मुझसे पूछो, ख़ुद इबादत करतीं हैं तुम्हे पूजा पर मजबूर कर रखा है, वगैरह। आप कहेंगे कि पूजा और इबादत तो एक ही चीज़ है। मैं कहूंगा कि होंगी मगर ये भैंसों के तर्क हैं। आपमें से कुछ कहेंगे कि नहीं नहीं, हमने कई बार आदमी को भी इस टाइप की बातें करते सुना है। मैं कुछ नहीं कहूंगा।

अब यह भैंस वही है, हर तरह से पहले जैसी। वैसे ही जुगाली करती है, वैसे ही तालाब में नहाती है, वैसे ही तर्क करती है, और यह राज़ की बात नहीं है कि भैंसियत से ज़्यादा रंगनिरपेक्षता पर ज़ोर देती है। भैंसों को आज भी यही समझाती है जहां तुम्हारे भूरे देव का पूजास्थल था वहीं होना चाहिए, पहले कालों को कहती थी कि जहां तुम्हारे कालेदेव का था वहां से भूरियों ने हटा दिया था, तुम्हे वहीं बनाना चाहिए।
मगर अब यह भैंस सांप्रदायिक नहीं धर्मनिरपेक्ष कहाती है। क्योंकि अब यह अल्पसंख्यक भैंसों के पक्ष में खड़ी है। इससे पता चलता है कि धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता, मानसिकता से नहीं संख्याबल से तय होतीं हैं। अगर इसी भैंस को इसी मानसिकता के साथ पड़ोस के किसी गांव भेज दिया जाए जहां भूरी भैंसों की संख्या अस्सी है, तो यह वहां फिर से सांप्रदायिक कहाने लगेगी।

बहरहाल, एक दिन एक पार्टी के कार्यकर्त्ता आये और उन्होंने उस भैंस पर एक बैनर भी टांग दिया: धर्मनिरपेक्ष भैंस।
‘अब इस भैंस पर किसी ने उंगली उठाई तो उसे सांप्रदायिक करार दिया जाएगा।’
‘इस तर्क या फ़लसफ़े को मानें तो फिर गांधी जी की जो कोई आलोचना करे उसे गोडसेवादी ठहरा दिया जाए !?’
कुछ मासूम टाइप भैंसों ने दबी ज़ुबान में पूछा, ‘आपके पास ‘भैंसियत’ से जुड़ा कोई स्लोगन नहीं है?’
कार्यकर्त्ता बोले, ‘हम अपने समुदाय में भी इंसानियत पर धर्मनिरपेक्षता को तरजीह देते हैं।’
एक भैंस का उत्साह बढ़ा, वह बोली, ‘हां एक बार घास के गुच्छे में अखबार आ गया था, उसमें पढ़कर पता चला कि आप भी इंसानियत नहीं हज़ार-हज़ार साल पुरानी इमारतों को गिराने-बनाने में सारा ध्यान लगाए हैं। पता नहीं लोग आपको दूसरों से अलग क्यों मानते हैं !?’
‘भैंस हो, भैंस की तरह रहो’, कार्यकर्त्ता को ग़ुस्सा आ गया। सुबह हाई कमांड बताना भूल गया होगा कि भैंसों पर ग़ुस्सा मत करना।
किसीको उपरवाला देता है, किसीको पार्टी देती है।
एक कहावत बल्कि उलाहना है, ‘उपरवाला जब अक्ल बांट रहा था तुम कहां थे।’
एक कहावत होनी चाहिए, पार्टी जब चिंतन बांट रही थी, तुम कहां थे।’
किसीके लिए उपरवाला पार्टी है, किसीके लिए पार्टी उपरवाला है।
एक और पार्टी के कार्यकर्त्ता आ गए। उन्होंने भैंस को गांवद्रोही ठहरा दिया।
‘गद्दार भैंस’। नारे लगने लगे।

वैसे साफ़ कर दूं कि भैंसों का ऐसा कोई गांव नहीं है, आदमियों के हों तो हों।

आगे के व्यंग्य का भैंसकथा से कोई संबंध नहीं है। आप जोड़ना चाहें तो जोड़ें। तब इसका ज़िम्मेदार संपादक मंडल होगा। पाठक तो वही चुनता है अपनी पत्रिका के लिए।

मैं सोचता था कि साहिर सांप्रदायिक लोगों से डरते होंगे। अब समझ में आया कि वे धर्मनिरपेक्षों से कहीं ज़्यादा डरते थे। इसलिए उन्होंने पहली पंक्ति तो लिखी:
‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा’
मगर स्टैंजा पूरा करते-करते वे घबरा गए। अभी धर्मनिरपेक्ष मित्र आ रहे होंगे। पूछेंगे आगे क्या लिखा !? उन्होंने पसीना पोंछकर आगे लिखा,
‘‘मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया.....’
मगर ‘मालिक’ का ज़िक्र डालने के बावजूद उनका पसीना थमा नहीं। उन्होंने आगे लिखा,
‘कुरान न हो जिसमें वो मंदिर नहीं तेरा
गीता न हो जिसमें वो हरम तेरा नहीं है’
पसीना ठहर गया।
आज साहिर होते बेचारे तो क्या लिखते !? शायद कुछ ऐसा:
‘अल्लाह को न माने वो ईश्वर तेरा नहीं है
ईश्वर के रहते अल्लाह का गुज़ारा नहीं है’
हरिवंश राय जी आदरणीय अमिताभ जी के पिता थे। पर उन्होंने लिखा,
‘धर्मग्रंथ सब जला चुकी है जिसके अंतर की ज्वाला....’
हाय राम ! उन्होंने यह भी लिखा,
‘वैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला’

बच्चनजी ने फ़िल्मों में कोई गीत नहीं लिखा (बाद में एकाध ले लिया गया)। उन्हें ऑफ़र ही नहीं
आया होगा। लगता है बच्चन जी एक तो सांप्रदायिक थे उपर से पॉपुलर कल्चर की रत्ती भर समझ नहीं थी। अमिताभ जी धर्मनिरपेक्ष भी हैं और पॉपूलर कल्चर की उनकी समझ का तो उनका पूरा जीवन ही गवाह है।

काश! मैं भैंस होता ! आज शायद इतना अकेला न होता।

-संजय ग्रोवर

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ईमेल से पोस्ट का प्रचार: सही या ग़लत

महीनों कुछ न पढ़ूं पर शौचालय में कुछ न कुछ चाहिए पढ़ने को। ताज़ा अखबार मिल जाए तो कहना ही क्या ! कभी-कभी अखबार खोलते ही सर्र से कोई पैम्फलेट निकलता है और....। आप जानते ही हैं कि कहीं भी जाकर गिर सकता है। अजीब स्थिति हो जाती है। पर कभी मन में नहीं आया कि पैम्फ़लेट डालने वाले से, विज्ञापन करवाने वाले से या अखबार वाले से इसके लिए जाकर लड़ूं। उन्हें दोषी ठहराऊं। दिन में औसतन पाँच ईमेल तो ऐसे होते ही हैं जिनमें लॉटरी या अन्य किसी ज़रिए से मुफ्त में लाखों डॉलर देने की बात कही गयी होती है यानि निरा मूर्ख समझा गया होता है। आपके पास भी आते होगे। दैनिक कर्म की तरह डिलीट कर देता हूँ। कई ब्लॉगर मित्रों की नयी पोस्टों की सूचनाएं भी आतीं हैं ईमेल से। कर सकता हूँ तो तुरंत टिप्पणी कर देता हूँ, नहीं, तो बाद के लिए छोड़ देता हूँ। भूल जाता हूँ तो शर्मिंदा होता रहता हूँ। पर किसी का कैसा भी ईमेल आए, इतना बुरा कभी नहीं लगा कि उसे फटकार कर कहूँ कि मत भेजा करो। कई बार तो लोगों ने अपने रिज़्यूमे तक भेज दिए हैं नौकरी दिलाने के लिए या अन्य कारणों से। समझा दिया कि भाई आपको ग़लतफ़हमी हुई है, यहाँ प्लेसमेंट एजेंसी जैसा कुछ नहीं है। लापरवाही के चलते भी ढेरों विचित्र प्रकार के ईमेल जमा हो जाते हैं। कई बार पुराने अलबम की तरह देखने में आनंद भी आता है। मैं ख़ुद अपनी हर नयी पोस्ट की सूचना देने के लिए पिछले सात-आठ महीनों से ईमेल भेज रहा हूँ। इतने महीनों में शायद पाँचेक लोगों के मेल आए होंगे कि हमें यह ईमेल मत भेजिए। वजहें अलग-अलग थीं। जायज़ माँग थी, मैंने बंदकर दिया। बुरा मानने जैसी कोई बात मुझे नहीं लगीं।
पर मैंने एक-दो बार कुछ मित्रों को इस बात पर कुछ दूसरे मित्रों को सार्वजनिक रुप से (सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर) फटकारते देखा। जमा नहीं। आपके पास कई तरीकें हैं- ब्लॉक कर दीजिए, स्पैम में डाल दीजिए या कम-अज़-कम एक बार ईमेल से निवेदन तो कर दीजिए। फिर भी कोई न माने तो बात और है।

छात्र-संगठन परचे बाँटते हैं। हमारे कई ब्लॉगर मित्र अपने कई तरह के कार्यक्रमों की सूचना ईमेल के ज़रिए या फ़ेसबुक जैसी साइट्स के ज़रिए भेजते हैं। साहित्यिक, सामाजिक, छात्र आंदोलनों से जुड़े कई मित्र दीवारों पर परचे चेपते आए हैं। किसी न किसी मामले में हर कोई प्रचार पर निर्भर है। सारी मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद, प्रचार ब्लॉगर की मजबूरी है। अपने ब्लॉग के कलेवर को पसंद करने वाले ज़्यादा से ज़्यादा संभावित पाठक ढूंढने के लिए उसे प्रचार करना ही पढ़ेगा। बहुत लोग आपके सब्सक्राइवर बन जाते हैं तो बहुत से ऐसे भी होते हैं जो (कारण कुछ भी हो सकते हैं) ईमेल से नयी पोस्ट की सूचना मिलने पर ख़ुश होते हैं।

आपको क्या लगता है ? ईमेल से पोस्ट का प्रचार सही है या ग़लत ?

सोमवार, 27 सितंबर 2010

क्षमा

रात भर इस कशमकश में रहा कि इस वक्त जैसी मनःस्थिति में हूँ, क्या ठीक से अपनी बात रख पा रहा हूँ !? एक अपराध-बोध ने और घेर लिया कि कहीं ब्लॉगिंग जैसे अत्यंत लोकतांत्रिक और संभावनाओं भरे माध्यम का कोई बेज़ा इस्तेमाल करके किसी तरह की ग़लत नज़ीर तो नहीं पेश कर रहा !?
इस लेख-श्रृंखला को यहीं समाप्त कर रहा हूँ ।


-संजय ग्रोवर

रविवार, 26 सितंबर 2010

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया

आईए.......2
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दलों, वादों, धाराओं आदि द्वारा बड़े किए गए, खड़े किए गए और पाले-पोसे गए बुद्विजीवियों की मजबूरी समझी जा सकती है। हाई कमांड के होते उन्हें ज़िंदगी-भर कार्य-कर्त्ता ही रहना होता है, वे कभी (अगर उनके अपने कुछ विचार हों भी) विचारकर्त्ता नहीं बन सकते। दल, वाद या धारा से कार्यकर्त्ता का रिश्ता कुछ-कुछ ऐसा होता है जैसा एक रुढ़ सोच के तहत चलने वाले परिवार में एक धाकड़-मर्द पति से एक पर्दानशीं पत्नी का होता है। पर्दे के भीतर से ‘हां’ मे सिर हिलाने की आज़ादी भर होती है।
विचित्र विडम्बना है कि दल, मठ, गुट आदि-आदि की सरपरस्ती या छत्रछाया में कोई यह तक मशहूर करने में सफ़ल हो जा सकता है कि तसलीमा नसरीन तो वास्तव में स्त्री-विरोधी हैं। सारा संघर्ष तो दरअसल हमने किया था 2010 में जबकि यह चालाक तसलीमा 2005 में ही क्रेडिट ले उड़ी। अब मौज-मजे की बारी आयी है तो तसलीमा का कहीं पता नहीं चल रहा और मजबूरी में हमें मज़े करने पड़ रहे हैं। इतनी धोखेबाज़ हैं तसलीमा।
कॉलोनी के बेईमान दुकानदार के लिए सुविधा हमेशा इसी में होती है कि उसके प्रतिद्वंदी दुकानदार भी बेईमान हों। ईमानदार प्रतिद्वंदी उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द होता है। उसके लिए रास्ता अकसर यही होता है कि या तो वो ईमानदार दुकानदार भी बेईमान बन जाए या फ़िर ‘सीधी तरह से न माने तो’, उसे किसी भी तरह बेईमान ‘घोषित’ और ‘सिद्व’ कर दिया जाए। फ़िर भी न माने तो और भी रास्ते हैं। (अपने समय की कई प्रखर प्रतिभाओं को ‘पागल’ सिद्ध कर दिए जाने को हमने सिर्फ़ सुना ही नही देखा भी है)
ठीक इसी तरह एक कट्टरपंथ का अस्तित्व भी दूसरे कट्टरपंथ के रहते ही संभव होता है। यह देखना दिलचस्प भी होता है और दुखद भी कि एक सांप्रदायिकता दूसरी सांप्रदायिकता (अगर प्रतिद्वंदी सांप्रदायिकता भी धर्मनिरपेक्षता का पोज़ बनाकर आ जाए तो और भी आसानी से) को तो स्वीकार करने पर तैयार हो जाती है मगर ‘इंसानियत’ शब्द का ज़िक्र भी आने से वह या तो हंसी उड़ाना शुरु कर देती है या इंसानियत की बात करने वाले को सांप्रदायिक सिद्ध करने पर तुल जाती है।
सुबह एफ एम पर मुझे अपना प्रिय गीत सुनने को मिला:

तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा

मगर मैं सोचता रहा कि हिंदी फ़िल्मी गीत जिनमें से हम पता नहीं कैसी-कैसी मिसालें ढूंढने में कामयाब हो रहते हैं, उस खज़ाने में उपरोक्त अर्थ वाले और कितने गीत हैं ?

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया

मुझे नहीं पता कि साहिर नास्तिक थे या आस्तिक और ‘मालिक’ का ‘अस्तित्व’ इस गीत में उन्हांेने अपनी मर्ज़ी से स्वीकार किया है या किसी मजबूरी में यह शब्द इस्तेमाल किया है मगर अपने अनुभव से इतना ज़रुर कह सकता हूं कि नास्तिक तो मुझे आज तक ऐसा कोई नहीं मिला जिसे यह गीत बुरा लगता हो।
मगर क्या आप इससे मिलते-जुलते अर्थ के भी पाँच और हिंदी फ़िल्मी गीत बता सकते हैं !?

इंसानियत जो सारे मसलों का हल बन सकती है उस पर बात करने में इतनी हिचकिचाहट क्यों !?

(जारी)

आईए अफ़वाह फ़ैला दें कि विष्णु नागर सांप्रदायिक हैं

अभी कहीं पढ़ा कि दारुल उलूम देवबंद ने कहा है कि कंडोम का इस्तेमाल ईश्वरीय नियमों के खि़लाफ़ है। मेरा ख़्याल है कि यह बात सही ही होगी, क्योंकि ख़ुदा, ईश्वर या गॉड उसे जो भी कह लो, उस बेचारे को (क्योंकि कहना आपको है, उसने तो अपना नाम किसी को बताया नहीं) क्या पता कि क्या उसके नियमों के खि़लाफ़ है और क्या अनुकूल, क्योंकि ये नियम उसने ख़ुद तो बैठकर बनाए नहीं।
अब जैसे कंडोम की ही बात करें। यह तो इतनी ताज़ा खोज है कि ऐसा कुछ भी बदमाश इंसान कर सकता है, इसकी तो उसे शायद आशंका भी नहीं रही होगी, तो वह इसके खि़लाफ़ नियम क्या ख़ाक बनाता ? और अगर ईश्वर-अल्लाह एक ही नाम है तो ऐसा तो वह कर ही नहीं सकता था कि हिंदुओं-ईसाईयों वगैरह के लिए अलग नियम बनाता और मुसलमानों के लिए अलग। उसने बनाए होते तो सबके लिए एक से ही नियम बनाए होते। उसकी नज़र में भेद नहीं हो सकता है, यह बात तो भेद करने वाले ख़ुद भी मानने को तैयार नहीं होते।

‘ईश्वरीय नियम’ शीर्षक वाला विष्णु नागर का यह व्यंग्य आज (26-09-2010) के जनसत्ता रविवारी में छपा है। यूं तो पूरा व्यंग्य ही दिलचस्प, पठनीय और जैसी कि नागर जी की पुरानी ‘कमी’ है, आसानी से समझ में आ जाने भाषा में है और तार्किकता से भरपूर है। मगर जैसी कि बदनीयती की बदौलत कुपाठ करके किसी को ‘कुछ’ घोषित कर देने की हमारी अमूर्त्त और पुरानी परम्परा है सो हम पूरा व्यंग्य पढ़ें ही क्यों !? जबकि दो ही पैराग्राफ़ों में नागर जी को सांप्रदायिक सिद्ध करने का भरपूर मसाला मौजूद है।

आईए कोशिश करें।

बोल्ड की गई शुरुआती पंक्तियां देखिए। हम कह सकते है कि वे दारुल उलूम देवबंद यानि मुसलमानों के पीछे क्यों पड़े हैं ? क्या उन्हें हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियां नहीं दिखाईं देतीं (यहां भाषा में थोड़ा बनावटी गुस्सा डाला जा सकता है)!? (अब थोड़ा अतिश्योक्ति में चले जाएं तो) नागर जी हर वक्त मुसलमानों के पीछे क्यों पड़े रहते हैं ? हद होती है सांप्रदायिकता की ! नागरजी, आपकी संवेदना के तंतु, जंगली जंतुओं जैसे हो गए हैं। (अब ज़रा धर्मनिरपेक्षता की अपनी महान मोटी समझ का इस्तेमाल करें) नागरजी ने कहा है कि दारुल उलूम देवबंद ने कहा है कि कंडोम का इस्तेमाल ईश्वरीय नियमों के खि़लाफ़ है। नागर जी ! आप दारुल उलूम देवबंद को ईश्वरीय नियमों के अधीन क्यों लाना चाहते हैं !? क्या आप चाहते हैं कि सारे मुसलमान हिंदू बन जाएं !? हद है !? (थोड़ा और बदमाशी पर उतर आएं) नागर जी, क्या आप हिंदू-मुसलमानों को लड़ाना चाहते हैं !? शर्मनाक ! शर्मनाक !
(बात बनी नहीं, थोड़ा और बदमाशी पर उतरें, बेशर्मी दिखाएं) नागर जी! अगली पंक्तियों में तो हद ही कर दी है आपने ! देखिए तो : हिंदुओं-ईसाईयों वगैरह के लिए अलग नियम बनाता और मुसलमानों के लिए अलग। क्या आप हिंदुओं-ईसाईयों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ एकजुट नहीं कर रहे! बाज आ जाईए।
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ऐसा नहीं है कि बाक़ी के व्यंग्य में ऐसी ‘संभावनाएं’ नहीं हैं। बल्कि इतनी हैं कि ‘संभावनाओं’ की तलाश में जुटी दुर्भावनाएं चाहें तो पूरा व्यंग्य ही ले उड़ सकती हैं। बहरहाल, मेरे लिए संभावना यह निकली कि कई दिन से इसपर लिखना चाह रहा था, नागर जी के लेख ने उकसा दिया। आप इसे ‘प्रेरित कर दिया’ भी पढ़ सकते हैं। यूं तो, जितना नागर जी को पढ़ा है, उनकी समझ के बारे में यही समझ बनी है कि यह लेख उनके हत्थे चढ़ भी गया तो पढ़ कर वास्तविक मंतव्य को तुरंत समझ जाएंगे और धीरे से मुस्करा भर देंगे। फ़िर भी संभावनाओं का क्या भरोसा, कब किसके सर चढ़कर बोलने लगें। कलको मुझपर कुछ लिख दिया तो !? ‘बड़े’ लेखक हैं, मेरी कौन सुनेगा ? मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि ’वही होगा जो ईश्वर को मंजूर होगा।’
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बहरहाल, मेरे लिए सवाल यह है कि मार नकली धर्मनिरपेक्षता जमाकर लेने के बावजूद कुछ लोगों का पेट और मन इतना क्यों नहीं भरता कि सामने वाले को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करना ज़रुरी हो जाता है !? मामला क्या है ? क्या इसके पीछे सिर्फ़ धर्मनिरपेक्षता की मोटी समझ ही कार्य करती है या चालाकी और अवसरवादिता की भी बड़ी भूमिका होती है ? जो जावेद अख़्तर और साजिद रशीद, हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथिओं की छातियों को एक ही ऊंगली से ठोंकते हैं वे हमारे तथाकथित धर्मनिरपेक्षों की समझ में कम क्यों आते हैं !?
अगले दो-चार दिन मैं आपसे इसी पर बतियाना चाहता हूँ, मगर छोटे-छोटे पैराग्राफ़ में। खुलकर अपनी बात कहें। न मुझे बख़्शें न किसी और को। और पिछले अनुभवों को देखते हुए मुझे आपसे यह निवेदन करने की ज़रुरत नहीं लगती कि भाषा अशालीन और भड़काऊ न हो। आप सभी समझदार लोग हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर

रविवार, 19 सितंबर 2010

अफ़वाहें अमर हैं~~~( पूरी कविता )

‘जो यथार्थ को व्यक्त करता है
वह अफ़वाहों में मार दिया जाता है !’
(उदय प्रकाश)



अफ़वाहें अमर हैं (पूरी कविता)

(08-09-2010)


गुट-विरोधी गुंडों का गुट
उनकी लटें सुलझाकर
चोटी गूंथ रहा है

साहित्यिक सरगनाओं की
गणित-निपुण आवारगी
उनकी रक्षा में तैनात है

उन्हें किसका डर है

वे कलात्मक हैं, अमूर्त्त हैं,
हुनर हैं

अफवाहें अमर हैं

धक्के खाती
घर को लुटाती
सच्चाई तस्लीम न होने पाई
अफ़वाहों के भारी विरोध के चलते

अब
मौज-मजे की बारी है
अफ़वाहों का पहला नंबर है

अफवाहें अमर हैं

.........................


आएंगे बुद्ध, कबीर, जीसस
कभी-कभी बरसेंगे बादल की मानिंद
कोई ओशो कोई तसलीमा
दस-पाँच को जगाएंगे
बीस-तीस को हर्षाएंगे

क्या कर पाएंगे

अहा इस आसमान की पसराहट तो देखो
सोया है चिंतनरत
सालों से शाश्वत

पता नहीं क्या करता है क्या नहीं करता
कुछ करता भी है कि नहीं करता
मगर इस शून्य की चौधराहट तो देखो

अफ़वाहें भी ऐसे ही पुरअसर हैं
नहीं हैं फिर भी हर जगह हैं

ससुरी चौबीस घण्टे की ख़बर हैं

भाई मेरे, मान भी लो

अफ़वाहे अमर हैं


बाबूजी, ज़रा इस प्रांगण में आओ
कुर्सी-मेज़ों-काउंटरों से सजे
रणस्थल में पधारो

कुछ भी नहीं हो रहा
पर सब कुछ युद्ध-स्तर पर हो रहा है
होगें तुम्हारे पास आर.टी.आई. के झुनझुने
पर यहां
‘अभी आएगी’, ‘आने ही वाली है’
जैसे
रेल की सीटी के स्वर हैं

अफ़वाहे अमर हैं

अफ़वाहें कभी मरतीं नहीं
हां मर चुका होता है
उन्हें फैलाने वाला
फैलाने से पहले ही

अपनी-अपनी नियति है
अपना-अपना असर है

अफवाहें अमर हैं
08-09-2010


-संजय ग्रोवर


अधूरी कविता का लिंक

( यूं तो कविता पूरी हुई पर नहीं कहता कि इसमें सुधार और विस्तार की गुंजाइश नहीं है। )

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

लेखन में रामराज्य

‘रामराज्य‘ रोके से न रूकता था। आए ही जा रहा था। एक विशेष राजनीतिक दल को इसे लाने का ठेका दिया गया था। व्यंग्यकार चिंतित थे कि राम राज्य आ गया तो लिखने को क्या रह जाएगा। और इसी चिंता में लिखे जा रहे थे। ऐसी ही किसी ‘सिचुएशन‘ में एक महिला ने अपनी सहेली से पूछा कि वह स्वेटर इतनी तेज़ रफ्तार से क्यों बुन रही है। महिला ने जवाब दिया कि ऊन बहुत थोड़ी बची है। और इसके खत्म हो जाने के पहले ही वह स्वेटर पूरा कर लेना चाहती है। इसके अलावा भी व्यंग्यकारों ने देख लिया था कि महाकवि ने भी ग्रंथ रचते समय गर्भवती पत्नियों को फिंकवा देने या छल से राजाओं को मार गिराने जैसे ‘निगेटिव प्वांइट्स‘ को ज़्यादा तूल नहीं दिया था। जरूर ग्रंथ लिखते समय महाकवि की मानसिकता ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा‘ और ‘आप भला तो जग भला‘ वाली रही होगी। व्यंग्यकारों ने निर्णय लिया कि एक पहुंचे हुए व सफल लेखक की यही पहचान है।
ऊपर से एक बार एक बड़ी और पुरानी इमारत को गिराए जाने के पश्चात् एक बड़े संपादक के गांव में भैंसें पूर्ववत् पगुरा रही थीं। ऐसे में व्यंग्यकार धोबी बनकर भी अपनी धुलाई करवाने का झंझट क्यों पालते? उनमें लगभग सभी गणितवीर थे। राजा, उसके दरबारी विद्वानों और कागज़ी व्यवस्था पर उंगली उठाने से ज्यादा आसान उन्हें अकेले धोबी की गरदन पकड़ना लगा। अतः उन्होंने सारी दुनिया छोड़कर एक धोबी के पीछे पड़ जाने का साहसिक निर्णय लिया। साथ ही वे नवोत्सुकों को व्यंग्य की परिभाषा समझाने लग पड़े। इनके जीते जी नवोत्सुकों को सदा नवोत्सुक ही रहना पड़ता था बशर्ते कि वे (नवोत्सुक) जीते जी न मर जाएं।

इधर अखबारों की चोटियां और दाढ़ियां निकल आईं और मुखपृष्ठों के माथों पर अपनी-अपनी परंपराओं के प्रतीक-चिन्ह पोते जाने लगे। देश में राजनेता इतने हो गए थे कि व्यंग्यकारों को रोज़ एक नया राक्षस मार गिराने का आनंद आ रहा था। इसलिए उन्होंने बाकी सभी विषयों से ध्यान हटाकर सारा यहीं केंद्रित कर दिया था। राक्षस चींटियों की तरह मर रहे थे। कलम के ब्रह्मास्त्रों के आगे उनकी एक न चलती थी। फिर मरे हुए राक्षसों को बटोरकर उनके पुतले बनाए जाते और उनकी छाती पर पैर रखकर हंसते हुए खिंचाई गई शब्दों की फोटुएं अपने-अपने कालमों में चेप दी जातीं।

इधर किसी सिरफिरे ने बताया कि जिन चींटों से आप पुरस्कार, पैसा व प्रतिष्ठा खींच रहे हैं वे उन्हीं चींटियों के धुले व फूले हुए संस्करण हैं जिन्हें आपने मरा समझ लिया है। मगर फालतू वक्त किसके पास था जो ऐसी गैर-पारंपरिक बातों पर ध्यान देता। फिर भी उनमें से कुछेक जागरूक थे। उन सबने एक-एक व्यंग्य उस सिरफिरे पर लिखा और फिर से रामराज्य की कल्पनाओं में खो गए।

और इतना खोए कि सो गए।


-संजय ग्रोवर


(हंस जनवरी, 1996 में प्रकाशित एवं व्यंग्य-संकलन ‘बीसवीं सदी की चर्चित व्यंग्य-रचनाएं‘ में संकलित)

सोमवार, 13 सितंबर 2010

वर्चुअल चोरी: गज़ल एक, शायर पाँच !

मित्रों, एक पहेली ने परेशान कर डाला है। एक ग़ज़ल पाँच जगह पाँच शायरों के साथ पायी गई है। क्या आप बता सकते हैं असली शायर कौन है ?

1.



2-



3-




4-




5-







मित्रों, मुझे ज़रुर बताईएगा। क्या है कि मेरी और 20-25 ग़ज़लें भी अपने ‘असली’
शायरों को ढूंढ रहीं हैं।

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

तुम्हारे हंसने पे आता है हंसना

ग़ज़ल


ज़ुबां तक बात गर आई नहीं है
कहूं क्या ! उसमें सच्चाई नहीं है


तुम्हारे हंसने पे आता है हंसना
ज़रा भी इसमें गहराई नहीं है


अदाकारी करे जो प्यार में भी
वो चालाकी है अंगड़ाई नहीं है


जो मेरी अक्ल को पत्थर बना दे
कि तुमने वो अदा पाई नहीं है


हैं मेरे पास सब नक्शों के नक्शे
तुम्हे आवाज़ तक आई नहीं है
तेरी आवारगी में भी गणित है
अक़ल ये हमको आज आई नहीं है


तू हिंदू हो या मुस्लिम, मैं ये जानूं
तुझे इंसानियत आई नहीं है


शुकर है कुछ तजुरबे काम आए
वगरना कौन हरजाई नहीं है


-संजय ग्रोवर

बुधवार, 8 सितंबर 2010

अफ़वाहें अमर हैं

स्थान: फ़ेसबुक


समय: कुछ घण्टे पहले

स्टेटस:
Uday Prakash :

'जो यथार्थ को व्यक्त करता है,
वह मार दिया जाता है अफ़वाहों से !'

Sanjay Grover :


अफ़वाहें अमर हैं


गुट-विरोधी गुंडों का गुट
उनकी लटें सुलझाकर
चोटी गूंथ रहा है


साहित्यिक सरगनाओं की
गणित-निपुण आवारगी
उनकी रक्षा में तैनात है

उन्हें किसका डर है

वे कलात्मक हैं,अमूर्त्त हैं,
हुनर हैं

अफवाहें अमर हैं

धक्के खाती
घर को लुटाती
सच्चाई तस्लीम न होने दी गई
अफ़वाहों के भारी विरोध के चलते

अब
मौज-मजे की बारी आयी है
अफ़वाहों का पहला नंबर है

अफवाहें अमर हैं

(अभी-अभी लिखा गया....बाक़ी पूरा होने पर....)


-संजय ग्रोवर

शनिवार, 4 सितंबर 2010

साहित्य-थिएटर

गिद्ध ने गुहार लगाई, ‘वे मुझे नोंच-नोंचकर खा रहे हैं’
बंदर ने बताया, ‘नकल करना बहुत बुरी बात है’
साँप ने सरगोशी की, ‘लगता है मेरी आस्तीन में कोई छुपा है’
शेर ने शिकायत की, ‘आखि़र कब तक मेरा हक़ मुझे नहीं मिलेगा’
गीदड़ ने ‘गायडेंस’ दी, ‘जो डर गया समझो मर गया’
लोमड़ी लाल-पीली होने लगी, ‘हद दर्जे के लालची हो’
कछुआ कुनमुनाया, ‘अब और आलस्य ठीक नहीं’
खरगोश खाट के नीचे से बोला, ‘हिम्मत है तो आजा सामने’
घुसपैठिया घुन्नाया, ‘मैं अपने घर पर किसी को ग़ैर-क़ानूनी कब्ज़ा हरग़िज़ नहीं करने दूंगा’

 साहित्य ने सबको सुना, समोया, देखा, झेला, कहा यहाँ तक कि बका
और हंसते-हंसते उसकी आँख से आंसू निकल पड़े

अपने-अपने सुरक्षित स्वर्गों में बैठे साहित्य के देवताओं ने घोषणा की, ‘ये तो ख़ुशी के आंसू हैं’

 -संजय ग्रोवर

रचना तिथि: 30-07-1994


(तकरीबन सोलह साल पहले लिखी इस कविता को बचकाना मानकर एक तरफ़ फ़ेंक रखा था। आज सोचा दोस्तों के सामने रखने में हर्ज़ भी क्या है !)

सोमवार, 30 अगस्त 2010

झूठ पहनकर...

ग़ज़लें


1.

झूठ पहनकर कितने अच्छे लगते हो
कपड़ों के अंदर से नंगे दिखते हो

गलियाना बाज़ार को भी अब पेशा है
बाद में गलियाते हो, पहले बिकते हो

झूठ, ढिठाई, तानाशाही, गाली, गुंडे-
इतनी बैसाखीं, पर बहस से डरते हो !

लगता है फिर आज किसी ने धोया है
टंगे-टंगे से, निचुड़े-निचुड़े लगते हो

अपने-आप से हार चुके हो, इसी लिए
बेध्यानी में ध्यान की बातें करते हो

झूठी जीत से झूठी ख़ुशियां पाते हो
औरों को कम, ख़ुदको ज़्यादा ठगते हो

अभी तुम्हारा कर्ज़ लदा है  सीने पर
अदा करुंगा, बचकर कहाँ निकलते हो

2.

तलघर में आयोजित सूरज
फिर निकला प्रायोजित सूरज

किरनें-विरनें गयी कहाँ पर !
हुआ कहाँ विनियोजित सूरज ?

ख़ुदकी गर्मी से जलता है
कैसे हो अनुशासित सूरज

चाँद-वाँद सब जल जाएंगे
हुआ अगर अनियंत्रित सूरज

आसमान के पाँव पकड़ कर
हो जाता अनुमोदित सूरज

पीछे साजिश का अंधियारा
आगे पूर्व-नियोजित सूरज


-संजय ग्रोवर

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

जो गहरे में उतरे गुनहगार निकले..

मोहतरिम शरद जोशी जी, मुआफ करना, जब आप नहीं रहे तभी पता चला कि आप थे। गलती आप ही की रही कि इतनी देर लगा दी जाने में। आपके अनेक समकालीन आपसे पहले चले गए और अब अपने-अपने शरीरों, खबरों और पुरस्कारों में खूब ज़ोर-शोर से जिन्दा हैं। और तो और जो लोग आपके बाद आए वे भी आपसे पहले चले गए और अब पुरस्कार और प्रतिष्ठा बटोर रहे हैं शरीर के लिए शरीर के जरिए। इससे भी ऊपर जो लोग साहित्य में ठीक से पैदा भी नहीं हुए थे वे भी जहां-तहां बढ़िया मौका देख कर फटाफट मर गए और अधजन्मे ही अमर हो गए। फिर क्षमा करना जोशी जी, शरीर छोड़ने की क्या जरूरत थी, आत्मा को ही अलगनी पर टांग देते। फिर देखते हिन्दुस्तान में कैसा हल्ला होता आपका। आपने हवा में तलवार भांजने से उपजे व्यंग्य को कलमबंद तो किया मगर खुद कभी हवा में कलम नहीं हिला सके। और शायद इसीलिए हिन्दी साहित्य के ‘डीसेंट डैडी‘ आपके लिए ‘वैलडन माई ब्वाॅय‘ से आगे कुछ नहीं कर सके।

जोशी जी निज भाषा, अपनी अस्मिता, विद्वता, वैचारिकता और हृदय की विशालता आज कठपुतली बनकर टीवी के स्टूडियों के कोने में बैठी है। चार्ली चैप्लिन ने जिस ड्राईंग रूप में व्यंग्य ढूंढा था उसी में वे अब कैसेट बन कर सजे हैं। उन्हें और कुछ व किसी तरह हम भले ही न समझें, स्टेटस सिम्बल तो समझ ही रहे हैं। जोशी जी, शायद जल्दी ही साहित्यकार और सटोरिया पर्यायवाची शब्द होंगे। मध्यमार्ग और अवसरवादिता तो तकरीबन समानार्थी हो ही चुके हैं। मंच कवियों के हास्य का स्वरूप तेजी से बदलने के कारण सरकस में जोकरों का अकाल पड़ गया है। ढिठाई ने आत्मविश्वास की जगह ले ली है।

ऐसे में मंच पर आपका गद्यवाचन छोटी-बड़ी कब्रों से भरे कब्रिस्तान की काली रात में अकेले घूमते बहादुर आदमी की बेफिक्री जैसा लगता था। इस अर्थ में आप कबीर तो हुए पर कमलेश्वर नहीं हो सके जिन्होंने राजीव जी की मृत्यु के कुल ढाई दिन बाद ही लंगोटियों की पतलूनें बनाने का करतब कर दिखलाया था, यह कह कर कि उनके शासन काल में कभी क्यू ही नहीं लगी। यह अलग बात है कि अपने संस्मरणों में कमलेश्वर ने एक जगह यह भी कह दिया है कि ‘मैं साहित्य में पायजामे सिलने नहीं लौटा हूं‘।

यही कारण है शरदजी कि आप साहित्यकारों के पूरे साल में शरद ऋतु के उन तीन महीनों जैसे लगते थे जिनमें आम पाठक और समाज बाकी नौ महीनों के लिए स्वास्थ्य इकट्ठा करता है। आपने यह भी समझा और समझाया कि साहित्य में कभी शतरंज भी खेलनी पड़ जाए तो आम आदमी के प्यादों से ही राजनीतिबाज बादशाहों को मात देने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए। यही आपका गुनाह था कि आपने वादों, धाराओं या पंथों के पिंजरों को नकारते हुए खुले आसमान में आज़ाद उड़ान भरने की जुर्रत की और आम आदमी के फक्कड़पन और अलमस्ती में अभी भी जिन्दा प्रेम, इंसानियत व भाईचारे की गहराई से आती ताक़त की सुगंध को समझने की कोशिश की। इसीलिए हमें यह जान लेना चाहिए कि आपको खास परवाह नहीं होगी जो हम कहेंः


सतह के समर्थक समझदार निकले,
जो गहरे में उतरे गुनहगार निकले।


-संजय ग्रोवर,

(शरद जोशी के निधन के बाद जनसत्ता ‘चैपाल‘ में बतौर पत्र 12 अक्तूबर 1991 को प्रकाशित)

उक्त/प्रयुक्त शेर जनाब शेरजंग गर्ग साहब का है।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

बीच में नहीं हैं अखबार

अखबार में छपने के लिए चाहिए


सम्पर्क

जो नहीं हैं मेरे पास

खाली-सा बैठा हूँ मैं
आते हैं मेरे दोस्त तो
सुनाता हूँ कविता
सुनाते-सुनाते कहने लगता हूँ
और कहते-कहते बतियाने

दोस्त सुनते हैं अनमने से
कभी नाराज़ होते हैं तो
एकाध दफ़ा ख़ुश भी होते है
अब तो एकाध बार
यह भी कहते हैं
यार कविता न होती तो क्या होता

मेरे दोस्तों को बदल रही है कविता
मेरे दोस्त भी बदल रहे हैं कविता को
मेरे भीतर का कवि पिघल कर
रोज़ नया जन्म ले रहा है

हमने अखबार हटा दिए हैं
बीच में से

-संजय ग्रोवर

रचना तिथि: 29-07-1994

रविवार, 25 जुलाई 2010

भीड़ और फ़ितरत


लघुकथा



मैं तैरने से डरता था, डूबने से डरता था, पानी से डरता था, भीड़ से डरता था।
जाने किस झोंक में उस दिन दरिया किनारे जा पहुंचा।
‘बचाओ-बचाओ’ की उस मंद पड़ती जा रही आवाज़ के मालिक पर किनारे खड़े लोग या तो हंस रहे थे या मुंह फेर रहे थे। और मुंह फेर कर जा भी रहे थे।
मैं बहुत बहादुर न था, परोपकारी न था।
पर मुझे देखकर उन डूबती निगाहों में उम्मीद और विश्वास की जो चमक कौंधी, उसने मुझे बदल डाला।
मैं कूद पड़ा दरिया में। भंवर मुझे तैरना सिखाने लगा। लहरें बोलीं मामूली काम है, डरते क्या हो ! तूफ़ान ने पैग़ाम भेजा कि तुम अपना काम कर लोगे तभी मैं उस तरफ़ आऊंगा।
मैंने उसे बचा लिया। होश में भी ले आया। उसने आंखें भी खोली। ख़ुश था। नज़रें घुमाकर देखने लगा दुनिया को दोबारा।
क्या कहीं कुछ बदल गया था !? उसने देखा कि पहले जो लोग उसपर हंस रहे थे, अब मुझ पर भी हंस रहे थे।
वह सोचने लगा। 
एकाएक उसने मुझे दरिया में धक्का दिया और भीड़ के साथ खड़ा होकर हंसने लगा।
डूबते वक़्त मैं सोच रहा था कि दरिया से बच भी गया तो भीड़ से कौन बचाएगा !


-संजय ग्रोवर

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

नास्तिकता सहज है

II नास्ति दतम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् II 




यह पंक्ति मैं पहली बार पढ़ रहा हूं।

जब मैं नास्तिक हुआ तो मैंने चार्वाक या मार्क्स का नाम तक नहीं सुना था। ऐसी कोई भारतीय या अन्य परंपरा है, इसकी मुझे हवा तक नहीं थी। कोई वामपंथी पार्टी भी है, यह भी मुझे बहुत बाद में जाकर पता चला। हां, बाद में सरिता-मुक्ता फ़िर हंस जैसी कुछ पत्रिकाओं से इस विचार को बल ज़रुर मिला। मेरा मानना है कि नास्तिकता सहज स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

दूसरे, क्या नास्तिकता को किसी परंपरा की ज़रुरत है ? मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो। नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है। यह तो प्रगतिशीलता, तर्कशीलता वैज्ञानिकता और मानवता का मिश्रण है। परंपरा के नष्ट होने से नास्तिकता नष्ट हो जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हो सकता है कि परंपरा के रहते नास्तिकों की संख्या कुछ ज़्यादा होती। पर ऐसे नास्तिक परंपरा से आए आस्तिकों की तरह ही रुढ़ और हठधर्मी होते। जिस तरह हम देखते हैं कि कई बार राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में आने से नास्तिक हो गए लोग घटना-विशेष की प्रतिक्रिया में ठीक कट्टरपंथिओं जैसा ही आचरण करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि हम यह आचरण घोषित कट्टरपंथियों के विरोध में कर रहे हैं इसलिए यह कट्टरपंथ नहीं, हमारी ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ है।

दोस्त लोग मानते हैं कि नास्तिकता किसी तरह घिसट-घिसट कर जीवित है। ऐसा शायद वे संख्या और सांसरिक/भौतिक सफ़लताओं के आधार पर तय कर लेते है। यही लोग ख़ुदको अघ्यात्मवादी भी मानते हैं। संख्या बल और भौतिक सफलता को मानक बनाएं तो इंसानियत भी एक अप्रासंगिक शय हो चुकी है और इसे भी दफ़ना देना चाहिए। और अगर आप सफ़लताओं की वजह से आस्तिकता के साथ हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप उस विचार और सही-ग़लत की वजह से कम और अपने फ़ायदे की वजह से उसके साथ ज़्यादा हैं। कलको आपको नास्तिकता में सांसरिक फ़ायदे दिखेंगे तो आप उसके गले में हाथ डाल देंगे। अगर नास्तिकता घिसटकर चल रही है और इस वजह से अप्रासंगिक है तो भैया सारी क्रांतियां और स्वतंत्रता आंदोलन भी कभी न कभी घिसटते ही हैं। घिसटने से इतना डरना या उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना !? दलितों, अश्वेतों और महिलाओं के आंदोलन भी तो सैकड़ों सालों से घिसट ही रहे थे। आज किसी अंजाम पर पहुंचते भी तो दिख रहे हैं।

--संजय ग्रोवर
 
सहयोगी ब्लॉग नास्तिकों का ब्लॉग पर पू्र्व प्रकाशित

इस विषय पर पर्याप्त चर्चा ’नास्तिकों का ब्लॉग पर हो चुकी है, दोहराव से कोई फ़ायदा नहीं। आपकी सुविधा के लिए वहां के सारे कमेंटस् यहां लगाए दे रहा हूं:-

67 comments:

anjule shyam said...
हाँ सर वास्तविक वजह यही होती है..नास्तिकता आदमीं को जिम्मेदार बनती है अपने और समाज दोने के लिए...
जब की लोग जिम्मेदारी से भागते हैं क्यों की इसमें उनका फायदा है..कुछ गलत हुवा तो कह सकें खुदा की यही मर्जी थी...और अपना पल्ला आसानी से झड सकें
April 24, 2010 8:00 AM
anjule shyam said...
नास्तिकों के ब्लॉग की शुरुकत आपके पोस्ट से हुई .....मुबारक कदम हो ये सर ....हम सबके लिए.पहला कदम सच में उठाना बहुत मुश्किल का है सभी एक दुसरे को देख रहे थे देखें कोंन पहले लिखता है....
April 24, 2010 8:00 AM
zeashan zaidi said...
मैं नहीं मानता की नास्तिकता स्वाभाविक है. बल्कि आस्तिकता स्वाभाविक है, जब हम कोई मशीन चलती हुई देखते हैं तो फ़ौरन दिमाग में विचार आता है की इसे किसी ने बनाया है. इसी तरह जब हम पूरे विश्व को चलता हुआ देखते हैं तो क्या यह विचार नहीं आना चाहिए की इसे किसी ने बनाया है?
April 24, 2010 9:04 AM
Rakesh said...
ओह जीशान जैदी जी, आप विश्व को किसने बनाया का प्रश्न करते हैं तो क्या आपके दिमाग में ईश्वर को किसने बनाया का प्रश्न नहीं आता?
ईश्वर की उत्पत्ति हमने स्वयं अपने भय और कमजोरी से की है.
April 24, 2010 9:28 AM
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
समझ के साथ नास्तिक होना ही नास्तिक होना है। वरना श्रद्धावत नास्तिक होना तो आस्तिक होना ही है।
आखिर ब्लाग का शुभारंभ हुआ। हम भी इस की प्रतीक्षा में ही थे।
April 24, 2010 9:50 AM
mukti said...
संजय जी, ये बात जो आज आप कह रहे हैं कि आप जब नास्तिक हुये तो किसी वाद से प्रभावित होकर नहीं हुये, ये तर्कशील बुद्धि से उपजा आपका स्वयं का विश्वास था, यही बात मेरे पिताजी के साथ भी थी. उन्होंने जिस माहौल में जन्म लिया था, उसमें भक्ति, अन्धविश्वास और कुरीतियों का बोलबाला था, पर उन्होंने हर बात को तर्क की कसौटी पर कसकर देखा और एक-एक करके उन्हें खारिज करते गये...
मैंने उनकी बेटी होते हुये भी अपना खुद का रास्ता चुना, मैं ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करती थी...पर धीरे-धीरे मुझे लगा कि ये मेरे तर्क में कहीं भी खरा नहीं उतरता है...आज मैं कह सकती हूँ कि मैं गैरधार्मिक हूँ क्योंकि मेरी किसी भी धर्म में कोई आस्था नहीं है.
धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा और नफ़रत ने धर्म से मोहभंग तो बहुत पहले कर दिया था...पर किसी भावना में बहकर कोई विश्वास अपनाना ठीक नहीं होता...इसलिये सोच समझकर लिया हुआ निर्णय है ये.
April 24, 2010 10:42 AM
Arvind Mishra said...
नास्तकिता और आस्तिकता दोनों ही असहज हैं -बस केवल सहजता ही सहज है .नास्तिकता की सीधी चढ़ कर ही आस्तिकता की ऊंचाईयों तक पहुंचा जा सकता है -आस्तिकता अनिवार्यतः पोंगा पंथी होना नहीं है !मैं इश्वर को नहीं मानता मगर मंदिर जाना चाहता हूँ क्योकि वह मेरी संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा है!
April 24, 2010 10:58 AM
प्रवीण शाह said...
मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो।
सत्य वचन देव, वाकई प्रत्येक स्थिति में तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता को सर्वोपरि मानने व आस्था-विश्वास आदि पूर्वागृहों से मुक्त हो अपनी अकल लगाने पर जो निष्कर्ष निकलेंगे उन्हें 'नास्तिकता' कहती है दुनिया ।
पर 'नास्तिक' शब्द का कोई बेहतर विकल्प होना चाहिये क्योंकि यह शब्द 'जिस' के नकार को प्रतिध्वनित करता है 'वह' है ही नहीं, यही 'नास्तिक' कहते हैं... जैसे 'एलोपैथी' जो 'होमियोपैथी' का विलोम है की जगह आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को आज Modern Evidence Based Medicine कहते हैं इसी तरह Modern evidence & logic based beliefs के लिये एक बेहतर शब्द की दरकार है।
April 24, 2010 11:27 AM
सतीश सक्सेना said...
हार्दिक शुभकामनायें !
April 24, 2010 12:17 PM
Sudha & Mrigank said...
ज़ीशान जी, अगर यह बात भी दिमाग में याये भी तो इसका उत्तर ईश्वर कैसे होगा? बहूत पहले भारत में परम्परा में कुछ प्रश्न पूछे गये- यदि मान भी ले कि इश्वर कि उत्पत्ति नही जन सकते तो भी उसने यह तथाकथित रचना कैसे की, क्या ’कच्चा माल’ था? यदि कुछ था तो उसे किसने बनाया? फ़िर तो वह अधिक शक्तिशाली हुआ and so on...
April 24, 2010 7:22 PM
zeashan zaidi said...
@Rakesh Ji & sudha Ji
ईश्वर अर्थात absolute creator अर्थात वह जिसने सभी की रचना की. इसलिए उसने अगर सृष्टि की रचना की तो उसके कच्चे माल की भी रचना की. अब सवाल उठता है की उसकी रचना किसने की तो जवाब यह है की अगर कोई absolute creator है तो वह स्वेयें का भी creator होगा. वरना फिर वह absolute creator नहीं रह जाएगा.
April 24, 2010 9:19 PM
प्रवीण शाह said...
@ zeashan zaidi,
Hmmmmm...
Absolute Creator अर्थात ईश्वर,
अब जब इनके होने के बारे में आपके इस Absolute Confidence पर पूछा जायेगा तो आप किसी 'धर्मग्रंथ' का हवाला दे दोगे... तर्क व तथ्य के आधार पर बात करिये श्रीमान...कृपया...
आइये जानते हैं कि यह Absolute Creator है कौन, है भी या नहीं ???
आभार!
April 24, 2010 9:58 PM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
@ zeashan zaidi,
मेरे लिए यह अत्यंत दुर्लभ जानकारी है कि एबसोल्यूट क्रिएटर स्वयं को भी क्रिएट करता है। इसे अगर आप विस्तार से बताएं तो बहुतों को लाभ होगा। कुछ क्रिएट करने के लिए शायद ज़रुरी है कि क्रिएटर पहले से मौजूद हो। और अगर वह पहले से मौजूद है तो उसे फिर से खुदको क्रिएट करने की ज़रुरत क्या है?
April 24, 2010 10:20 PM
Hindiblog Jagat said...
ब्लौगर बंधु, हिंदी में हजारों ब्लौग बन चुके हैं और एग्रीगेटरों द्वारा रोज़ सैकड़ों पोस्टें दिखाई जा रही हैं. लेकिन इनमें से कितनी पोस्टें वाकई पढने लायक हैं?
हिंदीब्लौगजगत हिंदी के अच्छे ब्लौगों की उत्तम प्रविष्टियों को एक स्थान पर बिना किसी पसंद-नापसंद के संकलित करने का एक मानवीय प्रयास है.
हिंदीब्लौगजगत में किसी ब्लौग को शामिल करने का एकमात्र आधार उसका सुरूचिपूर्ण और पठनीय होना है.
कृपया हिंदीब्लौगजगत देखिए
April 24, 2010 10:50 PM
ravikumarswarnkar said...
अच्छी शुरूआत हुई...
April 25, 2010 12:34 AM
zeashan zaidi said...
@Arvind Mishra
'.नास्तिकता की सीधी चढ़ कर ही आस्तिकता की ऊंचाईयों तक पहुंचा जा सकता है ' - शत प्रतिशत सहमत!
@Praveen Shah
मैं फिलहाल तो तर्कों के आधार पर ही बात कर रहा हूँ. अब ये बताएं की मेरे तर्क के ऊपर आपकी क्या राय है?
@Sanjay Grover
मैंने यह कहा की 'अगर कोई absolute creator है तो वह स्वेयें का भी creator होगा.' यह नहीं कहा की 'उसने खुद को क्रियेट वास्तव में किया है.'
इसका मतलब 'absolute creator' के बारे में दो संभावनाएं बनती हैं,
१. पहली ये की अगर वह कभी क्रियेट हुआ तो खुद उसी ने स्वयें को क्रियेट किया.'
२. दूसरी ये की वह कभी भी क्रियेट नहीं हुआ, वह सदेव से जैसा है वैसा ही रहा.
April 25, 2010 1:57 AM
Shafiqur Rahman khan yusufzai said...
बड़ी देर कर दी मैंने शायद!
मैंने आस्तिकता और नास्तिकता दोनों को करीब से देखने की कोशिश की है! शायद मै एक निहायत नालायक इंसान हूँ जिसकी वजह से ना तो सही तरीके से आस्तिक हो सका ना पुर्णतः नास्तिक हूँ! आस्तिकता और नास्तिकता जब जिद बन जाए तो समस्या बन जाती है सो मैंने अपनी पतंग को ढील देदी है! जो मन आये सो करो या मत करो! सच कहूँ तो किसी भी बंधन में बंधना आपकी उस व्यवस्था में आस्था का प्रतिक है और आस्था आस्तिकता की जननी है! सो स्वय को नास्तिक घोषित करते हुए अक्सर हम नास्तिक विचारों में अपनी आस्था दिखा जाते हैं! नास्तिकों का आस्तिकों से यही प्रश्न होता है की आखिर इश्वर है क्या? और वो है की नहीं है ? सिद्ध करने की होड़ होती है, एक की आस्था है की वो है दुसरे की आस्था है की नहीं है! या यूँ कहें की तर्क में आस्था रखने वाले नास्तिक और अध्यात्म या समर्पण में आस्था रखने वाले आस्तिक (आजकल परिभाषा में बदलाव करने की ज़रूरत है दूसरों की आस्था पर हमला कर अपनी आस्था का बखान करने या दूसरों की आस्था में खोट निकालने वाले आस्तिक) मगर आस्था दोनों के पास है!
यहाँ अपने पास ऐसा कुछ नहीं है या नहीं है की बहस में उलझना बेकार सा लगता है! अगर इश्वर निकाल आया तो कह्देंगे "नमस्ते ताऊ कैसे हो और क्या चल रहा है" नहीं आया तो कौन सा आसमान टूट पड़ेगा! आखिर उस इश्वर (जो है भी और नहीं भी) कौनसा मेरा या दुनिया का भला किया है!
और सवाल की आखिर रचना किसने की तो भाई मैंने नहीं की और जिसने की है वो सामने आके बताये की उसने की! मैं भी लगे हाथ सवाल करने के मुड में हूँ की भाई जब संभालना नहीं था तो रचना क्यों की
April 25, 2010 3:02 AM
Cyril Gupta said...
सिर्फ तार्किक बात:
1. The concept of 'Absolute Creator' stands on unfound grounds. If one can believe in an absolute creator, it is not any harder to believe in an absolute creation (creation that has been in existence since forever / creation that was formed on its own).
2. One cannot claim on the one hand that the world needs a creator and extend that chain of logic to prove the existence of God, and then negate that God needs a creator. If God does not need a creator, then by the same branch of logic the world does not need a creator.
3. There is not one, single piece of evidence that there is an all-powerful God who wants us to a) dress in a certain manner, b) eat in a certain manner, c) behave in a certain manner, d) pray to him from time to time, e) observe specific rituals.
While...
There is evidence all around the world that there is no God. Or if there is one he is: a) not all-powerful, b) not omni-present, c) does not care enough for the world, d) away on a holiday, e) has left us alone, in which case he isn't listening to your prayers anyway.
There is also not a single piece of evidence in support of heaven or hell, except the fact that we've made this earth pretty hellish all by ourselves
I've been an atheist all my life. The only times I went to a religious building was because the demands of family/society could not be avoided.
I have been through all kinds of crisis, personal and otherwise, but I have never felt that thinking about God has helped in any manner.
Congratulations to Sanjay Grover for creating a blog for atheists, because usually atheists are busy minding their own business, and since they couldn't care to create more non-followers, they don't publicize their views like non-atheists do.
April 25, 2010 4:32 AM
admin said...
अच्छी शुरुवात.
April 25, 2010 5:40 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
@Cyril Gupta,
इस तार्किक विवेचन के लिए आपका बहुत-बहुत आभार। यह ब्लाग सभी मित्रों का सम्मिलित प्रयास है। दूसरे सदस्यों की तरह मैं भी इसका एक सदस्य मात्र हूं।
April 25, 2010 7:53 AM
zeashan zaidi said...
@Cyril Gupta
About 1 & 2.
कम से कम ऐसा कोई absolute creation हमारे आसपास नहीं दिखाई देता.बल्कि किसी भी क्रियेशन का कोई न कोई कारण हमेशा दिखाई देता है.भले ही वह कारण Physical Laws हों. और इसीलिये यह मानने का कोई आधार नहीं की पूरे यूनिवर्स क्रियेशन का कोई कारण नहीं, और जहां बात आती है कारण की तो 'क्रियेटर' अपने आप तर्क में जुड़ जाता है. हाँ यह माना जा सकता है की क्रियेटर की तरह क्रियेशन की प्रोसेस भी forever है. अब क्रियेशन की इस प्रोसेस के लिए दो संभावनाएं हैं.
1. Without Creator : तो फिर यह प्रोसेस रैंडम होगी.
2. With Creator : तो फिर यह प्रोसेस Well Ordered होगी.
लेकिन यह प्रोसेस रैंडम तो नहीं दिखाई देती. क्योंकि यूनिवर्स क्रियेशन में वही घटनाएं होती हुई दिखाई देती हैं जिनके होने की Probability सबसे कम थी. मिसाल के तौर पर एटम का बनना. अगर electron, proton aur neutron से एटम बना तो होना ये चाहिए था की ये सब एक दूसरे से जुड़कर ठोस हो जाते, या फिर electrons & protons जोड़ों की शक्ल में यूनिवर्स में बिखरे होते, या फिर एटम के विविध रूपं यूनवर्स में दिखाई देते. लेकिन ऐसा नहीं है. एटम का वही रूप (With Fine Tuning) यूनिवर्स में दिख रहा है जिसके बनने की संभावना सबसे कम थी.
अब बात करते हैं क्रिएटर्स की चेन की, तो वास्तव में ऐसी कोई चेन दिखती नहीं है. विश्व में हर जगह क्रियेशन तो दिखाई देता है लेकिन क्रियेटर नहीं. अब इस क्रियेशन की Uniformity संकेत देती है की क्रियेटर एक ही है. अगर यह माना जाए की उस God का भी कोई God है तो उसका एविडेंस कहीं न कहीं दिखाई या सुनाई पड़ना चाहिए. लेकिन पूरी दुनिया में बस यही सुनाई पड़ता है की ईश्वर एक है.
3. लेकिन नेचर में इसी तरह का एविडेंस सबसे ज्यादा दिखाई देता है. हर जानवर, कीड़े मकोड़े को पता है की उसे क्या खाना है, कैसे बिहेव करना है. हाँ उनकी प्रेयर के बारे में हमें नहीं पता क्योंकि हम उनकी भाषा नहीं समझते.
"There is also not a single piece of evidence in support of heaven or hell, except the fact that we've made this earth pretty hellish all by ourselves"
अगर heaven or hell इस लाइफ में दिखाई दे रही है तो नेक्स्ट लाइफ में इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. हम इस पृथ्वी के बारे में भी दावे से नहीं कह सकते की इसके १००% रहस्य मालूम हो गए हैं, तो आफ्टर डेथ क्या होगा हम कैसे बता सकते हैं?
Thanks!
April 25, 2010 9:09 AM
Rashid Ali said...
We have such a big universe which has trillions of galaxies. each galaxy has trillions of stars. Well, we have not yet been able to figure out our own solar system. Who can be creator of such a mammoth universe. Even in my childhood, I grew with this inquisitiveness. But my family never allowed me to be natural with my belief or disbelief. Thence, like billions I took refuge in God. But today when I know that there is no god to answer my queries why to believe in him. Why can't we chuck him like other rituals? And this debate is futile over creation. It's also futile to debate about where do we go after death. with composition and decomposition, creation or destruction becomes a natural process without involving any role of supernal power. it's very simple. Why can't others understand this?
April 25, 2010 10:39 AM
Cyril Gupta said...
No debate is futile because a debate helps in forming opinions, and sometimes in changing them. I think a healthy debate on any and every topic should be encouraged, but an unhealthy debate should be avoided. What is a healthy debate? One in which people have respect for the person, but not for the topic (What I mean is, treat your opponent with respect, but don't let that come into your way of decimating the wrong views that he may hold).
If Zeashan or anyone else is ready for a healthy debate, I am ready to be a participant. But let that not be in light of any religious scripture (let's talk logic and science).
1. Absolute Creationism - It is all around us. In fact everything we witness is formed by absolute creation (as you call it). We only change the form of what we have, we do not create. So you cannot extend what we do to create tools, machines, etc. to apply to the universe. The universe gives us the tools and the raw material to create. But the universe or matter itself can be said to be formed on its own just as a god can be said to be born on its own.
2. Without Creator - If Order implies a creator than since God is orderful he must have a creator. How can you prove otherwise?
3. Probability - According to the chaos theory nothing is improbable given an infinite timescale. That is to say, if the timescale is infinite even an improbable event may occur. Thus a God can be born on its own (as you claim), or the universe can be born on its own.
One cannot claim that the universe (atoms) were brought in order by a God who exists in a realm that is not a part of this existence. If the electrons or protons, or neutrons are in order that does not imply that somebody brought them into order. They could be order just because that's the way of the things (or we may discover the true reason later), not because they were created by God.
Uniformity - Please clarify in what way is this creation Uniform. I see diversity everywhere. What is the uniform chain? There are distinct races of living beings and different kinds of matters that are formed by the same basic unit (an atom).
We can probably say that the universe is composed of one basic building block, but that authenticates the big-bang theory which says that all matter was compressed into an infinite point at the beginning of time.
-- I don't know what you mean by next life. An atheist may not believe in next life or continued existence.
You're right to say that one cannot deny the possibility of a next life, but that's equivalent to saying that one cannot deny the possibility of not having a next life.
Last point: Just because we are ignorant of how some things work, it doesn't make it logical to accept the existence of a supreme creator. That's a very savage kind of attitude. If you leave a record player in the midst of untouched savages, they'd think it's a gift from God. How are we behaving any different if we accept God only on the evidence that we don't know enough.
Since you agree that we do not know what will happen after death, how can you actually subscribe to any organized religion that claims to tell you how your after life is going to be?
April 25, 2010 8:36 PM
Swapnil Bhartiya said...
इश्वर मानव की सबसे बडी‌ खोज व भूल है। ९० प्रतिशत आबादी उस वस्तु मे विश्वास करती है जिसने उसे देखा तक नही। मानव मे अपने समाज पर अधिकार पाने की लालसा होती ही है, येन केन प्रकरेण। इश्वर की खोज भी बाकी बेबसों पर राज्य करने की चेष्ठा है। इश्वर की खोज उस समय आवश्यज थी जब प्राकृतिक घटनायें औरन् उनके कारण अज्ञात थे। अपनी समझे के आधार पर व्याख्या व जीवन के नियम तय किये गये। विज्ञान के सहारे जैसे जैसे चीजें‌ स्पष्ट होती‌ गयी नियम और समझ बदलते गये -- लेकिन अमनी हुकूमत कायम रखने हो धार्मित नेताओं ने नियम नही बदले वरन आधुनिक ज्ञान के आधार पर उनको संशोधित कर दिया। राज्य कायम रहे। धर्म परिवर्तन, धारमिक दतभेदत, युद्द, स्त्रियो से भेद भाव -- इस्लाम मे बुरके मे ढक देने की परंपरा -- सब शोषण है। इस्वर ने सबसे ज्यादा जाने लीं‌ हैं। 'मानव' ने हमेशा संधि की चेष्ठा की है। जिस दिन हम इश्वर की बजाये मानव ने आस्था स्थापित कर लेंगे। विश्व की सारी साम्स्या समाप्त हो जायेगी।
शायद १००० हजार साल बाद।
ग्रोवर जी, नीग्रो शब्द अपमान जनह है कॄपया अश्वेत कर दें।
उम्दा प्रस्तुति -- स्वपनिल भारतीय
सम्पादक
कटोडा
कल्किआन
कल्किआन हिंदी
April 25, 2010 10:26 PM
Swapnil Bhartiya said...
Zeashan, if you do believe that there has to be a 'creator' then I would agree with you IFF you can tell who is the creator of 'God' because there has to be a creator of everything :-)
Going by "creationists" approach, God can not exist without a creator. Who created the intelligent design called God?
April 25, 2010 10:29 PM
डॉ महेश सिन्हा said...
नास्तिक भी हुआ जाता है !
"नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है"
याने जहाँ कोई परंपरा नहीं है वहाँ नास्तिक नहीं हो सकता , क्योंकि जहाँ आधार ही नहीं वहाँ विरोध किसका ख़िलाफ़त किसकी ?
मतलब नास्तिकता बिना परंपरा के अस्तित्व में नहीं हो सकती
April 25, 2010 11:13 PM
Cyril Gupta said...
नास्तिकता परंपरा का विरोध नहीं, परंपरा का न होना है. सोचिये अगर कोई परंपरा न हो तो जो बचेगा वही नास्तिकता है. आप उसका मूर्त रूप परंपरा के विरोध में देखते हैं क्योंकि परंपरा होने की वजह से विरोध होता है. अगर परंपरा नहीं होती तो विरोध भी नहीं होता.
अगर किसी बच्चे को बगैर परंपरा के पाला जाये तो वह एक नास्तिक का जीवन जियेगा. लेकिन बिना परंपरा को बारंबार थोपे, समझाये, सिखलाये आस्तिक नहीं बनाया जा सकता. इसलिये हर धर्म मे जोर repetition पर है.
इसलिए यह माना जा सकता है कि नास्तिकता प्राकृतिक है (सभी जानवर नास्तिक होते हैं), व नास्तिकता स्वत: स्फूर्त: है. धर्म व ईश्वर की अवधारणा गैर-प्राकृतिक है, व मानव निर्मित है.
April 25, 2010 11:51 PM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
@डॉ महेश सिन्हा,
नास्तिकता एक विचार है और विचार परंपरा के बिना भी होते हैं और परंपरा की प्रतिक्रिया में भी। विचार के बिना परंपरा पैदा नहीं होती। परंपरा से विचार पैदा हो कोई ज़रुरी नहीं बल्कि एक स्तर पर जाकर परंपरा विचारों में बाधक बनने लगती है जब लोग ‘हमारी तो यही परंपरा है, हम तो यही करेंगे’ के फेर में पड़कर सही-ग़लत देखना बंद कर देते हैं।
@Swapnil Bhartiya,
अश्वेत कर दिया है। शुक्रिया।
April 26, 2010 12:04 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
@ संजय ग्रोवर
नास्तिक शब्द पर ध्यान दें
यह आस्तिक के सामने न याने नकारात्मक जोड़ कर बना है . याने नास्तिक का धरातल बिना आस्तिक के है ही नहीं .
यह मैं नहीं शब्द विन्यास कह रहा है .
April 26, 2010 12:10 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
आस्तिक शब्द पर ध्यान दें। यह नास्तिक में से ’न’ हटाकर बना है।
असल में यह जवाब देना ज़रुरी नहीं था। बहस किसी भी स्तर पर जारी रखी जा सकती है। लेकिन जब हम मुद्दे से हटकर शब्दों से खेलने लगते हैं या ख़ामख्वाह ही अणु-परमाणुओं की परिभाषाएं उद्धृत करने लगते हैं तो इससे हमारी विद्वता का प्रदर्शन तो होता है मगर बहस अपने अर्थ खो देती है।
April 26, 2010 12:35 AM
Cyril Gupta said...
:) There are 100 ways to argue the same argument. Why should any one way be perfect?
April 26, 2010 12:43 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
@Cyril Gupta
आपने मज़ाक में कही लेकिन बात गंभीर है। शायद इसीलिए आज तक
तर्क-कुतर्क की परिभाषाएं नहीं बन सकीं। दूसरे हमारे यहां बहस की नहीं, शास्त्रार्थ की परंपरा रही जिसमें आपको अपने नहीं शास्त्रों में लिखे विचार, तर्क के रुप में प्रस्तुत करने होते थे। शास्त्रों की जगह अब कुछ दूसरी क़िताबें लेने लगी हैं। छपे हुए शब्द को यहां स्वयंसिद्ध समझा जाता है, इसलिए उसे धड़ल्ले से प्रस्तुत कर दिया जाता है और उसे सिद्ध करने की कोई ज़रुरत नहीं समझी जाती।
April 26, 2010 1:00 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
किसी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई .इससे उसके इतिहास का पता चलता है . मेरी जानकारी तो यही कहती है की नास्तिक , आस्तिक में न जोड़कर बना है . शब्द इसी प्रकार बनाये जाते हैं . नास्तिक याने जो आस्तिक का विरोधी या नकारता है .
अगर आस्तिक ही नहीं होता तो न नास्तिकता होती न नास्तिक क्योंकि तब यह शब्द ही नहीं होता न इसका कोई महत्व . एक के लिए दूसरे का होना जरूरी है .
नास्तिक का अपना खुद का धरातल या विचार क्या होता है ?
नास्तिक एक ऐसा समूह है जो अपने को बाकी समाज और लोगों से अलग और ऊपर देखता है .
तर्क और कुतर्क में बहुत पतली सीमा है .
मान लिया जाए की आस्तिक के पास प्रश्नो के उत्तर नहीं हैं क्या नास्तिक के पास सारे प्रश्नो के उत्तर हैं .आस्था और अंधविश्वास के बीच की सीमा रेखा बहुत पतली है .
April 26, 2010 1:01 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
Cyril Gupta ने मजाक में ही सही बात सही कही है
April 26, 2010 1:03 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर/आस्तिक के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !? wo bhi aaj ki paristhitiyoN me. Jab manushya agyani tha aur hawa, pani,aag aadi se dar kar unme Ishwar ki kalpna kar leta tha. Aaj to vah bahut si batoN ke vaigyanik karan jaanta hai.
April 26, 2010 1:16 AM
Shafiqur Rahman khan yusufzai said...
@ dear all
मेरे विचार से शब्द "नास्तिकता" को आस्तिक विचार का शब्द मानना चाहिए! नास्तिकता सही मायने में स्वछंदता है! और किसी भी पहचान (Identity) से नहीं जुडती यहाँ तक किसी क्षेत्र और किसी भी प्रकार की समुहवादी भावना स्वछंदता के विरुद्ध जाती है! किसी भी नास्तिक धारा और परंपरा का पालन करने वाले विचार-विशेष के अनुयायी तो हो सकते हैं परन्तु नास्तिक (स्वछन्द) नहीं! नास्तिक विचार आपके बंद कमरे में अकेले में शुरू होता है और सदैव ही अकेला रहता है! नास्तिकता आच्छी बुराई सही गलत से भी परे है! मेरी नज़रो में ये सामाजिक सत्ता अथवा किसी भी प्रकार की संगठनात्मक सत्ता अथवा व्यवस्था को चुनौती है! इसलिए किसी भी समूह से जोड़ देना स्वछन्द आचरण के विरुद्ध होगा!
April 26, 2010 1:21 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
क्या विज्ञान के पास हर सवाल का जवाब है ? नहीं .
तो यह पूर्ण कैसे हो गया . विज्ञान यह भी मानता है की वस्तुएं परिवर्तित होती हैं नष्ट नहीं .
जो इंसान को दिखाई भी नहीं देता ऐसे छोटे से कण अणु और परमाणु में इतनी शक्ति कहाँ से आती है .
ऐसा लिखा गया है की कल्पना कीजिये एक ऐसे स्थान की जहाँ आस्तिकता नाम का जीव "नहीं" होता तो जो होता वह नास्तिकता होती .लेकिन ऐसा कहीं हुआ क्या ? अगर हाँ तो कहाँ और नहीं तो यह केवल एक काल्पनिक स्वप्न ही है .
April 26, 2010 1:24 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
किसी के पास सारे प्रश्न हों, यही संभव नहीं है, उत्तर तो बाद की बात है।
विज्ञान के पास सारे उत्तर हैं, ऐसा दावा किसने किया ? हां. कल जिन बहुत से सवालों पर विज्ञान को निरुत्तर समझा जाता था, आज उनमें से कईयों के उत्तर वह दे चुका। इसी आधार पर माना जाता है आगे भी बहुत से प्रश्न वह हल कर लेगा।
इंसान शुरु से आस्तिक था या नास्तिक, ऐसे कोई सबूत न मेरे पास हैं न आपके पास। लेकिन मैं अपने अनुभव से जानता हूं कि बच्चे में ईश्वर और आस्तिकता संबंधी सारे विचार, पैदा होने के बाद डाले जाते हैं। यही मेरी बात का मर्म है।
शफ़ीकुर्ररहमान जी से काफी हद तक सहमति है।
April 26, 2010 2:10 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
विज्ञान खोज करता है . उस चीज की जो विद्यमान है . यह विज्ञान की कमी है अगर उसे कोई बात नहीं मालूम है . यह उस बात की गलती नहीं कही जा सकती जिसे विज्ञान नहीं जानता .
मुझे किसी ने आस्तिक होने के पाठ नहीं पढ़ाये न परिवार वालों न किसी और ने . मैं भी सारी बातें जिसे आप आस्तिक कहते हैं का विरोधी था . कहा जा सकता है की मैं नास्तिक था .
मुझे मेरे स्वयं के अनुभव ने विश्वास करना सिखाया.इस विश्वास की पुनरावृत्ति किसी वैज्ञानिक तरीके से नहीं की जा सकती . मैं प्रारंभ से विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ .
April 26, 2010 3:09 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
बुरा न माने तो नास्तिकों का न समूह हो सकता है न ही ब्लाग
धन्यवाद
April 26, 2010 3:10 AM
zeashan zaidi said...
@Cyril Gupta
मैं केवल लोजिक और साइंस पर ही बात करूंगा.
In reply to :
1. Absolute Creationism - It is all around us........
Absolute Creation उसे कहेंगे जहां 'कुछ नहीं' से 'कुछ' क्रियेट हो जाए. और इस तरह का क्रियेशन करने वाले को Absolute Creator कहा जाएगा. जैसे की matter from energy or energy from matter. मनुष्य या कोई भी प्राणी Absolute Creator नहीं है. बल्कि क्रियेटर भी नहीं है जैसा की आपने कहा की सब कुछ पहले से उपलब्ध है, हम सिर्फ उसे जोड़ देते हैं, और उसके लिए भी कुदरत (या ईश्वर) ने हमारे सामने पहले से नमूने उपलब्ध कर रखे हैं. क्रियेटर तो कोई तभी होगा जब उसके सामने कोई नमूना न हो और वह कोई चीज़ तय्यार कर दे. दूसरी बात जब मनुष्य कोई चीज़ तैयार करता है तो इसलिए क्योंकि कुदरत ने उसे हर औज़ार उपलब्ध करा दिया है, साइंटिस्ट पोलिथीन इसलिए बना सका क्योंकि कार्बन इत्यादि के परमाणुओं में जुड़कर चेन बनाने की क्षमता थी. इसका मतलब कुदरत में (या उसके बनाने वाले) में थिंकिंग पावर थी की उसने ऐसे टूल्स बनाए जिसका इस्तेमाल करते हुए मनुष्य अपने काम की चीजें बना सके.
2. Without Creator - If Order implies a creator than since God is orderful he must have a creator. How can you prove otherwise?
यहाँ पर किसी चेन या आर्डर की बात नहीं है, बस दो ही चीज़ें हैं, क्रिएशन और क्रियेटर. अगर मैं ये कहूं की क्रियेशन में एक चीज़ दूसरे को क्रियेट कर रही है तो फिर हर क्रियेटर (including God) के लिए किसी और क्रियेटर का सवाल उठता है, लेकिन जब कोई ज्ञात चीज़ दूसरे को क्रियेट नहीं कर रही है (एक चीज़ का दूसरी चीज़ के रूप में बदलने का मतलब यह नहीं है की पहली चीज़ दूसरे की क्रियेटर है.) तो फिर क्रियेटर - क्रियेशन की कोई ordered चेन भी नहीं.
April 26, 2010 6:11 AM
zeashan zaidi said...
3. ठीक है, लेकिन बिग बैंग थ्योरी के अनुसार यूनिवर्स infinite timescale पर है नहीं. (Age of universe is 20 billion, which is not infinite.) और अगर इसे मान भी लिया जाए की Improbable event हुई तो साथ में probable भी होनी चाहिए. अगर एक एटम में प्रोटोन सेंटर में है और इलेक्ट्रोन चक्कर लगा रहा है, तो कुछ ऐसे भी एटम होने चाहिए जिसमे एलेक्ट्रोंस सेंटर बनाएं और प्रोटोन चक्कर लगाएं, या फिर दोनों एक दूसरे से जुड़कर ठोस एटम बना लें? हर पोसिबिलिटी यूनिवर्स में दिखनी चाहिए.
Infinite timescale की बात आप तभी कह सकते हैं जब eternal God को मानें. Then According to the chaos theory existence of God is Probable.
4. Uniformity
पहली Uniformity ये की हर चीज़ एटम से मिलकर बनी है, और हर एटम स्ट्रक्चर में दूसरे के similar है, living things की बात की जाए तो हर चीज़ का बिल्डिंग ब्लाक समान है यानी की सेल.
दूसरी Uniformity Macro Universe और Micro Universe में दिखती है, एटामिक स्ट्रक्चर और solar सिस्टम की समानता से आप बखूबी वाकिफ हैं.
April 26, 2010 6:12 AM
zeashan zaidi said...
@Swapnil
I am presenting three axioms
1. Every creation needs a creator
2. There is one and only one creator that is 'God'
3. creator does not need any creator because he can create itself.
April 26, 2010 6:13 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
यह क्रिएटर यानि कि भगवान कभी सामने क्यों नहीं आता !? परेशानी क्या है !? आपको तो आयडिया होगा।
April 26, 2010 8:02 AM
अर्कजेश said...
नास्तिकता की अवधारणा पर बहुत बढिया लिखा है । काफी विस्‍तृत र्दा‍शनिक बहस हो गई । ऐसा लगता है कि हर बात के आगे एक बात है ।
जहॉं तक आस्तिकता और नास्तिकता के आविर्भाव की बात है । तो बच्‍चा प्रारंभ में न तो आस्तिक होता न ही नास्तिक । जो भी होता है , होता है । जैसे मनुष्‍य से इतर अन्‍य जीव । हां , यह जरूर है कि बचपन में आस्तिकता दी जाती है । और बाद में यदि उसने अपने दिमाग का उपयोग किया तो उस सीखे हुए को सही न पाकर , जो हो जाता है, उसके लिए मनुष्‍य को नास्तिक शब्‍द का प्रयोग करना पडता है ।
क्‍योंकि विधेय के पहले निषेध नहीं हो सकता । अवधारण तो आस्तिकता की ही पहले आई । उसके बाद उसका निषेधात्‍मक पहलू नास्तिकता आई ।
आस्तिकता से परिचय के पहले मनुष्‍य जो होता है , उसे नास्तिकता नहीं कहा जा सकता । उसे कुछ भी नहीं कहा जा सकता ।
April 27, 2010 1:22 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
@अर्कजेश,
आस्तिकता की प्रचलित परिभाषाओं या अर्थों के अनुसार यह किसी ईश्वर की अवधारणा पर टिकी है जो कि हर बच्चे को जन्म के बाद ही दी जाती है। इस अर्थ में हर बच्चा जन्मतः नास्तिक ही है।
April 27, 2010 1:32 AM
Shafiqur Rahman khan yusufzai said...
एक नास्तिक की जान खतरे में है! घर बैठे कुछ कीजिये लिंक पर क्लिक करके अपना हँसता हुआ अक्षर डाल दीजिये
http://www.petition.fm/petitions/savearslan/
April 27, 2010 1:57 AM
अर्कजेश said...
@संजय ग्रोवर,
यदि नास्तिकता ईश्‍वर की अवधारणा पर टिकी है तो ईश्‍वर की संकल्‍पना प्राप्‍त करने के पहले कोई नास्तिक कैसे हो सकता है ?
'ईश्‍वर' नास्तिक के अस्त्तिव के लिए भी उतना ही अनिवार्य है , जितना की आस्तिक के । भले ही नकार की तरह ।
April 27, 2010 2:26 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
@अर्कजेश,
नास्तिकता ईश्वर की अवधारणा पर नहीं टिकी। जब तक बच्चा ईश्वर की अवधारणा से ‘बचा’ रहता है, नास्तिक रहता है। ज़िंदगी भर बचाया जा सके तो जिंदगी भर नास्तिक रह सकता है। ईश्वर की अवधारणा कहां बीच में आएगी जब तक इधर-उधर से उसे बताया न जाए ! ईश्वर की अवधारणा पर टिकी नास्तिकता आप उसे कह सकते हैं जो लोगों को पकी उम्र में आस्तिक से नास्तिक बनाती है। यानि कि एक व्यक्ति जो पारिवारिक संस्कारों से बचपन से आस्तिक है मगर बाद में किन्हीं कारणों से नास्तिक हो जाता है। लेकिन वहां भी ईश्वर की अवधारणा पर टिकी नास्तिकता उसे माना जाना चाहिए जब व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हुए उसका विरोध कर रहा हो। अगर ईश्वर के अस्तित्व से ही उसका विश्वास उट गया है फिर भी ऐसा मानना तो ज़्यादती ही है।
April 27, 2010 4:49 AM
अर्कजेश said...
'हॉं' के विकल्‍प के पहले या बगैर 'ना' संभव नहीं है । एक अबोध बच्‍चे को आप नास्तिक नहीं कह सकते , हालांकि उसे आस्तिकता का भी पता नहीं । उसका 'होना' सहज है , लेकिन उसे अपनी सहजता का भी पता नहीं ! इसीलिए सहज है । इस स्थिति के लिए नास्तिक शब्‍द का प्रयोग करना मैं सही नहीं समझता । क्‍योंक इसके शब्‍दार्थ में न+अस्ति है । जो यह बता रहा है कि 'न होने' की अवधारणा के लिए 'होने' की अवधारणा का पता होना जरूरी है ।
आपकी बात मैं समझ रह रहा हूँ , लेकिन उस स्थिति के लिए इस शब्‍द का प्रयोग मैं नहीं करता ।
=======
क्रियेटर की अवधारणा से मैं सर्वथा असहमत हूँ । यह सिर्फ तर्क को कुछ दूर तक खींचना भर है । अंतत: जब मानना ही पडता है कि क्रियेटर खुद को भी क्रियेट करता है तो फिर यह तर्क गच्‍चा खाने लगता है । शुरु से प्रकृति को ही ऐसा मान ल‍ीजिए कि स्‍वचालित है।
April 27, 2010 11:14 AM
प्रवीण शाह said...
"पर 'नास्तिक' शब्द का कोई बेहतर विकल्प होना चाहिये क्योंकि यह शब्द 'जिस' के नकार को प्रतिध्वनित करता है 'वह' है ही नहीं, यही 'नास्तिक' कहते हैं... जैसे 'एलोपैथी' जो 'होमियोपैथी' का विलोम है की जगह आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को आज Modern Evidence Based Medicine कहते हैं इसी तरह Modern evidence & logic based beliefs के लिये एक बेहतर शब्द की दरकार है।"
देखिये मैंने जब उपरोक्त टिप्पणी की थी तो जो आशंका मुझे थी, वही हुआ... बहस 'नास्तिक' शब्द, उसके अर्थ व उत्पत्ति आदि पर आ गई और मूल मुद्दा कहीं खो गया!
धर्म की जड़ें वाकई उतनी ही गहरी हैं जितनी अज्ञान, रूढ़िवादिता, जातीय अभिमान व ज्योतिष, रत्न शास्त्र, टैरो, वास्तु जैसे शास्त्रों की... कोई आश्चर्य नहीं कि यह सब एक दूसरे को पोषित करते हैं!
April 27, 2010 9:20 PM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
@अर्कजेश & प्रवीण शाह
मैं दोनों से सहमत हूं। कल शाम से ही अर्कजेश के कमेंट के संदर्भ में मेरे दिमाग में प्रवीण का पिछला कमेंट घूम रहा था। और अभी देखा तो आप दोनों के ये कमेंट देखने को मिले। वाकई नास्तिक के लिए कोई दूसरा संबोधन सोचना चाहिए।
April 27, 2010 10:52 PM
डॉ महेश सिन्हा said...
@Pravin Shah
allopathy होमियोपथी का विलोम !
इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे
April 28, 2010 6:29 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
यह क्रिएटर यानि कि भगवान कभी सामने क्यों नहीं आता !? परेशानी क्या है !? आपको तो आयडिया होगा
शायद आपकी अवधारणा भगवान के बारे में किसी वस्तु या प्रयोग से है
विज्ञान के अनुसार यह दुनिया तरंगो का खेल है .
ध्वनि और प्रकाश की तरंग का एक हिस्सा ही इंसान देख सकता है .
जो ध्वनि कुत्ते या चमगादड़ को सुनाई देती है वह इंसान को नहीं .इसी तरह उनकी दृष्टि के बारे में भी कहा जाता है
क्या हर इंसान जो इस दुनिया में है सब कुछ देख सकता है ? आपको सामने कोई वस्तु है जिसे देखने की सीमा आपकी दृष्टि में नहीं है तो उसे आप कैसे देखेंगे .
विज्ञान की बहुत सी बातें सिद्ध की जाती हैं अप्रत्यक्ष रूप से जैसे आप रेडियो तरंगो को नहीं देख सकते लेकिन मान लेते हैं क्योंकि टीवी और रेडियो जैसे उपकरण हैं . रेडियो आने से पहले यह कपोलकल्पित था की ऐसा भी हो सकता है . आज इस पर कोई प्रश्न नहीं करता .
यह विज्ञान की खोज करने वालों की कमी है की वे सब कुछ नहीं जानते .
अगर भगवान आपके सामने भी खड़ा होगा तो आप उसे कैसे देख पायेंगे ?
April 28, 2010 6:45 AM
Rangnath Singh said...
ईश्वर है या नहीं ? मैं ऐसी किसी बहस में पड़ना अनुचित समझता हूँ। पढ़ता भी नहीं लेकिन इस पोस्ट को पढ़ लिया क्योंकि संजय ग्रोवर ने लिखी थी। मैं पदार्थवादी हूँ। मैं नहीं मानता कि कोई ईश्वर है। यहाँ जितने लोगों ने बहस की है उसमें शफीकुर रहमान खान की बात सबसे सही लगी। अभी इतना ही,शेष फिर कभी।
April 29, 2010 11:09 PM
अशोक कुमार पाण्डेय said...
सीधी बात वह जिसे इश्वर कहा जाता है उसे मनुष्य ने अपनी ज़रूरतों के हिसाब से क्रियेट किया है। और ज़रूरतों के हिसाब से जोड़ा-घटाया है। मैं द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में विश्वास रखता हूं और ऐसे किसी परामनवीय शक्ति पर मेरा कोई विश्वास नहीं
May 1, 2010 8:05 AM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
यहां कमेंटस् में जिस तरह के प्रश्न उठे हैं उन पर विस्तार से चर्चा मेरे ब्लाग ‘संवादघर’ पर हो चुकी है। लिंक लगा रहा हूं:-
1. छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां
http://samwaadghar.blogspot.com/2009/09/blog-post_16.html
2. क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?
http://samwaadghar.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html
May 3, 2010 11:48 PM
mukti said...
This post has been removed by the author.
May 6, 2010 8:38 AM
mukti said...
यहाँ बहुत अच्छी बहस चल रही है... अच्छी लगी ये बहस.
जो लोग ये कह रहे हैं कि नास्तिकों का कोई समूह नहीं हो सकता उनसे मेरा ये कहना है कि यहाँ इस ब्लॉग से जुड़े लोग कोई समूह नहीं हैं और न सबके विचार एक जैसे हैं. ये स्वतंत्र सोच वाले कुछलोग हैं, जो एक ब्लॉग पर अपनी-अपनी बात लिखेंगे. इन सभी लोगों में बस एक बात कॉमन है कि वे किसी ईश्वर और धर्म में विश्वास नहीं करते हैं. क्यों नहीं करते हैं? उनके क्या तर्क हैं? नास्तिकता को लेकर उनकी सोच कैसी है?... ये सभी बातें सब में अलग-अलग हैं, जैसे मैं खुद को नास्तिक की अपेक्षा गैरधार्मिक कहना अधिक पसंद करती हूँ. गैरधार्मिकता एक विस्तृत अवधारणा है और इसे मान्यता मिलनी चाहिये, मैं इस में विश्वास करती हूँ.
May 6, 2010 8:42 AM
डॉ महेश सिन्हा said...
@ मुक्ति
धर्म क्या है पहले ये तो समझ लें आपके अनुसार . धर्म की भी अलग अलग व्याख्या हैं
सारे धार्मिक लोग भी एक समूह नहीं हैं
May 6, 2010 8:47 AM
मसिजीवी said...
एक अरसे के बाद गुणात्‍मक बहस दिखी ब्‍लॉगजगत पर। पारिभाषिक दृष्टि से खुद को ईश्‍वर निरपेक्ष किस्म का मानते हैं इतना कि ईश्‍वर नहीं है कहना भी उसे भाव देने जैसा लगता है इसलिए नहीं कहते...उसे भी कोई कष्‍ट नहीं इस बात से :), आज तक तो आया नही कहने कि अगर ये नहीं कहता कि ईश्‍वर है तो ये ही कह दूँ कि वह नहीं है... शायद ये स्थिति एग्‍नास्टिक होना कहलाती है।
मेरी एक सामान्‍य समझ है कि आस्तिक से बहस हो नहीं सकती, नास्तिक-नास्तिक आपस में बहस करेंगे तो बहस असंतुलित होगी।
एक सामान्‍य सी दार्शनिक समझ ये कि ईश्‍वर के अस्तित्‍व के मामले में 'बर्डन आफ प्रूफ' उनका है जो कहते हैं कि ईश्‍वर है अर्थात 'सिद्ध करो कि ईश्‍वर नही है' एक अवैध वाक्‍य है और जब तक कोई ये सिद्ध न कर दे कि ईश्‍वर का अस्तित्‍व है तब तक ईश्‍वर का अनस्‍ितत्‍व सिद्ध है।
May 6, 2010 10:58 AM
anuj said...
I don't understand that what is the relation between Atheism and god. its negative to say that I am atheist because I don't believe in god. Atheist is one who is so dissolved in inner being that even existence of any thing does not effect his inner soul... doesn't matter if its god itself (eg- Buddha). On this Atheist cite I counted almost in each line "Eshwar" name appears repeatedly with is more than any other religious book's page. All are Atheist and all are talking about god.... Strange but true............
If you will ask me who is the biggest Atheist in universe..... I can say God is the biggest Atheist.
Have fun..........
May 6, 2010 1:40 PM
anuj said...
Joke-
Ek bar ek bahut hi garib vyakti mar rah tha. Us ke parijano ne kaha paise bhi nahi hai pandit ko bula kar puja path ka intzam kaise karenge. Vha vyakti bila chinta kyu karte ho sukra hai bhagwan, mai to ek nastik hu.
May 6, 2010 1:52 PM
संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...
दिल्ली में जब काले बंदर का आंतक फैला था तब बहुत से लोगों का अंदाज़ा था कि यह सिर्फ अफ़वाह है। अंत में उसका कोई अस्तित्व सिद्ध भी नहीं हो सका। पर तब भी इस पर कई साहित्यकारों के साक्षात्कार छपे थे। अगर कोई धारणा या अफ़वाह समाज को नुकसान पहुंचा रही है या बहुत से निरपेक्ष लोगों को उस धारणा के चलते सिर्फ इसलिए प्रताड़ित होना पड़ रहा है कि वे उस धारणा में विश्वास नहीं रखते तो वह धारणा या अफ़वाह भले पूरी तरह काल्पनिक हो, उस पर बात तो करनी ही पड़ती है न।
May 6, 2010 9:21 PM
vinay said...
बहुत अच्छा सारगर्भित लेख ।
May 8, 2010 2:21 AM
jenny shabnam said...
संजय जी,
इस लेख पर विचार विमर्श और प्रतिक्रिया और उत्तर-प्रतुत्तर पढ़ गई
आपकी बात सही है कि ''आस्तिकता हम सिखाते हैं, जन्मजात कोई भी आस्तिक नहीं होता
'' आपके लेख को पढ़कर मैं अपनी टिप्पणी लिखने लगी, और फिर प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक लेख लिख गई
अगर आप वक़्त निकाल सकें तो मेरे ब्लॉग पर आयें, ख़ुशी होगी मुझे
आपके उत्तम और तर्कपूर्ण विचार केलिए बधाई आपको
आपके इस लेख केलिए धन्यवाद
मेरी नयी पोस्टिंग '' ईश्वर के होने और न होने के बीच...'' पढ़ने केलिए मेरे ब्लॉग पर आयें...
http://saajha-sansaar.blogspot.com/
May 8, 2010 11:11 AM
दीपक गर्ग said...
एक एक शब्द सार्थक.
तर्क सब मिथ्या बातों को नष्ट कर सकता है.
अति उत्तम,स्वागतयोग्य कदम.
मेरी बहुत बहुत शुभकामनाएँ
May 24, 2010 9:11 PM

शनिवार, 3 जुलाई 2010

बात फैलानी ही हो तो.....

ग़ज़ल


चार दिन तो आप मेरे दिल में भी रह लीजिए
पाँचवें दिन फ़िर मेरे घर में बसेरा कीजिए




राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए




आपका-मेरा तआल्लुक अब समझ आया मुझे
कीजिए सब आप और इल्ज़ाम मुझको दीजिए




दोस्त बनके जब तुम्हारे पास ही वो आ गया
खुदको अपने आपसे अब तो अलग कर लीजिए




मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
जिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए

-संजय ग्रोवर

(‘समकालीन साहित्य’ में प्रकाशित)

गुरुवार, 24 जून 2010

टीवी से पहले, टीवी के बाद


सारे के सारे बादल चाँद के पीछे जा छुपे थे। हर सितारा सूरज की तरह चमकता मालूम होता था। सुबह का सूरज आँखों को शीतलता प्रदान कर रहा था। लू के थपेड़े ऐसे लगते थे जैसे माँ बचपन में सुलाते वक्त लोरी गाते हुए थपकियाँ दिया करती थी। गली की लड़कियां जो मुझे दूर से आते देखकर प्रत्यक्षतः पिछली दीवार पर लगे राजेश खन्ना के फटे-पुराने फिल्मी पोस्टर को देखने को वरीयता देती थी आज मुझे नमकीन निगाहों से निहार रही थीं। मेरे पड़ोसी का पालतू कुत्ता जो प्रति पदचाप पाँच गुर्राहट की दर से मेरा मुकाबला करता था आज मेरी गन्ध मात्र पर ऐसे पूंछ हिला रहा था जैसे ऐतिहासिक फिल्मों के दृश्यों में राजा महाराजाओं के सिरहाने खड़ी दासियाँ पंखे झुलाया करती थीं।
यह एकाएक सबको क्या हो गया था?
दरअसल मैं कल रात पहली बार टीवी पर आया था।
कविताएं तो मैंने पहले भी बहुत कहीं थी। साहित्य सृजन तो मैंने हमेशा ही इसी तरह किया था। और कल रात टीवी पर जो रचनाएं मैंने पढ़ीं उन्हें कल से पहले लोगों तक पहुंचाने के लिये मुझ इतनी ही मेहनत करनी पड़ती थी जितनी एक फिक्रमंद बाप को अपने बीमार बच्चे के हाथ-पैर पकड़ कर, नाक बन्द करके कड़वी दवा पिलाने में करनी पड़ती है। लेकिन आज लोगों की बदली हुई (पोज़ीटिव) निगाहें देखकर ही अंदाजा हो गया था कि रचनाओं का रसास्वादन उन्होंने कैसे किया था। लगता था जैसे सभी रात को रसगुल्ला खाकर सोए हों।
फिर भी लोगों के मूड में एकाएक आया यह परिवर्तन बेहद रहस्यमयी था। यह कमाल मेरी रचनाओं का था या दूरदर्शन की साख का। हालांकि दोनों ही अपने-अपने रूपों में बिल्कुल पहले जैसे थे। न मैंने अपनी रचनाओं में कोई परिवर्तन किया था न दूरदर्शन ने अपनी दृष्टि में। फिर इन दोनों के विलय से ऐसा चमत्कारी रासायनिक परिवर्तन कैसे हो गया था। इस महत्वपूर्ण रासायनिक फार्मूले को मैं शीघ्रातिशीघ्र समझकर सुरक्षित रख लेना चाहता था।
फिर मैंने एक-एक कर इन सभी घटनाओं पर दोबारा दृष्टि डालना शुरू किया जो मेरे टीवी स्क्रीन की छत तक पहुँचने के दौराने-सफर बीच सीढ़ियों में घटी थी। मेरी स्मृति के पर्दे पर सारे दृश्य टीवी के बिना सेंसर किए गए विज्ञापनों की तरह तेजी से तैरने लगे। जैसे मंचीय मुद्राएं सीखते समय मुझे किन मुश्किलात और कैसी मानसिक जद्दोज़हद से गुजरना पड़ा था। कितनी उम्र गुज़र जाने पर मेरी समझ में आ सका था कि साहित्यकार होने के साथ-साथ साहित्यकार दिखना भी जरूरी है। तब कैसे-कैसे मैंने पता लगाया था कि साहित्यिक चेहरे को फोटोजेनिक-टच देने के लिए सौन्दर्य-प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियों (अर्थात् गुटों) में से किसके उत्पादन सबसे सस्ते, असरकारक और टिकाऊ हैं।

कैसे मैंने आम जनता का प्यारा कवि बने रहने के गुर सीखे थे और जहां जनता जैसा चाहती थी वहां वैसा ही कहना-लिखना शुरू कर दिया था। साथ ही नियमित अंतराल के बाद बात-बेबात जनता की तारीफ करना शुरू कर दिया था। कैसे मैंने पद-प्रतिष्ठा-पैसा-पहुँच-पौरूष-प्रचार इन छः तत्वों के संयोग से सम्मेलनों को सफल आयोजनों में ढालना सीखा और तब ‘‘तू मुझे बुला मैं तुझे बुलाऊँ‘‘ का सफल सूत्र मेरी बीमार होती साहित्यिक सेहत के लिये रामबाण औषधि सिद्ध हुआ था। मुझे यह भी याद है कि अपने विचारों और संवेदनाओं को स्थगित करना मैंने उन लोगों से सीखा था जिन्हें यह सब करने और सीखने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। (क्योंकि वहाँ न तो विचार थे न संवेदनाएं)।

शहर में अगर मेरे होने के बावजूद उभरता कोई साहित्यकार किसी बड़े प्रकाशन में अपनी रचना तीन साल के कड़े संघर्ष के बाद छपवा पाता तो मैं तीन दिन उसके साथ चैराहे -चैराहे घूमने जितनी मामूली मेहनत से ही मशहूर कर देता कि ‘‘ये आज जो कुछ है इन्हीं की (मेरी) बदौलत हैं।‘‘ जब कि अन्दर ही अन्दर खुद मैं मरा जा रहा होता था कि जल्द से जल्द इसकी स्थिति साहित्य में सचमुच सुदृढ़ हो जाए ताकि इसके सहारे मेरी भी दो-चार रचनाएं बड़े अखबार में स्थान पा सकें। खैर! जो संपादक मेरे दोस्त बन गए थे, ख़ुद ही बता देते थे कि आज तुम्हारी रचना के विरोध में 20-25 जो ख़त आए थे, हमने रद्दी में फिंकवा दिए हैं, अब तुम क्षतिपूर्ति के लिए इतने ही ख़त प्रशंसा में अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से लिखवाकर हमें दे दो। मैं कहता, मैं तो 50 लिखवा कर ले आया हूं, चलो आधे अगली बार लगा देना। इस मामले में जिन संपादकों के स्वभाव और विचार मुझसे भिन्न होते, उनके मैं स्टाफ़ को सैट कर लेता। स्टाफ भी अगर हरामी होता तो मैं कुछ और कमीनी तरकीबें इस्तेमाल कर लेता था। आपको नहीं बताऊंगा।
तत्पश्चात् कैसे मैंने नेताओं से सम्पर्क सांठा। कैसे अधिकारियों से रिश्ता गाँठा। कैसे लोगों, विचारों, किताबों और अखबारों को दलों, वादों, पंथों, सम्प्रदायों, धाराओं, धर्मों वगैरह के हिसाब से बाँटा। कैसे-कैसे उपायों से विरोधियों का पत्ता काटा। कैसे मैंने अपने से मिलती- जुलती विचारधारा के लोगों को छाँटा।
अर्थात् ऐसी तमाम तात्कालिक, त्वरित तपस्याओं के बाद मेरे मन के मुर्गे की बांग बुद्धत्व को प्राप्त हुई और उसने जब चाहे तब अपनी इच्छा पर साहित्यिक सुबह का सूर्योदय सुलगाने का हुनर हासिल कर लिया। यानि अब इतना हुआ कि मुझे व मेरी बातों को ‘‘बच्चा है‘‘ कहकर अपने अनुभवों की नाक पर से मक्खी की तरह उड़ा देने वाले ‘बाबागण‘ मुझ पर नज़र पड़ते ही ‘‘भाई साहब हम तो आपके ही बच्चे हैं। ज़रा नज़र रखना।‘‘ जैसे दूधिया वाक्यों की (दु)र्गन्ध से मुझे आकर्षित करने के उपाय खोजने लगते। रिश्तों के विलोमान्तर का मध्यान्तर अन्ततः अपनी मौत आप मर गया था।
इस प्रकार आपने देखा कि देखने में छोटी-छोठी लगने वाले बातें महसूस करने में कित्ती बड़ी-बड़ी हो सकती हैं। खुद मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या बताऊँ और क्या छोडूँ? क्यों बताऊँ या क्यों छोड़ूं! लेकिन एक बात साफ कर दूं। जो बालबुद्धि साहित्य-छौने बल खा-खाकर बौराए जा रहे हों कि सस्ते में सफलता के सूत्रों की सन्दूकची हाथ लग गई है, वे ज़रा अपने उत्साह की अंगीठी को ठंडा कर लें। ज़माना एक बार फिर आगे निकल चुका है। टाप-लेवल साहित्यिक स्थानों की आई.ए.एस. परीक्षाओं में उपरोक्त सूत्र अब प्रिलिमिनरी परीक्षा की कुंजी से ज्यादा महत्व नहीं रखते। वक्त और परिस्थितियों के साथ-साथ सफलता के सूत्र भी बदल जाते हैं। नई परिस्थितियों एवं नई चुनौतियों के लायक फार्मूले गढ़ने के लिये प्रतिभा और सृजनात्मकता की जरूरत होती है। जिसमें होती है उसे ऐसे लेख पढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती।
और जो साहित्यशावक ईमानदारी वगैरह के आले में पड़े हों उन्हें भी कहना ज़रूरी समझता हूं कि जो ‘‘मैं‘‘ टीवी में आता हूँ वह ‘‘मैं‘‘ वह ‘‘मैं‘‘ नहीं हूँ जो ‘‘मैं‘‘ अखबार में होता हूँ। इसलिये मेरे अखबार वाले ‘‘मैं‘‘ में मीन मेख निकालने से मेरे टीवी वाले ‘‘मैं‘‘ पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। बाकी फिर देख ही ली जाएगी। हाँ।
हाँ, होते हैं दो एक साहित्यकार ऐसे भी जो जैसे जीवन में रहते हैं वैसे ही अखबार में होते हैं और वैसे ही टीवी पर आते हैं। लेकिन उनकी आमद पर न तो गली की लड़कियाँ आभारी होती हैं न पड़ौसी का ‘‘पप्पी‘‘ ताली बजाता है। अब मेरी क्या मजाल कि मैं गली की लड़कियों या पड़ौसी के पप्पी के बारे में अखबार में भी कहूँ:

वो कि जिसकी अपनी कोई अहमियत बाक़ी नही,
उनकी नज़रों में उसी की अहमियत है दोस्तो।

-संजय ग्रोवर

(23.06.1995 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)
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देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....