शनिवार, 3 जुलाई 2010

बात फैलानी ही हो तो.....

ग़ज़ल


चार दिन तो आप मेरे दिल में भी रह लीजिए
पाँचवें दिन फ़िर मेरे घर में बसेरा कीजिए




राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए




आपका-मेरा तआल्लुक अब समझ आया मुझे
कीजिए सब आप और इल्ज़ाम मुझको दीजिए




दोस्त बनके जब तुम्हारे पास ही वो आ गया
खुदको अपने आपसे अब तो अलग कर लीजिए




मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
जिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए

-संजय ग्रोवर

(‘समकालीन साहित्य’ में प्रकाशित)

25 टिप्‍पणियां:

  1. संजय जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल.हर एक बात लाज़वाब

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  2. वाह...बहुत खूब..


    राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
    बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए

    सही है... :):)

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह क्या वायरस फैला रहे हैं आप :)
    खुबसूरत ग़ज़ल और अंदाज़-ए-बयां के क्या कहने

    उत्तर देंहटाएं
  4. मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
    जिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए
    --
    बहुत बढ़िया गजल!
    --
    संजय जी बधाई स्वीकार कीजिए!

    उत्तर देंहटाएं
  5. शकुन्तला बहादुर3 जुलाई 2010 को 9:51 pm

    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है।

    "बात फैलानी हो तो,दोस्त से कह दीजिए"-वाह!!

    शकुन्तला बहादुर,कैलिफ़ोर्निया

    उत्तर देंहटाएं
  6. दोस्त आज़कल सबसे तेज़ चैनल है
    सच कहा आपने

    उत्तर देंहटाएं
  7. राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
    बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए

    sahi akha apne ..yahi hota hai

    उत्तर देंहटाएं
  8. दोस्त बनके जब तुम्हारे पास ही वो आ गया
    खुदको अपने आपसे अब तो अलग कर लीजिए
    kitani khoobasuurat baat kahee aapne ... bahut khoobsoorat rachana hai .sanjay ji aapko bahut badhayi

    उत्तर देंहटाएं
  9. राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
    बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए

    sanjay bhai kya baat kahi,raje-dil k prachar-prasar ke sahi madhyam hai dost..mujhe wo gazal yad ho aayi...Dost ban-ban k mile mujh ko mitaane wale...achhi panktion k liye badhaayee...

    उत्तर देंहटाएं
  10. वक्त और इंसानी आचरण की हकीकत बयां करती सुंदर ग़ज़ल

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  11. बहुत अच्छी ग़ज़ल.हर एक बात लाज़वाब........

    उत्तर देंहटाएं
  12. गुड्डोदादी4 जुलाई 2010 को 6:03 pm

    संजय जी
    आशीर्वाद
    आपकी गजल की एक एक शब्द पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ
    विशेषतयः
    मय मयस्सर गर नहीं क्यों मारे मारे फिर रहे
    जिनका दम भरते थे उन आँखों में जा कर पीजीए
    ऐसे ही शब्दों के मोती पिरोते रहें गजल गीत की माला में
    गुड्डो दादी चिकागो से

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  13. वाह वाह , सुभान अल्लाह ! क्या कातिलाना अंदाज़ है ...और दोस्तों का तो ..कत्ल ही हो गया आज ।

    उत्तर देंहटाएं
  14. sanjay ji,
    har sher bahut kaamyaab...

    आपका-मेरा तआल्लुक अब समझ आया मुझे
    कीजिए सब आप और इल्ज़ाम मुझको दीजिए
    mukammal ghazal ke liye daad kubool kijiye.

    उत्तर देंहटाएं
  15. दोस्ती के अफसानों की हकीकत को अच्छा बयां किया है संजय जी

    उत्तर देंहटाएं
  16. मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
    जिनका दम भरते थे उन आँखों से जाकर पीजिए


    दोस्ती के अफसानों की हकीकत को अच्छा बयां किया है संजय जी

    उत्तर देंहटाएं
  17. राज़े-दिल दुनिया से कहने ख़ुद कहाँ तक जाओगे
    बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए...

    bilkul sahi kaha ... bahut khub..

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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