सोमवार, 7 जून 2010

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?

हंस के मई अंक में मेरा एक लेख है। यह अंक नेट पर आज, लगभग एक महीना देर से अवतरित हुआ है। वजह तकनीकी रहीं होंगीं। यह लेख हंस के कालम की कुछ बातों पर प्रतिवाद-स्वरुप है। अभी एक मित्र ने फोन पर कहा कि इसे ब्लाग पर लगाकर किसकी चर्चा चाहते हो-कालम की या अपनी !? बहरहाल, मैं इसका अगला भाग और छापकर अपनी तरफ़ से क़िस्सा ख़त्म करुंगा क्यों कि क्रिया-प्रतिक्रियाओं की भाषा लगातार छिछली हो रही है और (कालमिस्ट की मंशा जो भी रही हो )मामला महिला-मुक्ति से ज़्यादा दूसरे झगड़ों पर केंद्रित होता चला जा रहा लग रहा है।

(‘हंस’ में स्पेस की मारा-मारी के चलते जो कुछ एडिट हुआ या करना पड़ा, उसका भी कुछ हिस्सा यहां आ गया है। )

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?

यादवजी, मान लीजिए आप सड़क पर जा रहे हैं। देखते हैं कि एक आदमी, दूसरे के पेट में छुरा घोंपने वाला है, आपकी पहुंच के दायरे में है। आप छुरे वाला हाथ पकड़ लेते हैं। तभी वह आदमी पूछता है कि कौन जात-धरम हो भाई ? आप कहते हैं हिंदू हूँ या इंसान हूँ या नास्तिक हूँ। जवाब आता है कि कुरान पढ़ा है कभी ? शरियत जानते हो। तुम्हे क्या पता कि क्या जायज़ है और क्या नाजायज़ ? जाओ पहले पढ़के आओ ! यादवजी, क्या आप उसका हाथ छोड़कर कुरान पढ़ने जाएंगे या ‘सब धान बाईस पंसेरी’ ही करना ठीक समझेंगे !?
यादवजी, मान लीजिए आप मुस्लिम हैं। घर में कोई बीमार है। डॉक्टर ने भी बोल दिया है कि शोर-शराबे से दूर ही रखिए नहीं तो पागल भी हो सकता है। ऊपर के फ्लोर पर ढोल-मंजीरों वाला कोई धार्मिक आयोजन चल रहा है। आपकी नसें फट पड़ने को हो रही हैं। आप ऊपर जाकर प्रार्थना करते हैं कि भाई मेरा बच्चा मर जाएगा, पागल हो जाएगा, शोर कुछ कम कर लो। प्रत्युत्तर है कि पहले सारे धर्मग्रंथ पढ़ लो फ़िर आना ऊंगली उठाने।
मान लीजिए कि तालिबान और मुल्ला-मौलवी किसी तरह यह सिद्ध कर देते हैं कि वे जो कर रहे हैं वही कुरान और शरियत में लिखा है और वही सही है तो ? तो क्या शीबा मुस्लिम स्त्रियों की मुक्ति के लिए अपने प्रयासों को छोड़ कर बुरक़ा पहन लेंगी और मैदान छोड़ देंगीं ? अगर छोड़ देंगी और सभी ऐसा करने लगेंगे तो क्या इस दुनिया में किसी गैलीलियो के लिए कभी जगह रह पाएगी ! जो चर्च आज उनसे माफ़ी मांग रहा है वही कल फ़िर उनकी छाती पर चढ़ दौड़ेगा। मेरी मूल आपत्ति हर बीमारी का इलाज धर्मग्रंथों में ढूंढने को लेकर है। फिर शीबा नया क्या कर रही हैं ? सभी एडजस्टमेंटवादी, कंफ्यूज़्ड और मीडिओकर भी तो यही करते हैं। कि नहीं ग्रंथों में तो सब कुछ अच्छा-अच्छा लिखा था पर कोई बीच में आकर गड़बड़ कर गया। मज़े की बात यह है कि हर धर्म के कट्टरपंथी भी बीच-बीच में यही तर्क देते हैं। कौन है भाई यह ‘गड़बड़िया’ जो आए दिन ग्रंथों में गड़बड़ करता है और आप पकड़ नहीं पाते। जबकि आधी से ज़्यादा दुनिया पहरेदारी में लगी है। और अगर आप पकड़ नहीं पाते तो गड़बड़ तो रुकने से रही। आप सिद्ध कैसे करेंगे कि मूल ग्रंथ कौन-सा था !? क्या इसका कोई प्रामाणिक तरीका भी है !?
अगर इस्लाम में इतना ही ख़ुलापन है तो शीबा को यह कॉलम एक हिंदी पत्रिका में क्यों लिखना पड़ रहा है ? क्या सारे उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में मुल्ला-मौलवी और तालिबान घुसे बैठे हैं ? और क्या राजेंद्र यादव को यह खुलापन इस्लाम से मिला है !? वे तो आज भी इसको पढ़ने को तैयार नहीं। अगर इस्लाम में सारी समस्याओं के हल है तो शीबा बताएं कि वहां क्लोनिंग के बारे में क्या लिखा है ? टेस्ट ट्यूब बेबी के बारे में क्या है ? सेरोगेट मदर के बारे में क्या है ? कंप्यूटर और इण्टरनेट के बारे में क्या है ? समलैंगिकता, ओरल, एनल, वोकल और लोकल सैक्स की बाबत क्या लिखा है ? जब शीबा यह बताएं तो ऐसे वाक्यांशों या अनुवादों के साथ बताएं जिनमें उक्त शब्द सीधे-सीधे आते हों। ज्योतिषियों वाली गोल-मोल भाषा नहीं चलेगी। वरना तो हिंदुत्व में भी सब कुछ निकल आएगा।
एक बार फ़िर (‘हसं’,जनवरी 2010) वे अपने कॉलम का उद्देश्य और रणनीति बताते हुए अंत में कहतीं हैं कि ‘‘इसलिए जिन्हें ‘महिला सबलीकरण’ का एकमात्र रास्ता धर्मविमुख होना लगता है, यह बहस उस वर्ग के लिए नहीं है क्योंकि महिला सबलीकरण मुहिम धर्मविहीनता की ‘युटोपिया’ का इंतज़ार नहीं कर सकती।‘‘
इस तरह बहस के संभावित सबसे बड़े विपक्ष को वे पहले ही बाहर कर देती हैं । फ़िर यह बहस किसके लिए है !? मीडिओकरों और मुल्ला-मौलवियों के लिए !? क्या ये लोग ‘हंस’ पढ़ते हैं ? वे यह बहस मदरसों और मोहल्लों में क्यों नहीं चलातीं !? अगर धर्म-विमुखता युटोपिया है तो धर्म-प्रमुखता भी अंततः हमें ‘बिन-बाल-बुश‘ की बनायी आत्मघाती, निरंकुश, कट्टर और पढ़े-लिखे अनपढ़ों की दुनिया से आगे कहां ला पायी ? वे इसे ‘बीच के लोगों की गड़बड़’ कहेंगी तो मैं भी कहूंगा कि रुस और चीन में भी ‘बीच के लोगों ने गड़बड़’ की थी। सही बात तो यह है कि सही मायने में नास्तिकता का परिचय और परीक्षा तो अभी हुए ही नहीं हैं। हमारे यहां के तो कम्युनिस्ट भी नास्तिकता और मानवता को शरमा-शरमाकर, घबरा-घबराकर अंडरगारमेंट्स की तरह बरतते आ रहे हैं।
नूर ज़हीर और कृष्ण बिहारी ने शीबा की वैचारिक अस्पष्टता की ओर इशारा किया है। ‘हंस’ नवंबर 2009 के अपने लेख ‘...खाने के और दिखाने के और!’ मे शीबा पाठकों के कथनों के सहारे अपनी रणनीति स्पष्ट करने की कोशिश करती हैं ‘इस्लाम को प्रच्छन्न रणनीति के तौर पर इस्तेमाल कर क्या ठीक निशाना साधा है.....’ वगैरह। मगर प्रगतिशीलों, सेक्युलरों और प्रखर नारीवादियों के लिए उनके मुंह से बात-बेबात, बरबस फूट पड़ने वाले ताने और कोसने, सोचने पर मजबूर करते हैं कि रणनीति इससे कहीं ठीक उलट तो नहीं !? यहां तक कि बिना किसी विशेष संदर्भ-प्रसंग के तसलीमा पर फ़ट पड़ती हैं। देखें ‘हंस’, जनवरी 2010 में ‘प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया’। उन्हें लगता है कि विरोधी उनसे इसलिए नाराज़ हैं कि वे तसलीमा या ‘हंस में छपने वाली लेखिकाओं’ की तरह यौन-क्रियाओं के सूक्ष्म डिटेल्स नहीं दे रहीं। तसलीमा का नाम आते ही वे इस कदर धैर्य छोड़ बैठती हैं कि भूल जाती हैं कि तसलीमा की प्रसिद्धि की शुरुआत इन ‘डिटेल्स’ से नहीं ‘लज्जा’ से हुई थी। कि ‘यौन-डिटेल्स’ वाली दो-चार आत्मकथात्मक क़िताबें आने से पहले ही तसलीमा ‘औरत के हक़ में’ और ‘उत्ताल हवा’ जैसी कई कृतियों के ज़रिए ख़ासी मशहूर हो चलीं थीं। कि तसलीमा की सोच बिलकुल साफ़ और भाषा एकदम सरल है। इस भाषा में विद्रोही विचारों को प्रकट करना बहुत हिम्मत का काम होता है। हश्र में निर्वासन और पत्थर मिलते हैं। हिंदी साहित्य के तोप-विद्रोही समझे जाने वाले राजेंद्र यादव की भाषा में भी यह सरलता नहीं है। कहां अपनी साफ़ सोच, बेबाक बातों और अपने हर व्यक्तिगत को सार्वजनिक-सामाजिक बना कर दुनिया भर में लड़ती हुई तसलीमा और कहां बात-बात में डरने वाले, दिन में दस बार अपनी बात बदलने वाले और ‘कुछ कहने-कुछ करने’ वाले हम ! तसलीमा के प्रति उनकी ऐसी नफ़रत का कारण सिर्फ़ इतना ही है ! या तसलीमा की ‘धर्म-विमुखता’ भी एक कारण है ? वैसे शीबा अगर स्पष्ट करें कि उनका एतराज़ तसलीमा की यौन-क्रियाओं पर है या उन्हें लिखे जाने पर है तो आगे इस संदर्भ में बहस सही रास्ते पर चल सके।

शीबा की रणनीति पर उनका अपना कन्फ्यूज़न देखना है तो ‘हंस‘, मई 2009 में छपा ‘सब धान बाईस पंसेरी’ पढ़ जाईए। जिसमें राजेद्र यादव द्वारा अपने एक संपादकीय में इस्लाम पर किए ‘हमले’ पर गुस्सा खा जाती हैं। अपनी समझ में यादवजी की ऐसी-तैसी करते हुए वे फ़िल्म ‘ख़ुदा के लिए’ के हवाले से कहती हैं ’‘पर जब मौलाना वली इस्लाम में संगीत, शिक्षा, निकाह में स्त्री की मर्ज़ी, हलाल कमाई, आधुनिक वेशभूषा व वस्त्र आदि को इस्लामी इतिहास, कुरान की व्याख्या व मोहम्मद साहब के जीवन से उदाहरण लेकर सिद्ध करते हैं तो मौलाना ताहिरी के ग़ुब्बारे की हवा निकल जाती है और उसका गुमराह किया नौजवान सरमद उसकी ही मस्ज़िद में जींस-टीशर्ट में अज़ान देकर उसे चुनौती भी दे पाता है।‘‘
चलिए, यह तो हुआ इस्लाम को रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किए जाने का मामला। पर यहां शीबा यह भी याद रखें कि इस रणनीति के तहत सरमद ख़ुद कितना भी चाहे पर अज़ान को चुनौती फिर भी नहीं दे सकता। इसे दूसरे कोण से देखें तो नतीजा यह भी निकलता है कि जींस पहनी तो क्या हुआ, करना तो वही सब पड़ा ! एक अपने कबीरदास थे जो बिना जींस पहने ही ‘ता चढ़ मुल्ला बांग दे’ गाते फिरते थे। शीबा यह भी सोचें कि इन रणनीतियों का ज़्यादा फ़ायदा अंततः ‘बिन-बाल-बुश’ को ही तो नहीं हो रहा। अभी कितने हज़ार साल और हम इन रणनीतियों पर कुर्बान करेंगे !? आगे चलें। इसी लेख में वे फिर यादवजी पर कुनमुनाती हैं, ‘आपके संपादकीय का तीसरा विरोधाभास यह है कि आप तुर्की के इस्लाम या इंडोनेशिया के इस्लाम की तारीफ़ भी कर रहे हैं और पूरे विश्व के इस्लाम को एक भी मान रहे हैं। क्या आप यह नहीं देख पाते कि जो क्षेत्र इस्लाम पूर्व की कबीलाई व्यवस्था में जकड़े हैं वहीं पर स्त्रियों पर अत्याचार अधिक हैं।’
यहां फिर वे कुछ-कुछ कट्टरपंथिओं वाला सिरा पकड़ लेती हैं कि दोष इस्लाम में नहीं, इधर-उधर हैं। और अपरोक्ष तरीके से फिर वही बात कि मुक्ति इस्लाम के भीतर ही संभव है। अब हम इसे रणनीति मानें कि कट्टर आस्था !? आगे कहती हैं कि ‘राजेंद्र जी, काश धर्म के प्रति आपकी झुंझलाहट और गुस्सा, आपको और गहरे अध्ययन व विश्लेषण की ओर प्रेरित कर पाता।’ क्या धर्म को रणनीति की तरह इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति इसके प्रति गुस्सा और झुंझलाहट रखने वाले व्यक्ति को इसके अध्ययन के लिए कहेगा !? उसके भीतर तो ख़ुद यह झुंझलाहट होनी चाहिए। इस्लाम के प्रति यह श्रद्धा भाव इस पूरे लेख में आपको दिखाई देगा। लेकिन जहां उन्हें मुफ़ीद लगता है वे इसे रणनीति भी करार दे देतीं हैं। ऐसे विरोधाभास उनके कॉलम में कई जगह हैं। एक ही लेख में ज़्यादा लिखा तो संभव है वे मुझे भी कॉलम का दुश्मन और किसी कट्टर धार्मिक संगठन का आदमी बता दें। काहिल, जाहिल और झूठ का पुलिंदा बता दें।

-संजय ग्रोवर

19 टिप्‍पणियां:

  1. हंस में पढ़ा था...और कई चीज़ों ने प्रभावित किया था...
    संपादित अंश यहां पढ़े...धन्यवाद...

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  2. मेरी समझ में ये नहीं आता कि धर्म को व्यक्तिगत मामला मानकर छोड़ क्यों नहीं दिया जाता ? उसके पीछे इतनी सर फुटौव्वल करने का क्या फ़ायदा?

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  3. sanjay ji sheeba ke lekh ham bhi padhate aa rahe hain ..bahut confused lagatin hain ve ..iss baar ke do lekhon ne jo sheeba ki madad ke liye likhe gaye hain ve toh hans ka star gira rahe hain .

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  4. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. संजय साहब अब क्या कहें धर्म की बात करने के लिये ज्यादा दिमाग नहीं लगाना चाहिये क्योंकि धर्म में हर बात का तोड़ की बातें करने वाले अनपढ़ धार्मिक होते हैं....अब अनपढ़ो से क्या बहस करना...

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  6. मुक्ति जी, धर्म व्यक्तिगत मामला तब तक है जब तक घर के भीतर है। जब वह बरास्ता सड़क पूजाघरों में शोर मचाता है, सड़कों पर तंबू तानता है, लोगों के सार्वजनिक जीवन में तमाम तरह की बाधाएं डालता है, तो व्यक्तिगत कैसे हुआ !?

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  7. संजय जी हम तो पहले ही से आपके लेखन के कायल हेँ ....ये लेख कई सारे सवाल उठाता है और उनके समाधान भी देता है बधाई ....आपका ये कहना भी सटीक है
    धर्म व्यक्तिगत मामला तब तक है जब तक घर के भीतर है। जब वह बरास्ता सड़क पूजाघरों में शोर मचाता है, सड़कों पर तंबू तानता है, लोगों के सार्वजनिक जीवन में तमाम तरह की बाधाएं डालता है, तो व्यक्तिगत कैसे हुआ !

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  8. SANJAY JI , YE DHARM KA TALIBANI VYABHICHAR HAI YAA KUCHH DER KI BUDHHI VILASTAA HAI , AAP EK ACHHE RACHNAKAR HAI , KYO APNE KRATITVA KO VIVAADASPAT BANAATE HO . KUCHH GAIJIMEDAR LOGO KO YE JIMMEDARI DE DO .... KAMNA BILLORE MUMBAI ,,,,

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  9. संजय् जी,
    इस दिशा में आपकी और मेरी सोच एक है, किंतु जहाँ तक शीबा और राजेन्द्र यादव का सवाल है दोनों की ज़िम्मेवारियां अलग अलग हैं इसलिए भूमिकाएं भी अलग अलग होंगीं। शीबा एक अच्छी सोशल एक्टिविस्ट हैं व और अच्छी होना चाहती हैं तथा राजेन्द्रजी हंस के सम्पादक मालिक की भूमिका निभा रहे हैं। शीबा जिन्हें सम्बोधित करना चाहती हैं उन्हें शायद यही भाषा रास आये [यह बात अलग है कि अभी तक वे उस ज़मीन को जोतना तो छोड़ दीजिए झाड़ू भी नहीं लगा पायी हैं] हंस किन्हीं अर्थों में अच्छा काम कर रही है और राजेन्द्र जी को उसे बनाये और चलाये रखना है। इसलिए विवादों का सदैव स्वागत है।
    बाकी थोड़ा लिखा बहुत समझना।

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  10. पता नहीं इन सम्स्यवों से निजात कैसे मिले ..... जितने भी लोग यहाँ सम्स्यवों से निजात दिलाने का जो सलुसनन देते हैं वों खुद खुद उस फार्मूलों को फ़ालों करते नहीं दीखते....आखिर जब सलुसन देने वाला खुद उसे फलो नहीं करेगा तो दुसरे कैसे उसे फ़ालों करेंगे ....कहीं ये लड़ाई के नाम पे केवल लड़ने का एक्टिंग तो नहीं कर रहे हैं............

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  11. Excellent Sanjay G
    apki lakhni very very super.
    Manmohan Vyas ( Bikaner )

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  12. सुभाष चंदर11 जून 2010 को 10:06 am

    संजय जी,
    सच कहूं तो आप मूर्ख हैं जो इस बकवास पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। नूर ज़हीर, कृष्णबिहारी और आप, तीन ही ढंग के लोगों ने इस कालम पर लिखा है। नहीं तो हर कोई इस कालम को नज़र अंदाज़ कर रहा है। हां, मेरी टिप्पणी के बाद ज़रुर कुछ लोग बात को संभालने के लिए लफ्फाज़ियां करेंगे। कहें तो उनके नाम भी बता दूं। लेकिन जिस भाषा और ‘‘तर्कों’’ में इनके गुर्गों और छद्म नामों ने ‘हंस’ के जून अंक में टिप्पणियां की हैं, इनकी रही-सही असलियत भी पाठकों के सामने आ चुकी है। इनका ख़ुदका घमंड, तानाशाह प्रवृत्ति और बड़बोलापन इनकी ज़ुबान और लहज़े से साफ़ छलकते हैं। इनका कहना है कि मुसलमानों को इस्लाम की सही जानकारी नहीं इसलिए वे भटक गए हैं। इनसे पूछिए कि आपको तो इस्लाम की सही जानकारी है, आप ज़रा अपने स्वभाव को तो देखिए ! आपको देखकर तो यही लगता है कि छूट दे दी जाए तो इस देश पर अग्रेजी बोलने वाले तलिबानों का राज होगा। 1000 साल और जाएंगे कुंए में।
    1400 साल में आप कुरान नहीं समझ पाए। अब इनकी मानें तो सारे मुसलमान काम-धंधे छोड़कर पहले अरबी सीखेंगे, फिर कुरान पढ़ेंगे। कोई ज़रुरी नहीं कि एक बार में सबको समझ में आ ही जाए। फिर दूसरे धर्मो के लोग अपने काम छोड़कर कुरान सीखेंगे ताकि मुसलमानों को समझ सकें। यानि कि 1400 साल और। यानि कि युटोपिया का भी बाप। इनको क्या समझाना संजय जी। ये मुसलमानों को वापिस गड्ढे में धकेलकर अपना कैरियर और राजनीति चमकाने का मामला ज़्यादा लगता है।
    यादवजी ने जो किया है, भुगतेंगे। आप क्यों हर वक्त उनके लिए तलवार भांजते रहते हैं ! सही-ग़लत तो देख लिया कीजिए।

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  13. संजय जी, क्या आप पता करके बता सकते हैं कि सोशल एक्टीविस्ट का कोर्स कहां होता है !? आज-कल मुझे भी बहुत शौक लगा हुआ है इसका। इसकी कोई डिग्री-विग्री होती है या समाज के कोई वड्डे लोग मिलकर तय कर लेते हैं कि भई आज से ये बंदा सोशल एक्टीविस्ट हुआ। मुझे भी न घूमने और पार्टी-शार्टी का बहुत शौक है। वो जैसे पेज 3 में दिखाते हैं न वैसे ही। मुझे भी मिल जाएगी न एक्टीविस्ट की पदवी। हमारे गांव के पंचजी से कुछ लिखाना हुआ तो मैं एक मिनट में लिखा लूंगी। ठीक है न।

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  14. सुभाष चंदर12 जून 2010 को 11:51 am

    संजय जी, आपने ठीक किया जो नयी और उम्दा पोस्ट लगा दी। वरना आप इन्हीं के ‘काम’ को बढ़ाते। एक बात हमेशा याद रखें कि आदरणीय प्रभाष जोशी जी ने कहा था कि हमने मुसलमानों को इसलिए पचा लिया कि वे हमारी जाति-प्रथा का सम्मान करते थे। यह उनकी सोच थी। वरना व्यवहारिक बात यह है कि हर धर्म में हर तरह के लोग हैं। मगर कालम को देखिए। पूरी तरह से ब्राहमणवादी चालाकियों से भरा कालम। वही आधुनिकता और वैज्ञानिकता के नाम पर अपनी श्रेष्ठता और पुरानी गंदगी को पुनः स्थापित करने की कोशिश। मौकापरस्ती की इंतिहा देखिए। कल तक जो काले-कलूटे कहे जाने योग्य लगते थे आज अपनी खाल बचाने के लिए उन्हीं की नायिकाओं वाली झलक दिखाकर, किलकारी मारकर और हलक फाड़कर चिल्लाना पड़ रहा है। हाय कैसी मजबूरी आ पड़ी।
    कल तक जो स्त्री-मित्र अजीब से और घाघ लगते थे, उन्हींने प्रायोजित प्रशंसा में लेख लिख दिया तो वही सात्र्र हो गए। जो संभोग-गुरु कल ग़रीबों के दुश्मन लगते थे आज उन्हीं में सारी संभावनाएं नज़र आने लगीं। जो प्रभाष जोशी और आडवाणी साक्षात्कार के सर्वाधिक श्रद्धेय पात्र लगते थे, आजके मौसम में वे धूल बन गए। मतलब हर चढ़ते सूरज की धोती पकड़कर लटक जाना और दूसरों को गरियाना। महिला-मुक्ति के नाम पर नंगी सांप्रदायिकता परोसता दुनिया का यह शायद पहला कालम होगा। बचकर रहें।

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  15. मैंने यह लेख हंस में पढ़ा था। यह शानदार है। खसकर पहले पैरे में उठाए गए सवाल।

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....