मंगलवार, 17 अगस्त 2010

बीच में नहीं हैं अखबार

अखबार में छपने के लिए चाहिए


सम्पर्क

जो नहीं हैं मेरे पास

खाली-सा बैठा हूँ मैं
आते हैं मेरे दोस्त तो
सुनाता हूँ कविता
सुनाते-सुनाते कहने लगता हूँ
और कहते-कहते बतियाने

दोस्त सुनते हैं अनमने से
कभी नाराज़ होते हैं तो
एकाध दफ़ा ख़ुश भी होते है
अब तो एकाध बार
यह भी कहते हैं
यार कविता न होती तो क्या होता

मेरे दोस्तों को बदल रही है कविता
मेरे दोस्त भी बदल रहे हैं कविता को
मेरे भीतर का कवि पिघल कर
रोज़ नया जन्म ले रहा है

हमने अखबार हटा दिए हैं
बीच में से

-संजय ग्रोवर

रचना तिथि: 29-07-1994

23 टिप्‍पणियां:

  1. *********--,_
    ********['****'*********\*****
    **`''|
    *********|*********,]
    **********`._******].
    ************|***************__/*******-'*********,'**********,'
    *******_/'**********\*********************,....__
    **|--''**************'-;__********|\*****_/******.,'
    ***\**********************`--.__,'_*'----*****,-'
    ***`\*****************************\`-'\__****,|
    ,--;_/*******HAPPY INDEPENDENCE*_/*****.|*,/
    \__************** DAY **********'|****_/**_/*
    **._/**_-,*************************_|***
    **\___/*_/************************,_/
    *******|**********************_/
    *******|********************,/
    *******\********************/
    ********|**************/.-'
    *********\***********_/
    **********|*********/
    ***********|********|
    ******.****|********|
    ******;*****\*******/
    ******'******|*****|
    *************\****_|
    **************\_,/

    स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

    मेरे दोस्तों को बदल रही है कविता
    मेरे दोस्त भी बदल रहे हैं कविता को
    मेरे भीतर का कवि पिघल कर
    रोज़ नया जन्म ले रहा है॥

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सटीक! आज के अखबारों को हर नागरिक और जन-कवि को 'हटा' देना चाहिए।
    कविताएं अब लिखी जाएंगी !

    उत्तर देंहटाएं
  3. अखबार में छपने के लिए चाहिए
    सम्पर्क
    जो नहीं हैं मेरे पास

    Kitni sateek baat kahi hai..bahut khub..

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरे दोस्तों को बदल रही है कविता
    मेरे दोस्त भी बदल रहे हैं कविता को
    मेरे भीतर का कवि पिघल कर रोज़ नया जन्म ले रहा है
    मैं सामान्‍यतय: गद्य कवितायें पूरी नहीं पढ़ता, मगर आपकी कविताओं में एक विचित्र आकर्षण देखा है मैनें, बॉंधे रहती हैं और अंतिम छोर पर कुछ सोचने के लिये छोड़ देती हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सही ..आज कल अखबारों में हत्या के अलावा और समाचार भी क्या होते हैं ....

    दोस्त भी बदल रहे हैं ...यह पढ़ना अच्छा लगा ..कवीतायें बहुत कुछ बदलती हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  6. सर अब कोई जरुरत नहीं जुगाड़ की ब्लॉग हैं ना आप अपने दिल की बात जी खोल कर लिखिए ...हम है ना पढने केलिए.........

    उत्तर देंहटाएं
  7. PEHLE MAZAK-Bhai aajkal akbhar phadta bhi kaun hai.Doosri baat yeh
    Ruh mein yunhi nagmon ko faramosh rehne de
    kaun sunega deewane ko , kahmoosh rehne de

    उत्तर देंहटाएं
  8. मेरे दोस्तों को बदल रही है कविता
    मेरे दोस्त भी बदल रहे हैं कविता को
    मेरे भीतर का कवि पिघल कर
    रोज़ नया जन्म ले रहा है॥

    badhiya.........

    उत्तर देंहटाएं
  9. सही है कविता परिवर्तन लाती है और खुद भी परिवर्तित होती है... अखबार की मध्यस्थता की कोई ज़रूरत नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  10. मेरे दोस्तों को बदल रही है कविता
    मेरे दोस्त भी बदल रहे हैं कविता को
    मेरे भीतर का कवि पिघल कर
    रोज़ नया जन्म ले रहा है
    ...........
    यह बेहद सुखद है ! बस अख़बार न हो बीच मे !

    उत्तर देंहटाएं
  11. Jo dost aapki kavita ko badalne ki koshish kar rahe hein, mumkin hai woh chhand rahit kavita ko pasand nahin karte hon. Is lie kuch un ke lie bhi ho jaey. kya khayal hai?

    aapka, SABIR HASAN RAEES.

    उत्तर देंहटाएं
  12. badhiya...............:)

    मेरे भीतर का कवि पिघल कर
    रोज़ नया जन्म ले रहा है॥

    उत्तर देंहटाएं
  13. aapki dil ki jajbat kavita me jhalakti hai.....
    har ek ko lagata hai ye meri kahani hai...
    badhai....

    उत्तर देंहटाएं
  14. akhbaro me ab bacha hi kya hai. bahut sahi kaha aapne " akhbar hata diye hai hamne beech mein se"

    उत्तर देंहटाएं
  15. जो जी में आरहा है, अर्ज है
    खूनखराबे का इश्तिहार देखिये
    लीजिए आज काअखबार देखिये
    अखबार बीच में नहीं है यानि
    आज जी भर मुझे यार देखिये
    दोस्त पर आपको विश्वास बहुत है
    आस्तीन में छुपी दोधार देखिये
    दोस्त को दुःख में पुकारा था
    अब सारी उम्र इंतज़ार देखिये शफ्फ्कत

    उत्तर देंहटाएं
  16. akhbaar sirf khabar prakaashit hoti hai jisme samvedanshilta nahi hoti. achha hai ye akhbaar hat jaaye aur kavita janm leti rahe duniya badalti rahe. achhi prastuti, badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  17. कविताओं के लिए अखबार में जगह बची भी है क्या ???
    यूँ कविता भी बाजारवाद की चपेट में आ गया है और "जो दीखता है,वो बिकता है" की रह चल ही अपनी जगह बना पा रहा है...
    यथार्थ पर चोट करती एक प्रभावशाली कविता..

    उत्तर देंहटाएं
  18. ये अखबार हटाना अच्छा रहा...

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं ‘पुराने पोस्ट’ पर क्लिक करें-

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अनुसरण (1) अफवाहें (1) असमंजस (2) अस्पताल (1) अहिंसा (2) आंदोलन (4) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (3) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (1) इतिहास (1) इमेज (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (1) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचाई (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (1) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (57) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) खीज (1) खेल (1) गज़ल (4) ग़जल (1) ग़ज़ल (26) गाना (2) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (2) ग़ुलामी (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चालू (1) चिंतन (1) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जागरण (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) टॉफ़ी (1) डर (3) डायरी (3) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज़ (10) तन्हाई (1) तर्क (2) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (2) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (1) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नज़्मनुमां (1) नफरत की राजनीति (1) नया (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (2) निष्पक्षता (1) पक्ष (1) परंपरा (3) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (7) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पैंतरेबाज़ी (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बजरंगी (1) बड़ा (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बहस (15) बहुरुपिए (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (1) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (1) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भीड़ (1) भ्रष्टाचार (7) मंज़िल (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (6) मर्दानगी (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) मां (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रहस्य (2) राज़ (1) राजनीति (4) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) रोज़गार (1) लघु कथा (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (7) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लोग क्या कहेंगे (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (80) व्यंग्य कथा (1) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (45) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संस्मरण (3) सकारात्मकता (1) सच (1) सड़क (1) सपना (1) सफ़र (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (39) सर्वे (1) सवाल (3) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साभार (3) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (5) साहित्य में आतंकवाद (17) स्त्री-विमर्श के आस-पास (19) स्लट वॉक (1) हमारे डॉक्टर (1) हल (1) हास्य (2) हास्यास्पद (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) animal (1) atheism (1) audience (1) awards (1) Blackmail (1) chameleon (1) character (1) communism (1) cow (1) cricket (1) cunning (1) devotee (1) dishonest (1) Doha (1) dreams (1) employment (1) experiment (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) ghazal (12) god (1) gods of atheists (1) greatness (1) hindi literature (3) Hindi Satire (8) history (1) humanity (1) Humour (3) hypocrisy (3) hypocritical (2) innovation (1) IPL (1) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lyrics (3) mob (1) movements (1) music (2) name (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppressed (1) paper (1) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) plagiarism (1) poem (1) poetry (19) pressure (1) prestige (1) puppets (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) royalty (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (22) secret (1) senseless (1) short story (4) slavery (1) song (2) sponsored (1) spoon (1) stature (1) The father (1) The gurus of world (1) tradition (1) trash (1) travel (1) ultra-calculative (1) values (1) verse (3) vicious (1) woman (1) world cup (1)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....