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शनिवार, 30 जुलाई 2011

मेरिट-स्थान और पलट-वॉक

दो व्यंग्य

1. मेरिट-स्थान

मेरे सपनों में एक जगह है साहब। सपनों में ही होगी साहब। मुझे तो बिलकुल विश्वास नहीं होता कि ऐसी जगह, ऐसी व्यवस्था हक़ीकत में भी हो सकती है। वहां मैं देखता हूं कि कई चैनल हैं और बड़ी-बड़ी बहसें चलतीं हैं। वक्ता डायस ठोंक-टोंक कर बोल रहे हैं। कह रहे हैं कि मेरिट के आधार पर नियुक्तियां होंगी तो उस जगह सब ठीक हो जाएगा। आज-कल उन्हें बिछुड़ी हुई मेरिट बहुत याद आने लगी है। 10-20 साल पहले मैंने सपने में देखा था कि आरक्षण नाम का एक जलजला उस जगह आया था और बहुत-से लोगों के विचार अचानक से शीर्षासन करने लगे थे। मेरिट और मानवता की बातें शुरु हो गयीं। उससे पहले जितने भी सपने मैंने देखे उनमें होता यही था कि लोग दफ्तरों में जाते और बिना संबंध या रिश्वत के अगर अपना काम कराने की कोशिश करते तो अकसर मुह की खाकर और अपना-सा मुंह लेकर लौट आते। वजह क्या बताऊं, कोई विश्वास ही नहीं करेगा। उन दफ्तरों में सारा स्टाफ़ मेरिट वालों का होता था। मेरिट के अलावा कोई और योग्यता वहां दाखि़ल हो सकती थी तो वो ‘डोनेशन’ थी, वो ‘पहुंच’ थी। रिज़र्वेशन नाम की चिड़िया उस वक्त सिर्फ़ ख़्यालों, सपनों और अनुमानों में उड़ा करती थी। एक दिन अक्ल का मारा एक ऐसा शासक सत्ता में आ गया कि पट्ठे ने रिज़र्वेशन को हक़ीकत में बदल दिया। सत्यानाश हो उसका कि सपनों में भी हमारे सपनों की झण्ड हो गई।
फिर मुझे सपना आता है कि रोल बदल दिए गए हैं। मेरिट की बात करने वालों को झोपड़-पट्टियों में रहने को भेज दिया गया है। जहां सड़ा पानी भी उपलब्ध हो जाए तो पहले सोचना पड़ता है कि इससे नहाएं या पीकर पहले प्यास बुझाएं ! जहां सुअरों और नालियों के साथ सोना पड़ता है। पहले वे अपने पाखाने भी साफ़ नहीं करते थे अब दूसरों के भी करने पड़ते हैं। बदले में उन्हें मार, ग़ालियां और जूठन मिलती है। उनकी स्त्रियों के साथ रोज़ाना.....। धर्मस्थलों में तो छोड़िए, उन्हें विद्यालयों में भी घुसने नहीं दिया जाता। उनके पास कोई पढ़ाई की डिग्रीयां नहीं हैं। ज़्यादा क्या लिखूं, सपने में भी ऐसी बातें सोचकर डर लगता है। साल-भर तक मैं इस सपने को यूंही छोड़ देना चाहता हूं...
उसके बाद जो सपना आएगा, उसमें देखेंगे कि क्या वे तब भी मेरिट की बात इतने ही ज़ोर-शोर से करते हैं। क्या वे तब भी इतनी ही दिलदारी से डायस ठोंकते हैं! क्या तब भी इस ठोकन पर भाड़ेदार और मलाईमार तालियां इतनी ही ज़ोर से पिटतीं हैं.....
दूसरे संवादघर में ‘मेरिट-स्थान’


2. पलट-वॉक


लड़कियां बौरा गयी हैं। कहतीं हैं स्लट वॉक करेंगीं। कर रियो तो करो इतना ढोल काहे पीट रियो ? भीड़ लगाना चाह रियो क्या ? पगलियो, ये जो विरोध कर रए हैं, इन्हें बुलाना चाह रियो क्या ? बावरी हो का ? इन्हें तो भनक लगने की देर है, ये तो सबसे पहले आवेंगे। इनने तो अब तक इतनी पब्लिसिटी कर दी होगी तुम्हारी कि जितनी तुम पैसा-गहना खर्च करके भी ना कर पातीं सात जनम में। ये तो लाइव भी देखेंगे, टी वी कवरेज पे जुटेंगे, अखबार में ढूंढेंगे, ब्लॉग पे छांटेंगे तुम्हे। मोहे याद है जितने ज़्यादा जो अखबार सभ्यता-संस्कृति पे संपादकीय लेख लिखा करे थे, उतने ही ज़्यादा उनमें हीरोइनों के बड़े-बड़े रंगीन फोटू छपा करे थे। अभी मैं बताऊं का कि कैसे फोटू छपा करे थे ! तुम भी सब जानो हो री। और तुम नया का कर री हो ? हम मर्द लोग सब कर चुके। विश्वास ना है तुम्हे ! तो आओ मैं तुम्हे अपनी टाइम-मशीन में 30-35 साल पुराने अपने कस्बे में ले चलूं।
देखो, सुबह के सात बज रे हैं। हलवाई सब खुले पड़े हैं। कोई चड़ढी में है तो कोई साथ में बनियान भी डाले है। तुम तो कहोगी कि टू-पीस पहन राखा है इनने। कहो, कहो। देखो तो कैसी ताजी-ताजी कचौड़ी, जलेबी, पूड़ी बन री हैं। ग्राहक आ रे हैं आंख मलते हुए। कोई लुंगी में आ रिया है, कोई धोती में आ रिया है, कोई प्लस बनियान में भी है तो कोई विद अंगोछा भी है। पर देखो, कैसे सहज भाव से आ रे हैं, खा रे हैं और जा रे हैं। कोई घमंड नहीं, कोई पब्लिसिटी नहीं और का कहें हैं उसे कि कोई आत्म-मुग्धता नहीं कि हम कुछ स्पेशल कर रे हैं। कुछ ऐसा कर रे हैं जिसे कलको स्लट वाक भी कहा जा सके है। देखी है ऐसी सहजता, ऐसी सादगी, ऐसी विनम्रता ? तुम काहे इत्ती फूल री हो री लड़कियो !
अखाड़े देखोगी, पहलवान देखोगी हमारे कस्बे के ? सब स्लट वाक भूल जाओगी री। तुम्हारी जिम में लड़की एलाउ तो है, यहां तो जो करना हो, सब लड़के ही कर लेंवे करे हैं। अरे, अब छोड़ो भी, लड़कईयो।
ना मन भरा अभी ! आओ फिर महानगर में लौट आओ। ये देखो जो सर्कस जैसा पंडाल लगा है। देखो बाबा कैसी कूद-फांद कर रे हैं टू-पीस में। ज़्यादा जोश आ जाया करे है तो ऊपर का वन पीस भी उतार के हवा में घुमा दिया करे हैं। अरे हटो जाओ लड़कियों, बड़ीं आयीं स्लट वॉक करने वालीं। अभी नागा बाबा का जुलूस दिखाऊं का ? हैं ? डर गयीं !
अरे हम मर्दुए बहुत बदमाश हैं रे। पहले तो तुम्हें कुछ करने ना देंगे, रोड़े अटकावेंगे, डरावेंगे, फिर भी तुम ना मानोगी, कर ही दिखलाओगी तो हम बोल देंगे ई में नया का है, ई तो हम पहले ही कर चुके, कई बार कर चुके, तुम तो प्रतिक्रिया कर री हो, पलट वार कर री ओ, माने कि पलट-वॉक कर री हो। हमारा कोई इंट्रेस्ट इसमें ना है।
वैसे चीफ़ गैस्ट बनाके बुलाओ तो मैं आ भी लूंगा।

दूसरे संवादघर में 'पलट-वॉक'

--संजय ग्रोवर

मंगलवार, 15 जून 2010

शास्त्रीय गाल-वादन की बुनियादी समझ का हंगामा

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?--2
जैसा कि वादा था कि दूसरे लेख के साथ इस क़िस्से को ख़त्म करेंगे। अगर ‘हंस’ में अलंकारिक भाषा में कोई प्रतिक्रिया आती भी है तो उसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की जाएगी।
(जेंडर जिहाद, हंस, जून 2010)

शास्त्रीय गाल-वादन की बुनियादी समझ का हंगामा
बिना नाम लिए बात करने में कम-अज़-कम दो तरह की आसानियां हैं। एक तो आप असुविधाजनक सवालों से आसानी से कन्नी काट सकते हैं। दूसरे, हवा में आरोपों के गोले छोड़ सकते हैं। पाठक बैठे अंदाज़े लगाते रहेंगे कि यार यह इसके लिए छोड़ा गया होगा और वह उसके लिए। शास्त्रीय गाल-वादन में इस युक्ति का विशेष महत्व मालूम होता है। आखिर कोई गाल वादन इतना शास्त्रीय बनता कैसे होगा कि बिलकुल दूसरों जैसी या उनसे भी ‘बेहतर’ ‘चारित्रिक योग्यताओं’ के बावजूद ख़ुदको दूसरों से अलग दिखाकर पूरे आत्मविश्वास से दूसरों को गरिया सके।
मेरे किसी मित्र ने एक लिंक भेजा है जिसमें मेरे प्रिय एंकर रवीशकुमार कॉलमिस्ट का परिचय देते हुए कह रहे हैं कि ‘हंस’ में इनके लेख छपते ही हंगामा मच गया। कमाल है ! हम भी ‘हंस’ पढ़ते हैं। ब्लॉग और टी वी भी देखते हैं कभी-कभार। मगर.....
जंगल में मोर नाचा किसी ने न देखा !
हम (तुम?) जो थोड़ी-सी पीके ज़रा झूमें...सबने देखा....
ज़ाहिर है कि इसे समझने के लिए ‘बुनियादी समझ’ चाहिए। ‘पीली छतरी वाली लड़की’ पर हंगामा मचा, कोई मेरे घर पर बताने नहीं आया। ख़ुद ही पता चल गया। ‘खांटी’ पर हंगामा मचा। अभी अशोक चक्रधर हिंदी अकादमी के कुछ बने, हंगामा हुआ। उनके पुरस्कार किसीने लिए, किसी ने नहीं लिए। हंगामा मचा। सबकी ख़बर मिली। लेकिन उक्त ‘हंगामा’ बड़ा अद्भुत, अमूर्त्त और विलक्षण रहा होगा। सच है, शास्त्रीय गाल-वादन के लिए ‘बुनियादी समझ’, ‘मेहनत’ और ‘टीम-स्प्रिट’ तो चाहिए ही। चलिए, अब हम भी बिना नाम लिए कॉलमी जेण्डर जिहाद पर बात करते हैं। बीच में कोई ‘रणनीति’ हो जाए तो माफ़ कर दीजिएगा, कभी-कभी मैं भी तात्कालिक असर में आ जाता हूं।
(बीच-बीच में कॉलमिस्ट ने किन्हीं भावुक-हृदयों को संबोधित किया है। यहां मैंने उन भावुक-हृदयों की तरफ़ से किन्हीं फ़िल्मी-हृदयों को संबोधित किया है।)

स्त्री मित्र--अच्छे या अंधे !?
आप फिल्मी हृदयों को अच्छे स्त्री-मित्र चाहिए क्यों ? उसके लिए आपमें भी थोड़ी पात्रता होनी चाहिए या नहीं !? या सब कुछ हंगामें में चाहिए ! या इसलिए कि आप गंदे स्त्री मित्रों की हरकतों का बदला अच्छे स्त्री मित्रों से लेकर उसे उपलब्धि समझने लगें ! जिंदगी कोई फंतासी नहीं है कि एक दिन यकायक अच्छे स्त्री मित्रों की बारिश शुरु हो जाएगी। पहले अच्छे इंसान पैदा कीजिए (बतर्ज़ ‘तसलीमा नसरीन बनाईए), अच्छे मित्र अपने-आप पैदा हो जाएंगे। वैसे आप साहित्य नगरिया की पतली गलियों में भी झांके तो पाएंगे कि यहां वास्तव में न किसी को अच्छे स्त्री मित्र चाहिएं न अच्छे पुरुष मित्र न अच्छे मित्र। अच्छे के नाम पर सबको अंधे मित्र चाहिए। अभी मेरा एक लेख कहीं छपे और मेरा कोई मित्र अपने वास्तविक विचार प्रकट करते हुए असहमति में मेरे लेख की धज्जियां उड़ा दे तो ! कोई बड़ी बात नहीं कि मैं उससे दोस्ती तोड़ने तक पर आमादा हो जाऊं। दोस्ती के नाम पर सभी को अंधी सहमति चाहिए। कभी कोई शोध हुई तो यह भी निकलकर आ सकता है कि हिंदी साहित्य की सबसे ज़्यादा दुर्गति ‘मित्रवाद’ के चलते हुई है। फिर हमी चौराहे पर वंशवाद, भाई-भतीजावाद और पता नहीं किस-किसवाद को गालियां देते फिरते हैं। फिर औरतें क्यों अपवाद हों !? वे क्या आकाश से टपकी हैं ! उन्हें भी अंधे मित्र चाहिएं। कुछ उदाहरण रख रहा हूं। कोई फैसला नहीं दे रहा। आप सोचिए कि ऐसी महिलाओं की हां में हां मिलाने वाले मित्र अच्छे होंगे या अंधे:-
1.----एक बहिन अपने भाई से चाहती है कि वह ससुराल में उसपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ़ उसका साथ दे। भाई अपना बहुत कुछ दांव पर लगाकर ऐसा करता भी है। तत्पश्चात बहिन यह चाहती है कि भाई ससुराल के हर रीति-रिवाज को भी बिलकुल पारंपरिक ढंग से निभाए। भाई कहता है कि दोनों में से एक काम करा लो। या तो प्रगतिशील ही बना लो या रुढ़िवादी। बहिन को जवाब रास नहीं आता। धीरे-धीरे भाई उसे पागल लगने लगता है।
2.----एक पति घर आता है और चाहता है कि पत्नी किसी भी हालत में हो, तुरंत हाज़िर होकर उसकी ‘थकान’ मिटाए। हम कहते हैं कि ये ‘मेल शाविनिस्ट’ पत्नी को सेक्स ऑबजेक्ट से ज़्यादा कुछ समझते ही नहीं। मुझे इससे कोई असहमति नहीं। पर एक थोड़ी जुदा स्थिति में देखिए। पत्नी को करने को कुछ ख़ास नहीं है। घर में ज़्यादIतर काम नौकरों के हवाले हैं। पत्नी का अधिकांश समय किटी पार्टी में, सोशल नेट वर्किंग साइटस् पर, चैट में या अन्य समारोहों में बीतता है। थका-मांदा पति रात को घर में घुसता है। पर पत्नी के ‘मूड’ का साथ नहीं दे पाता। यह पत्नी यह भी चाहती है कि पति कुछ भी करे पर इतना कमाकर लाए कि शानो-शौकत में कोई कमी न रहे। कई बार ऐसी पत्नियां यह भी चाहतीं हैं कि उनके पति दूसरी औरतों से फालतू बात भी न करें। अब यह स्त्री पति को नपुंसक, नाकारा, बेवफा, पैसे का लालची आदि-आदि कहकर दूसरे पुरुषों से संबंध बनाना शुरु कर देती है। क्या यह स्त्री पुरुष को सेक्स ऑबजेक्ट से ज़्यादा कुछ समझ रही है !?
3.-----स्त्रिओं पर शारीरिक हिंसा होती है, मैं भी कहता हूं आप भी कहते हो, भई, यह तो बहुत बुरी बात है। मैं भी कहूंगा, आप भी कहेंगे कि और कहीं तो ज़ोर चला नहीं, कमज़ोर सामाजिक स्थिति वाली कमज़ोर बीवी पर गुस्सा निकाल लिया। पर क्या आपने स्त्रियों को अपने बच्चों को धुनते देखा है ! स्त्री उस मर्द से अलग क्या कर रही है ? आप बच्चे की तुलनात्मक स्थिति देखिए। बच्चा आपसे तलाक नहीं ले सकता। वह मां-बाप नहीं बदल सकता। 20-25 साल की स्त्री खुद भी समझदार हो गयी होती है। साथ में बहुत से मां-बाप कम-अज़-कम इतना विकल्प तो देते ही हैं कि इन-इनमें से एक चुन लो। बच्चे के पास यह भी नहीं है। उससे पूछा तक नहीं गया कि वह इस दुनिया और इस घर में आना चाहता है कि नहीं। उसे (अगर वह लड़का है) यह तक नहीं बताया गया कि ये जो बारह बहिनें तेरी पहले से पैदा हो रखीं हैं और जिनके पैदा होने में तेरा रत्ती भर भी लेना देना नहीं है, इनकी ज़िम्मेदारी भी तेरी है। अगर तू इनकी समाजानुसार व्यवस्था करने में चूक गया तो क्रांतिकारी से क्रांतिकारी और मौलिक से मौलिक लोग भी तुझे ही गालियां देने वाले हैं।
तिसपर हम यह तो न कहें कि स्त्री ज़्यादा संवेदनशील, ईमानदार वगैरह होती है। क्यों झूठ बोल-बोलकर उसे फिर से ‘देवी’ बनाएं और एक नए जाल में फंसा दें ! लेकिन नहीं। ज़्यादा संभावना यही है कि ऐसे में भी स्त्री को अंधी तारीफ़ करने वाला ही ‘सच्चा स्त्री-मित्र’ लगने वाला है। अपवादों को ज़रा एक तरफ रख लें।
तसलीमा नसरीन से आपकी (दयनीय) घृणा
वही पुराना राग विरोधाभास। पहले वे ‘आपकी प्रिय लेडी’ कहकर तसलीमा के प्रति अपनी घृणा व्यक्त करते हैं। फिर वे चार लाइनों बाद कहते हैं तसलीमा (और कुछ अन्य सफल महिलाओं के नाम) जैसी पढ़ी-लिखी, स्वाबलंबी, शहरी आधुनिकाएं बनाईए, चुनौती वे अपने-आप खड़ी कर देंगी। आंकड़ा और शोध-पसंद, सरलीकरण के प्रबल विरोधी, फिल्मी-हृदय आप यह नहीं सोच रहे कि पढ़ी-लिखी महिलाएं आज भी कुछ कम नहीं पर आज भी ज़्यादातर का लक्ष्य कैरियर और शादी पर ख़त्म हो जाता है। जिसका एक कारण, धर्म उनके और उनके घर वालों के सिर पर ख़ून की तरह सवार है। दूसरी तरफ भंवरीदेवी और फूलनदेवी जैसी गांव की बेपढ़ी-लिखी औरतें आपके दिए कई उदाहरणों से बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दिखाती हैं। तसलीमाएं ‘बनाने’ से नहीं बनतीं (जैसा कि आज-कल कुछ लोगों ने समझ लिया है), पैदा होतीं हैं। कभी पेट से भी, परिस्थितियों से भी, निर्णय-क्षमता, विवेक, विद्रोह, सोच और साहस से भी। तसलीमा कोई आई.पी.एल का क्रिकेट मैच नहीं है कि इधर पचास प्रायोजक मिले और उधर तसलीमा तैयार। यह कोई प्रोपर्टी डीलर की डीलिंग भी नहीं है कि ‘‘ ओ बादशाहो, तुसी बस थोड़ी जई रणनीत्ति, थोड़ी डिग्री-डुगरी, थोड़ी इनफार्मेशन, थोड़ी फ़िलॉस्फी पाओ, तिन दिन विच तसलीम्मा बणाके त्वाडे हथ विच दे दांगे। अज-कल ते भतेरे लोग बणवा रए ने। गल्फ विच साडी सिस्टर कंसर्न हैगी, ओदर वी दो-तिन्न बणा के दित्तीयां ने। बड़ी डिमांड हैगी बाऊजी, हर संपादुक आपणी निजी तसलीम्मा चांदा ए। वेखणा बाऊजी, एक दिन्न एन्नीयां तसलीम्मा बजार विच उतार दांगे कि लोग असली तसलीम्मा नू भुल्ल जाणगे।’’ (‘‘साहिबान, आप बस थोड़ी-सी रणनीति, थोड़ी डिग्रीयां, थोड़ी सूचनाएं, थोड़ा दर्शन डालिए। तीन दिन में तसलीमा बनाकर आपके हाथ में दे देंगे। आज-कल तो बहुत लोग बनवा रहे हैं। गल्फ़ में हमारी सिस्टर कन्सर्न है, वहां भी दो-तीन बनाकर दी हैं। बहुत डिमांड है बाऊ जी, हर संपादक अपनी निजी तसलीमा चाहता है। देखना बाऊजी, एक दिन इतनी तसलीमाएं बाज़ार में उतार देंगे कि लोग असली तसलीमा को भूल जाएंगे।’’)
अच्छा माफ कीजिएगा, धर्म जब आप फ़िल्म-लिंकित-हृदयों के लिए सिर्फ एक रणनीति है फिर तसलीमा से इतना गुस्सा खाने का मतलब और मक़सद !? फ़िर तो दोनों एक ही बिरादरी के हुए ना !
पर मुश्किल यह है कि तसलीमा से आपकी घृणा छुपाए नहीं छुपती।
परफेक्ट बदल
यह क्या होता है ? और बिना इसे आज़माए आप स्टंट-फिल्म-लिंकित-हृदयों को पता कैसे चलता है कि यह परफेक्ट नहीं है ! क्या आपको लगता है कि दुनिया में आज जितनी भी व्यवस्थाएं लागू हैं सब एक ही बार में ‘परफेक्ट’ बना कर लागू कर दी गयीं थीं !?
नास्तिक और धर्म-विमुख
इशारों में दो-चार नास्तिकों की बात करके आपने ‘सिद्ध’ कर दिया कि नास्तिक भी स्त्री का शोषण करते हैं अतः यह ऑप्शन यहीं ख़त्म ! ऐसा ही करतब आपने पिछली क़िस्तों में पश्चिमी पुरुषों को लेकर कर दिखाया है। आप नास्तिकों से चमत्कार की उम्मीद क्यों रखते हैं ? इनमें से भी बहुत से आस्तिकों के घरों में पले-बढ़े होते हैं। बहुत से किन्हीं राजनीतिक दलों के संपर्क में आ जाने के चलते नास्तिक ‘बन’ गए होते हैं। फिर आप तो आंकड़ा और शोध-पसंद, सरलीकरण के विरोधी, फिल्मी-हृदय हैं। मैंने सुना है कि आप लोग कुछ परसेंटेज वगैरह निकाला करते हैं कि फलां समाज में नास्तिकों का प्रतिशत इतना है, फलां देश में इतना है। नास्तिकों में स्त्री-शोषकों का प्रतिशत इतना है, वगैरह। अपने ही सिद्धांतों के खिलाफ तो मत जाईए !
आप एक बार अगर अपने बारे में भी बता दें कि आप नास्तिक हैं, आस्तिक हैं, धर्म-प्रमुख हैं, विमुख हैं या कुछ और हैं तो आगे से आपको समझने में आसानी रहेगी। चलिए, छोड़िए। समझिए कि मेरी रणनीति थी।
आपकी पितृसत्ता
कई बार आपने कहा कि स्त्री-समस्याओं के लिए इस्लाम नहीं पितृसत्ता या दूसरे धर्म ज़िम्मेदार है। सवाल यह उठता है कि जिस वक्त ‘पवित्र ग्रंथ’ लिखे गए उस वक्त पितृसत्ता थी या मातृसत्ता ! लिखने वाला इंसान था या कोई अदृश्य शक्ति ? अगर इंसान ने लिखे तो सबको मालूम है कि इंसान की अपनी सीमाएं हैं और वह ग़लतियां करता है। सुघारता भी है। जो न सुधारने पे अड़ जाए, उसे क्या कहें ? अगर अदृश्य शक्ति ने ग्रंथ लिखे तो उसे पता होना ही चाहिए था कि भविष्य में पितृसत्ता भी होनी है और दूसरे धर्म भी। सो दूरदर्शिता तो यही होती कि धर्म ग्रंथ इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए लिखे जाते।
आपका युटोपिया
सारे मुसलमान अपने सारे काम-धंधे छोड़कर पहले अरबी सीखें। फिर कुरान पढ़ें। क्या गारंटी है कि अरबी सीखने के बाद भी कुरान के वे वही अर्थ पकड़ पाएंगे जो लिखने वाले ने लिखे ! जो नहीं समझेंगे वे किसकी मदद लेंगे ? मुल्ला-मौलवियों की या आपकी ! दूसरे लोग और दूसरे धर्म कैसे पता लगाएंगे कि आप लोग उन्हें सही अर्थ बता रहे हैं !? यानि कि वे भी अरबी सीखें और कुरान पड़ें। कितने सौ साल लगेगें इसमें ? यह युटोपिया है कि उसके भी पितामह !?
आपकी तर्कप्रणाली
कृष्णबिहारी का आपने बिना नाम लिए जवाब दिया और उन पर संघी होने का अप्रत्यक्ष आरोप भी लगा दिया। उनकी मूल आपत्ति का जवाब आज तक नहीं दिया कि दूसरे देशों में बुरक़ा कहां से आया। मैं समझता हूं कि कृष्णबिहारी का बड़प्पन है कि बदले में उन्होंने आप पर तालिबानी आतंकवादी, पाक़िस्तानी जासूस या इस्लाम प्रचारक होने का आरोप नहीं लगाया। बहुत ख़ूब तर्क प्रणाली है कि नाम लिए बिना आधा-अधूरा जवाब दो और नुक्ते जैसी कुछ ग़लती निकालकर अगले का पूरा विचार खारिज़ कर दो। जैसा कि इकबाल हिंदुस्तानी नामक पत्र लेखक के साथ किया गया।
(इस प्रसंग का बाक़ी हिस्सा एक रणनीति के तहत सुरक्षित।)
किसी को संघी, पंथी या तालिबानी बता देना कोई तर्क या जवाब है क्या ?
बच्चों को ऐसा करते तो देखा भी था। बहस के नाम पर चलाए जा रहे कालम में बहस से बचने की हर तरकीब करने से पाठकों को क्या संदेश मिलेगा आखि़र ?
आपकी भाषा
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स्त्रियों से संवाद की आपकी समस्या
शाह बानो का हवाला देकर आपने जो समस्या और तत्काल पश्चात जो समाधान बताए, उन्हें फिलहाल अपनी एक रणनीति के तौर पर मैं स्वीकार कर लेता हूं।  आपको मेरी एक सलाह है। जिन स्त्रियों को आप संबोधित कर रहे हैं, (वे जहां कहीं भी संबोधित हो रहीं हों) उन्हें चार पुरुषों की कामना के क़िस्से और स्त्री की भिन्न-भिन्न पुरुषों से शारीरिक संतुष्टि के तुलनात्मक अध्ययन वाले हिस्से संप्रेषित न करें (शौहर को दुनियावी ख़ुदा समझने वाली औरतों-मात्र को संबोधित कालम में ऐसी बातें ! तौबा ! तौबा !)। मुझे नहीं लगता कि इतने विराधाभासी विचार एक साथ अनपढ़ और धार्मिक स्त्रियां भी झेल पाएंगीं। कोई लफड़ा न खड़ा हो जाए ! और अगर चार पुरुषों वाले आयडियाज़ वे स्त्रियां बर्दाश्त कर सकतीं हैं तो आपकी ज़रुरत ही क्या है ! तसलीमा पहले ही सब कुछ कह गयीं हैं। और अगर मामला वैसा ही है जैसा आप कह रहे हैं और आपको वाकई उन स्त्रियों की चिंता है तो मेरी एक और सलाह है, माइंड मत कीजिएगा। मुझे नहीं लगता उन स्त्रिओं ने ‘हंस’ का नाम भी सुना होगा (यादव जी क्षमा करें)। कहीं एक साल बेकार न चला गया हो। मुझे लगता है वे स्त्रियां उन्हीं दुकानों से लाकर वही क़िताबें पढ़ती होंगीं जो आप टीवी में मेरे प्रिय एंकर रवीश कुमार को दिखा रहे थे। आप वैसी ही साज-सज्जा में अपने लेख छपवाकर उन दुकानों में रखवाईए, लोग ज़रुर पढ़ेंगे आपको। जावेद अख्तर तक को फतवा मिल गया पर आपके इतने हंगामें के बाद भी किसी ने दो शब्द न बोले। ब्लाग पर भी एक-दो लड़कियां लिख रहीं हैं आपसे मिलते-जुलते विषयों पर। एक कट्टरपंथ लानत-मलामत कर रहा है तो दूसरा समर्थन कर रहा है। कुछ ऐसे ‘सरफिरे’ युवा हौसला भी बढ़ा रहे हैं जो तसलीमा की ही तरह सब धर्मों को एक ही ठेंगे पर रखते हैं। आपको तो ब्लॉग पर भी शायद ऐसा वाक़या पेश नहीं आया। हो सकता है आपको मुल्ला-मौलवी भी सीरियसली श्रद्धापूर्वक लें। प्रयोग करने में क्या हर्ज़ है ?
विवाह संस्था से मुक्त कराएं !
वैसे एकाध सवाल से कन्नी काटने की इजाज़त अपन को भी नहीं होनी चाहिए क्या ? अपन चलते हैं। पर रणनीति !? क्यों भई, आप फ़िल्मी हृदय ऐसा क्यों चाहते है कि जो लड़कियां विवाह करना चाहती हैं उन्हें भी विवाह न करने दें हम ! अब क्या ‘प्रगतिशील खाप पंचायतें’ लगवाने का इरादा है !? यह क्या हुआ ? कौन-सा मानवाधिकार हुआ यह ? राइट टू इनफॉर्मेशन है ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ? क्या है यह ? मेरी तो पूरी नालेज ही जवाब दे रही है। अरे, आपने कहा होता कि जो लड़कियां शादी नहीं करना चाहतीं, उनका साथ देकर दिखाएं । तब तो अपना सोचना भी बनता था। आपने तो सवाल ही उल्टा फेंक दिया। वैसे अपन पाठकों का भी पूछना बनता है कि आपने लिखने के अलावा, स्त्री-मुक्ति के संदर्भ में, ऐसे कौन-से क्रांतिकारी फैसले लिए हैं और उनपर अमल किया है ज़िंदगी में, कि आपके लेखन को गाल-वादन न माना जाए !?
आपका गाल-वादन विशिष्ट क्यों ?
क्या सिर्फ इसलिए कि आप को तीन पन्ने मिले हुए हैं और अपन (यानि वे पाठक-लेखक जिन्हें ‘अपना मोर्चा’ और ‘बीच बहस में’ पहुंचने तक के लिए ड्रिबलिंग करनी पड़ रही है) को छपन तक के लाले हैं !? यह तो कोई बहुत लोकतांत्रिक एप्रोच नहीं मालूम होती ! राजसत्ता की तानाशाही टाइप लगती है। और कोई फ़र्क़ हो तो बताएं। इसी लिखे को आप सेमिनार में बोलने या भाषण देने को गाल-वादन से ऊपर की कोई चीज़ मानना चाहें तो यह आपकी ‘बुनियादी समझ’ है। वैसे नेता लोग भी भाषण देने को दूर-दराज़ के बीहड़ इलाकों में जाकर धूप में पसीना निकालते हैं। आइंदा उन्हें गलियाने से पहले तनिक सोचा जाए !
अपनी रणनीति
बिलकुल साफ है कि जब कोई कॉलमिस्ट बिना नाम लिए सवाल या आरोप दागेगा तभी जवाब देंगे, सिर्फ कॉलमिस्ट को। बाक़ी किसी से अपन को कोई मतलब नहीं।

अपन चलते हैं। पीछे संपादक जी जानें, कॉलमिस्ट जानें, वे स्त्रियां जानें। इससे ज़्यादा रिपीटाबाज़ी अपने बस की नहीं।
दुष्यंत के एक शेर का मलीदा पेश है:
हंगामा हो, ना भी हो, हमको लेना-देना क्या-
हंगामें की कहके, अपना नाम होना चाहिए।

वैसे कुछ नादान ऐसे भी होते हैं जो कहते हैं:

हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी-सी जो पी ली है !

ज़ाहिर है इनमें ‘बुनियादी समझ’ नहीं होती।

-संजय ग्रोवर

सोमवार, 7 जून 2010

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?

हंस के मई अंक में मेरा एक लेख है। यह अंक नेट पर आज, लगभग एक महीना देर से अवतरित हुआ है। वजह तकनीकी रहीं होंगीं। यह लेख हंस के कालम की कुछ बातों पर प्रतिवाद-स्वरुप है। अभी एक मित्र ने फोन पर कहा कि इसे ब्लाग पर लगाकर किसकी चर्चा चाहते हो-कालम की या अपनी !? बहरहाल, मैं इसका अगला भाग और छापकर अपनी तरफ़ से क़िस्सा ख़त्म करुंगा क्यों कि क्रिया-प्रतिक्रियाओं की भाषा लगातार छिछली हो रही है और (कालमिस्ट की मंशा जो भी रही हो )मामला महिला-मुक्ति से ज़्यादा दूसरे झगड़ों पर केंद्रित होता चला जा रहा लग रहा है।

(‘हंस’ में स्पेस की मारा-मारी के चलते जो कुछ एडिट हुआ या करना पड़ा, उसका भी कुछ हिस्सा यहां आ गया है। )

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?

यादवजी, मान लीजिए आप सड़क पर जा रहे हैं। देखते हैं कि एक आदमी, दूसरे के पेट में छुरा घोंपने वाला है, आपकी पहुंच के दायरे में है। आप छुरे वाला हाथ पकड़ लेते हैं। तभी वह आदमी पूछता है कि कौन जात-धरम हो भाई ? आप कहते हैं हिंदू हूँ या इंसान हूँ या नास्तिक हूँ। जवाब आता है कि कुरान पढ़ा है कभी ? शरियत जानते हो। तुम्हे क्या पता कि क्या जायज़ है और क्या नाजायज़ ? जाओ पहले पढ़के आओ ! यादवजी, क्या आप उसका हाथ छोड़कर कुरान पढ़ने जाएंगे या ‘सब धान बाईस पंसेरी’ ही करना ठीक समझेंगे !?
यादवजी, मान लीजिए आप मुस्लिम हैं। घर में कोई बीमार है। डॉक्टर ने भी बोल दिया है कि शोर-शराबे से दूर ही रखिए नहीं तो पागल भी हो सकता है। ऊपर के फ्लोर पर ढोल-मंजीरों वाला कोई धार्मिक आयोजन चल रहा है। आपकी नसें फट पड़ने को हो रही हैं। आप ऊपर जाकर प्रार्थना करते हैं कि भाई मेरा बच्चा मर जाएगा, पागल हो जाएगा, शोर कुछ कम कर लो। प्रत्युत्तर है कि पहले सारे धर्मग्रंथ पढ़ लो फ़िर आना ऊंगली उठाने।
मान लीजिए कि तालिबान और मुल्ला-मौलवी किसी तरह यह सिद्ध कर देते हैं कि वे जो कर रहे हैं वही कुरान और शरियत में लिखा है और वही सही है तो ? तो क्या शीबा मुस्लिम स्त्रियों की मुक्ति के लिए अपने प्रयासों को छोड़ कर बुरक़ा पहन लेंगी और मैदान छोड़ देंगीं ? अगर छोड़ देंगी और सभी ऐसा करने लगेंगे तो क्या इस दुनिया में किसी गैलीलियो के लिए कभी जगह रह पाएगी ! जो चर्च आज उनसे माफ़ी मांग रहा है वही कल फ़िर उनकी छाती पर चढ़ दौड़ेगा। मेरी मूल आपत्ति हर बीमारी का इलाज धर्मग्रंथों में ढूंढने को लेकर है। फिर शीबा नया क्या कर रही हैं ? सभी एडजस्टमेंटवादी, कंफ्यूज़्ड और मीडिओकर भी तो यही करते हैं। कि नहीं ग्रंथों में तो सब कुछ अच्छा-अच्छा लिखा था पर कोई बीच में आकर गड़बड़ कर गया। मज़े की बात यह है कि हर धर्म के कट्टरपंथी भी बीच-बीच में यही तर्क देते हैं। कौन है भाई यह ‘गड़बड़िया’ जो आए दिन ग्रंथों में गड़बड़ करता है और आप पकड़ नहीं पाते। जबकि आधी से ज़्यादा दुनिया पहरेदारी में लगी है। और अगर आप पकड़ नहीं पाते तो गड़बड़ तो रुकने से रही। आप सिद्ध कैसे करेंगे कि मूल ग्रंथ कौन-सा था !? क्या इसका कोई प्रामाणिक तरीका भी है !?
अगर इस्लाम में इतना ही ख़ुलापन है तो शीबा को यह कॉलम एक हिंदी पत्रिका में क्यों लिखना पड़ रहा है ? क्या सारे उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में मुल्ला-मौलवी और तालिबान घुसे बैठे हैं ? और क्या राजेंद्र यादव को यह खुलापन इस्लाम से मिला है !? वे तो आज भी इसको पढ़ने को तैयार नहीं। अगर इस्लाम में सारी समस्याओं के हल है तो शीबा बताएं कि वहां क्लोनिंग के बारे में क्या लिखा है ? टेस्ट ट्यूब बेबी के बारे में क्या है ? सेरोगेट मदर के बारे में क्या है ? कंप्यूटर और इण्टरनेट के बारे में क्या है ? समलैंगिकता, ओरल, एनल, वोकल और लोकल सैक्स की बाबत क्या लिखा है ? जब शीबा यह बताएं तो ऐसे वाक्यांशों या अनुवादों के साथ बताएं जिनमें उक्त शब्द सीधे-सीधे आते हों। ज्योतिषियों वाली गोल-मोल भाषा नहीं चलेगी। वरना तो हिंदुत्व में भी सब कुछ निकल आएगा।
एक बार फ़िर (‘हसं’,जनवरी 2010) वे अपने कॉलम का उद्देश्य और रणनीति बताते हुए अंत में कहतीं हैं कि ‘‘इसलिए जिन्हें ‘महिला सबलीकरण’ का एकमात्र रास्ता धर्मविमुख होना लगता है, यह बहस उस वर्ग के लिए नहीं है क्योंकि महिला सबलीकरण मुहिम धर्मविहीनता की ‘युटोपिया’ का इंतज़ार नहीं कर सकती।‘‘
इस तरह बहस के संभावित सबसे बड़े विपक्ष को वे पहले ही बाहर कर देती हैं । फ़िर यह बहस किसके लिए है !? मीडिओकरों और मुल्ला-मौलवियों के लिए !? क्या ये लोग ‘हंस’ पढ़ते हैं ? वे यह बहस मदरसों और मोहल्लों में क्यों नहीं चलातीं !? अगर धर्म-विमुखता युटोपिया है तो धर्म-प्रमुखता भी अंततः हमें ‘बिन-बाल-बुश‘ की बनायी आत्मघाती, निरंकुश, कट्टर और पढ़े-लिखे अनपढ़ों की दुनिया से आगे कहां ला पायी ? वे इसे ‘बीच के लोगों की गड़बड़’ कहेंगी तो मैं भी कहूंगा कि रुस और चीन में भी ‘बीच के लोगों ने गड़बड़’ की थी। सही बात तो यह है कि सही मायने में नास्तिकता का परिचय और परीक्षा तो अभी हुए ही नहीं हैं। हमारे यहां के तो कम्युनिस्ट भी नास्तिकता और मानवता को शरमा-शरमाकर, घबरा-घबराकर अंडरगारमेंट्स की तरह बरतते आ रहे हैं।
नूर ज़हीर और कृष्ण बिहारी ने शीबा की वैचारिक अस्पष्टता की ओर इशारा किया है। ‘हंस’ नवंबर 2009 के अपने लेख ‘...खाने के और दिखाने के और!’ मे शीबा पाठकों के कथनों के सहारे अपनी रणनीति स्पष्ट करने की कोशिश करती हैं ‘इस्लाम को प्रच्छन्न रणनीति के तौर पर इस्तेमाल कर क्या ठीक निशाना साधा है.....’ वगैरह। मगर प्रगतिशीलों, सेक्युलरों और प्रखर नारीवादियों के लिए उनके मुंह से बात-बेबात, बरबस फूट पड़ने वाले ताने और कोसने, सोचने पर मजबूर करते हैं कि रणनीति इससे कहीं ठीक उलट तो नहीं !? यहां तक कि बिना किसी विशेष संदर्भ-प्रसंग के तसलीमा पर फ़ट पड़ती हैं। देखें ‘हंस’, जनवरी 2010 में ‘प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया’। उन्हें लगता है कि विरोधी उनसे इसलिए नाराज़ हैं कि वे तसलीमा या ‘हंस में छपने वाली लेखिकाओं’ की तरह यौन-क्रियाओं के सूक्ष्म डिटेल्स नहीं दे रहीं। तसलीमा का नाम आते ही वे इस कदर धैर्य छोड़ बैठती हैं कि भूल जाती हैं कि तसलीमा की प्रसिद्धि की शुरुआत इन ‘डिटेल्स’ से नहीं ‘लज्जा’ से हुई थी। कि ‘यौन-डिटेल्स’ वाली दो-चार आत्मकथात्मक क़िताबें आने से पहले ही तसलीमा ‘औरत के हक़ में’ और ‘उत्ताल हवा’ जैसी कई कृतियों के ज़रिए ख़ासी मशहूर हो चलीं थीं। कि तसलीमा की सोच बिलकुल साफ़ और भाषा एकदम सरल है। इस भाषा में विद्रोही विचारों को प्रकट करना बहुत हिम्मत का काम होता है। हश्र में निर्वासन और पत्थर मिलते हैं। हिंदी साहित्य के तोप-विद्रोही समझे जाने वाले राजेंद्र यादव की भाषा में भी यह सरलता नहीं है। कहां अपनी साफ़ सोच, बेबाक बातों और अपने हर व्यक्तिगत को सार्वजनिक-सामाजिक बना कर दुनिया भर में लड़ती हुई तसलीमा और कहां बात-बात में डरने वाले, दिन में दस बार अपनी बात बदलने वाले और ‘कुछ कहने-कुछ करने’ वाले हम ! तसलीमा के प्रति उनकी ऐसी नफ़रत का कारण सिर्फ़ इतना ही है ! या तसलीमा की ‘धर्म-विमुखता’ भी एक कारण है ? वैसे शीबा अगर स्पष्ट करें कि उनका एतराज़ तसलीमा की यौन-क्रियाओं पर है या उन्हें लिखे जाने पर है तो आगे इस संदर्भ में बहस सही रास्ते पर चल सके।

शीबा की रणनीति पर उनका अपना कन्फ्यूज़न देखना है तो ‘हंस‘, मई 2009 में छपा ‘सब धान बाईस पंसेरी’ पढ़ जाईए। जिसमें राजेद्र यादव द्वारा अपने एक संपादकीय में इस्लाम पर किए ‘हमले’ पर गुस्सा खा जाती हैं। अपनी समझ में यादवजी की ऐसी-तैसी करते हुए वे फ़िल्म ‘ख़ुदा के लिए’ के हवाले से कहती हैं ’‘पर जब मौलाना वली इस्लाम में संगीत, शिक्षा, निकाह में स्त्री की मर्ज़ी, हलाल कमाई, आधुनिक वेशभूषा व वस्त्र आदि को इस्लामी इतिहास, कुरान की व्याख्या व मोहम्मद साहब के जीवन से उदाहरण लेकर सिद्ध करते हैं तो मौलाना ताहिरी के ग़ुब्बारे की हवा निकल जाती है और उसका गुमराह किया नौजवान सरमद उसकी ही मस्ज़िद में जींस-टीशर्ट में अज़ान देकर उसे चुनौती भी दे पाता है।‘‘
चलिए, यह तो हुआ इस्लाम को रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किए जाने का मामला। पर यहां शीबा यह भी याद रखें कि इस रणनीति के तहत सरमद ख़ुद कितना भी चाहे पर अज़ान को चुनौती फिर भी नहीं दे सकता। इसे दूसरे कोण से देखें तो नतीजा यह भी निकलता है कि जींस पहनी तो क्या हुआ, करना तो वही सब पड़ा ! एक अपने कबीरदास थे जो बिना जींस पहने ही ‘ता चढ़ मुल्ला बांग दे’ गाते फिरते थे। शीबा यह भी सोचें कि इन रणनीतियों का ज़्यादा फ़ायदा अंततः ‘बिन-बाल-बुश’ को ही तो नहीं हो रहा। अभी कितने हज़ार साल और हम इन रणनीतियों पर कुर्बान करेंगे !? आगे चलें। इसी लेख में वे फिर यादवजी पर कुनमुनाती हैं, ‘आपके संपादकीय का तीसरा विरोधाभास यह है कि आप तुर्की के इस्लाम या इंडोनेशिया के इस्लाम की तारीफ़ भी कर रहे हैं और पूरे विश्व के इस्लाम को एक भी मान रहे हैं। क्या आप यह नहीं देख पाते कि जो क्षेत्र इस्लाम पूर्व की कबीलाई व्यवस्था में जकड़े हैं वहीं पर स्त्रियों पर अत्याचार अधिक हैं।’
यहां फिर वे कुछ-कुछ कट्टरपंथिओं वाला सिरा पकड़ लेती हैं कि दोष इस्लाम में नहीं, इधर-उधर हैं। और अपरोक्ष तरीके से फिर वही बात कि मुक्ति इस्लाम के भीतर ही संभव है। अब हम इसे रणनीति मानें कि कट्टर आस्था !? आगे कहती हैं कि ‘राजेंद्र जी, काश धर्म के प्रति आपकी झुंझलाहट और गुस्सा, आपको और गहरे अध्ययन व विश्लेषण की ओर प्रेरित कर पाता।’ क्या धर्म को रणनीति की तरह इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति इसके प्रति गुस्सा और झुंझलाहट रखने वाले व्यक्ति को इसके अध्ययन के लिए कहेगा !? उसके भीतर तो ख़ुद यह झुंझलाहट होनी चाहिए। इस्लाम के प्रति यह श्रद्धा भाव इस पूरे लेख में आपको दिखाई देगा। लेकिन जहां उन्हें मुफ़ीद लगता है वे इसे रणनीति भी करार दे देतीं हैं। ऐसे विरोधाभास उनके कॉलम में कई जगह हैं। एक ही लेख में ज़्यादा लिखा तो संभव है वे मुझे भी कॉलम का दुश्मन और किसी कट्टर धार्मिक संगठन का आदमी बता दें। काहिल, जाहिल और झूठ का पुलिंदा बता दें।

-संजय ग्रोवर

मंगलवार, 11 मई 2010

पुरूष की मुट्ठी में बंद है नारी-मुक्ति की उक्ति-2

पहला भाग


शब्दों को छोड़कर आइए अब ज़रा विज्ञापन की दुनिया का जायज़ा लें । नारी शरीरों की निर्वस्त्रता पर नारी संगठन और संस्कृतिदार पुरूष अपना विरोध कई तरह से प्रकट करते आए हैं व कर रहे हैं । मगर, कई बैंको और फाइनेंस कंपनियों के दर्जनों ऐसे विज्ञापन पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी पर देखने-सुनने-पढ़ने को मिलते हैं, जिनमें प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से दहेज व अन्य स्त्री विरोधी कुप्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता है ।

फिल्मों में देखिए । वहां भी यही हाल है । हमारा नायक अक्सर बहन, बेटी या पड़ोसन के लिए कहीं-न-कहीं से दहेज जुटाकर समस्या की जड़ में जाने की बजाय उसे टालने में अपनी सार्थकता समझता है । इक्का-दुक्का फिल्मों में ही लालची वर-पक्ष को दुत्कार कर किसी आदर्श पुरूष से कन्या का विवाह करने के उदाहरण देखने को मिलते हैं । मुझे याद नहीं कि कभी किसी नारी संगठन ने ऐसे विज्ञापनों या ऐसी फिल्मों का विरोध किया हो । स्त्री का आंचल पौन इंच भर ढलक जाने पर हाय-तौबा मचाने वाले सभ्यजनों को उक्त दृश्यों का विरोध करने के नाम पर क्यों सांप सूंघ जाता है ? क्या कभी किसी नारी संगठन का ध्यान इस ओर नहीं गया कि फिल्मों में किस तरह नारी के अंतर्वस्त्र ब्रेज़ियर को मज़ाक की वस्तु बनाया जाता रहा है (ताजा उदाहरण दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे) । नारी का अंतर्वस्त्र आखिर हास्य का साधन क्यों और कैसे हो सकता है ? क्या यह सोच अश्लील और विकृत नहीं है ?

इसके अलावा कई फिल्मों में दिखाया जाता है कि नायक नायिका के कम कपड़ों पर ऐतराज करता है और उसके भावुकतापूर्ण भाषण से प्रभावित होकर नायिका तुरंत अगले ही दृश्य में साड़ी में लिपटी दिखाई देती है । मगर, अगले गाने में ही वह नायक के साथ ही, और भी कम, लगभग नाममात्र के वस्त्रों में नायक से लिपटती-चिपटती और कामुकतापूर्ण झटके मारती दिखाई पड़ती है । तब न तो नायक ऐतराज करता है, न दर्शक बुरा मानते हैं । एक अन्य आम दृश्य में नायक द्वारा शरीर की मांग करने पर नायिका अपनी सभ्यता-संस्कृति को लेकर लंबा-चैड़ा भाषण देती है । तब नायक प्रभावित होता है और दोनों में ‘सच्चा प्रेम’ हो जाता है । अगले गाने में वे लगभग वस्त्रहीन नाचने लगते हैं । अब तक नायिका तो अपनी सभ्यता-संस्कृति को भूल ही चुकी होती है, दर्शक भी इसको लगभग धार्मिक फिल्म की ही तरह श्रद्वापूर्वक देखने लगते हैं । ज्यादातर फिल्मों में, नायक अक्सर कई दूसरी स्त्रियों के साथ लिपटता-चिपटता रहता है और नायिका अकेली पड़ी उसका इंतजार करती रहती है । जिन दूसरी स्त्रियों के साथ नायक लगभग केलिक्रीड़ा जैसे दृश्य प्रस्तुत करता है, क्या वे किसी की बहन-बेटियां नहीं होतीं ?

क्या हमारी सभ्यता-संस्कृति यही कहती है कि बस अपनी मां-बहन-बेटी को ही कै़द में बंद कर दो और फिर बाकी सभी स्त्रियों को अपनी जायदाद समझो । इन दृश्यों को देखकर हमारे धर्मध्वजियों व नारी संगठनों के माथे पर शिकन तक नहीं आती । उक्त तीनों नियमित दृश्यों में मौजूद विरोधाभास ही इस साज़िश की पोल खोल देते हैं कि किस तरह सभ्यता, संस्कृति, परिवार, धर्म आदि बडे़-बडे़ शब्दों की आड़ में स्त्री को गुलाम बनाए रखने की चालाकी खेली जा रही है । दिलचस्प बात यह है कि परिवार, मर्यादा इत्यादि का सारा ठेका देवी स्त्री को दिया गया है और दुनिया भर के अच्छे-बुरे सभी आनंद लेने की ’ज़िम्मेदारी ’देवता पुरूष को दी गई है ।
नारी मुक्ति के संदर्भ में एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि बहुत से पुरूष यह मानते और कहते हैं कि नारी तो मुक्त हो चुकी । अब बचा क्या है । वह नौकरी करती है, घूमती है, खाती-पीती है, फिल्म देखती है । पुलिस में, हवाई जहाज में, पानी के जहाज़ पर काम करती है अर्थात् पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है । ज़ाहिर है कि पुरूष इसे पूर्ण मुक्ति के संदर्भ में देखने की बजाय उसकी पूर्व स्थिति की तुलना में बेहतर वर्तमान स्थिति को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं । पहली बात तो यह है कि जब भी होगी नारी मुक्ति पुरूष वर्चस्व पर सिर्फ प्रतिक्रिया मात्र नहीं होगी । हां, जब नारी पुरूष से मुक्त हो जाएगी, तब ही वह अपने लिए वास्तविक मुक्ति की तलाश और कोशिश शुरू कर पाएगी। और इस प्रक्रिया में अभी खासा लंबा समय लगने वाला है ।

फिर भी, यहां हम पुरुष की तुलना में नारी की सही स्थिति को जानने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। क्या नारी आज भी अकेली फिल्म देखने जा सकती है? क्या वह पुरुष की तरह बेधड़क पार्क में घूम सकती है? क्या वह किसी अजनबी शहर में कमरा लेकर अकेली रह सकती है? क्या वह लड़कों की तरह बेतकल्लुफी से अपनी मित्रों के गले में हाथ डाले ‘हा हा हू हू’ करते हुए शहर की सड़कों-चौराहों पर घूम सकती है? क्या तपती-सुलगती गर्मी में पुरुष की ही तरह स्त्री भी वस्त्र उतार कर दो-घड़ी चैन की सांस ले सकती है? उक्त में से कोई भी कार्य करने पर समाज द्वारा उसे चालू, चरित्रहीन, वेश्या, सनकी, पागल या संदिग्ध-चरित्र करार दे दिए जाने की पूरी-पूरी संभावना है। सुनने-पढने में यह सब अटपटा, अजीब या अश्लील लग सकता है। मगर स्त्री भी उसी हांड़-मांस की इंसान है और बिलकुल पुरुष की तरह ही उसकी भी इच्छाएं और तकलीफें हैं। वह कोई मशीन या जानवर नहीं है, जिस पर सर्दी-गर्मी का कोई असर ही न होता हो।

मगर प्रतिक्रियावाद हमेशा ही अपने साथ कई विसंगतियों को भी लाता है। ऐसी ही एक ख़तरनाक विसंगति है यह कहा जाना कि ‘तुम स्त्री होकर भी स्त्री का विरोध करती हो’। यह एक नए किस्म का जातिवाद है। स्त्री भी एक इंसान है और पुरुष की तरह वह भी कभी सही तो कभी ग़लत होगी ही, मगर हम हमेशा नई-नई जातियां या वर्ण गढ़ते रहते हैं। यथा डाॅक्टर हमेशा डाॅक्टर को सही कहे, व्यंग्यकार व्यंग्यकारों पर व्यंग्य न लिखें, पत्रकार एकता ज़िन्दाबाद, दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, दलित दलित को ग़लत न कहें, वगैरहा-वगैरहा। पहले ही जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के झगड़ों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। मगर हम हैं कि मानते ही नहीं।
स्त्री की मुक्ति के साथ-साथ हमारे सामाजिक-नैतिक मानदंडों, साहित्यिक प्रतिबद्धताओं, कला संबंधी प्रतिमानों सहित हर क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव आ जाएंगे, जिसका फिलहाल हमें ठीक से अंदाज़ा भी नहीं है। हो सकता है कि आने वाले समय में हमें यह जानने को मिले कि जिसे हम स्त्री का स्वभाव समझ रहे थे, उसमें से अधिकांश उस पर जबरन थोपा गया था। ‘लोग क्या कहेंगे’ या ‘समाज क्या कहेगा’ आदि डरों की वजह से इन प्रक्रियाओं में अनुपस्थित रहने के बजाय हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने विवेक और तर्कबुद्धि से ही इस बाबत निर्णय लेने होंगे। इतिहास गवाह है कि जो लोग इन सामाजिक परिवर्तनों और सुधारों को धर्म व शास्त्र विरुद्ध कहकर इनकी आलोचना करते हैं, बदलाव आ चुकने और समाज के बहुलांश द्वारा इन्हें अपना चुकने के बाद वही लोग अगुआ बनकर इसका ‘क्रेडिट’ लेने की कोशिश भी करते हैं। विरोध, आलोचना और अकेले पड़ जाने के डर से अगर सभी चिंतक अपने चिंतन और उस पर पहलक़दमी करने के इरादों को कूड़े की टोकरी में डालते आए होते तो आदमी आज भी बंदर बना पेड़ों पर कूद रहा होता।

-संजय ग्रोवर


(समाप्त)

पहला भाग

{7 मार्च 1997 को अमरउजाला (रुपायन) में प्रकाशित}

गुरुवार, 6 मई 2010

पुरूष की मुट्ठी में बंद है नारी-मुक्ति की उक्ति-1


प्रशंसा सुनकर गद-गद होना या झूठी तारीफ सुनकर दूसरों का काम तुरत-फुरत कर देना-एक ऐसी कमजोरी है, जो ज्यादातर लोगों में पाई जाती है । मगर जिस वर्ग को इस विधि से सर्वाधिक छला गया है, वो है-स्त्री वर्ग । सुंदर और मोटे-मोटे शब्दों का जाल बिछाकर स्त्री को इस तरह फंसाया गया है कि इस जाल को स्त्रियों ने अपनी नियति ही मान लिया है । मगर आश्चर्य और दुःख की बात तो यह है कि इस सदियों पुराने भारी-भरकम शब्दजाल मे फंसी अधिकांश स्त्रियां, खुद को गौरवान्वित महसूस करती हैं । यहां तक तो गनीमत है, मगर जब यही स्त्रियां, आजादी की ख्वाहिश-मंद और इसके लिए प्रयासरत कुछ दूसरी, थोड़ी-सी, साहसी महिलाओं को तरह-तरह से रोकने की, उनके नैतिक साहस को डिगाने की, उन पर उलजुलूल, मनगढंत लांछन लगाकर उनका चरित्र-हनन करने कोशिश करती हैं, तो उनका यह कृत्य आपत्तिजनक, निंदनीय व व्यक्तिगत आजादी पर हमला तो होता ही है, साथ ही पुरूषवादी समाज के अमानुषिक, तानाशाह तौर-तरीकों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा भी देता है । इज्जत, शील, मर्यादा, ममता, लज्जा आदि कितने ही ऐसे शब्द हैं, जो वर्षो से स्त्री को भरमाते आए हैं । ये शब्द और स्त्री संदर्भो में इनके प्रचालित अर्थ इस भयावह सचाई को बताते हैं कि महज चंद शब्दों की आड़ में एक बड़ी भीड़ का कितनी आसानी से शोषण किया जा सकता है । एक स्त्री व एक पुरूष विवाह से पहले या विवाह के बिना अगर संभोग कर लेते हैं, तो हमारा समाज व साहित्य बांग लगाता है कि हाय, बेचारी स्त्री का शील भंग हो गया । अब पूछिए इनसे कि ‘शील’ नामक इस सम्मान (?) से सिर्फ स्त्री को ही क्यों नवाजा गया है ? क्या पुरूष का ‘शील’ नहीं होता ?
एक अन्य उदाहरण में जब स्त्री के साथ बलात्कार होता है तो जबरन किए जाने वाले इस कृत्य के लिए बलात्कार एकदम उपयुक्त शब्द होता है । मगर, इससे सामाजिक संप्रभुओं का मतलब हल नहीं होता । सो वे कहते हैं कि स्त्री की इज्जत लुट गई, अस्मत लुट गई । कितनी हास्यास्पद है यह अलंकृत भाषा । जैसे कि आपके घर में डाका पडे़ और बजाय डाकुओं के हंसी भी आपकी ही उड़ाई जाए । आप शर्म के मारे घर से ही न निकलें, थाने में रिपोर्ट कराने न जाएं कि सब हंसेगे आप पर । लोग संदेहपूर्ण नज़रों से देखेंगे आपको कि आपके घर में डाका पड़ा, तो गलती भी आपकी रही होगी, आप ही चरित्रहीन होंगे ।
ऐसा ही एक और शब्द है ममता । इसका प्रचलित अर्थ है मां को अपने बच्चों (दरअसल बेटों) के लिए बेशर्त प्यार । यहां तक तो गनीमत है । अगर अधिकांश स्त्रियां अपने बच्चों पर ममता लुटाती हैं और उन्हें बच्चे पैदा करने और उन्हंे पालने में आनंद आता है तो निश्चय ही यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है और किसी को उन्हें रोकने का कोई हक नहीं है । मगर, जब यही स्त्रियां और समाज इस मातृत्व को जबरन किसी पर थोपने की कोशिश करते हैं और उसके इनकार करने पर उसे असामान्य करार देते हैं, चरित्रहीन करार देते हैं, तो निश्चय ही यह आपतिजनक है । व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है । अगर कुछ स्त्रियां मातृत्व से इनकार कर रही हैं तो यह कैसे कहा ज सकता है कि हर स्त्री मां बनना चाहती है । सिर्फ पुरानी धारणाओं या ‘आंचल में है दूध और आंखों में पानी’ जैसी उक्तियों पर जीती-जागती स्त्रियों और उनके सपनों को बलि चढ़ा देने का हक किसे हो और क्यों हो । कैसी विडंबना है कि एक कुंवारी स्त्री अगर अपनी मर्ज़ी से मां बनती है या बनना चाहती तो उसे भी सताया जाता है । और शादीशुदा स्त्री माँ नहीं बनना चाहती तो उसे तो प्रताड़ित किया ही जाता है। प्रंसगवश पंजाबी लेखिका अजीत कौर के उपन्यास ‘गौरी’ से कुछ पंक्तियां उद्धृत करना उपयोगी होगा-’ममता का भी वैसे कुछ ज्यादा ही आडंबर रचा हुआ है कवियों-ववियों ने । ममता कोई पहाड़ी झरना नहीं होता कि एक बार धारा फूटी तो बस बहती ही चली जाएगी । ममता भी शेष मानवी भावनाओं की तरह रोज़-रोज़ पानी देकर सींचने-पालने वाली चीज़ है । नहीं तो सूख जाती है यह भी ।’
फिर कुछ और शब्द हैं । स्त्री देवी है, मां-बहन और बेटी है । भारतीय संदर्भो में स्त्री की दुर्दशा को देखते हुए उसे देवी कहा जाना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे कि एक मुहावरे के अनुसार किसी को पोदीने के पेड़ पर चढ़ाकर उससे अपना काम निकलवा लेना । बार-बार स्त्री को मां-बहन-बेटी कहते रहने में जो अर्थ छुपा है, उसकी धुरी भी पुरूष है । निहितार्थ इसके भी यही हैं कि वो पुरूष की मां, बहन और बेटी है । उसकी परवरिश, सुरक्षा या परवाह चूकि पुरूष को ही करनी है, अतः हर मामले में उसे अनुमति या सलाह भी पुरूष से ही लेनी चाहिए । इस कारक ने भी स्त्री को बौद्विक या मानसिक रूप से अपंग बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है । अगर ऐसा न होता तो अकसर हमें यह भी सुनने को मिलता कि ‘पुरूष हमारा भाई है, बेटा है, देवता है, इसलिए उसे हमें घर में, एक कोने में संभालकर रखना चाहिए । स्त्री को देवी कहने वाला समाज वास्तव में उसे क्या मानता है, इसका पता हमें इसी बात से चल जाता है कि हमारे यहां प्रचलित लगभग सभी गालियां स्त्री को लक्ष्य करके कही गयी हैं। स्त्री की वास्तविक हैसियत बताने वाले ऐसे कितने ही शब्द हैं । जैसे अर्धान्गिनी । निहितार्थ है पुरूष का आधा भाग, वो भी अनिवार्य रूपेण स्त्री ही, क्योंकि पुरूष को तो ‘अर्धान्गिना’ हम कहते नहीं ।

-संजय ग्रोवर

{7 मार्च 1997 को अमरउजाला (रुपायन) में प्रकाशित}

(जारी)

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सोमवार, 29 मार्च 2010

दोबारा में : 8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

Saturday, March 7, 2009
8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

व्यंग्य

**मर्दों वाली बात**

वातावरण मर्दांनगी से भरपूर था। इतना कि भरी हुई टोकरी से मरी हुई मछलियो की तरह मर्दानगी फिसल-फिसल जाती थी। मर्दानगी के कई रूप थे। कही घनी मूंछों में थी, तो कहीं बांहों की फड़कती पेशियों में। चढ़ी हुई आंखों में थी, तो मस्तानी चाल में थी। बच्चों को गरियाते हुए थी और मां-बहनों को सुरक्षियाते हुए थी। अखबारी कागज़ पर कूद-फांद भी मचा रही थी और धर्म के दंगल में कुश्ती भी लड़ रही थी।
एक खास किस्म के चिंतन की कृपा से एक खास किस्म की पूर्व-निर्धारित शैली में जीने वाले सभी जन मर्द थे। हालांकि वे गैस का सिलिंडर लाने से लेकर बिजली का बिल जमा कराने तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘एडजस्ट‘ कर लेते थे, मगर फिर भी मर्द बने रहते थे, क्योंकि औरतों के साथ ‘एडजस्ट‘ नहीं कर पाते थे। वे सब इसलिए भी मर्द थे कि वे माइकल जैक्सन नहीं थे। हालांकि उनमें से कई कवि, लेखक और कलाकार थे, जो लंबे बाल भी रखते थे और पान से होंठ लाल भी किए रहते थे। मंच पर सांस्कृतिक हरकतें मचाने में वे माइकल से उन्नीस भी नहीं पड़ते थे, पर वे सुमित्रानंदन पंत भी नहीं थे कि अपनी सुकुमारता को मर्दानगी से स्वीकार पाते। हाय कि मर्द होते हुए भी वे सब कितने लाचार थे।
उनमे से कुछ लोग लंबे बाल रखने की बजाय दाढ़ी बढ़ाए रखते थे, तो कुछ, कुछ और प्रतीकें। ये सब उनके पूर्वजो की पुस्तकों में मर्दानगी के चिन्ह घोषित किए गए थे और मर्दानगी सिर्फ प्रतीकों में ही बची रह गई लगती थी। अपने पूर्वजों की पुस्तकों और उनमें तय किए जा चुके मर्दानगी के मानदंडों में लिथड़े हुए वे आंखें बंद किए पड़े रहते थे। यह उनकी मर्दानगी का एक और प्रकार था। अपनी टोटल मर्दानगी के बावजूद वे मर्दानगी के सभी प्रतीकों का खुलकर प्रदर्शन न कर पाने की अपनी सांस्कृतिक मजबूरी पर मन मसोस कर रह जाते थे।
लगभग सभी मर्द लोग बदलाव के हामी थे, मगर धीरे-धीरे। वे कमीज-धोती से शर्ट-पतलून तक तब आते थे, जब दूसरे (कम मर्द या नामर्द) लोग छींटदार कपड़ों पर पहुंच जाते थे। इस तरह वे एक बदलाव लाते हुए भी, बड़े धैयपूर्वक, एकाध सीढ़ी का ‘गैप‘ बनाए रखते थे। वे चाहते थे कि देश-समाज-सभ्यता-संस्कृति को धक्का एकदम से न लगे बल्कि धीरे-धीरे लगे। हालांकि यह युक्ति किसी असाध्य रोग को झेल रहे वृद्ध रोगी को दयामृत्यृस्वरूप ‘स्लो प्वाइज़न‘ देने जैसे थी, मगर उनकी मर्दानगी के अनुकूल पड़ती थी।
एक दिन उन सबने उन पुरस्कारों पर हाय-तौबा मचा दी, जो उन्हें नहीं दिए गए थे। हालांकि माइकल जैक्सन कोई इधर का उद्योगपति नहीं था। फिर भी उसे न जाने क्या सूझी कि उसने इधर के मर्दों के लिए कुछ लंबे-मोटे पुरस्कारों की घोषणा कर दी।
इसके बाद क्या हुआ? क्या उन्होंने माइकल जैक्सन की भावनाओं का आदर करते हुए पुरस्कार ग्रहण कर लेने की सहृदयता व सहिष्णुता दिखाई? या पुरस्कार लौटा देने का क्रांतिकारी कदम उठाया? पाठक-श्रोता-दर्शक-आलोचक अपने-अपने अंदाजें मारते हुए अपने-अपने नतीजों पर पहुंच गए थे।
इधर मेरे लिए वक्त आ गया था कि हर लेख के अंत की तरह एक बार फिर डरूं। अतः जैसा कि नहीं होना चाहिए, पर अक्सर होता है, मैंने घोषणा की कि यह सब तो एक सपना था।

यह हुई ना मर्दों (ना+मर्दों?) वाली बात।




-संजय ग्रोवर

(जनवरी, 1997 को हंस में प्रकाशित)

+
‘अनुभूति’ पर कविताएं ‘स्त्री थी कि हंस रही थी’ और ‘हमारी किताबों में हमारी औरतें’

‘संवादघर’ पर कार्टून ‘‘कार्टूनखाना में स्कर्टस्’’

‘अमर उजाला’ में ग़ज़ल

‘संवादघर’ में कविता ‘मर्दानगी’

प्रस्तुतकर्ता sanjaygrover पर 2:32 PM
(लेबल: कविता, कार्टून, व्यंग्य, स्त्री-विमर्श के आस-पास, ग़ज़ल)

प्रतिक्रियाएँ:

3 टिप्पणियाँ:

प्रेम सागर सिंह said...
ग्रोवरजी,
शानदार आलेख है, आभर।
March 8, 2009 8:30 PM

amarpathik said...
Sanjay bhai apka lekh sachmuch krantikaari hai....
March 26, 2010 2:51 PM

mukti said...
हा हा हा हा !!! ये इतना अच्छा व्यंग्य कैसे मुझसे छूट गया. अच्छा हुआ फ़ेसबुक पर आपने लिंक दिया.
March 26, 2010 6:15 PM

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

गालियों और लात-घूंसों के साथ जूठन भी प्राकृतिक स्वभाव !?


मटुकजूली के ब्लाग से चली यह बहस रा. सहारा  और गीताश्री के ब्लाग से होती हुई  मुझ तक आ पहुंची है क्यांकि एक टिप्पणी मटुक जूली के ब्लाग पर मैंने की थी। जिसपर उन्होंने अपने विचार रखे और उनपर मैं अपने रख रहा हूं।

(तकनीकी कारणों से यह मटुकजूली ब्लाग पर पोस्ट नहीं हो पा रही है। अपने और दूसरे ब्लाग पर डाल रहा हूं।)



प्रिय मटुकजूली जी,

कृपया इस ’प्रिय’ शब्द के कोई विशेष अर्थ न निकालें, यह कामचलाऊ भाषागत शिष्टाचार है, जिसका मैं खामख्वाह विरोध नहीं करना चाहता। चूंकि आपने ‘अपनत्व के छिलके’ शब्दों का प्रयोग किया इसलिए यह सावधानी बरतनी पड़ रही है। मैंने किसी विशेष अर्थ में आपके साथ ‘अपनत्व’ का कोई दावा किया हो, मुझे तो याद नहीं। हां, इस भीड़वादी समाज में दो लोग और निकलकर आए जिनके पास अपने कुछ विचार हैं और उन्हें सलीके से कहने का हौसला भी वे रखते हैं, इस नाते अपने से मिलते-जुलते स्वभाव और विचारों के लोगों को प्रोत्साहित करने की जो भावना मन में उठती है, वह ज़रुर कारण बनी। अब आप इसका अर्थ यह भी मत लगा लीजिए कि किसी का या मेरा प्रोत्साहन नहीं होगा तो आप कुछ कर नहीं पाएंगे। बिलकुल करेंगे। ऐसे प्रोत्साहन का एक कारण प्रोत्साहन देने वाले का अपना अकेलापन भी होता है जिसके चलते ही वह इस ज़रुरत को समझ पाता है कि उसके जैसे लोगों को प्रेरणा, प्रोत्साहन और नैतिक समर्थन की कितनी ज़रुरत होती है। इसका अर्थ कोई यह भी न लगा ले कि मैं हर उस आदमी का समर्थक हूं जो भीड़ से अलग या भीड़ के खिलाफ़ कुछ भी कर रहा है। देखना होता है कि उसके ऐसा करने की वजह क्या है, उससे समाज में किस तरह का बदलाव आने की संभावना है।

आपका धन्यवाद कि आपने इतने धैर्य और सदाशयता के साथ मेरी टिप्पणी पर अपने विचार रखे। कलको गीताश्री भी मेरी उस सहमति पर आपत्ति उठा सकतीं हैं जो मैंने आपके कुछ विचारों पर व्यक्त की है। मैं उनका भी स्वागत करुंगा। आखिर यही तो वैचारिक और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसके लिए मैं, आप, गीताश्री और हमारे जैसे लोग एक जगह बनाना चाहते हैं। पर कभी-कभी आप अतिरेक में चले जाते हैं (हो सकता है मैं भी जाता होऊं और जब ऐसा हो तो आप मुझे भी टोकिएगा) और बातों को  अपने अर्थ दे देते हैं। आप मुझे मेरी अगली-पिछली टिप्पणियों में से एक वाक्य निकाल कर दिखाईए जिससे यह पता चलता हो कि मैं आपको तुलसीदास से वंचित रखना चाहता हूं ! हां, किसी कवि, लेखक, चिंतक या दार्शनिक को पसंद करने के सबके अपने-अपने कारण होते हैं। आपके भी हैं, मेरे भी हैं। मुझे वे लोग अच्छे लगते हैं जो आम आदमी को समझ में आने वाली भाषा में बदलाव की बात करते हैं, रुढ़ियों और कुप्रथाओं के खिलाफ लिखते हैं। मुझे सौंदर्य इसी में नज़र आता है। चरित्र-चित्रण की बात है तो क्या आप यह मानते हैं कि ऐसा करते हुए लेखक के अपने पूर्वाग्रह आड़े नहीं आते होगे ! अगर मुझे घुट्टी में ही औरत से, कमज़ोर और वंचित से (सर्वावाइल आफ द फिटेस्ट !) नफ़रत सिखाई गयी है तो मैं उक्त सबका चरित्र-चित्रण बिना पूर्वाग्रहों के कैसे कर पाऊंगा !? और माफ़ कीजिए, मैं इस आधार पर किसीके बारे में अपनी राय नहीं बना सकता कि उसे रवींद्रनाथ टैगोर या बर्नार्ड शा पसंद करते थे कि नहीं करते थे। मैं किसी को पढ़ता हूं तो सीधे-सीधे पढ़ता हूं। मुझे एक लेखक की कोई बात जम रही है मगर चूंकि जयशंकर प्रसाद या अरुंधति राय को नहीं जमी इसलिए मैं भी विरोध करुं, मेरी समझ से कतई बाहर है। मुझे तो अत्यंत हैरानी है कि ऐसी बातें आप कह रहे हैं ! अभी कल ही कहीं पढ़ रहा था कि मिर्ज़ा ग़ालिब मीर के बड़े प्रशंसक थे। अब मैं इसका क्या करुं कि ग़ालिब मुझे अत्यंत प्रिय हैं, मीर समझ में नहीं आते। हांलांकि मीर मेरी इस कसौटी पर खरे हैं कि उनकी भाषा ग़ालिब की तुलना में आसान है। मगर इधर ग़ालिब ने व्यक्ति और समाज के मनोविज्ञान को जिस तरह समझा है, उधर दिखाई नहीं पड़ता। मेरी समझ में आज भी हमारे समाज को आसान भाषा में खरी-खरी कहने वाले लेखकों-चिंतकों की ज़रुरत है क्यों कि कबीरदास के ‘माला फेरत जुग भया‘ और ‘ता चढ़ मुल्ला बांग दे’ के बावज़ूद हमारा समाज वहीं का वहीं पड़ा है। कबीरदास के ऐसे दो-चार दोहे ज़रुर हमारे कोर्स की क़िताबों में हैं मगर कबीर, बुद्ध या चार्वाक के वास्तविक विचारों से हमारा आम आदमी ठीक से परिचित नहीं है या उसे होने नहीं दिया गया। ओशो का भी मैं प्रेमी हूं और मनसा आनंद जी के ब्लाग पर आजकल उनका ‘‘स्वर्णिम बचपन’’ पढ़ रहा हूं। लेकिन जैसे ही पूर्व-जन्म, अध्यात्म, आत्मा, ईश्वर, गुरु में अंधी श्रद्धा जैसे प्रसंग आते हैं, बात मेरी समझ से बाहर चली जाती है। किसी भी लेखक या चिंतक का लिखा-कहा सब कुछ कैसे सही हो सकता है !? मेरे दिमाग में तो यह बात कभी अट नहीं पायी। आपको मेरी या मुझे आपकी भी सारी बातें कहां जम रही हैं। तय परिभाषाओं के हिसाब से आप और मैं बड़े लेखक हों न हों, दोनों एक-दूसरे को तो कुछ-ना-कुछ समझ ही रहे थे।



औरतों-मर्दों के प्राकृतिक गुणों पर आते हैं। आपने बताया कि आपने परिवार में हमेशा औरतों को मिल-बांट कर खाते देखा। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। होनी भी क्यों चाहिए !? यहां एक मुसीबत यह भी तो है कि जो मिल-बांटकर नहीं खाएगी, आप तय कर देंगे कि यह तो औरत ही नहीं है। मुझे कुछ उदाहरण याद आते हैं। जब पिता किसी व्यवसायिक कार्य से रातों को बाहर जाया करते तो मां रात को घर में सोने के लिए किसी पुरुष रिश्तेदार को बुला लिया करतीं थीं। हांलांकि घर में हम छः छः बच्चे भी होते थे और थोड़े साहसी और व्यवहारिक हों तो एक-दो चोरों से निपटने के लिए कम नहीं होते। मगर उस मानसिक-सांस्कारिक कमज़ोरी का आप क्या करेगे जो स्त्रियों और कुछ बच्चों को परिवेश से मिली होती है। अब जिस पुरुष रिश्तेदार को बुलाया जाता था ज़ाहिर है कि उसकी अच्छी आवभगत भी होती थी। अब मैं और आप कैसे तय करेंगे कि यह मिल-बांट कर खाना था या कुछ और था !? जब मैं स्त्रियों और उनकी समस्याओं के प्रति न के बराबर संवेदनशील था तब भी नोट करता था कि मां हमेशा बासी चीज़ें खातीं थीं। घर की आर्थिक स्थिति कुछ खराब भी नहीं थीं। पिता ने भी कभी मां से ऐसी कोई टोका-टाकी नहीं की थी कभी। मगर मां जब भी अच्छा या महंगा कुछ खातीं तो तब जब घर में कोई सामने न हो या रसोई के एक कोने में छुपकर खातीं थीं। कोई चाहे तो इसे त्याग कह सकता है मगर मेरी समझ में सामाजिक-पारिवारिक-सांस्कारिक परिवेश से मिले अपराध-बोध और हीन-भावनाएं सीधे-सीधे इसके पीछे थीं। कमाल की बात कि मुझे भी एक रिश्तेदार महिला ने एक-दो बार रात सोने के लिए बुलाया जब उनके पतिदेव बाहर गएं। भाभी और उनकी बिटिया ठीक-ठाक ताकतवर थीं। जहां तक शारीरिक ताकत की बात है तो वे महिला अगर मुझे एक धक्का मारतीं तो मैं दो-चार कदम दूर जाकर ही गिरता। मगर संस्कारों की घुट्टी में मिली मानसिक कमज़ोरी का क्या करें !

और स्त्रियां तो बांटकर खातीं हैं मगर हमारे दलित-हरिजन-वंचित-पिछड़े ! वे तो गालियों और लात-घूंसों के साथ जूठन खाते आएं हैं। इसे भी उनका प्राकृतिक स्वभाव कहेंगे आप !? उनकी बुद्धि भी ‘भटक’ गयी है जो वे अपने हक मांग रहे हैं। मेरा कहना आपसे यही था कि हम पहले ठीक से तय तो कर लें कि क्या प्राकृतिक है और क्या समाज-व्यवस्था द्वारा लादा गया है। इसमें मेरी या आपकी उम्र से कोई लेना-देना नहीं था। हज़ारों सालों की तयशुदा परिभाषाओं में से बहुत सी स्त्री के संदर्भ में ग़लत साबित पड़ती जा रही हैं, इसलिए आप तो जल्दी न करें। मेरा निवेदन यह था। शारीरिक ताकत की बात करें तो क्या सारे पुरुष फौज में भर्ती होने के क़ाबिल होते हैं !? वे पुरुष भी जो पुस्तकों के लोकार्पण और वैचारिक अभिव्यक्ति पर लोगों को पीट-पीटकर मार डालते हैं, आतंकवादियों के हमलों के वक्त गायब हो जाते हैं। एक वक्त होता था जब हम साफ-साफ देखा करते थे कि आस्ट्रेलिया जैसे देशों की (महिला) खिलाड़िनें भी हमारे  जैसे देशों के (पुरुष) खिलाड़ियों से कद-बुत और दम-खम में बेहतर होतीं थीं। आज हमारे देश की बहुत सी स्त्रियां बहुत से ऐसे काम कर रहीं हैं जो उनके लिए असंभव घोषित कर दिए गए थे। सीधी बात है कि जो महिलाएं ख़ुदको आधी रात को घूमने या फायटर पायलट बनने के अनुकूल पाएंगी वे निभा ले जाएंगी बाकी अपने दूसरे कामों में लगेंगी। नौकरी करने के लिए महिलाएं हों या पुरुष दोनों ही को कुछ न कुछ त्याग तो करने पड़ते ही हैं। आधी रात को घूमने की बात है तो दो ही इलाज हैं कि या तो हम समाज को इतना खुला और कुण्ठामुक्त बनाएं कि रात को उनका घूमना सामान्य बात हो जाए या उन्हें ज़िंदगी भर दबा-छुपाकर रखते रहें। आधी रात को घूमने में कई खतरे आखिर पुरुष को भी रहते हैं। आपको और मुझे भी अपनी बात कहते हुए तरह-तरह के खतरे होते हैं, तो क्या हम अपनी बात कहना छोड़ देते हैं !?

कुछ स्त्री-संगठनों ने आपके प्रसंग में जिस तरह के तर्क दिए मुझे जमे नहीं थे। लेकिन स्त्री-संगठनों की उपयोगिता से मैं इन्कार नहीं कर सकता। हो सकता है कुछ स्त्रियां अतिरेक में जाकर तो कुछ आर्थिक कारणों से कई बार ग़लत बातें कर देती हों मगर हमारे समाज में अभी तक वह माहौल नहीं बन पाया कि जहां स्त्री-संगठनों की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाए। मैं तो आरक्षण के भी खिलाफ हूं पर मेरे नज़दीक यह बिलकुल साफ है कि बिना आरक्षण के इस समाज में दलितों-वंचितों की स्थिति कतई बदलने वाली नहीं थी। ओशो भी संगठन या संस्थाबाज़ी के खि़लाफ थे पर अंततः उन्हें भी एक कामचलाऊ जमावड़ा बनाना पड़ा।

35 और 24 में भारतेंदु और भगतसिंह काफी कुछ कह गये लेकिन सब कुछ नहीं कह गए। बहुत कुछ अभी कहने को भी बाकी है और दोहराए जाने को भी।

-संजय ग्रोवर

बुधवार, 25 नवंबर 2009

मोहे अगला जनम ना दीजो-2



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भला किसी को ग़ज़लें भी फ़ुल वॉल्यूम पर सुनते देखा है कभी !

सरल सुनता है कि पूरे मोहल्ले को सुनाता है !?

‘‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,

वे काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।’’

जगजीत सिंह की आवाज़ जैसे कोई डोर है। सरल उसपर चढ़ता है और पतंग बन जाता है। यूं मुक्त आकाश में लहराना कितना अच्छा लगता है सरल को।

25 का हुआ सरल। 30 का हुआ सरल। 35 का हुआ सरल।

मगर वही कमरा। वही बंद दरवाज़ा। वही ऊंची आवाज़ में ग़ज़लें। कभी जगजीत की जगह मेंहदी हसन ले लेते हैं तो कभी हरिहरन। कभी ग़ुलाम अली आ जाते हैं तो कभी हुसैन बंधु। कभी-कभार भूपेन हज़ारिका भी आते हैं। लता, रफ़ी, किशोर भी आते हैं...

’’कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.......’’

मगर जगजीत की आवाज़ में आवाज़ मिलाना इतना अच्छा क्यों लगता है सरल को !

‘‘ न दुनिया का डर था न रिश्तों के बंधन’’

और तेज़ ! और ऊंचा। बात-बेबात झेंपने, शरमाने, डरने और घबराने वाला सरल बंद कमरे में अपनी आवाज़ को एकदम खुला छोड़ देता है। कमरा एक स्टेज बन जाता है। अब उसमें और जगजीत सिंह में कोई फ़र्क नहीं। साथ-साथ बैठे कोरस गा रहे हों जैसे।

खुले में जितना छुपना पड़ता है, बंद में ख़ुदको उतना ही खोल देना चाहता है सरल।

‘‘मैं भी कुछ हंू, देखो कितनी कलाएं हैं मुझमें, सुनो...!’’

कैसी है ख़ुदको अभिव्यक्त करने की यह जानलेवा छटपटाहट !?

क्या बाहर कोई मुझे सुन रहा होगा !

‘‘मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी.......’’



एकाएक कुछ याद आ जाता है सरल को। कोई चीज़ है जो कचोट रही है भीतर से।



यह किसके बचपन के बारे में बात चल रही है आखि़र ! ऐसा क्या था जिसे लौटाने के लिए दुआएं, प्रार्थनाएं हो रही हैं ! गिड़गिड़ाया जा रहा है ! होगा यह जगजीत सिंह का बचपन। होगा यह तलत अजीज़ और सुदर्शन फ़ाकिर का बचपन। सरल क्यों इसके गुणगान में इस कदर लीन है ! सरल का बचपन तो नहीं यह। क्या सरल की भी इच्छा होती है अपने बचपन में लौटने की !

सिहर उठता है सरल। धुंधली यादों में मकड़ी के जालों से भरे कमरें हैं। अदृश्य दीमकें हैं जो भीतर-भीतर सारे बचपन को कुतर जाती थीं और बाहर किसी को पता भी नहीं चलता था। अपने ही लिजलिजे अस्तित्व की सीलन से भरे बिस्तर हैं। वे आक्रमणकारी छींकें हैं जो 50-50 की संख्या में एक साथ हमला करतीं थीं और सरल की कमर के साथ मनोबल को भी तोड़ देतीं थीं। और 5-10 घंटों के इंतेज़ार की यादें हैं कि अब बस अब मेहमान जाएंगे और सरल अपनी झेंप को पोंछता-छुपाता कमरे से बाहर निकलेगा। उम्मीद करेगा कि मां ख़ुदबख़ुद ही कुछ खाने को दे दे, उसे कोई याचक मुद्रा न बनानी पड़े। न मां पर हमलावर होना पड़े। फ़िलहाल तो मां से लड़ना ही उसके लिए मर्दानगी है। जिसके लिए सौ-पचास कोड़े अपने-आपको भी मारने होते हैं अंधेरे बंद कमरों में।

और क्या-क्या है सरल के बचपन में।



‘‘ ांडू आ गया। ांडू आ गया।’’

मोहल्ले के बच्चे सरल के पीछे-पीछे आ रहे हैं।

सरल के पैरों में पसीना है। चप्पलें उतर-उतर जाती हैं। क़दम-क़दम पर, गिर जाने के डर से शरीर कांप रहा है। ऊपर छतों पर खड़े लोग उस पर हंस रहे हैं, सरल को लगता है। सात घरों वाली यह गली पार करने में न जाने कितनी उम्र बीत जाएगी। ऊपर से ये बच्चे पीछे लगे हैं,

‘‘ ांडू है।’’ ं

‘‘ ांडू है।’’

कौन हैं ये बच्चे ! क्यों सरल के पीछे लगे हैं !? क्या कह रहे हैं सरल को !?



(जारी)



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शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

दमित-विमर्श


सुना है कि वक्त बदल गया है।पुरुष भी अब आज़ाद हो रहे हैं। मगर मैं कहता हूं कि फ़िर कहां है वो लड़की जो मेरा हाथ पकड़कर जबरन मुझे घर से बाहर खींच ले जाए। झिड़के कि कहां रसोई में घुसे रहते हो दिन-भर, देखो अब मर्द भी बाहर घूम रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, मंचों पर कहानी-कविता पढ़ रहे हैं।

लो, यह नेकर पहनो। अनकमफर्टेबल होने की ज़रुरत नहीं। लो पहनो पहनो हाफ शर्ट, पहनो सैण्डो बनियान। और किसी लड़की ने तुम्हारी तरफ़ बुरी निगाहों से देखा या अश्लील फिकरा कसा तो मैं उसकी आंखें निकाल लूंगी, ज़ुबान खींच लूंगी। चलो बैठो मोपेड पर मेरे पीछे। चलो छोड़ो इसे, आज गाड़ी तुम ड्राइव करो, हौसला रखो, मैं बैठी हूं न तुम्हारे पास।



कहां है वो लड़की !? मैं उसके साथ घिसटता चला जाऊंगा।


--एक्स वाई ज़ेड

(फेसबुक/संवादघर से निवेदन है कि मेरा असली नाम न छापें। मर्दों के लिए ज़माना अभी इतना भी नहीं बदला। लड़कियों और उनकी बाप-मांओं को पता चल गया तो मेरे लिए अच्छे घर की खाती-कमाती लड़की मिलनी मुश्किल हो जाएगी।)

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

मोहे अगला जनम ना दीजो ।


क्या करे इन हाथों का ? काट डाले इन्हें ? फेंक आए कहीं जाकर ? या हरदम ढंक कर रखे कहीं ? छुपा दे ! या किसी खुरदुरी चीज़ पर तब तक रगड़ता रहे जब तक दूसरे लड़कों की तरह मर्दाने, खुरदुरे, सख्त या गंठीले ना हो जाएं। तनहाई के छोटे से छोटे वक्फ़े में भी ये हीन भावनाएं, ये अपराध-बोध सरल का पीछा नहीं छोड़ते। किसी से हाथ मिलाने से भी डरता है, बचता है सरल। बीच-बीच में सुनने को मिल जो जाता है- ‘अरे यार, तुम्हारे हाथ तो लड़कियों से भी ज़्यादा मुलायम हैं।’'अगर रात अंधेरे में तेरा चेहरा देखे बगैर कोई तुझसे हाथ मिलाए तो यही समझेगा किसी लड़की का हाथ पकड़ लिया है।'


तिस पर दुबला-पतला-पीला शरीर। शर्मीला स्वभाव। तरह-तरह के फोबिया। ज़रा कुछ खट्टा या तला हुआ खाले तो खांसी, ज़ुकाम, पेटदर्द । महीने में 15 दिन बिस्तर पर गुज़रते हैं। धैर्य नाम की चीज़ से सरल का कोई वास्ता है नहीं। लोग उसकी चुप्पी और अवसाद को ही उसका धैर्य समझ लेते हैं तो उसका क्या कसूर। अशांति का महासागर ठाठें मारता रहता है सरल की छोटी-सी खोपड़ी में। बिस्तर में रहता है तो तरह-तरह की अच्छी बुरी कल्पनाएं और फंतासियां भी साथ रहती ही हैं।



कैसी-कैसी कल्पनाएं हैं सरल की ! एक ऐसी पोशाक बनवाए जिसमें से उसकी तो एक उंगली तक न दिखे पर वह सबको समूचा देख सके। कोई ऐसी कार मिल जाए उसे कि वह तो अंदर से सबको देखले पर उसकी किसी को झलक तक न मिले।



एक तो पड़ा-पड़ा जासूसी उपन्यास पढा करता है ऊपर से जाने किसने दे दिए हैं उसे ये फोबियाओं के उपहार। कहां से क्यों आ गया यह जानलेवा अपराध-बोघ! भयानक असुरक्षा की भावना। इस तरह लोगों से छुपकर, डरकर, शरमा कर अंधेरे कमरों की ओट में कैसे काटेगा वह अपनी ज़िंदगी !

(जारी)
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बुधवार, 24 जून 2009

व्यंग्य-कक्ष में ‘आदरणीय जीजाजी’

सभ्य समाज में आदर झटकने के जो कुछेक तरीके मुझे जंचे हैं उनमें से एक है किसी का दामाद हो जाना। जिस घर के आप दामाद हो गए, अगर थोड़ी देर के लिए उस घर को हम राष्ट्र मान लें तो समझिए कि उस घर में आपकी हैसियत राष्ट्रपति जितनी हो जाती है। भारत के राष्ट्रपति जैसी नहीं कि जिसके पास ताम-झाम तो होता है पर काम-धाम नहीं होता। आप तो कम से कम अगला दामाद आ जाने तक, अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह होते हैं जिसे कि भरे-पूरे अधिकार भी प्राप्त होते हैं।

आप सिर्फ दामाद ही नहीं होते, आप जीजाजी भी होते हैं। भारत में जीजाजी होना यानि कि हवा के घोड़े पर सवारी गांठना। यानि कि जलवों के हलवों पर जीभ लपोरते रहना। यानि कि भले ही पूरी दुनिया में आपको कोई न पूछे मगर एक घर सदा ऐसा होता है जो लाल कालीन बिछाए आपके स्वागत को सूखता रहता है। वहां घुसते ही आप महान हो जाते हैं। क्रिकेट की भाषा में कहें तो पिद्दी से पिद्दी बल्लेबाज के लिए भी दुनिया में कम से कम एक पिच तो ऐसी होती है जहां खेलना शुरू करते ही उसके जीवन की पारी जम जाती है।

जीजाजी होने की सुविधापूर्ण स्थिति को तो बड़े-बड़े कवियों ने भी कल्पनाओं तक के कद्दू-कस में कस कर खूब लच्छे बनाए भी हैं और बेचे भी हैं। भारतीय सभ्यता संस्कृति के अनुसार नारी की मर्यादा की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर देने वाले कई बुजुर्ग कवियों ने सालियों की सुंदरता, उनके स्वभावों की चपलता, उनके साथ अपने सभी प्रकार के सम्बन्धों की स्वायत्तता, स्वतंत्रता, उनकी विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों में कर्मठता, अपने जीजाओं के प्रति उनकी कर्तव्यनिष्ठा आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए अत्यन्त सुन्दर व सार्थक साहित्य का सृजन किया है।

यानि कि साली न हुई आपकी गली के पिछवाड़े की दीवार हो गई। जिस पर बड़े-बड़े शब्दों में आपने ही लोगों के सामने लिखा है ‘यहां पोस्टर लगाना मना है‘। फिर अकेले में आप ही हैं कि लगाए जा रहे हैं। तिस पर साहित्य में सार्वजनिक रूप से अपने दुष्ट-कर्म का महिमा-मण्डन भी कर रहे हैं। इधर लोग भी आपके लिखने और आपके लगाने पर समान भाव से तालियां बजा रहे हैं।

लगता है कि आपके भीतर के लिखने वाले को भी पता है कि कितना भी लिख लो मगर लगाने वाला लगाने से बाज नहीं आएगा। और अपने व्यवहार के इश्तहार से इस लिखे को मेट कर ही दम लेगा। और इधर लगाने वाला भी जानता है कि यह लिखने वाला फिर-फिर लिखता रहेगा और मैं बार-बार लगाता रहूंगा। यही इस दीवार की नियति है।

वहां पर चार दीवारें एक ख़ास स्थिति में इकट्ठी खड़ी होने के कारण एक घर जैसा बन गया है जहां कि मैं रहता हूं। एक दिन, जब सोचने को और कुछ न बचा तो मैंने सोचा कि एक महिला कर्मचारी रख लूं जो खाना बना दे, कपड़े धोए, बर्तन मांजे व अन्य छोटे-मोटे काम कर दे। पर जब मित्रमल से बात हुई तो कहने लगे कि क्यों दो-चार सौ रूपये महीने खर्चते हो। इससे तो अच्छा है शादी कर लो। पत्नी के पद पर नियुक्त महिला मुफ्त में सारा काम तो करेगी ही साथ में दहेज लाएगी सो अलग। ऊपर से ससुरालियों से रोज़ाना मिलने वाली भेंटे, नकदी, आदर, सम्मान, जलपान वगैरह ... .... ...।

बात मेरी समझ में आई और मैं तैयार हुआ। पत्नी पद की उम्मीदवार से बातचीत चली तो मैंने बताया कि कैसे मित्रमल के सुझाव पर मैं इस नेक ख्याल पर अमल के लिए तैयार हुआ। इतना सुनना था कि वे हत्थे से उखड़ र्गइं। कहने लगी कि आप पत्नी और नौकरानी में कोई फ़र्क नहीं मानते। मेरे भी पसीने छूटने लगे। कि तभी मेरे दिमाग में एक पुराने विचार का नवीनीकरण हुआ और स्थिति संभल गई। मैंने उन्हे समझाया कि मशहूर अंगे्रज विद्वान जॉर्ज बर्नाड शा के विचार भी पत्नियों के बारे में ऐसे ही थे। इतना सुनना था कि उनका हृदय परिवर्तन हो गया और वे बड़े आदर भाव से मुझे निहारने लगीं।

यही वह पल था जब मेरे दिल में यह ख्याल आया कि आदर हथियाने का यह उपाय भी कोई बुरा नहीं कि अपने लूले-लंगड़े विचारों को भी महापुरूषों के उद्धरणों की बैसाखियों के सहारे पार करा दिया जाए।

वैसे इन दोनों के अलावा भी अन्य कई तरकीबों से मैंने आदर बटोरा है। अगर साथ ले जा सका तो इसे साथ ले जाऊंगा नहीं तो वसीयत में अपने आदरणीय संबंधियों, मित्रों को बराबर-बराबर बांट जाऊंगा।

आपको इस लेख में कोई बात अटपटी या आपत्तिजनक न लगे इसके लिए बता दूं कि यह लेख कई बड़े लेखकों
के साहित्य और महापुरूषों की जीवनियों में से कांट-छांट कर बड़ी मेहनत व लगन से लिखा है।

क्या अब भी आप इस लेख को व मुझे आदर नहीं देंगे?

-संजय ग्रोवर

(18-03-1994 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

'मर्दानगी' पर दो कविताएं

1. मर्दानगी
.............................गर्वीले चेहरे पर
अकड़ी हुई मूँछें
बाहों पर उछलती हुई मछलियां
गरज़दार आवाज़



मर्दानगी
रखी है इतिहास के शोकेस में
चाबी भरने पर आवाज़ भी करती है
जब जम जाती है इस पर धूल
तो क्रेज़ी स्त्रीत्व अपने कोमल हाथों से
इसे झाड़-बुहार कर
फिर रख देता है शोकेस में



जब पुरानी पड़ जाती है
याकि मर जाती है
तो पुरानी की जगह नई सजा दी जाती है



मर्दानगी
खुश है अपने सजने पर



साल दर साल
पीढ़ी दर पीढ़ी
शोकेस में सजती आ रही है
मर्दानगी

(तकरीबन 14-15 साल पहले ‘कतार’ नामक लघुपत्रिका में प्रकाशित)
.............................

2 . यहाँ भी मैं
........................अब स्त्रियां पूछ रही हैं
पुरुष एक और
स्त्री को चाह सकता है
तो स्त्री
एक और पुरुष मित्र को
क्यों नहीं चाह सकती
......................................






मैंने भरोसा दिलाया
बिलकुल चाह सकती है
बशर्ते कि
वह पुरुष मित्र
मैं होऊं।
..........................




(रचना तिथि: 23-02-२००९)
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-संजय ग्रोवर

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

ये ‘‘डीसैक्सुअलाइजेशन’’ क्या बला है ?


सुशांत जी, आपने पेड़ो के नीचे खड़े, दीवार पर चढ़े, खेत में खड़े, कई बार तो आधी रात के वक्त चैराहे पर खड़े ‘‘मर्दों’’ को पेशाब करते देखा है ? आपको क्या लगता है ये सब ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं ? आपने आदिवासियों को देखा है ? उनकी स्त्रियों की वेश-भूषा देखी है ? क्या वे दिन-रात यौन-क्रिया करते हैं और इसलिए ‘‘डीसैक्सुअलाइज़्ड’’ हैं ? मुझे याद आता है 20-30 साल पुराना माहौल जब कोई स्त्री किसी महफिल में स्लीवलैस पहनकर आ जाती थी तो पूरे वक्त न तो वो खुद सहज रह पाती थीं न पूरी महफिल। पूरे वक्त स्त्री बांहो को तरह-तरह से ढंकने की कोशिश करती रहती तो मर्द नज़रें चुराते। शोहदे घूर-घूर कर देखते। यानि सहज-सामान्य कोई न रह पाता। क्या आज भी ऐसा ही है ? यह बदलाव क्या ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ की वजह से आया है !? टीवी के रिएलिटी शोज़ में मध्यवर्गीय घरों की लड़कियां आज उन्मुक्त वेश-भूषा में सहज भाव से विचरती हैं। उनके साथ उनके माँ-बाप-भाई-बहिन भी होते हैं और वे भी उतने ही सहज होते हैं। क्या वे सब दिन-रात सैक्स कर-करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं इसलिए इतने सहज-सामान्य हो गए हैं ?
इसके अलावा भी अपने कुछ पुराने लेखों के टुकड़े यहाँ पेश करना चाहूंगा जिससे मुझे अपनी बात कहने में आसानी हो जाएगी और व्यर्थ के दोहराव और वक्तखर्ची से भी बच जाऊंगा:-
अश्लीलता को लेकर एक और मजेदार तथ्य यह है कि बढ़ते-बदलते समय के साथ-साथ इसको नापने-देखने के मापदंड भी बदलते जाते हैं। 1970 में जो फिल्म या दृश्य हमें अजीब लगते थे, अब नहीं लगते। आज बाबी पर उतना विवाद नहीं हो सकता, जितना ‘चोली के पीछे’ पर होता है। आज साइकिल, स्कूटर, कार चलाती लड़कियां उतनी अजीब नहीं लगतीं, जितनी पांच-दस साल पहले लगती थीं। मिनी स्कर्ट के आ जाने के बाद साधारण स्कर्ट पर एतराज कम हो जाते हैं। मध्यवर्गीय घरों में नौकरीशुदा स्त्रियों को लेकर तनाव व झगडे़ जितना पहले दिखते थे, उतना अब नहीं दिखते।
(6 दिसम्बर 1996 को अमरउजाला, रुपायन में प्रकाशित)
अब आप मेरे आलेख के उस अंश को दोबारा-तिबारा पढ़ लें जिसमें से न जाने कौन-सा गुणा-भाग करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ शब्द निचोड़ लिया गया है:-
‘‘स़्त्री को अपनी कई समस्याओं से जूझने-निपटने के लिए देह से मुक्त तो अब होना ही होगा और इसके लिए उसकी अनावृत देह को भी पुरूष अनावृत देह की तरह सामान्य जन की आदत में आ जाने वाली अनुत्तेजक अवस्था के स्तर पर पहुंचाना होगा ।‘‘
अगर अभी भी आपको समझ में नहीं आता तो मुझे कुछ बातें दोहरानी तो पड़ेंगी ही। वैसे भी अगर हम अतार्किक बातों को हज़ार-हज़ार साल दोहरा सकते हैं तो तार्किक को भी दो-चार बार दोहरा लेंगे तो ऐसी कौन सी आफत आ जाएगी ? पहले वे बातें मैंने टिप्पणी में कही थीं, अब संशोधन के साथ मुख्य पोस्ट में लगा रहा हूँ। मैं हर मसले पर चर्चा करुंगा। थोड़ा धीरज तो रखें। मगर आपको तो जय-पराजय के नतीजे की जल्दी मची है।
और आप मुद्वों से हटकर न जाने कौन-कौन से राग अलाप रहे हैं ? कि मैं अपने-आपसे नाराज़ हूँ। कि मुझे प्रशंसा सुनने की आदत नहीं है ! क्या आपको लगता है कि इन सब बातों का इंस बहस से कोई मतलब है ?
बाते अभी बहुत सी बाकी हैं ।
(जारी)

-संजय ग्रोवर

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

पंाच पोंगे-कट्टर-मुल्ले-पंथी बनाएंगे सारे समाज का खाने-पीने-पहनने-नाचने का मैन्यू !?




सुशांत जी आप तो नाराज़ हो गए। यह क्या बात हुई कि जब आप अपने लेख का अंत ‘‘‘वहीं जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना कर रहा है।’’’ जैसे वाक्यों से करते हैं तो वो आपको बड़ी धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक-सभ्य भाषा लगती है। ऐसा क्यों, भाई ?


ऊपर से आप मुझे नयी व्यवस्था का मिशन-स्टेटमेंट बनाने को कह रहे हैं जैसे कि पिछली व्यवस्था का आपने तैयार किया था ! सारे यथास्थ्तििवादियों की तान यहीं आकर टूटती है। कल को कोई मजदूर या एन.जी. किसी टाटा-बिरला के यहाँ चल रहे शोषण का विरोध करेगा तो आप तो उससे यह कहेंगे कि पहले तुम खुद टाटा-बिरला जैसा कारखाना लगाओ या उसका कोई नक्शा बनाकर दो तब विरोध करना। अपने से अलग विचारों के लोगों को आप किस तरह से जंगल में जा बैठने का आदेश जारी करते हैं जैसे सारा समाज आपका जरखरीद गुलाम हो सारे लोग आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हों और सारे देश का पट्टा आपके नाम लिखा हो। सब वही खाएं जो आप बताएं, वही पहनें जो आप कहें, वही बोलें जो आप उनके मुंह में डाल दें। वाह, कैसी हत्यारी भाषा, कितनी अहंकारी सोच (?), कितनी तानाशाह प्रवृत्ति मगर फिर भी धार्मिक ! फिर भी आध्यात्मिक ! फिर भी सामाजिक ! फिर भी सभ्य।आप कहते हैं कि मैं कोई व्यवस्था सुझाऊँ। मैं क्यों सुझाऊं भाई !?


हां, मुझे पता है कि एक दवा मुझे अत्यधिक नुकसान पहुँचा रही है। लेकिन क्या मै उसे सिर्फ इसलिए खाता जाऊं और तारीफ करता जाऊं कि बाज़ार में उसकी वैकल्पिक दवा उपलब्ध नहीं है और मैं खुद वह दवा बनाने में सक्षम नहीं हूँ ! मैं उस दवा के ज़हरीले असरात की बाबत आवाज़ उठाऊंगा तभी तो कुछ लोग नयी दवा बनाने के बारे में सोचेगे। तभी तो वे सब लोग भी आवाज़ उठाएंगे जो इंस दवा के ज़हरीले नतीजे तो भुगतते रहे हैं मगर सिर्फ इसलिए चुप हैं कि उन्हें लगता है कि वे अकेले हैं और उपहास के पात्र बन जाएंगे। स्त्री-विमर्श के मामले में ही देखिए, पहले विद्वान लोग कहते-फिरते थे कि ऐसी दो-चार ही सिरफिरी औरतें हैं जो धीरे-धीरे अपने-आप ‘‘ठीक’’ हो जाएंगी, नही ंतो हम कर देंगे। अब देखिए तो कहां-कहां से कितनी-कितनी आवाज़े उठ रही हैं। आरक्षण के मसले पर आप ही जैसे विद्वानों ने पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह को पागल तक कह डाला था। मगर आज सारी पार्टियां बढ़-चढ़कर आरक्षण दे रही हैं। इण्टरनेट के आगमन को लेकर आप ही जैसे लोगों ने तमाम हाऊ-बिलाऊ मचाई। मगर सबसे ज़्यादा फायदा भी आप ही जैसे लोग उठा रहे हैं। भले ही इंस नितांत वैज्ञानिक माध्यम का दुरुपयोग अपनी अवैज्ञानिक सोच को फैलाने के लिए कर रहे हों। इसलिए किसी भी नयी चीज़ का विरोध करने से पहले यह तो तय कर लीजिए कि अंत तक आप अपने स्टैण्ड पर कायम भी रह पाएंगे या नहीं !? और इंस ग़लतफहमी में तो बिलकुल मत रहिए कि सभी आपकी तरह सोचते (?) हैं और भेड़ों की तरह आप उन्हें जहां मर्ज़ी हांक ले जाएंगे।


कोई भी व्यवस्था तो एक दिन में बनती है और ही कोई एक आदमी उसे बनाता है। मगर आप मुझसे ऐसी ही उम्मीद रखते हैं। आप क्या समझते हैं कि मैं भी उन दस-पाँच पोंगापंथियों और कठमुल्लों की तरह अहंकारी और मूर्ख हूँ जो खुदको इतना महान विद्वान समझते हैं कि वही सारी दुनिया के लिए खाने-पीने-नाचने-पहनने का मैन्यू तय कर सकते हैं ! मेरी रुचि ऐसी किसी गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था में है ही नहीं कि सब मेरी तरह से जीएं। अगर मेरी टांगें पतली हैं और निक्कर मुझे सूट नहीं करता तो मै यह विधान बनवाने की कोशिश करुं कि सभी मेरी तरह फुलपैंट पहनेंगे। अरे जिसको जो रुचता है वो करे। आप कौन हैं तय करने वाले। दरअसल आपको किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने की आदत ही नहीं जिसमें सबके लिए जगह हो जब तक कि वह किसी तीसरे के जीवन में नाजायज घुसपैठ कर रहे हों। आपको सिर्फ वही व्यवस्था समझ में आती है जो या तो आपके अनुकूल पड़ती हो या मेरे ! आपके हिसाब से तो फिर सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-दमन, कन्या-भ्रूण-हत्या भी चलते रहने चाहिए थे क्योंकि फुलप्रूफ वैकल्पिक व्यवस्था तो मेरे पास थी आपके ! अगर सती-प्रथा हटानी है तो वैसी ही कोई और प्रथा होनी चाहिए हमारे पास। नही तो, आपकी सोच के हिसाब से ही, सती-प्रथा का विरोध करने का हमारा कोई हक ही नहीं बनता।


कई बातें तो आप ऐसी मुझे समझा रहे हैं जो खुद आपको समझनी चाहिएं। जैसे कि फुल वाॅल्यूम पर रेडियो चलाने का उदाहरण। अपने एक पुराने व्यंग्य की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना शायद बेहतर भी होगा और कारगर भी:- ‘‘क्यों! भावनाएं क्या सिर्फ आस्तिकों की होती हैं! हमारी नहीं!? हम संख्या में कम हैं इसलिए!? दिन-रात जागरण-कीर्तन के लाउड-स्पीकर क्या हमसे पूछकर हमारे कानों पर फोड़े जाते हैं? पार्कों और सड़कों पर कथित धार्मिक मजमे क्या हमसे पूछ कर लगाए जाते हैं? आए दिन कथित धार्मिक प्रवचनों, सीरियलों, फिल्मों और गानों में हमें गालियां दी जाती हैं जिनके पीछे कोई ठोस तर्क, तथ्य या आधार नहीं होता। हमनें तो कभी नहीं किए धरने, तोड़-फोड़, हत्याएं या प्रदर्शन!! हमारी भावनाएं नहीं हैं क्या? हमें ठेस नहीं पहुँचती क्या? पर शायद हम बौद्धिक और मानसिक रुप से उनसे कहीं ज्यादा परिपक्व हैं इसीलिए प्रतिक्रिया में बेहूदी हरकतें नहीं करते।’’


बाते अभी बहुत-सी बाक़ी हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर


देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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