मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ईमेल से पोस्ट का प्रचार: सही या ग़लत

महीनों कुछ न पढ़ूं पर शौचालय में कुछ न कुछ चाहिए पढ़ने को। ताज़ा अखबार मिल जाए तो कहना ही क्या ! कभी-कभी अखबार खोलते ही सर्र से कोई पैम्फलेट निकलता है और....। आप जानते ही हैं कि कहीं भी जाकर गिर सकता है। अजीब स्थिति हो जाती है। पर कभी मन में नहीं आया कि पैम्फ़लेट डालने वाले से, विज्ञापन करवाने वाले से या अखबार वाले से इसके लिए जाकर लड़ूं। उन्हें दोषी ठहराऊं। दिन में औसतन पाँच ईमेल तो ऐसे होते ही हैं जिनमें लॉटरी या अन्य किसी ज़रिए से मुफ्त में लाखों डॉलर देने की बात कही गयी होती है यानि निरा मूर्ख समझा गया होता है। आपके पास भी आते होगे। दैनिक कर्म की तरह डिलीट कर देता हूँ। कई ब्लॉगर मित्रों की नयी पोस्टों की सूचनाएं भी आतीं हैं ईमेल से। कर सकता हूँ तो तुरंत टिप्पणी कर देता हूँ, नहीं, तो बाद के लिए छोड़ देता हूँ। भूल जाता हूँ तो शर्मिंदा होता रहता हूँ। पर किसी का कैसा भी ईमेल आए, इतना बुरा कभी नहीं लगा कि उसे फटकार कर कहूँ कि मत भेजा करो। कई बार तो लोगों ने अपने रिज़्यूमे तक भेज दिए हैं नौकरी दिलाने के लिए या अन्य कारणों से। समझा दिया कि भाई आपको ग़लतफ़हमी हुई है, यहाँ प्लेसमेंट एजेंसी जैसा कुछ नहीं है। लापरवाही के चलते भी ढेरों विचित्र प्रकार के ईमेल जमा हो जाते हैं। कई बार पुराने अलबम की तरह देखने में आनंद भी आता है। मैं ख़ुद अपनी हर नयी पोस्ट की सूचना देने के लिए पिछले सात-आठ महीनों से ईमेल भेज रहा हूँ। इतने महीनों में शायद पाँचेक लोगों के मेल आए होंगे कि हमें यह ईमेल मत भेजिए। वजहें अलग-अलग थीं। जायज़ माँग थी, मैंने बंदकर दिया। बुरा मानने जैसी कोई बात मुझे नहीं लगीं।
पर मैंने एक-दो बार कुछ मित्रों को इस बात पर कुछ दूसरे मित्रों को सार्वजनिक रुप से (सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर) फटकारते देखा। जमा नहीं। आपके पास कई तरीकें हैं- ब्लॉक कर दीजिए, स्पैम में डाल दीजिए या कम-अज़-कम एक बार ईमेल से निवेदन तो कर दीजिए। फिर भी कोई न माने तो बात और है।

छात्र-संगठन परचे बाँटते हैं। हमारे कई ब्लॉगर मित्र अपने कई तरह के कार्यक्रमों की सूचना ईमेल के ज़रिए या फ़ेसबुक जैसी साइट्स के ज़रिए भेजते हैं। साहित्यिक, सामाजिक, छात्र आंदोलनों से जुड़े कई मित्र दीवारों पर परचे चेपते आए हैं। किसी न किसी मामले में हर कोई प्रचार पर निर्भर है। सारी मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद, प्रचार ब्लॉगर की मजबूरी है। अपने ब्लॉग के कलेवर को पसंद करने वाले ज़्यादा से ज़्यादा संभावित पाठक ढूंढने के लिए उसे प्रचार करना ही पढ़ेगा। बहुत लोग आपके सब्सक्राइवर बन जाते हैं तो बहुत से ऐसे भी होते हैं जो (कारण कुछ भी हो सकते हैं) ईमेल से नयी पोस्ट की सूचना मिलने पर ख़ुश होते हैं।

आपको क्या लगता है ? ईमेल से पोस्ट का प्रचार सही है या ग़लत ?

47 टिप्‍पणियां:

  1. प्रचार सही है सर...क्योंकि इसके बिना कोई भी नए लोगों तक नहीं पहुच सकता....लेकिन प्रोब्लुम तब होती है जब लोग बेमतलब कि बातों पर भी फसबूक पर टग करने लगते हैं....आप टैग करते हैं मुझे ये मुझे बहुत पसंद है..क्योंकि आप बात मुद्दों कि करते हैं...वों बहुत जरुरी बातें होती हैं...
    लेकिन दिक्कत मुझे उन लोगों से होती है जो दिन भर में ना जाने कितनी बार कवितायेँ फसबूक पर टैग करते हैं..मुझे कोई मेल करता है तो कत्तई बुरा नहीं लगता ...लेकिन जब कोई टैग करता है तो उस पोस्ट पर आने वाले कमेंट्स से मेरा पूरा इ मेल id भर जाता है तो मुझे बहुत बुरा लगता है जबकि मैं उस कविता को पसंद भी नहीं करता...inboxs साफ करने में अच्छा खाशा वक़्त जाया होता है.....
    कई बार कई लोगों को को mass करके भी बोलने पर वों टैग करने से बाज नहीं आते...तो गुस्सा आता है सर.......प्रचार जरुरी है लेकिन एक हद में राह कर ही सर ताकि दूसरे को दिक्कत ना हो इस बात का भी लोग ख्याल करें तो शायद ही हमें किसी के टैग करने से कोई प्राब्लम हो....( लेकिन आप हमें टैग करना और मेल करना ना भूलें.....शुक्रिया सर...)

    उत्तर देंहटाएं
  2. कोई अपनी पोस्ट का प्रचार करता है तो इसमें क्या बुरा है. आपको नहीं पसंद तो आप अपनी पोस्ट का प्रचार ना करें पर जो कर रहा है उसे करने दें. जब कोई अपनी पोस्ट मेरे पास कमेन्ट के लिए भेजता है तो मैं तो बड़ा खुश होता हूँ और ना चाहते हुए भी उस पर कमेन्ट जरुर देता हूँ.

    अरे मैं तो कमेन्ट देने के लिए वहा भी पहुच जाता हूँ जहाँ मेरी जरुरत नहीं होती. फिर कोई खुद ही कमेन्ट मांगे तो क्या बात है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. इसमे कुछ गलत नही है जिसे पढना हो किसी भी तरह पढेगा । एग्रीगेटर की ज़रूरत भी इसीलिये है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. संजय ग्रोवर जी

    दीप जी (विचार शून्य)और शरद जी जैसा ही मेरा सोचना है । मैं भी कई बार अपनी ताज़ा पोस्ट की सूचना मेल से भेज दिया करता हूं , मेरे पास भी अनेक ऐसी सूचना मेल बराबर आती रहती है ।

    सच तो यह है कि जिसके पास कुछ सामान है वही देखने का आमंत्रण दे सकता है ।
    हां , कुछ ऐसे भी हैं , जिनके पास गुणवत्ता की कोई सामग्री नहीं होती , फिर भी मेल भेज भेज कर तंग करते हैं , उनके ब्लॉग पर पहुंच कर निराशा ही होती है ।
    लेकिन मैंने तो ऐसे ब्लॉगर का भी दिल नहीं दुखाया ।

    हां, मुझे ऐसे कमेंट देने वालों से ज़रूर शिकायत है जो एक पंक्ति का कमेंट दे'कर दो पंक्तियों का अपनी पोस्ट का लिंक विज्ञापन साथ ही साथ चिपका देते हैं ।
    उन्हें अपनी पोस्ट की सूचना के लिए दूसरा कमेंट डालना चाहिए , वह भी तब अगर किसी की मेल आई डी ज्ञात न हो ।

    ताज़ा ग़ज़ल का इंतज़ार रहेगा , संजय भाई !
    मेल ज़रूर कर दें , कृपया ।

    शुभ कामनाओं सहित

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रचार के युग में ये सवाल दादा ? पोतड़ों और सेनेटरी नेपकीन्स के एड के दौर में हम ब्लागर्स को भी..... संप्रेषण के लिये बताना होता है तो बुरा क्या है.... टिप्पणी करना क्या आमंत्रण नहीं ? इस बहाने आप मेरे ब्लाग पर आवें यही न जिसे ना पसंद हो वो अस्वीकार करे शरद जी से सहमत

    उत्तर देंहटाएं
  6. @ Anjule
    Aapki baat sahi hai. Vaise post likhte samay FB par tag karne wali bat mere dimaag me nahiN thi.
    @All
    yah baat kisi na kisi roop me lagbhag sabhi ne kahi hai aur is-se asahmati ki koi vajah bhi nahiN lagti ki har blog ya har post aisi nahiN hoti ki comment karne ka man kare.

    उत्तर देंहटाएं
  7. sach kaha sanjay jee!! ab dekhiye ham jaise naye blogger jinke post me aisa kuchh hota nahi, lekin hamare me ye lalsa rahti hai ki koi isko padhe aur hame motivate kare..........to mera to manana hai ki mail ke throgh logo ko bulana ek dum jayaj hai:)

    उत्तर देंहटाएं
  8. प्रचार नहीं होगा, तो लोग हमारे-आपके विचारों से लाभांवित कैसे होंगे। हम लोग जो बौद्धिकता से लबालब भरे अपने पोस्ट लिखते हैं, वे बिना प्रचार के अपठनीय रह जायेंगे और देश-समाज का एक बड़ा हिस्सा उन बौद्धिक चीजों से महरूम रह जायेगा। इसलिए पोस्ट लिखिये और सब को भेजिये, जितना ई-मेल आइडी हो। आखिर सूचना क्रांति के इस युग में सभी को जानने का हक तो है ही।

    उत्तर देंहटाएं
  9. गलत सही तो नही जानता परन्‍तु इस तरह सभी सूचनाये एक ही जगह मेल में मिल जाती है

    उत्तर देंहटाएं
  10. मैं नहीं सोचता की इसमें कोई गलत है समय के अनुसार नई नई तकनीकी को अपनाना ही तो समय के साथ चलना कहलाता है आने वाला समय तो अब जीरो पेपर वाला होने वाला है. अब तो इतने सुलभ साधन की उपलब्धता को नकारने में कोई समझदारी नहीं है.

    उत्तर देंहटाएं
  11. भाई यह तो खुलापन है, जिसे ऐसे ईमेल्स से तकलीफ है वे या तो हमें स्पैम में डाल दें या हमारा पता ब्लॉक कर दें, हमें कोई तकलीफ नहीं है परन्तु हमारे मेल भेजने से एतराज करने का हक किसी को नहीं। अगर किसी को एतराज है तो बेहतर है कि वे इन्टरनेट की यह सुविधा लेना बंद कर दें। हम तो मेल भेजेंगे, भेजेंगे और भेजेंगे।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    www.vyangya.blog.co.in
    http://vyangyalok.blogspot.com
    व्यंग्य और व्यंग्यलोक
    On Facebook

    उत्तर देंहटाएं
  12. Saaf galat hai, ye spamming hai aur ishke liye 1 lakh ka jurmana bhe hai.

    Aagar koi new email apne mobile per pane ke liye paise deta ho..


    -Kunnu Singh

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  13. इसमें गलत कुछ भी नहीं है ! मेरे पास भी ई मेल के ज़रिये कई नयी पोस्ट्स की सूचनाएं आती हैं और अक्सर ये मेल्स बेहतरीन नए ब्लॉग्स पर पहुँचने का ज़रिया बन जाती हैं ! कई बार अपने मित्रों तक अपनी पोस्ट की सूचना इसलिए भी देना ज़रूरी हो जाता है कि रचनाओं के इतने विशाल महासागर में कहीं वे इसे मिस ना कर दें ! फिर पोस्ट को देखना और ना देखना तो आपके अपने विवेक पर ही निर्भर करता है ! मन हो तो देखिये वरना डिलीट कर दीजिए !

    उत्तर देंहटाएं
  14. मुझे तो भेजिये...वैसे ब्लॉग प्रमोशन मेल्स को असुविधाजनक माना जाता है..लेकिन कोई आपके पसंद का कंटेंट दे रहा है तो मन करता है कि सूचना ज़रूर मिले...
    जारी रखे.....लेकिन ये सज्जनता का भाव भला है कि पूछ लें कि असुविधा हो रही हो तो न भेजें.

    शुभेच्छाएं.


    sanjay patel

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  15. संजय भाई


    इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है।

    आखिर किसी तरह तो सब तक पहुँचना होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  16. मेरे ख़याल से तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं. कितने ई मेल आते हैं....अगर कोई अपनी पोस्ट के बारे में बता रहा है तो क्या बुराई है....आप मुझे मेल करते रहें ग्रोवर जी. कुछ नई चीज़ों की जानकारी milti hai.

    शिरीष कुमार मौर्य
    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  17. भाई मैं ई-मेल द्वारा भेज नहीं पाता, पर कमेंट करते वक़्त आमंत्रित ज़रूर कर जाता हूं। और मेल के साथ लिंक भी मिल जाता है। तो इसमें बुराई क्या है। घर बैठे मिल गया लिंक। अगर इस माध्यम से न मिले तो मैं तो कई पोस्टों तक पहुंच ही न पाऊं। अग्रीगेटर भी एक समय के बाद उसे हटा देते हैं, मेरे मेल बॉक्स में तो यह तब तक पड़ा रहता है जब तक मैं न हटा दूं।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    चक्रव्यूह से आगे, आंच पर अनुपमा पाठक की कविता की समीक्षा, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

    उत्तर देंहटाएं
  18. mere hisaab se bilkul sahi hai...dikkat kya hai bhai agar koi apni rachna likhne ke baad usey saanjha karna chaahe email ke zariye....main to hamesha hee aisa karta hoon!!

    उत्तर देंहटाएं
  19. मुझे लगता है कि ब्‍लॉग्‍स अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम हैं और अभिव्‍यक्ति का उद्देश्‍य संप्रेषण होता है। कोई ब्‍लॉगर अगर यतन से विभिन्‍न संगत ई-मेल प्राप्‍त कर ई-मेल से अधिक से अधिक संभावित संपेषण चाहता है तो इसमें सिद्धान्‍तत: कुछ ग़ल़त नहीं। लेकिन मेल प्राप्‍तकर्ता के लिये एक सुगम मार्ग होना चाहिये आपकी मेल सूची से हटने के लिये। कई विकल्‍प हो सके हैं; मेरा विकल्‍प निम्‍नानुसार है:

    मान्‍यवर,
    रास्‍ते की धूल पर एक नयी पोस्‍ट लगाई है, समय निकाल सकें तो अवश्‍य पधारें।
    http://rastekeedhool.blogspot.com/2010/09/blog-post_29.html
    अगर आप भविष्‍य में इस विषय में मेल प्राप्‍त न करना चाहें तो कृपया इस मेल को ब्‍लैंक लौटा दें जिससे आपकी ई-मेल आई डी सूची से हटाई जा सके। हो सकता है पूर्व में आपके द्वारा इस प्रकार लौटाई गयी मेल पर कार्रवाई न हो पायी हो; उसके लिये मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।
    सादर
    तिलक राज कपूर
    If this mail has caused any discomfort, kindly reply it blank. Your E-mail ID will be removed from the list. I have exercised all care in removing names in past but if I missed your previous returned mails, I sincerely apologize for that.
    Thanks
    Tilak Raj Kapoor

    इसके बाद जो मेल मुझे ब्‍लैंक लौटाये जाते हैं उनकी ई-मेल आई डी सूची से हटा देता हूँ। यह निरंतर प्रक्रिया है किसी किसी से ब्‍लैंक मेल पहली बार में प्राप्‍त नहीं होता, बाद में आ जाता है।
    एक बात तो निश्चित है कि यदि किसी अपरिचित को मेल भेजा गया है तो उसकी सुविधा प्राथमिकता होनी चाहिये। अन्‍यथा भी जो रुचि नहीं रखता उसे मेल भेजना निरर्थक है।

    उत्तर देंहटाएं
  20. प्रतिदिन पैंतालीस से पचास मेल पोस्ट पढने के आग्रह वाले मेरे पास आते हैं...यदि हफ्ते भर के लिए कहीं छुट्टियों में चले जाओ तो आने पर मेल का यह अम्बार जबरदस्त खीझ देता है...
    इनमे से बीस पच्चीस प्रतिशत पोस्ट ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़कर लगता है यह मेल का जरिया न होता तो इतनी अच्छी पोस्ट न पढ़ पाती...
    अब कैसे निर्णय करूँ कि मेल द्वारा यह प्रचार सही है या नहीं ??????
    वैसे मुझे लगता है किसी भी व्यक्ति की दो चार पोस्ट पढ़ लोग अंदाज़ा लगा ही लेते हैं कि अमुक क्या और कैसा लिखता है और फिर पाठक अपने रूचि के ब्लॉग पर स्वतः ही चला जाता है...जिन्हें अच्छा पढने भर से मतलब है,वे यह नहीं देखते कि प्रति पोस्ट टिपण्णी उन्होंने दी है या नहीं या सामने वाले ने उनके पोस्ट पर टिपण्णी की है या नहीं..पर हाँ,पर आज की जो स्थिति है,वह केवल पढने की ही नहीं है..टिप्पणियों के आदान प्रदान और टिप्पणियों की संख्या के आधार पर ही लेखन को सार्थक मानने की है...तो ऐसे में मेल/फोन या अन्य किसी भी माध्यम से प्रचार करना अधिकाँश को जंचता है.

    व्यक्तिगत रूप में मेरा विश्वास है कि यदि लेखन से निष्ठां पूर्वक जुड़े हुए हैं हम तो टिपण्णी मोह से सर्वथा ऊपर उठे रहना चाहिए...और दूसरी बात,जैसे सुगंध किसी प्रचार का मुहताज नहीं होता,ऐसे ही अच्छे लेखन को प्रचार की आवश्यकता नहीं होती...अतः इसमें रत लेखकों को चाहिए कि लेखन कर्म में 100 % ध्यान दें,विज्ञापन में नहीं...

    उत्तर देंहटाएं
  21. कुन्‍नू सिंह जी ने कहा 'साफ़ ग़ल़त है, ये स्‍पैमिंग है और इसके लिये 1 लाख का जुर्माना भी है'

    यह नई जानकारी है जिसके प्रति गंभीरता अपेक्षित है।

    उत्तर देंहटाएं
  22. संजय जी
    आपका प्रश्न है

    ईमेल से पोस्ट का प्रचार: सही या ग़लत

    सही या गलत बात ये नही ..बात है कि क्या सिर्फ जो मेल में बताये कि उन्होंने ये पोस्ट डाला है उसको पढ़ा जाए और टिप्पणी कि जाये या फिर जो आपकी नज़र में अच्छा लिखा है उसमे टिपण्णी कि जाये..
    प्रचार प्रसार करना गलत नहीहै..मगर बकवाश पे भी वह वह करना जरुर गलत हैआप राय दे ताकि सामने वाला सुधर कर सके लेखन में ये सही है..
    बाकि ऐसा मेरा सोचना है....वो मैंने बता दिया .
    आभार
    सखी
    sakhi singh

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  23. प्रचार ही तो है, इसमें ग़लत क्या?
    आप तो भेजिये:)

    उत्तर देंहटाएं
  24. अमाँ जिसे नहीं चाहिए होगा वह कह देगा कि मेल न भेजिए। इसमें ऐसा क्या जटिल है?

    -girijeshrao

    (VIA email)

    उत्तर देंहटाएं
  25. Every one has his own style of publicity, so difficuilt to decide about if prachar by post is correct or not.
    rakesh goswami from jodhpur.

    उत्तर देंहटाएं
  26. निश्चित ही ब्लाग की सूचनाएं ईमेल से भेजा जाना उचित है। इस तरह से प्रचार से पोस्ट पाठकों को आसानी से सुलभ हो जाती है। फिर मार्केटिंग का तो जमाना ही है। इससे हमें तमाम नई बातें पता चलती हैं जो हम नेट पर सिर खपाने पर भी नहीं पता कर पाते। और जिसे इसकी जरूरत महसूस नहीं होती, वो तो पढ़ने से पहले ही डिलीट कर दिया करते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  27. गलत !
    जो आपको चाहने वाले हैं वह ई-मेल सदस्यता ले लें ।

    यदि यह विकल्प न भी हो, तो भी एक पोस्ट लिख कर फेरी लगाना अशोभनीय है !

    -डा. अमर कुमार

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  28. इसमें मुझे कुछ गलत नहीं लगता। जिन्‍हें नहीं पढना होता है, वे सूचित कर देते हैं। उन्‍हें मेल नहीं भेजा जाता।
    अनुराग

    उत्तर देंहटाएं
  29. अब देखिए ना बताने के बाद भी आप नहीं पहुंचे।
    तो पाठक तो सलेक्टिव होता ही है। आप बताइए या न बताइए, उसे पढना होगा तो पढेगा, न पढना होगा तो ना पढेगा। टिप्पणी देना होगा तो देगा, न देना होगा तो न देगा। आप तो सिर्फ़ मेल की बात किए हैं, और भी तो माधयम है, एक की चर्चा तो कर ही चुका हूं, अन्य कई हैं, जैसे ... चैट द्वारा, फोन द्वारा, कुछ अन्य ब्लोगर्स के द्वारा, कुछ अन्य ब्लोगर्स के पोस्ट द्वारा, कुछ चर्चा के द्वारा, कुछ और भी होंगे। क्यों न इस पर शोध किया जाए।
    आपकी इस पोस्ट से हम जैसे भिखारी प्रचारक को यह फ़ायदा ज़रूर हुआ कि पता चला कि किनके पास कटोरी फ़ैलाना है किनके पास नहीं।
    आभार इस प्रस्तुति के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  30. Nothing wrong. Those who do not want to read may just delete the mail.

    उत्तर देंहटाएं
  31. kyaa kahein sanjay ...

    jaise aap nahin samjh sake ki ham kyaa kah rahe hain..
    waise hi ham bhi nahin dsamjh se ki aap kyaa kahalwaanaa chaahte hain....

    -मनु "बे-तख़ल्लुस"

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  32. मित्र, आप सन्‍लग्‍न फाईल मे देख सकते है कि अन्‍वच्छित ईमेल के कारण मेरा ईमेल बाक्‍स कैसे कूडे का डिब्‍बा बना हुआ है। आपको फिर भी भेजना हो भेजो :)

    (+ an attachment)

    -Pramendra Pratap Singh

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  33. मुझे कोई समस्‍या नहीं है। क्‍योंकि समस्‍या होने पर एक बार बता दीजिए
    दुबारा आए तो ईमेल ब्‍लॉक करने ज्‍यादा समय नहीं लगता ।

    -Arkjesh

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  34. आदरणीय

    ए मेल के ज़रिये
    पोस्ट की सूचना देने में किसी भी तरह से
    कोई बुराई नहीं है

    -muflis dk

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  35. सबसे अच्छा यह लग रहा है कि लगभग सभी ने गम्भीरता से मुद्दे पर बात की, किसीने हल्के में लेने या मज़ा लेने जैसे भाव नहीं रखे। मुझे व्यक्तिगत रुप से यह फ़ायदा हुआ कि दसेक और लोगों ने अपनी हिचकिचाहट तोड़ी और मैंने उनके नाम भी लिस्ट से निकाल दिए। कुछ लोगों ने इसे मेरी व्यक्तिगत समस्या की तरह भी लिया, मगर आप सब, ख़ासकर जो लंबे समय से ब्लागिंग कर रहे हैं, जानते हैं कि यह किसीकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है।
    अगर हम तयशुदा परिभाषाओं में न जाएं तो मुझे लगता है कि प्रचार तो उसी दिन शुरु हो जाता है जिस दिन आप अपने विचार अपने से बाहर प्रकट करना शुरु कर देते हैं। ब्लॉग पर पोस्ट डालना नेट की दुनिया में प्रचार का ही पहला क़दम है। वैसे मैं सोचता हूं कि मुफ्त की सुविधाएं न होतीं तो हममें से कितनों की सामर्थ्य थी कि दस-दस ब्लॉग बनाकर उसपर मनमानी सामग्री का ढेर लगा देता !?
    और कोई किसी को ‘जबरन मेल’ कैसे पढ़वा सकता है !? जब तक आप अपने हाथ से लिंक पर क्लिक नहीं करेंगे, वह खुल कैसे जाएगा ? ऐसा काला जादू किसी के पास नहीं है भैय्या !
    बहरहाल निचोड़ तो गिरिजेशराव जी, अर्कजेश जी आदि ने दो-दो पंक्तिओं में दे दिया है। इसमें असहमति की कोई बात ही नहीं कि अगर रोज़ना 100-200 मेल्स का ढेर लग जाए तो ढूंढने-मिटाने में खीज आती है। लेकिन मुझे लगता है कि जब एक सीधा-सा विकल्प सामने हो तो इधर-उधर के रास्ते तलाशना, किसी और बात की तरफ़ भी संकेत करता है। पहली मेल के आते ही आप साफ़-साफ़ चार शब्दों में कहिए कि भाई मत भेजिए, बात ख़त्म। अब आप छः महीने तो किसी से कुछ कहें नहीं और बाद में एकाएक हल्ला बोल दें तो यह अपनी कमी की सज़ा दूसरे को देना है। पहली समस्या तो मुझे यह लगती है कि हमारे यहां साफ़ बात करने का न तो चलन है न आदत। दूसरे, कई लोग कमेंट के बदले कमेंट की आस रखते हैं और वे यह भी मानकर चलते हैं कि दूसरा भी सिर्फ़ कमेंट की ही वजह से सूचना मेल करता है। ऐसे लोगों की आस टूटती है तो धैर्य भी छूट जाता है। अब आपके सामने दो एक ऐसे लोगों के कमेंट भी रख दिए हैं जिन्होंने आज से पहले कभी मुझे मेल न भेजने को कभी नहीं कहा और अभी तक सीधा न कहकर इशारे ही किए जा रहे हैं। सोचिए कि यह किसकी कमी है।
    रंजनाजी, तिलकराज कपूर जी और मनोज कुमार जी ने यथासंभव कई पहलुओं को समेटते हुए, निष्पक्षता से अपनी बात रखी है। रंजनाजी से मैं यही निवेदन करुंगा कि नए पाठकों तक पहुंचने के लिए तो फ़िलहाल यही रास्ता है।
    जहां तक कुन्नू सिंह जी के कमेंट की बात है तो उन्होंने आखिरी पंक्ति में मोबाइल का संदर्भ भी जोड़ दिया है। सो जब तक कंफर्म न हो कि जुर्माने की बात उन्होंने सिर्फ़ ईमेल के लिए कही है, और यह जानकारी उन्हें मिली किस स्रोत से है, तब तक यह एक भ्रामक सूचना ही मानी जानी चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  36. कुन्नू सिंह जी का दायित्व बनता है कि खुलासा करें ।

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  37. sanjay ji...koi pareshani nahi,balki suvidha ho jaati hai seedhe post tak pahunch jaate hai...


    -asha dhaundiyal

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  38. Dear Sunjay ,

    You are sending every time good articles.


    Thanks
    Devmani Mishra

    (VIA EMAIL)

    उत्तर देंहटाएं
  39. इस मे कोई हर्ज नही है।ई मेल सो पोस्ट आने पर मै तो जरूर पढ़ता हूँ ।

    उत्तर देंहटाएं
  40. संजय जी मेरे विचार से तो सही है.आपकी पोस्ट की जानकारी मेल से ही मिलती है.किसी को मेल नहीं लेना तो जेसा अपने कहा .ब्लोक कर दे .१०० से अधिक मेल मेरे पास भी आते हैं कुल १० मिनिट लगते है सोर्टिंग और डीलिट में और क्या .

    उत्तर देंहटाएं
  41. चर्चा में एक बात निकल कर आई जो ई-मेल भेजने और टिप्‍पणी देने को जोड़ती है। मेरा मानना है (मैं भी मानूँ तब भी) कि टिप्‍पणी एक पृथक विषय है जो मेल प्राप्‍त करने वाले का विषय है और मेल भेजी गई है का आशय यह लिया जाना त्रुटिपूर्ण होगा कि टिप्‍पणी चाही गयी है। मैं लगभग 800 मेल आई डी पर सूचना देता हूँ टिप्‍पणी 50 के ल्रभग ही प्राप्‍त होती हैं; हर बार कुछ नये नाम होते हैं कंछ पुराने अनुपस्थि‍त होते हैं; इसका यह आशय तो कदापि नहीं कि शेष 750 ई-मेल आई डी निरर्थक हैं। इनमें से कई ऐसे होते होंगे जो रचना पढ़ते होंगे लेकिन किसी कारण टिप्‍पणी नहीं दे पाते अथवा देने की आवश्‍यकता नहीं समझते। पोस्‍ट की सूचना देने के साथ ही भेजने वाले की उद्देश्‍यपूर्ति हो जाना चाहिये और उसे इतने से प्रसन्‍न रहना चाहिये। इसी प्रकार प्राप्‍तकर्ता को भी इसे केवल सूचना के रूप में लेना चाहिये न कि टिप्‍पणी का निमंत्रण। अगर इतनी स्‍पष्‍टता बनी रहे तो मुझे लगता है कि आपत्तियों का स्‍वत: निराकरण काफ़ी हद तक हो जाता है।
    मैं चाहूँगा कि कम से कम हिन्‍दी ब्‍लॉगर्स तो सर्वसम्‍मति से इस प्रकार का प्रोटोकॉल तय कर सकते हैं जो उनकी आपत्ति का निराकरण कर सके जिन्‍हें इस प्रकार के मेल्‍स से आपत्ति है।

    उत्तर देंहटाएं
  42. बिलकुल, तिलकराज जी, टिप्पणियां ज़्यादा महत्व वहां रखती हैं जहां कोई बहस चल रही हो। वहां भी टिप्पणियों की संख्या के बजाय बहस का स्तर देखा जाना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  43. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं ‘पुराने पोस्ट’ पर क्लिक करें-

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अनुसरण (1) अफवाहें (1) असमंजस (2) अस्पताल (1) अहिंसा (2) आंदोलन (4) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (3) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (1) इतिहास (1) इमेज (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (1) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचाई (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (1) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (57) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) खीज (1) खेल (1) गज़ल (4) ग़जल (1) ग़ज़ल (26) गाना (2) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (2) ग़ुलामी (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चालू (1) चिंतन (1) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जागरण (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) टॉफ़ी (1) डर (3) डायरी (3) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज़ (10) तन्हाई (1) तर्क (2) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (2) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (1) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नज़्मनुमां (1) नफरत की राजनीति (1) नया (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (2) निष्पक्षता (1) पक्ष (1) परंपरा (3) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (7) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पैंतरेबाज़ी (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बजरंगी (1) बड़ा (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बहस (15) बहुरुपिए (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (1) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (1) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भीड़ (1) भ्रष्टाचार (7) मंज़िल (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (6) मर्दानगी (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) मां (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रहस्य (2) राज़ (1) राजनीति (4) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) रोज़गार (1) लघु कथा (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (7) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लोग क्या कहेंगे (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (80) व्यंग्य कथा (1) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (45) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संस्मरण (3) सकारात्मकता (1) सच (1) सड़क (1) सपना (1) सफ़र (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (39) सर्वे (1) सवाल (3) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साभार (3) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (5) साहित्य में आतंकवाद (17) स्त्री-विमर्श के आस-पास (19) स्लट वॉक (1) हमारे डॉक्टर (1) हल (1) हास्य (2) हास्यास्पद (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) animal (1) atheism (1) audience (1) awards (1) Blackmail (1) chameleon (1) character (1) communism (1) cow (1) cricket (1) cunning (1) devotee (1) dishonest (1) Doha (1) dreams (1) employment (1) experiment (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) ghazal (12) god (1) gods of atheists (1) greatness (1) hindi literature (3) Hindi Satire (8) history (1) humanity (1) Humour (3) hypocrisy (3) hypocritical (2) innovation (1) IPL (1) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lyrics (3) mob (1) movements (1) music (2) name (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppressed (1) paper (1) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) plagiarism (1) poem (1) poetry (19) pressure (1) prestige (1) puppets (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) royalty (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (22) secret (1) senseless (1) short story (4) slavery (1) song (2) sponsored (1) spoon (1) stature (1) The father (1) The gurus of world (1) tradition (1) trash (1) travel (1) ultra-calculative (1) values (1) verse (3) vicious (1) woman (1) world cup (1)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....