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बुधवार, 24 जनवरी 2018

उनकी ख़ूबी मुझे जब ख़राबी लगी

ग़ज़ल

उनकी ख़ूबी मुझे जब ख़राबी लगी
उनको मेरी भी हालत शराबी लगी

उम्र-भर उनके ताले यूं उलझे रहे
वक़्त पड़ने पे बस मेरी चाबी लगी

उनके हालात जो भी थे, अच्छे न थे
उनकी हर बात मुझको क़िताबी लगी

उनके पोस्टर पे गांधीजी चस्पां थे पर
उनके गुंडों की नीयत नवाबी लगी



मिलना-जुलना मुझे उनका अच्छा लगा 
भ्रष्ट थे सबके सब, ये ख़राबी लगी

-संजय ग्रोवर



सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

....और देश बच गया!


....और देश बच गया!
तीन दिन पहले भी बचा था। तीन दिन बाद फिर बचेगा। 47 में बचा। 77 में बचा। 2004 में बचा। 2009 में बचा। रामलीला ग्राउंड में बचा। जंतर-मंतर पे बचा।
आए दिन बचता है।
बचानेवाले बदल जाते हैं, देश वही रहता है।
बच-बचाकर काट रहा है किसी तरह।
इतनी गुज़र गयी, बाक़ी भी गुज़र जाएगी।
× × ×
लो, यह रखा है देश, आओ और बचा लो।
जो बचाएगा, उसीका हो जाएगा।
कोई भी बचा सकता है।
जिनसे इसे बचाना चाहिए, वे भी।
× × ×
भीड़ बहुत थी।
हर कोई देश बचाना चाहता था, किसी भी क़ीमत पर।
मगर देश कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।
मुझे मिल गया, अंधेरे कोने में, हांफ़ता-कांपता।
‘क्या हुआ !?’
‘कुछ नहीं, बचाने वालों से बचके खड़ा हूं।’
× × ×
मांग उठ रही है कि देश को राजनेताओं से बचना चाहिए।
संशय उठ रहा है कि यह भी नज़र बचाकर की जाने वाली राजनीति है।
यहां ‘बच-बचके कबड्डी खेलना’ वाला मुहावरा याद आ सकता है।
× × ×
अगर देश न बचता तो क्या होता !
फुर्र ! छूमंतर !
क्या एकदम से उड़ जाता ? कपूर की तरह !
भाप की तरह ग़ायब हो जाता !
या उतना और वैसा फिर भी बचा रहता जितना और जैसा आज है !
क्या बचने और न बचने में कोई फ़र्क़ है या सब मन का वहम है !


-संजय ग्रोवर

रविवार, 2 सितंबर 2012

सांप्रदायिक टांगों पर धर्मनिरपेक्ष सिर!



पिछले कुछ दिनों से एक बहस को रह-रहकर सर उठाते देखता हूं। सुनने में हर मानवतावादी को यह बहुत भली दिखाई पड़ेगी। मुद्दा है कि क्या किसी ग़ैर-धर्मनरपेक्ष व्यक्ति को हमारे जैसे देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए!? बिना हिचक कम लोग ही इसका समर्थन कर पाएंगे मगर क्या विद्वजन पर्याप्त गहराई में जा रहे हैं ? पहली बार यह बहस पूरे ज़ोर-शोर से शायद तब उठी थी जब चुनाव आडवाणी और अटलबिहारी वाजपेयी के बीच होना था। अटल जी चुन लिए गए। बहुत-से लोगों ने राहत की सांस ली। मगर यह सांस ज़्यादा देर तक नहीं चली। गोधरा हो गया। धर्मनिरपेक्ष अटल जी के होते हो गया। फ़िर गुजरात हो गया। वह भी अटल जी के होते हो गया। हिंदू-हृदय-सम्राट का उत्थान और विकास धर्मनिरपेक्ष अटल जी के होते हुआ। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि देश और समाज क्या केवल छवियों के आधार पर चलेंगे !? चल सकते हैं क्या ? अटल जी अपनी इमेज के चलते प्रधान बने मगर उस वक्त भाजपा की जीत का आधार किसने बनाया था? अच्छा था, बुरा था, गर्वनाक था कि शर्मनाक था, इसपर अलग-अलग राय हो सकती है, मगर इससे कौन इंकार कर सकता है कि यह आधार आडवाणी ने बनाया था और लोगों का मानना था कि यह सांप्रदायिकता फ़ैलाकर बनाया गया था। ऐसे में क्या अटल जी से इस नैतिकता की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए थी कि ऐसे किसी भी आधार पर बनी सरकार का मुखिया बनने से इंकार कर देते ! या फ़िर वे धर्मनिरपेक्षता पर की गयी अपनी मेहनत के बूते जीते होते! यह भी कमाल है कि उनकी छवि अंत तक धर्मनिरपेक्ष की बनी रही !!

इतने कम वक्फ़े में इतिहास ख़ुदको दोहराएगा कि नहीं, यह तो पता नहीं मगर बहसें फ़िर उसी मिजाज़ की हवा में टहल रहीं हैं। क्या यह कोई पूछने या बताने की बात है कि इस बार भी अगर भाजपा जीतती है या बड़ा दल बनती है तो किस वजह से बनेगी!? लेकिन सर पर बिठा दी जाएंगी जेटली, सुषमा या नीतिश की छवियां ! (यहां तक कि पिछली बार सांप्रदायिक और खलनायक बताए गए आडवाणी भी आज मोदी के मुक़ाबले धर्मनरपेक्ष माने जा रहे हैं!) क्या इसे न्याय या ईमानदारी कहेंगे? और छवियों के होते भी असलियत अपना काम करती रहती है, ऊपर लिख चुका हूं।

यूं आजकल अकसर यह भी पढ़ने को मिल जाता है कि कथित श्रेष्ठ जातियां कथित छोटी जातियों को अकसर इसी तरह इस्तेमाल करतीं  हैं और महत्वपूर्ण पदों पर उन्हें एक हद से आगे नहीं बढ़ने देतीं।

मेरी विशेष रुचि न तो मोदी में है न जेटली में न किसी और में, पर बहस तो सही मुद्दे पर होनी चाहिए।

-संजय ग्रोवर


गुरुवार, 28 जून 2012

इमेज बड़ी चीज़ है, मुंह ढंक के सोईए


लघु-व्यंग्य-कथा 





सुनो रिश्ता भेजा है उन्होंने, कह रहे हैं लड़के ने जो किया उसपर बड़े शर्मिंदा हैं, एक मौका दे दो पाप धोने का....

अजी, थोड़ी शर्म तो करो कहते हुए ! उसी कमीने बलात्कारी से शादी !!
कह रहे हैं छोटे से नही ंतो बड़े से कर दो, कुछ तो प्रायश्चित होगा...

एक ही ख़ानदान के हैं कमीने। उनमें क्या फ़र्क़ होना है !?

नहीं, नहीं, बड़ा काफ़ी उदारवादी स्वभाव का है। मेरा पुराना मिलना-जुलना है उससे।

ऐसी क्या उदारता दिख गयी तुम्हे उसमें ?

अरे बड़ा समझदार है, कहता है बलात्कार तो मूर्ख करते हैं, मेरे पास तो औरतें ख़ुद चलके आतीं हैं....

मतलब !? अजीब ही बात बता रहे हो आप तो ! पीछे एक रिश्ता आया था, लड़का कहता था जब मैं लोगों को अहिंसक तरीके से डराकर अपने काम निकाल सकता हूं तो मुझे हिंसा करने की क्या ज़रुरत ?

अरे नहीं, बड़ा सयाना है बड़ा भाई। सभ्यता, सुशीलता, व्यवहारिकता सब अच्छे से समझता है। कहता है कि देखिए साहब, एक आदमी रात में किसीके घर में घुसता है सामान चुराने, तो वह चोर या डाकू कहलाता है। वही आदमी अगर थोड़ा धैर्य धारण करना सीख ले, ज़रा-सी वाक्पटुता सीख ले, लोगों में किसी तरह यह विश्वास पैदा कर दे कि वह उनके सारे सही-ग़लत काम पलक झपकते करवा सकता है, और बाबाजी बनके कहीं डेरा जमा ले तो लोग तो ख़ुद ही भागे चले आते हैं अपने-आपको ठगवाने के लिए।

मेरे पल्ले ना पड़ रही आज आपकी बातें।

अगले की इमेज ऐसी है कि औरतें मक्खियों सी भिनकती हैं। पूरे दिन काम आता है औरतों के। बता रहा था कि कई दफ़ा कई औरतों के कई काम इसी छोटे भाई से करा देता हूं। न छोटे को पता लगने देता हूं न औरतों को। मुझे लगा कि ऐसा कहते समय एक आंख भी दबाई थी उसने...

लगा क्या, दबाई ही होगी ?

अरे पता नहीं, ईश्वर ने चेहरा-मोहरा कुछ ऐसा रचा है अगले का कि पता ही नहीं चलता दबाई कि नहीं दबाई....

कैसा गोल-मोल कर रहे हो मामले को ! दोनों भाईयों का चरित्तर तो फिर एक जैसा ही हुआ ना ?

इमेज तो अलग-अलग है ना। चरित्तर को कौन पूछता है ? देखा नहीं कैसे राधेलाल दस साल अपने पल्ले से लगाके चुपचाप औरतों के लिए काम करता रहा। एक दिन उसीकी बचाई चार औरते अपने उत्पीड़कों के साथ हो गयीं और राधेलाल को झूठा फंसा दिया....

कोई मजबूरी रही होगी औरतों की ! शायद किसीने डराया हो ? औरतों को तो समाज के साथ चलना होता है, तीज-त्यौहार, रीति-रिवाज करने होते हैं। सभी राधेलाल की तरह सब कुछ छोड़-छाडके तो नहीं रह सकते ना.....

जो भी हो, जब राधेलाल सब तरफ़ से हार गया, कोई समझनेवाला नहीं मिला तो एक दिन धैर्य खो बैठा और बहसबाज़ी के दौरान गर्मा-गर्मी में उनमें से एक पर हाथ छोड़ बैठा। अब कौन पूछता है उसके दस साल के चरित्तर को ? अब तो हर कोई कहता है, देखो जा रहा है औरतों का दुश्मन, हत्यारा, शोषक......अब इमेज तो गयी न उसकी ! चरित्तर को लेके चाटेगा अब ?

लोग इतने ही मूर्ख होते हैं क्या !?

मूर्ख ही नहीं, कई शातिर भी होते हैं उनमें। एक तीर से दो शिकार करते हैं। एक तरफ़ राधेलाल की इमेज का कुंडा हुआ दूसरी तरफ़ इसी उदाहण का उपयोग औरतों की इमेज ख़राब करने में भी कर रहे हैं कि देखो कैसी अहसान फ़रामोश होतीं हैं औरतें, अपनी मदद करनेवाले राधेलाल की क्या दुर्गति कर दी...



तो जनाब बहस जारी है। इंटरनेट पर, अख़बारों में, टी.वी. चैनलों पर......
शादी चाहे आक्रामक बलात्कारी से हो या उदारवादी आखेटक से, एक बात पक्की है कि अगर यहां रिश्ता होता है तो लड़की जाएगी उसी घर में और झेलेगी भी दोनों भाईयों को।
क्या कहा ? कोई और घर !
फ़िर आप ही कहते हैं कि सब घर उसीके बनाए हुए हैं!


-संजय ग्रोवर


रविवार, 5 दिसंबर 2010

एक ही डिब्बी के

‘ओए, जो हमारे दल का नहीं
देशद्रोही है,
पीट-पीटकर मार डालूंगा’
इक्कू ने कहा

‘स्साल्ले ! हमारी हां में हां नहीं मिलाता !
सांप्रदायिक घोषित कर दूंगा
गाली देकर भगा दूंगा
नहीं मानेगा तो गोली भी चलवा दूंगा’
यह आया दुक्कू

तिक्कू की बात और भी मज़ेदार
‘हमारे गुट में नहीं आएगा
तो गुटबाज़ घोषित कर दूंगा’

हंसें तो फ़ंसें आप
ये सब तो हैं बहुत गंभीर

अभी देखना आएंगे कुछ हाथ
कुछ वाद कुछ पंथ कुछ संघ
कुछ खुले कुछ तंग
कुछ ये कुछ वो.. (उफ़ !)

इनसे खेलेंगे
इन्हें फ़ेंटेंगे
इन्हें फ़ेंकेंगे
तुरुप बनाएंगे

खेलते-खेलते
अंततः थक जाएंगे

इन्हें समेटकर
डाल देंगे एक डिब्बी में

और पता है फिर वे क्या करेंगे !
जाकर वे भी किसी डिब्बी में सो जाएंगे

आप हंसें तो फ़ंसें
सोचें तो सिर नोचें

चलिए आप और हम
उस डिब्बी का पता लगाएं

पर उसके लिए
हमें डिब्बी से बाहर निकलना होगा !

-संजय ग्रोवर

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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