Wednesday, October 12, 2011

दहेज नहीं होती दुलहन


अरसा हुआ ‘संवादघर’ ने औरतो की ख़बर नहीं ली।
परसों जब जगजीत सिंह पर लिखे अपने एक लेख को ढूंढ रहा था तो यह कटिंग भी मिल गयी।
दिए गए विषय या मांग पर लिखना मेरे लिए बहुत मुश्क़िल काम रहा है। प्रस्तुत लेख एक ऐसी ही रचना है। फ़िलहाल टाइपिंग का मन नहीं है तो सीधे कटिंग लगा रहा हूं:









2 comments:

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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