शनिवार, 30 जुलाई 2011

मेरिट-स्थान और पलट-वॉक

दो व्यंग्य

1. मेरिट-स्थान

मेरे सपनों में एक जगह है साहब। सपनों में ही होगी साहब। मुझे तो बिलकुल विश्वास नहीं होता कि ऐसी जगह, ऐसी व्यवस्था हक़ीकत में भी हो सकती है। वहां मैं देखता हूं कि कई चैनल हैं और बड़ी-बड़ी बहसें चलतीं हैं। वक्ता डायस ठोंक-टोंक कर बोल रहे हैं। कह रहे हैं कि मेरिट के आधार पर नियुक्तियां होंगी तो उस जगह सब ठीक हो जाएगा। आज-कल उन्हें बिछुड़ी हुई मेरिट बहुत याद आने लगी है। 10-20 साल पहले मैंने सपने में देखा था कि आरक्षण नाम का एक जलजला उस जगह आया था और बहुत-से लोगों के विचार अचानक से शीर्षासन करने लगे थे। मेरिट और मानवता की बातें शुरु हो गयीं। उससे पहले जितने भी सपने मैंने देखे उनमें होता यही था कि लोग दफ्तरों में जाते और बिना संबंध या रिश्वत के अगर अपना काम कराने की कोशिश करते तो अकसर मुह की खाकर और अपना-सा मुंह लेकर लौट आते। वजह क्या बताऊं, कोई विश्वास ही नहीं करेगा। उन दफ्तरों में सारा स्टाफ़ मेरिट वालों का होता था। मेरिट के अलावा कोई और योग्यता वहां दाखि़ल हो सकती थी तो वो ‘डोनेशन’ थी, वो ‘पहुंच’ थी। रिज़र्वेशन नाम की चिड़िया उस वक्त सिर्फ़ ख़्यालों, सपनों और अनुमानों में उड़ा करती थी। एक दिन अक्ल का मारा एक ऐसा शासक सत्ता में आ गया कि पट्ठे ने रिज़र्वेशन को हक़ीकत में बदल दिया। सत्यानाश हो उसका कि सपनों में भी हमारे सपनों की झण्ड हो गई।
फिर मुझे सपना आता है कि रोल बदल दिए गए हैं। मेरिट की बात करने वालों को झोपड़-पट्टियों में रहने को भेज दिया गया है। जहां सड़ा पानी भी उपलब्ध हो जाए तो पहले सोचना पड़ता है कि इससे नहाएं या पीकर पहले प्यास बुझाएं ! जहां सुअरों और नालियों के साथ सोना पड़ता है। पहले वे अपने पाखाने भी साफ़ नहीं करते थे अब दूसरों के भी करने पड़ते हैं। बदले में उन्हें मार, ग़ालियां और जूठन मिलती है। उनकी स्त्रियों के साथ रोज़ाना.....। धर्मस्थलों में तो छोड़िए, उन्हें विद्यालयों में भी घुसने नहीं दिया जाता। उनके पास कोई पढ़ाई की डिग्रीयां नहीं हैं। ज़्यादा क्या लिखूं, सपने में भी ऐसी बातें सोचकर डर लगता है। साल-भर तक मैं इस सपने को यूंही छोड़ देना चाहता हूं...
उसके बाद जो सपना आएगा, उसमें देखेंगे कि क्या वे तब भी मेरिट की बात इतने ही ज़ोर-शोर से करते हैं। क्या वे तब भी इतनी ही दिलदारी से डायस ठोंकते हैं! क्या तब भी इस ठोकन पर भाड़ेदार और मलाईमार तालियां इतनी ही ज़ोर से पिटतीं हैं.....
दूसरे संवादघर में ‘मेरिट-स्थान’


2. पलट-वॉक


लड़कियां बौरा गयी हैं। कहतीं हैं स्लट वॉक करेंगीं। कर रियो तो करो इतना ढोल काहे पीट रियो ? भीड़ लगाना चाह रियो क्या ? पगलियो, ये जो विरोध कर रए हैं, इन्हें बुलाना चाह रियो क्या ? बावरी हो का ? इन्हें तो भनक लगने की देर है, ये तो सबसे पहले आवेंगे। इनने तो अब तक इतनी पब्लिसिटी कर दी होगी तुम्हारी कि जितनी तुम पैसा-गहना खर्च करके भी ना कर पातीं सात जनम में। ये तो लाइव भी देखेंगे, टी वी कवरेज पे जुटेंगे, अखबार में ढूंढेंगे, ब्लॉग पे छांटेंगे तुम्हे। मोहे याद है जितने ज़्यादा जो अखबार सभ्यता-संस्कृति पे संपादकीय लेख लिखा करे थे, उतने ही ज़्यादा उनमें हीरोइनों के बड़े-बड़े रंगीन फोटू छपा करे थे। अभी मैं बताऊं का कि कैसे फोटू छपा करे थे ! तुम भी सब जानो हो री। और तुम नया का कर री हो ? हम मर्द लोग सब कर चुके। विश्वास ना है तुम्हे ! तो आओ मैं तुम्हे अपनी टाइम-मशीन में 30-35 साल पुराने अपने कस्बे में ले चलूं।
देखो, सुबह के सात बज रे हैं। हलवाई सब खुले पड़े हैं। कोई चड़ढी में है तो कोई साथ में बनियान भी डाले है। तुम तो कहोगी कि टू-पीस पहन राखा है इनने। कहो, कहो। देखो तो कैसी ताजी-ताजी कचौड़ी, जलेबी, पूड़ी बन री हैं। ग्राहक आ रे हैं आंख मलते हुए। कोई लुंगी में आ रिया है, कोई धोती में आ रिया है, कोई प्लस बनियान में भी है तो कोई विद अंगोछा भी है। पर देखो, कैसे सहज भाव से आ रे हैं, खा रे हैं और जा रे हैं। कोई घमंड नहीं, कोई पब्लिसिटी नहीं और का कहें हैं उसे कि कोई आत्म-मुग्धता नहीं कि हम कुछ स्पेशल कर रे हैं। कुछ ऐसा कर रे हैं जिसे कलको स्लट वाक भी कहा जा सके है। देखी है ऐसी सहजता, ऐसी सादगी, ऐसी विनम्रता ? तुम काहे इत्ती फूल री हो री लड़कियो !
अखाड़े देखोगी, पहलवान देखोगी हमारे कस्बे के ? सब स्लट वाक भूल जाओगी री। तुम्हारी जिम में लड़की एलाउ तो है, यहां तो जो करना हो, सब लड़के ही कर लेंवे करे हैं। अरे, अब छोड़ो भी, लड़कईयो।
ना मन भरा अभी ! आओ फिर महानगर में लौट आओ। ये देखो जो सर्कस जैसा पंडाल लगा है। देखो बाबा कैसी कूद-फांद कर रे हैं टू-पीस में। ज़्यादा जोश आ जाया करे है तो ऊपर का वन पीस भी उतार के हवा में घुमा दिया करे हैं। अरे हटो जाओ लड़कियों, बड़ीं आयीं स्लट वॉक करने वालीं। अभी नागा बाबा का जुलूस दिखाऊं का ? हैं ? डर गयीं !
अरे हम मर्दुए बहुत बदमाश हैं रे। पहले तो तुम्हें कुछ करने ना देंगे, रोड़े अटकावेंगे, डरावेंगे, फिर भी तुम ना मानोगी, कर ही दिखलाओगी तो हम बोल देंगे ई में नया का है, ई तो हम पहले ही कर चुके, कई बार कर चुके, तुम तो प्रतिक्रिया कर री हो, पलट वार कर री ओ, माने कि पलट-वॉक कर री हो। हमारा कोई इंट्रेस्ट इसमें ना है।
वैसे चीफ़ गैस्ट बनाके बुलाओ तो मैं आ भी लूंगा।

दूसरे संवादघर में 'पलट-वॉक'

--संजय ग्रोवर

4 टिप्‍पणियां:

  1. इतने ही बड़े व्यंग्यकार हो तो अख़बार में क्यों नहीं भेजते। जो अख़बार में छपता है वही अच्छा व्यंग्य होता है। किसीको दो कौड़ी का लगता है तो लगे।

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