रविवार, 25 जुलाई 2010

भीड़ और फ़ितरत


लघुकथा



मैं तैरने से डरता था, डूबने से डरता था, पानी से डरता था, भीड़ से डरता था।
जाने किस झोंक में उस दिन दरिया किनारे जा पहुंचा।
‘बचाओ-बचाओ’ की उस मंद पड़ती जा रही आवाज़ के मालिक पर किनारे खड़े लोग या तो हंस रहे थे या मुंह फेर रहे थे। और मुंह फेर कर जा भी रहे थे।
मैं बहुत बहादुर न था, परोपकारी न था।
पर मुझे देखकर उन डूबती निगाहों में उम्मीद और विश्वास की जो चमक कौंधी, उसने मुझे बदल डाला।
मैं कूद पड़ा दरिया में। भंवर मुझे तैरना सिखाने लगा। लहरें बोलीं मामूली काम है, डरते क्या हो ! तूफ़ान ने पैग़ाम भेजा कि तुम अपना काम कर लोगे तभी मैं उस तरफ़ आऊंगा।
मैंने उसे बचा लिया। होश में भी ले आया। उसने आंखें भी खोली। ख़ुश था। नज़रें घुमाकर देखने लगा दुनिया को दोबारा।
क्या कहीं कुछ बदल गया था !? उसने देखा कि पहले जो लोग उसपर हंस रहे थे, अब मुझ पर भी हंस रहे थे।
वह सोचने लगा। 
एकाएक उसने मुझे दरिया में धक्का दिया और भीड़ के साथ खड़ा होकर हंसने लगा।
डूबते वक़्त मैं सोच रहा था कि दरिया से बच भी गया तो भीड़ से कौन बचाएगा !


-संजय ग्रोवर

38 टिप्‍पणियां:

  1. भीड़ के चरित्र पर अच्छा कटाक्ष !

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  2. बेहतर लघुकथा...
    अलहदा होना वाकई मुश्किल काम है...

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  3. गजब की लघुकथा
    मानवीय फितरत की दास्तान

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  4. बेहद गहरी सोच का परिचायक्।
    कल (26/7/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  5. वाकई , भीड़ से अलग होना मुश्किल काम है। भीड़ को समझाना , आईना दिखाना भी।लेकिन फ़ूट पैदा की जा सकती है, सम्वाद स्थापित कर के। अकेले भी चला जा सकता है।

    इला

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  6. इला जी, आपसे बेहतर कौन जानता होगा कि उसके लिए सर पर किसी राजनीतिक दल, किसी कट्टर धार्मिक संगठन, किसी ग़लतकामी गुट की छत्रछाया और दुष्ट इरादों की दखलअंदाज़ी बहुत ज़रुरी है।
    अपनी मनोकामनाओं से अवगत कराने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार।

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  7. अच्छी लघुकथा है, पर क्या वाकई लोग इतने एहसान फरामोश हो सकते हैं कि जो उन्हें डूबने से बचाए उसे ही डुबो दें?

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  8. मुक्ति, आप तो नास्तिक हैं, आपको क्या बताना कि इस दुनिया में जो भी होता है, लोग ही करते हैं। बात डुबोने निकालने की उतनी नहीं है जितनी भीड़ के प्रभाव में अपने चरित्र और फ़ैसलों को बदल लेने की है। इसको लेकर मेरे अपने कई अनुभव हैं। जब मैं छोटा था और सही-ग़लत को लेकर कन्फ्यूज़ रहता था तो कुछेक बार मैंने भी ऐसा किया था।

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  9. भीड़ के चरित्र पर अच्छा कटाक्ष है इस लघुकथा में!

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  10. भाई बेहतरीन लघु कथा
    -
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    कम शब्दों में जबरदस्त बात कही है
    आपने ऊपर नास्तिकता का जिक्र किया है तो कहना चाहूँगा कि आस्तिकता का ज्यादातर भाव भीड़ तंत्र पर ही आधारित होता है !
    -
    -
    भीड़ अपने आप में एक धर्म है जो हमारा चाल, चरित्र और चेहरा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है

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  11. यहाँ किसी का कोई साथ नहीं देता
    मुझे गिराके अगर तुम संभल सको तो चलो.
    ..भीड़ का चरित्र.

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  12. इंसानी फितरत को बहुत अच्छे से दिखाया है....

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  13. इससे बेहतर लघुकथा नहीं हो सकती ...श्रेष्ठ
    इतने कम शब्दों में और इतनी गहरी बात .
    बेजोड़ ..दाद हाज़िर है क़ुबूल करें

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  14. bheer se alag soch kar, jo bachate hue dikhaya, yahin manavta hai, jo sab me nahi hoti..........!! k

    koi nahi manavta harte rahti hai, lekin fir bhi thori bahut to jinda hai na.......aur aapne wahi dikhaya!!

    bahut achchha!

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  15. गहरा कटाक्ष लिये सामयिक आईना।

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  16. इंसानी चरित्र का अच्छा चित्रण ..प्रभावशाली कथा.

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  17. ओह इतनी कृतघ्नता ....एक गहरा असर छोडती अच्छी लघु कथा

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  18. Huzoor Lajawab.Antertam ki gheheraiyon tak utarti hui.Crowd has its own charecter and every person, who is the part of that crowd, has to surrender his charecter to that crowd.But the person of strong charecter will-power and dedication may change the charecter of even a wild crowd.

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  19. aapko paheli baar para ......bahut hi sukhad raha......bheer ka ek alag charitra hota hai...
    sarak per chalte sabhya se log jub bheer ka roop le lete hai tu sabke ander ka chupa shaitaan baher aa jata hai......jisko vo hamsha apne ander bandh ker rakhte hai......
    bahut khoob

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  20. उस भीड़ में शायद मैं व मेरे जैसे कई साहित्यकार भी रहे होंगे।

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  21. bahut hi prabhavshali katha thi .duniya ka sahi chitran hai .
    bahut bahut badhai


    --Rachana Srivastava

    ( VIA EMAIL )

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  22. Sufiyana talism hai kahani mein. Bheed woh ke do payr karne walo ko zinda jaladeti hai.Bheed dharm ke naam per gharbhwati ka hamal, pet cheer kar football khelti hai.Wahi bheed ek gunde ko mantri banati hai.Magar yeh bheed aaj ke hai. Yehi bheed thi jisne inklab bhi uthaeye hai aur samaj ko badla bhi hai.Yar mujhe to Gandhi wali bheed ki talash hai aur yeh Hitler wali bheed hai iske aage to bhag kar darya mein doobna hi hoga. SHAFFKAT

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  23. आपने भीड़ कि एकदम सही परिभाषा दी .. गहरे चिंतन से यह बात कही . लघुकथा के रूप में भीड़ पर एक अच्छा कटाक्ष किया आपने !

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  24. संजय जी,
    बहुत ही बढि़या लघुकथा है आपकी। यह लघु कथा कहीं न कहीं हमारे जीवन की वास्तविकताओं व मानव की असंवेदनशीलता का परिचय देती है। अब जमाना बदल गया है। अब वो लोग नहीं रहे, जो रिश्तों को निभाना जानते थे। आज के दौर में तो हम एक-दूसरे के ही दुश्मन बने बैठे है और भीड़ में अपने वजूद, मानवता व संवेदनशीलता का गला घौटकर अपने पर ही हँस रहे हैं। पुन: आपको बधाई।
    यदि वक्त मिले तो आप मेरे ब्लॉग aparajita.mywebdunia.com और charkli01.blogspot.com पर भी एक नजर जरूर डालिएगा। मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा।

    ....धन्यवाद,
    --गायत्री शर्मा

    (VIA EMAIL)

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  25. sanjayji,, bahut kuchh kah diya tamasbino ko saamajh gayee vo jo bhidd mee akele thee, talaashte rahe vo ,ke ab yaad nahi kaun kis kis se khele the ,,,,,,kamna billore mumbai

    उत्तर देंहटाएं
  26. काश कि भीड़ का चरित्र पहचान पाते।

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  27. thanks sir ,so add your community................

    --shashank badkul

    ...(VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  28. sir, i publiced a news paeaper daily janata sahkar
    you write a artical my new peaper
    VIJAY MATHRANI - 8875732350

    उत्तर देंहटाएं
  29. इसे पढ कर खलील ज़िब्रान, ईसप और खोज़ा नसरुद्दीन की कहानियां याद आ गयीं! बहतरीन!

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  30. आज का जो बहुरूपिया समय है उसमे हम भीड़ का हिस्सा न बनें और स्वार्थ ,लिप्सा ,चालाकी ,संवेदनहीनता और क्रूर होने से बचे रह सकें इसके लिए ऐसे साहित्य की जरूरत है ।

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  31. भीड़ बहुत सुन्दर लघुकथा बहुत सुंदर... बहुत २ बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  32. भीङ का कोई च​रित्र नही। भीड का ​हिस्सा ना बने। बहुत अच्छा ​लिखा ही सर जी।

    उत्तर देंहटाएं
  33. भीङ का कोई च​रित्र नही। भीड का ​हिस्सा ना बने। बहुत अच्छा ​लिखा ही सर जी।

    उत्तर देंहटाएं

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