मंगलवार, 26 मई 2009

आध्यात्मिकता अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.


जावेद अख्तर को मैं जब भी देखता-सुनता हूं, खुश भी होता हूं, हैरान भी। चाहे कोई रिएलिटी शो हो या कोई डिबेट। किस साहस और तार्किकता के साथ यह आदमी अपनी बात रखता है। तिसपर अंदाज़े-बयां ! ग़ज़ब ! अभी-अभी मैंने भाई अशोक कुमार पाण्डेय के ब्लाग पर उनका यह व्याख्यान पढ़ा। मुझे लगा कि अगर मुझमें ज़रा-सी भी मानवता, सामाजिकता, व्यवहारिकता और देशप्रेम है तो मुझे तुरंत ही इसे अपने ब्लाग पर पोस्ट करना चाहिए। ‘कबाड़खाना’ http://kabaadkhaana.blogspot.com से इसे मैं साभार ले रहा हूं।


Tuesday, May 26, 2009

आध्यात्मिकता अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है
हमारे समय के बड़े कवि-कहानीकार श्री कुमार अम्बुज ने मेल से यह ज़बरदस्त और ज़रूरी दस्तावेज़ भेजा है. बहुत सारे सवाल खड़े करता जावेद अख़्तर का यह सम्भाषण इत्मीनान से पढ़े जाने की दरकार रखता है. इस के लिए श्री कुमार अम्बुज और डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का बहुत बहुत आभार. (जावेद अख्तर के इण्डिया टुडे कॉनक्लेव में दिनांक 26 फरवरी, 2005 को ‘स्पिरिचुअलिटी, हलो ऑर होक्स’ सत्र में दिए गए व्याख्यान का डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद)मुझे पूरा विश्वास है देवियों और सज्जनों कि इस भव्य सभा में किसी को भी मेरी स्थिति से ईर्ष्या नहीं हो रही होगी. श्री श्री रविशंकर जैसे जादुई और दुर्जेय व्यक्तित्व के बाद बोलने के लिए खड़ा होना ठीक ऐसा ही है जैसे तेंदुलकर के चमचमाती सेंचुरी बना लेने के बाद किसी को खेलने के लिए मैदान में उतरना पड़े. लेकिन किन्हीं कमज़ोर क्षणों में मैंने वादा कर लिया था. कुछ बातें मैं शुरू में ही साफ कर देना चाहता हूं. आप कृपया मेरे नाम –जावेद अख्तर- से प्रभावित न हों. मैं कोई रहस्य उजागर नहीं कर रहा. मैं तो वह बात कह रहा हूं जो मैं अनेक बार कह चुका हूं, लिखकर, टी वी पर या सार्वजनिक रूप से बोलकर, कि मैं नास्तिक हूं. मेरी कोई धार्मिक आस्थाएंनहीं हैं. निश्चय ही मैं किसी खास किस्म की आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं करता. खास किस्म की!एक और बात! मैं यहां बैठे इस भद्र पुरुष की आलोचना करने, इनका विश्लेषण करने, या इन पर प्रहार करने खड़ा नहीं हुआ हूं. हमारे रिश्ते बहुत प्रीतिकर और शालीन हैं. मैंने हमेशा इन्हें अत्यधिक शिष्ट पाया है. मैं तो एक विचार, एक मनोवृत्ति, एक मानसिकता की बात करना चाहता हूं, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं.मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब राजीव ने इस सत्र की शुरुआत की, एक क्षण के लिए मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह पर आ गया हूं. इसलिए कि अगर हम कृष्ण, गौतम और कबीर, या विवेकानन्द के दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं तो मुझे कुछ भी नहीं कहना है. मैं इसी वक़्त बैठ जाता हूं. मैं यहां उस गौरवशाली अतीत पर बहस करने नहीं आया हूं जिस पर मेरे खयाल से हर हिन्दुस्तानी को, और उचित ही, गर्व है. मैं तो यहां एक सन्देहास्पद वर्तमान पर चर्चा करने आयाहूं.इण्डिया टुडे ने मुझे बुलाया है और मैं यहां आज की आध्यात्मिकता पर बात करने आया हूं. कृपया इस आध्यात्मिकता शब्द से भ्रमित न हों. एक ही नाम के दो ऐसे इंसान हो सकते हैं जो एक दूसरे से एकदम अलग हों. तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की. रामानंद सागर ने टेलीविज़न धारावाहिक बनाया. रामायण दोनों में है, लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुलसीदास और रामानंद सागर को एक करके देख लेना कोई बहुत अक्लमन्दी का काम होगा. मुझे याद आता है कि जब तुलसी ने रामचरितमानस रची, उन्हें एक तरह से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था. भला कोई अवधी जैसी भाषा में ऐसी पवित्र पुस्तक कैसे लिख सकता है? कभी-कभी मैं सोचता हूं कि किसम-किसम के कट्टरपंथियों में, चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के क्यों न हों, कितनी समानता होती है! 1798 में, आपके इसी शहर में, शाह अब्दुल क़ादिर नाम के एक भले मानुस ने पहली बार क़ुरान का तर्ज़ुमा उर्दू में किया. उस वक़्त के सारे उलेमाओं ने उनके खिलाफ एक फतवा ज़ारी कर डाला कि उन्होंने एक म्लेच्छ भाषा में इस पवित्र पुस्तक का अनुवाद करने की हिमाक़त कैसे की! तुलसी ने रामचरितमानस लिखी तो उनका बहिष्कार किया गया. मुझे उनकी एक चौपाई याद आती है :”धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ जौलाहा कहौ कोऊ.काहू की बेटी सौं बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारन सोऊ..तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु कोऊ.मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबो एकू न दैबो को दोऊ..”रामानंद सागर ने अपने धारावाहिक से करोड़ों की कमाई की. मैं उन्हें कम करके नहीं आंक रहा लेकिन निश्चय ही वे तुलसी से बहुत नीचे ठहरते हैं. मैं एक और उदाहरण देता हूं. शायद यह ज़्यादा स्पष्ट और उपयुक्त हो. सत्य की खोज में गौतम महलों से निकले और जंगलों में गए. लेकिन आज हम देखते हैं कि वर्तमान युग के गुरु जंगल से निकलते हैं और महलों में जाकर स्थापित हो जाते हैं. ये विपरीत दिशा में जा रहे हैं. इसलिए हम लोग एक ही प्रवाह में इनकी बात नहीं कर सकते. इसलिए, हमें उन नामों की आड़ नहीं लेनी चाहिए जो हर भारतीय के लिए प्रिय और आदरणीय हैं. जब मुझे यहां आमंत्रित किया गया तो मैंने महसूस किया कि हां, मैं नास्तिक हूं और किसी भी हालत में बुद्धिपरक रहने की कोशिश करता हूं. शायद इसीलिए मुझे बुलाया गया है. लेकिन, उसी क्षण मैंने महसूस किया कि एक और खासियत है जो मुझमें और आधुनिक युग के गुरुओं में समान रूप से मौज़ूद है. मैं फिल्मों के लिए काम करता हूं. हममें काफी कुछ एक जैसा है. हम दोनों ही सपने बेचते हैं, हम दोनों ही भ्रम-जाल रचते हैं, हम दोनों ही छवियां निर्मित करते हैं. लेकिन एक फर्क़ भी है. तीन घण्टों के बाद हम कहते हैं – “दी एण्ड, खेल खत्म! अपने यथार्थ में लौट जाइए.” वे ऐसा नहीं करते. इसलिए, देवियों और सज्जनों मैं एकदम स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यहां उस आध्यात्मिकता के बारे में बात करने आया हूं जो दुनिया के सुपरमार्केट में बिकाऊ है. हथियार, ड्रग्स और आध्यात्मिकता ये ही तो हैं दुनिया के तीन सबसे बड़े धन्धे. लेकिन हथियार और ड्रग्स के मामले में तो आपको कुछ करना पड़ता है, कुछ देना पड़ता है. इसलिए वह अलग है. यहां तो आप कुछ देते भी नहीं.इस सुपर मार्केट में आपको मिलता है इंस्टैण्ट निर्वाण, मोक्ष बाय मेल, आत्मानुभूति का क्रैश कोर्स – चार सरल पाठों में कॉस्मिक कांशियसनेस. इस सुपर मार्केट की चेनें सारी दुनिया में मौज़ूद हैं, जहां बेचैन आभिजात वर्गीय लोग आध्यात्मिक फास्ट फूड खरीद सकते हैं. मैं इसी आध्यात्मिकता की बात कर रहा हूं.प्लेटो ने अपने डायलॉग्ज़ में कई बुद्धिमत्तापूर्ण बातें कही हैं. उनमें से एक यह है कि किसी भी मुद्दे पर बहस शुरू करने से पहले शब्दों के अर्थ निश्चित कर लो. इसलिए, हम भी इस शब्द- ‘आध्यात्मिकता’ का अर्थ निश्चित कर लेने का प्रयत्न करते हैं. अगर इसका अभिप्राय मानव प्रजाति के प्रति ऐसे प्रेम से है जो सभी धर्मों, जतियों, पंथों, नस्लों के पार जाता है, तोमुझे कोई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं उसे मानवता कहता हूं. अगर इसका अभिप्राय पेड़-पौधों, पहाड़ों, समुद्रों, नदियों और पशुओं के प्रति, यानि मानवेत्तर विश्व से प्रेम से है, तो भी मुझे क़तई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं इसे पर्यावरणीय चेतना कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का मतलब विवाह, अभिभावकत्व, ललित कलाओं, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रति हार्दिक सम्मान का नाम है? मुझे भला क्या असहमति हो सकती है श्रीमान? मैं इसे नागरिक ज़िम्मेदारी कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ अपने भीतर उतरकर स्वयं की ज़िन्दगी का अर्थ समझना है? इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मैं इसे आत्मान्वेषण या स्व-मूल्यांकन कहता हूं. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ योग है? पतंजलि कीकृपा से, जिन्होंने हमें योग, यम, यतम, आसन, प्राणायाम के मानी समझाए, हम इसे किसी भी नाम से कर सकते हैं. अगर हम प्राणायाम करते हैं, बहुत अच्छी बात है. मैं इसे हेल्थ केयर कहता हूं. फिजीकल फिटनेस कहता हूं. तो अब मुद्दा सिर्फ अर्थ विज्ञान का है. अगर यही सब आध्यात्मिकता है तो फिर बहस किस बात पर है? जिन तमाम शब्दों का प्रयोग मैंने किया है वे अत्यधिक सम्मानित और पूरी तरह स्वीकार कर लिए गए शब्द हैं. इनमें कुछ भी अमूर्त या अस्पष्ट नहीं है. तो फिर इस शब्द- आध्यात्मिकता- पर इतनी ज़िद क्यों? आखिर आध्यात्मिकता शब्द में ऐसा क्या है जो इन शब्दों में नहीं सिमट आया है? वो ऐसा आखिर है क्या?पलटकर कोई मुझी से पूछ सकता है कि आपको इस शब्द से क्या परेशानी है? क्यों मैं इस शब्द को बदलने, त्यागने, छोड़ देने, बासी मान लेने का आग्रह कर रहा हूं. आखिर क्यों? मैं आपको बताता हूं कि मेरी आपत्ति किस बात पर है. अगर आध्यात्मिकता का अर्थ इन सबसे है तो फिर बहस की कोई बात नहीं है. लेकिन कुछ और है जो मुझे परेशान करता है. शब्द कोष में आध्यात्मिकता शब्द, -स्पिरिचुअलिटी- की जड़ें आत्मा, स्पिरिट में हैं. उस काल में जबइंसान को यह भी पता नहीं था कि धरती गोल है या चपटी, तब उसने यह मान लिया था कि हमारा अस्तित्व दो चीज़ों के मेल से निर्मित है. शरीर और आत्मा. शरीर अस्थायी है. यह मरणशील है. लेकिन आत्मा, मैं कह सकता हूं, बायोडिग्रेडेबल है. आपके शरीर में लिवर है, हार्ट है, आंतें हैं, दिमाग है. लेकिन क्योंकि दिमाग शरीर का एक हिस्सा है और मन दिमाग के भीतर रहता है, वह घटिया है क्योंकि अंतत: शरीर के साथ दिमाग का भी मरना निश्चित है. लेकिन चिंता न करें, आप फिर भी नहीं मरेंगे, क्योंकि आप तो आत्मा हैं और क्योंकि आत्मा परम चेतस है, वह सदा रहेगी, और आपकी ज़िन्दगी में जो भी समस्याएं आती हैं वे इसलिए आती हैं कि आप अपने मन की बात सुनते हैं. अपने मन की बात सुनना बन्द कर दीजिए.. आत्मा की आवाज़ सुनिए – आत्मा जोकॉस्मिक सत्य को जानने वाली सर्वोच्च चेतना है. ठीक है. कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि पुणे में एक आश्रम है, मैं भी वहां जाया करता था. मुझे वक्तृत्व कला अच्छी लगती थी. सभा कक्ष के बाहर एक सूचना पट्टिका लगी हुई थी: “अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़ कर आएं”. और भी गुरु हैं जिन्हें इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं होता है कि आप जूते बाहर नहीं छोड़ते. लेकिन दिमाग?.....नहीं.अब, अगर आप अपना दिमाग ही बाहर छोड़ देते हैं तो फिर क्या होगा? आपको ज़रूरत होगी ऐसे गुरु की जो आपको चेतना के अगले मुकाम तक ले जाए. वह मुकाम जो आत्मा में कहीं अवस्थित है. वह सर्वोच्च चेतना तक पहुंच चुका है. उसे परम सत्य ज्ञात है. लेकिन क्या वह आपको बता सकता है? जी नहीं. वह आपको नहीं बता सकता. तो, अपना सत्य आप खुद ढूंढ सकेंगे?. जी नहीं. उसके लिए आपको गुरु की सहायता की ज़रूरत होगी. आपको तो उसकी ज़रूरत होगी लेकिनवह आपको इस बात की गारण्टी नहीं दे सकता कि आपको परम सत्य मिल ही जाएगा... और यह परम सत्य है क्या? कॉस्मिक सत्य क्या है? जिसका सम्बन्ध कॉस्मॉस यानि ब्रह्माण्ड से है? मुझे तो अब तक यह समझ में नहीं आया है. जैसे ही हम अपने सौर मण्डल से बाहर निकलते हैं, पहला नक्षत्र जो हमारे सामने आता है वह है अल्फा सेंचुरी, और वह हमसे केवल चार प्रकाश वर्ष दूर है. उससे मेरा क्या रिश्ता बनता है? क्यों बनता है?तो, राजा ने ऐसे कपड़े पहन रखे हैं जो सिर्फ बुद्धिमानों को ही दिखाई देते हैं. और राजा लगातार बड़ा होता जा रहा है. और ऐसे बुद्धिमानों की संख्या भी निरंतर बढती जा रही है जिन्हें राजा के ये कपड़े दिखाई दे रहे हैं और जो उनकी तारीफ करते हैं. मैं सोचता था कि आध्यात्मिकता दरअसलधार्मिक लोगों की दूसरी रक्षा पंक्ति है. जब वे पारम्परिक धर्म से लज्जित अनुभव करने लगते हैं, जब यह बहुत चालू लगने लगता है तो वे कॉस्मॉस या परम चेतना के छद्म की ओट ले लेते हैं. लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है. इसलिए कि पारम्परिक धर्म और आध्यात्मिकता के अनुयायीगण अलग-अलग हैं. आप ज़रा दुनिया का नक्शा उठाइए और ऐसी जगहों को चिह्नित कीजिए जो अत्यधिक धार्मिक हैं -चाहे भारत में या भारत के बाहर- एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप.... कहीं भी. आप पाएंगे कि जहां-जहां धर्म का आधिक्य है वहीं-वहीं मानव अधिकारों का अभाव है, दमन है. सब जगह. हमारे मार्क्सवादी मित्र कहा करते थे कि धर्म गरीबों की अफीम है, दमित की कराह है. मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता. लेकिन आजकल आध्यात्मिकता अवश्य ही अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.आप देखेंगे कि इनके अनुयायी खासे खाते-पीते लोग है, समृद्ध वर्ग से हैं. ठीक है. गुरु को भी सत्ता मिलती है, ऊंचा कद और पद मिलता है, सम्पत्ति मिलती है..(जिसका अधिक महत्व नहीं है), शक्ति मिलती है और मिलती है अकूत सम्पदा. और भक्तों को क्या मिलता है? जब मैंने ध्यान से इन्हें देखा तो पाया कि इन भक्तों की भी अनेक श्रेणियां हैं. ये सभी एक किस्म के नहीं हैं. अनेक तरह के अनुयायी, अनेक तरह के भक्त. एक वह जो अमीर है, सफल है, ज़िन्दगी में खासा कामयाब है, पैसा कमा रहा है, सम्पदा बटोर रहा है. अब, क्योंकि उसके पास सब कुछ है, वह अपने पापों का शमन भी चाहता है. तो गुरु उससे कहता है कि “तुम जो भी कर रहे हो, वह निष्काम कर्म है. तुम तो बस एक भूमिका अदा कर रहे हो, यह सब माया है, तुम जो यह पैसा कमा रहे हो और सम्पत्ति अर्जित कर रहे हो, तुम इसमें भावनात्मक रूप से थोड़े ही संलग्नहो. तुम तो बस एक भूमिका निबाह रहे हो.. तुम मेरे पास आओ, क्योंकि तुम्हें शाश्वत सत्य की तलाश है. कोई बात नहीं कि तुम्हारे हाथ मैले हैं, तुम्हारा मन और आत्मा तो शुद्ध है”. और इस आदमी को अपने बारे में सब कुछ अच्छा लगने लगता है. सात दिन तक वह दुनिया का शोषण करता है और सातवें दिन के अंत में जब वह गुरु के चरणों में जाकर बैठता है तो महसूस करता है कि मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूं.लोगों का एक और वर्ग है. ये लोग भी धनी वर्ग से हैं. लेकिन ये पहले वर्ग की तरह कामयाब लोग नहीं हैं. आप जानते हैं कि कामयाबी-नाकामयाबी भी सापेक्ष होती है. कोई रिक्शा वाला अगर फुटपाथ पर जुआ खेले और सौ रुपये जीत जाए तो अपने आप को कामयाब समझने लगेगा, और कोई बड़े व्यावसायिक घराने का व्यक्ति अगर तीन करोड भी कमा ले, लेकिन उसका भाई खरबपति हो, तो वो अपने आप को नाकामयाब समझेगा. तो, यह जो अमीर लेकिन नाकामयाब इंसान है, यह क्या करता है? उसे तलाश होती है एक ऐसे गुरु की जो उससे कहे कि “कौन कहताहै कि तुम नाकामयाब हो? तुम्हारे पास और भी तो बहुत कुछ है. तुम्हारे पास ज़िन्दगी का एक मक़सद है, तुम्हारे पास ऐसी संवेदना है जो तुम्हारे भाई के पास नहीं है. क्या हुआ जो वह खुद को कामयाब समझता है? वह कामयाब थोड़े ही है. तुम्हें पता है, यह दुनिया बड़ी क्रूर है. दुनिया बड़ी ईमानदारी से तुम्हें कहती है कि तुम्हें दस में से तीन नम्बर मिले हैं. दूसरे को तो सात मिले हैं. ठीक है. वे तुम्हारे साथ ऐसा ही सुलूक करेंगे.” तो इस तरह इसे करुणा मिलती है, सांत्वना मिलती है. यह एक दूसरी तरह का खेल है. एक और वर्ग. मैं इस वर्ग के बारे में किसी अवमानना या श्रेष्ठता के भाव के साथ बात नहीं कर रहा. और न मेरे मन में इस वर्ग के प्रति कोई कटुताहै, बल्कि अत्यधिक सहानुभूति है क्योंकि यह वर्ग आधुनिक युग के गुरु और आज की आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा अनुयायी है. यह है असंतुष्ट अमीर बीबियों का वर्ग.एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी सारी निजता, सारी आकांक्षाएं, सारे सपने, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व विवाह की वेदी पर कुर्बान कर दिया और बदले में पाया है एक उदासीन पति, जिसने ज़्यादा से ज़्यादा उसे क्या दिया? कुछ बच्चे! वह डूबा है अपने काम धन्धे में, या दूसरी औरतों में. इस औरत को तलाश है एक कन्धे की. इसे पता है कि यह एक अस्तित्ववादी असफलता है. आगेभी कोई उम्मीद नहीं है. उसकी ज़िन्दगी एक विराट शून्य है; एकदम खाली, सुविधाभरी लेकिन उद्देश्यहीन. दुखद किंतु सत्य! और भी लोग हैं. ऐसे जिन्हें यकायक कोई आघात लगता है. किसी का बच्चा चल बसता है, किसी की पत्नी गुज़र जाती है. किसी का पति नहीं रहता. या उनकीसम्पत्ति नष्ट हो जाती है, व्यवसाय खत्म हो जाता है. कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उनके मुंह से निकल पड़ता है: “आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?” किससे पूछ सकते हैं ये लोग यह सवाल? ये जाते हैं गुरु के पास. और गुरु इन्हें कहता है कि “यही तो है कर्म. लेकिन एक और दुनिया है जहां मैं तुम्हें ले जा सकता हूं, अगर तुम मेरा अनुगमन करो. वहां कोई पीड़ा नहीं है. वहां मृत्यु नहीं है. वहां है अमरत्व. वहां केवल सुख ही सुख है”. तो इन सारी दुखी आत्माओं से यह गुरु कहता है कि “मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूं जहां कोई कष्ट नहीं है”. आप मुझे क्षमा करें, यह बात निराशाजनक लग सकती है लेकिन सत्य है, कि ऐसा कोई स्वर्ग नहीं है.ज़िन्दगी में हमेशा थोड़ा दर्द रहेगा, कुछ आघात लगेंगे, हार की सम्भावनाएं रहेंगी. लेकिन उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है. आपमें से कोई मुझसे पूछ सकता है कि अगर इन्हें कुछ खुशी मिल रही है, कुछ शांति मिल रही है तो आपको क्या परेशानी है? मुझे अपनी पढ़ी एक कहानी याद आती है. किसी संत की कही एक पुरानी कहानी है. एक भूखे कुत्ते को एक सूखी हड्डी मिल जाती है. वह उसी को चबाने की कोशिश करने लगता है और इसी कोशिश में अपनी जीभ काट बैठता है. जीभ से खून आने लगता है. कुत्ते को लगता है कि उसे हड्डी से ही यह प्राप्त हो रहा है. मुझे बहुत बुरा लग रहा है. मैं नहीं चाहता कि ये समझदार लोग ऐसा बर्ताव करें, क्योंकि मैं इनका आदर करता हूं. मानसिक शांति या थोड़ा सुकून तो ड्रग्स या मदिरा से भी मिल जाता है लेकिन क्या वह आकांक्ष्य है? क्या आप उसकी हिमायत करेंगे? जवाब होगा, नहीं. ऐसी कोई भी मानसिक शांति जिसकी जड़ें तार्किक विचारों में न हो, खुद को धोखा देने के सिवा और कुछ नहीं हो सकती. कोई भी शांति जो आपको सत्य से दूर ले जाए, एक भ्रम मात्र है, महज़ एक मृग तृष्णा है. मैं जानता हूं कि शांति की इस अनुभूति में एक सुरक्षा-बोध है, ठीक वैसा ही जैसी तीन पहियों की साइकिल में होता है. अगर आप यह साइकिल चलाएं, आप गिरेंगे नहीं. लेकिन बड़े हो गए लोग तीन पहियों की साइकिलें नहीं चलाया करते. वे दो पहियों वाली साइकिलें चलाते हैं, चाहे कभी गिर ही क्यों न जाएं. यही तो ज़िन्दगी है.एक और वर्ग है. ठीक उसी तरह का जैसा गोल्फ क्लब जाने वालों का हुआ करता है. वहां जाने वाला हर व्यक्ति गोल्फ का शौकीन नहीं हुआ करता. ठीक उसी तरह हर वह इंसान जो आश्रम में नज़र आता है, आध्यात्मिक नहीं होता. एक ऐसे गुरु के, जिनका आश्रम दिल्ली से मात्र दो घण्टे की दूरी पर है, घनघोर भक्त एक फिल्म निर्माता ने एक बार मुझसे कहा था कि मुझे भी उनके गुरु के पास जाना चाहिए. वहां मुझे दिल्ली की हर बड़ी हस्ती के दीदार हो जाएंगे. सच तो यह है कि वे गुरु जी निर्माणाधीन दूसरे चन्द्रास्वामी हैं. तो, यह तो नेटवर्किंग के लिए एक मिलन बिन्दु है. ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में अगाध सम्मान है जो आध्यात्मिक या धार्मिक हैं और फिर भी भले इंसान हैं. इसकी वजह है. मैं मानता हूं कि किसी भी भाव या अनुभूति की तरह आपकी भी एकसीमा होती है. आप एक निश्चित दूरी तक ही देख सकते हैं. उससे आगे आप नहीं देख सकते. आप एक खास स्तर तक ही सुन सकते हैं, उससे परे की ध्वनि आपको सुनाई नहीं देगी. आप एक खास मुकाम तक ही शोक मना सकते हैं, दर्द हद से बढ़ता है तो खुद-ब-खुद दवा हो जाता है. एक खास बिन्दु तक आप प्रसन्न हो सकते हैं, उसके बाद वह प्रसन्नता भी प्रभावहीन हो जाती है. इसी तरह, मैं मानता हूं कि आपके भलेपन की भी एक निश्चित सीमा है. आप एक हद तक ही भलेहो सकते हैं, उससे आगे नहीं. अब कल्पना कीजिए कि हम किसी औसत इंसान में इस भलमनसाहत की मात्रा दस इकाई मानते हैं. अब हर कोई जो मस्जिद में जाकर पांच वक़्त नमाज़ अदा कर रहा है वह इस दस में से पांच इकाई की भलमनसाहत रखता है, जो किसी मदिर में जाता है या गुरु के चरणों में बैठता है वह तीन इकाई भलमनसाहत रखता है. यह सारी भलमनसाहत निहायत गैर उत्पादक किस्म की है. मैं इबादतगाह में नहीं जाता, मैं प्रार्थना नहीं करता. अगर मैं किसी गुरु के पास, किसी मस्जिद या मंदिर या चर्च में नहीं जाता तो मैं अपनेहिस्से की भलमनसाहत का क्या करता हूं? मुझे किसी की मदद करनी होगी, किसी भूखे को खाना खिलाना होगा, किसी को शरण देनी होगी. वे लोग जो अपने हिस्से की भलमनसाहत को पूजा-पाठ में, धर्म या आध्यात्म गुरुओं के मान-सम्मान में खर्च करने के बाद भी अगर कुछ भलमनसाहत बचाए रख पाते हैं, तो मैं उन्हें सलाम करता हूं.आप मुझसे पूछ सकते हैं कि अगर धार्मिक लोगों के बारे में मेरे विचार इस तरह के हैं तो तो फिर मैं कृष्ण, कबीर या गौतम के प्रति इतना आदर भाव कैसे रखता हूं? आप ज़रूर पूछ सकते हैं. मैं बताता हूं कि क्यों मेरे मन में उनके प्रति आदर है. इन लोगों ने मानव सभ्यता को समृद्ध किया है. इनका जन्म इतिहास के अलग-अलग समयों पर, अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ. लेकिनएक बात इन सबमें समान थी. ये अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए. ये दलितों के लिए लड़े. चाहे वह रावण हो, कंस हो, कोई बड़ा धर्म गुरु हो या गांधी के समय में ब्रिटिश साम्राज्य या कबीर के वक़्त में फिरोज़ शाह तुग़लक का धर्मान्ध साम्राज्य हो, ये उसके विरुद्ध खड़े हुए. और जिस बात पर मुझे ताज़्ज़ुब होता है, और जिससे मेरी आशंकाओं की पुष्टि भी होती है वह यह कि ये तमाम ज्ञानी लोग, जो कॉस्मिक सत्य, ब्रह्माण्डीय सत्य को जान चुके हैं, इनमें से कोई भी किसी सत्ता की मुखालिफत नहीं करता. इनमें से कोई सत्ता या सुविधा सम्पन्न वर्ग के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं करता. दान ठीक है, लेकिन वह भी तभी जब कि उसे प्रतिष्ठान औरसत्ता की स्वीकृति हो. लेकिन आप मुझे बताइये कि कौन है ऐसा गुरु जो बेचारे दलितों को उन मंदिरों तक ले गया हो जिनके द्वार अब भी उनके लिए बन्द हैं? मैं ऐसे किसी गुरु का नाम जानना चाहता हूं जो आदिवासियों के अधिकारों के लिए ठेकेदारों से लड़ा हो. मुझे आप ऐसे गुरु का नाम बताएं जिसने गुजरात के पीड़ितों के बारे में बात की हो और उनके सहायता शिविरों में गया हो. ये सब भी तो आखिर इंसान हैं. मान्यवर, यह काफी नहीं है कि अमीरों को यह सिखाया जाए कि वे सांस कैसे लें. यह तो अमीरों का शगल है. पाखण्डियों की नौटंकी है. यह तो एक दुष्टता पूर्ण छद्म है. और आप जानते हैं कि ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में इस छद्म के लिए एक खास शब्द है, और वह शब्द है: होक्स(HOAX). हिन्दी में इसे कहा जा सकता है, झांसे बाजी!.धन्यवाद.

45 टिप्‍पणियां:

  1. Soch ko khuraak dene wala yah vaktavy bada hi prabhavit kar gaya..

    prakashit karne hetu aabhaar.

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  2. ho sakta hai ki aapko unki batein prbhavit karti hain. Par ye na bhuliyega ki achchhi -achchhi batein banana unka pesha hai.
    Ye sab batein unhone jo bhi kahin hain apne anubhav ke adhar par kahin hai.Par ho sake to unka atit bhi ek baat aapko padhna chahiye.
    "Garv pravat ko bahut hai uchchatam uchai ka,
    par na ab tak jaan paya bhed apni khai ka.
    Navnit Nirav

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  3. बहुत महत्वपूर्ण आलेख है। आलेख का शीर्षक सोलह आने सही।

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  4. पेशा तो यह अमिताभ बच्चन का भी है और गुलशन कुमार का भी था। पर क्या उनको कभी आपने ऐसी बातें करते सुना ? ऐसी बाते करने के लिए विवेक, बुद्धि, तर्क और साहस चाहिए पड़ते हैं।

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  5. aadhytm ke baare men alag-alag logon kee alag ray ho sakti hai. Yah vastav men us prakaar se hai kee vyakti vishesh ne use kaise samjha hai. Theek usee tarah se jaise kee jameen ke ek tukde ko dekh kar property dealer ke man men use bechne ka bhav, builder ke man men bhavan banaane ka bhav, kisaan ke man men khetee karne ka bhav aur bachche ke man men gharonde banaane ka bhav uthta hai.
    Par koi bhee galat nahin hai aur saath hee us tukde ka bhee astitva bana hua hai. guru ke baare men bhee aisa hee hai

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  6. Es tark ko mai solah me solah aana deta hoon...Satya hai..Lekin jis satya ki anubhuti mai nahi kar saka use mai satya hi na manoon ye to nahi ho sakta..!

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  7. अति प्रभावी.बुकमार्क कर सहेज लिया है. आभार.

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  8. @yuva
    कई प्रोपर्टी डीलर उस टुकड़े को बिना खरीदे ही चार-चार बार बेच देते हैं तो कई बिल्डर अन्य तरह की तिकड़मबाजियां करके ज़्यादा से ज़्यादा ‘‘कमाने’’ की कोशिश करते हैं। बच्चों का घरोंदा बनाना तो समझ भी आता है पर जब बड़े लोग घरोंदे बनाने को घर बनाने या समाज बदलने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण, गंभीर और पवित्र कार्य वगैरहा समझने लगते हंै तो कुछ प्रश्न तो मन में उठते ही हैं। @Einstein
    अनुभूति अगर किसी को नहीं हो रही तो हमें उसे ज़बरदस्ती कराने की कोशिश तो नहीं ही करनी चाहिए। प्रश्न यह भी उठता है कि यह ‘अनुभूति’ आखिर कोई क्यों करना चाहता है !? Koi agar is ANUBHUTI ke bina hi apne jivan ko zyada safal, sarthak aur paripurn samajhta ho to? कई बार तो हम अपनी ‘अनुभूति’ को लेकर ही ‘कन्फर्म’ नहीं होते कि हुई भी है या नहीं ! इसके अलावा हमें यह भी देखने चाहिए कि इस ‘अनुभूति’ के बाद हमारे बाहरी व्यक्त्तित्त्व में, आचरण में, सोच में क्या कोई ऐसे सकारात्मक परिवर्तन आते हैं जिनसे हमें या समाज को कोई ठोस लाभ होता हो।

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  9. achha kiya kabaadkhana se sabhar lekar. achhi baat ka jitna prasaar ho, achha

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  10. शुक्रिया धीरेश भाई। आपकी नवीनतम पोस्ट के दो-तीन शेर भी मुझे इस अर्थ में काफी प्रासंगिक लग रहे हैं-

    जब य` मालूम है कि बस्ती की हवा ठीक नहीं
    फिर अभी इसको बदल लेने में क्या ठीक नहीं

    ज़हर मिल जाए दवा में तो ज़ायज़ है यहां
    हाँ मगर ज़हर में मिल जाए दवा ठीक नहीं

    उसकी फ़ितरत ही सही चीख़ना चिल्लाना मगर
    मैं समझता हूँ नगर में वो बला ठीक नहीं

    ख़ुद ही डसवाता था इक सांप से लोगों को वो
    ख़ुद ही कहता था कि ये खेल ज़रा ठीक नहीं


    -आबिद आलमी

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  11. agar baat kahne ki hai to shayad aapne kabhi kisi ko sunane kee jehmat nahi uthai hai siwaye javed sahab ke.

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  12. ghar se maszid jara door hai..chalo kisi rote hue bache ko hasaaya jate...aapne sahi kaha kaha hai aajkal aise guru jinhone gujraat ke danga peedto ya dalito ke liye awaaz utthaee...ab to kalyug bhi nahi raha jisme duniya ko tarne ke liye guruo ne avtaar liya tha.ab to hathyug hai.es hath kar or es hath pa.jaise karam karenge esse janam me hisaab dena hai agle janam tak bhagwaan bhi entzaar nahi karte....nice post..

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  13. @Navnit Nirav
    achchha hua jo aapne apne vakya meN "shaayad" laga diya, varna aap jhuthe parh jaate.

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  14. ग्रोवर साहब, जावेद साहब इस जमाने के चलन में भले आदमियों की श्रेणी में आते हैं, उनके व्यक्तव्य में कहीं भी ईमानदारी की कमी नहीं है। ईमानदारी से मतलब है धन्धेबाजी और चालाकी का न होना। यहाँ इस व्याखान में जो कुछ उन्होंने कहा है, वह आज के हालात के परिप्रेक्ष्य में कहा है, मसलन आज की आध्यात्मिकता, आज के गुरु, आज के धन्धेबाज। वे पूरी सफाई से काल एवं किरदार निरपेक्ष आध्यात्मिकता पर बोलने से बचे हैं, और जहाँ भी उसका हवाला दिया है उसका दाँये-बाँये करते हुए पक्ष ही लिया। आज के सबसे ज्यादा चलने वाले धन्धों में भी वे फिल्मों का नाम लेना भूल गये हैं, हो जाता है। इतना कुछ कहने के पश्चात भी वे रविशंकर से घनिष्टता, आदर, आत्मीयता किस विवशता में प्रकट कर रहे हैं। सुनिये उन्हें भी अपने आधार पर पूरा विश्वास नहीं है, जिस तरह ये धर्म गुरु ईश्वर को प्रगट नहीं कर सकते उसी तरह से जावेद साहब भी उस प्रकृति के सारे रहस्यों को नहीं खोल सकते। जिस तहर धर्म गुरू बातों के लच्छों से अपने आध्यात्म की रक्षा करते हैं उसी तरह जावेद साहब अपनी तार्किकता की। लेकिन दोनों में एक भूख है उसे सही तरह से जानने-समझने की जो दोनों में ही वास्तविक है। रही बात आधुनिक आध्यात्मिकता की और राम, गौतम, कृष्ण, गाँधी की तुलना में आज के धार्मिक गुरुओं की तो फिल्मों में भी जावेद साहब जैसे कितने फिल्मकार हैं? वे फिल्मों के खिलाफ क्यों नहीं बोलते फिरते? इसलिये कि यहाँ रोजीरोटी का सवाल है!, समाज को विकृत करने वाले फिल्मकारों, जिनकी फिल्में देखकर बच्चे आत्महत्यायें कर लेते हैं, सास-बहु सीरीयल परिवार तौड़ रहे हैं, बच्चों का बचपन छीन रहे की तुलना में अच्छे फिल्मकारों का अनुपात क्या है? जावेद साहब कवि हैं उनसे पूछिये कि इन पंक्तियों....
    दिल की बातें किसी से करने दो
    अक्ल क्या सबके पास होती है
    को कोई मोल है या नहीं। यदि आध्यात्मिकता के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि धरती गोल है या चपटी तो कृष्ण की आध्यात्मिकता उन्हें क्यूँ प्रियकर है।क्या विज्ञान की अंतिम खोज पूरी हो चुकी है? और जो खौज हुई हैं वे अपने आपमें अन्तिम है? जावेद साहब का विज्ञान में क्या योगदान है मालुम कीजिये। और यह भी जानने का प्रयास कीजिये कि जो वैज्ञानिक बडे-बडे आविष्कार कर आधुनिक दुनिया को इतनी सुविधायें दे गये हैं इन्हे विज्ञान का जावेद साहब जितना दम्भ क्यूँ नहीं हुआ उनमें अधिकांश अपनी धार्मिक आस्थाओं का त्याग क्यूं नहीं कर सके। मेरी भी यह दृढ धारणा है कि समस्त भौतिक परिमाणोँ का कारण भी भौतिक ही है इसमें चमत्कार घटित नहीं होता, लेकिन जावेद साहब से पूछ कर देखिये कि इस सृष्टि का जिसके ओर-छोर की कल्पना करना भी मुश्किल है क्या एक चमत्कार नहीं है? आध्यात्मिकता को खारिज करने के लिए बाबा रामदेव, चन्द्रास्वामी, भाजपा को आधार बनाकार सुविधा प्राप्त मत कीजिये, इस तरह तो विज्ञान, तार्किकता और हर क्षेत्र को खारिज करने के के आधार भी मिल जायेंगे, क्यूँकि ऐसे तत्व तो सब जगह घुस जाते हैं।जावेद साहब, परोपकारयुक्त, त्याग और संघर्ष युक्त आध्यात्मिकता के पक्ष में खडे होने को तैयार लग रहे हैं लेकिन क्या उसके लिये भी मानवता, पर्यावरणीय चेतना, नागरिक जिम्मेदारी आदि शब्दों से काम नहीं चलाया जा सकता? आध्यात्मिकता पर बात करने के लिये केवल व्यक्ति और इस विराट सृष्टि के तादात्म्य पर चिंतन कीजिये और कोई हीरा निकालकर लाइये। अन्त में मुझे आपके उत्साह की तारीफ करने पडेगी कि आपने इस पोस्ट की भू्मिका में अपनी मानवता, सामाजिकता, व्यावहारिकता, देशप्रेम जैसे जज्बों के साथ आत्मार्पण किया है, आपकी संवेदना को सोचकर ही रोमांच होता है। होता है अपने जैसे विचार कहीं मिल जायें, और उस भाषा में मिल जायें जिसमें हम खुद अभिव्यक्त नहीं कर पा रहें हों तब ऐसा रोमांच अनुभव करना स्वाभाविक ही है। आपाका व्यंग्य लेख अच्छा था पूरा हो गया क्या?.... हाँ जावेद साहब से जरा पूछियेगा कि जिस प्रकार से आध्यात्म शब्द के बगैर काम चलाया जा सकता है उसी प्रकार अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक शब्द के बगैर काम नहीं चलाया जा सकता क्या?

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  15. ग्रोवर साहब, जावेद साहब इस जमाने के चलन में भले आदमियों की श्रेणी में आते हैं, उनके व्यक्तव्य में कहीं भी ईमानदारी की कमी नहीं है। ईमानदारी से मतलब है धन्धेबाजी और चालाकी का न होना। यहाँ इस व्याखान में जो कुछ उन्होंने कहा है, वह आज के हालात के परिप्रेक्ष्य में कहा है, मसलन आज की आध्यात्मिकता, आज के गुरु, आज के धन्धेबाज। वे पूरी सफाई से काल एवं किरदार निरपेक्ष आध्यात्मिकता पर बोलने से बचे हैं, और जहाँ भी उसका हवाला दिया है उसका दाँये-बाँये करते हुए पक्ष ही लिया। आज के सबसे ज्यादा चलने वाले धन्धों में भी वे फिल्मों का नाम लेना भूल गये हैं, हो जाता है। इतना कुछ कहने के पश्चात भी वे रविशंकर से घनिष्टता, आदर, आत्मीयता किस विवशता में प्रकट कर रहे हैं। सुनिये उन्हें भी अपने आधार पर पूरा विश्वास नहीं है, जिस तरह ये धर्म गुरु ईश्वर को प्रगट नहीं कर सकते उसी तरह से जावेद साहब भी उस प्रकृति के सारे रहस्यों को नहीं खोल सकते। जिस तहर धर्म गुरू बातों के लच्छों से अपने आध्यात्म की रक्षा करते हैं उसी तरह जावेद साहब अपनी तार्किकता की। लेकिन दोनों में एक भूख है उसे सही तरह से जानने-समझने की जो दोनों में ही वास्तविक है। रही बात आधुनिक आध्यात्मिकता की और राम, गौतम, कृष्ण, गाँधी की तुलना में आज के धार्मिक गुरुओं की तो फिल्मों में भी जावेद साहब जैसे कितने फिल्मकार हैं? वे फिल्मों के खिलाफ क्यों नहीं बोलते फिरते? इसलिये कि यहाँ रोजीरोटी का सवाल है!, समाज को विकृत करने वाले फिल्मकारों, जिनकी फिल्में देखकर बच्चे आत्महत्यायें कर लेते हैं, सास-बहु सीरीयल परिवार तौड़ रहे हैं, बच्चों का बचपन छीन रहे की तुलना में अच्छे फिल्मकारों का अनुपात क्या है? जावेद साहब कवि हैं उनसे पूछिये कि इन पंक्तियों....
    दिल की बातें किसी से करने दो
    अक्ल क्या सबके पास होती है
    को कोई मोल है या नहीं। यदि आध्यात्मिकता के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि धरती गोल है या चपटी तो कृष्ण की आध्यात्मिकता उन्हें क्यूँ प्रियकर है।क्या विज्ञान की अंतिम खोज पूरी हो चुकी है? और जो खौज हुई हैं वे अपने आपमें अन्तिम है? जावेद साहब का विज्ञान में क्या योगदान है मालुम कीजिये। और यह भी जानने का प्रयास कीजिये कि जो वैज्ञानिक बडे-बडे आविष्कार कर आधुनिक दुनिया को इतनी सुविधायें दे गये हैं इन्हे विज्ञान का जावेद साहब जितना दम्भ क्यूँ नहीं हुआ उनमें अधिकांश अपनी धार्मिक आस्थाओं का त्याग क्यूं नहीं कर सके। मेरी भी यह दृढ धारणा है कि समस्त भौतिक परिमाणोँ का कारण भी भौतिक ही है इसमें चमत्कार घटित नहीं होता, लेकिन जावेद साहब से पूछ कर देखिये कि इस सृष्टि का जिसके ओर-छोर की कल्पना करना भी मुश्किल है क्या एक चमत्कार नहीं है? आध्यात्मिकता को खारिज करने के लिए बाबा रामदेव, चन्द्रास्वामी, भाजपा को आधार बनाकार सुविधा प्राप्त मत कीजिये, इस तरह तो विज्ञान, तार्किकता और हर क्षेत्र को खारिज करने के के आधार भी मिल जायेंगे, क्यूँकि ऐसे तत्व तो सब जगह घुस जाते हैं।जावेद साहब, परोपकारयुक्त, त्याग और संघर्ष युक्त आध्यात्मिकता के पक्ष में खडे होने को तैयार लग रहे हैं लेकिन क्या उसके लिये भी मानवता, पर्यावरणीय चेतना, नागरिक जिम्मेदारी आदि शब्दों से काम नहीं चलाया जा सकता? आध्यात्मिकता पर बात करने के लिये केवल व्यक्ति और इस विराट सृष्टि के तादात्म्य पर चिंतन कीजिये और कोई हीरा निकालकर लाइये। अन्त में मुझे आपके उत्साह की तारीफ करने पडेगी कि आपने इस पोस्ट की भू्मिका में अपनी मानवता, सामाजिकता, व्यावहारिकता, देशप्रेम जैसे जज्बों के साथ आत्मार्पण किया है, आपकी संवेदना को सोचकर ही रोमांच होता है। होता है अपने जैसे विचार कहीं मिल जायें, और उस भाषा में मिल जायें जिसमें हम खुद अभिव्यक्त नहीं कर पा रहें हों तब ऐसा रोमांच अनुभव करना स्वाभाविक ही है। आपाका व्यंग्य लेख अच्छा था पूरा हो गया क्या?.... हाँ जावेद साहब से जरा पूछियेगा कि जिस प्रकार से आध्यात्म शब्द के बगैर काम चलाया जा सकता है उसी प्रकार अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक शब्द के बगैर काम नहीं चलाया जा सकता क्या?

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  16. वैचारिक अभिव्यक्ति...विचारों का संगम आलेख और टिप्पणियों में......पढ़वाने का शुक्रिया....

    साभार
    हमसफ़र यादों का.......

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  17. आपने ठीक कहा बारहठ जी कि मैं रोमांचित हंू। मैं तो रजनीश को पढ़कर भी रोमांचित होता हूं और अंबेडकर को भी और गांधी को भी। और माक्र्स को भी। और खुशवंत सिंह को भी। और राजेंद्र यादव को भी। और उदयप्रकाश को भी। मैं हर उस व्यक्ति को पढ़-सुन-देखकर रोमांचित होता हूं जो भीड़ से अलग खड़ा हो कर, सारे चश्मों को हटाकर चीज़ों को सीधे-सीधे देखता है और उनपर अपने विचार सीधे-सीधे प्रकट करता है। क्या यह रोमांचित होने की बात नहीं कि जहां हर कोई आंख-मंूदकर, दिमाग गिरवी रखकर भीड़ के पीछे भाग रहा हो वहां 10-5 लोग अभी भी तरह-तरह के खतरे उठाकर तर्कविरोधी माहौल में भी अपने तर्क रख रहे हैं। यह तो और भी ज्यादा रोमांचित होने की बात है कि उनके विचार काफी कुछ मुझसे मिलते-जुलते हैं। यह हमेशा तो नही होता ! मैंने एक बार एक बस-यात्रा के दौरान एक भजन सुना था:-
    जिस भजन में राम का नाम न हो उस भजन को गाना ना चहीए,
    चाहे पतनी कितनी प्यारी हो उसे भेद बताना ना चहीए।।
    मैं ज़रा भी रोमांचित नहीं हुआ।
    जावेद अख्तर ने थोड़ा सा घुमा-फिरा कर क्यों कहा यह तो उन्हें ही मालूम होगा पर मेरी समझ में एक कारण यह भी हो सकता है कि इस देश में जहां कुछ लोग बात-बेबात लट्ठबाजी, मुकदमेबाजी, अफवाहबाजी और षडयंत्रबाजी पर उतर आते हैं, वहां खुदको और अपने वक्त को बचाते हुए कुछ बदलाव लाए जा सकें तो कोई ऐसी बुरी बात भी नहीं है। रही बात फिल्मकारों पर कुछ न कहने की तो पहले तो यह कि अभी हाल ही में उन्होने आॅस्कर अवार्डस् को लेकर दिए गए अमिताभ बच्चन के बयान के विरुद्ध बयान दिया था। दूसरे जावेद साहब फिल्म वालों का विरोध नहीं करते इससे दूसरों के पाप कैसे माफ हो जाते हैं ! तीसरे, मुझे हैरानी यह होती है कि जिन लोगों को आप बड़ा चालू, समाज-विरोधी वगैरह समझते हैं, उन्हीं से आप सारी ईमानदारियों की, अच्छाईयों की और छोटा से छोटा उसूल निभाने की उम्मीदें रखतें हैं और जो लोग ऋषितुल्य और महात्मा बनते फिरते हैं उनसे आप न किसी चीज़ का जवाब मांगते हैं न हिसाब ! क्या आप यह ब्लाग भूखे रहकर लिखते हैं ? क्या आपने कभी किसी को हिसाब दिया कि आप जो खाते हैं वो कहां से कमाते हैं ! दिलचस्प संयोग है कि ये गुरु लोग भी कभी अपने भक्तों से नहीं पूछते कि जो दक्षिणा आप हमें देते हो वह पाप की कमाई की है या पुण्य की कमाई की ? उन्हें मालूम है कि जिस दिन हमने इस तरह के सवाल उठाने शुरु किए 100 में से 90 भक्त हमें छोड़कर भाग जाएंगे।
    (जारी)

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  18. संजय ग्रोवर साहब इतना सारगर्भित वैचारिक चिंतन लिए हुए इस लेख को प्रस्तुत करने के लिए आपका हार्दिक आभार !

    मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे दो-तीन बार जावेद अख्तर से बातचीत करने का अवसर प्राप्त हो चुका है ! मैं हमेशा उनकी सोच और लेखन का कायल रहा हूँ, वक्ता के तौर पर भी वो जादू सा करते हैं !

    यह एक ऐसा संग्रहणीय आलेख है जिसे हर एक को पढना चाहिए !

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  19. मैंने अभी-अभी आपकी टिप्पणी देखी है। आपने “जारी” लिखा है। कुछ और लिखना चाहेंगे या मैं अपना नजरिया स्पष्ट करूं। आज सुबह से ही आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने में बहुत परेशानी आ रही है।

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  20. सर्वप्रथम तो मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जावेद साहब के प्रति मेरा पूरा सम्मान है, जैसा मैंने पहले भी लिखा। जितना थोडा जावेद साहब के बारे में जानता हूँ उसके मुताबिक वे सज्जन व्यक्ति हैं, अगर उनके विचार मुझे उचित नहीं भी लगें तब भी उनकी सज्जनता मेरे लिये पर्याप्त महत्व रखती है। उनके विषय में मेरी जानकारी की एक सीमा है। उनके आलेख ने मुझे रोमांचित तो नहीं किया लेकिन हाँ अपील जरूर किया था, वैसे मैं भी रोमांचित हुआ हूँ जब मैंने पहली बार जादू देखा, सिनेमा देखा, तालाब में नहाया अर्थात रोमांच कारण बौद्धिकता से इतर भी होता है, जहां कुछ चमत्कार जैसा अनुभव होता हो। टिप्पणी मैंने आपकी भूमिका के कारण की थी, जिससे लग रहा था कि आप उक्त व्याख्यान से अक्षरशः सहमत हैं, टिप्पणी की, क्यूँकि मुझे लगा था कि इतने सतही विचारों को भी कोई, जोकि बौद्धिक होने का दम भरता हो, कैसे मानवता, सामाजिकता और व्यावहारिकता के लिये दुर्लभ उपहार की तरह ग्रहण कर सकता है, आखिर अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले बौद्धिक भी क्यूँ अपनी तराजू नहीं रखते हैं या उसका उपयोग नहीं करते हैं। मुझे बार-बार यह भी सोचने को विवश होना पड़ता है कि विचारधारा से जुडे, दर्शन से जुडे लोग भी कितने सीमित अनुभव वाले और चिंतनहीन हैं। हो सकता है मेरी भाषा की व्यजंना अतिरेक पूर्ण हो लेकिन उसे टिप्पणी के रूप में ही लिया जाना चाहिये। मैं यहाँ अपना नजरिया न केवल आपकी टिप्पणी के संदर्भ में स्पष्ट कर रहा हूँ वरन संभव हुआ तो अपने ब्लॉग पर उक्त व्याख्यान को अपनी समीक्षा के साथ पोस्ट भी कर रहा हूँ।
    मैं आपके रोमांच के लिये आपको पुनः बधाई देता हूँ। आप उन विचारकों के साथ रोमांचित अनुभव करते हैं जो भीड़ से अलग खड़े हैं। जैसा आपने लिखा, रजनीश, अंबेड़कर, गाँधी, मार्क्स, खुशवंत सिंह, राजेन्द्र यादव, उदय प्रकाश, ऐसे नाम और भी होंगे। खुशवंत सिंह और उदयप्रकाश के बारे में मैं इतना नहीं जानता हूँ कि कोई टिप्पणी कर सकूँ। मार्क्स और राजेन्द्र यादव पर यदि आपने अवसर दिया तो अवश्य मैं चर्चा में शामिल हो सकता हूँ। राजेन्द्र यादव और रजनीश के लिये मैं यह नहीं मानता कि विचारधारा के स्तर पर भीड़ से अलग खडे हैं। अंबेडकर, गाँधी और मार्क्स मेरे लिये भी आदरणीय है, अपनी बौद्धिकता से कहीं अधिक अपने चरित्र के कारण। मैं जावेद साहब के व्याख्यान के संदर्भ में यह जनना चाहूँगा कि गाँधी और रजनीश की आध्यात्मिकता के विषय में अब आपके क्या विचार हैं।(बताना आवश्यक नहीं है।)
    प्रथम तो यह कि जिसे आप भीड़ से अलग बता रहे हैं वह भीड़ से अलग नहीं है वस्तुतः एक पूरी की पूरी भीड़ है। नास्तिकता के विचार के प्रणेता भी जावेद अख्तर नहीं हैं वे केवल उसके प्रवक्ता हैं, उनके व्याख्यान में एक भी ऐसा वाक्य नहीं है जो पहले से ही कहा-सुना हुआ नहीं हो। गूढ़तम व्याख्या के साथ नास्तिकता के विचार का प्रतिपादन उन्हीं ग्रन्थों में किया हुआ है जहाँ से आस्तिकता का विचार प्राप्त हुआ है, जावेद साहब की नास्तिकता की व्याख्या उसके समकक्ष बहुत छिछली ठहरती है। नास्तिकता का एक पूरा दर्शन भी मिलता है, लेकिन वह भी अनाध्यात्मिक नहीं है। किसी भी धर्म के ग्रंथों को पढ़ लीजियेगा वहाँ एकाधिक नास्तिक चरित्रों का गठन किया हुआ मिल जायेगा। इस सबके बावजूद आध्यात्मवादियों ने नास्तिकता को सर्वथा त्याज्य नहीं बताया है, उनका ऐसा आग्रह ऐसी हठधर्मिता नहीं है। जिन नास्तिक चरित्रों का पतन और संहार धार्मिक ग्रंथों में गढ़ा गया है उसका कारण उनकी नास्तिकता को नहीं उनके अहंकार और चारित्रिक पतन को बताया गया है। आशय यह है कि नास्तिकता को होल्ड करने के लिये और भी विराट, और भी उन्नत व्यक्तित्व की आवश्यकता है। यह भी निरन्तर याद रखने की आवश्यकता है कि आध्यात्मिकता के लिए संस्थागत धर्म की अनिवार्यता नहीं है, और न ही यह कोई अनिवार्य शिक्षा या साक्षरता की भाँति प्रत्येक व्यक्ति के लिये जरूरी है।( यदि व्याख्यान होता तो मैं उदाहरण भी देता चलता।) मुझे जावेद साहब की नास्तिकता पर आपत्ति नहीं है, श्रीमान् मुझे उनके अंधविश्वास, झाड़-फूंक और आडम्बर विरोध या आध्यात्मिकता की आड़ में किये जा रहे कुकर्मों के विरोध पर गर्व भी है। मुझे आपत्ति उनके आध्यात्म के विषय प्रगट किये गये चालू विचारों से है, मैं स्वयं को आध्यात्म की आलोचना ( समीक्षा) के लिये तैयार पाता हूँ लेकिन उचित भाषा में गंभीर चितंन के साथ, ऐसा नहीं कि हम जब तर्क नहीं कर पायें तो गाली-गलौच की भाषा पर उतर आयें।

    जारी......

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  21. प्रथम तो यह कि जिसे आप भीड़ से अलग बता रहे हैं वह भीड़ से अलग नहीं है वस्तुतः एक पूरी की पूरी भीड़ है। नास्तिकता के विचार के प्रणेता भी जावेद अख्तर नहीं हैं वे केवल उसके प्रवक्ता हैं, उनके व्याख्यान में एक भी ऐसा वाक्य नहीं है जो पहले से ही कहा-सुना हुआ नहीं हो। गूढ़तम व्याख्या के साथ नास्तिकता के विचार का प्रतिपादन उन्हीं ग्रन्थों में किया हुआ है जहाँ से आस्तिकता का विचार प्राप्त हुआ है, जावेद साहब की नास्तिकता की व्याख्या उसके समकक्ष बहुत छिछली ठहरती है। नास्तिकता का एक पूरा दर्शन भी मिलता है, लेकिन वह भी अनाध्यात्मिक नहीं है। किसी भी धर्म के ग्रंथों को पढ़ लीजियेगा वहाँ एकाधिक नास्तिक चरित्रों का गठन किया हुआ मिल जायेगा। इस सबके बावजूद आध्यात्मवादियों ने नास्तिकता को सर्वथा त्याज्य नहीं बताया है, उनका ऐसा आग्रह ऐसी हठधर्मिता नहीं है। जिन नास्तिक चरित्रों का पतन और संहार धार्मिक ग्रंथों में गढ़ा गया है उसका कारण उनकी नास्तिकता को नहीं उनके अहंकार और चारित्रिक पतन को बताया गया है। आशय यह है कि नास्तिकता को होल्ड करने के लिये और भी विराट, और भी उन्नत व्यक्तित्व की आवश्यकता है। यह भी निरन्तर याद रखने की आवश्यकता है कि आध्यात्मिकता के लिए संस्थागत धर्म की अनिवार्यता नहीं है, और न ही यह कोई अनिवार्य शिक्षा या साक्षरता की भाँति प्रत्येक व्यक्ति के लिये जरूरी है।( यदि व्याख्यान होता तो मैं उदाहरण भी देता चलता।) मुझे जावेद साहब की नास्तिकता पर आपत्ति नहीं है, श्रीमान् मुझे उनके अंधविश्वास, झाड़-फूंक और आडम्बर विरोध या आध्यात्मिकता की आड़ में किये जा रहे कुकर्मों के विरोध पर गर्व भी है। मुझे आपत्ति उनके आध्यात्म के विषय प्रगट किये गये चालू विचारों से है, मैं स्वयं को आध्यात्म की आलोचना ( समीक्षा) के लिये तैयार पाता हूँ लेकिन उचित भाषा में गंभीर चितंन के साथ, ऐसा नहीं कि हम जब तर्क नहीं कर पायें तो गाली-गलौच की भाषा पर उतर आयें।

    जारी......

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  22. यह तो हुई एक बात, दूसरे भीड़ से पृथक खड़े होना अपने आपमें तार्किक होने की कसौटी नहीं है, न ही भीड़ में खड़ा रहना अतार्किता का सबूत है। क्योंकि भीड़ से अलग तो ओसामाबिनलादेन, सद्दाम हूसैन, वीरप्पन और जगन गूजर भी खडे थे, एक पागल भी भीड़ से अलग खड़ा होता है, और फैशन में भी अलग खड़ा हुआ जाता है। लेकिन उन्हें हम तार्किक नहीं मानते, आप भी उनके साथ रोमांच अनुभव नहीं करते होंगे। न तो पागल व्यक्ति तार्किक होता है न ही उसके हाथ के पत्थर विचार माने जा सकते हैं। भीड़ से अलग खडे होना आत्मविश्वास की निशानी है यदि यह विवेकपूर्ण है तभी अपील करता है। लेकिन भीड़ से अलग घमण्ड और अज्ञानता में भी खड़ा हुआ जा सकता है। अपने आपको चश्माहीन और तार्किक होने का सर्टिफिकेट तो तालीबानी, बजरंगी और शिवसैनिक भी देते हैं लेकिन हमारे यहाँ वे सर्टिफिकेट मान्य नहीं होते हैं। जो दिल-दिमाग किसी प्रतिफल के स्वरूप गिरवी रखे होते हैं, उनके गिरवी होने की पहचान तो हो जाती है, उन्हें मुक्त कराने का खयाल तो बार-बार उठता रहता है लेकिन जो दिल-दिमाग बिना किसी प्रतिफल के ही किसी की तिजौरी में बंद है उनकी पहचान भी नहीं हो पाती। ऐसे दिल-दिमाग को बंद तिजौरी से बाहर निकलवाने का खयाल भी नहीं आता अतः उनकी नियति बंद तिजौरी में ही सड़ जाने की होती है।

    जारी...........

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  23. आप ने जिस भजन का उल्लेख किया है उस पर मैं भी रोमांचित नहीं होता. मैं सत्यनारायण कथाओं पर रोमांचित होने के लिये किसी से कह भी नहीं सकता। लेकिन उक्त भजन पर रोमांचित न होने के मेर कारण अलग होते। इस भजन की पहली पंक्ति आस्था से संबंधित है तो दूसरी नीति से, आपने रहीम के नीति के दोहे तो पढ़े होंगे। हो सकता है मैं गलत होऊँ लेकिन मुझे लग रहा है कि आपने राम का अर्थ हिन्दु अवतार से लिया हो, और दूसरी पंक्ति को पुरुष प्रधान समाज में नारी की गैर-बराबरी से लिया हो। इस तरह आपका उक्त भजन का अस्वीकार उचित है। लेकिन मेरे आग्रह पर एकबार, एक आस्तिक व्यक्ति की दृष्टि से इस भजन में राम का अर्थ सम्प्रदायातीत ईश्वर से लगाइये, तब इसकी व्याख्या यह होती है कि मनुष्य को केवल एक ईश्वर की पूजा-भक्ति करनी चाहिए और व्यक्ति पूजा से दूर रहना चाहिए, जैसी व्यक्ति पूजा आजकल हम देख रहे हैं। अमिताभ बच्चन के भी मंदिर बन गये हैं और वहाँ शायद धूप-बत्ती के साथ आरती भी गायी जाती हो। अब इस पंक्ति में नास्तिक और आस्तिक दोनों के लिये के लिये संदेश है, नास्तिक इसे व्यक्ति पूजा से दूर रहने के संदेश के रूप में ग्रहण कर सकता है। अब दूसरी पंक्ति पर आते हैं, मैं नहीं कहूँगा कि आप जैव-विज्ञान या मनोविज्ञान की दृष्टि से इस पर विचार करें। आप व्यावहारिक दृष्टि से विचार करें आखिर भेद क्या होता है, उसे गोपनीय रखने की क्या आवश्यकता है, एक पुरुष के निकट उसका सबसे करीबी रिश्ता क्या है जहाँ उसके सबसे कमजोर होने की सबसे ज्यादा संभावना है, इतने पर भी उक्त पंक्ति में एक विशेषण और है, प्यारी अर्थात बचने की कोई संभावना नहीं। जीवन के व्यवहार में हम अनुभव करते हैं कि अत्यधिक भावुकता में उठाये गये कदमों के कारण असहज स्थिति उत्पन्न हो जाती है, सफलता दूर हो जाती है। यदि एक पुरूष उक्त परिस्थिति में भी अपनी भावुकता पर नियन्त्रण प्राप्त कर लेता है, तो अपनी एक कमजोरी को सदा के लिये जीत लेता है। आप पूछ सकते हैं कि मनुष्य के जीवन में कोई भेद होना ही क्यूँ चाहिये। मैं निवेदन करना चाहूँगा कि भेद का जनक केवल पाप ही नहीं है, और संसार में व्यक्ति अकेला ही नहीं है, और उक्त पंक्ति में पत्नी की और से खतरा नहीं पत्नी के कारण खतरे की ओर इशारा मात्र है। (उदाहरण की आवश्कता हो तो आदेश करें) अब मैं आपको हमारी आँखों पर चढ़ रहे उस चश्मे से परिचित कराता हूँ जिसकी हम अवहेलना करते हैं। यदि ऐसा कोई शोध प्रकाशित होता है जो यह निष्कर्ष प्रदान करता हो कि परुषों की तुलना में महिलायें अधिक बातूनी या पर निंदक, भेद की कच्ची होती हैं तो हम उसे नहीं मानते हैं। लेकिन यदि कोई ऐसा शोध प्रकाशित होता है कि महिलाये पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील, दयालु, कुशल प्रशासक, तार्किक, तीक्ष्ण बुद्धि होती हैं तो हम उस शोध को अधिक प्रमाणिक ही नहीं मानते अपना सर्टिफिकेट भी साथ जोड़ देते हैं। अब सोचिये शायद लगे कि इस भजन में इतनी निकृष्ट बात नहीं है? मैं नहीं कह सकता कि गाने वाले ने उस भजन को साम्प्रदायिक चश्मे के साथ न गाया हो लेकिन उस साम्प्रदायिक चश्मे से सुने जाने की भी संभावना है। मेरा इस भजन से विरोध इसलिये है कि यह नारी को मुख्य धारा में लाने की आवश्यकता को खारिज करता है। यह भजन जिस ने भी लिखा होगा, जब भी लिखा होगा उस समय और समाज का नारी के व्यवहार का यह आंकलन यदि 100% सही भी हो तो भी मैं मानता हूँ कि शिक्षा, सम्मान और उचित भूमिका मिलने पर औरत व पुरुष की मानसिक दृढ़ता में में कोई अत्यधिक असमानता नहीं होगी।

    जारी.........

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  24. जावेद साहब ने घुमा-फिराकर क्यूँ कहा? आपने अपनी तरफ से कारण का अनुमान भी लगाया है। आप वक्तव्य को फिर से पढिये, उन्होंने घुमा-फिराकर कुछ भी नहीं कहा है। जो कारण आपने बताये हैं, यदि वे कारण होते तो इस व्याख्यान में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है जहाँ आध्यात्मिकता के प्रसंगों का उल्लेख आवश्यक था, वे आसानी से उनका जिक्र करने से बच सकते थे। वे केवल जिक्र ही नहीं कर रहे, बल्कि उक्त आध्यात्मिकता पर गर्व करने को अपनी तरफ से उचित भी बता रहे हैं , यहाँ तक कि ताल ठोक रहे हैं। अतः उनके सामने समस्या वह नहीं थी जो आपने अनुमान लगाया है। समस्या सीमित और सतही चिंतन की है। मुझे आस्कर अवार्ड प्रकरण का ज्ञान नहीं है, कृपया अवगत करायें। मैंने जावेद साहब के फिल्मों के प्रति रवैये का प्रश्न इसलिये उठाया था, क्योंकि मैं यह मानता हूँ कि यदि मैं किसी पर कोई आरोप लगाता हूँ, या किसी विचार को खारिज कर दूसरे विचार का समर्थन करता हूँ, तो जो आरोप मैं लगा रहा हूँ वही आरोप मेरे ऊपर या मेरे विचार के ऊपर नहीं लगने चाहिएं। खुद हत्यारा होते हुए मुझे अहिंसा का संदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। फिर भी यदि निर्लज्जता के साथ मैं यह करता हूँ तो मेरा संदेश प्रभावहीन होगा। आखिर हाथ में खून सना खंजर लेकर तो लोगों को अहिंसा के लिये तैयार नहीं किया जा सकता। मैं आपसे सहमत हूँ कि इससे दूसरों के पाप नहीं धुलते, लेकिन मुझे तो उन पर अंगुली उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं जावेद साहब को, जैसा आपने लिखा है, बड़ा चालू, या समाजविरोधी नहीं मानता हूँ और न ही मैं उनसे ईमानदारी, अच्छाई और उसूल निभाने की उम्मेदें रखता हूँ। लेकिन हाँ जब कोई व्यक्ति प्रश्न उछालता है तो मैं उससे प्रतिप्रश्न करना भी जरूरी समझता हूँ। मैं जावेद साहब की तहर कोई जानी पहचानी हस्ती नहीं हूँ, पता नहीं आपने कैसे निष्कर्ष निकाल लिया कि मैं जो लोग महात्मा बने फिरते हैं मैं उनसे कोई सवाल नहीं करता। आप कहते हैं कि आपकी आँखों पर चश्मा नहीं है, फिर आपने कैसे निष्कर्ष निकाल लिया कि मैं अनुचित तरीकों से पेट भरता हूँ और अपनी आय के विषय में बात करने से कतराता हूँ? हम परिचित भी नहीं हैं फिर आखिर आपने कैसे यह निष्कर्ष निकाला कि मैं अपनी आय के स्रोत को लेकर अपराधबोध से ग्रसित हूँ? आपने किस चश्मे से देखा? इस चश्मे को उतार लीजिये महानुभाव जिससे आपने मेरी आय के स्रोत का दिलचस्प संयोग बाबाओं के पास आने वाले काली कमाईवालों के साथ भी बैठा दिया है। इस दिलचस्प संयोग पर नाचने वाले अपने मन-मयुर से फिलहाल तो केवल इतना पूछिये कि तमाम तरह के सवालों के बाद भी 1 प्रतिशत बाबा और 1 प्रतिशत उनके चेले जो आपके प्रश्नहीन होने तक बचे रहेंगे क्या उनकी आध्यात्मिकता आपको स्वीकार होगी या इस चश्मे की और भी परत हैं। ग्रोवर साहब इस 1 प्रतिशत के विषय में सोचिये जो बाबाऔं से इसलिये दुःखी है कि उन्हौंने उसकी आस्था को धंधे में बदल दिया है और जावेद साहब से इसलिये कि वे उसकी आस्था को गाली देते हैं। फिलहाल यह तो खुला कि आप पाप-पुण्य को मानते हैं। हाँ यदि मेरी आय के स्रोत की शुचिता, और बैलेंसशीट देखने के बाद किसी चश्मे के हटने की संभावना हो तो बन्दा हाजिर है।


    और कहिये जो भी कहना है....

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  25. मित्रों,कुछ कारणों से कुछ दिनों से आपसे दूर था। शीघ्र ही पूर्ववत मुखातिब होऊंगा। तब तक आप सब कृपया जारी रहिए। खासकर प्रीतिशजी। रोमांच बना रहना चाहिए।

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  26. प्रिय प्रीतीश बारहठ जी


    मान्यवर
    अब आप कोई दर्शनात्मक पुस्तक लिख ही डालिए !

    वो क्या है कि आपकी प्रतिक्रिया कई बार पढने के बावजूद कुछ
    समझ में नहीं आई ! आप कहना क्या चाहते हैं यही स्पष्ट नहीं हो पा रहा है !

    आप भीड़ से अलग होने के प्रसंग को लादेन और रजनीश से मिक्स कर रहे हैं ! क्या आप सर्जन और विनाश के मध्य कोई रेखा नहीं देख रहे ? अपनी बात को रखना और बात है लेकिन तर्क के लिए ही तर्क करना नितांत अलग बात !

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  27. जासूस जोशी3 जून 2009 को 11:19 am

    सबसे पहले तो आपने ही कहा था कि जावेद साहेब फिल्म वालों पर क्यों नहीं बोलते ? अब आप ही.....!

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  28. जासूस जोशी3 जून 2009 को 11:45 am

    संजय जी,
    सबसे पहले तो आपने ही कहा था कि जावेद साहेब फिल्म वालों पर क्यों नहीं बोलते ? अब आप ही.....!

    उत्तर देंहटाएं
  29. भाई शमीम फराज जी, आपकी उक्त टिप्पणी प्रकाशित नहीं हो पायी है। लगता है ब्लाग में कोई चमत्कारी कीड़ा (वायरस) घुस गया है। ठीक है, निपटेंगे। ठीक समझे ंतो कृपया टिप्पणी दोबारा भेजें।
    जासूस जी मैं जल्दी ही जवाबात के साथ हाजिर होऊंगा। रोमांच के साथ धैर्य भी बनाए रखिए।

    उत्तर देंहटाएं
  30. प्रिय श्री प्रकाश गोविन्द जी,
    मान्यवर
    आपका सुझाव सर-माथे लेकिन आपको तो कई बार पढ़ने के बावजूद मेरी टिप्पणी ही समझ में नहीं आई कि मैं कहना क्या चाहता हूँ , फिर भी आपने मुझे इतना काबिल समझ लिया कि मैं ऐसी किताब लिख सकता हूँ। रहने दीजिये किताब भी शायद समझ में नहीं आयेगी।

    मुझे भी क्या है कि कई बार आपकी टिप्पणी पढ़ने के बाद भी यह समझ में नहीं आया कि आपको मेरी टिप्पणी में क्या समझ नहीं आया। कौनसा वाक्य, कौनसा संदर्भ, कौनसा शब्द?

    लगता है मेरी टिप्पणी आपने कई बार पढ़ी लेकिन शायद ध्यान से एकबार भी नहीं पढ़ी इसलिये आपको कुछ भी स्पष्ट नहीं हुआ। श्रीमान् मैंने भी यही कहा है कि लादेन और रजनीश (आपके अनुसार) को एक ही श्रेणी में खड़ा नहीं किया जा सकता, हाँलाकि दोनों ही भीड़ से अलग खड़े हैं । मैं ने रजनीश को विचारधारा के स्तर पर भीड़ से अलग नहीं माना है, मैंने यह कहा है कि भीड़ से अलग खड़े होने के आधार पर ही किसी को बौद्धक-तार्किक नहीं माना जा सकता, बौद्धकता-तार्किकता की कसौटी अलग हैं। आप मेरी टिप्पणी को ब्लागर की टिप्पणी के संदर्भ में पढ़े। नहीं समझ में आना एक बात है और नहीं समझने के लिये नहीं समझना दूसरी बात है।
    बहरहाल आप का कोटिशः हार्दिक धन्यवाद कि नहीं समझ में आने के बावजूद, (एक स्थान पर तो गलत समझने के बावजूद) आपने न केवल मेरी टिप्पणी को टिप्पणी करने योग्य समझा बल्की मुझे दर्शन पर पुस्तक लिखने योग्य समझ कर मेरा मान बढ़ाया जोकि मेरे लिये कुछ अधिक ही है।
    बार-बार धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  31. क्या यह तूफान से पहले की खामोशी है ?

    उत्तर देंहटाएं
  32. चमत्कारी कीड़ा5 जून 2009 को 10:30 am

    Anon... ji,

    नहीं ब्लाग में एक चमत्कारी कीड़ा घुस गया है, एक नया एण्टी वायरस जल्दी ही आने वाला है नाम होगा "लम्पट कार्यवाहियों के लिये औचित्य की तलाश है नास्तिकता" इस से वायरस स्केन किया जाना है।

    उत्तर देंहटाएं
  33. शुक्रिया कीड़ाचार्यजी, अपने असली रुप में आप आशा से कहीं जल्दी अवतरित हो गए। अंततः आपने माना तो कि चमत्कारों के पीछे किस तरह की निकम्मी, चालू और षड्यंत्रकारी प्रवृतियां काम करती हैं। अब दूध चम्मच से ही पीएंगे या खुद भी कुछ हाथ-पांव हिलाएंगे। या अभी और 1000-1200 साल जन्म-भोज, मरण-भोज और गिद्ध-भोज खाते रहेंगे। अपने नाकारापन को बचकाने रस्मों-रिवाजों में बचकानी गड़म-सड़म, अंत्रम-मंत्रम से कब तक ढकते रहेंगे ? परम्परा, मर्यादा, सभ्यता, संस्कृति की आड़ में कब तक अपने भिखमंगेपन को ग्लोरीफाई करेंगे ? कृपा करके अब अपने स्वार्थों के अनुरुप बनाए काल्पनिक ईश्वर के नाम पर निठल्ली-निठारी खाना बंद कीजिए और कोई वास्तविक काम शुरु करके देश की भूखी, गरीब, अशिक्षित, परेशान जनता की जान बख्श दीजिए।

    उत्तर देंहटाएं
  34. Anon..ji

    मुझे कतई आश्चर्य नहीं है आपके इस स्तर पर उतरने का। दरअसल आप जिस साधन पर सवार हैं वह अपनी सवारी को अंततः इसी स्थान पर ले आता है। यह साधक की नहीं साधन की कमजोरी है। क्या देश भक्ति, समाज सेवा, गरीबों की सेवा, मानवता की सेवा, इसी भाषा में की जानी है? तार्किकता का इतना बड़ा अस्त्र इतना जल्दी भोंथरा हो गया? इतने सारे चश्मे अब कहाँ से प्रगट हो रहे हैं, शायद आँखो पर नहीं लगाकर जेब में रखते होंगे। मुबारक हो...........जो भी बकना हो जम कर बक लीजिये। देख लीजिये निर्णय अन्ततः तर्क से नहीं भावना से ही हो रहा है। अलविदा..... ईश्वर आपके शब्द सलामत रखे।

    और बकिये जो भी बकना है....

    उत्तर देंहटाएं
  35. Grover saahab ye to sadiyo se chalaa aarahha hai tab bhi koi nahi sudherta . ek samay tha jab guru ke ashtam me shishya gurusewa me leen ho shiksha prapt karte the aaj,guru swayam vishwa kaa sabse arthik roop se sashakt prani ban arthik roop se hi sashakt praniyo ko hi shiksha de rahaa hai.
    sunder lekh ke liye dhanyavad

    उत्तर देंहटाएं
  36. संजयजी तो आपको जवाब जब देंगे, तब देंगे और चूंकि मैं उनका ब्लाग शुरु से पढ़ रहा हूं इसलिए जानता हूं कि बखूबी देंगे। पर जरा दोचार ज़रुरी बातें मुझसे भी कर लीजिए। यह जो आपने साधन वगैरह की बात छेड़ी है, क्या आपको पता है कि आपने ईश्वर तक को अपना साधन बना लिया है !? यह जो ईश्वर के नाम पर आप करते फिरते हैं, इसकी सहमति/अनुमति आप ईश्वर से कैसे, कब, कहां लेते हैं, जरा बताएंगे ? उसको प्रमाणित करेंगे ? ईश्वर अपने विचार आपके पास इम्पलीमेंटेशन के लिए बाय ईमेल भेजता है या कोरियर से ? या फोन करता है आपको ? आपने ईश्वर को अपना साधन तो क्या, सवारी बना लिया है ? उसके नाम पर अयाशियां कर रहे हैं, लोगों को सता रहे हैं। कसम है मुझे इंसानियत की, अगर मैं ईश्वर होता, चैराहे-चैराहे आप जैसों की पोल खुलवा देता कि कोई लेना-देना नहीं मेरा इस आदमी के साथ। मेरे नाम पर यह ठग रहा है लोगों को, खून चूस रहा है गरीबों का। जिसे इंसानियत की ही कोई प्रतीति नहीं उसे मेरी अनुभूति क्या होगी !?
    और यह जो आप जावेद अख्तर के पीछे लगे हैं कि फिल्मवालों को कुछ नहीं कहते, मिंयामिट्ठूजी, जरा 2005 में दिए गए इसी व्याख्यान की चंद पंक्तियां पढ़ लीजिए:-
    @@@@@@@@@@@@तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की. रामानंद सागर ने टेलीविज़न धारावाहिक बनाया. रामायण दोनों में है, लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुलसीदास और रामानंद सागर को एक करके देख लेना कोई बहुत अक्लमन्दी का काम होगा.रामानंद सागर ने अपने धारावाहिक से करोड़ों की कमाई की. मैं उन्हें कम करके नहीं आंक रहा लेकिन निश्चय ही वे तुलसी से बहुत नीचे ठहरते हैं.@@@@@@@@@@@@
    अब बताईए कि रामानंद सागर फिल्मकार नही ंतो क्या तुलसीदास हैं ? अमिताभ बच्चन का उदाहरण संजय जी दे ही चुके हैं, संभवतः आगे और भी दें। अच्छा अच्छा, आप चाहते हैं कि जावेद अख्तर फिल्मवालों का विरोध उन मुद्दों पर करें जिन पर आप चाहते हैं, (आपने कुछ उदाहरण दिए भी हैं) भले ही उन मुद्दो से जावेद का अपना कोई विरोध न हो । क्या कहने आपकी राजसी शान के। ऐसा कीजिए न, कि अपने फोन नं. और अन्य संपर्क-सूत्र वगैरह अपने किसी साधन के हाथ जावेद को भिजवा दीजिए। जब उन्हें विरोध करना हुआ करेगा आपसे सलाह ले लिया करेंगे। क्योंकि उनमें अपना तो दिमाग है नहीं, सारी दार्शनिकता तो आप ही में भरी पड़ी है। और अब तो प्रकाश गोविंद जी ने अनुमोदन भी कर दिया है। वैसे एक बात बताईए, उस दो लाइन के भजन में से तो आपने इतने-इतने अर्थ निकाल लिए जो उसके रचयिता ने भी सपने में नहीं सोचे होंगे। मगर प्रकाश गोविंद जी का आप दो लाइन का व्यंग्य नहीं समझ पाए कि देखिए तो, कैसे-कैसे लोग दार्शनिक बने फिर रहे हैं।
    बातें तो बहुत हैं मन में पर संजय जी ही कहें तो अच्छा है। हां, अगर संजय भाई नंे दो-चार दिन और लगाए तो मैं खुदको रोक नहीं पाऊंगा।

    उत्तर देंहटाएं
  37. भाई संजय ग्रोवर जी
    आप अचानक कहाँ चले गए ?
    आपके जवाब का मुझे इन्तजार है !

    मेरी कलम कुलबुला रही है .... उँगलियों में ऐंठन हो रही है किन्तु भाई अब मैं और पंगे नहीं ले सकता ! यहाँ बहुत बदनाम हो चुका हूँ ! जाने कितनों को नाराज कर चूका हूँ ! सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैंने माडरेशन भी आँन नहीं किया हुआ है ! लोग आते हैं और बिना अपना नाम-पता बताये गालियाँ देकर भाग जाते हैं !

    मुझे इन गालियों से कोई फर्क नहीं पड़ता ,,,, वो क्या है न ग्रोवर साहब मुखालफत से भी कभी-कभी शख्सियत संवारती है !

    तो भैया मैं तो आदी हूँ लेकिन अन्य लोगों का ख्याल रखना पड़ता है !

    कृपया आप आयें और श्री एक हजार आठ माननीय प्रीतीश बारहठ जी की शंकाओं का यथोचित समाधान प्रस्तुत करें !
    कह इसलिए रहा हूँ , क्योंकि मुझे भली-भांति मालूम है कि आप पूर्णतयः सक्षम हैं !

    आपकी प्रतीक्षा में

    आज की आवाज

    उत्तर देंहटाएं
  38. हम वहां (नहीं) हैं जहां से हमको भी-
    कुछ हमारी खबर नहीं आती।

    मैं किसी ईश्वरीय दुनिया में नहीं हूं, यहीं हूं अपने यथार्थ में। एक तो कुछ चक्करों में उलझा हूं, दूसरे बार-बार एक जैसे प्रश्नों (?) का उत्तर (!) देने में कोफ्त तो होती ही है। लेकिन प्रीतिश जी के रोमांच और अति उत्साह को भंग करना इसलिए अति आवश्यक है कि चुप रहने से उनकी गलतफहमियां बढ़ती हैं और दुनिया में अच्छे, मौलिक, तार्किक, संवेदनशील और अपनी सोच रखने वालों या अपनी शत्र्तों पर जीने वाले लोगों का जीना लगातार मुश्किल होता चला जाता है।

    जल्दी ही.....

    उत्तर देंहटाएं
  39. एक सार्थक बहस चलाने के लिये आभार

    उत्तर देंहटाएं
  40. बड़े शौक से सुन रहा था ज़्माना,
    ‘हमीं’ सो गए दासतां कहते-कहते

    उत्तर देंहटाएं
  41. कई मित्र तर्क देते हैं कि कई वैज्ञानिक भी धर्म/ईश्वर में आस्था रखते थे। इसका जवाब बहुत ही आसान है। एक व्यक्तित्व आपका वह होता है जो आपके परिवार, परिवेश, समाज और संस्कारों से मिला होता है। अगर कोई आस्तिक परिवार में पैदा हुआ है तो सहज है कि वह आस्तिक होगा । एकाध अपवाद की बात अलग है। एक दूसरा व्यक्तिव है जो आपको प्रकृति से मिलता है। जिसके चलते कोई गायक, चिंतक, लेखक, क्रिकेटर या वैज्ञानिक आदि बनता है। साफ़ है कि इनमें से कोई अगर नास्तिक घर में पैदा हुआ तो वो नास्तिक गायक हो जाएगा। कोई आस्तिक घर में पैदा हुआ तो आस्तिक वैज्ञानिक हो जाएगा। वैज्ञानिक भी मेरी समझ में कम-अज़-कम दो तरह के तो होते ही हैं, ज़्यादा भी हो सकते हैं। एक तो रुटीन वैज्ञानिक होते हैं या अपनी नौकरी के चलते वैज्ञानिक होते हैं। दूसरे वे होते हैं जो हर वक्त उखाड़-पछाड़, खोज-बीन या सवाल-जवाब में लगे रहते हैं। ऐसे ही वैज्ञानिक खोजें या आविष्कार करते हैं। सभी नहीं करते। अब जो लोग इसलिए वैज्ञानिक हो गए कि कोई सबजेक्ट तो पढ़ना ही है या कोई नौकरी तो करनी ही है या और कोई विकल्प नहीं है तो यही सही। उनसे बहुत ज़्यादा उम्मीदें रखनी भी नहीं चाहिएं, हां अपवाद यहां भी हो सकते हैं।

    एक नास्तिक अपनी ज़िंदगी धर्म या आध्यात्म के बिना आसानी से गुज़ार सकता है बशर्ते कि कथित आस्तिक क़दम-क़दम पर उसे परेशान न करें। मगर एक भी चमत्कारी बाबा आज की तारीख में बिना विज्ञान के एक कदम भी नहीं चल सकता। उसकी धोती, उसका चश्मा, उसका माइक, उसके ट्रक, उसके ए.सी., उसका फोटू और उसमें से निकलने वाला पाउडर, उसके मुंह से निकलने वाले आर्टीफिशयल लड्डू, उसके स्टाल, उसके पंडाल, उसका सिहांसन, उसके नकली फव्वारे और पिचकारियां, एक भी चीज़ ऐसी नहीं है जो बिना विज्ञान के बनी हो। सब कुछ विज्ञान का और विज्ञान को ही गालियां। अब इसे क्या कहें ? इस महान भावना के लिए जो भी शब्द आपके दिमाग में आता हो कृपया ख़ुद ही जोड़ लें।

    http://sb.samwaad.com/2009/12/blog-post_09.html

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  42. is saNdarbh me 3 aur mahatvapurn link :-

    1.
    http://nastikonblog.blogspot.com/2010/04/blog-post_24.html

    2.
    http://nastikonblog.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

    3.
    http://nastikonblog.blogspot.com/2010/05/blog-post_15.html

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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