गिद्ध ने गुहार लगाई,
‘वे मुझे नोंच-नोंचकर खा रहे हैं’
बंदर ने बताया,
‘नकल करना बहुत बुरी बात है’
साँप ने सरगोशी की,
‘लगता है मेरी आस्तीन में कोई छुपा है’
शेर ने शिकायत की,
‘आखि़र कब तक मेरा हक़ मुझे नहीं मिलेगा’
गीदड़ ने ‘गायडेंस’ दी,
‘जो डर गया समझो मर गया’
लोमड़ी लाल-पीली होने लगी,
‘हद दर्जे के लालची हो’
कछुआ कुनमुनाया,
‘अब और आलस्य ठीक नहीं’
खरगोश खाट के नीचे से बोला,
‘हिम्मत है तो आजा सामने’
घुसपैठिया घुन्नाया,
‘मैं अपने घर पर किसी को ग़ैर-क़ानूनी कब्ज़ा
हरग़िज़ नहीं करने दूंगा’
साहित्य ने सबको सुना, समोया, देखा, झेला,
कहा
यहाँ तक कि बका
और हंसते-हंसते उसकी आँख से
आंसू निकल पड़े
अपने-अपने सुरक्षित स्वर्गों में बैठे
साहित्य के देवताओं ने घोषणा की,
‘ये तो ख़ुशी के आंसू हैं’
-संजय ग्रोवर
रचना तिथि: 30-07-1994
(तकरीबन सोलह साल पहले लिखी इस कविता को बचकाना मानकर एक तरफ़ फ़ेंक रखा था। आज सोचा दोस्तों के सामने रखने में हर्ज़ भी क्या है !)
No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
Saturday, September 4, 2010
साहित्य-थिएटर
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sundar prasturi
ReplyDeleteaabhar..
yogendra kumar purohit
M.F.a.
BIKANER,INDIA
सुन्दर और विचार युक्त रचना के लिए बधाई.
ReplyDeleteआपकी कविता बहुत अच्छी लगी.....
ReplyDeleteगहरी सी लगती बात...
ReplyDeleteबेहतर...
कमाल की कविता है संजय भाई....
ReplyDeleteयह रचना व्यंग्य नहीं, व्यंग्य की पीड़ा है। पीड़ा मन में ज़ल्दी धंसती है।
ReplyDeleteफ़ुरसत में .. कुल्हड़ की चाय, “मनोज” पर, ... आमंत्रित हैं!
सुन्दर भाव!
ReplyDeleteक्या आप ब्लॉग संकलक हमारीवाणी.कॉम के सदस्य हैं?
वाह जनाब, इक प्रकार से आपने अपने स्टाइल से पंचतन्त्र की सी कथा में कविता वोह भी नेगेटव को पोसिटिव बनाते हुवे लिखी है .बात नए अंदाज़ में कही गयी इस लिए रोचक लगी.
ReplyDeleteगिद्ध ने गुहार लगाई,
‘वे मुझे नोंच-नोंचकर खा रहे हैं’-- साब ,अपरोक्ष रूप में ओक्सितोक्सिन के ज़हर से मेरे प्रदेश के तो सारे गिद्ध मारे जा चुके हैं .
अच्छा व्यंग किया है ..
ReplyDeleteव्यंग्य लिखता हूँ इसलिए व्यंग्य दिखता है .
ReplyDeleteएकदम चोखी कविता
एक अच्छे ब्लॉग से जुड़ा हूँ.
....और यही सब कुछ साहित्य के भीतर भी ज्यों का त्यों हुआ...!
ReplyDeleteलाजवाब व्यंग. बचपन का पढ़ा कुछ याद आ गया.
ReplyDelete"बहरा बोला साफ़ सुनाई दे रहा
डाकू दल दल का शोर
डाकू दल दल का शोर!!!
कसम अंधे ने खाई
वो देखो बारह डाकू
पड़ रहे दिखाई
लूला बोला
दो दो हाथ दिखाएँ
लंगड़ा बोला भाग चलो
वरना मर जाये .."
....बहुत सार्थक प्रस्तुति
ReplyDeleteशिक्षक दिवस की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ
sanjay ji
ReplyDeletebahut majedaar blo hai. jhoot pahan kar achhe lagte ho kya khoob hai. badhai.
sharad joshi a par neye dhang se likah hai.
-mmsaral
(VIA EMAIL)
achchi hai!
ReplyDeleteअद्भुत!
ReplyDeleteबधाई.
वाह-वा! मज़ा आया.
ReplyDeleteये साहित्य भी अच्छी दशा को प्राप्त हुआ है.
ReplyDeleteबहुत बढ़िया भाई......
ReplyDeleteBahut acha laga ye vyagya..bahut2 badhai
ReplyDeleteBahut sundar vayangya laga..bahut2 badhai...
ReplyDeleteEk nayi duniya dekhi yahaan...
ReplyDeletebahoot hi sunder vyang hai sahotya ki gotbandi par...
ReplyDeletevery nice------------
bahoot hi sunder vyang hai sahotya ki gotbandi par...
ReplyDeletevery nice------------
bahoot hi sunder vyang hai sahotya ki gotbandi par...
ReplyDeletevery nice------------
bahoot hi sunder vyang hai sahotya ki gotbandi par...
ReplyDeletevery nice------------
bahoot hi gahri chot hai sahitya ke gutbazi par......
ReplyDeleteसंजय ग्रोवर जी
ReplyDeleteकमाल की रचना लिखी है …
बधाई शब्द पर्याप्त नहीं है इस बार …
अपने-अपने सुरक्षित स्वर्गों में बैठे
साहित्य के देवताओं ने घोषणा की,
‘ये तो ख़ुशी के आंसू हैं’
वाकई क्या लिखा है …
ऊऽऽऽय्य्य्याऽऽह !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
bahut hi badhiya...ye to wine ki us botal ki tarah hai jo barso pahale aapne fek diya par wakt ke sath iska swad badhata gaya...
ReplyDeleteअपने-अपने सुरक्षित स्वर्गों में बैठे
ReplyDeleteसाहित्य के देवताओं ने घोषणा की,
‘ये तो ख़ुशी के आंसू हैं’
बहुत सही ।
ReplyDeleteSanjay jee, badi shandaar aapki advisory hai........jo bade pyare pyare advise de rahi hai...
ReplyDeletebahut khhubsurat..:)
बहुत अच्छी....लाजवाब....मज़ा आया
ReplyDeleteआपकी हर प्रस्तुति की तरह अच्छी रचना।
ReplyDeletebahut achha tanz kiya hai aapne aaj ki vyavstha par
ReplyDeleteबहुत अच्छी , प्रभावशाली अभिव्यक्ति .विसंगतियों को जोड़ कर जो सर्जन किया वह अभिनव तथा प्रशंशनीय है.
ReplyDeleteradheshyam saoo
करारा व्यंग्य है ! बधाई !
ReplyDelete-Rekha Maitra
(VIA EMAIL)