शनिवार, 22 मई 2010

मोहरा, अफवाहें फैला कर....

ग़ज़लें

1.
मोहरा, अफवाहें फैला कर
बात करे क्या आँख मिला कर

औरत को माँ-बहिन कहेगा
लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर

पर्वत को राई कर देगा
अपने तिल का ताड़ बना कर

वक्त है उसका, यारी कर ले
यार मेरे कुछ तो समझा कर

ख़ुदको ही कुछ समझ न आया
जब बाहर निकला समझा कर

(http://www.anubhuti-hindi.org/ में प्रकाशित)

2.

मेरी हंसी उड़ाओ बाबा
अपना दुःख बिसराओ बाबा

पहले मुझको समझ तो लो तुम
फिर समझाने आओ बाबा

मैं इक ज़िन्दा ताजमहल हूँ
आँखों में दिल लाओ बाबा

सच माफ़िक ना आता हो तो
अफ़वाहें फैलाओ बाबा

आग दूर तक फ़ैलानी है
दिल को और जलाओ बाबा

उपर वाला थक कर सोया
ज़ोर से मत चिल्लाओ बाबा

फिर आया ग़ज़लों का मौसम
फिर दिल की कह जाओ बाबा


(दैनिक ‘आज’ में प्रकाशित)


-संजय ग्रोवर

38 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों बेहतरीन, संजय भाई.

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  2. पर्वत को राई कर देगा
    अपने तिल का ताड़ बना कर...sundar

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  3. अन्दाज़ बहुत उम्दा ऒर दिलचस्प हॆ । बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. औरत को माँ-बहिन कहेगा
    लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर...

    बेहतर ग़ज़लें...

    उत्तर देंहटाएं
  5. संजय भाई, बहुत अच्‍छी ग़ज़लें कही हैं। आपकी और पोस्‍ट भी कभी समय निकालकर पढ़ता हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. संजय जी बहुत उम्दा और ताज़ी ग़ज़ल कही ... बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. मोहरा, अफवाहें फैला कर
    बात करे क्या आँख मिला कर

    औरत को माँ-बहिन कहेगा
    लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर

    पर्वत को राई कर देगा
    अपने तिल का ताड़ बना कर

    छोटी बहर में बहुत अच्छी गज़लें

    उत्तर देंहटाएं
  8. accha likha hai sanjay ji
    aap hamare portal ke liye bhi kuch likhiye....www.aajkikhabar.com


    regards
    chandrasen

    (chandrasen verma via email)

    उत्तर देंहटाएं
  9. vaah kya baat hai ,,,,jab bhi aap kahte ho -kahte ho dil kholkar , nazrana yee aapka - bole sab se dol kar,,,,, kamna mumbai

    उत्तर देंहटाएं
  10. औरत को माँ-बहिन कहेगा
    लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर


    मैं इक ज़िन्दा ताजमहल हूँ
    आँखों में दिल लाओ बाबा

    दोनों ही ग़ज़ल और इसके सभी शेर कमाल के लिक्खे हैं आपने....पर ये दोनों शेर ...ओह्ह्ह !!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. उम्दा रचनाओं के लिए संजय ग्रोवर जी को बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी दोनों रचनाएँ अच्छी लगीं। ब्लॉगर पर टिप्पणी करते समय कुछ एरर मेसेज आया, इसलिए मेल पर टिप्पणी दे रहा हूँ। मेरी बधाई एवं शुभकामनाएँ स्वीकार करें।
    -भूपेन्द्र
    (via email)

    उत्तर देंहटाएं
  13. आग दूर तक फ़ैलानी है
    दिल को और जलाओ बाबा

    उपर वाला थक कर सोया
    ज़ोर से मत चिल्लाओ बाबा

    bahut hi khoobsurat gajal...

    उत्तर देंहटाएं
  14. आदरणीय संजय जी की दोनों ही ग़ज़लें उम्दा और यथार्थ बयान करती हुई. इतनी उम्दा ग़ज़लों को लिए दिल से आभार स्वीकार कीजियेगा..बधाई !!

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत अच्छी लगीं दोनों ही गज़लें ...खासकर ये शेर--
    औरत को माँ-बहिन कहेगा
    लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर...

    उत्तर देंहटाएं
  16. प्रभावपूर्ण गज़ल, धन्‍यवाद संजय जी.

    उत्तर देंहटाएं
  17. सच माफ़िक ना आता हो तो
    अफ़वाहें फैलाओ बाबा
    behtrin gazal sir........shukriya in gazlon ke liye aapka........

    उत्तर देंहटाएं
  18. मैं इक ज़िन्दा ताजमहल हूँ
    आँखों में दिल लाओ बाबा

    आग दूर तक फ़ैलानी है
    दिल को और जलाओ बाबा

    बहुत ख़ूब
    क्या कहने,उमदा अश’आर हैं
    दाद हाज़िर है क़ुबूल फ़रमाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  19. Dhanywaad sanjay ji
    aapki gajle bhi pasand aayi
    ashok

    asshok jamnani

    VIA EMAIL

    उत्तर देंहटाएं
  20. संजय जी,

    दोनों रचनाएँ यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं। सुन्दर हैं।

    शकुन्तला बहादुर

    Shakuntala Bahadur

    VIA EMAIL

    उत्तर देंहटाएं
  21. अरे साहब ! इतने प्यारे ग़ज़लगो हैं आप , नहीं जानता था । किसी एक शे'र को कोट् नहीं करूंगा , तमाम अश्आर दाद के मुस्तहक़ हैं ।
    आइंदा भी अच्छी ग़ज़लें पढ़ने , सुख़नवरी की प्यास बुझाने की हसरत में आते रहना पड़ेगा आपके यहां । क़लम की जीनत सलामत रहे ।
    मौका मिले तो शस्वरं पर भी तशरीफ़ फ़रमाएं , अभी बह्रे हज़ज में दो ग़ज़लें मुहब्बत के नाम लगा रखी हैं , जिनमें से एक मेरी मादरी ज़ुबान राजस्थानी में है ।
    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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