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बुधवार, 7 दिसंबर 2022

खेल

मेला मशहूर था.

कई दुकाने लगी होती थी. कुछ दुकानों पर प्लास्टिक के टुकड़ों से बना एक चौखटा जैसा बिकता था. ये टुकड़े चौखटे के भीतर ही सरकते थे. इन पर एक नक्शा सा बना होता था. दंकानदार उस बिगड़े हुए नक्शे को दिखाकर बताता था कि इन टुकड़ों को सरकाकर नक्शा वापस बिठाना है. नक्शा सही हो गया समझो आप जीत गए.

क्या उस समय भी कोई होता था जो समझता हो कि उसने नक्शा जोड़ लिया मतलब समाज को जोड़ लिया !

ताली बजानेवाले तब भी होते थे.

-संजय ग्रोवर






गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

फ़ॉलोअर












लघुकथा

फ़ॉलोअर




गली सुनसान थी और सड़क उदास.

मेरा ध्यान कैसे न जाता कि वह आदमी लगातार मेरा पीछा कर रहा था. इंटरनेट के प्रचलन के बाद जो भाषा प्रयोग की जाने लगी है उसमें कहूं तो वह मुझे ‘फॉलो’ कर रहा था.

मैं जानबूझकर उस गली में मुड़ गया जिसमें मुझे नहीं जाना था. पीछे मुड़कर देखा, वह वहां भी आ रहा था.

आखिर चाहता क्या होगा ! मुझपर ऐसा है क्या जो इसके काम आएगा !

कैसे पता करुं ? मैं एक जगह रुका और टांग खुजाने लगा. वह भी रुक गया और टांग खुजाने लगा.

‘अजीब आदमी है!’

कहीं मैं ख़्वामख्वाह शक तो नहीं कर रहा! कुछ और पता लगाना चाहिए.

एक दुकान दिखी. मैंने एक लस्सी ले ली. उसने भी लस्सी ले ली.

मैंने दुकानदार से पूछा-‘भैया, थोड़ा ज़हर है!’

वह हंसने लगा. ज़ाहिर था कि ज़हर उसपर कैसे होता.

मैं भी बस यूंही झुंझला गया था. देखना चाहता था कि यह किस हद तक फ़ॉलो करता है!

गली तक! घर तक! ज़िंदगी-भर!

यह ख़्याल ही मुझमें सिहरन पैदा कर रहा था कि इसने अगर ज़िंदगी-भर मुझे फ़ॉलो किया तो मैं जियूंगा कैसे. इसको तो लगता है किसी वजह से या बिना वजह ही फ़ॉलो करने की आदत है मगर मेरी प्राइवेसी का क्या होगा!

यह खिड़की में आंख दिए रहेगा तो मैं नहाऊंगा कैसे, कपड़े कैसे बदलूंगा्! यह भी वहीं नहाने लगा तो! कहीं कपड़े भी मेरे मांगने लगा तो! कलको मुझे सब कुछ इसीके अनुसार करना पड़ेगा कि ‘भाई साहब! आपकी इजाज़त हो तो मैं नहा लूं वैसे मेरा तो टाइम हो गया!’ ‘भाईसाहब! मैं फ़लां विचार व्यक्त करुंगा तो आप कम तो नहीं हो जाओगे ?’  

इसकी तो पता नहीं पर मेरी ज़िंदगी क़ैद से भी बदतर हो जाएगी.

परेशान हूं कि पीछा कैसे छुड़ाऊं?



-संजय ग्रोवर 

 




बुधवार, 18 अप्रैल 2018

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

पैंतरे

छोटी कहानी


जंगल में सब ठीक-ठाक चल रहा था।
शेर बकरियों को खा रहे थे। हिरनों को खा रहे थे। जो भी खाने का मन हो, खाए जा रहे थे।
भेड़िए भेड़ों को चबा रहे थे।
मतलब शांति ही शांति थी, अनेकता में एकता थी।
एकाएक पता नहीं क्या हवा चली!
एक बकरी ने शेर का हाथ पकड़ लिया,‘‘बहुत हुआ, अब तुम मुझे नहीं खा सकते.’’
शेर पहले तो एकदम सकपका गया, उसे लगा कुछ प्रकृति-विरुद्ध हो रहा है। जंगल के धर्म के विरुद्ध कुछ हो रहा है।
उसने ज़ोर-ज़बरदस्ती की कोशिश जारी रखी।
‘यह नहीं चलेगा’....
शेर ने मुड़कर देखा ; पीछे एक और बकरी खड़ी थी।
‘जानवर जानवर को कैसे खा सकता है!‘ सामने से कुछ भेड़ें आ रहीं थीं।
और फ़िर ख़रगोश.....फ़िर हिरन....फ़िर दूसरे निरीह जानवर और पक्षी.....
‘‘यह नहीं चलेगा, नहीं चलेगा.....’’
शेर चकरा गया। यह तो उसने कभी सोचा ही नहीं था।
थोड़ा घबरा भी गया....
‘तुम सबको हुआ क्या है..... पहली बार उसकी आवाज़ में नरमी देखी गई, ‘‘आओ बैठकर बात कर लेते हैं’.....पहली बार उसे तर्क की ज़रुरत महसूस हुई।
‘‘कैसी निगेटिव बातें कर रहे हो आज तुम लोग!? अगर मैं तुम्हे नहीं खाऊंगा तो सृष्टि कैसे चलेगी, जंगल कैसे चलेगा?’’ उसने दलील रखी।
‘‘जंगल आप चला रहें हैं ? लगता आपको कुछ ग़लतफ़हमी हुई है! बाई द वे आप क्या करते हैं जंगल को चलाने के लिए?’’ एक छोटे-से मेमने ने पूछा।
‘‘हर्रामज़ा.....! इसकी इतनी हिम्मत!!‘‘शेर के तनबदन में आग़ लग गई, ‘‘बहुत अच्छा सवाल उठाया तुमने’’ प्रकटतः उसने कहा।
‘‘एक जानवर दूसरे को खाए यह कौन-सा धर्म है?‘‘एक ख़रगोश बोला।
‘‘कल तक मेरे सामने मूतता था मगर आज....यह इन सबको हुआ क्या है!...‘‘वैरी गुड, इंटेलीजेंट क्वेश्चन....ऊपर-ऊपर उसने कहा,‘‘फ़िर मैं खाऊंगा क्या....क्या मैं भूखा मरुंगा....
‘‘हमें क्या पता क्या खाओगे, तुमने कब हमारे खाने की चिंता की?,’’ एक छोटी भेड़ ने पूछ लिया।
‘‘तुम्हें मालूम है जंगल में शहर से कुछ आदमी आते हैं जो तुम्हे पकड़-पकड़कर ले जाते हैं, मैं मर गया तो उनसे तुम्हे कौन बचाएगा?’’शेर ने पैंतरा फेंका।
‘‘वो तो तुम्हे भी पकड़कर ले जाते हैं। जाने कितने भालू-चीते उन्होंने पिंजरों में बंद कर रखे हैं’’,,ऊपर पेड़ पर एक छोटा बंदर लटका था ; वही बोल रहा था,‘‘क्या मज़ाक़ कर रहे हो अंकल?’’
शेर ने पहली बार अपने बदन पर पसीना महसूस किया,‘‘ठीक है, मुझे थोड़ा वक्त दो.....तुम भी सोच लो हम भी सोच लें....आज मैं तुम्हारे लिए भूखा रहूंगा...तुम्हारे लिए ही सोचूंगा.....रात बहुत हो गई है, अब तुम जाओ......’’


दूसरे दिन जंगल के जानवरों ने देखा कि जंगल के बीचोंबीच एक स्टेज बना है जिसपर शेर, चीता, भालू, भेड़िए, सांप जैसे हिंसक और ख़तरनाक जानवर शांत मुद्रा में बैठे हैं। तरह-तरह के बैनर लगे हैं जिनपर क़िस्म-क़िस्म के नारे लिखे हैं-

भ्रष्टाचार मिटाएंगे, नई रोशनी लाएंगे!
जतिवाद मुर्दाबाद! मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!
समाज नहीं टूटने देंगे! जंगल नहीं लूटने देंगे!
जानवरों पर अत्याचार, बंद करो! बंद करो!
अहिंसा खोज हमारी है, शेर की ईमानदारी है!
समझ में उनकी दोष है, हम भी तो ख़रग़ोश हैं!
...........
इधर मेमने, ख़रगोश, हिरन, बकरी वगैरह एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे।


-संजय ग्रोवर
16-09-2014


मंगलवार, 15 जनवरी 2013

सुरक्षा की हद



‘सरगुरु, आजकल महिलाएं बहुत संकट में हैं.....’
‘इन्हें ढंककर रखना चाहिए, सर से पांव तक....मैंने पहले भी कहा.....’
‘मगर सरगुरु....इसके बावजूद भी तो सब होता ही है....’
‘अकेले बाहर नहीं भेजना चाहिए.....कोई आई, भाई, माई, झाई, दाई...साथ होना चाहिए....’
‘पर केस तो तब भी होते हैं......’
‘दरअसल घर से बाहर नहीं निकलने देना चाहिए.....वही है मुसीबत की जड़...’
‘पर घर में भी हम लोग......मेरा मतलब है लोग बाज़ नहीं आते....’
‘देखो हमारी नयी तकनीक से कोई दुश्मनी तो है नहीं.....कुछ लॉकर टाइप बनाकर उसमें औरतों को रखा जा सकता है, चाबियां दो-तीन हों जो घर के दो-तीन बुज़ुर्गों के पास रहें.....’
‘क्या बात कर रहे हैं, लॉकर तो बहुत छोटे होते हैं....’
’नहीं वैसे नहीं.....दड़बे जैसे तो होने ही चाहिए......घर के सभी काम निपटाकर वे वहां आराम कर सकती हैं’
‘वहां उनका मन कैसे लगेगा, सरगुरु....’
‘वहां उन्हें धर्मग्रंथ दिए जाएं....उन्हें तो वे खुद भी छोड़ने को तैयार नहीं होतीं.....’
‘लेकिऩ मसला केवल शरीर का तो नहीं है, हम कोई भौतिकवादी तो हैं नहीं...अगर उन्हें वहां किसीका ख़्याल आ गया तो उनका मन, उनकी रुह, उनकी आत्मा इत्यादि भ्रष्ट नहीं हो जाएंगे......’
‘तो फ़िर.....उनके लिए बिल बनाए जा सकते हैं.....जब वे अंदर घुस जाएं तो बाहर से मिट्टी डाल दी जाए....'
‘अजी ऐसे तो वो मर ही जाएंगीं.......’
‘मर जाएंगी तो क्या हुआ, इज़्ज़त तो बची रहेगी।’



-संजय ग्रोवर

गुरुवार, 28 जून 2012

इमेज बड़ी चीज़ है, मुंह ढंक के सोईए


लघु-व्यंग्य-कथा 





सुनो रिश्ता भेजा है उन्होंने, कह रहे हैं लड़के ने जो किया उसपर बड़े शर्मिंदा हैं, एक मौका दे दो पाप धोने का....

अजी, थोड़ी शर्म तो करो कहते हुए ! उसी कमीने बलात्कारी से शादी !!
कह रहे हैं छोटे से नही ंतो बड़े से कर दो, कुछ तो प्रायश्चित होगा...

एक ही ख़ानदान के हैं कमीने। उनमें क्या फ़र्क़ होना है !?

नहीं, नहीं, बड़ा काफ़ी उदारवादी स्वभाव का है। मेरा पुराना मिलना-जुलना है उससे।

ऐसी क्या उदारता दिख गयी तुम्हे उसमें ?

अरे बड़ा समझदार है, कहता है बलात्कार तो मूर्ख करते हैं, मेरे पास तो औरतें ख़ुद चलके आतीं हैं....

मतलब !? अजीब ही बात बता रहे हो आप तो ! पीछे एक रिश्ता आया था, लड़का कहता था जब मैं लोगों को अहिंसक तरीके से डराकर अपने काम निकाल सकता हूं तो मुझे हिंसा करने की क्या ज़रुरत ?

अरे नहीं, बड़ा सयाना है बड़ा भाई। सभ्यता, सुशीलता, व्यवहारिकता सब अच्छे से समझता है। कहता है कि देखिए साहब, एक आदमी रात में किसीके घर में घुसता है सामान चुराने, तो वह चोर या डाकू कहलाता है। वही आदमी अगर थोड़ा धैर्य धारण करना सीख ले, ज़रा-सी वाक्पटुता सीख ले, लोगों में किसी तरह यह विश्वास पैदा कर दे कि वह उनके सारे सही-ग़लत काम पलक झपकते करवा सकता है, और बाबाजी बनके कहीं डेरा जमा ले तो लोग तो ख़ुद ही भागे चले आते हैं अपने-आपको ठगवाने के लिए।

मेरे पल्ले ना पड़ रही आज आपकी बातें।

अगले की इमेज ऐसी है कि औरतें मक्खियों सी भिनकती हैं। पूरे दिन काम आता है औरतों के। बता रहा था कि कई दफ़ा कई औरतों के कई काम इसी छोटे भाई से करा देता हूं। न छोटे को पता लगने देता हूं न औरतों को। मुझे लगा कि ऐसा कहते समय एक आंख भी दबाई थी उसने...

लगा क्या, दबाई ही होगी ?

अरे पता नहीं, ईश्वर ने चेहरा-मोहरा कुछ ऐसा रचा है अगले का कि पता ही नहीं चलता दबाई कि नहीं दबाई....

कैसा गोल-मोल कर रहे हो मामले को ! दोनों भाईयों का चरित्तर तो फिर एक जैसा ही हुआ ना ?

इमेज तो अलग-अलग है ना। चरित्तर को कौन पूछता है ? देखा नहीं कैसे राधेलाल दस साल अपने पल्ले से लगाके चुपचाप औरतों के लिए काम करता रहा। एक दिन उसीकी बचाई चार औरते अपने उत्पीड़कों के साथ हो गयीं और राधेलाल को झूठा फंसा दिया....

कोई मजबूरी रही होगी औरतों की ! शायद किसीने डराया हो ? औरतों को तो समाज के साथ चलना होता है, तीज-त्यौहार, रीति-रिवाज करने होते हैं। सभी राधेलाल की तरह सब कुछ छोड़-छाडके तो नहीं रह सकते ना.....

जो भी हो, जब राधेलाल सब तरफ़ से हार गया, कोई समझनेवाला नहीं मिला तो एक दिन धैर्य खो बैठा और बहसबाज़ी के दौरान गर्मा-गर्मी में उनमें से एक पर हाथ छोड़ बैठा। अब कौन पूछता है उसके दस साल के चरित्तर को ? अब तो हर कोई कहता है, देखो जा रहा है औरतों का दुश्मन, हत्यारा, शोषक......अब इमेज तो गयी न उसकी ! चरित्तर को लेके चाटेगा अब ?

लोग इतने ही मूर्ख होते हैं क्या !?

मूर्ख ही नहीं, कई शातिर भी होते हैं उनमें। एक तीर से दो शिकार करते हैं। एक तरफ़ राधेलाल की इमेज का कुंडा हुआ दूसरी तरफ़ इसी उदाहण का उपयोग औरतों की इमेज ख़राब करने में भी कर रहे हैं कि देखो कैसी अहसान फ़रामोश होतीं हैं औरतें, अपनी मदद करनेवाले राधेलाल की क्या दुर्गति कर दी...



तो जनाब बहस जारी है। इंटरनेट पर, अख़बारों में, टी.वी. चैनलों पर......
शादी चाहे आक्रामक बलात्कारी से हो या उदारवादी आखेटक से, एक बात पक्की है कि अगर यहां रिश्ता होता है तो लड़की जाएगी उसी घर में और झेलेगी भी दोनों भाईयों को।
क्या कहा ? कोई और घर !
फ़िर आप ही कहते हैं कि सब घर उसीके बनाए हुए हैं!


-संजय ग्रोवर


बुधवार, 14 दिसंबर 2011

नाथूराम, अहिंसा और इतिहास

लघुकथा


जब तक अंग्रेज भारत में रहे, नाथूराम का आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहा। इतना कि देश में किसी को पता भी नहीं था कि यहा कोई नाथूराम रहता है।
अंग्रेजों के जाते ही और भारत के आज़ाद होते ही नाथूराम मुखर होकर आंदोलित हो गया। उसकी पिस्तौल एकाएक जागरुक हो गयी। गोलियां आज़ादी के गीत गाने लगीं। जिस नाथूराम ने कभी किसी अंग्रेज का बाल भी बांका नहीं किया था उसने बिना किसी सुरक्षा के चलने वाले निहत्थे बूढ़े पर गोलियां दाग़ दीं।
इस तरह नाथूराम इतिहास में शामिल हो गया।
नाथूराम के जीवन से हमें शिक्षा मिलती है कि इतिहास तो कमज़ोर आदमी का मकान है, इसमें कभी भी घुसपैठ की जा सकती है।
यह शिक्षा भी मिलती है कि इतिहास में शामिल होने के लिए हमें कुछ भी कर डालना चाहिए।
नाथूराम का जीवन बहुत शिक्षाप्रद रहा। संभवतः आज भी बहुत-से आंदोलनकारी उसके जीवन से शिक्षा लेते होंगे।

किसी ताज़ा आंदोलन में कोई नाथूराम गांधी टोपी लगाए अहिंसा पर उपदेश देता मिल जाए तो भी कोई हैरानी की बात न होगी।



-संजय ग्रोवर

शनिवार, 13 नवंबर 2010

वे, मैं और इमेज

लघु-व्यंग्य-कथा



पहले उनकी इमेज आयी।
स्नेहपूर्वक मुझे खींचा, दरवाज़े से बाहर ले गई।
मंच पर खड़ा कर दिया। तत्पश्चात मेरी तारीफ़ों के पुल बंधे। सत्कार में गायन-वादन हुआ। विनम्रता देखते ही बनती थी। भीड़ जमा हुई। भीड़ विदा हुई।
‘बन गयी तुम्हारी भी, बना दी मैंने, अब अंदर चलें।’
अनमना-सा मैं, अंदर लौटते हुए कुछ सोच-समझ नहीं पा रहा था।
इमेज को उन्होंने बाहर ही छोड़ दिया, ख़ुद अंदर आ गए।
‘लाओ, निकालो’, वे बोले।
‘क्या ?’ मैं हैरान।
‘क़ीमत’
‘किस बात की ?’
‘अभी इमेज नहीं बनायी तुम्हारी ! मुफ्त में बनती है क्या ?’
मुझे एकाएक कुछ सूझा नहीं।
‘मैंने कहा था क्या !?’ बमुश्किल मेरे मुंह से बोल फूटे।
मेरा गिरेबान उनके हाथ में, ‘तुमने मना भी तो नहीं किया था।’ गोला मेरे सर पर लगा। कुछ पल को सोच की सांसें फिर रुकीं।

बल्कि यंूही कई साल गुज़र गए।

एकाएक मैंने उनको गले से पकड़ा, भड़ाक से दरवाज़ा खोला और बाहर लोगों की तरफ़ चला, ‘अभी सारा हिसाब बराबर किए देता हूं।’
उन्होंने मेरे हाथ झटके और अपनी इमेज के साथ ‘ये जा और वो जा’।

-संजय ग्रोवर

रविवार, 25 जुलाई 2010

भीड़ और फ़ितरत


लघुकथा



मैं तैरने से डरता था, डूबने से डरता था, पानी से डरता था, भीड़ से डरता था।
जाने किस झोंक में उस दिन दरिया किनारे जा पहुंचा।
‘बचाओ-बचाओ’ की उस मंद पड़ती जा रही आवाज़ के मालिक पर किनारे खड़े लोग या तो हंस रहे थे या मुंह फेर रहे थे। और मुंह फेर कर जा भी रहे थे।
मैं बहुत बहादुर न था, परोपकारी न था।
पर मुझे देखकर उन डूबती निगाहों में उम्मीद और विश्वास की जो चमक कौंधी, उसने मुझे बदल डाला।
मैं कूद पड़ा दरिया में। भंवर मुझे तैरना सिखाने लगा। लहरें बोलीं मामूली काम है, डरते क्या हो ! तूफ़ान ने पैग़ाम भेजा कि तुम अपना काम कर लोगे तभी मैं उस तरफ़ आऊंगा।
मैंने उसे बचा लिया। होश में भी ले आया। उसने आंखें भी खोली। ख़ुश था। नज़रें घुमाकर देखने लगा दुनिया को दोबारा।
क्या कहीं कुछ बदल गया था !? उसने देखा कि पहले जो लोग उसपर हंस रहे थे, अब मुझ पर भी हंस रहे थे।
वह सोचने लगा। 
एकाएक उसने मुझे दरिया में धक्का दिया और भीड़ के साथ खड़ा होकर हंसने लगा।
डूबते वक़्त मैं सोच रहा था कि दरिया से बच भी गया तो भीड़ से कौन बचाएगा !


-संजय ग्रोवर

सोमवार, 17 मई 2010

चालू

लघुकथा










चालू

उन्होंने जाल फेंका।
शिकार किसी तरह बच निकला।
यूं समझिए कि ख़ाकसार किसी तरह बच निकला।
भन्ना गए। सर पर दोहत्थड़ मारकर बोले, ‘‘तुम तो कहते थे भोला है। देखो तो सही साला कितना चालू आदमी है।’


-संजय ग्रोवर

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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