बुधवार, 16 जून 2010

वाह रे वाह

ग़ज़ल

आन को दें ईमान पे तरजीह, वाह रे वाह
वहशी को इंसान पे तरजीह, वाह रे वाह


मात्रा मोड़ के, कायदे तोड़ के, बोले गुरजी
दीजो बहर को ज्ञान पे तरजीह, वाह रे वाह


ख़ुद तो ‘सुबहू’, ‘ईमां’, ‘सामां’ लिखके खिसके-
‘नादां’ को ’नादान’ पे तरजीह, वाह रे वाह


चार छूट जब तुमने ली, दो हम क्यंू ना लें !?
गुज़रे को उन्वान पे तरजीह, वाह रे वाह


संस्कृत बोलो, फ़ारसी बोलो, ख़ुश भी हो लो
मुश्किल को आसान पे तरजीह, वाह रे वाह


अढ़सठ तमग़े, साठ डिग्रियां, बातें थुलथुल
मैल को जैसे कान पे तरजीह, वाह रे वाह


अकादमिक बाड़े में अदब के साथ कबाड़े-
रट्टू को गुनवान पे तरजीह, वाह रे वाह


दुधमुही मूरत, मीठा साग़र, अफ़ीमी सीरत-
सूरत को विज्ञान पे तरजीह, वाह रे वाह


सूरत-मूरत, छबियां-डिबियां, मिलना-जुलना
ज़ाहिर को ईमान पे तरजीह, वाह रे वाह


गुरजी नुक्ते के क़ायल और मैं गुरजी का
सो नुक्ताचीं तान के तरजीह, वाह रे वाह

-संजय ग्रोवर

(गुरजी=गुरुजी=उस्ताद)

27 टिप्‍पणियां:

  1. अढ़सठ तमग़े, साठ डिग्रियां, बातें थुलथुल
    मैल को जैसे कान पे तरजीह, वाह रे वाह

    सूरत-मूरत, छबियां-डिबियां, मिलना-जुलना
    ज़ाहिर को ईमान पे तरजीह, वाह रे वाह

    ये कहन, बहर, काफिये और रदीफ़ आप जैसे उस्ताद के बस की ही बात है...क्या ग़ज़ल कही है...सुभान अल्लाह...बेमिसाल...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. गुरजी नुक्ते के क़ायल और मैं गुरजी का
    सो नुक्ताचीं तान के तरजीह, वाह रे वाह

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह रे वाह !
    को
    वाह पे तरजीह ।
    क्रिएटिव है एक-दम । बहुत खूब ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत धारधार व्यंग्य है, जी नही बहुत ख़ास एक ग़ज़ल है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. अकादमिक बाड़े में अदब के साथ कबाड़े-
    रट्टू को गुनवान पे तरजीह, वाह रे वाह


    क्या रचना है.....
    वाह जी वाह....

    जबरदस्त लाजवाब !!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. इतनी तल्खी कहाँ से निकल पड़ी ?

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुशीला जी, शायरों के तो तल्खि़यां ही निकलतीं हैं, कोई लाॅटरियां थोड़े ही निकलतीं हैं :-)

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  9. इसको इसकी पूरी खूबसूरती के साथ कोई पढ़े और मैं सुनूँ..जी यही करता है बस !
    गज़ब की गज़ल ! कोई एक शेर नहीं ढूँढ़ पा रहा बेहतर कहने को ! सब के सब...!

    आज रीडर पर पढ़ के ही चुप नहीं रहते बना...आना पड़ा !

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  10. शैल अग्रवाल16 जून 2010 को 10:26 pm

    ये तरज़ीह
    ना उम्मीद को उम्मीद ही सही
    वाह रे वाह !!

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  11. dharti ki mitti murde se kahe ,jab se paida huwa tha tu to tuje dekhte hi hajaro bahe teri taraf hoti thi,chand minto ki gode bhi,ek janni maa ki god ka aanand lene janam liya tha sansar me aab aagya tu maout ke baad ...janni ke kokh se dharti ke kokh me.
    Regards,
    shakeel lohani.

    उत्तर देंहटाएं
  12. achi rahi apki gazal....khub wah ji wah hui khud hi..lekin achchi hai gazal bhi

    उत्तर देंहटाएं
  13. व्यंग्य करना तो कोई आपसे सीखे... वाह रे वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपके ब्लाग को पढ़ कर वाह-वाह कहने को जी करता है. बधाई .

    उत्तर देंहटाएं
  15. संजय जी पहली बार आपके ब्लॉग पर आया... ताजी ग़ज़ल पढ़ा कर वाकई मजा आ गया... विचारों का खज़ाना है आपकी ये ग़ज़ल..अपने समाज की कई विसंगतियां आपने वाह वाह में उजागर कर दी... खास तौर पर निम्न पंक्तियाँ ..

    "अकादमिक बाड़े में अदब के साथ कबाड़े-
    रट्टू को गुनवान पे तरजीह, वाह रे वाह... "

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  16. hamare kahne ke liye to kuch bacha hi nahi bhai logon ne to pahle hi wah wahi laga di......

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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