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बुधवार, 25 मार्च 2015

विचार की चोरी और इंटरनेट की नयी नैतिकता



फ़ेसबुक/इंटरनेट पर बीच-बीच में ऐसी बातें उठती रहतीं हैं कि किसीके विचार/रचना/स्टेटस चुराने में बुरा क्या
है, आखि़र हम उसके विचार फ़ैला रहे हैं, समाज को फ़ायदा पहुंचा रहे हैं, रचनाकार का काम ही तो कर रहे हैं, तो रचनाकार/विचारक को इसपर आपत्ति क्यों हो।

इंटरनेट के विस्तार से एक बहुत अच्छा काम यह हुआ/हो रहा है कि लोग दूसरों की बातें सुनते हैं और छोटी से छोटी बात पर भी विचार करने को तैयार रहते हैं। किसीकी बात बिलकुल निराधार या तर्कहीन भी हो तो उसे यह समझाने में कोई हर्ज़ नहीं कि आपकी बात तर्कहीन है।

मुझे इस बात का आज तक एक भी कारण समझ/नज़र में नहीं आया कि दूसरों की बात/विचार/रचना बिना उसके नाम के क्यों देनी चाहिए !? आपकी ऐसी कामना/लालसा/वासना जिसमें आप दूसरे को भी शामिल/इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके लिए आप कोई वाज़िब वजह तो देंगे कि नहीं देंगे !?

आखि़र रचना/विचार से जुड़े व्यक्ति का नाम देने में समस्या क्या है ? क्या उसका नाम देने के लिए आपको हिमालय की चोटी पर चढ़ना पड़ेगा ? क्या उसके लिए आपको स्पाँसर ढूंढना पड़ेगा ? क्या उसके लिए आपको कुश्ती लड़नी पड़ेगी ? क्या उसका नाम देने से आपको स्पाँडिलाइटिस हो जाएगी ? क्या उसके लिए संसद में बिल पास कराना पड़ता है ? क्या उसके लिए आपको बैंक से क़र्ज़ा लेना पड़ेगा ? क्या उसका नाम देने से महंगाई बढ़ जाएगी ? क्या उसका नाम देने से इस बार की फ़सल नष्ट हो जाएगी ? क्या नाम न देने से समाज को वह बात जल्दी समझ में आ जाएगी ?क्या उसका नाम देने के लिए आपको अगले चौक से ऑटो लाना पड़ेगा ?

आखि़र समस्या क्या है ? आखि़र रचना/विचार चुराने के लिए भी आपको एक मोबाइल/स्मार्टफ़ोन/टेबलेट/लैपटॉप/पीसी तो चाहिए ही न ? उसीमें ज़रा-सी उंगली हिलाएंगे और स्टेटस शेयर हो जाएगा। फिर यह ज़िद क्यों ?

इससे होगा यह कि एक तो असली आदमी का नाम नहीं जाएगा ; दूसरे, आपका नाम चला जाएगा। विचारक का नाम ज़रुरी नहीं है और चुरानेवाले का नाम ज़रुरी है ? चुपड़ी और दो-दो ? क्या विचार करना और चाय पीना आप एक ही बात समझते हैं ?

फिर तो चोरी, छेड़ख़ानी, लूटपाट, सेंधमारी और ज़बरदस्ती में भी क्या दिक़्क़त है ?

आपको अपने साथ कुछ भी करने की स्वतंत्रता है, मगर सबके लिए नियम आप कैसे बना सकते हैं, वो भी ऐसे मामलों में जहां दूसरा शामिल है और जहां ज़बरदस्ती हो रही है !? और आप मूल लेखक की स्वीकृति तक नहीं लेना चाहते !?

अपने साथ आदमी जो चाहे कर सकता है। किसीके पास अतिरिक्त संपत्ति है या दूसरों में बांटना चाहता है तो वह घर ख़ुला छोड़कर जा सकता है, ताले-चाबी फ़ेंक सकता है, कबाड़ी को दे सकता है ; फिर भी काम न हो तो सूचना लिखकर टांग सकता है, विज्ञापन दे सकता है कि हमारे यहां चौबीस घंटे चोरी करने की छूट है, सुविधा है, आने से पहले फ़ोन करलें तो और भी अच्छा, मैं हूंगी/हूंगा तो भी टहलने निकल जाऊंगी/गा.......

आप अपने स्टेटस लुटाने के लिए बिलकुल स्वतंत्र हैं। आप अपनी पुस्तकों के प्रकाशक से कह सकते हैं कि आपकी क़िताब आपके पड़ोसी के नाम से छाप दे, रॉयल्टी ज़रुरतमंदो को दे दे। आपको अपनी बात अपने नाम के बिना कहने में इतना आनंद होता है तो आप परदे के पीछे खड़े होकर भाषण दे सकते हैं, मास्क लगा सकते हैं, अपने विचार किसी दूसरे परफ़ॉर्मर/रनर को लिखकर दे सकते हैं ; कौन आपत्ति करेगा ?

मगर आप सारी कॉलोनी/समाज के लिए ऐसे नियम/मान्यताएं/परंपराएं बनाने की कोशिश करेंगे तो यह संभवतः कम ही लोगों को जायज़ या तर्कसंगत लगेगा।

आप क्या सोचते हैं ?

-संजय ग्रोवर
25-03-2015

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

उदारता क्या है ?


लगभग सभी धर्मों के मानने वाले यह दावा करते हैं कि धर्म इंसान को उदार, सहिष्णु और मानवीय बनाता है। मेरे मन में अकसर कुछ सवाल उठते हैं। चूंकि मैंने इन सवालों को आज तक किसी दूसरी जगह नहीं पढ़ा, इसलिए मन हुआ कि इन्हें आपके सामने रखूं। यह मेरी एकतरफा सोच हो सकती है कि ये सवाल भी व्यक्ति को उदार बनाने की दिशा में ही एक छोटा-मोटा क़दम हो सकते हैं। इसलिए आपकी राय भी इन सवालों को प्रासंगिक या अप्रासंगिक बनाएगी। बचपन से लेकर आज तक कई तरह के आस्तिकों और नास्तिकों से वास्ता रहा है। मुझ एक भी उदाहरण याद नहीं आता जब किसी नास्तिक ने किसी आस्तिक पड़ोसी पर एतराज़ किया हो, झगड़ा किया हो कि जागरन, कीर्तन या नमाज मेरे विश्वासों के खि़लाफ है इसलिए आप इसे करना बंद कर दें। हालांकि बारीकी से अध्ययन करें तो कोई दो नास्तिक या दो आस्तिक भी बिलकुल एक जैसे नहीं होते। मैंने कभी अखबार में नहीं पढ़ा या रेडियो-टी.वी. पर नहीं देखा-सुना कि नास्तिकों का कोई गुट क्रोधित होकर भागा गया हो और उसने आस्तिकों के किसी आयोजन में जाकर तोड़-फोड़ की हो। मेरे सुनने में आज तक नहीं आया कि ‘लिव इन’ करने वाले युवाओं या विवाह संस्था में विश्वास न करने वाले लोगों ने शादीशुदा लोगों पर जाकर दबाव डाला हो कि आप अपनी शादी तोड़ दें नहीं तो हम आपको पीटेंगे, आपका मुंह काला करेंगे। वेलेंटाइन मनाने वाले या प्यार करने वाले लोगों ने कभी किसी को धमकाया हो कि आप सब भी ये सब करो नहीं तो आप पागल हो, हास्यास्पद हो, समाज विरोधी हो और आप फलां मोहल्ला, शहर, देश, प्रदेश छोड़ कर चले जाओ। क्या आपने कभी सुना है कि किसी स्कर्ट या नेकर पहनने वाले ने कहा है कि कुर्त्ता-पायजामा, धोती-बंडी जैसे कपड़े अश्लील हैं, हमारे जैसे कपड़े पहनो नहीं तो हम तुम्हारे कपड़े फाड़ डालेंगे, ये-वो कर देंगे ! क्या आपने कभी सुना कि वस्त्र-विहीन आकृतियां बनाने वाले किसी पेण्टर ने या उसके समर्थकों ने वस्त्रदार पेंटिंग बनाने वालों पर आपत्ति की हो, उनकी पेंटिंग फाड़ डालीं हों ! पक्ष-विपक्ष में कई उदाहरण रखे जा सकते हैं। पर मुझे लगता है कि मेरी बात स्पष्ट हो गयी है और ज़्यादा शब्द या जगह ख़र्च करने का कोई अर्थ नहीं है।
इस लेखक की ज़िंदगी का अधिकांश हिस्सा कुर्त्ता-पायजामा/जींस, हवाई चप्पल और साइकिल के साथ बीता है पर इसे किसी के भी कुछ और पहनने-ओढ़ने-चलाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

उम्मीद है उदारता को लेकर दृष्टि विकसित करने में आप मेरी मदद करेंगे।



-संजय ग्रोवर

बुधवार, 16 सितंबर 2009

छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां


कई बार अपने या दूसरों के ब्लागस् पर अपनी या दूसरों की कुछ टिप्पणियां ऐसी लगती हैं कि मन होता है इन्हें ज़्यादा महत्व देकर ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए। ‘छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां’ ऐसी ही टिप्पणियों का मंच बन रहा है। शुरुआत पूजा प्रसाद के ब्लाग ‘जो जारी है.....’ पर आस्तिक-नास्तिक की एक दोस्ताना बहस पर की गयी अपनी ही टिप्पणी से:-


पूजाजी, बुरा मत मानिएगा, मुझे ईश्वर को मानने वालों के तर्क हमेशा ही अजीबो-गरीब लगते हैं। और उनके पीछे फिलाॅस्फी ( ) भी ऐसी ही है जो उन्हें अजीबो-गरीब ही बना सकती है। एक शेर में यह मानसिकता बखूबी व्यक्त हो गयी है -



जिंदगी जीने को दी, जी मैंने,

किस्मत में लिखा था पी, तो पी मैंने,

मैं न पीता तो तेरा लिखा ग़लत हो जाता-

तेरे लिखे को निभाया, क्या ख़ता की मैंने !



अब हम शायर महोदय से विनम्रतापूर्वक पूछें कि आपको पता कैसे लगा कि आपकी किस्मत में यही लिखा था। अगर आप न पीते तो यही समझते रहते कि आपकी किस्मत में न पीना लिखा था। क्योंकि ऐसी कोई किताब तो कहीं किसी फलक पर रखी नहीं है कि जिसे हम पहले से पढ़ लें और जान लें और घटना के बाद संतुष्टिपूव्रक मान सकें कि हां, यही लिखा था, यही हुआ। भाग्य और भगवान के नाम पर चलने वाली यह ऐसी बारीक चालाकी है जिसके तहत जो भी हो जाए, बाद में आराम से कहा जा सकता है कि हां, यही लिखा था। आखिर कोई कहां पर जाकर जांचेगा कि यह लिखा था या नहीं !?



अब कुछ उन तर्कों पर आया जाए जिनके सहारे ‘भगवान’ को ‘सिद्ध’ किया जाता है। ये तर्क कम, तानाशाह मनमानियां ज़्यादा लगती हैं। इन्हीं को उलटकर भगवान का न होना भी ‘सिद्ध’ किया जा सकता है। देखें:-

1। चूंकि लाल फूल लाल ही रहता है, इसका मतलब भगवान नहीं है।


2। चूंकि दुनिया इतने सालों से अपनेआप ठीक-ठाक चल रही है इसलिए भगवान की कोई ज़रुरत ही नहीं है यानिकि वो नहीं है।


3। चूंकि दुनिया में इतना ज़ुल्म, अत्याचार, अन्याय और असमानता है जो कि भगवान के रहते संभव ही नहीं था अतः भगवान नहीं है।


4। भगवान को मानने वालों की भी न मानने वालों की तरह मृत्यु हो जाती है, मतलब भगवान नहीं है।


5। चूंकि अपने आप सही वक्त पर दिन और रात हो जाते हैं इसलिए भगवान नहीं है। आदि-आदि....



अब यह तर्क है कि ज़बरदस्ती कि आप चाहे कुदरत कहो पर है तो वो ईश्वर......



धर्म और तर्क एक ही चीज़ है.......


कैसे पूजाजी !?


इसे और विस्तार दूंगा। तब तक आप यह पोस्ट और प्रतिक्रियाएं पढ़ें:-


क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?


एक अन्य प्रासंगिक पोस्ट ‘ईश्वर किसे पुकारे’ का लिंक भी यहां लगा रहा हूं। इसे भी पढ़ें।



-संजय ग्रोवर

शनिवार, 15 अगस्त 2009

क्या हमें ‘सच का सामना’ नहीं ‘सच का परदा’ चाहिए !?

नैतिकता पर बहस शायद आज की सबसे मुश्किल बहस है। क्योंकि ज़्यादातर लोग ‘चली आ रही नैतिकता’ पर अड़े रहते हैं, भले व्यवहार में इसका उल्टा करते हों। थोड़े-से लोग नैतिकता के नियमों को बदलने की कोशिश करते हैं। उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें पुराने नियम अमानवीय व अलोकतांत्रिक लग रहे होते हैं तो कुछेक ऐसे भी होते हैं जो व्यक्तिगत स्वार्थों या ‘नयी भीड़’में शामिल होने की खातिर ऐसा करते हैं। उनमें से कुछ की नैतिकता को लेकर अपनी एक तार्किक सोच भी हो सकती है। मुझे लगता है कि ‘जो करना वही कहना’ या ‘जो किया, कह दिया’ नैतिकता है। इस दृष्टि से मुझे ‘सच का सामना’ एक बेहद मामूली सीरियल लगता है जिसपर इतना हल्ला-गुल्ला होना हैरान करता है। मुझे याद आता है कि 25-30 साल पहले सरिता-मुक्ता जैसी आर्य-समाजी पत्रिकाओं में लगभग यही सब बातें ‘पाठकों की समस्याएं’ में बतौर प्रश्न छपा करती थीं। फ़र्क बस इतना है कि वहां पाठकों के नामों की जगह कखग वगैरह लिखा रहता था। ज़ाहिर है कि यह सब सरिता के संपादक गण अपने मन से बनाकर तो लिखते नहीं होंगे। एक दिलचस्प तथ्य मैं देख रहा हूं कि जहां भी इस कार्यक्रम पर टिप्पणी, लेख आदि आ रहे हैं हर जगह ऐतराज़ यही है कि यह सब पर्दे पर कहा क्यों जा रहा है ! ‘यह सब किया क्यों गया’ इसपर अभी तक कोई आपत्ति मेरे देखने में नहीं आयी। क्या नैतिकता यह है कि विनोद कांबली अपनी एक टीस, एक शिकायत को मन में दबाए रखकर झूठी दोस्ती बनाए रखें !? यह कैसी दोस्ती है जिसमें अपने दिल की बात दोस्त से कह देने भर का भी स्पेस नहीं !? और यह दबी हुई कुण्ठा इस दोस्ती के लिए आगे चलकर किसी और शक्ल में और ज़्यादा ख़तरनाक साबित नहीं हो सकती !? अगर एक महिला वहां जाकर झूठ बोलती है कि वह अपने पति के अलावा किसी अन्य से संबंध बनाने की ख्वाहिशमंद नहीं रही और वह झूठ पकड़ा जाता है तो सवाल यह भी तो उठता है कि क्या उस महिला को पता नहीं था कि वह ‘सच का सामना’ करने जा रही है ? वह क्यों गयीं वहां अगर उसमें सच का सामना करने की हिम्मत नहीं थी ? इसके अलावा कोई बेईमान आदमी ही यह कह सकता है कि 13-14 की उम्र तक आते-आते उसे विपरीतलिंगियों के प्रति आकर्षण होना (जिसे आज की प्रचलित भाषा में ‘क्रश आना’ कहते हैं) नहीं शुरु हो गया था। फिर हम क्यों चाहते हैं कि हम लगातार झूठ भी बोलते रहें ऊपर से अपने देश को ‘सच्चाई का पुजारी’, ‘नैतिकता की सबसे पुरानी/प्रतिष्ठत कर्मशाला’ भी कहते रहें !? या तो हम मान लें कि हम झूठे हैं। कम-अज़-कम एक यही सच बोल दें।

या फिर हम अपने सच का इस्ते माल वहीं तक करना चाहते हैं जहां तक वो हमारे झूठ का परदा बन सके !?

देश-भक्ति क्या है ?


1. कुछ देशों को गालियां बकना।


2। कुछ कौमों/सम्प्रदायों को गालियां बकना।



3। गीत गाना।



4। झण्डा फहराना।



5। पूजा-पाठ करना।



6. अपने देश के लोगों से ऊंच-नीच करना।


7। अपना काम ईमानदारी से करना।



मंगलवार, 16 जून 2009

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?


यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।


पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?


दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।


इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !


क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?


ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!


वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?

(नयी पोस्ट लगा रहा हूं इसका मतलब यह नहीं कि पिछली पोस्ट पर बहस खत्म हो गयी।)

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

पंाच पोंगे-कट्टर-मुल्ले-पंथी बनाएंगे सारे समाज का खाने-पीने-पहनने-नाचने का मैन्यू !?




सुशांत जी आप तो नाराज़ हो गए। यह क्या बात हुई कि जब आप अपने लेख का अंत ‘‘‘वहीं जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना कर रहा है।’’’ जैसे वाक्यों से करते हैं तो वो आपको बड़ी धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक-सभ्य भाषा लगती है। ऐसा क्यों, भाई ?


ऊपर से आप मुझे नयी व्यवस्था का मिशन-स्टेटमेंट बनाने को कह रहे हैं जैसे कि पिछली व्यवस्था का आपने तैयार किया था ! सारे यथास्थ्तििवादियों की तान यहीं आकर टूटती है। कल को कोई मजदूर या एन.जी.ओ किसी टाटा-बिरला के यहाँ चल रहे शोषण का विरोध करेगा तो आप तो उससे यह कहेंगे कि पहले तुम खुद टाटा-बिरला जैसा कारखाना लगाओ या उसका कोई नक्शा बनाकर दो तब विरोध करना। अपने से अलग विचारों के लोगों को आप किस तरह से जंगल में जा बैठने का आदेश जारी करते हैं जैसे सारा समाज आपका जरखरीद गुलाम हो सारे लोग आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हों और सारे देश का पट्टा आपके नाम लिखा हो। सब वही खाएं जो आप बताएं, वही पहनें जो आप कहें, वही बोलें जो आप उनके मुंह में डाल दें। वाह, कैसी हत्यारी भाषा, कितनी अहंकारी सोच (?), कितनी तानाशाह प्रवृत्ति । मगर फिर भी धार्मिक ! फिर भी आध्यात्मिक ! फिर भी सामाजिक ! फिर भी सभ्य।आप कहते हैं कि मैं कोई व्यवस्था सुझाऊँ। मैं क्यों सुझाऊं भाई !?


हां, मुझे पता है कि एक दवा मुझे अत्यधिक नुकसान पहुँचा रही है। लेकिन क्या मै उसे सिर्फ इसलिए खाता जाऊं और तारीफ करता जाऊं कि बाज़ार में उसकी वैकल्पिक दवा उपलब्ध नहीं है और मैं खुद वह दवा बनाने में सक्षम नहीं हूँ ! मैं उस दवा के ज़हरीले असरात की बाबत आवाज़ उठाऊंगा तभी तो कुछ लोग नयी दवा बनाने के बारे में सोचेगे। तभी तो वे सब लोग भी आवाज़ उठाएंगे जो इंस दवा के ज़हरीले नतीजे तो भुगतते आ रहे हैं मगर सिर्फ इसलिए चुप हैं कि उन्हें लगता है कि वे अकेले हैं और उपहास के पात्र बन जाएंगे। स्त्री-विमर्श के मामले में ही देखिए, पहले विद्वान लोग कहते-फिरते थे कि ऐसी दो-चार ही सिरफिरी औरतें हैं जो धीरे-धीरे अपने-आप ‘‘ठीक’’ हो जाएंगी, नही ंतो हम कर देंगे। अब देखिए तो कहां-कहां से कितनी-कितनी आवाज़े उठ रही हैं। आरक्षण के मसले पर आप ही जैसे विद्वानों ने पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह को पागल तक कह डाला था। मगर आज सारी पार्टियां बढ़-चढ़कर आरक्षण दे रही हैं। इण्टरनेट के आगमन को लेकर आप ही जैसे लोगों ने तमाम हाऊ-बिलाऊ मचाई। मगर सबसे ज़्यादा फायदा भी आप ही जैसे लोग उठा रहे हैं। भले ही इंस नितांत वैज्ञानिक माध्यम का दुरुपयोग अपनी अवैज्ञानिक सोच को फैलाने के लिए कर रहे हों। इसलिए किसी भी नयी चीज़ का विरोध करने से पहले यह तो तय कर लीजिए कि अंत तक आप अपने स्टैण्ड पर कायम भी रह पाएंगे या नहीं !? और इंस ग़लतफहमी में तो बिलकुल मत रहिए कि सभी आपकी तरह सोचते (?) हैं और भेड़ों की तरह आप उन्हें जहां मर्ज़ी हांक ले जाएंगे।


कोई भी व्यवस्था न तो एक दिन में बनती है और न ही कोई एक आदमी उसे बनाता है। मगर आप मुझसे ऐसी ही उम्मीद रखते हैं। आप क्या समझते हैं कि मैं भी उन दस-पाँच पोंगापंथियों और कठमुल्लों की तरह अहंकारी और मूर्ख हूँ जो खुदको इतना महान विद्वान समझते हैं कि वही सारी दुनिया के लिए खाने-पीने-नाचने-पहनने का मैन्यू तय कर सकते हैं ! मेरी रुचि ऐसी किसी गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था में है ही नहीं कि सब मेरी तरह से जीएं। अगर मेरी टांगें पतली हैं और निक्कर मुझे सूट नहीं करता तो मै यह विधान बनवाने की कोशिश करुं कि सभी मेरी तरह फुलपैंट पहनेंगे। अरे जिसको जो रुचता है वो करे। आप कौन हैं तय करने वाले। दरअसल आपको किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने की आदत ही नहीं जिसमें सबके लिए जगह हो जब तक कि वह किसी तीसरे के जीवन में नाजायज घुसपैठ न कर रहे हों। आपको सिर्फ वही व्यवस्था समझ में आती है जो या तो आपके अनुकूल पड़ती हो या मेरे ! आपके हिसाब से तो फिर सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-दमन, कन्या-भ्रूण-हत्या भी चलते रहने चाहिए थे क्योंकि फुलप्रूफ वैकल्पिक व्यवस्था तो न मेरे पास थी न आपके ! अगर सती-प्रथा हटानी है तो वैसी ही कोई और प्रथा होनी चाहिए न हमारे पास। नही तो, आपकी सोच के हिसाब से ही, सती-प्रथा का विरोध करने का हमारा कोई हक ही नहीं बनता।


कई बातें तो आप ऐसी मुझे समझा रहे हैं जो खुद आपको समझनी चाहिएं। जैसे कि फुल वाॅल्यूम पर रेडियो चलाने का उदाहरण। अपने एक पुराने व्यंग्य की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना शायद बेहतर भी होगा और कारगर भी:- ‘‘क्यों! भावनाएं क्या सिर्फ आस्तिकों की होती हैं! हमारी नहीं!? हम संख्या में कम हैं इसलिए!? दिन-रात जागरण-कीर्तन के लाउड-स्पीकर क्या हमसे पूछकर हमारे कानों पर फोड़े जाते हैं? पार्कों और सड़कों पर कथित धार्मिक मजमे क्या हमसे पूछ कर लगाए जाते हैं? आए दिन कथित धार्मिक प्रवचनों, सीरियलों, फिल्मों और गानों में हमें गालियां दी जाती हैं जिनके पीछे कोई ठोस तर्क, तथ्य या आधार नहीं होता। हमनें तो कभी नहीं किए धरने, तोड़-फोड़, हत्याएं या प्रदर्शन!! हमारी भावनाएं नहीं हैं क्या? हमें ठेस नहीं पहुँचती क्या? पर शायद हम बौद्धिक और मानसिक रुप से उनसे कहीं ज्यादा परिपक्व हैं इसीलिए प्रतिक्रिया में बेहूदी हरकतें नहीं करते।’’


बाते अभी बहुत-सी बाक़ी हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर


शनिवार, 20 दिसंबर 2008

क्या कुछ और भी है कि जिसकी पर्दादारी है..........

अभी रात की तो बात है कि एन.डी.टी.वी.इण्डिया पर हेमंत करकरे का इण्टरव्यू देखकर हटा हूँ। सुबह हर चैनल पर हाहाकार मचा है। पता चलता है कि जो उच्चाधिकारी पहले-पहल शिकार हो गए उनमें हेमंत करकरे भी थे। आपको याद हो तो ए.टी.एस. की जांच में जो राज़ खुले उनमें एक यह भी था कि ले.कर्नल प्रसाद पुरोहित को आर. डी. एक्स. की सप्लाई कश्मीर के किसी गिलानी से मिल रही थी।
आगे चलें। यानि कि थोड़ा पीछे जाएं।
जिस दिन तहलका नानावती आयोग की रपट के बाद अपने स्टिंग आॅपरेशन को लेकर एक प्रेस-कान्फ्रेंस कर रहा होता है उसी दिन दिल्ली के एक बाज़ार में दो आतंकवादी मोटर-बाइक पर आकर बम फेंक देते हैं। तहलका की प्रेस-काॅन्फ्रेंस उस में धुल जाती है।
थोड़ा और पीछे जाएं।
एक दिन देव-मूर्तियां दूध पीने लगती हैं। दूसरे दिन समुद्र का पानी मीठा हो जाता है। तीसरे दिन मरियम की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
थोड़ा विश्लेषण करें।
एक कहता है कि बाबरी मस्जिद गिरी इसलिए 93 के दंगे हुए। दूसरा कहता है कि गोधरा हुआ इसलिए गुजरात हुआ।
एक कट्टरपंथ से ही दूसरा कट्टरपंथ जस्टीफाई होता है।
एक के रहने से ही दूसरे की ‘दुकान’ चलती है।
एक कट्टरपंथ नहीं होगा तो दूसरा क्या कहकर अपना औचित्य सिद्ध करेगा ?
अगर पाकिस्तान और मुसलमान ख़त्म हो जाएं तो बहुत सारे कट्टर हिंदुओं के तो ‘रोज़गार’ ही छिन जाएंगे। यही हाल हिन्दुस्तान के साथ होने पर पाकिस्तानी कठमुल्लों का होगा।
विभिन्न धर्मों के राजनेताओं के गठजोड़ तो ‘देव’ और ‘फ़िज़ा’ जैसी नई-पुरानी फ़िल्मों में दिखाए जा चुके हैं।
पर कट्टरमुल्लाओं का क्या ?
कट्टरपंथी और कठमुल्ला को जोड़कर यह (कट्टरमुल्ला) शब्द बनाया है। जिससे कि मुझे कोई धर्मविशेष का पक्षधर न समझ ले।
तो क्या एक संभावना यह भी हो सकती है कि कट्टरमुल्लाओं का कोई अंतर्राष्ट्रीय गठजोड़ हो जो कभी-कभी एक-दूसरे से हाथ मिलाकर भी काम कर लेता हो!
क्या कट्टरपंथी ऐसे ही सारी दुनिया को तबाह करते जाएंगे।
अगर हमें सचमुच देश की और मानवता की चिंता है तो हमें इन सवालों से भी दो-चार होना चाहिए।
अगर हमें सिर्फ नारेबाज़ी, अफ़वाहबाज़ी, तोड़-फोड़ और षड्यंत्रबाज़ी ही करनी है तो बात और है।
-संजय ग्रोवर

रविवार, 30 नवंबर 2008

जब किसी से कोई गिला रखना.......सामने अपने आईना रखना....






मित्रों, उम्मेद सिंह जी नाराज़ हैं कि जिन गांधीजी ने पाकिस्तान बनने दिया(हालांकि मैंने तो यह सुना है कि गांधी जी ने कहा था कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा) उनका ज़िक्र मैंने ऐसे वक़्त पर क्योंकर किया। या शायद ज़िक्र ही क्यों किया। बहुत से मित्रों को गांधीजी से तरह-तरह की नाराज़गियां हैं। मैं उनकी नाराज़गियों का सम्मान करता हूँ। मगर सवालचंद के मन को कई तरह के सवाल मथ रहे हैं। मैं उनका भी सम्मान करता हूँ। पहला सवाल आता है कि जिन लोगों का ‘‘मुस्लिम-प्रेम’’( और अब ‘‘क्रिश्चियन प्रेम’’ भी ) सारा देश देखता आ रहा है, वे लोग, अगर पाकिस्तान न बनता तो, मुस्लिमों को कहाँ रखते और किस हाल में रखते। कोई मानवतावादी पाकिस्तान बनने पर आपत्ति करे या दुखी हो तो समझ में भी आता है। मगर हर दूसरे धर्म को बल्कि अपने ही धर्म के लोगों को अछूत बताकर उनसे वहशियाना व्यवहार करने वाले, अपने ही देश के लोगों को बिहारी कहकर भगाने वाले लोगों का ऐसा दुख, स्वांग ही ज़्यादा लगता है। वे कौन लोग थे जो मुसलमानों के साथ बैठकर शायरी भी करते थे, उनसे उर्दू भी सीखते थे और अपने घरों में उनके खाने के बर्तन अलग भी रखते थे। जो दोस्तों के साथ ऐसी छुआछूत बरतते हो वो दुश्मनों के साथ क्या करते हांेगे। हाँ, यह बात ज़रुर सोचने की है कि वे सिर्फ़ हिन्दू ही थे या हिन्दूओं में से भी कोई वर्ग-विशेष था!

दूसरा सवाल आता है कि श्री गोडसेजी ने गाँधीजी को ही गोली क्यों मारी ? क्या गांधीजी का किया उससे भी बुरा था जो अंग्रेज कर रहे थे !? आदरणीय श्री गोडसेजी ने किसी अंग्रेज को गोली क्यों नहीं मारी? सालों-साल वे देश के आज़ाद होने का इंतज़ार करते रहे।क्या गोडसेजी को पहले से पता था कि एक दिन गांधी जी पाकिस्तान ‘बनाएंगे’ और तभी मैं उनको गोली मारुंगा। एक दिन जब देश आज़ाद हो गया तो वे गए और एक निहत्थे बूढे़ को जिसके आस-पास कोई सिक्योरिटी-फ़ोर्स भी नहीं हुआ करती थी, झोले में से पिस्तौल निकालकर गोली मार दी। क्या इसी प्रकार की बहादुरी की हमें आदत पड़ चुकी है ! अभी-अभी हमने देखा कि अपने ही देश के, निहत्थे, कमज़ोर और ग़रीब बिहारियों को आए दिन पीटने वाले नए और पुराने शिवसैनिक, विदेशी आतंकियों के मृत्यु-तांडव के वक्त, बजाय कुछ करने के, किस तरह मुम्बई की सड़कों से अन्तध्र्यान हो गए। आखिरकार तो, हमेशा की ही तरह हमारे जांबाज़ सिपाहियों ने ही देश को बचाया।

अपनी प्रतिक्रिया में आपने गांधीजी के संदर्भ में धर्मनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल जिस तरह से किया है वह एक बहुत बड़ी राहत की बात है। अन्यथा कट्टरपंथी तो धर्मनिरपेक्ष, नास्तिक और मानवाधिकार जैसे शब्दों का इस्तेमाल लगभग गाली की तरह करते हैं। सवालचंद पूछता है कि जब लौह-पुरुष श्री आडवाणीजी ने श्री जिन्ना को ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ कहा तो उनके यहां इतना वबाल क्यों मच गया ! उन्होने श्री जिन्ना की तारीफ़ की थी या बुराई ?
मित्रों, सवाल बहुत से हैं। सवालचंद धीरे-धीरे उन्हें आपके सामने रखेगा। फ़िलहाल वक़्त एक होकर कुछ करने का है। लेकिन डर और आक्रोश हमारे विवेक को इतना भी न हर लें कि हम फ़िर वही सब उपचार करने लगें जिनसे बीमारी पैदा हुई थी। याकि बीमारी को ही स्वास्थ्य न समझने लगें।

अंत में 30-11-2008 के रा. सहारा में विभांशु दिव्याल के काॅलम ‘समाज’ से आखिर के दो पैरा आपके साथ बांटना चाहूंगा (ऊपर दाएं कोने में देखें)
अपनी एक ग़ज़ल भी तो याद आती है:-

किस आसमां में उड़ता और किस ज़मीं पे सोता/
उम्मीद नहीं होती तो मैं भी नहीं होता //

कुदरत ने जानी होती गर आदमी की फितरत/
आकाश जहाँ पर है पाताल वहीं होता //

इस मुल्क में अमन की कुछ ऐसी कहानी है/
अन्जाम तो है जिसमें उन्वान नहीं होता//

गर हमने ठीक तरह कुछ काम किए होते /
तो काम उनका इतना आसान नहीं होता//

गर मैं भी उनकी तरह चेहरे बदल के हंसता/
तो मुझपे बेरुखी का इल्ज़ाम नहीं होता//

हिन्दू हैं मुसलमां हैं सिख और फिरंग सब हैं/
बस आज की दुनिया में इन्सान नहीं होता//
-संजय ग्रोवर






देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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