ग़ज़ल
मज़दूर अपनी जान पे है खेल रहा तो!
धर्मात्मा भी ज्ञान अपना पेल रहा तो!
ज़ेवर के लिए ही जिन्होंने ज़िंदगी दे दी
ज़ेवर ही उनकी नाक में नकेल रहा तो!
कहने को अपनी ज़िंदगी आज़ाद रही है
जीवन रिवाज़ो-रस्म की इक जेल रहा तो!
बादाम मां ने, बाप ने भिगवा के रखे हैं
लौण्डा जो ठण्ड में है दण्ड पेल रहा तो!
सुनते हैं कान होते हैं सुनने के वास्ते,
दूजों को सुनना उनके लिए खेल रहा तो!
इस बार इनको देखा था अब उनको लाओगे?
पर इनकी-उनकी सांठ-गांठ, मेल रहा तो!
-संजय ग्रोवर
No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
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बुधवार, 22 दिसंबर 2021
सुनते हैं कान होते हैं सुनने के वास्ते
शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020
गाकर भीड़ लगा सकते हो ?
क्या तुम अच्छा गा सकते हो ?
गाकर भीड़ लगा सकते हो ?
भीड़ को सम्मोहित करके तुम
क्या नारा लगवा सकते हो ?
भीड़ तालियां भीड़ ही थप्पड़-
ख़ुदको यह समझा सकते हो ?
अब तक जो होता आया है
क्या फिर से करवा सकते हो ?
तुमसे क्या अब बात छुपाना-
क्या तुम घर पर आ सकते हो ?
अपने दिल की बात बताकर
मेरे दिल तक आ सकते हो ?
क्या बोला, मैं नया-नया हूं
ठीक है फिर तुम जा सकते हो
-संजय ग्रोवर
14-02-2020
रविवार, 14 अप्रैल 2019
कहो भीड़ बन जाऊं क्या
ग़ज़ल
मैं भी प्यार ‘जताऊं’ क्या
झूठों में मिल जाऊं क्या
15-03-2019
जिस दिन कोई नहीं होता
उस दिन घर पर आऊं क्या
जीवन बड़ा कठिन है रे
फिर जीकर दिखलाऊं क्या
इकला हूं मैं बचपन से
कहो भीड़ बन जाऊं क्या
जब खाता तब खाता हूं
तुमको कुछ मंगवाऊं क्या
जो-जो मैंने काम किए
तुमको भी दिखलाऊं क्या
यूंही जलती रहती है
बत्ती सुनो बुझाऊं क्या
मैं दुनिया से नहीं मिला
तो मैं जां से जाऊं क्या
कभी-कभी डर लगता है
सुनो अभी मर जाऊं क्या
14-04-2019
-संजय ग्रोवर
मैं भी प्यार ‘जताऊं’ क्या
झूठों में मिल जाऊं क्या
15-03-2019
जिस दिन कोई नहीं होता
उस दिन घर पर आऊं क्या
जीवन बड़ा कठिन है रे
फिर जीकर दिखलाऊं क्या
इकला हूं मैं बचपन से
कहो भीड़ बन जाऊं क्या
जब खाता तब खाता हूं
तुमको कुछ मंगवाऊं क्या
जो-जो मैंने काम किए
तुमको भी दिखलाऊं क्या
यूंही जलती रहती है
बत्ती सुनो बुझाऊं क्या
मैं दुनिया से नहीं मिला
तो मैं जां से जाऊं क्या
कभी-कभी डर लगता है
सुनो अभी मर जाऊं क्या
14-04-2019
-संजय ग्रोवर
शुक्रवार, 15 मार्च 2019
मैं पशोपेश में रहा
ग़ज़ल
मैं अपने देश में रहा
मैं पशोपेश में रहा
सदा तक़लीफ़ में रहा
ज़रा आवेश में रहा
वही होगा मेरा रक़ीब
जो कई वेश में रहा
मैं क्यों ईमानदार हूं
बहुत वो तैश में रहा
न मैं अमीर में रहा
न ही दरवेश में रहा
-संजय ग्रोवर
15-03-2019
मैं अपने देश में रहा
मैं पशोपेश में रहा
सदा तक़लीफ़ में रहा
ज़रा आवेश में रहा
वही होगा मेरा रक़ीब
जो कई वेश में रहा
मैं क्यों ईमानदार हूं
बहुत वो तैश में रहा
न मैं अमीर में रहा
न ही दरवेश में रहा
-संजय ग्रोवर
15-03-2019
सोमवार, 29 अक्टूबर 2018
बात यूं है कि बात कुछ भी नहीं
गज़ल
हाथ आई हयात कुछ भी नहीं
बात यूं है कि बात कुछ भी नहीं
11-01-2013
यू तो मेरी औक़ात कुछ भी नहीं
काट लूं दिन तो रात कुछ भी नहीं
29-10-2018
मुझको, सच में, बयान कर न सके
वो तेरे इल्ज़ामात कुछ भी नहीं
12-09-2018
मुझसे दिनवाले लुटेरों ने कहा
अपने आगे बारात कुछ भी नहीं
झूठ बोलूंगा, ख़ुदसे हारुंगा
सच कहूंगा तो मात कुछ भी नहीं
12-09-2018
-संजय ग्रोवर
29-10-2018
हाथ आई हयात कुछ भी नहीं
बात यूं है कि बात कुछ भी नहीं
11-01-2013
यू तो मेरी औक़ात कुछ भी नहीं
काट लूं दिन तो रात कुछ भी नहीं
29-10-2018
मुझको, सच में, बयान कर न सके
वो तेरे इल्ज़ामात कुछ भी नहीं
12-09-2018
मुझसे दिनवाले लुटेरों ने कहा
अपने आगे बारात कुछ भी नहीं
झूठ बोलूंगा, ख़ुदसे हारुंगा
सच कहूंगा तो मात कुछ भी नहीं
12-09-2018
-संजय ग्रोवर
29-10-2018
बुधवार, 27 जून 2018
एक मुर्दा कहीं से ले आओ
![]() |
| photo by Sanjay Grover |
भीड़, तन्हा को जब डराती है
मेरी तो हंसी छूट जाती है
सब ग़लत हैं तो हम सही क्यों हों
भीड़ को ऐसी अदा भाती है
दिन में इस फ़िक़्र में हूं जागा हुआ
रात में नींद नहीं आती है
भीड़, तन्हा से करती है नफ़रत
और हक़ प्यार पे जताती है
एक मुर्दा कहीं से ले आओ
भीड़ तो पीछे-पीछे आती है
पूरी औरत को करके अंगड़ाई
शायरी कैसा सितम ढाती है
आज इक और बात कह डाली
देखिए किसको समझ आती है
-संजय ग्रोवर
27-06-2018
बुधवार, 20 जून 2018
है शुक्र कि मेरा कोई उस्ताद नहीं है
ग़ज़ल
हिंदू कि मुसलमां, मुझे कुछ याद नहीं है
है शुक्र कि मेरा कोई उस्ताद नहीं है
जो जीतने से पहले बेईमान हो गए
ऐसे, थके-हारों से तो फ़रियाद नहीं है
जो चाहते हैं मैं भी बनूं हिंदू, मुसलमां
वो ख़ुद ही करलें खाज, मुझपे दाद नहीं है
इंसान हूं, इंसानियत की बात करुंगा
आज़ाद है ज़हन मेरा, बरबाद नहीं है
-संजय ग्रोवर
12/20-06-2018
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मंगलवार, 19 जून 2018
इसकी ख़ातिर अपनी नज़रों से भी क्या गिर जाऊं मैं !
ग़ज़ल
दूसरों के वास्ते बेहद बड़ा हो जाऊं मैं
इसकी ख़ातिर अपनी नज़रों से भी क्या गिर जाऊं मैं
एक इकले आदमी की, कैसी है जद्दोजहद
कौन है सुनने के क़ाबिल, किसको ये दिखलाऊं मैं
जब नहीं हो कुछ भी तो मैं भी करुं तमग़े जमा
बस दिखूं मसरुफ़ चाहे यूंही आऊं जाऊं मैं
बहर-वहर, नुक्ते-वुक्ते, सब लगें इनको दुरुस्त
इनके खाने और कमाने को भी कुछ लिख जाऊं मैं
जीते-जी लफ़्ज़ों के जिसके लोग दें मानी बदल
क्या करुं त्वारीख़ में, ऊपर से मर भी जाऊं मैं
-संजय ग्रोवर
19-06-2018
तवारीख=इतिहास history, लफ़्ज़=शब्द word, मानी=अर्थ meaning, मसरुफ़=व्यस्त busy, जद्दोजहद=संघर्ष, अंर्तद्वंद conflict, struggle
दूसरों के वास्ते बेहद बड़ा हो जाऊं मैं
इसकी ख़ातिर अपनी नज़रों से भी क्या गिर जाऊं मैं
एक इकले आदमी की, कैसी है जद्दोजहद
कौन है सुनने के क़ाबिल, किसको ये दिखलाऊं मैं
जब नहीं हो कुछ भी तो मैं भी करुं तमग़े जमा
बस दिखूं मसरुफ़ चाहे यूंही आऊं जाऊं मैं
बहर-वहर, नुक्ते-वुक्ते, सब लगें इनको दुरुस्त
इनके खाने और कमाने को भी कुछ लिख जाऊं मैं
जीते-जी लफ़्ज़ों के जिसके लोग दें मानी बदल
क्या करुं त्वारीख़ में, ऊपर से मर भी जाऊं मैं
-संजय ग्रोवर
19-06-2018
तवारीख=इतिहास history, लफ़्ज़=शब्द word, मानी=अर्थ meaning, मसरुफ़=व्यस्त busy, जद्दोजहद=संघर्ष, अंर्तद्वंद conflict, struggle
गुरुवार, 26 अप्रैल 2018
किसीसे, बात छुपाओ, कभी कहा ही नहीं
ग़ज़ल
राज़ खुल जाने के डर में कभी रहा ही नहीं
किसीसे, बात छुपाओ, कभी कहा ही नहीं
मैंने वो बात कही भीड़ जिससे डरती है
ये कोई जुर्म है कि भीड़ से डरा ही नहीं !
जितना ख़ुश होता हूं मैं सच्ची बात को कहके
उतना ख़ुश और किसी बात पर हुआ ही नहीं
किसीने ज़ात से जोड़ा, किसीने मज़हब से
मगर मैं ख़ुदसे किसी झूठ से जुड़ा ही नहीं
बुतों ने बहुत दिखाईं तमाम ऊंची जगहें
मगर मैं हंसता रहा, झाड़ पर चढ़ा ही नहीं
-संजय ग्रोवर
26-04-2018
राज़ खुल जाने के डर में कभी रहा ही नहीं
किसीसे, बात छुपाओ, कभी कहा ही नहीं
मैंने वो बात कही भीड़ जिससे डरती है
ये कोई जुर्म है कि भीड़ से डरा ही नहीं !
जितना ख़ुश होता हूं मैं सच्ची बात को कहके
उतना ख़ुश और किसी बात पर हुआ ही नहीं
किसीने ज़ात से जोड़ा, किसीने मज़हब से
मगर मैं ख़ुदसे किसी झूठ से जुड़ा ही नहीं
बुतों ने बहुत दिखाईं तमाम ऊंची जगहें
मगर मैं हंसता रहा, झाड़ पर चढ़ा ही नहीं
-संजय ग्रोवर
26-04-2018
बुधवार, 25 अप्रैल 2018
कितने मिलते हैं मेरे दोस्त औ’ दुश्मन के ख़्याल
ग़ज़ल
या तो बेईमानी-भरी दुनिया से मैं कट जाऊं
या कि ईमान के चक्कर में ख़ुद निपट जाऊं
तुम तो चाहते हो सभी माफ़िया में शामिल हों
तुम तो चाहोगे (मैं) अपनी बात से पलट जाऊं
न मैं सौदा हूं ना दलाल न ऊपरवाला
लोग क्यों चाहते हैं उनसे मैं भी पट जाऊं
मेरे अकेलेपन को मौक़ा मत समझ लेना
किसी भी तौर नहीं होगा, सच से कट जाऊं
कितने मिलते हैं मेरे दोस्त औ’ दुश्मन के ख़्याल
यही बेहतर है इनके बीच से मैं हट जाऊं
-संजय ग्रोवर
25-04-2018
या तो बेईमानी-भरी दुनिया से मैं कट जाऊं
या कि ईमान के चक्कर में ख़ुद निपट जाऊं
तुम तो चाहते हो सभी माफ़िया में शामिल हों
तुम तो चाहोगे (मैं) अपनी बात से पलट जाऊं
न मैं सौदा हूं ना दलाल न ऊपरवाला
लोग क्यों चाहते हैं उनसे मैं भी पट जाऊं
मेरे अकेलेपन को मौक़ा मत समझ लेना
किसी भी तौर नहीं होगा, सच से कट जाऊं
कितने मिलते हैं मेरे दोस्त औ’ दुश्मन के ख़्याल
यही बेहतर है इनके बीच से मैं हट जाऊं
-संजय ग्रोवर
25-04-2018
बुधवार, 24 जनवरी 2018
उनकी ख़ूबी मुझे जब ख़राबी लगी
ग़ज़लउनकी ख़ूबी मुझे जब ख़राबी लगी
उनको मेरी भी हालत शराबी लगी
उम्र-भर उनके ताले यूं उलझे रहे
वक़्त पड़ने पे बस मेरी चाबी लगी
उनके हालात जो भी थे, अच्छे न थे
उनकी हर बात मुझको क़िताबी लगी
उनके पोस्टर पे गांधीजी चस्पां थे पर
उनके गुंडों की नीयत नवाबी लगी
मिलना-जुलना मुझे उनका अच्छा लगा
भ्रष्ट थे सबके सब, ये ख़राबी लगी
-संजय ग्रोवर
शुक्रवार, 12 जनवरी 2018
यही तो मेरा हासिल हैं
गज़ल
सुबह देर तक सोने का
आज का दिन था रोने का
09-05-2017
मिला वक़्त जब सोने का
वक़्त था सुबह होने का
माफ़िया चाहे जो कर ले
माफ़िया-सा नहीं होने का
सुबह देर तक सोने का
आज का दिन था रोने का
09-05-2017
मिला वक़्त जब सोने का
वक़्त था सुबह होने का
माफ़िया चाहे जो कर ले
माफ़िया-सा नहीं होने का
ज़िंदा रहूं दिखाने को
यह नहीं मुझसे होने का
यही तो मेरा हासिल हैं
दाग़ नहीं मैं धोने का
11-01-2018
सभी तमाशे में शामिल
इनसे क्या है होने का
09-05-2017
-संजय ग्रोवर
12-01-2018
गुरुवार, 4 जनवरी 2018
मुझमें सच्चाईयों के कांटें हैं
ग़ज़ल
आसमानों से दूर रहता हूं
बेईमानों से दूर रहता हूं
वो जो मिल-जुलके बेईमानी करें
ख़ानदानों से दूर रहता हूं
असलियत को जो छुपाना चाहें
उन फ़सानों से दूर रहता हूं
हुक़्म उदूली करुं,नहीं चाहता
हुक़्मरानों से दूर रहता हूं
मुझमें सच्चाईयों के कांटें हैं
बाग़वानों से दूर रहता हूं
प्यार के नाम पे जो चलतीं हैं
उन दुकानों से दूर रहता हूं
हिंदुओं तुम भी मुझसे दूर रहो
मुस्लमानों से दूर रहता हूं
कोई इंसान हो तो आ जाए
मैं बेगानों से दूर रहता हूं
-संजय ग्रोवर
04-01-2018
आसमानों से दूर रहता हूं
बेईमानों से दूर रहता हूं
वो जो मिल-जुलके बेईमानी करें
ख़ानदानों से दूर रहता हूं
असलियत को जो छुपाना चाहें
उन फ़सानों से दूर रहता हूं
हुक़्म उदूली करुं,नहीं चाहता
हुक़्मरानों से दूर रहता हूं
मुझमें सच्चाईयों के कांटें हैं
बाग़वानों से दूर रहता हूं
प्यार के नाम पे जो चलतीं हैं
उन दुकानों से दूर रहता हूं
हिंदुओं तुम भी मुझसे दूर रहो
मुस्लमानों से दूर रहता हूं
कोई इंसान हो तो आ जाए
मैं बेगानों से दूर रहता हूं
-संजय ग्रोवर
04-01-2018
शनिवार, 23 दिसंबर 2017
पत्थरों से न करो बोर किसी पागल को
ग़ज़ल

ये शख़्स कितना पुराना है, बुहारो कोई
अभी भी चांद पे बैठा है, उतारो कोई
दिलो-दिमाग़ में उलझा है, उलझाता है
इसकी सच्चाई में सलवट है, सुधारो कोई
पत्थरों से न करो बोर किसी पागल को
सर में सर भी है अगर थोड़ा तो मारो कोई
ये तेरी ज़ुल्फ़ है, ख़म है कि है मशीन कोई
हो कोई रस्ता तो रस्ते में उतारो कोई
कभी निहारना लगता है घूरने जैसा
न कोई घूरे तो कहते हैं निहारो कोई
-संजय ग्रोवर
23-12-2017

ये शख़्स कितना पुराना है, बुहारो कोई
अभी भी चांद पे बैठा है, उतारो कोई
दिलो-दिमाग़ में उलझा है, उलझाता है
इसकी सच्चाई में सलवट है, सुधारो कोई
पत्थरों से न करो बोर किसी पागल को
सर में सर भी है अगर थोड़ा तो मारो कोई
ये तेरी ज़ुल्फ़ है, ख़म है कि है मशीन कोई
हो कोई रस्ता तो रस्ते में उतारो कोई
कभी निहारना लगता है घूरने जैसा
न कोई घूरे तो कहते हैं निहारो कोई
-संजय ग्रोवर
23-12-2017
शुक्रवार, 22 सितंबर 2017
इंसान बनाम बेईमान
पहले वे यहूदियों के लिए आएमैं वहां नहीं मिला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वे वामपंथियों के लिए आए
मैं उन्हें नहीं मिला
क्योंकि मैं वामपंथी नहीं था
वे अब संघियों के लिए आए
मैं नहीं मिला
क्योंकि मैं संघी नहीं था
वे आए मंदिरों में, मस्ज़िदों में, गुरुद्वारों में
उन्होंने कोना-कोना छान मारा
सवाल ही नहीं था कि मैं वहां होता
वे आए औरतों के लिए, मर्दों के लिए, उभयलिंगीयों के लिए
मैं वहां होता तभी तो मिलता
मैं उन्हें ऐसी किसी जगह नहीं मिला
जहां लोग ख़ुदको ही झांसा दे रहे थे
अपने-आपसे झूठ बोल रहे थे
दूसरों का वक़्त बरबाद करके
ख़ुदको दिलासा दे रहे थे
लोगों को ग़रीब करके
ख़ुदको अमीर समझ रहे थे
भगवा, हरा, ब्राहमी
रंग लपेटे
ख़ुदको सादामिजाज़
बता रहे थे
वे ऐसी हर जगह पर गए
जहां उन्होंने सिर्फ़ ख़ुदको पाया
उन्हें पता ही नहीं था
कि लगातार
वे ख़ुदसे ही लड़ रहे थे
मैं तो न हिंदू था न मुसलमान न सिख न ईसाई
न किसीसे श्रेष्ठ
मैं तो बस इंसान था
हूं और रहूंगा
मैं तो बस स्वतंत्र था
हूं और रहूंगा
-संजय ग्रोवर
22-09-2017
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
फिर ख़रीदी तुमने मेरी ई-क़िताब
ग़ज़लें
1.
फिर ख़रीदी तुमने मेरी ई-क़िताब
मुझको ख़ुदसे रश्क़ आया फिर जनाब
06-09-2017
वाह और अफ़वाह में ढूंढे है राह
मुझको तो चेहरा तेरा लगता नक़ाब
जिसने रट रक्खे बुज़ंुर्गोंवाले ख़्वाब
उसकी समझो आसमानी हर क़िताब
ख़ाप ताज़ा शक़्ल में फिर आ गई
जो है लाया उससे क्या पूछें हिसाब
फिरसे ख़ास हाथों में ख़ासे फूल हैं
उसके नीचे आम, कांटों का अज़ाब
कौन समझेगा मैं अकसर सोचता था
तुम हो मुमक़िन वक़्त पर मुमक़िन जवाब
07-09-2017
2.
उनकी टक्कर उन्हींसे हो गई
वही बच गए, वही गिर पड़े
भीड़ थी तेरे सर में गरमी
देख कहीं अब तेरे सिर पड़े
बहुत लगाई बहुत बुझाई
ख़ुदपे आई ख़ुद ही गिर पड़े
मेरे संग ज़माना सारा
आंख में आंसू यूंही तिर पड़े
मैं उनसे बचना चाहता था
इस ख़ातिर वो मेरे सिर पड़े
07-09-2017
-संजय ग्रोवर
1.
फिर ख़रीदी तुमने मेरी ई-क़िताब
मुझको ख़ुदसे रश्क़ आया फिर जनाब
06-09-2017
वाह और अफ़वाह में ढूंढे है राह
मुझको तो चेहरा तेरा लगता नक़ाब
जिसने रट रक्खे बुज़ंुर्गोंवाले ख़्वाब
उसकी समझो आसमानी हर क़िताब
ख़ाप ताज़ा शक़्ल में फिर आ गई
जो है लाया उससे क्या पूछें हिसाब
फिरसे ख़ास हाथों में ख़ासे फूल हैं
उसके नीचे आम, कांटों का अज़ाब
कौन समझेगा मैं अकसर सोचता था
तुम हो मुमक़िन वक़्त पर मुमक़िन जवाब
07-09-2017
2.
उनकी टक्कर उन्हींसे हो गई
वही बच गए, वही गिर पड़े
भीड़ थी तेरे सर में गरमी
देख कहीं अब तेरे सिर पड़े
बहुत लगाई बहुत बुझाई
ख़ुदपे आई ख़ुद ही गिर पड़े
मेरे संग ज़माना सारा
आंख में आंसू यूंही तिर पड़े
मैं उनसे बचना चाहता था
इस ख़ातिर वो मेरे सिर पड़े
07-09-2017
-संजय ग्रोवर
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सोमवार, 28 मार्च 2016
तुम कैसे हो इससे इनको क्या लेना

मुर्दाघर की रौशन दुनिया कर देंगे
तुम जागे तो मुर्दे हत्या कर देंगे
लाशें, मोहरे, कठपुतली या भाषणबाज़
बड़ा बनाकर तुमको क्या-क्या कर देंगे
ठगों के झगड़ों में क्या सच क्या झूठ भला
ये तो बस हर रंग को धुंधला कर देंगे
तुम सोचोगे तुम्हे प्रकाशित कर डाला
चारों जांनिब घुप्प अंधेरा कर देंगे
जिनके लिए अच्छाई है सिर्फ़ अदाकारी
वो हर बढ़िया चीज़ को घटिया कर देंगे
तुम कैसे हो इससे इनको क्या लेना
सोचो तुमको घोषित क्या-क्या कर देंगे
-संजय ग्रोवर
28-03-2016
शनिवार, 23 जनवरी 2016
सनातन, हास्यास्पद और दयनीय

‘हम तुम्हे मंदिर में नहीं घुसने देंगे’
वे बोले
मैं हंसा
कुछ वक़्त ग़ुज़रा
कई लोग हंसने लगे
वे फ़िर आए और बोले-
‘हम तुम्हे मंदिर पर हंसनेवालों में शामिल नहीं करेंगे’
मैं हंसा
कुछ वक़्त और ग़ुज़रा
और कई लोग हंसे
वे फिर चले आए
अबके बोले
‘हमसे घृणा मत करो’
मैं हंसा
बोले-
‘घृणा पर हंसते हो’
मैं हंसा
वे हंसने लगे, बोले-
‘हम भी हंस सकते हैं, देखो
ज़्यादा ऊंची आवाज़ में हंस सकते हैं
हम तुम्हे अपने नये लाफ़्टर क्लब में नहीं आने देंगे’
मैं हंसा
‘तुम किसीसे प्रेम नहीं करते’
वे बोले
मैं हंसा
‘वे हमारे दुश्मन हैं’
वे बोले
मैं हंसा
‘हम तुम्हें उनमें शामिल कर देंगे’
वे बोले
‘हम सब एक हैं’
वे बोले
मेरी हंसी छूट गई
‘हम तुमसे घृणा करते हैं’
वे अंततः बोले
मैं हंसा
हंसता रहा
हंस रहा हूं
-संजय ग्रोवर
23-04-2016
बुधवार, 23 दिसंबर 2015
अब तो काई-सी जमी है बस
ग़ज़ल
वो महज़ इक आदमी है बस
और उसमें क्या कमी है बस
उम्रे-दरिया के तजुर्बों पर
अब तो काई-सी जमी है बस
आंसुओं का बह चुका दरिया
आंख में थोड़ी नमी है बस
हर बरस आता है इक तूफ़ां
जोश सारा मौसमी है बस
इन डरे लोगों के हिस्से में
इक मरी-सी ज़िंदगी है बस
-संजय ग्रोवर
वो महज़ इक आदमी है बस
और उसमें क्या कमी है बस
उम्रे-दरिया के तजुर्बों पर
अब तो काई-सी जमी है बस
आंसुओं का बह चुका दरिया
आंख में थोड़ी नमी है बस
हर बरस आता है इक तूफ़ां
जोश सारा मौसमी है बस
इन डरे लोगों के हिस्से में
इक मरी-सी ज़िंदगी है बस
-संजय ग्रोवर
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गुरुवार, 17 दिसंबर 2015
बादलों की तर्ज़ पे...
ग़ज़ल
ज़िंदगी की जुस्तजू में ज़िंदगी बन जा
ढूंढ मत अब रोशनी, ख़ुद रोशनी बन जा
रोशनी में रोशनी का क्या सबब, ऐ दोस्त!
जब अंधेरी रात आए, चांदनी बन जा
गर तक़ल्लुफ़ झूठ हैं तो छोड़ दे इनको
मैंने ये थोड़ी कहा, बेहूदगी बन जा
हर तरफ़ चौराहों पे भटका हुआ इंसान-
उसको अपनी-सी लगे, तू वो गली बन जा
कुंओं में जीते हुए सदियां गई ऐ दोस्त
क़ैद से बाहर निकल, फिर आदमी बन जा
गर शराफ़त में नहीं पानी का कोई ढंग
बादलों की तर्ज़ पे आवारगी बन जा
-संजय ग्रोवर
ज़िंदगी की जुस्तजू में ज़िंदगी बन जा
ढूंढ मत अब रोशनी, ख़ुद रोशनी बन जा
रोशनी में रोशनी का क्या सबब, ऐ दोस्त!
जब अंधेरी रात आए, चांदनी बन जा
गर तक़ल्लुफ़ झूठ हैं तो छोड़ दे इनको
मैंने ये थोड़ी कहा, बेहूदगी बन जा
हर तरफ़ चौराहों पे भटका हुआ इंसान-
उसको अपनी-सी लगे, तू वो गली बन जा
कुंओं में जीते हुए सदियां गई ऐ दोस्त
क़ैद से बाहर निकल, फिर आदमी बन जा
गर शराफ़त में नहीं पानी का कोई ढंग
बादलों की तर्ज़ पे आवारगी बन जा
-संजय ग्रोवर
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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........
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अफ़वाह
(1)
अफवाहें
(1)
अर्थ
(1)
असमंजस
(2)
असलियत
(1)
अस्पताल
(1)
अहिंसा
(3)
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