रविवार, 2 सितंबर 2012

सांप्रदायिक टांगों पर धर्मनिरपेक्ष सिर!



पिछले कुछ दिनों से एक बहस को रह-रहकर सर उठाते देखता हूं। सुनने में हर मानवतावादी को यह बहुत भली दिखाई पड़ेगी। मुद्दा है कि क्या किसी ग़ैर-धर्मनरपेक्ष व्यक्ति को हमारे जैसे देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए!? बिना हिचक कम लोग ही इसका समर्थन कर पाएंगे मगर क्या विद्वजन पर्याप्त गहराई में जा रहे हैं ? पहली बार यह बहस पूरे ज़ोर-शोर से शायद तब उठी थी जब चुनाव आडवाणी और अटलबिहारी वाजपेयी के बीच होना था। अटल जी चुन लिए गए। बहुत-से लोगों ने राहत की सांस ली। मगर यह सांस ज़्यादा देर तक नहीं चली। गोधरा हो गया। धर्मनिरपेक्ष अटल जी के होते हो गया। फ़िर गुजरात हो गया। वह भी अटल जी के होते हो गया। हिंदू-हृदय-सम्राट का उत्थान और विकास धर्मनिरपेक्ष अटल जी के होते हुआ। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि देश और समाज क्या केवल छवियों के आधार पर चलेंगे !? चल सकते हैं क्या ? अटल जी अपनी इमेज के चलते प्रधान बने मगर उस वक्त भाजपा की जीत का आधार किसने बनाया था? अच्छा था, बुरा था, गर्वनाक था कि शर्मनाक था, इसपर अलग-अलग राय हो सकती है, मगर इससे कौन इंकार कर सकता है कि यह आधार आडवाणी ने बनाया था और लोगों का मानना था कि यह सांप्रदायिकता फ़ैलाकर बनाया गया था। ऐसे में क्या अटल जी से इस नैतिकता की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए थी कि ऐसे किसी भी आधार पर बनी सरकार का मुखिया बनने से इंकार कर देते ! या फ़िर वे धर्मनिरपेक्षता पर की गयी अपनी मेहनत के बूते जीते होते! यह भी कमाल है कि उनकी छवि अंत तक धर्मनिरपेक्ष की बनी रही !!

इतने कम वक्फ़े में इतिहास ख़ुदको दोहराएगा कि नहीं, यह तो पता नहीं मगर बहसें फ़िर उसी मिजाज़ की हवा में टहल रहीं हैं। क्या यह कोई पूछने या बताने की बात है कि इस बार भी अगर भाजपा जीतती है या बड़ा दल बनती है तो किस वजह से बनेगी!? लेकिन सर पर बिठा दी जाएंगी जेटली, सुषमा या नीतिश की छवियां ! (यहां तक कि पिछली बार सांप्रदायिक और खलनायक बताए गए आडवाणी भी आज मोदी के मुक़ाबले धर्मनरपेक्ष माने जा रहे हैं!) क्या इसे न्याय या ईमानदारी कहेंगे? और छवियों के होते भी असलियत अपना काम करती रहती है, ऊपर लिख चुका हूं।

यूं आजकल अकसर यह भी पढ़ने को मिल जाता है कि कथित श्रेष्ठ जातियां कथित छोटी जातियों को अकसर इसी तरह इस्तेमाल करतीं  हैं और महत्वपूर्ण पदों पर उन्हें एक हद से आगे नहीं बढ़ने देतीं।

मेरी विशेष रुचि न तो मोदी में है न जेटली में न किसी और में, पर बहस तो सही मुद्दे पर होनी चाहिए।

-संजय ग्रोवर


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ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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