गुरुवार, 24 जून 2010

टीवी से पहले, टीवी के बाद


सारे के सारे बादल चाँद के पीछे जा छुपे थे। हर सितारा सूरज की तरह चमकता मालूम होता था। सुबह का सूरज आँखों को शीतलता प्रदान कर रहा था। लू के थपेड़े ऐसे लगते थे जैसे माँ बचपन में सुलाते वक्त लोरी गाते हुए थपकियाँ दिया करती थी। गली की लड़कियां जो मुझे दूर से आते देखकर प्रत्यक्षतः पिछली दीवार पर लगे राजेश खन्ना के फटे-पुराने फिल्मी पोस्टर को देखने को वरीयता देती थी आज मुझे नमकीन निगाहों से निहार रही थीं। मेरे पड़ोसी का पालतू कुत्ता जो प्रति पदचाप पाँच गुर्राहट की दर से मेरा मुकाबला करता था आज मेरी गन्ध मात्र पर ऐसे पूंछ हिला रहा था जैसे ऐतिहासिक फिल्मों के दृश्यों में राजा महाराजाओं के सिरहाने खड़ी दासियाँ पंखे झुलाया करती थीं।
यह एकाएक सबको क्या हो गया था?
दरअसल मैं कल रात पहली बार टीवी पर आया था।
कविताएं तो मैंने पहले भी बहुत कहीं थी। साहित्य सृजन तो मैंने हमेशा ही इसी तरह किया था। और कल रात टीवी पर जो रचनाएं मैंने पढ़ीं उन्हें कल से पहले लोगों तक पहुंचाने के लिये मुझ इतनी ही मेहनत करनी पड़ती थी जितनी एक फिक्रमंद बाप को अपने बीमार बच्चे के हाथ-पैर पकड़ कर, नाक बन्द करके कड़वी दवा पिलाने में करनी पड़ती है। लेकिन आज लोगों की बदली हुई (पोज़ीटिव) निगाहें देखकर ही अंदाजा हो गया था कि रचनाओं का रसास्वादन उन्होंने कैसे किया था। लगता था जैसे सभी रात को रसगुल्ला खाकर सोए हों।
फिर भी लोगों के मूड में एकाएक आया यह परिवर्तन बेहद रहस्यमयी था। यह कमाल मेरी रचनाओं का था या दूरदर्शन की साख का। हालांकि दोनों ही अपने-अपने रूपों में बिल्कुल पहले जैसे थे। न मैंने अपनी रचनाओं में कोई परिवर्तन किया था न दूरदर्शन ने अपनी दृष्टि में। फिर इन दोनों के विलय से ऐसा चमत्कारी रासायनिक परिवर्तन कैसे हो गया था। इस महत्वपूर्ण रासायनिक फार्मूले को मैं शीघ्रातिशीघ्र समझकर सुरक्षित रख लेना चाहता था।
फिर मैंने एक-एक कर इन सभी घटनाओं पर दोबारा दृष्टि डालना शुरू किया जो मेरे टीवी स्क्रीन की छत तक पहुँचने के दौराने-सफर बीच सीढ़ियों में घटी थी। मेरी स्मृति के पर्दे पर सारे दृश्य टीवी के बिना सेंसर किए गए विज्ञापनों की तरह तेजी से तैरने लगे। जैसे मंचीय मुद्राएं सीखते समय मुझे किन मुश्किलात और कैसी मानसिक जद्दोज़हद से गुजरना पड़ा था। कितनी उम्र गुज़र जाने पर मेरी समझ में आ सका था कि साहित्यकार होने के साथ-साथ साहित्यकार दिखना भी जरूरी है। तब कैसे-कैसे मैंने पता लगाया था कि साहित्यिक चेहरे को फोटोजेनिक-टच देने के लिए सौन्दर्य-प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियों (अर्थात् गुटों) में से किसके उत्पादन सबसे सस्ते, असरकारक और टिकाऊ हैं।

कैसे मैंने आम जनता का प्यारा कवि बने रहने के गुर सीखे थे और जहां जनता जैसा चाहती थी वहां वैसा ही कहना-लिखना शुरू कर दिया था। साथ ही नियमित अंतराल के बाद बात-बेबात जनता की तारीफ करना शुरू कर दिया था। कैसे मैंने पद-प्रतिष्ठा-पैसा-पहुँच-पौरूष-प्रचार इन छः तत्वों के संयोग से सम्मेलनों को सफल आयोजनों में ढालना सीखा और तब ‘‘तू मुझे बुला मैं तुझे बुलाऊँ‘‘ का सफल सूत्र मेरी बीमार होती साहित्यिक सेहत के लिये रामबाण औषधि सिद्ध हुआ था। मुझे यह भी याद है कि अपने विचारों और संवेदनाओं को स्थगित करना मैंने उन लोगों से सीखा था जिन्हें यह सब करने और सीखने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। (क्योंकि वहाँ न तो विचार थे न संवेदनाएं)।

शहर में अगर मेरे होने के बावजूद उभरता कोई साहित्यकार किसी बड़े प्रकाशन में अपनी रचना तीन साल के कड़े संघर्ष के बाद छपवा पाता तो मैं तीन दिन उसके साथ चैराहे -चैराहे घूमने जितनी मामूली मेहनत से ही मशहूर कर देता कि ‘‘ये आज जो कुछ है इन्हीं की (मेरी) बदौलत हैं।‘‘ जब कि अन्दर ही अन्दर खुद मैं मरा जा रहा होता था कि जल्द से जल्द इसकी स्थिति साहित्य में सचमुच सुदृढ़ हो जाए ताकि इसके सहारे मेरी भी दो-चार रचनाएं बड़े अखबार में स्थान पा सकें। खैर! जो संपादक मेरे दोस्त बन गए थे, ख़ुद ही बता देते थे कि आज तुम्हारी रचना के विरोध में 20-25 जो ख़त आए थे, हमने रद्दी में फिंकवा दिए हैं, अब तुम क्षतिपूर्ति के लिए इतने ही ख़त प्रशंसा में अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से लिखवाकर हमें दे दो। मैं कहता, मैं तो 50 लिखवा कर ले आया हूं, चलो आधे अगली बार लगा देना। इस मामले में जिन संपादकों के स्वभाव और विचार मुझसे भिन्न होते, उनके मैं स्टाफ़ को सैट कर लेता। स्टाफ भी अगर हरामी होता तो मैं कुछ और कमीनी तरकीबें इस्तेमाल कर लेता था। आपको नहीं बताऊंगा।
तत्पश्चात् कैसे मैंने नेताओं से सम्पर्क सांठा। कैसे अधिकारियों से रिश्ता गाँठा। कैसे लोगों, विचारों, किताबों और अखबारों को दलों, वादों, पंथों, सम्प्रदायों, धाराओं, धर्मों वगैरह के हिसाब से बाँटा। कैसे-कैसे उपायों से विरोधियों का पत्ता काटा। कैसे मैंने अपने से मिलती- जुलती विचारधारा के लोगों को छाँटा।
अर्थात् ऐसी तमाम तात्कालिक, त्वरित तपस्याओं के बाद मेरे मन के मुर्गे की बांग बुद्धत्व को प्राप्त हुई और उसने जब चाहे तब अपनी इच्छा पर साहित्यिक सुबह का सूर्योदय सुलगाने का हुनर हासिल कर लिया। यानि अब इतना हुआ कि मुझे व मेरी बातों को ‘‘बच्चा है‘‘ कहकर अपने अनुभवों की नाक पर से मक्खी की तरह उड़ा देने वाले ‘बाबागण‘ मुझ पर नज़र पड़ते ही ‘‘भाई साहब हम तो आपके ही बच्चे हैं। ज़रा नज़र रखना।‘‘ जैसे दूधिया वाक्यों की (दु)र्गन्ध से मुझे आकर्षित करने के उपाय खोजने लगते। रिश्तों के विलोमान्तर का मध्यान्तर अन्ततः अपनी मौत आप मर गया था।
इस प्रकार आपने देखा कि देखने में छोटी-छोठी लगने वाले बातें महसूस करने में कित्ती बड़ी-बड़ी हो सकती हैं। खुद मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या बताऊँ और क्या छोडूँ? क्यों बताऊँ या क्यों छोड़ूं! लेकिन एक बात साफ कर दूं। जो बालबुद्धि साहित्य-छौने बल खा-खाकर बौराए जा रहे हों कि सस्ते में सफलता के सूत्रों की सन्दूकची हाथ लग गई है, वे ज़रा अपने उत्साह की अंगीठी को ठंडा कर लें। ज़माना एक बार फिर आगे निकल चुका है। टाप-लेवल साहित्यिक स्थानों की आई.ए.एस. परीक्षाओं में उपरोक्त सूत्र अब प्रिलिमिनरी परीक्षा की कुंजी से ज्यादा महत्व नहीं रखते। वक्त और परिस्थितियों के साथ-साथ सफलता के सूत्र भी बदल जाते हैं। नई परिस्थितियों एवं नई चुनौतियों के लायक फार्मूले गढ़ने के लिये प्रतिभा और सृजनात्मकता की जरूरत होती है। जिसमें होती है उसे ऐसे लेख पढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती।
और जो साहित्यशावक ईमानदारी वगैरह के आले में पड़े हों उन्हें भी कहना ज़रूरी समझता हूं कि जो ‘‘मैं‘‘ टीवी में आता हूँ वह ‘‘मैं‘‘ वह ‘‘मैं‘‘ नहीं हूँ जो ‘‘मैं‘‘ अखबार में होता हूँ। इसलिये मेरे अखबार वाले ‘‘मैं‘‘ में मीन मेख निकालने से मेरे टीवी वाले ‘‘मैं‘‘ पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। बाकी फिर देख ही ली जाएगी। हाँ।
हाँ, होते हैं दो एक साहित्यकार ऐसे भी जो जैसे जीवन में रहते हैं वैसे ही अखबार में होते हैं और वैसे ही टीवी पर आते हैं। लेकिन उनकी आमद पर न तो गली की लड़कियाँ आभारी होती हैं न पड़ौसी का ‘‘पप्पी‘‘ ताली बजाता है। अब मेरी क्या मजाल कि मैं गली की लड़कियों या पड़ौसी के पप्पी के बारे में अखबार में भी कहूँ:

वो कि जिसकी अपनी कोई अहमियत बाक़ी नही,
उनकी नज़रों में उसी की अहमियत है दोस्तो।

-संजय ग्रोवर

(23.06.1995 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

23 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ा मार्मिक और सच्चा व्यंग्य है... कुछ भी होने के साथ-साथ दिखना ज़रूरी है, पर दिखने के साथ ही "होना" भी ज़रूरी है. बिना कुछ हुए, कुछ दिखा नहीं जा सकता और अगर दिखा भी जा सकता है, तो बहुत दिनों तक नहीं. असलियत एक न एक दिन सामने आ ही जाती है.

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  2. 15 sal baad bhi yatharth hi hai aapki yah rachna,ekdam dhansu......

    padhta gaya aakhir note dekha to yakin nahi hua ki ye 15 sal pahle ka likha hua hai, aaj bhi utna hi prasangik hai........

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  3. ऐसा ही कुछ होता है जब अंधेरे में खड़े व्यक्ति पर अचानक कुछ देर के लिए सर्चलाइट की रोशनी पड़ती है और फिर गायब हो जाती है।

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  4. ये खींचतान भरी सचाई है. सभी झूलने को विवश.

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  5. बढ़ियां...
    लेकिन लोग अभी दूरदर्शन देखते हैं इस पर आश्चर्य है...

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  6. तीखा चटपटा मजेदार व्यंग...आनंद आया पढ़ कर...वाह...
    नीरज

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  7. सटीक करारा व्यंग्य....हालाँकि यह दुखद है ,पर सत्य तो यही है...

    साहित्य में भी अच्छा लिखने से जरूरी यह है की आप ढंग से अपने प्रोडक्ट(रचना) और अपना मार्केटिंग कर रहे हैं या नहीं...

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  8. Golgapee wala vyang! Paani chahe naak me chadh jay,par maze se satakte rahte hai!

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  9. "वो कि जिसकी अपनी कोई अहमियत बाक़ी नही,
    उनकी नज़रों में उसी की अहमियत है दोस्तो।"

    निचोड़ कर रख दिया - आभार

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  10. बहुत बढिया
    तीव्र कटाक्ष

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  12. अच्छा व्यंग है, बहुत कटु भी है और सत्य भी इसे स्वीकार भी करना पड़ेगा

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  13. हम क्या समझते नहीं हैं यह ‘मैं’ ‘मैं’ करके आपने किस पर लिखा है? आपको जो करना हो करते रहिए, हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। कामयाबी की चादर में सब ढंक जाता हैं। हमारे पीछे पार्टी है, हमारा मज़हब है, उसके बचाने वाले हैं, हमारा गुट है, हमारी एक इमेज है, हमारा संपादक है, आपके पीछे क्या है ?

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  14. दम सूफी जी, आप जो कोई भी हैं, आपको ध्यान देना चाहिए था कि यह व्यंग्य 15 साल पुराना है। बाक़ी आप जो कोई भी हों, मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि मुझमें एक साथ कई लोगों को उल्लू बनाने का हुनर नहीं है, कई तो क्या एक को बनाने का भी नहीं है। वैसे शायद
    ओशो ने कहीं कहा है कि जितनी गहरी हीन भावना होती है, पद-प्रतिष्ठा की तड़प उतनी ज़्यादा होती है। जितनी ज़्यादा कुण्ठा और असुरक्षा की भावना होती है, उतना ज़्यादा मन भीड़ के बीच रहने और उसे ‘कुछ कर दिखाने’ को आमादा रहता है। बहरहाल, अब तो ओशो के नाम पर भी कुछ दुकानदार एक ही तरह की भाषा में एक ही तरह की रटंत ढो रहे हैं। लगता है अब ओशो से लेकर बाबा साहब तक सबके ‘पूज्यनीय’ होने के दिन आ गए (ताकि उनके विचारों के प्रसार को रोका जा सके)। जो हर विचार को बैनर की तरह इस्तेमाल करने के या काठी की तरह ढोने के आदी हैं, उनसे ज़्यादा उम्मीद की भी नहीं जानी चाहिए। बहरहाल, आप जो कोई भी हैं, मुझे आपमें और आपकी तथाकथित उपलब्धियों में कोई दिलचस्पी नहीं। कृपया माफ़ करें।

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  15. भूत किशोर & Co.1 जुलाई 2010 को 6:56 pm

    हां हम तो ऐसे ही हैं I लकीर पीटने को ही लीक से हटना कहते हैं I तुमसे जो बन पड़े कर लो I

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  16. @भूत किशोर & Co.

    ज़माना है तुम्हारा, चाहे जिसकी ज़िंदगी ले लो
    मगर मेरा कहा मानो तो ऐसे खेल ना खेलो
    किसी दिन जाल में अपने, न मकड़ी ख़ुद ही फंस जाए...
    ज़रा नज़रों से कहदो जी निशाने पर न ख़ुद आएं....

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