ग़ज़ल
हिंदू कि मुसलमां, मुझे कुछ याद नहीं है
है शुक्र कि मेरा कोई उस्ताद नहीं है
जो जीतने से पहले बेईमान हो गए
ऐसे, थके-हारों से तो फ़रियाद नहीं है
जो चाहते हैं मैं भी बनूं हिंदू, मुसलमां
वो ख़ुद ही करलें खाज, मुझपे दाद नहीं है
इंसान हूं, इंसानियत की बात करुंगा
आज़ाद है ज़हन मेरा, बरबाद नहीं है
-संजय ग्रोवर
12/20-06-2018
