~~~~कविता~~~~
औरतें खुश हो जाएं
आखिर हमने ढूंढ ही निकाला
पवित्र क़िताब की पृष्ठ-संख्या इतने के
उतनेंवें श्लोक में लिखा है
औरतों को दिए जाने चाहिए अधिकार और न्याय
मगर ज़रा ठहरो
यह तो हमने देखा ही नहीं कि
औरतों को अपनी मनपसंद चीज़ें मिलने पर
खुश होने के लिए
पवित्र क़िताब में लिखा है कि नहीं
बहरहाल
जिन औरतों को चाहिएं अधिकार और न्याय
वे अपने जीवन और चिंतन
अपने समय और समझ
अपने संसार और सपनों
अपने अनुभवों और अरमानों
को आले में रखकर
चली आएं
पवित्र क़िताब की पृष्ठ-संख्या इतने की
पंक्ति-संख्या उतनी में
और ज़रा लाइन लगा लें
ठीक से
व्यवस्था बनाएं रखें
जो शरमाती हैं, घबराती हैं
निकल नहीं सकती खुद घर से
वो अपने भाईयों, बापों, पतियों
या पड़ोसी पुरुषों को भेज दें
हम आज सभी को देंगे अधिकार और न्याय
(जो नहीं लेंगी हमसे न्याय-उनके किसी अंजाम के हम नहीं होंगे जिम्मेवार-या हम ही होंगे जिम्मेवार)
हम तो हैं ही दाता
अपने बराबर ही देंगे तुम्हे भी
शुकर करो और प्रार्थना करो कि
हमारी दान देने की योग्यता और विनम्रता
ऐसे ही बनी रहे
और तुम्हे कभी कोई परेशानी न आए
माँगने और पाने में
(तुम माँगती रहो हम देते रहें)
हम क्यों करेंगे भेद
हमारी ही तो हैं औरतें
हमारी ही हैं क़िताबें भी
मानाकि
दीमकों की खायी
धूल में अटी
जालों में लिपटी क़िताबों में
पता लगाना मुश्किल है कि
दीमकें, धूल और जाले
भीतर से बाहर आए हैं
या बाहर से अंदर गए हैं
मगर फिर भी बहुत जगह है इनके अंदर
और औरतों
तुम तो बिलकुल निश्चिंत रहो
तुम्हारे लिए तो कुछ शब्द ही काफी हैं
एक श्लोक, एक आयत, एक वाक्य.............
भारी है
तुम्हारे सारे जीवन,
सारे अस्तित्व,
सारे व्यक्तित्व,
सारे विचारों पर
फिर हम भी तो हैं तुम्हारे साथ
सही-सही तौलकर न्याय करेंगे
तराजू तो हमारे ही हाथ है
एक पलड़े में हैं
पवित्र क़िताब के दो शब्द
दूसरे में दुनिया की सारी औरतें
आओ और तुल जाओ
जैसे-जैसे मिलते जाएंगे क़िताबों में
वैसे-वैसे हम देते जाएंगे
तुम्हे तुम्हारे अधिकार
पहले नहीं मिले थे तो नहीं दिए थे
अब मिल गए हैं तो दे दिए हैं
मगर ज़रा ध्यान रखना
क़िताब से बाहर मत निकलना
बल्कि क़िताब में जो-जो पृष्ठ हमने बताए हैं
उनसे भी नहीं
क़िताब में रख दिया गया है वह सभी कुछ
जो तुम्हारे लिए उचित समझा गया है
इसके अलावा
आगे भी जो कुछ उचित समझा जाएगा
पहुँचा दिया जाएगा क़िताब ही में
क़िताब में साँस लेना
क़िताब में से आसमान देखना
क़िताब में स्वतंत्रता से रहना
(क़िताब में लिखा है कि तुम्हारे लिए कितने फुट कितने इंच स्वतंत्रता ठीक रहेगी)
फिर एक दिन
क़िताब में ही मोक्ष को प्राप्त हो जाना
तुम्हारी सहूलियत के लिए हम
प्राचीन आसमानी ग्रंथकारों के
आधुनिक ज़मीनी अवतारों से
सिफारिश भी कर देंगे कि
क़िताब को कोई अच्छा सा नाम भी दे दें
जैसेकि जीवन
अब तो खुश हो ना औरतों !
हमारी क़िताबों के हवाले से
हमारी औरतों से
हमें बस यही कहना है
---संजय ग्रोवर
~हंस (जुलाई 2000) में प्रकाशित~
औरतें खुश हो जाएं
आखिर हमने ढूंढ ही निकाला
पवित्र क़िताब की पृष्ठ-संख्या इतने के
उतनेंवें श्लोक में लिखा है
औरतों को दिए जाने चाहिए अधिकार और न्याय
मगर ज़रा ठहरो
यह तो हमने देखा ही नहीं कि
औरतों को अपनी मनपसंद चीज़ें मिलने पर
खुश होने के लिए
पवित्र क़िताब में लिखा है कि नहीं
बहरहाल
जिन औरतों को चाहिएं अधिकार और न्याय
वे अपने जीवन और चिंतन
अपने समय और समझ
अपने संसार और सपनों
अपने अनुभवों और अरमानों
को आले में रखकर
चली आएं
पवित्र क़िताब की पृष्ठ-संख्या इतने की
पंक्ति-संख्या उतनी में
और ज़रा लाइन लगा लें
ठीक से
व्यवस्था बनाएं रखें
जो शरमाती हैं, घबराती हैं
निकल नहीं सकती खुद घर से
वो अपने भाईयों, बापों, पतियों
या पड़ोसी पुरुषों को भेज दें
हम आज सभी को देंगे अधिकार और न्याय
(जो नहीं लेंगी हमसे न्याय-उनके किसी अंजाम के हम नहीं होंगे जिम्मेवार-या हम ही होंगे जिम्मेवार)
हम तो हैं ही दाता
अपने बराबर ही देंगे तुम्हे भी
शुकर करो और प्रार्थना करो कि
हमारी दान देने की योग्यता और विनम्रता
ऐसे ही बनी रहे
और तुम्हे कभी कोई परेशानी न आए
माँगने और पाने में
(तुम माँगती रहो हम देते रहें)
हम क्यों करेंगे भेद
हमारी ही तो हैं औरतें
हमारी ही हैं क़िताबें भी
मानाकि
दीमकों की खायी
धूल में अटी
जालों में लिपटी क़िताबों में
पता लगाना मुश्किल है कि
दीमकें, धूल और जाले
भीतर से बाहर आए हैं
या बाहर से अंदर गए हैं
मगर फिर भी बहुत जगह है इनके अंदर
और औरतों
तुम तो बिलकुल निश्चिंत रहो
तुम्हारे लिए तो कुछ शब्द ही काफी हैं
एक श्लोक, एक आयत, एक वाक्य.............
भारी है
तुम्हारे सारे जीवन,
सारे अस्तित्व,
सारे व्यक्तित्व,
सारे विचारों पर
फिर हम भी तो हैं तुम्हारे साथ
सही-सही तौलकर न्याय करेंगे
तराजू तो हमारे ही हाथ है
एक पलड़े में हैं
पवित्र क़िताब के दो शब्द
दूसरे में दुनिया की सारी औरतें
आओ और तुल जाओ
जैसे-जैसे मिलते जाएंगे क़िताबों में
वैसे-वैसे हम देते जाएंगे
तुम्हे तुम्हारे अधिकार
पहले नहीं मिले थे तो नहीं दिए थे
अब मिल गए हैं तो दे दिए हैं
मगर ज़रा ध्यान रखना
क़िताब से बाहर मत निकलना
बल्कि क़िताब में जो-जो पृष्ठ हमने बताए हैं
उनसे भी नहीं
क़िताब में रख दिया गया है वह सभी कुछ
जो तुम्हारे लिए उचित समझा गया है
इसके अलावा
आगे भी जो कुछ उचित समझा जाएगा
पहुँचा दिया जाएगा क़िताब ही में
क़िताब में साँस लेना
क़िताब में से आसमान देखना
क़िताब में स्वतंत्रता से रहना
(क़िताब में लिखा है कि तुम्हारे लिए कितने फुट कितने इंच स्वतंत्रता ठीक रहेगी)
फिर एक दिन
क़िताब में ही मोक्ष को प्राप्त हो जाना
तुम्हारी सहूलियत के लिए हम
प्राचीन आसमानी ग्रंथकारों के
आधुनिक ज़मीनी अवतारों से
सिफारिश भी कर देंगे कि
क़िताब को कोई अच्छा सा नाम भी दे दें
जैसेकि जीवन
अब तो खुश हो ना औरतों !
हमारी क़िताबों के हवाले से
हमारी औरतों से
हमें बस यही कहना है
---संजय ग्रोवर
~हंस (जुलाई 2000) में प्रकाशित~
