ग़ज़ल
चार दिन तो आप मेरे दिल में भी रह लीजिए
पाँचवें दिन फ़िर मेरे घर में बसेरा कीजिए
राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए
आपका-मेरा तआल्लुक अब समझ आया मुझे
कीजिए सब आप और इल्ज़ाम मुझको दीजिए
दोस्त बनके जब तुम्हारे पास ही वो आ गया
खुदको अपने आपसे अब तो अलग कर लीजिए
मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
जिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए
-संजय ग्रोवर
(‘समकालीन साहित्य’ में प्रकाशित)
No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.

संजय जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल.हर एक बात लाज़वाब
ReplyDeleteवाह...बहुत खूब..
ReplyDeleteराज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए
सही है... :):)
वाह क्या वायरस फैला रहे हैं आप :)
ReplyDeleteखुबसूरत ग़ज़ल और अंदाज़-ए-बयां के क्या कहने
मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
ReplyDeleteजिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए
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बहुत बढ़िया गजल!
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संजय जी बधाई स्वीकार कीजिए!
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है।
ReplyDelete"बात फैलानी हो तो,दोस्त से कह दीजिए"-वाह!!
शकुन्तला बहादुर,कैलिफ़ोर्निया
लाजवाब गज़ल, धन्यवाद संजय जी.
ReplyDeleteदोस्त आज़कल सबसे तेज़ चैनल है
ReplyDeleteसच कहा आपने
राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
ReplyDeleteबात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए
sahi akha apne ..yahi hota hai
दोस्त बनके जब तुम्हारे पास ही वो आ गया
ReplyDeleteखुदको अपने आपसे अब तो अलग कर लीजिए
kitani khoobasuurat baat kahee aapne ... bahut khoobsoorat rachana hai .sanjay ji aapko bahut badhayi
waah achchha pryaas..
ReplyDeletenice
ReplyDeleteराज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
ReplyDeleteबात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए
sanjay bhai kya baat kahi,raje-dil k prachar-prasar ke sahi madhyam hai dost..mujhe wo gazal yad ho aayi...Dost ban-ban k mile mujh ko mitaane wale...achhi panktion k liye badhaayee...
वक्त और इंसानी आचरण की हकीकत बयां करती सुंदर ग़ज़ल
ReplyDeleteबहुत अच्छी ग़ज़ल.हर एक बात लाज़वाब........
ReplyDeletenice
ReplyDeleteसंजय जी
ReplyDeleteआशीर्वाद
आपकी गजल की एक एक शब्द पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ
विशेषतयः
मय मयस्सर गर नहीं क्यों मारे मारे फिर रहे
जिनका दम भरते थे उन आँखों में जा कर पीजीए
ऐसे ही शब्दों के मोती पिरोते रहें गजल गीत की माला में
गुड्डो दादी चिकागो से
वाह वाह , सुभान अल्लाह ! क्या कातिलाना अंदाज़ है ...और दोस्तों का तो ..कत्ल ही हो गया आज ।
ReplyDeletesanjay ji,
ReplyDeletehar sher bahut kaamyaab...
आपका-मेरा तआल्लुक अब समझ आया मुझे
कीजिए सब आप और इल्ज़ाम मुझको दीजिए
mukammal ghazal ke liye daad kubool kijiye.
Achhi hai sir. Pramod
ReplyDeleteदोस्ती के अफसानों की हकीकत को अच्छा बयां किया है संजय जी
ReplyDeleteमय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
ReplyDeleteजिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए
दोस्ती के अफसानों की हकीकत को अच्छा बयां किया है संजय जी
very nice
ReplyDeleteराज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
ReplyDeleteबात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए...
bilkul sahi kaha ... bahut khub..
अच्छी रचना, बधाई।
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