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बुधवार, 7 दिसंबर 2022

खेल

मेला मशहूर था.

कई दुकाने लगी होती थी. कुछ दुकानों पर प्लास्टिक के टुकड़ों से बना एक चौखटा जैसा बिकता था. ये टुकड़े चौखटे के भीतर ही सरकते थे. इन पर एक नक्शा सा बना होता था. दंकानदार उस बिगड़े हुए नक्शे को दिखाकर बताता था कि इन टुकड़ों को सरकाकर नक्शा वापस बिठाना है. नक्शा सही हो गया समझो आप जीत गए.

क्या उस समय भी कोई होता था जो समझता हो कि उसने नक्शा जोड़ लिया मतलब समाज को जोड़ लिया !

ताली बजानेवाले तब भी होते थे.

-संजय ग्रोवर






रविवार, 13 नवंबर 2022

लैट द होल वर्ल्ड नो अर्थात् दुनिया को पता तो चले !

व्यंग्य 



 


इस देश में योग्यता, प्रतिभा, वीरता और मौलिकता की ठीक से कद्र कभी भी नहीं हुई। ख़ामख्वाह सारी तवज्जो नेताओं को दे दी जाती है। हैरानी है कि भ्रष्टाचार के गुणगान के मामले में भी यही हो रहा है और कोई बोलनेवाला नहीं है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया जिसे शायद चौथा खंबा कहते हैं, वह भी सिर्फ़ नेताओं के भ्रष्टाचार की आरती उतारने में लगा है। यूं तो ठीक भी है, खंबा नाम कुछ सोचकर ही दिया गया होगा। सारी दुनिया इधर से उधर हो जाए, खंबा कहां अपनी जगह से हिलता है ! ज़्यादा हुआ तो टूटकर अपने ही पैरों में घुस जाता है। यह जानते हुए भी कि खंबे हिलने के लिए नहीं होते, हम उन्हें हिलाने में लगे रहते हैं। और इन दिनों तो पक्षपात की हद हो रही है। जनता के टेलेंट पर पर्दा डाला जा रहा है। मैं पूछता हूं कि क्या भ्रष्टाचार की सारी योग्यता 100-50 नेताओं तक जाकर ख़त्म हो गयी है ?


अरे, कभी हमारे बीच आओं, एक-एक घर को देखो आकर, एक-एक नागरिक से मिलो, असलियत देखो, दिखाओ! ख़ामख्वाह नेता को सिर पर चढ़ा रखा है। क्षोभ होता है। जनता के यहां चप्पे-चप्पे पर वीरता की निशानियां भरी पड़ीं हैं। मौलिकता ठाठें मार रही है। क्या किसी राणा प्रताप की इतनी हिम्मत थी कि नक्शा कुछ हो और घर कुछ और बना दे !? घास की रोटियां खाने से कहीं संस्कृतियां बनतीं हैं? और उन गांधी जी को देखो! चल दिए आज़ादी की लड़ाई लड़ने ! भाई साहब! नीचे से ऊपर तक पूरा नेटवर्क बिठाना पड़ता है माफ़िया का, एक-एक विभाग में सैटिंग रखनी पड़ती है, पड़ोसियों को डराना-धमकाना और ‘समझाना’ पड़ता है तब जाकर एक नाजायज़ टॉयलेट या छोटा-सा कमरा बन पाता है। मज़ाक समझ रक्खा है क्या !? पड़ोसी ढीठ हो, असामाजिक हो, अधार्मिक हो, पिटकर भी न मानता हो तो मुश्क़िल हो जाती है। रात-रात भर जागकर काम करना पड़ता है।  


अरे तुम आओ तो सही। मैं तो कहता हूं विदेशी पर्यटको को भी यहीं भेजो। कहां बेचारों को आगरा के ताजमहल और हैदराबाद के मीनारों पर भटका रहे हो? हमारी असली संस्कृति तो यहां घर-घर में बिखरी पड़ी है। ये बढ़ी हुई बालकनियां, ये छज्जे, ये गटर के ऊपर बनाए कमरे हमारी सांस्कृतिक धरोहर नहीं हैं तो क्या हैं ? ये जो अपने चरित्र के परमानेंट ठोस सबूत हमने अपने हाथों से बनाए हैं, इनका क्या कोई मतलब नहीं है? विदेशियों को ठीक से पता तो चले कि राष्ट्रवाद की, धार्मिकता की, सामाजिकता की, इंसानियत की हमारी असली अवधारणाएं आखि़र हैं क्या ? हमारा घर-घर, दुकान-दुकान टूरिस्ट प्लेस है। इनपर टिकट लगाकर कमाई भी हो सकती है। आधा पैसा सरकार ले आधा घरवालों को दिया जाए। वो इसलिए कि मैंने अकसर देखा है कि इन सजे-संवरे-पत्थरथुपे फ्लैटों में अकसर ग़रीब लोग रहते हैं। इन बेचारों की कभी पूर्ति नहीं होती। छज्जा निकल जाए तो इन्हें बालकनी चाहिए, बालकनी बन गयी तो इन्हें लगता है यार, यहां तो कमरा होना चाहिए था। कमरा हो जाए तो याद आता है कि शर्माजी ने तो अपने में 3 आगे और 2 पीछे बना रखे हैं, उनसे आयडिया लेकर आता हूं। कल बच्चे की शादी भी होनी है, जगह कम न हो जाए। बच्चे इनके हैं, भुगतेगा पड़ोसी। टूरिस्टों को दिखाना चाहिए कि देखो ऐसा होता है ज़िम्मेदार और सामाजिक आदमी। कुछ सीखो इन जगदगुरुओं से। ईडियटस्!


देखो इनका कॉन्फ़िडेंस लेवल! क्या बच्चा, क्या बूढ़ा, क्या डॉक्टर, क्या वक़ील, क्या स्त्री, क्या पुरुष ! एक से एक हैं। इन्हें कहीं बिठा दो, कहीं भेज दो, हर जगह भ्रष्टाचार करके दिखा देंगे। मंदिर में रखवा दो, दुकान पे बिठा दो, ऑफ़िस में लिटा दो, प्राइवेट सेक्टर में भेज दो, सरकारी में ऐडजस्ट करा दो....कहीं से भी बिना भ्रष्टाचार किए लौट आएं तो आप मेरा नाम बदलकर ईमानदार रख देना। लानत भेजना मुझ पर अगर पता चले कि कि कोई विदेश में जाकर अपनी ‘संस्कृति के चिन्ह’ छोडे़ बिना लौट आया। फ़िर क्यों मीडिया नेताओं की मेरिट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है ? क्या उन्होंने मीडिया को कुछ डोनेशन वगैरह दे दिया है ? अरे हमें बताओ तो सही, हम और बढ़िया इंतज़ाम करके देंगे। टीवी पर दिखने के लिए हम मुंह पोतकर उछलने को भी तैयार रहते हैं तो फिर क्यों हमारी योग्यता को दबाया जा रहा है ?


मुझे लगता है कि सरकार और मीडिया इस मामले में कुछ नहीं करनेवाले। क्या सरकार को इस बात का अंदाज़ा नहीं कि पड़ोसी के मीटर में तार डालना और हर बार इस तरह मीटर बदल-बदलकर डालना कि पड़ोसी को सिर्फ़ इतना ही लगे कि ‘हां, यार कभी-कभी आ जाते हैं सौ-दो सौ रु. ज़्यादा, कोई बत्ती जलती छूट गयी होगी किसी दिन’ कुछ कम बड़ा हुनर है !?


मीडिया अगर साथ दे तो बहुत कुछ हो सकता है। रियल रिएलिटी शो बनाए जा सकते हैं जैसे-‘भ्रष्टाचार का आंचल’, बेईमानी की छांव में’, ‘ईमानदारी का नरक’, ‘खा-पी टीवी पर पहलीबार: असली जनता का असली भ्रष्टाचार’, ‘असली भ्रष्टाचारी कौन ?’, इनमें टीमें बनायी जा सकती हैं। टीमों को काम दिए जा सकते हैं कि जो सबसे पहले नाजायज़ कमरा बना कर दिखाएगा, विजेता होगा। डांसिंग-फ्लोरस् बनाकर उनके नाम रखे जा सकते हैं-'क़ानून की छाती',' इंसानियत का मलबा' आदि। सरप्राइज़ तत्व डाले जा सकते हैं जैसे कि ईमानदार या मजबूर पड़ोसी बेईमान कमरा निर्माताओं को ख़ुद आमंत्रित कर रहा है कि आईए सर, हे वीर पुरुष, हे महासामाजिक प्राणी, हे धर्म-धुरंधर, आओ, पचास-पचास के गुट बनाकर मुझे पीटो। मैं आपसे पिटकर पवित्र होना चाहता हूं। आप नहीं आएंगे तो मैं आपको निमंत्रण-पत्र भेजकर बुलाऊंगा। आखिर देश की असली सभ्यता-संस्कृति-परंपरा को टूटने से बचाने का सवाल है। देखो, कितने विदेशी दर्शक तुम्हारी योग्यता, वीरता और प्रतिभा का प्रदर्शन देखने दूर-दूर से आए हैं। देखने लायक दृश्य होगा कि ‘क़ानून की छाती’ पर चढ़कर पचास-पचास लोग एक आदमी को पीट रहे हैं, ‘इंसानियत के मलबे’ पर अपने-अपने षड्यंत्रों के साथ नाच रहे हैं। ‘सलाम ज़िंदगी’, ‘हलो ज़िंदगी’, ‘जीना इसीका नाम है’ जैसे कार्यक्रमों से प्रेरणा लेकर कुछ और दृश्य जोड़े जा सकते हैं। जैसे पीछे परदे पर पीटनेवाले जन-भ्रष्टाचारियों के संबंधियों-दोस्तों के साक्षात्कार चल रहे हों। लीजिए, एक बहिन कह रही है,‘भैया तो शुरु से ही बड़े स्मार्ट थे। बिना टिकट ही गाड़ी में भी घूम आते थे और फ़िल्म भी देख आते थे। और बचे पैसों के समोसे लाकर आधे मुझे खिला देते थे। हमारा नेचर बिलकुल एक जैसा है, इसलिए शुरु से ही बहुत पटती थी।’ और यह सुनकर इकले को पीटते-पीटते भैया की आंखें भर आतीं हैं। पीटना रोककर वह इकले की कमीज़ फ़ाड़ते हैं और अपने आंसू पोंछने लगते हैं। उधर परदे पर अंग्रेजी में सबटायटल्स भी चल रहे हैं ताकि विदेशी दर्शक हमारी सभ्यता-संस्कृति को क़रीब से अर्थात् ज़मीनी यानि ग्रासरुट लेवल पर समझ सकें और भ्रष्टाचार के संदर्भ में भारतीय राजनेताओं से उनका मोहभंग हो सके।  बड़े भ्रष्टाचारी बने फ़िरते हैं ससुरे। क्या औक़ात है इनकी भारत की जनता के सामने !?


 


अव्वल तो कोई पूछता नहीं मगर यह रिएलिटी शो है इसलिए एक आदमी आ गया है पूछने, ‘भाई साहब, आप सब इस आदमी को क्यों पीट रहे हैं !?


‘बड़ा ऐंटी-सोशल आदमी है जी, किसीसे मिल-जुलके नहीं चलता।’


‘अच्छा जी ! हुआ क्या ?’


एक छोटी-सी दुकान बना रहा हूं ज़रा-सी ज़मीन ऐनक्रोच करके, साला बनाने नहीं दे रहा, कहता है मेरे घर का रास्ता बंद होता है! हम कह रहे हैं तू भी बनाले कुछ, हम सहयोग कर देंगे पर मानता नहीं, साले ने अपने अलग ही क़ानून बना रक्खे हैं !’


‘बड़ा ग़लत आदमी है ! जरा मैं भी हाथ फरैरे कल्लूं।’


पीछे गाना बज रहा है,‘सारे बजाज और सारे दलाल, चाहते हैं अच्छा लुकपाल, जिन्नलुकपाल, जिन्नलुकपाल, चहिए हमको जिन्नलुकपाल....’


ठीक भी है, कम-अज़-कम जिन्न का ‘लुक’ तो ऐसा होना ही चाहिए जिसे ‘पाला’ जा सके!


और भारत में कैसी हैरत ! जो लोग अपने बीच क़ानून का पालन करनेवालों को बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें नेताओं के खि़लाफ़ एक कड़ा क़ानून चाहिए। 


 (जारी)


--संजय ग्रोवर


13-11-2011

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

नहीं दिखाएंगे बनाम हम देखेंगे




ऐसे मौक़े पर किसी एक पक्ष के बारे में रचना लिख दो, अकसर मशहूर हो जाती है।
किसीने लिख दिया कि हम पेपर नहीं दिखाएंगे।
बिलकुल ठीक है, नागरिकता वगैरह के पेपर की मांग से ग़रीबों और दूसरे कई लोगों को बहुत मुश्क़िल होगी। वैसे भी, क्या गारंटी है जो यहां का निकलेगा वो अच्छा भी निकलेगा! 
क्या अभी तक आपने नहीं देखा कि यहां लोग क्या बोलते हैं और क्या निकलते हैं ?
पेपर नहीं दिखाएंगे। बिलकुल ठीक है।
मेरे ग्रुप में किसी ने यह कविता लगा दी, अच्छी लगी। इसलिए कि भाषा बहुत आसान है। सब समझ में आता है।
हम पेपर नहीं दिखाएंगे।
लेकिन देखोगे तो सही! कि देखोगे भी नहीं?
क़ागज़ देखने के मामले में, लगता है भारत के लोग, लगता है, अभी पुराने ज़माने में ही रह रहे हैं।
बहुत-से लोग कहते हैं कि हम ईबुक नहीं लेंगे, हमें तो क़ागज़ की क़िताब ही चाहिए। 
उनको सजाया जा सकता है। फिर लेखक चाहे फ़ोटो-कॉपी मशीन जैसा क्यों न हो, लोग पीछे सजी नुमाइश से प्रभावित होते हैं।
उनमें से ख़ुशबू आती है (हो सकता है कोई परफ्यूम वगैरह लगा रहता हो)।
और उनको रखने को कई अलमारियां और रैक वगैैरह चाहिए।
और बड़ी बात, उनको तकिये के नीचे दबाया जा सकता है। भारत में ‘तकिया-तले’ साहित्य का महत्व कौन नहीं जानता। यहां तो अभी तक संस्कृति भी वही चलाए रखना चाहते हैं कई लोग।
बाद में उन्हीं में से बदबू भी आती है।
क्योंकि उन्हीं में कीड़ा लग सकता है।
उनकी रद्दी बेची जा सकती है, ईबुक का क्या बेचोगे?
हांलाकि विचार उसमें बिलकुल वही होते हैं जो ईबुक में होते हैं।
पर इसको समझने के लिए भी तो कुछ विचार चाहिएं।
फिर भारत में इतनी स्वतंत्रता आ गई तो ‘भारतीय’ टाइप के विद्वानों और प्रकाशकों का क्या होगा ?
और कौन-से क़ागज़ नहीं देखोगे ?
क्या इंटरव्यू के समय भी क़ागज़ नहीं देखोगे-दिखाओगे?
क्या फ़िल्म देखने जाओगे तो भी क़ागज़ नहीं दिखाओगे?
क्या गाड़ी का लाइसेंस भी नहीं दिखाओगे ?
चूंकि मैं भारत का चरित्र कई साल से देख रहा हूं इसलिए थोड़ा शक़ होता है।
क्या पेपर मतलब एग्ज़ाम भी नहीं दोगे?
क्या असंवैधानिक अमीर कमरों के क़ागज़ भी नहीं दिखाओगे?
ऐसा मत करना। बड़ी अव्यवस्था फैल जाएगी।
फैली ही हुई है।
इधर एक ऐतिहासिक कविता हुई-कि ‘हम नहीं दिखाएंगे’।
उधर एक ऐतिहासिक नज़्म हो चुकी-‘हम देखेंगे’।
‘हम नहीं दिखाएंगे’
‘हम देखेंगे’
‘हम नहीं दिखाएंगे’
‘हम देखेंगे’
ऐसे भी गाओ, एक इतिहास और बनेगा।

-संजय ग्रोवर




बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

महापुरुषों के दिवस

वे जो स्कूल-कॉलेज में पढ़ाते भी हैं और स्टेशनरी भी चुराते हैं, जो बाढ़ और अकाल के नाम पर दफ़्तर में आई राशि ख़ुद खा जाते हैं, जो टैक्स नहीं देते, जो भरपूर ब्लैक-मनी होते हुए भी घर में हवा-पानी के लिए छोड़ी गई जगह में कमरे बना लेते हैं फिर शहर को कंक्रीट का जंगल भी बताकर कविताएं लिखते हैं, जो जंतर-मंतर और रामलीला ग्राउंड में आंदोलन करते हैं पर भ्रष्टाचार का मतलब तक नहीं समझते, जो पुरस्कार लेने के लिए बड़े-बड़े आदमियों की संस्तुतियां कराते हैं पर इमेज एक बेचारे आदमी की बनाए रखते हैं, जो जितने ज़्यादा और जितनी जल्दी छोटे काम करते हैं उतनी जल्दी बड़े आदमी बन जाते हैं, जो चोरी-छुपे यौन-संबंध बनाते हैं और साथ में बेबाक़ होने का श्रेय भी ले लेते हैं, जो दहेज जैसी बुराईओं को दहेजवाली शादियों में जाकर हटाना चाहते हैं, जो ख़ूब अच्छा लिखते और भाषण देते हैं पर उस लिखे या भाष्य के उनके जीवन में कोई चिन्ह तक दिखाई नहीं देते, जो पड़ोसी या टीचर का लिखा भाषण 115वीं बार पढ़ते हैं, जो लोगों को बिना मांगे भी रिश्वत ऑफ़र करते हैं, जो नंगे आदमी के दिवस पर सूट पहनते हैं, शराब न पीनेवाले का दिवस भरपूर शराब पीकर मनाते हैं, जो अहिंसावादी का दिवस लठैतों से लैस होकर मनाते हैं, फ़िल्में न देखनेवाले को फ़िल्म देखकर श्रद्धांजलि देते हैं, अनशन करनेवाले को भरपेट खाकर फिर उसका दिवस मनाकर डकार जाते हैं ....... 

आज का दिन उन्हीं के लिए है। वे सुबह से रात देर तक भाषण देंगे, महापुरुषों की कहानियां सुनाएंगे, बच्चों को लड्डू बांटेगे और फिर पिकनिक मनाने चले जाएंगे।


और बाक़ी सारे दिन तो हैं ही उन्हीं के।


मैं तो मरने से पहले ही मर जाऊं अगर ऐसे लोग मेरा कुछ मनाएं।


भाषण ख़त्म हुआ। अब जाकर ऐश करो जैसे हर साल करते हो।


-संजय ग्रोवर



मंगलवार, 21 मई 2019

‘कोई ट्रॉल करो न प्लीज़’

व्यंग्य



क्या आपने ट्रॉल को देखा है ?
तो उनके बारे में सुना तो होगा !
सुना है आजकल काफी मशहूर हो चले हैं।
कई सेलेब्रिटीं कहती रहतीं हैं-‘क्या बताऊं यार, मेरे पीछें तो आजकल ट्रॉल पड़े हैं:(
कहने का मन होता है-‘फिर तो काफ़ी मशहूर हों आप!’
ट्रॉल बदतमीज़ी करते होंगे पर कई साल से मुल्क़ में जो वातावरण बना है, ट्रॉल्स ही कई लोगों को हीरो/शहीद भी बनाते हैं।
कभी-कभी ट्रॉल्स के नाम भी दिलचस्प होते हैं, जैसे-‘आई लव यू’, ‘रोटी-रोज़ी’, ‘एक्स-वाई-ज़ेड’........

एक मित्र ने दिखाया, ‘देखो आजकल कितने लोग मुझे ट्रॉल कर रहे हैं...........’
दूसरा मित्र ट्रॉल्स के नाम देखकर सोच में पड़ गया, बोला-‘सच बतईयो, कहीं नाम बदल-बदलकर तू ख़ुद ही ख़ुदको  ट्रॉल तो नहीं कर लेता......’
बताइए कितना गड़बडझाला मचा दिया है इंटरनेट की दुनिया में ट्रॉल्स ने।

लेकिन कइयों का कैरियर भी तो यहीं से चमकता है।
मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि हर मशहूर आदमी की मशहूरी में ट्रॉल्स का योगदान होता है। पर कइयों के में होता भी होगा। तिकड़मबाज़ी से हम परहेज़ भी कहां करते हैं।

मैं कल्पना करता हूं कि आप गाड़ी में जा रहें हैं। अगले ही स्टेशन पर ट्रॉल करवाने का शौक़ीन एक जत्था, कोट-पैंट-टाई पहने, गाड़ी में घुस आता है,  ट्रॉल के कुछ शौक़ीन खिड़कियों पर खड़े हैं।
‘ए भाई साहब, ए बहिनजी, ए मैडम, थोड़ा ट्रॉल करो न बाबा, टी आर पी का सवाल है.....’
‘आजकल चैनल बहुत हो गए, भैया, काम करनेवाले भी बहुत हो गए, अपने हिस्से में ज़्यादा ट्रॉल नहीं आता, मुन्नी, मैं क्या करुं ?’
‘यह बच्चा किसका है?’ खिड़की में से आवाज़ आती है, वहां भी ट्रॉल करवाने के इच्छुक खड़े हैं, उन्हीं में से एक कह रहा है-‘बच्चे से थोड़ा सुस्सू ही करा दो न आंटी, हम अपने हिसाब से पेश कर देंगे कि देखो बच्चे भी किस तरह से ट्रॉल करते हैं, कितना सताते हैं अत्याचारी....’
‘लेकिन आपका सूट तो बिलकुल नया है,-आप कहते हैं,--‘इसपे सुस्सू कैसे करा दें.......’
‘अरे बस, करा दो आंटी, नया सूट सिलवाया ही इसीलिए है।’

आजकल कई संस्थायें फ़ॉलोअर्स बेचती हैं, क्या पता ट्रॉल्स भी बिकते हों ! सोचिए, आप आटा मल रहें हैं या पकौड़े तल रहे हैं कि कॉलबैल बजती है! आप जैसे-तैसे दरवाज़ा खोलते हैं कि एक व्यक्ति कहता है-‘भाई साहब ट्रॉल्स ले लो, सस्ते लगा दूंगा। बिलकुल सच्चे ट्रॉलों जैसे ट्रॉल करते हैं।’
‘काम ही सस्ता करते हैं, सस्ते तो बिकेंगे ही’-आप सोचते हैं।

मंगल बाज़ार लगा है, रात के ग्यारह-बारह बजे हैं। ट्रॉल्स् पड़े-खड़े सड़ रहे हैं। ठेलीवाला कहता है-‘रात का बखत है, एक किलो ले लो, जितने बचे हैं सब डाल दूंगा।’

कोई दोस्त आपसे मिलता है। उसके साथ एक और व्यक्ति है जिसका परिचय वह यह कहकर आपसे कराता है-‘इनसे मिलिए, हमारे पुराने मित्र हैं, क्या ज़बरदस्त ट्रॉल करते हैं, कई लोगों का कैरियर बनाया है इन्होंने।’

एक पुरानी परिचित महिला कहती है-‘मेरे बेटे की जॉब लग गई। आजकल एक विशेष पद का सृजन किया गया है-‘ट्रॉल’, बड़े-बड़ों को ट्रॉल करेगा मेरा बेटा। छोटों को ट्रॉल करके बड़ा बनाएगा।’

एक दिन आएगा जब लोग अपने बच्चों का नाम भी ऐसा ही रखेंगे-‘ये मेरी लड़की ट्रॉली, और ये मेरी बुआ का लड़का ट्रालू। कित्ते प्यारे लगते हैं न!’

एक भिखारी किसीसे कहता है-‘अरे भीख नहीं देते तो थोड़ा ट्रॉल ही कर दो !’
‘हट बे! हमारे पास फ़ालतू टाइम नहीं कि मुफ्त में लोगों को ट्रॉल करतें फिरें’-जवाब मिलता है। पता चलता है कि भिखारी से कम तो ये भी नहीं है।

ट्रॉल के शौक़ीन लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। कोई उन्हें ट्रॉल नहीं करता] इस नाराज़गी में उन्हानें लोगों को ट्रॉल करना शुरु कर दिया है।

-संजय ग्रोवर
21-05-2019

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

फ़ालतू

नया हास्य                                                                                                                                                                                          



एक दिन पड़ोसियों का प्रतिनिधिमंडल मुझसे मिलने आया, आ ही गया। 

बोले आप दिनभर घर पर क्यों रहते हो ?

मैंने कहा ‘क्यों, कोई दिक्क़त है ?’

बोले, ‘दिक्क़त तो बहुत है’

मैंने कहा,‘ख़ुलकर बताओ’

‘कहने लगे,‘क्योंकि हम भी पूरे दिन घर पर ही रहते हैं, कहीं आपको पता न चल जाए इस डर से न तो टीवी देख पाते हैं, न बात कर पाते हैं, न घात कर पाते हैं, न लात कर पाते हैं....वग़ैरह....

‘ओह! मैंने कहा,‘मैं भी चला जाया करुंगा’

‘कहां ?’

‘फ़ेसबुक पर’

-संजय ग्रोवर



रविवार, 12 मार्च 2017

महापुरुष और बड़े

व्यंग्य


महापुरुषों को मैं बचपन से ही जानने लगा था। 26 जनवरी, 15 अगस्त और अन्य ऐसेे त्यौहारों पर स्कूलों में जो मुख्य या विशेष अतिथि आते थे, हमें उन्हींको महापुरुष वगैरह मानना होता था। मुश्क़िल यह थी कि स्कूल भी घर के आसपास होते थे और मुख्य अतिथि भी हमारे आसपास के लोग होते थे। मैं अकसर उनसे बचबचाकर निकलता था। बाद में मैं यह देखकर हैरान-परेशान होता था कि इनकी पहुंच कहां-कहां तक है, स्कूल में भी पहुंच जाते हैं। इनके पीछे गांधी, पटेल, नेहरु और शास्त्री आदि के फ़ोटो टंगे रहते थे। ये लोग अहिंसा वगैरह पर भाषण देते थे। हांलांकि सड़क पर इनके सामने से निकलते हुए डर लगा रहता था कि कहीं किसी बात पर (या बिना बात पर ही) थप्पड़ न मार दें। तब मैं सोचता था कि अख़बार, रेडियो और टीवी पर जो महापुरुष दिखाते हैं, ये कुछ राष्ट्रीय स्तर के महापुरुष होते होंगे। उस वक़्त मुझे राष्ट्रीय स्तर के बारे में ठीक से पता नहीं था। अब तो मुझे हर स्तर पर सभी तरह के स्तरों का पता है कि किसी भी स्तर का किसी स्तर पर भी कोई स्तर नहीं है। 

लेकिन उस वक़्त पता होता तो मैं बड़ा कैसे होता !? तब शायद मुझे बड़ा होने से ही इंकार करना पड़ता। अब तो मैं बड़े लोगों को थोड़ा धन्यवाद भी दे सकता हूं क्योंकि मैं सबसे ज़्यादा उन्हीं की वजह से हंसता हूं। इसके अलावा कई छोटे लोग भी बड़े बनने की कोशिश में लगे रहते हैं। उनकी कोशिशें भी मज़ेदार होतीं हैं। जो संघर्ष के वक़्त इतना हंसाते हैं वो बड़ा होकर कितना हंसाएंगे। अकसर लोग बड़े होने के बाद भी मेरी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं।   

मैं भी बड़ा बनने के चक्कर में कई बार घर से बाहर निकला। पर हर बार आधे रास्ते से ही लौट आया। क्योंकि हर बार मुझे यह लगा कि मैं कहीं जा नहीं रहा बल्कि आ रहा हूं, कहीं चढ़ नहीं रहा बल्कि गिर रहा हूं, कहीं पहुंच नहीं रहा बल्कि लौट रहा हूं। हर बार मुझे लगा कि कहीं पहुंचने के लिए अगर लौटना पड़ता है, बड़े होने के लिए अगर छोटा होना पड़ता है, तो पहुंच के करना क्या है !? लौट ही जाते हैं। 


उसके बाद मैं तरह-तरह के छोटे-बड़े लोगों से मिलने लगा। ख़ासकर जब भी मैं बड़े लोगों से मिला और बाद में उनकी हरक़तों का विश्लेषण किया (जिसमें कई साल ख़राब हो गए) तो अंततः मैंने पाया कि मैं ख़ामख़्वाह ही ख़ुदको छोटा समझता रहा, मैं तो बचपन से ही काफ़ी बेहतर था।


इसके बाद मुझमें सचमुच का आत्मविश्वास आ गया (जिसे कई लोग पागलपन भी समझ लेते हैं)। अब मैं तथाकथित छोटे लोगों की चिंता भले कर लूं पर तथाकथित बड़े की चिंता रत्तीभर भी नहीं करता। 
क्योंकि मुझे मालूम है कि ये बेचारे आत्मविश्वास और सोच की कमी व अहंकार(मैं) और हीनभावना की अधिकता की वजह से बड़े बनते हैं।  अगर आत्मविश्वास, संवेदना, समझ और नीयत ठीक हो तो आदमी को बड़ा बनने की कोई ज़रुरत ही नहीं होती। मैं इसका तर्कों, तथ्यों और उदाहरणों के साथ खुला विश्लेषण कर सकता हूं। पर ऐसा करने पर कई बड़े लोग सदमे में आ जाएंगे, उन्हें अपने बड़ेपन पर शक़ होने लगेगा। एक साथ इतने सारे लोगों को इतना बड़ा झटका देना ठीक नहीं है। हम लोग एक साथ इतने सारे सच के आदी नहीं हैं। इतने तो क्या हम तो कितने के भी आदी नहीं हैं।

इसलिए ऐसे काम मैं धीरे-धीरे करता हूं।


मुझे कौन-सा बड़ा आदमी बनना है।   


-संजय ग्रोवर
12-03-2017
प्रसिद्ध व्यक्ति से एक अनपेक्षित बातचीत )


रविवार, 17 जुलाई 2016

दोस्त और दुनिया

कविता

मैंने उन्हें दुनिया के बारे में बताया
वे सोचने लगे

दुनिया ने उन्हें मेरे बारे में बताया
वे मान गए


-संजय ग्रोवर

17-07-2016

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

एक फ़ोटो निकालते हैं चलो

ग़ज़ल

ख़ुदको फिर से खंगालते हैं चलो,
आज क़ाग़ज़ संभालते हैं चलो

गर लगे, हो गए पुराने-से
ख़ुदको रद्दी में डालते हैं चलो

क्यूं अंधेरों को अंधेरा न कहा
रौशनी इसपे डालते हैं चलो

ज़हन जाना तो मार डालोगे
बात को कल पे टालते हैं चलो

सुन न पाओगे, कह न पाएंगे
एक फ़ोटो निकालते हैं चलो
30-11-2015

आदमी जैसी किसमें है श्रद्धा!
आदमी को ही पालते हैं चलो
02-12-2015


सच को मांगेगा! कौन पूछेगा?
फिर भी सिक्का उछालते हैं चलो

कोई मुद्दा उछालते हैं चलो
यूंही अरमां निकालते हैं चलो

03-12-2015

-संजय ग्रोवर






मंगलवार, 31 मार्च 2015

बचकाने बच्चे और पुरस्कार की टॉफ़ियां

पुरस्कार टॉफ़ियों की तरह होते हैं, देनेवाले अंकल की तरह होते हैं, लेनेवाले बच्चों की तरह। बल्कि बचकाने।


अंततः तसल्ली यही बचती है कि हमने कौन-से वाले अंकल से टॉफ़ी ली, तथाकथित अच्छे अंकल से या तथाकथित बुरे अंकल से। ज़्यादा लालची बच्चे यह सावधानी भी नहीं रख पाते, कई बार वे झोंक में आकर उन अंकलों से भी टॉफ़ी ले लेते हैं जिन्हें वे सार्वजनिक रुप से बुरा घोषित कर चुके होते हैं। ऐसे बच्चे एक-दूसरे का लालच छुपा लेते हैं। इनके लिए यह विषय व्यंग्य का नहीं होता।

जो भी अंकल टॉफ़ी देते हैं वे थोड़ा सिर पर हाथ फिराते हैं, बाल सहलाते हैं, गोद में उठाते हैं, कई बार कुछ काम भी बता देते हैं करने को।

जो बचकाने बच्चे टॉफ़ी के पीछे पगलाए रहते हैं, उन्हें इसकी या उसकी में से एक गोद चुननी होती है।

उनकी सारी लड़ाई ‘तेरेवाले अंकल अ़च्छे या मेरेवाले अंकल अच्छे’ की होती है। गोद में बैठने का शौक़ दोनों को बराबर होता है।

कभी-कभी कोई बच्चा ऐसा आ जाता है जो कहता है कि मुझे किसी भी अंकल से टॉफ़ी नहीं लेनी तो दोनों तरह के बच्चे हैरान और परेशान हो जाते हैं। पहले ये पूरी कोशिश करते हैं कि उसको भी किसी न किसी अंकल से टॉफ़ी दिला दें। अगर वह नहीं लेता तो ये कोशिश करते हैं कि किसी भी तरह यह प्रचारित कर दें कि वह भी टॉफ़ी लेता है। या कि उसे टॉफ़ी नहीं मिली इसलिए वह टॉफ़ी के खि़लाफ़ है।

समझनेवाले समाज की हालत देखकर ही समझ जाते हैं कि टॉफ़ियां भले बदल जाएं मगर बचकाने बच्चे और उनके अंकल लोग ज़रा नहीं बदलते।

किसीने ठीक ही कहा है कि आत्मविश्वास से हीन और अपनी ही नज़र में संदिग्ध लोग पुरस्कार लेकर ख़ुदको ख़ुदके लिए विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं।

किसीने क्या मैंने ही कहा है।


-संजय ग्रोवर

31-03-2015



बुधवार, 25 मार्च 2015

विचार की चोरी और इंटरनेट की नयी नैतिकता



फ़ेसबुक/इंटरनेट पर बीच-बीच में ऐसी बातें उठती रहतीं हैं कि किसीके विचार/रचना/स्टेटस चुराने में बुरा क्या
है, आखि़र हम उसके विचार फ़ैला रहे हैं, समाज को फ़ायदा पहुंचा रहे हैं, रचनाकार का काम ही तो कर रहे हैं, तो रचनाकार/विचारक को इसपर आपत्ति क्यों हो।

इंटरनेट के विस्तार से एक बहुत अच्छा काम यह हुआ/हो रहा है कि लोग दूसरों की बातें सुनते हैं और छोटी से छोटी बात पर भी विचार करने को तैयार रहते हैं। किसीकी बात बिलकुल निराधार या तर्कहीन भी हो तो उसे यह समझाने में कोई हर्ज़ नहीं कि आपकी बात तर्कहीन है।

मुझे इस बात का आज तक एक भी कारण समझ/नज़र में नहीं आया कि दूसरों की बात/विचार/रचना बिना उसके नाम के क्यों देनी चाहिए !? आपकी ऐसी कामना/लालसा/वासना जिसमें आप दूसरे को भी शामिल/इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके लिए आप कोई वाज़िब वजह तो देंगे कि नहीं देंगे !?

आखि़र रचना/विचार से जुड़े व्यक्ति का नाम देने में समस्या क्या है ? क्या उसका नाम देने के लिए आपको हिमालय की चोटी पर चढ़ना पड़ेगा ? क्या उसके लिए आपको स्पाँसर ढूंढना पड़ेगा ? क्या उसके लिए आपको कुश्ती लड़नी पड़ेगी ? क्या उसका नाम देने से आपको स्पाँडिलाइटिस हो जाएगी ? क्या उसके लिए संसद में बिल पास कराना पड़ता है ? क्या उसके लिए आपको बैंक से क़र्ज़ा लेना पड़ेगा ? क्या उसका नाम देने से महंगाई बढ़ जाएगी ? क्या उसका नाम देने से इस बार की फ़सल नष्ट हो जाएगी ? क्या नाम न देने से समाज को वह बात जल्दी समझ में आ जाएगी ?क्या उसका नाम देने के लिए आपको अगले चौक से ऑटो लाना पड़ेगा ?

आखि़र समस्या क्या है ? आखि़र रचना/विचार चुराने के लिए भी आपको एक मोबाइल/स्मार्टफ़ोन/टेबलेट/लैपटॉप/पीसी तो चाहिए ही न ? उसीमें ज़रा-सी उंगली हिलाएंगे और स्टेटस शेयर हो जाएगा। फिर यह ज़िद क्यों ?

इससे होगा यह कि एक तो असली आदमी का नाम नहीं जाएगा ; दूसरे, आपका नाम चला जाएगा। विचारक का नाम ज़रुरी नहीं है और चुरानेवाले का नाम ज़रुरी है ? चुपड़ी और दो-दो ? क्या विचार करना और चाय पीना आप एक ही बात समझते हैं ?

फिर तो चोरी, छेड़ख़ानी, लूटपाट, सेंधमारी और ज़बरदस्ती में भी क्या दिक़्क़त है ?

आपको अपने साथ कुछ भी करने की स्वतंत्रता है, मगर सबके लिए नियम आप कैसे बना सकते हैं, वो भी ऐसे मामलों में जहां दूसरा शामिल है और जहां ज़बरदस्ती हो रही है !? और आप मूल लेखक की स्वीकृति तक नहीं लेना चाहते !?

अपने साथ आदमी जो चाहे कर सकता है। किसीके पास अतिरिक्त संपत्ति है या दूसरों में बांटना चाहता है तो वह घर ख़ुला छोड़कर जा सकता है, ताले-चाबी फ़ेंक सकता है, कबाड़ी को दे सकता है ; फिर भी काम न हो तो सूचना लिखकर टांग सकता है, विज्ञापन दे सकता है कि हमारे यहां चौबीस घंटे चोरी करने की छूट है, सुविधा है, आने से पहले फ़ोन करलें तो और भी अच्छा, मैं हूंगी/हूंगा तो भी टहलने निकल जाऊंगी/गा.......

आप अपने स्टेटस लुटाने के लिए बिलकुल स्वतंत्र हैं। आप अपनी पुस्तकों के प्रकाशक से कह सकते हैं कि आपकी क़िताब आपके पड़ोसी के नाम से छाप दे, रॉयल्टी ज़रुरतमंदो को दे दे। आपको अपनी बात अपने नाम के बिना कहने में इतना आनंद होता है तो आप परदे के पीछे खड़े होकर भाषण दे सकते हैं, मास्क लगा सकते हैं, अपने विचार किसी दूसरे परफ़ॉर्मर/रनर को लिखकर दे सकते हैं ; कौन आपत्ति करेगा ?

मगर आप सारी कॉलोनी/समाज के लिए ऐसे नियम/मान्यताएं/परंपराएं बनाने की कोशिश करेंगे तो यह संभवतः कम ही लोगों को जायज़ या तर्कसंगत लगेगा।

आप क्या सोचते हैं ?

-संजय ग्रोवर
25-03-2015

बुधवार, 4 मार्च 2015

निराकार

‘क्या लाए ?’

‘जी, जो भी बन पड़ा ले आया हूं।’

‘गुड, देखो हमारे यहां अपना पक्ष चुनने की पूरी स्वतंत्रता है, चाहो तो इसे मेरी दायीं जेब में डाल दो, चाहो तो बायीं में।’

‘जी, मैं जानता हूं कि रास्ते अलग़-अलग़ हैं पर गंतव्य एक ही है।’

‘शाबाश! बाहर लोगों को बताना मत भूलना कि मुझे अपना पक्ष चुनने का पूरा मौक़ा दिया गया।’

‘जी मैं ज़रुर बताऊंगा जैसे आपने मुझे बताया।’

-संजय ग्रोवर
04-03-2015


शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार

व्यंग्य

पता नहीं भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार का क्या रिश्ता है पर पिछले कुछ सालों से इन तीनों का नाम कई बार एक साथ सुनने में आया है। आप भी सुनना चाहते हैं तो यह वार्त्तालाप सुनिए-

‘देखिए, मैं ज़रुर भ्रष्टाचार दूर कर दूंगा, यह अच्छा मौक़ा है, भगवान भी अब यही चाहता है, लगता है कि उसीने मुझे इसके लिए चुना है, ज़रुर कोई चमत्कार होने वाला है।’

‘यह तो बहुत अच्छी बात है, सभी परेशान हैं, लेकिन मुझे एक बात समझ में नहीं आई।’ भगवान क्या आपके बड़े होने का इंतज़ार कर रहा था ?’

‘यह क्या बात हुई ?’

‘मतलब इतने सालों से अपने यहां भ्रष्टाचार भगवान की इच्छा से था ? भगवान क्या भ्रष्टाचार दूर करने के लिए आप पर डिपेंड करता है? वह ख़ुद भी तो दूर कर सकता था। या किसी और को चुन सकता था ?‘

‘यह भी कोई प्रश्न है ?’

‘नहीं, मतलब इतने सालों से भगवान को भ्रष्टाचार बुरा नहीं लग रहा था, आपके बड़े होते ही बुरा लगने लगा ? लगता है भगवान आपसे डरता है !’

‘हा हा हा, आप भी क्या बात कर रहे हैं, हम तो बहुत साधारण आदमी हैं।’

‘आपकी इसी विनम्रता का मैं क़ायल हूं, आप बुरा न मानें तो कृपया बताएं कि इतने सालों से भगवान भ्रष्टाचार के साथ मज़े से रह रहा था तो एकाएक उसे हुआ क्या ? कहीं आपने तो उसे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए नहीं राज़ी किया !?’

‘क्या यार.....आप भी कमाल करते हैं....’

‘नहीं नहीं, अब तो आपको बताना ही पड़ेगा कि आपकी टीम ने भगवान को कैसे तैयार किया ? प्लीज़ अपनी टीम से बात करवाएं, लोग आपकी स्ट्रेटजी जानना चाहेंगे, लीजिए माइक लीजिए, सब आप ही के तो हैं.....’

‘नहीं नहीं, सब जनता के हैं, देखिए अभी टीम के सदस्य थके हुए हैं, एक-दो की तबीयत भी ख़राब है....’

‘ओह! तो भगवान उनकी तबियत कब तक ठीक करेगा ? क्या भगवान की तबियत आप पता करेंगे कि कब उसकी तबियत आएगी और वह उनकी तबियत ठीक करेगा ?’

‘हा हा हा, आप भी ना......, चलिए दूसरे लोगों को भी टाइम दे रक्खा है....’

‘चलिए, नमस्कार, भगवान को भी मेरी नमस्ते दीजिएगा।’

‘हा हा हा।‘

-संजय ग्रोवर 
14-02-2015


गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

ग़ज़ल

अपने हक़ में अक्स बदल देने के आदी निकले रे
आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे

जिनका मक़सद-ए-आज़ादी था औरों की ग़ुलामी
वही बारहा बनके मसीहा-ए-आज़ादी निकले रे

ज़ालिम ने मज़लूमों को हर तरह से यूं बेदख़ल किया
उनका हक़ भी ख़ुद लेने को बन फ़रियादी निकले रे

भरम को जिनने कहा हक़ीक़त, छोटेपन को ऊंचाई
वो रंगीन-मिज़ाज, ओढ़कर शक़्लें सादी, निकले रे

पहले क्या-क्या होता होगा, लोगों ने कुछ यूं जाना
जिनको आंदोलन समझा, सब कूदा-फ़ांदी निकले रे


-संजय ग्रोवर

04-12-2014

रविवार, 15 जून 2014

पूज्य पिताजी

सभ्य समाज में आदर झटकने का एक और तरीका जो मुझे पसंद आया है वह है पिता बन जाना। यहां एक सुविधाजनक तथ्य यह है कि डॅाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, साहित्यकार या कुछ और बनने के लिए आप में क्षेत्र विशेष से संबंधित कुछ योग्यताएं होनी ज़रुरी हैं (हालांकि अपवाद हर जगह हैं और आजकल तो हर क्षेत्र मे अपवादों का ही बोलबाला है), लेकिन पिता होने के लिए ऐसा कुछ ज़रुरी नहीं है। उदाहरण के लिए देश में लोग डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, नेता, अभिनेता, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकर्मी, पुलिसवाले, चोर-डाकू, प्रशासनिक अधिकारी, बाबू, चपरासी, बेरोज̣̣गार वगैरह कम या ज़्यादा मात्रा में हो सकते हैं, अच्छे या बुरे हो सकते हैं, हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं, लेकिन पिता सभी हो सकते हैं और लगभग सभी होते हैं, खूब होते हैं।

यहां मैं उन लोगों को शामिल नहीं कर रहा हूं जो पिता बनने से पहले ही दादाबन जाते हैं और सब्ज़ी काटने के चाकुओं, नाख़ून काटने की कैंचियों, ब्लेडों, लात-घूसों, घुड़कियों और आंखे तरेरने-दिखाने जैसे औज़ारों के सहारे अपने आस-पड़ोस के बच्चों को (और कभी-कभी तो बड़ों को भी) धौंसियाना शुरू कर के अपने पांव पालने में ही चमका देते हैं। बचपन में ही दादा बन गए ये होनहार बिरवान और परिपक्वहोकर जब पिता बनते हैं तो इनके लिए गाड फादरसंबोधन का इस्तेमाल करना ज्यादा उचित समझा जाता है। तरह-तरह के माफियाओं से जुड़े छोटे-बड़े लोगों के लिए ये गॉड फ़ादऱपिता कुछ कम आदरणीय नहीं होते। और अगर सफ़ेदपोश हों तो दूसरे लोगों के लिए भी। ऊपर से आजकल तो सफ़ेदपोश और स्याहपोश का फ़र्क़ भी खत्म सा हो चला है।

जैसाकि मैंने पहले ही कहा, यहां हम इस तरह के पिताओं की बाबत बात नहीं कर रहे हैं। जिनकी कर रहे हैं उनमें से एक भगवान परशुराम के पिता थे। इनकी ही आज्ञा पर आज्ञाकारी परशुराम जी ने तुरंत आंखें मींची और अपनी मां का सिर उसकी गरदन से उड़ा दिया।

इसके अलावा एक बार जब मैं रेल से सफ़र कर रहा था तो बीच के किसी स्टेशन से पांच व्यक्ति सवार हुए और मेरे साथ वाली सीट पर सवारहो गए। इनमें से तीन पिता श्रेणी के और दो पुत्र श्रेणी के लग रहे थे। दोनों पुत्रगण अपनी सारी प्रतिभा का इस्तेमाल स्वीकृति-सूचक ढंग से सर हिलाने में करते हुए वार्तालाप में हिस्सा ले रहे थे। एक राजनीतिक दल में आस्था व्यक्त करते हुए पिता लोग कह रहे थे कि इस दल ने भ्रष्टाचार का लगभग ख़ात्मा कर दिया है। यहां तक कि अपने दल के किसी ख़ास व्यक्ति का काम भी अगर ग़ैरक़ानूनी हो तो नहीं किया जाता। इसके अलावा वे यह भी कह रहे थे कि नई पीढ़ी भ्रष्ट हो गई है, उसके सामने कोई आदर्श नहीं है।

तभी बीच वार्तालाप में टिकट चैकर महोदय ने हस्तक्षेप किया और टिकटों की मांग की। पता चला कि न तो पिता लोगों के पास टिकट है न पुत्रों के पास। अर्थात् टिकट न लेना एक ऐसा मुद्दा था जहां जैनरेशन गैपबिल्कुल आड़े नहीं आया था। टिकट चैकर, जो कि इस समय किसी का पिता था न पुत्र, कुछ-कुछ पिताओं के अंदाज़ में सख़्ती दिखाने लगा। इस पर पांचों जन पुत्रों की तरह आज्ञाकारी से दिखने लगे। कुछ ले देकर सौदा पटाने का जिक्र आया तो टिकट चैकर महोदय का हृदय परिवर्तन हो गया।

दरअसल पिता होना ही कुछ चमत्कारी सी घटना है। आप बचपन से लेकर जवानी तक कितने भी दुष्ट, लुच्चे, लफंगे, भौंदू, रट्टू, सनकी, हरामखोर, अत्याचारी, व्याभिचारी यहां तक कि उग्रवादी रहे हों मगर पिता बनते ही ऑटोमेटिकलीअपने बच्चों के लिए आदरणीय हो जाते हैं। यह मामला ही कुछ ऐसा है कि सदा आपका विरोध करने वाला, आपसे जलने वाला पड़ौसी तक आपके साथ हो जाता है और विवाद की स्थिति में आपके पुत्र को ही समझाने पर तुल जाता है कि कुछ भी हो, आखि़र हैं तो तेरे पिता ही। इस सार्वभौम सत्यके आगे अच्छे-अच्छे पुत्रों की बोलती बंद हो जाती है। आज्ञाकारी बच्चे अक्सर आपस में इस बात पर लड़ पड़ते हैं कि तूने जो कहना था मुझसे कह लेता, मेरे बाप तक कैसे पहुंचा।

अब कौन जाने कि कौन कितना पहुँचा-हुआहै ! कौन दूसरों तक पहुँचा है और कौन अपनों तक !?

-संजय ग्रोवर


(27 नवंबर, 1994 को जनसत्ता में प्रकाशित)

गुरुवार, 29 मई 2014

प्लांटिंग, पवित्रता और प्रतिबद्धता


बात दिलचस्प है इसलिए बता रहा हूं।

देखता हूं कि जो लोग किसी तथाकथित महान विचारधारा और गुट से जुड़े होते हैं वे अकेले और स्वतंत्र व्यक्ति का विरोध करने में कुछ हिचकिचाते हैं। वजह तो पता नहीं, अंदाज़ा लगाना चाहें तो कोई आफ़त भी नहीं आ रही-शायद उन्हें विश्वास ही नही हो पाता कि आदमी अकेले भी स्वतंत्र हो सकता है, बिना ऊपर से आए ऑर्डर के भी कुछ कर सकता है। उनकी ग़लती भी नहीं है, जैसी ज़िंदग़ी आदमी जीता है, उससे अलग या आगे की कल्पना उसके लिए मुश्क़िल होती होगी।

उन्हें अगर अकेले विचारक का विरोध करने की ट्रेनिंग नहीं मिली तो करें क्या ? फिर ऐसा क्यों न किया जाए कि उसे किसी विरोधी गुट से जुड़ा दिखा दिया जाए जिससे दिखावटी या वास्तविक लड़ाई में वे प्रशिक्षित किए गए हैं। हांलांकि यह तरीक़ा कुछ ऐसा ही है जैसे आप पहले किसीके घर में जाकर स्मैक का पाउच प्लांट कर दें फिर दूसरे दिन अख़बार में ख़बर निकले कि ‘नशे का ख़तरनाक़ तस्कर गिरफ्तार, भारी मात्रा में स्मैक बरामद’। यह विधि है तो शर्मनाक़ पर धर्म और धारा की भलाई की ख़ातिर कब क्या न करना पड़ जाए, कुछ मालूम नहीं।

वैसे गुटधारियों की ज़िंदगी होती इतनी मनोरंजक है कि कई बार ज़रुर अकेले आदमी का भी मन होता होगा कि इन्हीं के बीच जाके पसर जाए। भिन्न-भिन्न तरीक़ों से ये लोग संबोधनों, विशेषणों, अवसरों और परिस्थितियों का उपयोग करते हैं। जैसे कि इनका विरोधी गुट अफ़वाहें उड़ाए तो ये एकदम पवित्रता का धुंआ छोड़ने लगते हैं, नाक सिकोड़ने लगते हैं कि देखो कैसे-कैसे षड्यंत्र ये लोग करते हैं, बेहूदे कहीं के। मगर जब ये ख़ुद अफ़वाहें उड़ातें तो भारी मजबूरी में उड़ाते हैं-क्या करें कोई और रास्ता ही नहीं था, कुछ न कुछ रणनीति तो बनानी ही पड़ती है, आखि़र हमारी लड़ाई सच की लड़ाई है, हमारी कोई उनके जैसी थोड़ी है।

मज़े की बात है जब मरज़ी ये सच का ठेका ले लेते हैं और जब दिल करे झूठ में सहजता ढूंढने लगते हैं। बहुत ही मतलब कमिटेड लोग होते हैं, विरोधी गुट की भाषा में प्रतिबद्ध। कभी, अभी अपने नये मकान में चिलगोज़े खाने का अपना फ़ोटो दिखाकर बताते हैं कि कैसे मेरा संघर्ष सफ़ल हुआ तो कभी अचानक रोना-धोना शुरु कर देते हैं कि यार सारी ज़िंदग़ी फ़क़ीरी में बीत गई, कुछ हासिल नहीं हुआ, तुम्ही कुछ करवाओ न यार।
कहने में डर रहा हूं मगर लगता यही है कि इनका सिद्धांत एक ही होता है कि जब जहां जिससे फ़ायदा हो, जिधर को भीड़ जाती दिखे, तुरंत उसी रंग में आ जाओ। दारु पी रहे हो तो आवारग़ी को महान साबित करने में हाथ-पैर तोड़ लो, परिवारों के साथ बैठे हो तो कहो कि मैं तो शुरु से कहता था कि एक दिन तो तुम्हे यह करना ही पड़ेगा। इसके अलावा रास्ता भी क्या था।

सत्ता से इनकी लड़ाई हमेशा रहती है। हम जैसे तो वैसे भी कया लड़ेंगे सत्ता से, हमें तो मालूम भी नहीं कि रहती किधर है, हमारी तो ज़िंदग़ी ऐसे छोटे-मोटे झंझटों से निपटते बीत जाती है जिनमें लोकल अख़बारों को भी कोई ग्लैमर नहीं दिखता। सत्ता के बारे में हमें तो तभी जानने को मिलता है जब किसी सत्ता-विरोधी को कोई पुरस्कार, कोई वजीफ़ा, कोई ग्रांट, कोई यात्रा मिलने की ख़बर आती है। ख़बर देने वाले चैनल भी सत्ता-विरोधी ही होते हैं। सत्ता का मूड भी क्या ग़ज़ब होता है कि इसे जब अपने विरोधियों पर ज़्यादा ग़ुस्सा आता है तो ग़ुस्से में यह उन्हें पुरस्कार और सम्मान फ़ेक-फ़ेंक कर मारती है।

मैं ऐसे लोगों को सीरियसली इसलिए लेता हूं कि ये आपस में मिल जाएं तो किसीको कुछ भी साबित कर सकते हैं, किसीको भी सीरियस हालत में पहुंचा सकते हैं। वैसे इन्हें मिलना पड़ता भी नहीं है, ये मिले-मिले से ही होते हैं। उसदिन सड़कपर परस्पर-विरोधी दो प्रतिबद्धों की बातें सुनने को मिल गई-

कई साल बाद मिले यार, कैसा चल रहा है?

बस, सब सैट हैं, एक लड़का डॉक्टर हो गया है, एक इंजीनियर है, एक बामपंथ में डाल दिया है, एक जॉनसंघ में लग गया है, बस मिल-जुलके बढ़िया चला रहे हैं ऊपरवाले की कृपा से।

अच्छा, सुना तो था कि आपने एक गोद भी लिया था जिसे सफ़ाई का क्रेज़ हो गया था....?

अरे! वो तो....कहने लगा पापा, सफ़ाई की एक्टिंग अलग बात है, परफ़ॉर्मेंस अलग बात है पर ज़िंदगी-भर येई थोड़े ना करता रहूंगा, मैं क्या इसके लिए पैदा हुआ हूं.....मुझे भी रहम आ गया, मैंने कहा कि सारी समानता के ठेका हमींने थोड़े ले लिया है, तू कुछ अफ़सरी वगैरह कर ले, जा जी ले अपनी ज़िंदग़ी....

तो साथित्रो, हांलांकि स्टेज पर तो ये लड़ते ही रहते हैं, मगर ये लेख पढ़कर कहीं ये न कह दें कि यह आदमी हमारे समाज को तोड़ रहा है, फूट डाल रहा है....

इसलिए इस लेख को चुपचाप पढ़ लें और भूल जाएं।

-संजय ग्रोवर
29-05-2014


शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

सड़क-बहादुर

पिछले दो-तीन सालों से अपने यहां सड़क ख़ासी चर्चा में है। लोग एक-दूसरे को अहिंसापूर्ण ढ्रंग से ललकारते
मिलते हैं कि बेट्टा सड़क पर नहीं उतरे तो ज़िंदगी में किया क्या !? अगला एकदम से घबरा जाता है कि सड़क पर जाकर दो-चार नारे नहीं मारे, मोमबत्ती की गरमी में हाथ शहीद नहीं किए, किसी बिल्डिंग को नहीं घेरा, किसीको चपत मारकर नहीं भागे तो मानो आदमी को डूबकर मर जाना चाहिए। और सिर्फ़ सड़क से काम नहीं चलता, सड़क पर संघर्ष करते हुए आपके विज़ुअल्स् और स्टिल फ़ोटोग्राफ़ भी हर एंगल से पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए।

आप ज़रा मेरी बेशर्मी देखिए ; मुझे ऐसे तानों से रत्ती-भर काँपलैक्स नहीं होता। जैसे कई लोग कैमरा-संकोची होते हैं, मैं सड़क-संकोची हूं। बचपन से ही हूं। उस वक्त भी ऐसे लोग पर्याप्त से ज़्यादा मात्रा में पाए जाते थे जो सड़क पर किसी भी तरह के संघर्ष को लेकर अत्यंत मुखर होते थे। बिजली चली जाए तो मर्द लोग सड़क पर ही कमीज़-बनियान उतारकर हवा करना शुरु कर देते थे। घर में नल होते हुए भी कई संघर्ष-पसंद मर्द सड़क के नल पर इस मस्त अंदाज़ में बोल्डली नहाते थे कि मैं अपने बाथरुम में भी उनका मुक़ाबला नहीं कर सकता था। आपको तो मालूम है अपने यहां सड़के भले ग़रीब मिल जाएं, नालियां बराबर कीचड़-संपन्न रहतीं हैं। प्रकृति को सड़क पर प्रदर्शित करती नालियां प्रकृति-प्रेमी मर्दों का एक तरीके से अपरोक्ष आह्वान करतीं हैं कि आओ, कुछ कर जाओ। संघर्षवान मर्द आहलादित् हो उठते। कई बार तो वे नालियों का भी वेट नहीं करते। कुछ तो ऐसे साहसी कि पेड़ की आड़ या छोटी-सी झाड़ के भी मोहताज नहीं। ‘घटाओ तुम्हे साथ देना पड़ेगा ; मैं फिर आज........’।  क्या तो चौराहा, क्या मैदान और क्या मेला.....

लोग थे और हैं कि सड़क पर ही बिना किसीकी परमिशन लिए गड्ढे-वड्ढे खोदकर तम्बू-बम्बू तान देते हैं, कई बार तो रास्ते-वास्ते भी बंद कर देते रहे। और कोई कुछ पूछ ले तो, अबे स्साल्ले, रिक्शा पीछेवाली सड़क से निकाल्ले ना, देखता नहीं कथा चल्लई है, आया बड़ा रिक्शेवाला.....। सड़क पर मंडप लगे हैं और वहीं आग़ जल्लई है और वहीं पवित्र रोशनी में लेना-देना भी चल रहा है। कल्लो क्या कल्लोगे ? कन्नेवाले ख़ुद ही दोस्तों और रिश्तेदारों में शामिल हैं। सड़क पर लेन-देन करना क्या मज़ाक़ है ? आंदोलन से कम नहीं लगता।

सड़क पर साहसपूर्ण अहिंसात्मक संघर्ष के हम आदी रहे।

झूठ नहीं बोलूंगा, उस वक़्त बड़ा अपराध-बोध होता था। कई बार लगता कि मैं मर्द ही नहीं हूं, मुझे जीने का हक़ क्या है, वगैरह...। बाद में पता नहीं कैसे, उल्टा-सीधा पढ़ते-सोचते, अपराध-बोध और शर्म-संकोच वगैरह कम होते गए।

लेकिन दुनिया ? उसका क्या करोगे ? देखता हूं कि सड़क को लेकर विद्वानों और आंदोलननुमांकारियों की अवधारणाएं आज भी उठान पर हैं। पर मुझे समझ में नहीं आता कि जो काम आप अपने घरों और दुकानों में कर सकते हैं उसके लिए सड़क पर क्यों नाचते हैं !? मान लीजिए आप एक अभिनेता हैं और आप ईमानदारी पर अपनी जान न्यौछावर कर देना चाहते हैं। तो सीधा उपाय है कि जो भी प्रोड्यूसर/डायरेक्टर/फ़ायनेंसर आपको बुक करने आया है उसको अपने ड्रॉइंग-रुम में ही बोल दीजिए न कि मैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ व्हाइट मनी वाली फ़िल्म में ही काम करुंगा, भले आप मेहनताना कम दे दें, पर मैं ब्लैक मनी किसी भी हालत में नहीं लूंगा। मेरे कई बंगले हैं, कई ज़मीनें हैं, पीढ़ियों का इंतज़ाम हो चुका है, अब मैं ईमानदारी से जीना चाहता हूं। अगर आप दहेज की बीमारी दूर करना चाहते हैं तो कार्ड लेकर आई सहेली से अपनी किचेन में ही धीरे से कहके देखिए कि बहिना, मैंने तो दहेजवाली शादियों में जाना बंद कर दिया है, कहीं तू भी इसी तरह की शादी तो नहीं कर रही ? अगर आपकी दिलचस्पी इक्वैलिटी में यानि कि जातिवाद को हटाने में है तो आप कह सकते हैं कि जिन्होंने अपने वैवाहिक विज्ञापन में अपनी जाति का ज़िक्र किया है, इन्वीटेशन कार्ड में भी जाति का ज़िक्र किया है, जो अपने वैवाहिक आयोजन या दूसरे समारोह जाति-आधारित रीति-रिवाज़ों पर चढ़कर गर्व से मनाते हैं, वे मुझसे ऐसी कोई कोई उम्मीद न रखें कि मैं मूर्खों की तरह, ख़ामख्वाह ही तुम्हें जाति-विरोधी या इक्वैलिटी-समर्थक मान लूंगा। होंगे दूसरे अक्ल के अंधे, मैं पाखण्ड को समझने में कोई भेद-भाव नहीं बरतता।

इस बात की गारंटी कोई भी ले सकता है कि जब आप ऐसा करेंगे तो कोई पुलिस आपको पकड़ने नहीं आएगी, कोई आप पर अश्रु-गैस के गोले नहीं छोड़ेगा, पानी की बौछार नहीं करेगा, लाठी चार्ज नहीं करेगा, जेल में बंद नहीं करेगा। यह सब आप घर बैठे बड़े मज़े से कर सकते हैं।

करके देखिए, तब समझ में आएगा कि सड़क पर ज़्यादा हिम्मत चाहिए कि घर में ज़्यादा चाहिए ?

अगर आप घर के कमरे में नहीं कर सकते तो सड़क से कैसे कर लेंगे ?

-संजय ग्रोवर

07-02-2014


रविवार, 29 सितंबर 2013

ग़रीबी वगैरह के मामले में अमीर कम्युनिस्ट वगैरह




फ़ेसबुक इत्यादि के स्टेटस इत्यादि से पता चलता है कि भारत का कम्युनिस्ट अकसर भूखा-प्यासा रहता है। उसकी ज़िंदगी निरंतर, निहायत दयनीय, शौचनीय वगैरह बनी रहती है। ज़ाहिर है कि भूखा-प्यासा आदमी शारीरिक रुप से तो कमज़ोर हो ही जाता है। ऐसे में गाड़ी वगैरह चलाने में भी दिक्क़त होती होगी। ताक़त तो उसमें भी लगती है ; इग्नीशन में चाबी घुमानी पड़ती है, पैर से ऐक्सीलरेटर और ब्रेक वगैरह दबाने पड़ते हैं। इसमें काफ़ी संघर्ष लगता होगा। इंटरनेट इत्यादि से ही पता चलता है कि भारत में बहुत सारे कम्युनिस्टों के पास गाड़ियां वगैरह हैं। गाड़ियों का क्या, वो तो आजकल कई आम आदमियों के पास भी चार-चार हैं, एक-दो कम्युनिस्टों के पास भी हों तो आपको क्या तक़लीफ़ है! यू तो दान इत्यादि से तथाकथित कम्युनिस्ट को नफ़रत है मगर गाड़ी, शराब और लैपटॉप की बात अलग है। इस दान से विज्ञान और तकनीक़ का समुचित प्रचार-प्रसार वगैरह होता है। ग़रीबी और विज्ञान वगैरह के चक्कर में ही कम्युनिस्ट को दो-दो, चार-चार मोबाइल वगैरह ख़रीदने पड़ जाते हैं जिससे कि वह समय-समय पर अपनी ग़रीबी के सतत संघर्ष के ऐतिहासिक फ़ोटू इंटरनेट पर इधर-उधर डालकर विज्ञान का प्रसार कर सके। भारतीय तथाकथित कम्युनिस्ट की एक ग़रीबी कई बार मैंने व्यक्तिगत रुप से नोट की है कि अमीरों को ग़ाली देने के क्षेत्र में वह काटा-झिरला-खुंबानी को बेचारा अफ़ोर्ड नहीं कर पाता हांलांकि दिल्ली-बंबई में ये और संबंद्ध अख़बारी सेठ उसके ज़्यादा नज़दीक पड़ते होंगे। मगर किसी रहस्यमय मजबूरी के तहत वह आठ-दस हज़ार में काम चलानेवाले किसी दल-वाद-समर्थन विहीन आदमी को अमीर आदमी घोषित कर देता है और उसे ग़ालियां बक-बक के साम्यवाद का विस्तार करता है।

कम्युनिस्ट या तो गांव में और झोंपड़ी में रहता है या कंगारु की तरह छलांग लगाकर सीधे दिल्ली में जाकर एंकर या संपादक हो जाता है। इससे भी काम नहीं चलता तो बंबई चला जाता है और वहां दर्दनाक़ संघर्ष करने लगता है। ऐसे में कई बार उसका रहन-सहन देखकर लोगों को ग़लतफ़हमी हो जाती है कि कहीं यह आदमी सत्ताधारी, विपक्षी या कोई सेठ वगैरह तो नहीं है। इमेज हैंडल करना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन कम्युनिस्ट वह भी कर दिखाता है। अपने संघर्ष के एक-एक क्षण के स्टिल फ़ोटोग्राफ़ और विज़ुअल उसके पास सुरक्षित रहते हैं जो उसीकी तरह ग़रीब और श्वेत-श्याम होते हैं। इस इमेज के लिए संघियों से अलग दिखना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए वह संस्कृतनुमा हिंदी को लात मारकर संस्कृतनुमा उर्दू में प्रविष्ट हो जाता है। वह ऐसी-ऐसी ग़ज़लें सुनता है जो अपने अर्थों में भले ग़रीब हों मगर लफ्ज़ों में अमीरी से भरी रहती हैं। वह अध्यात्मिक भजन त्यागकर सूफ़ी संगीत में गोल-गोल घूमने लगता है। समाधियों के बजाय मज़ारों को पकड़ लेता है। कोई कह दे कि इन दोनों में फ़र्क़ क्या है तो वह या तो जवाब नहीं देता या उसे संघी घोषित कर देता है। ये दोनों हैं तो अदाएं हीं पर लाजवाब इसलिए हैं कि कम्युनिस्ट ख़ुदको यथार्थवादी मानता है। वह छंद को छोड़कर बहर पर लटक जाता है। ग़रीबी हटाने से ज़्यादा उसे रात-दिन यह चिंता खाए जाती है कि कोई उसे संघी न कह दे।

दस-बीस साल पहले तक अकसर लोग घर आए मेहमानों से दूध के बारे में पूछते डरते थे। दूध का मनोवैज्ञानिक असर भारतीय मानस पर कुछ ऐसा था कि लोग मेहमानों को उससे महंगी चीज़ खिला देते थे मगर घर में रात रुक गए मेहमान से दूध की बाबत इस तरह पूछते थे,‘‘भाईसाहब/बहिनजी, आप रात को दूध तो नहीं लेते ? नहीं ना। हां, वही तो मैंने सोचा, ,भाईसाहब/बहिनजी को तो मैंने दूध लेते कभी देखा नहीं।’’ इधर भाईसाहब/बहिनजी भी सोचते थे कि अगर आज मैंने इनके घर में पी लिया तो कलको ये भी तो मेरे घर आएंगे। यह कस्बों-शहरों की बात है। गांवों में भूले-भटके कोई चला जाए तो लोग दूध लेकर सवार हो जाते थे और कभी-कभी तो दवाई की तरह ज़बरदस्ती पिला देते थे। दूध शायद अमीरी का प्रतीक होगा और प्रतीकों में कथित भारतीयों की जान बसती है। कुछ-कुछ दूध जैसी खिचड़ी मानसिकता शराब को लेकर कम्युनिस्टों की है। उनकी फ़िल्मी और ग़ैरफ़िल्मी शायरी में शराब बिलकुल अध्यात्मिकता की तरह बहती है। अगर गानों से कम्युनिस्टों को जाना जाए तो लगता है कि शराब अगर कोई दूसरा पिलाए तो आदमी एकदम ख़ानदानी आवारा बन जाता है और ऊंची रुहानी शायरी करता है वरना अपने पैसे से पिए तो वह अमीरी की पंूजीवादी नालियों में सड़ता है। लगता है कम्युनिस्ट शायरों के लिए बंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री ने व्हाइट मनी वाले सेठ अलग से रखे हुए हैं। जिस फ़िल्म में कम्युनिस्ट काम करते हैं उनमें सिर्फ़ व्हाइट मनी लगाई जाती है। या फ़िर ये पैसा उन्हें मजदूरों वगैरह के चंदे से दिया जाता है।

मुझे जब शराब पीनी होती है तो मैं पांच सौ रुपए की बोतल के साथ सौ रुपए के काजू भी ख़रीद लेता हूं। एक तो मेरी प्रतीकात्मकता में कोई ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है दूसरे मुझे पता है कि सड़ी हुई नमकीन भी आजकल बीस-तीस रुपए की आती है। पैसे भी मुझे ख़ुदही खर्च करने होते हैं इसलिए मुझे अपना बजट भी मालूम रहता है। पैदल जाकर ख़ुद ही लाइन में लगकर दारु ख़रीद लेता हूं और हाथ झुलाकर घर आ जाता हूं। कम्युनिस्ट होता तो शर्म के मारे गाड़ी में जाना पड़ता और मारे शर्म के जाने से पहले भी दो पैग़ मारने पड़ते। मैं इतना अमीर हूं कि मेरे दो पैग़ दो महीने चलते हैं। इतना अय्याश हूं कि दो पैग़ में दो सौ पैग़ों की बदनामी बिना किसी संपादकत्व, एंकरत्व, आयकनत्व, महापुरुषत्व, प्रोफ़ेसरत्व के अफ़ोर्ड कर सकता हूं। जहां फ़िल्मकारों, नेताओं, पत्रकारनुमाओं और यथार्थवादी साहित्यकारों को भी शराब छुपकर पीनी पड़ती हो वहां मुझसे ज़्यादा मस्त, असली और दोटूक जिंदगी क्या हो सकती है।

क्योंकि न तो मैं कम्युनिस्ट हूं न मैंने यह लेख हिंदूवादियों को ख़ुश करने को लिखा है। मैं महज़ आदमी हूं। जिस किसीको आदमी के लिखे से छूत लगती हो वो मंतर वगैरह मारकर ख़ुदको शुद्ध कर ले। या कुछ प्रतीक वगैरह घिस ले। लेख तो अब आपने पढ़ ही लिया है।

न तो मैंने इसके लिए ज़बरदस्ती की थी न आप नशे में थे।

-संजय ग्रोवर 

29-09-2013

बुधवार, 28 अगस्त 2013

एक नई जाति



हर आदमी चाहता है, जीवन में कुछ अच्छा काम करुं। इस चक्कर में कई लोग मंदिर-मस्ज़िद जाते हैं, दान-पुन्न वगैरह करते हैं, कई तरह से कई तरीक़े करते हैं। लेकिन कई बार फ़िर भी मन नहीं भरता। रात को नींद नहीं आती, जीवन खोखला-सा लगता है। इस चक्कर में मैंने भी काफ़ी सोचा और एक आयडिया निकल आया। अपने यहां प्रतीकात्मकता का बड़ा महत्व है। प्रतीकात्मकता नाम की इस महान अवधारणा में माना गया है कि आप बाहर कुछ प्रतीक सजा-धजा लेंगे तो ये आपके भीतर पवित्रता का सूखा हुआ सोता खोल डालेंगे। जैसे आप गांधी टोपी पहन लेंगे तो आप गांधीजी की तरह हो जाएंगे। टोपी में तो फिर भी पैसे लगते हैं। मुझे जो आयडिया सूझा है, उसमें कोई ख़र्चा भी नहीं है।

आप एक काम कीजिए। आजकल तो वैसे भी भ्रष्टाचार-विरोध का सीज़न है। मैं जो आयडिया दे रहा हूं, हर मौसम और हर काल में काम आएगा। आपको कुछ भी नहीं करना अपने नाम के साथ बस ईमानदार, सज्जन, शरीफ़, मासूम जैसा कोई शब्द लगा लेना है। फ़िर देखिए, किस तरह सब बदलने लगेगा। मान लीजिए आपने अपने नाम के आगे ईमानदार को जोड़ लिया। आप तो जानते ही हैं कि यहां लोग नाम से कम और उपनाम या सरनेम से ज़्यादा बुलाते हैं।

आप किसी मित्र के घर जाएंगे, वह दरवाज़े से झांकते ही बोलेगा, ‘अरे यार ईमानदार! बड़े दिन बाद आए।’ दोस्त के दोस्त भी कहेंगे कि हां यार, ईमानदारों की तो संख्या ही इतनी कम है, रोज़ाना आ भी कैसे सकते हैं, बड़े दिन बाद ही आएंगे। इस तरह आप देखेंगे कि पहले ही दिन से आपको एक राहत मिलनी शुरु हो जाएगी।
आप जहां से भी निकलेंगे, आपको जाननेवाले यही कहेंगे-‘देखो, ईमानदार आ रहा है। वो देख, ईमानदार जा रहा है।’

देखते-देखते यह उपनाम आपके बीवी-बच्चों के साथ जुड़ जाएगा। परंपरा जो ठहरी। लोग कहेंगे, ‘देखो, सबके सब ईमानदार हैं, बीवी-बच्चे सब। पहले भाईसाहब ईमानदार हुए, थोड़े दिन बाद भाभीजी और बच्चे भी ईमानदार हो गए।’ बात टैक्नीकली बिलकुल सही है। सुननेवाला कहेगा-‘कमाल का परिवार है, यार!’ इस तरह आपका एक स्टेटस बनना शुरु हो जाएगा।

इस जादू का असर ज़रुर आपके मित्रों, परिचितों, रिश्तेदारों पर भी पड़ेगा। उन्हें भी लगेगा यार ईमानदारी तो अच्छी चीज़ है, हमें भी बनना चाहिए। इस तरह समाज में ईमानदारों की संख्या बढ़ने लगेगी। यह आपका एक सामाजिक योगदान भी होगा। नींद ज़रा और अच्छी आने लगेगी।

जैसे-जैसे समाज की दशा बदलेगी और ईमानदारों की संख्या बढ़ेगी, दुर्घटनाओं पर लोग कुछ इस तरह बात करेंगे-

‘बॉस, रात एक आदमी ने दूसरे को ठग लिया ; ठगा हुआ बेचारा बहुत रो रहा था....’
‘अच्छा, किसने ठगा ?’
‘कोई ईमानदार था, बताते हैं।’
‘ईमानदार था! हुम....फ़िर तो ठीक ही ठगा होगा ; ईमानदार किसीको ग़लत क्यों ठगेगा।’

पोलिस थाने में पूछेगी,‘कौन हो भाई?’
‘जी, मैं तो ईमानदार हूं।’
‘कबसे ईमानदार है भाई ?’
‘जनम से ही हूं जी।’
बात यह भी टैक्नीकली सही है। अगले ने जबसे होश संभाला है, हर कोई उसे ईमानदार कहकर ही पुकारता है।
‘पिताजी, के बारे में बता।'
‘ईमानदार हैं जी’
टैक्नीकली बात यह भी ठीक है। सरनेम उनका भी ईमानदार है।

इस तरह समाज में ईमानदारों की संख्या तेजी से बढ़ती जाएगी। क्योंकि इनवेस्टमेंट तो कुछ है नहीं, फ़ायदा ठीक-ठाक है।

आप किसी चैनल पर डिबेट देखते होंगे। कितना अच्छा लगेगा जब देखेंगे कि अ पार्टी से बहस में भाग ले रहे हैं श्री ईमानदार, ब पार्टी से सुश्री ईमानदार, सामाजिक कार्यकर्त्ता श्री ईमानदार, अधिवक्ता श्री ईमानदार, फ़िल्म स्टार श्री ईमानदार और साथ में है वही आपका पुराना ऐंकर ईमानदार, जिसे आप करते हैं बहुत प्यार।
ज़ाहिर है कि आपके मुंह से ख़ुदबख़ुद निकलेगा,‘भई, मीडिया में तो ईमानदारी की कोई कमी नही; फ़िर भी जो हो रहा है पता नहीं क्यों हो रहा है!’

ज़्यादा बताने से क्या फ़ायदा, आप सब परिपक्व लोग हैं। आयडिया मेरा एकदम मौलिक है। फ़िर भी कई बार ऐसा होता है कि आप अपनी तरफ़ से मौलिक काम करते हैं मगर बाद में पता चलता है कि यह काम 2-4 या सौ या हज़ार-दस हज़ार साल पहले भी कोई कर चुका है। तो अगर यह स्कीम भी पहले से कहीं चल रही हो तो बता ज़रुर दीजिएगा। मैं विदड्रा कर लूंगा।

-संजय ग्रोवर

28-08-2013

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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