
थोडी देर को मान लीजिए कि सरकार लालवाणी जी की बन गई है।
मगर इसबार विदेशी बहू की तरह कुर्बानी लालवाणी जी ने ही दे डाली है।
उनका कहना क़ाबिले-ग़ौर है कि पड़ोस में जींस रोकने वाले और जज़िया लगाने वाले कट्टरपंथी आ गए हैं और हमारा तो जीना-मरना सब पड़ोस की वजह से है तो ज़ाहिर है कि प्रधान भी कोई उन्हीं के टाइप का होना चाहिए। लालवाणी जी ने बाबा बयानदेव जी को प्रधान-संत्री और बाबा धांसूराम पोपू को राष्ट्राचार्य बना दिया है। बाक़ी कैबिनेट पर आप अंदाज़े मारिए।
मेरी दूर-दृष्टि अनुसार देश का भावी दृश्य कुछ इस प्रकार बनता है:-
मनोचिकित्सकों को पकड़कर ओझाओं और बाबाओं के हवाले कर दिया गया है। बाबा उन्हें पेड़ो से लटकाकर, नीचे से लाल मिर्चों की धूनी देकर इन पश्चिम-परस्तों का ‘इलाज’ कर रहे हैं।
सभ्यता और संस्कृति को शीघ्र पतन से बचाने के लिए स्त्रिओं के लिए एक बोरानुमा पोशाक का निर्माण किया गया है। माना गया है कि चूंकि इस का रंग काला नहीं है इसलिए इसकी तुलना दूसरी पोशाकों से करना अपने देश और धर्म से गद्दारी करना होगा।
अभी-अभी पता चला है कि युद्ध-स्थल पर दुश्मन देश ने हमारी सेनाओं के सामने बिल्ली छोड़ दी है। बिल्ली द्वारा रास्ता काट जाने के चलते हमारी सेनाएं हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। पुरोहितजन इस अनोखी रणनीति की काट ढंूढ रहे हैं। इस बीच दुश्मन हमारी ज़मीन कब्जाता चला जा रहा है।
इससे आगे का व्यंग्य आप पूरा करें---------
(संजय ग्रोवर)