सोमवार, 17 मई 2010

चालू

लघुकथा










चालू

उन्होंने जाल फेंका।
शिकार किसी तरह बच निकला।
यूं समझिए कि ख़ाकसार किसी तरह बच निकला।
भन्ना गए। सर पर दोहत्थड़ मारकर बोले, ‘‘तुम तो कहते थे भोला है। देखो तो सही साला कितना चालू आदमी है।’


-संजय ग्रोवर

31 टिप्‍पणियां:

  1. jo bacha wo chalu aur jo phans gaya wo bevakoof...dono hi suraton mein jeet apni aur hum sahi

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  2. बहुत ही असरदार। लंबे समय तक याद रहने वाली चंद रचनाओं में से एक। इस आगे कहीं कोट करूंगा। आपकी इजाजत से। धन्यवाद

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  3. वाकई बहुत चालू है - जाल में नहीं फंसा.
    बहुत सुन्दर

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  4. भन्ना गए। सर पर दोहत्थड़ मारकर बोले, ‘‘तुम तो कहते थे भोला है। देखो तो सही साला कितना चालू आदमी है।’’ ............
    आप इतने चालू हैं...........मान गए सर.....

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  5. @@@@@@@@@@@@@@@@@@@
    $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
    जनतंत्र
    पर
    रुश्दी डरपोक, हुसेन कट्टरपंथी हैं, मेरा नाम उनसे मत जोड़ें
    $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
    रविवार.काम
    पर
    मैला ढोने वाली औरतें
    $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
    तहलका
    पर
    तहज़ीब की पाठशाला
    $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
    मनोज बाजपेयी ब्लॉग
    पर
    घातक है संकीर्ण राजनीति का विष
    $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
    कस्‍बा
    पर
    कब कटेगी चौरासी- कब पढ़ेंगे आप
    $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
    @@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

    उत्तर देंहटाएं
  6. जो चाकू से बच निकले वह चाकू ही होता है !

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  7. ये सारा जग ऐसा ही है। खुद को छोड़कर सभी चालू दिखते हैं।

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  8. ye katha hai ya kisi ke upar vyangya..jo bhi hai majedar hai

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  9. बहुत बहुत बधाई। संजय जी आपका प्रयास बहुत बेहतर है।
    -संजय द्विवेदी, भोपाल

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  10. Bahut khoob sanjay ji
    kam shabdo main adhiktam kaha
    ashok

    (Asshok Jamnani via email)

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  11. कथा लघु भले ही हो मगर असर दीर्घ काल तक करने वाली है।

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  12. Hello Mama



    This was too good… Itne kam words me itni badi baat… Remarkable creation.



    Ashu

    ABHISHEK SACHDEVA

    (via email)

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  13. क्या खूब ! छोटी पर मारक !
    आभार ।

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  14. Bahut khub sanjay G.
    Apne to kamal kar dia.
    Achha hai--Bildaron ki dunia me kahi koi GHAR waah
    SANVADGHAR hi sahi- Ghar to hai-
    Ate rahenge apke Ghar Inshaallaah
    with Mubarakbaad
    zulaikha jabeen
    (via email)

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  15. मित्रो, एक दिलचस्प दीर्घकथा जो इस लघुकथा के साथ चली। मेरे जैसे लोगों के लिए यह दीर्घ ही रहती है। आपकी टिप्पणियों और प्रोत्साहन की वजह से आज मुझे दिलचस्प लग रही है, वरना अकसर दुखद ही लगती रही। कभी-कभी हास्यास्पद भी। यह लघु कथा 21-12-2006 को लिखी गयी। मेरे पसंदीदा दो ‘बड़े’ संपादकों जिन्हें मैं बहुत लोकतांत्रिक मानता रहा हूं,, ने इसे लौटा दिया था। मायूस और कन्फ्यूज़ हो गया था। अभी हाल में ख़्याल आया कि क्यों न इसे ब्लाग पर डालकर देखूं ! देखा। और....

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  16. sanjay ji,
    aapki ye rachna aaj ke samaaj ke sach ko bayaan kar rahi hai, jaal mein koi fas gaya to bholapan hai, khud ko bacha liya to chaalu hai...bahut khub likha hai aapne. badhai sweekaren.

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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