सोमवार, 27 सितंबर 2010

क्षमा

रात भर इस कशमकश में रहा कि इस वक्त जैसी मनःस्थिति में हूँ, क्या ठीक से अपनी बात रख पा रहा हूँ !? एक अपराध-बोध ने और घेर लिया कि कहीं ब्लॉगिंग जैसे अत्यंत लोकतांत्रिक और संभावनाओं भरे माध्यम का कोई बेज़ा इस्तेमाल करके किसी तरह की ग़लत नज़ीर तो नहीं पेश कर रहा !?
इस लेख-श्रृंखला को यहीं समाप्त कर रहा हूँ ।


-संजय ग्रोवर

5 टिप्‍पणियां:

  1. नो कमेंट..स्व विवेक का इस्तेमाल करके जो भी आपने निर्णय लिया है, वो हमें मान्य है.

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  2. बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने .......

    पढ़िए और मुस्कुराइए :-
    आप ही बताये कैसे पार की जाये नदी ?

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  3. @Udan Tashtari
    Sameer bhai aapke vaichaarik lacheelepan/udaarta par daad maiN pahle bhi deta huN, aaj bhi de rahaa huN.
    @गजेन्द्र सिंह
    Bahut shukriya.
    Nadi ke baare me 'dubne ke baad' bataauNga :)

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  4. आखिर हुआ क्या संजय जी , वैसे आप सोच तो सही रहे हैं !

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  5. जी हां, शरद जी, मुझे लगा कि सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के जो नए-नए रुप मैं देख रहा हूं, उन्हें फिलहाल ठीक से लिख नहीं पा रहा हूं। इसलिए मैंने कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया। मैं उन मित्रों से भी क्षमा चाहूंगा जिन्हें मैंने इन तीनों पोस्टों की सूचना ईमेल से नहीं दी।

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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