Tuesday, June 16, 2009

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?


यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।


पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?


दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।


इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !


क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?


ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!


वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?

(नयी पोस्ट लगा रहा हूं इसका मतलब यह नहीं कि पिछली पोस्ट पर बहस खत्म हो गयी।)

32 comments:

  1. आस्था की बात है, बहस की नहीं. ईश्वर नहीं कहता कि मुझे मानो मगर अपने होने का अहसास तो करा ही देता है.

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  2. वह दादा है या नहीं इस पर बहस चलने दीजिए। पर इस अनदेखी शख्सियत को लोगों ने दादा जरूर बना दिया है और उस के एजेंट बन हफ्ता भी खूब वसूलते हैं।

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  3. मगर सोचने की बात यह भी है कि यह ‘‘अहसास’’ ईश्वर करवाता है या उसके नाम पर धंधा चलाने वाले और आतंक फैलाने वाले!? ईश्वर अपने होने का अहसास क्यों करवाना चाहता है ? क्या अपने होने को लेकर इंसान की तरह उसमें भी कोई हीन-भावना है ? और किनको करवाना चाहता है ? दोषियों, बेईमानों, पाखण्डियों, भ्रष्टाचारियों को या सलाम/नमस्ते न करने वालों को ? आस्था की बात है तो यह टिप्पणी क्यों ! और ‘‘अहसास कराने’’ का यह ‘तर्क’ क्यों !?

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  4. Hamesha se ye saval uthta raha hai ki Eshwar hai ki nahi...Hai to kaisa hai...Unki prakirti kya hai...

    ALBERT EINSTEIN ne bhi kaha tha ki "KOI SATTA HAI JO MUJHE PRERIT KARTI HAI EN KARYON KE LIYE" (JO MAHAN KARYA VO KAR GAYE)

    UNHONE ES SATTA KO "SUPREME POWER" KAHA... MAI use ESHWAR Kahta hoon...

    Hamari Buddhi bahut dur tak sath nahi deti Prakirti ke rahsyon ko samjhne me...Lekin ek Satta Hamesha se apna karya kisi patra ke madhyam se karva leti hai...

    Usi "SATTA" ko mai Eshwar manta hoon aur khud ko ek Patra banana chahta hoon...

    Mai en savalon me pade bina, Vishwas karta hoon ki Eshwar hai aur ye utna hi satya hai jitna ki mera comment apke es post pe...

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  5. अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अगर ऐसा कुछ कहा है तो यह उनका बड़प्पन, उनकी विनम्रता रही होगी। वरना तो उन्होंने जो किया अपनी बुद्धि, अपनी जिज्ञासा, अपनी तार्किकता और अपने साहस के बल पर किया। और उनकी बुद्धि ने बहुत दूर तक और देर तक उनका साथ दिया।
    प्रकृति के रहस्यों को ढंूढना एक बात है और अप्रमाणिक, अव्यवहारिक ईश्वर को ढंूढना, मानना बिलकुल दूसरी बात। जब हम इस रहस्य को खोजने जाते हैं कि वर्षा कैसे होती है तो हम बादल को भी देख चुके होते हैं और उससे टपकने वाले पानी का भी इस्तेमाल कर चुके होते हैं। ईश्वर के मामले में ऐसा कतई नहीं है।

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  6. वाह! यही कह-कह के तो मैं थक गई. हमारे चारों तरफ हवा, पानी, और पेड -पौधों के रूप में इहमें ईश्वर नहीं दिखाई देता. हम तो अपने बनाये चित्रों के जैसा ईश्वर ढूंढने मे लगे हैं, जिसका मिलना असंभव है. बहुत बढिया.

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  7. Grover jee ek bat mai apse share karna chahta hoon ki jab koi Sankhya Darshan padhega to usme likha gaya hai ki PRAKIRTI + PURUSH esi se jagat ka nirman hua hai.

    PRKIRTI vahi hai jiske rahsyon ke bare me ham sab bat karte hai. PURUSH ko hi sanketik rup se ALBERT EINSTEIN ne "SUPREME POWER" kahe hai.

    Eshwar na to Avyavharik hai aur na hi Apramanik.
    ALBERT EINSTEIN ka last unfinished work tha "UNIFIED MODEL THEORY" uska agla kadam " THEORY OF EVERYTHING" it means there is only one basic force...U can say that Everything is coming from one source...Yahi bat adhyatm bhi kahta hai...

    In last simit shabdon se asimit ko parivhashit kiya nahi ja sakta hai...

    kisi ko bhi Eshwar ko tabhi manana chahiye jab unke pas koi tark ho...Nahi to nahi manana hi uttam hai...

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  8. mera bhi wishwash hai ki ishwar hai...aap kahte hai ki aap parkriti ke rahsay ko khoj lete hai badalo ko dekh chuke hai...pani ka bhi estemaal kar chuke hai...to jinhe aap dekh chuke hai kya wahi sach hai?maine apne dada ji ko dekha hai.unke dada ji ko nahi to kya woh nahi the? the wo the.agar humne ishwar ko samne nahi dekha to kya woh hai....he is unseen,silent listener of every conversation.sansar uski rachna hai...

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  9. राज जी, आपने अपने परदादा को न सही, मनुष्य को तो देखा है। इतना तो आप भी मानेंगी कि आपके परदादा भी मनुष्य ही रहे होंगे। वैसे भी आपके या मेरे परदादा के होने न होने का इस दुनिया पर उस तरह से फर्क नहीं पड़ता। क्यों कि यहां धर्म के नाम पर जो अधर्म ईश्वर के नाम पर होता है वो मेरे आपके परदादाओं के नाम पर नहीं।
    आइंस्टाइन जी, मैं किताबों में लिखे या विद्वानों के कथनों को उतने तक ही महत्व देता हूं जितने तक वो प्रमाणिक, तार्किक और व्यवहारिक होते हैं। सिर्फ इसलिए कि बात किसी बहुत बड़े विद्वान ने कही है या किसी बहुत बड़े ग्रन्थ में लिखी है, मैं प्रभावित होने को, मानने को तैयार या बाध्य नहीं हूं।

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  10. बस इसीलिए तो ईश्वर को मानना पड़ता है।

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  11. yeh apna apna wishawas hai jise ishwar ko nahi manna woh na manne ke bhane dund lega jisemaanna hai wo manne ke...bus thats it...

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  12. भाई ग्रोवर जी इतनी गूढ़ बातें ?
    मुझे तो इतनी भारी-भरकम बातों से ही चक्कर आने लगता है !
    मैं तो ठहरा प्योर नास्तिक आदमी !
    किस विद्वान ने क्या कहा ?
    किस धर्म ग्रन्थ में क्या लिखा है ?
    इन बातों का कोई मतलब नहीं है !
    पहले ये तो तय कर लो कि कौन सा धर्म ग्रन्थ फाईनल है !

    मैं तो सिर्फ एक सहज सवाल पूछना चाहता हूँ कि -
    क्या ईश्वर के बगैर इंसान नहीं रह सकता है ?
    क्या जैसे मैं खुश हूँ क्या दूसरा खुश नहीं रह सकता ?
    हम ईश्वर के मोहताज हैं या ईश्वर हमारा मोहताज है ?
    ईश्वर ने मनुष्यता की कितनी विशाल जमीन हथियाई है
    ... आखिर इसका जवाब कौन देगा ?

    एक और बात अपने अनुभव से कह सकता हूँ !
    ऐसा तो मैंने बहुत देखा है कि आदमी बहुत अच्छा है लेकिन ईश्वर को नहीं मानता लेकिन मैंने आज तक नहीं देखा कि कोई धूर्त व मक्कार हो और वो ईश्वर को न मानता हो !

    आज की आवाज

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  13. प्रकाश गोविन्द said...
    एक और बात अपने अनुभव से कह सकता हूँ !
    ऐसा तो मैंने बहुत देखा है कि आदमी बहुत अच्छा है लेकिन ईश्वर को नहीं मानता लेकिन मैंने आज तक नहीं देखा कि कोई धूर्त व मक्कार हो और वो ईश्वर को न मानता हो !

    BILKUL PRAKASH JI, LAGBHAG YAHI ANUBHAV MERA BHI HAI.

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  14. Bas ek bat--- Kya athah jalrashi(Dhurta aur Makkar) se dar kar, kinare baith kar koi Manush Moti(Ishwar) chun layega kya...Mai samjhta hoon...kabhi nahi..kabhi nahi.. kabhi nahi..

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  15. सवाल यह है कि आप मोती समझते किसे हैं !? मैं तो ईमानदारी को, मौलिकता को, इंसानियत को, विवेक को, प्रेम को, समझ को, संवेदना को, मासूमियत को मोती समझता हूं। जिस देश में करोड़ों लोगों को धोती नसीब न हो वहां, कहीं दूर गगन में (पता नहीं कहां) हाथ-पैर मारकर अध्यात्मिकता के मोती ढंूढते रहना मुझे तो समझ आता नहीं।

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  16. आपको ही सही मानती हूँ

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  17. Apne jise Moti kaha hai, vo bilkul sahi hai...kya eske bina koi Adhyatmikta aur Ishwar ki parikalpna kar sakta hai kya... Yadi koi karta hai to vo bakai dhongi hai..Bas Najriye ka fark hai...Dharm ke thekedaron ne Ishwar ki Paribhasha hi badal di hai..Esiliye kuchh Bharam hai...Ishwar ke liye...

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  18. रजनीश ने थोडा घुमा फिरा कर कभी कहा था की समग्र का योग ही ईश्वर है . आठ लाख मील दूर से सूरज की किरणें आती हैं और वृक्षों की पत्तियों पर पड़ती हैं जिसके क्लोरोफिल से आक्सीजन बनती है जिससे हमारी सांस चलती है और जीवन संभव हो पाता है . हम उस आठ लाख मील दूर की चीज से जुड़े हैं और तभी जीवन है पर हम अपने को स्वतंत्र मानते हैं . असल में यह जो नामकरण है यह बदमाशी है .हमें आइन्स्टीन की तरह मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों को समझना चाहिए . ये पूजा पाठ इबादत और इनके करने पर भौतिक पुरस्कार और न करने पर दंड सब धूर्तों के चोंचले हैं. मनुष्य ने सदैव अपने अपने समय में अज्ञात के बारे में तरह तरह की कल्पनाएँ की हैं उसकी इस कल्पना वृत्ति का सम्मान करना चाहिए किन्तु हजारों साल पहले की गयी कल्पनाओं को मानना मुर्खता ही होगी जबकि आज हमारे पास अपेक्षाकृत अधिक जानकारियाँ उपलब्ध हैं आइन्स्टीन ने ही कहा था की ज्ञान तो समुद्र की तरह अनंत है और में तो एक छोटा सा बच्चा हूँ जो घोंघे सीपियों से खेल रहा हूँ

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  19. जैसे हम वैसा हमारा भगवान। पहली बार आपके ब्लोग पर आया अच्छा लगा।

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  20. प्रिय ग्रोवर साहब

    मैंने सवाल किया था कि क्या हम ईश्वर के बगैर नहीं रह सकते ?
    आखिर हमारे लिए ईश्वर जरूरी क्यों है ?

    अगर हम उसको नहीं मानेंगे तो क्या वो रुष्ट होकर दुनिया नष्ट कर देगा ?

    भाई किसने भगवान् को एप्लीकेशन दी थी कि प्लीज दुनिया बनाओ न .... आदमी बनाओ .. पेड़ पौधे बनाओ .. नदी-नाले-समुंदर बनाओ ?

    अगर चलो उसने बना ही दिया तो क्या उसका उद्देश्य ये था कि प्रथ्वी पर दिन-रात मेरा गुण-गान हो ?

    देखिये मेरी प्रतिक्रिया का बस इतना सा मतलब था कि नास्तिकता किसी के लिए भी खतरा नहीं है ... न ही किसी का नुक्सान कर रही है लेकिन आपकी आस्तिकता लाखों के लिए सिरदर्द बनी हुयी है ! आप स्वयं बताईये कि नास्तिकता किसी के लिए भी उलझन या परेशानी सबब कैसे बन सकती है बल्कि आपको तो खुश होना चाहिए कि जब आप स्वर्ग में सोमरस पीते हुए अप्सराओं का नृत्य देख रहे होंगे तब हमारे जैसे नास्तिक नरक की आग में जलेंगे !

    तब की तब देखी जायेगी किन्तु आज तो आस्तिक लोगों ने जीना मुश्किल कर दिया है .... कहीं बीच सड़क पर देवी जागरण ... कहीं दुर्गा पूजा ... कहीं अखंड रामायण ... कहीं भागवत कथा ..... रात-रात भर माईक लगाकर आपने आना-जाना, सोना-खाना हराम कर दिया है ! और समय-समय पर व्रत-त्योहारों के चलते बाजार की चीजें महँगी होती हैं वो भी हम जैसे लोगों को खामखाँ भुगतना पड़ता है !

    जब मैं इस शहर में आया था तो साईं बाबा का एक भी मंदिर नहीं था ... हाँ कुछ लोग जो महाराष्ट्र इत्यादि घूम कर आते थे तो वहीँ से तस्वीर लाकर घर में लगा लेते थे ! आज शहर में पचासों साईं बाबा के मंदिर स्थापित हो गए हैं ! यह भी पता चला कि वो शिव के अवतार हैं ! ब्रहस्पतिवार को कई जगहों पर आना-जाना दुश्वार हो गया है !

    इसी तरह शनि का सिर्फ एक मंदिर था जिसमें भूले-भटके ही कोई कभी जाता था लेकिन आज वहां मेला लगता है ... बेशुमार भीड़ ! अगर आप किसी जरूरी काम से जा रहे हों तो दूसरी सड़क से लम्बा घूम के जाईये !

    पहले यहाँ दुर्गा-पूजा के पंडाल पूरे शहर में ८-९ के करीब लगते थे.. आज आप गिन नहीं सकते ... हर मोहल्ले में दुर्गा पूजा !

    एक गरीब आदमी को एक अदद छत बनाने में जिन्दगी लग जाती है लेकिन, कैसे ये एकड़ में फैले भव्य मंदिर और आश्रम रातों-रात खड़े हो जाते हैं ?

    आखिर इतनी भक्ति आ कहाँ से रही है ?

    कहीं कोई ताकत अनायास तो आपके जीवन में हस्तक्षेप करके मन-मस्तिष्क को परिवर्तित नहीं कर रही है ?

    कहीं ये ताकत मीडिया तो नहीं है जो रात-दिन तंत्र-मन्त्र और बाबाओं को दिखाकर आपके आत्म विश्वास को निरंतर कमजोर कर रहा है ?

    अगर आप आज्ञा दें तो अगली प्रतिक्रिया में ईश्वरीय सत्ता सम्बन्धी थोडा ज्ञान मैं भी उडेल दूँ ?

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  21. मैं आपके ब्लॉग के माध्यम से कहना चाहता हूँ कि कुछ ब्लॉगर बंधु परिचर्चा की शुरुआत कहीं और करते हैं फिर बाद में चुपचाप अपने ब्लॉग पर किसी का नाम लेकर उसकी बातों का पोस्टमार्टम करते हैं

    ... अब यह तो संभव नहीं है कि मैं दस जगह जाकर अपना पक्ष रखूं ! यह स्वस्थ तरीका नहीं है ! अभी ऐसा ही "तस्लीम" ब्लॉग पर किया गया ... परिचर्चा वहां चल रही है ... जवाब मैं वहां दे रहा हूँ .... बाद में महाशय अपने ब्लॉग पर जाकर मेरे लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि मुझे सदबुद्धि दे !

    कृपया ऐसा न करें ! जो परिचर्चा जहाँ चल रही है उसे वहीँ तक सीमित रखें या फिर अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखने के बाद आमंत्रित करें !

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  22. भाई गोविंदजी, आपके पहले कमेंट पर मैं यह कहूंगा कि आप बिलकुल खुल-खिलकर अपनी बात कहिए। तार्किक बातों का हमेशा यहां स्वागत है और इनकी सख्त ज़रुरत भी है। अब यहां न कोई राम है न कोई शंबूक।
    दूसरे कमेंट पर मैं कहूंगा कि जब विज्ञान-विरोधियों के हाथ उस्तरा........मेरा मतलब है कोई वैज्ञानिक माध्यम पड़ जाता है तो उसका यही हश्र होता है। ईश्वर से दूसरों के लिए सद्बुद्धि वही मांगते हैं जिनका न तो खुदपर विश्वास होता है न ही खुद में सद्बुद्धि आ पाने की कोई उम्मीद। ईश्वर अगर वास्तव में होता भी तो इन मंगतों से परेशान होकर खुदकुशी की सोचने लगता। फिर यही मंगते एतराज भी उठाते हैं कि कुछ फिल्मकार हमारा मंगतापन दिखाकर विदेशों में हमारी ‘छवि’ खराब कर रहे हैं। असलियत से ज्यादा इन्हें छवि की चिंता रहती है। शायद इसीलिए इंसान के बजाय ईश्वर का आदर करते हैं। आदर भी झूठा। खुद ही कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान-सर्वत्र-विद्यमान है और फिर खुद ही यह भी समझते हैं कि वह इनकी ‘असली हरकतों’ को न देखकर सिर्फ पूजा-पाठ से ‘इम्प्रेस’ हो जाएगा।
    इनकी जितनी तारीफ की जाए कम है। स्वागत है आपका।

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  23. कई बार आपकी पोस्ट पढ़कर राजेंद्र यादव जी की हंस की सम्पादकीय याद आती है. आपके तर्कों की काट आसान नहीं है. लाजवाब पोस्ट.
    _____________________________________
    समोसा के 1000 साल पूरे होने पर मेरी पोस्ट का भी आनंद "शब्द सृजन की ओर " पर उठायें.

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  24. ईश्वर का होना या ना होना मानने या ना मानने पर निर्भर करता है.......यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो आपके लिए वह है और दुनिया-जहान की कोई ताकत आपको उसको मानने से नहीं रोक सकती........और यदि आप ईश्वर में विश्वास कतई नहीं रखते तो फ़िर कोई आपको इसके लिए बाध्य भी नहीं कर सकता.......मैं तो ईश्वर में आस्था रखता हूँ.......आज जहाँ विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि हर चीज़ को तर्क और कारण का चश्मा लगाकर देखा जाता है, ईश्वर के अस्तित्व पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं......मगर जिस तरह हर चीज़ की एक सीमा होती है, ठीक उसी तरह विज्ञान की भी अपनी सीमा है और ईश्वर का अस्तित्व उस सीमा से परे है.....

    साभार
    हमसफ़र यादों का.......

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  25. जो चीज़ कहीं है ही नहीं वो सीमाओं से परे तो खुदबखुद ही होगी मेरे भाई।

    आप एक बच्चे को इस तरह पालें कि उसे समाज, परिवेश, परिवार, पड़ोस कोई भी एक शब्द भी ईश्वर के बारे में न बताए। 15-16 की उम्र का होते-होते जब वह बच्चा ईश्वर को मानने वाले समाज के बीच जाएगा तो उसे ‘ईश्वर-ईश्वर’ रटते लोग पागल और अजूबे नहीं लगेंगे क्या !? लेकिन बहुमत तो ईश्वर वालों का है। तो हो सकता है कि बहुमत और अन्य दवाबों (जैसे कि अपनी अलग सोच रखने वालों को पत्थर मारने वाले और किसी भी हद तक गिरकर परेशान करने वाले लोग) के चलते वह आत्मविश्वास खो बैठे। तो होगा क्या ! अंततः वह बच्चा ही पागल कहाएगा। पत्थर मारने वाले वहशी नहीं।

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  26. वाह ! इतनी संलग्नता के साथ इतनी सारी बातें। इतने सारे तर्क और कहीं कुछ अशांत नहीं। यह बैठने और बातें करने की छायादार चौपाल है। लेकिन ईश्वर है या नहीं यह हमेशा से अनिर्णीत बहस रही है। हाकिंस ने कहा उच्च गणित और भौतिकी के जिन सूत्रों से सिद्ध किया जा सकता है कि ईश्वर नहीं है, उन्हीं से यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि वह है। वह शून्य जैसा प्रमेय है। शून्य क्या होता है? या नहीं होता? लेकिन गणना में उसकी आवश्यकता होती है। शायद बर्नार्ड शा ने ऐसे ही किसी प्रश्न के उत्तर में कहा था कि अगर ईश्वर है तो मैं उसकी हत्या नहीं कर सकता...और ..अगर नहीं है, तो उसको ज्न्म देना मेरे वश में नहीं। ...तो कोई ऐसी चीज़ जिस पर मेरा कोई वश ही नहीं, उसके बारे में सोच कर मैं समय क्यों गवाऊं?
    वैसे मुझे लगता है, एक अकेले (सालिटरी) मनुष्य के ईश्वर और किसी 'समूह' (कलेक्टिव/ कम्युनल)के ईश्वर की धारणा के बीच अंतर करना चाहिए।
    बधाई।

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  27. jin saral ko main janta hoon meri dua hai ki ye sab un ke saath na hua ho wo jo bhi hoon meri hardik samvedna
    par agar durbhagye se wahi hain to un ke bare men jitna janta hoon wo kehta hoon ye ek ese viyakti hain jo kinhi arthoon men bhagwan se kam naheen inhone kaiyoon ko marg darshan diya hai kai log in ke utsah vardhan se aaj kamiyaab hain saral nishkapat sahej to kiya hua jo kabhi gussa bhi aajata hai kisi daridra mitr ke bacche ka birth day yahi mana sakte hain kisi abhage ka sahara yahi ban sakte hain taki wo apne pairoon par khara ho sakekisi mitr ki nokri ke liye yahi pryas kar sakte hain kisi viyathit ki viyetha yahi sun sakte hain wo bhi bina uska anand liyepoori karuna poori imandari ke saath fhir bhi koi inke saath na chal sake to kiya ye kisi bhagwan se kam hain sadar pranaam

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  28. हा, धिक्!February 25, 2010 at 12:50 PM

    सरल को खामख़्वाह भगवान बनाकर क्यों सारे किए धरे पर पानी फेर रहे हो, डिक साहब ?

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  29. हौस्लेवालाDecember 24, 2011 at 2:59 PM

    अरे यार मैं शनि महाराज को चार साल से ढूंढ रहा हूँ...अगर आप लोगों को कहीं नजर आये तो बताना......यमराज की फिराक में भी हूँ हो सके तो मेरी जान लेकर देखे फिर बात करता हूँ इन देवताओं से

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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