‘ओए, जो हमारे दल का नहीं
देशद्रोही है,
पीट-पीटकर मार डालूंगा’
इक्कू ने कहा
‘स्साल्ले ! हमारी हां में हां नहीं मिलाता !
सांप्रदायिक घोषित कर दूंगा
गाली देकर भगा दूंगा
नहीं मानेगा तो गोली भी चलवा दूंगा’
यह आया दुक्कू
तिक्कू की बात और भी मज़ेदार
‘हमारे गुट में नहीं आएगा
तो गुटबाज़ घोषित कर दूंगा’
हंसें तो फ़ंसें आप
ये सब तो हैं बहुत गंभीर
अभी देखना आएंगे कुछ हाथ
कुछ वाद कुछ पंथ कुछ संघ
कुछ खुले कुछ तंग
कुछ ये कुछ वो.. (उफ़ !)
इनसे खेलेंगे
इन्हें फ़ेंटेंगे
इन्हें फ़ेंकेंगे
तुरुप बनाएंगे
खेलते-खेलते
अंततः थक जाएंगे
इन्हें समेटकर
डाल देंगे एक डिब्बी में
और पता है फिर वे क्या करेंगे !
जाकर वे भी किसी डिब्बी में सो जाएंगे
आप हंसें तो फ़ंसें
सोचें तो सिर नोचें
चलिए आप और हम
उस डिब्बी का पता लगाएं
पर उसके लिए
हमें डिब्बी से बाहर निकलना होगा !
-संजय ग्रोवर
No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
Sunday, December 5, 2010
एक ही डिब्बी के
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जितनी सरलता से और तरलता से आपने यह सुन्दर रचना की है वह मेधा बधाई की पात्र है
ReplyDeleteसंजय ग्रोवर जी की सन्देश देती हुई रचना बहुत बढ़िया लगी!
ReplyDeleteसटीक व्यंग्य... व्यवस्था पर और उनपर जिन्होंने ख़ुद को यह व्यवस्था दी!!
ReplyDeletebahut khoob, lekin kya hamaare yehaN ke NAMAK maiN kuch haraarat baqi hai?
ReplyDeleteबहुत अच्छी प्रस्तुति ...
ReplyDeleteबहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति ! एक निर्मम यथार्थ को उजागर करती बेहतरीन रचना ! बधाई एवं शुभकामनाएं !
ReplyDeleteपर उसके लिये हमें डिब्बी से बाहर निकलना होगा।
ReplyDeleteअच्छी रचना।
इस कविता में सत्ता निर्माताओं के प्रति बेखौफ असहमति है , व्यंजना और लक्षणा में भी । शब्दों में आक्रोश है । कविता में वैचारिक और संवेदना की युगलबंदी देखने लायक है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
ReplyDeleteविचार-प्रायश्चित
वाह ...बहुत खूब.
ReplyDeleteपंकज.
हर आदम इक डिब्बा है और उसकी कोई डिब्बी है
ReplyDeleteताजी श्वॉंस उसी को मिलती जिसने खोली डिब्बी है।
दिल जीत लिया रे!
ReplyDeleteइक्कू, दुक्कू, तिक्कू और डिब्बी को लेकर एक खतरनाक संत्रासी टाइप फंतासी रची जा सकती है। लिखिए न!
-गिरिजेश राव
(VIA EMAIL)
Salaam!
ReplyDeletetash ke patto ko kitne pyare dhang se aapne sabdo me sameta ...........
ReplyDeleteekke dukke tikke...........mamaj ke numainde..:P
इक्कू दुक्कू और टिक्कू के बाद बचता ही क्या है सुवा चक्कू के...निकालो और घुसेड दो...
ReplyDeleteधारदार व्यंग रचना...ऐसे लेखन में आप लाजवाब हो जी.
नीरज
बहुत अच्छी प्रस्तुति ...बधाई
ReplyDeleteHum Sab log bhi inhi patto ke saman hai, ek dusre ke saath bhi aur ek dusre ek virodhi bhi, par anth me ek hi asmaan ke hi niche rahte hai hum log,
ReplyDeletePhir ek dusre se bhair kyu
जनाब सार्थक व्यंग, अनूठा पत्तों के सहारे लिखा सच शायद पहलीबार देखा .शुक्रिया
ReplyDeletesandeshprad saarthak vyang, shbhkaamnaayen.
ReplyDeleteसटीक व्यंग्य...
ReplyDeleteये तो हुई वो बात के अंदर के भी अंदर है कुछ.........
ReplyDeleteबहुत खूब संजय भाई........बधाई|
संजय भाई, बहुत गहरी बात कर दी आपने। बधाई।
ReplyDelete'तस्लीम' पर आपके विचारों के लिए आभार। आप उसके फॉलोअर साइडबार में लगे विजेट के द्वारा भी बन सकते हैं।
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अंधविश्वासी तथा मूर्ख में फर्क।
मासिक धर्म : एक कुदरती प्रक्रिया।