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रविवार, 1 मार्च 2009

व्यंग्य-कक्ष में*****ऐतिहासिक भावनाएं*****

पिछले कुछ महीनों से इतिहास ने मेरे दैनिक जीवन में खलबली मचा दी है। मन का चैन और आँखों की नींद उड़ गयी है। जब भी कुछ खाता हूँ, पीता हूँ या करता हूँ तो मन में आशंकाएं घिरने लगती हैं कि हज़ार साल बाद या पाँच सौ साल बाद या पचास साल बाद इसे लेकर क्या सोचा जाएगा ? क्या इससे लोगों की भावनाएं तो नहीं आहत हो जाएंगी ? क्या इससे कोई अपने आपको उपेक्षित, अपमानित, उपहासित, हास्यास्पद हुआ तो नहीं महसूस करेगा ? लगने लगा है कि अब सब कुछ इसे लेकर तय करना पड़ेगा कि पचास/पाँच सौ/पाँच हज़ार सालों बाद उसके कैसे और कितने अर्थ व निष्कर्ष निकाले जाएंगे!

मान लीजिए सौ साल बाद आदमी कम्प्यूटर की फ्लौपियां, सीडियां आदि खाना शुरु कर दे तो उस फ्लौपी-खाऊ समुदाय की भावनाएं इस तथ्य को जानकर कितनी आहत होंगीं कि सौ साल पहले हमारे लोग रोटी जैसी कोई पिलपिली, खुरदुरी और नरम चीज़ खाकर गुज़ारा करते थे। उनमें से कई लोगों को यह भी लगेगा कि यह एक ऐतिहासिक झूठ है। ऐसा सम्भव ही नहीं कि सीडी-खाऊ और सेलफोन-पीऊ हमारी महान जाति ने कभी रोटी-सब्ज़ी-दाल जैसी निकृष्ट व अर्द्धविकसित डिशें खाईं होें। इसलिए इन दुष्ट तथ्यों को इतिहास से निकाला जाए और हमारी नरमो-नाजु़क भावनाओं को आहत होने से बचाया जाए।

सौ/पचास/पाँच सौ साल बाद जब आदमी आदमी को खाने लगेगा (हो सकता है मैं ग़लत होऊँ और दस साल बाद ही ऐसा हो जाए। हो सकता है आज भी ऐसा हो रहा हो। ) तो यह जान कर उसके जज़्बात को कितनी ठेस पहुँचेगी कि कुछ साल पहले हमारे पुरखे पशुओं के माँस जैसी गलीज़ चीजें़ खाया करते थे। एकाध अपवाद ने कभी-कभार एकाध औरत को तंदूर में भूना ज़रुर पर खाने का पराक्रम नहीं दिखा पाया। अन्यथा मानव-भक्षण से ज़्यादा ‘ग्रेसफुल’ कार्य और क्या हो सकता था। अगर पशु को खाने से इंसान पशुवत हो जाता था तो मानव को खाने से ज़्यादा मानवीय क्यों नहीं हो जाएगा भला!

कई बार अपने देसी पाखाने में उंकडँ़ू बैठा मैं यह सोच-सोच कर काँप उठता हूँ कि जब सुलभ शौचालयों समेत हमारे सारे पाखाने विदेशी ढंग की सीटों से सुसज्जित हो उठेंगे तो मेरी भावी पीढ़ियों को यह जान कर कितना दुख होगा कि उनके पितर पाखाने में भद्दे स्टाइल में बैठ कर शौच-क्रिया का संचालन किया करते थे। पाठकगण, आप बात को हल्के ढंग से न लें। बहरहाल, मैं तो समझ गया हँू कि आज की हल्की-सी भी हरकत का सरोकार कल की भारी-भरकम भावुकताओं से है। आज कुछ भी करने से पहले यह नहीं देखना होगा कि आज स्थितियां क्या हैं, ज़रुरतें क्या हैं, उपलब्धताएं क्या हैं। बल्कि यह देखना होगा कि कल इसके क्या ऐतिहासिक अर्थ निकाले जाएंगे! सदियों बाद लोगों की भावनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा!

आगे की तो मैं पहले भी सोचता था पर अब कुछ ज़्यादा ही सोचने लगा हँू। मसलन जब गाता हँू तो दस साल आगे की सोचता हँू। जब जागता हँू तो पचास साल आगे की सोचता हँू। जब सोता हँू तो हज़ार साल आगे की सोचता हूँ।

जब बेईमानी करता हूँ तो कुछ नहीं सोचता!

पर सोचता हूँ कि कभी इन बातों पर भी हमारी आने वाली पीढ़ियों की भावनाएं आहत हुआ करेंगी जब उन्हें पता लगेगा कि हम बात-बात में झूठ बोलते थे, तिकड़म भिड़ाते थे, भ्रष्टाचार में सिर से पाँव तक लिप्त थे, चारा और ताबूत तक में कमीशन खा जाते थे, औरतों को नंगा घुमाते थे, आदमी तक से पशुवत् व्यवहार करते थे, किडनियां निकाल कर बेच देते थे, एक-दूसरे का खून पीने पर उतारु रहते थे!?
फिलहाल भावनाओं की वो किस्म ज़्यादा प्रचलन में है जो बात-बात पर आहत हो जाती है। भावनाओं पर इतना और ऐसा ही ज़ोर रहा तो डर है कि जल्दी ही भावनाएं भी ऐतिहासिक न हो जाएं!

-संजय ग्रोवर


(‘समयांतर’ में प्रकाशित)

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

'व्यंग्य-कक्ष' में *****प्रोजेक्ट डॉक्टर*****


अर्सा पहले एक अखबार में एक कार्टून छपा था। कार्टून के ऊपरी कोने में पिछले दिन के अखबार की कटिंग लगी थी,‘‘एक डाॅक्टर की लापरवाही से एक प्रोफेसर की मौत‘‘। और नीचे कार्टून के नायक के माध्यम से कार्टूनिस्ट ने इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया इस वाक्य में व्यक्त की थी,‘‘... .... ... और जब एक प्रोफेसर की लापरवाही से इतने लोग डाॅक्टर बन जाते हैं तब ... ... ...‘‘

इस पर बहुत से लोग कह सकते हैं कि उस डाॅक्टर ने ऐसे ही बने सारे डाॅक्टरों की तरफ से बाकी सारे लापरवाह प्रोफेसरों की ग़लतियों की सज़ा उस एक प्रोफेसर को देकर कोई बुरा नहीं किया। कुछ और लोग इस पर ‘‘जैसे कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान‘‘ का दार्शनिक मूड अपना कर निर्लिप्त बने रह सकते हैं। और कुछ ‘‘जैसे को तैसा‘‘ के अंदाज़ में ले सकते है। पर अगर हम कार्टूनकार के नज़रिए को गंभीरता से लें और उसे सच मानें तो देश में आए दिन होने वाली डाॅक्टरों की हड़तालों को देखकर हमें मानना पड़ेगा कि हमारे देश के प्रोफेसर अतीत में तो ज़रूरत से (और इस देश की ग़ज़ब की सहन शक्ति से) ज्यादा ग़लतियां कर ही चुके हैं अभी भी ऐसा करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। इसकी एक वजह शायद यह हो सकती है कि बहुत सारे प्रोफेसर भी अपने प्रोफेसरों की लापरवाहियों की बदौलत ही प्रोफेसर बन पाए होते हैं।

हड़ताल पर गए सरकारी डाॅक्टर अक्सर यह दावा करते हैं कि उन्होंने सरकार की सारी स्वास्थ्य मशीनरी को ठप्प कर दिया है। दरअसल यह दावा सरकार के ही हित में जाता है। क्यों कि इससे तो साफ-साफ पता चलता है कि हड़ताल से पहले सरकारी स्वास्थ्य मशीनरी कार्य भी कर रही थी। क्या सरकार के लिये उसकी अब तक की स्वास्थ्य संबंधी उपलब्धियों को नकारने वाले विरोधियों पर चढ़-दौड़ने के लिये हड़ताली डाॅक्टरों का यह बयान काफी नहीं होना चाहिए?

डाॅक्टरों की दो किस्में हमारे देश में पायी जाती हैं - सरकारी और प्राईवेट। लोग इनके बारे में तरह-तरह की बातें करते हैं। कहते हैं कि बहुत से सरकारी डाॅक्टर ऐसे भी होते हैं और इसलिए भी होते हैं कि वे अपने दाखिले के वक्त इतना डोनेशन दे चुके होते हैं कि उनके पास अपना क्लीनिक खोलने के लिये पर्याप्त पैसे ही नहीं बचे होते। जो थोड़े बहुत पैसे बच रहते हैं उनका ‘‘यथोचित‘‘ उपयोग करके वे सरकारी हो जाते हैं। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि प्राईवेट डाॅक्टर इसलिये कभी हड़ताल नहीं करते या अपनी दुकान (अर्थात् क्लीनिक) बन्द नहीं करते क्योंकि उन्हें अपने मनमाफिक तरीके से अपना व्यापार करने की आज़ादी हासिल होती है। सरकार अगर सरकारी डाॅक्टरों को ड्यूटी टाइम में भी ‘प्रैक्टिस‘ करने की छूट दे दे तो उनके द्वारा की जाने वाली हड़तालों की संख्या में कमी आ जाएगी। ऐसा कुछ लोगों का सुझाव है।

लोग और जो कुछ कहें, पर जब वे प्राईवेट डाॅक्टर की तुलना व्यापारी से करते हैं तो बिलकुल अच्छा नहीं लगता। अगर ऐसा है तो गाँवों के लोग आज भी डाॅक्टर को भगवान क्यों मानते हैं? शहरों और कस्बों के पढ़े-लिखे लोग मरीज देखने आए डाॅक्टर के रिक्शे से उतरते ही कुलियों की तरह उनकी अटैचियाँ क्यों ढोते हैं? ‘‘गारन्टी पीरियड‘‘ में पंखों, मशीनों या घड़ियों के खराब हो जाने पर विक्रेता व्यापारी से पैसा वापिस मांगने वाले लोग मरीज़ के ठीक न हो पाने की दशा में पिछले डाॅक्टर को यूं ही बख्श कर अगले की ओर क्यों बढ़ जाते हैं?

पर चूंकि समाज ऐसा करता है इसलिए स्पष्ट है कि डाॅक्टर भगवान का दूसरा रूप होता है। उसका हर काम निर्विवाद है, इंसानी मान्यताओं और धारणाओं से ऊपर है। हो सकता है कि कुछ लोग यहाॅँ-वहाँॅं मौजूद भगवान के ऐसे रूपों को देखकर पूजा करना ही छोड़ दें, पर इससे तथ्यों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।

अब उस दिन का किस्सा ही लीजिए। कलम कुमार जब डाॅ. अधपके की दुकान पर पहूॅँुंचा तो देखता क्या है कि डाॅ. अधपके मरीज़ों से घिरे बैठे हैं। सामने बैठे मरीज़ के मँुॅंह में थर्मामीटर लगा है। उसके बराबर बैठे मरीज़ से डाॅं0 अधपके हालचाल पूछ रहे हैं। तीसरा मरीज डा0 अधपके की बगल में बैठा है। डाॅ0 साहिब उसकी आॅंँखों का चैक अप करते हैं। पेट को टटोल कर देखते हैं। नब्ज़ देखते हैं। फिर जब पर्चे पर दवा लिखने लगते हैं तो मरीज़ टोकता है ‘‘डा0 साहब आपने मेरा गला तो देखा ही नहीं जिसे दिखाने मैं यहाॅंँ आया था‘‘।

कोई बात नहीं। डाॅ. अधपके की यह भूल क्षम्य है। सभी जानते है कि जब ग्राहक ज्यादा हों, दुकानदार अकेला हो और वक्त कम हो तो ग्राहकों को जल्दी-जल्दी निपटाने में ऐसी गड़बड़ियां आम तौर पर हो ही जाती है।

बुजुर्ग लोग फरमाते हैं कि हमारा समाज आज भी डाॅक्टरों की इतनी इज़्ज़त इसलिये करता है कि किसी जमाने में डाॅक्टर से बड़ा समाज सेवक दूसरा नहीं होता था। चूंकि हमारे समाज ने निस्वार्थ सेवा करने वालों को हमेशा सम्मान दिया है। और परम्पराओं को यथासम्भव व यथाशक्ति निभाया है तो इसका फायदा डाॅक्टरों को आज भी मिल रहा है।

पर समाज सेवा करने वाले डाॅक्टरों की यह तीसरी किस्म भारतीय चीतों की नस्ल की तरह इतनी तेजी से लुप्त क्यों होती जा रही हैं? कुछ अर्सा पहले सरकार ने चीतों की नस्ल को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाईगर नामक एक योजना शुरू की थी। क्या हम अपने समाज की खुशहाली के लिए महत्वपूर्ण अंग समझे जाने वाले समाज सेवी डाॅक्टरों की लुप्त होती नस्ल को बचाने के लिये भी सरकार से ‘‘प्रोजेक्ट डाॅक्टर‘ जैसी किसी योजना की उम्मीद करें?


इससे पहले कि कोई चीते के पंजों और डाॅक्टर के स्टेथस्कोप में समानता देखना शुरू करें, मैं इस लेख को यहीं खत्म किये देता हूं।
-संजय ग्रोवर


(6 अक्तूबर, 1995 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

(‘कस्बा‘ पर रवीश जी और ‘मेरे आस-पास’ पर मनविंदर भिंबर जी के अनुभव पढ़े तो अपने कई नए-पुराने अनुभव और यह व्यंग्य याद आ गया।)

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

पंाच पोंगे-कट्टर-मुल्ले-पंथी बनाएंगे सारे समाज का खाने-पीने-पहनने-नाचने का मैन्यू !?




सुशांत जी आप तो नाराज़ हो गए। यह क्या बात हुई कि जब आप अपने लेख का अंत ‘‘‘वहीं जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना कर रहा है।’’’ जैसे वाक्यों से करते हैं तो वो आपको बड़ी धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक-सभ्य भाषा लगती है। ऐसा क्यों, भाई ?


ऊपर से आप मुझे नयी व्यवस्था का मिशन-स्टेटमेंट बनाने को कह रहे हैं जैसे कि पिछली व्यवस्था का आपने तैयार किया था ! सारे यथास्थ्तििवादियों की तान यहीं आकर टूटती है। कल को कोई मजदूर या एन.जी. किसी टाटा-बिरला के यहाँ चल रहे शोषण का विरोध करेगा तो आप तो उससे यह कहेंगे कि पहले तुम खुद टाटा-बिरला जैसा कारखाना लगाओ या उसका कोई नक्शा बनाकर दो तब विरोध करना। अपने से अलग विचारों के लोगों को आप किस तरह से जंगल में जा बैठने का आदेश जारी करते हैं जैसे सारा समाज आपका जरखरीद गुलाम हो सारे लोग आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हों और सारे देश का पट्टा आपके नाम लिखा हो। सब वही खाएं जो आप बताएं, वही पहनें जो आप कहें, वही बोलें जो आप उनके मुंह में डाल दें। वाह, कैसी हत्यारी भाषा, कितनी अहंकारी सोच (?), कितनी तानाशाह प्रवृत्ति मगर फिर भी धार्मिक ! फिर भी आध्यात्मिक ! फिर भी सामाजिक ! फिर भी सभ्य।आप कहते हैं कि मैं कोई व्यवस्था सुझाऊँ। मैं क्यों सुझाऊं भाई !?


हां, मुझे पता है कि एक दवा मुझे अत्यधिक नुकसान पहुँचा रही है। लेकिन क्या मै उसे सिर्फ इसलिए खाता जाऊं और तारीफ करता जाऊं कि बाज़ार में उसकी वैकल्पिक दवा उपलब्ध नहीं है और मैं खुद वह दवा बनाने में सक्षम नहीं हूँ ! मैं उस दवा के ज़हरीले असरात की बाबत आवाज़ उठाऊंगा तभी तो कुछ लोग नयी दवा बनाने के बारे में सोचेगे। तभी तो वे सब लोग भी आवाज़ उठाएंगे जो इंस दवा के ज़हरीले नतीजे तो भुगतते रहे हैं मगर सिर्फ इसलिए चुप हैं कि उन्हें लगता है कि वे अकेले हैं और उपहास के पात्र बन जाएंगे। स्त्री-विमर्श के मामले में ही देखिए, पहले विद्वान लोग कहते-फिरते थे कि ऐसी दो-चार ही सिरफिरी औरतें हैं जो धीरे-धीरे अपने-आप ‘‘ठीक’’ हो जाएंगी, नही ंतो हम कर देंगे। अब देखिए तो कहां-कहां से कितनी-कितनी आवाज़े उठ रही हैं। आरक्षण के मसले पर आप ही जैसे विद्वानों ने पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह को पागल तक कह डाला था। मगर आज सारी पार्टियां बढ़-चढ़कर आरक्षण दे रही हैं। इण्टरनेट के आगमन को लेकर आप ही जैसे लोगों ने तमाम हाऊ-बिलाऊ मचाई। मगर सबसे ज़्यादा फायदा भी आप ही जैसे लोग उठा रहे हैं। भले ही इंस नितांत वैज्ञानिक माध्यम का दुरुपयोग अपनी अवैज्ञानिक सोच को फैलाने के लिए कर रहे हों। इसलिए किसी भी नयी चीज़ का विरोध करने से पहले यह तो तय कर लीजिए कि अंत तक आप अपने स्टैण्ड पर कायम भी रह पाएंगे या नहीं !? और इंस ग़लतफहमी में तो बिलकुल मत रहिए कि सभी आपकी तरह सोचते (?) हैं और भेड़ों की तरह आप उन्हें जहां मर्ज़ी हांक ले जाएंगे।


कोई भी व्यवस्था तो एक दिन में बनती है और ही कोई एक आदमी उसे बनाता है। मगर आप मुझसे ऐसी ही उम्मीद रखते हैं। आप क्या समझते हैं कि मैं भी उन दस-पाँच पोंगापंथियों और कठमुल्लों की तरह अहंकारी और मूर्ख हूँ जो खुदको इतना महान विद्वान समझते हैं कि वही सारी दुनिया के लिए खाने-पीने-नाचने-पहनने का मैन्यू तय कर सकते हैं ! मेरी रुचि ऐसी किसी गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था में है ही नहीं कि सब मेरी तरह से जीएं। अगर मेरी टांगें पतली हैं और निक्कर मुझे सूट नहीं करता तो मै यह विधान बनवाने की कोशिश करुं कि सभी मेरी तरह फुलपैंट पहनेंगे। अरे जिसको जो रुचता है वो करे। आप कौन हैं तय करने वाले। दरअसल आपको किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने की आदत ही नहीं जिसमें सबके लिए जगह हो जब तक कि वह किसी तीसरे के जीवन में नाजायज घुसपैठ कर रहे हों। आपको सिर्फ वही व्यवस्था समझ में आती है जो या तो आपके अनुकूल पड़ती हो या मेरे ! आपके हिसाब से तो फिर सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-दमन, कन्या-भ्रूण-हत्या भी चलते रहने चाहिए थे क्योंकि फुलप्रूफ वैकल्पिक व्यवस्था तो मेरे पास थी आपके ! अगर सती-प्रथा हटानी है तो वैसी ही कोई और प्रथा होनी चाहिए हमारे पास। नही तो, आपकी सोच के हिसाब से ही, सती-प्रथा का विरोध करने का हमारा कोई हक ही नहीं बनता।


कई बातें तो आप ऐसी मुझे समझा रहे हैं जो खुद आपको समझनी चाहिएं। जैसे कि फुल वाॅल्यूम पर रेडियो चलाने का उदाहरण। अपने एक पुराने व्यंग्य की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना शायद बेहतर भी होगा और कारगर भी:- ‘‘क्यों! भावनाएं क्या सिर्फ आस्तिकों की होती हैं! हमारी नहीं!? हम संख्या में कम हैं इसलिए!? दिन-रात जागरण-कीर्तन के लाउड-स्पीकर क्या हमसे पूछकर हमारे कानों पर फोड़े जाते हैं? पार्कों और सड़कों पर कथित धार्मिक मजमे क्या हमसे पूछ कर लगाए जाते हैं? आए दिन कथित धार्मिक प्रवचनों, सीरियलों, फिल्मों और गानों में हमें गालियां दी जाती हैं जिनके पीछे कोई ठोस तर्क, तथ्य या आधार नहीं होता। हमनें तो कभी नहीं किए धरने, तोड़-फोड़, हत्याएं या प्रदर्शन!! हमारी भावनाएं नहीं हैं क्या? हमें ठेस नहीं पहुँचती क्या? पर शायद हम बौद्धिक और मानसिक रुप से उनसे कहीं ज्यादा परिपक्व हैं इसीलिए प्रतिक्रिया में बेहूदी हरकतें नहीं करते।’’


बाते अभी बहुत-सी बाक़ी हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर


शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

कौन है सामाजिक और कौन असामाजिक ?

शायद कहीं एक लघुकथा पढ़ी थी। बाद में उसमें मैंने थोड़ा-सा कुछ अपना भी जोड़ दिया। बज़रिए डार्विन हम इंस कहानी में पहुंचते हैं।




पृथ्वी पर तब बंदर ही बंदर थे। आदमी नामक महान जीव का आगमन तब तक नहीं हुआ था। पता नहीं एक बंदर को क्या हुआ कि पट्ठा विद्रोही होना शुरु हो गया। कभी अगले पैर ऊपर उठा लेता और निचले दोनों पैरों पर सारे शरीर का बैलेंस साधते, चलने की कोशिश करता। कभी पेड़ के पत्ते उठाकर शरीर को जगह-जगह ढंकने की कोशिश करता। हांलांकि इन कोशिशों के चलते कभी उसकी कमर में दर्द भी होता तो कभी बंदर समाज में जोरदार खिल्ली भी उड़ती। शुरु में तो बंदर-समाज उसकी हरकतों को ‘‘लाइटली’’ लेता रहा। जब पानी सिर से गुजरने लगा तो बंदरों के सामाजिक आकाओं ने उसे अपने यहाँ तलब किया और पूछा कि भई आखिर तुम्हे हुआ क्या है, ये क्या अजीबो-ग़रीब हरकतें करते रहते हो ! बंदर बोला सर एक ऐक्सपेरिमेंट कर रहा हूँ। क्या पता इंस में कामयाब हो जाऊँ।




‘‘उससे क्या होगा ?’’ बंदराधिपति ने धैर्य बनाए रखते हुए पूछा।




‘‘ तब शायद हम अगले दोनों हाथों से कुछ दूसरे काम कर पाएं जैसे खाना खाना, खाना बनाना, कलम पकड़कर लिखना, कपड़े बनाना-पहनना...वगैरहा.......‘‘




.......‘‘अच्छा तभी पत्ते उठा-उठाकर शरीर पर लपेटते फिरते हो.....’’ बंदराचार्य ने उपहास करते हुए कहा....।‘‘




‘‘सर ठंड के दिनों में शरीर कांपने लगता है ना, शरीर ढंकने से थोड़ी राहत मिलती है.....’’


‘‘चल पाखंडी, शरीर ढंकने के बहाने सैक्स का प्रचार कर रहा है।’’ बंदर-प्रमुख गुस्से में थर-थर कांपने लगे।




‘‘साला, समाज में अराजकता फैला रहा है, निकाल बाहर करो इसे‘‘ एक परंपरावादी बंदर चीखा।




‘‘हमारे धर्म-संस्कृति को भ्रष्ट कर रहा है।’’ एक संस्कृति-पसंद बंदर गुस्से में बाल नोच-नोंचकर कूदने लगा।




‘‘हां-हां, पेड़ से उतरना हमारी सभ्यता के खिलाफ है।’’‘‘सिर्फ दो पैरों पर चलते हुए साले को ज़रा शर्म नहीं आती।’’


‘‘हरामखोर, शरीर के पवित्र अंगों को पत्तों से ढंकता है।’’


‘‘मारो, साले को छोड़ना मत।’’और पत्थरों की बरसात शुरु हो गयी।




मगर वह भी अपनी तरह का एक ही बंदर था। चोट खाता रहा। हंसी उड़वाता रहा। मगर प्रयोग करना नहीं छोड़ा।आखिरकार एक दिन निचले दोनों पैरो पर खड़ा हो गया। हाथों से तरह-तरह के दूसरे काम करने लगा। और आदमी बन गया। देखा-देखी, हंसी उड़ाने वाले, पत्थर मारने वाले, अराजक कहने वालों में से भी कई बंदर उसके रास्ते पर चल पड़े और वे भी आदमी बन गए।




पुराना बंदर समाज अभी भी है और आज भी ‘‘माॅडर्न’’ बंदर-समाज की हंसी उड़ाता है।




बात कपड़े पहनने या उतारने की उतनी नहीं है सिंहल साहेब ! बात यथास्थ्तििवाद से विद्रोह और वक्त और ज़रुरत के हिसाब से खुदको और समाज को बदलने की है। भीड़ के पीछे चलने वाले, रुढ़िवादी और अपनी कोई सोच न रखने वालों ने तो विरोध ही करना होता है, चाहे वह कपड़े उतारना हो या पहनना। अभी सारी दुनिया के लोग कपड़े उतारकर घूमना शुरु कर दे और समाज इसे बहुत प्रतिष्ठा की बात मानने लगे तो यही नग्नता-विरोधी अपने सारे कपड़े फेंककर सबसे आगे खड़े हो जाएंगे और कहेंगे कि सबसे पहले तो यह हमने ही सुझाया थां, विश्वास न हो तो हमारे ग्रंथ-शास्त्र पढ़ लो। उनमें भी यही लिखा है।




आपकी एक ग़लतफहमी दूर कर सकूं तो खुदको सफल समझूंगा। समाज में गतिशीलता और परिवर्तन उन सैकड़ों बंदरों की वजह से नहीं आते जो प्रयोगवादी, विद्रोही और चिंतनशील बंदरों को अराजक, धर्मभ्रष्ट और असामाजिक वगैरहा-वगैरहा कहते हैं। बल्कि उन बंदरों की वजह से आते हैं जो यह सब सुन/सहकर भी अपनी धुन में लगे रहते हैं। सामाजिकता क्या होती है और असामाजिकता क्या, इसपर भी अगली किस्त में ज़रुर बात करेंगे। मेरे द्वारा आपकी टिप्पणी को बतौर पोस्ट छाप दिया जाना आपको मेरे हृदय की विशालता वगैरहा क्यों लग रहा है, इसपर भी बात करेंगे। मज़े की बात यह है कि मैंने अपने पूरे लेख में ‘‘डीसैक्सुअलाइजेशन’’ शब्द का इस्तेमाल ही नहीं किया। फिर भी आपको ऐसा क्यों लगा, इसपर भी बात करेंगे।
-संजय ग्रोवर

शनिवार, 31 जनवरी 2009

टिप्पणी को पोस्ट बनाते हुए स्त्री-विमर्श


यह ब्लाॅग किसका है ? ज़ाहिर है कि मेरा।




मैं किसी और को इसपर आने क्यों दूं। छाने क्यों दूं !




मेरी पोस्ट पर कितनी टिप्पणियां आयीं ? इसका चर्चा कितनी बार कितने अखबारों में हुआ ?




क्या ब्लाॅगिंग का मकसद बस इतना ही है, होना चाहिए !?




विज्ञान और तकनीक ने हर सोचपूर्ण व्यक्ति को, अगर उसके पास एक अदद पी।सी। और एक ब्राॅड-बैण्ड कनेक्शन है, अपना एक अखबार दे दिया है जिसकी पहुँच दुनिया के हर कोने तक है। मुझे लगता है, ब्लाॅगिंग की यह अद्भुत विधा अखबार से भी ऊपर की कोई चीज़ है।




सुशांत सिंहल से मेरा कोई पूर्व-परिचय नहीं है। मुझे नहीं पता उनका संबंध किस गुट, किस दल, किस विचारघारा वगैरहा-वगैरहा से है। मैं उनसे वैचारिक रुप से सहमत होऊं या नहीं, पर मेरे काॅलम ‘‘मेरी नज़रों से आसमां देखो’’ की पहली पोस्ट पर उनकी टिप्पणी ऐसी तो है ही कि जिस पर चर्चा की जानी चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में लोकतंत्र की मात्रा बढ़ाने की मेरी कोशिश के तहत भी इसे पढ़िए और राय दीजिए। (इंस दौरान यदि मैं सुशांत सिंहल से यह उम्मीद करने लगूं कि वे भी अपने ब्लाॅगस् और मंचों पर अपने से अलग तरह के विचारों को ऐसे ही खुले दिल और सहिष्णुता के साथ मौका देंगे, तो इसमें शायद कोई अतिश्योक्ति तो नहीं होगी !)



Sushant Singhal said...
संवादघर ( www।samwaadghar।blogspot।com) में नारी की दैहिक स्वतंत्रता व सामाजिक उपयोगिता पर जो बहस चल रही है वह रोचक तो है ही, बहुत महत्वपूर्ण भी है । एक ऐसा एंगिल जिससे अभी तक किसी ने इस विषय पर बात नहीं की है, मैं सुधी पाठकों के सम्मुख रख रहा हूं ! बहस को और उलझाने के लिये नहीं बल्कि सुलझाने में मदद हो सके इसलिये ! नारी देह के डि-सैक्सुअलाइज़ेशन (de-sexualization) की दो स्थिति हो सकती हैं । पहली स्थिति है - जहरीला फल चखने से पहले वाले आदम और हव्वा की - जो यौन भावना से पूर्णतः अपरिचित थे और शिशुओं की सी पवित्रता से ईडन गार्डन में रहते थे। ऐसा एक ही स्थिति में संभव है - जो भी शिशु इस दुनिया में आये उसे ऐसे लोक में छोड़ दिया जाये जो ईडन गार्डन के ही समकक्ष हो । वहां यौनभावना का नामो-निशां भी न हो । "धीरे धीरे इस दुनिया से भी यौनभावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना है" - यह भी लक्ष्य हमें अपने सामने रखना होगा ।यदि यह संभव नहीं है या हम इसके लिये तैयार नहीं हैं तो दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि हम न्यूडिस्ट समाज की ओर बढ़ें और ठीक वैसे ही रहें जैसे पशु पक्षी रहते हैं । सुना है, कुछ देशों में - जहां न्यूडिस्ट समाज के निर्माण के प्रयोग चल रहे हैं, वहां लोगों का अनुभव यही है कि जब सब पूर्ण निर्वस्त्र होकर घूमते रहते हैं तो एक दूसरे को देख कर उनमें यौन भावना पनपती ही नहीं । "सेक्स नग्नता में नहीं, अपितु कपड़ों में है" - यही अनुभव वहां आया है । इस अर्थ में वे पशु-पक्षियों की सेक्स प्रणाली के अत्यंत निकट पहुंच गये हैं । प्रकृति की कालगणना के अनुसार, मादा पशु-पक्षी जब संतानोत्पत्ति के लिये शारीरिक रूप से तैयार होती हैं तो यौनक्रिया हेतु नर पशु का आह्वान करती हैं और गर्भाधान हो जाने के पश्चात वे यौनक्रिया की ओर झांकती भी नहीं । पूर्णतः डि-सैक्सुअलाइज़ेशन की स्थिति वहां पाई जाती है । पशु पक्षी जगत में मादा का कोई शोषण नहीं होता, कोई बलात्कार का भी जिक्र सुनने में नहीं आता । मादा या पुरुष के लिये विवाह करने का या केवल एक से ही यौन संबंध रखने का भी कोई विधान नहीं है। उनकी ज़िंदगी मज़े से चल रही है । ये बात दूसरी है कि पशु - पक्षी समाज आज से दस बीस हज़ार साल पहले जिस अवस्था में रहा होगा आज भी वहीं का वहीं है । कोई विकास नहीं, कोइ गतिशीलता नहीं - भविष्य को लेकर कोई चिंतन भी नहीं ।हमारे समाज के संदर्भ में देखें तो कुछ प्राचीन विचारकों, समाजशास्त्रियों का मत है कि यौनभावना का केवल एक उपयोग है और वह है - 'संतानोत्पत्ति' । उनका कहना है कि प्रकृति ने सेक्स-क्रिया में आनन्द की अनुभूति केवल इसलिये जोड़ी है कि जिससे काम के वशीभूत नर-नारी एक दूसरे के संसर्ग में आते रहें और सृष्टि आगे चलती चली जाये । विशेषकर स्त्री को मां बनने के मार्ग में जिस कष्टकर अनुभव से गुज़रना पड़ता है, उसे देखते हुए प्रकृति को यह बहुत आवश्यक लगा कि यौनक्रिया अत्यंत आनंदपूर्ण हो जिसके लालच में स्त्री भी फंस जाये । एक कष्टकर प्रक्रिया से बच्चे को जन्म देने के बाद मां अपने बच्चे से कहीं विरक्ति अनुभव न करने लगे इसके लिये प्रकृति ने पुनः व्यवस्था की - बच्चे को अपना दूध पिलाना मां के लिये ऐसा सुख बना दिया कि मां अपने सब शारीरिक कष्ट भूल जाये । विचारकों का मानना है कि मां की विरक्ति के चलते बच्चा कहीं भूखा न रह जाये, इसी लिये प्रकृति ने ये इंतज़ाम किया है । सच तो ये है कि सृष्टि को आगे बढ़ाये रखने के लिये जो-जो भी क्रियायें आवश्यक हैं उन सभी में प्रकृति ने आनन्द का तत्व जोड़ दिया है। भूख लगने पर शरीर को कष्ट की अनुभूति होने लगती है व भोजन करने पर हमारी जिह्वा को व पेट को सुख मिलता है। अगर भूख कष्टकर न होती तो क्या कोई प्राणी काम-धाम किया करता ! क्या शेर कभी अपनी मांद से बाहर निकलता, क्या कोई पुरुष घर-बार छोड़ कर नौकरी करने दूसरे शहर जाता ?पर लगता है कि हमें न तो ईडन गार्डन की पवित्रता चाहिये और न ही पशु-पक्षियों के जैसा न्यूडिस्ट समाज का आदर्श ही हमें रुचिकर है । कुछ लोगों की इच्छा एक ऐसा समाज बनाने की है जिसमे यौन संबंध को एक कप चाय से अधिक महत्व न दिया जाये । जब भी, जहां पर भी, जिससे भी यौन संबंध बनाने की इच्छा हो, यह करने की हमें पूर्ण स्वतंत्रता हो, समाज उसमे कोई रोक-टोक, अड़ंगेबाजी न करे । यदि ऐसा है तो हमें यह जानना लाभदायक होगा कि ये सारी रोक-टोक, अड़ंगे बाजी नारी के हितों को ध्यान में रख कर ही लगाई गई हैं । आइये देखें कैसे ?पहली बात तो हमें यह समझना चाहिये कि समाज को किसी व्यक्ति के यौन संबंध में आपत्ति नहीं है, निर्बाध यौन संबंध में आपत्ति है और इसके पीछे वैध कारण हैं ! हमारे समाजशास्त्रियों ने दीर्घ कालीन अनुभव के बाद ये व्यवस्था दी कि यौन संबंध हर मानव की जैविक आवश्यकता है अतः हर स्त्री - पुरुष को अनुकूल आयु होने पर यौन संसर्ग का अवसर मिलना चाहिये । चूंकि सेक्स का स्वाभाविक परिणाम संतानोत्पत्ति है, इसलिये दूसरी महत्वपूर्ण व्यवस्था यह की गयी कि संतान के लालन पालन का उत्तरदायित्व अकेली मां का न होकर माता - पिता का संयुक्त रूप से हो । यह व्यवस्था केवल मानव समाज में ही है । बच्चे का लालन पालन करना, उसे पढ़ाना लिखाना, योग्य बनाना क्योंकि बहुत बड़ी और दीर्घकालिक जिम्मेदारी है जिसमें माता और पिता को मिल जुल कर अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करना होता है, इसलिये विवाह संस्था का प्रादुर्भाव हुआ ताकि स्त्री पुरुष के संबंध को स्थायित्व मिल सके, समाज उनके परस्पर संबंध को पहचाने और इस संबंध के परिणाम स्वरूप जन्म लेने वाली संतानों को स्वीकार्यता दे। स्त्री-पुरुष को लालच दिया गया कि बच्चे का लालन-पालन करके पितृ‌ऋण से मुक्ति मिलेगी, बच्चे को योग्य बना दोगे तो गुरु ‌ऋण से मुक्ति मिलेगी, ऐसी अवधारणायें जन मानस में बैठा दी गयीं। विवाह विच्छेद को बुरा माना गया क्योंकि ऐसा करने से बच्चों का भविष्य दांव पर लग जाता है । जो स्त्री-पुरुष इस दीर्घकालिक जिम्मेदारी को उठाने का संकल्प लेते हुए, एक दूसरे के साथ जीवन भर साथ रहने का वचन देते हुए विवाह के बंधन में बंधते हैं, उनको समाज बहुत मान-सम्मान देता है, उनके विवाह पर लोग नाचते कूदते हैं, खुशियां मनाते हैं, उनके प्रथम शारीरिक संबंध की रात्रि को भी बहुत उल्लासपूर्ण अवसर माना जाता है । उनको शुभकामनायें दी जाती हैं, भेंट दी जाती हैं । उनके गृहस्थ जीवन की सफलता की हर कोई कामना करता है ।दूसरी ओर, जो बिना जिम्मेदारी ओढ़े, केवल मज़े लेने के लिये, अपने शारीरिक संबंध को आधिकारिक रूप से घोषित किये बिना, क्षणिक काम संतुष्टि चाहते हैं उनको समाज बुरा कहता है, उनको सज़ा देना चाहता है क्योंकि ऐसे लोग सामाजिक व्यवस्था को छिन्न विच्छिन्न करने का अपराध कर रहे हैं ।अब प्रश्न यह है कि ये व्यवस्था व्यक्ति व समाज की उन्नति में, विकास में सहयोगी है अथवा व्यक्ति का शोषण करती है ? दूसरा प्रश्न ये है कि कोई पुरुष बच्चों के लालन-पालन का उत्तरदायित्व उठाने के लिये किन परिस्थितियों में सहर्ष तत्पर होगा ? कोई स्त्री-पुरुष जीवन भर साथ साथ कैसे रह पाते हैं ? जो स्थायित्व और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी की, वात्सल्य की भावना पशु-पक्षी जगत में कभी देखने को नहीं मिलती, वह मानव समाज में क्यों कर दृष्टव्य होती है? जब कोई स्त्री पुरुष एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हुए, एक दूसरे के साथ सहयोग करते हुए, साथ साथ रहने लगते हैं तो उनके बीच एक ऐसा प्रेम संबंध पनपने लगता है जो उस प्यार मोहब्बत से बिल्कुल अलग है - जिसका ढिंढोरा फिल्मों में, किस्से-कहानियों में, उपन्यासों में पीटा जाता है। एक दूसरे के साथ मिल कर घर का तिनका-तिनका जोड़ते हुए, एक दूसरे के सुख-दुःख में काम आते हुए, बीमारी और कष्ट में एक दूसरे की सेवा-सुश्रुषा करते हुए, स्त्री-पुरुष एक दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं । वे एक दूसरे को "आई लव यू" कहते भले ही न हों पर उनका प्यार अंधे को भी दिखाई दे सकता है । यह प्यार किसी स्त्री की कोमल कमनीय त्वचा, सुगठित देहयष्टि, झील सी आंखों को देख कर होने वाले प्यार से (जो जितनी तेज़ी से आता है, उतनी ही तेज़ी से गायब भी हो सकता है) बिल्कुल जुदा किस्म का होता है। इसमे रंग रूप, शारीरिक गुण-दोष कहीं आड़े नहीं आते। इंसान का व्यवहार, उसकी बोलचाल, उसकी कर्तव्य-परायणता, सेवाभाव, समर्पण, निश्छलता, दया-ममता ही प्यार की भावना को जन्म देते हैं। ये प्रेम भावना पहले स्त्री-पुरुष के गृहस्थ जीवन को स्थायित्व देती है, फिर यही प्रेम माता-पिता को अपने बच्चों से भी हो जाता है। यह प्यार बदले में कुछ नहीं मांगता बल्कि अपना सर्वस्व दूसरे को सौंपने की भावना मन में जगाता है। ये सामाजिक व्यवस्था तब तक सफलतापूर्वक कार्य करती रहती है जब तक स्त्री-पुरुष में से कोई एक दूसरे को धोखा न दे । पुरुष को ये विश्वास हो कि जिस स्त्री पर उसने अपने मन की समस्त कोमल भावनायें केन्द्रित की हैं, जिसे सुख देने के लिये वह दिन रात परिश्रम करता है, वह उसके अलावा अन्य किसी भी व्यक्ति की ओर मुंह उठा कर देखती तक नहीं है। स्त्री को भी ये विश्वास हो कि जिस पुरुष के लिये उसने अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया है, वह कल उसे तिरस्कृत करके किसी और का नहीं हो जायेगा । बच्चों का अपने माता - पिता के प्रति स्नेह व आदर भी माता-पिता के मन में अपनी वृद्धावस्था के प्रति सुरक्षा की भावना जगाता है ।"पुरुष भी स्त्री के साथ बच्चे के लालन-पालन में बराबर का सहयोग दे" -इस परिकल्पना, व इस हेतु बनाई गई व्यवस्था की सफलता, इस बात पर निर्भर मानी गयी कि पुरुष को यह विश्वास हो कि जिस शिशु के लालन-पालन का दायित्व वह वहन कर रहा है, वह उसका ही है, किसी अन्य पुरुष का नहीं है। इसके लिये यह व्यवस्था जरूरी लगी कि स्त्री केवल एक ही पुरुष से संबंध रखे । कोई स्त्री एक ही पुरुष की हो कर रहने का वचन देती है तो पुरुष न केवल उसके बच्चों का पूर्ण दायित्व वहन करने को सहर्ष तत्पर होता है, बल्कि उस स्त्री को व उसके बच्चों को भी अपनी संपत्ति में पूर्ण अधिकार देता है। इस व्यवस्था के चलते, यदि कोई पुरुष अपने दायित्व से भागता है तो ये समाज उस स्त्री को उसका हक दिलवाता है ।स्त्री ने जब एक ही पुरुष की होकर रहना स्वीकार किया तो बदले में पुरुष से भी यह अपेक्षा की कि पुरुष भी उस के अधिकारों में किसी प्रकार की कोई कटौती न करे । दूसरे शब्दों में स्त्री ने यह चाहा कि पुरुष भी केवल उसका ही होकर रहे । पुरुष की संपत्ति में हक मांगने वाली न तो कोई दूसरी स्त्री हो न ही किसी अन्य महिला से उसके बच्चे हों ।शायद आप यह स्वीकार करेंगे कि यह सामाजिक व्यवस्था न हो तो बच्चों के लालन पालन की जिम्मेदारी ठीक उसी तरह से अकेली स्त्री पर ही आ जायेगी जिस तरह से पशुओं में केवल मादा पर यह जिम्मेदारी होती है । चिड़िया अंडे देने से पहले एक घोंसले का निर्माण करती है, अंडों को सेती है, बच्चों के लिये भोजन का प्रबंध भी करती है और तब तक उनकी देख भाल करती है जब तक वह इस योग्य नहीं हो जाते कि स्वयं उड़ सकें और अपना पेट भर सकें । बच्चों को योग्य व आत्म निर्भर बना देने के बाद बच्चों व उनकी मां का नाता टूट जाता है । पिता का तो बच्चों से वहां कोई नाता होता ही नहीं ।इसके विपरीत, मानवेतर पशुओं से ऊपर उठ कर जब हम मानव जगत में देखते हैं तो नज़र आता है कि न केवल यहां माता और पिता - दोनो का संबंध अपनी संतान से है, बल्कि संतान भी अपनी जन्मदात्री मां को व पिता को पहचानती है । भारत जैसे देशों में तो बच्चा और भी अनेकानेक संबंधियों को पहचानना सीखता है - भाई, बहिन, ताऊ, ताई, चाचा - चाची, बुआ - फूफा, मामा - मामी, मौसा - मौसी, दादा - दादी, नाना - नानी से अपने संबंध को बच्चा समझता है और उनकी सेवा करना, उनका आदर करना अपना धर्म मानता है । ये सब भी बच्चे से अपना स्नेह संबंध जोड़ते हैं और उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आर्थिक विकास में अपने अपने ढंग से सहयोग करते हैं ।बात के सूत्र समेटते हुए कहा जा सकता है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष सेक्स को "महज़ चाय के एक कप" जैसी महत्ता देना चाहते हैं; उन्मुक्त सेक्स व्यवहार के मार्ग में समाज द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाओं को वह समाज की अनधिकार चेष्टा मानते हैं; यदि उन्हें लगता है कि उनको सड़क पर, कैमरे के सामने, मंच पर नग्न या अर्धनग्न आने का अधिकार है, और उनका ये व्यवहार समाज की चिंता का विषय नहीं हो सकता तो इसका सीधा सा अर्थ है कि वह इस सामाजिक व्यवस्था से सहमत नहीं हैं, इसे शोषण की जनक मानते हैं और इस व्यवस्था से मिलने वाले लाभों में भी उनको कोई दिलचस्पी नहीं है । यदि स्त्री यह विकल्प चाहती है कि वह गर्भाधान, बच्चे के जन्म, फिर उसके लालन-पालन की समस्त जिम्मेदारी अकेले ही उठाए और बच्चे का बीजारोपण करने वाले नर पशु से न तो उसे सहयोग की दरकार है, न ही बच्चे के लिये किसी अधिकार की कोई अपेक्षा है तो स्त्री ऐसा करने के लिये स्वतंत्र है । बस, उसे समाज द्वारा दी जाने वाली समस्त सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देनी होगी । वह समाज की व्यवस्था को भंग करने के बाद समाज से किसी भी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा भी क्यों रखे ? अस्पताल, डॉक्टर, नर्स, दवायें, कपड़े, कॉपी-किताब, स्कूल, अध्यापक, नौकरी, व्यापार आदि सभी सुविधायें समाज ही तो देता है । वह जंगल में रहे, अपना और अपने बच्चे का नीड़ खुद बनाये, उसक पेट भरने का प्रबंध स्वयं करे। क्या आज की नारी इस विकल्प के लिये तैयार है?यदि समाज द्वारा दी जा रही सेवाओं व सुविधाओं का उपयोग करना है तो उस व्यवस्था को सम्मान भी देना होगा जिस व्यवस्था के चलते ये सारी सुविधायें व सेवायें संभव हो पा रही हैं । सच तो ये है कि शोषण से मुक्ति के नाम पर यदि हम अराजकता चाहते हैं तो समाज में क्यों रहें, समाज से, समाज की सुविधाओं से दूर जंगल में जाकर रहें न ! वहां न तो कोई शोषणकर्ता होगा न ही शोषित होगा ! वहां जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना करने आ रहा है ?- सुशान्त सिंहल






गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

‘व्यंग्य-कक्ष’ में *****लोग क्या कहेंगे*****

सरल कुमार पूर्वाग्रहों से रहित एक सरल स्वभाव का आदमी था। जैसे कि दूसरे रंगों के पहनता था वैसे ही एक दिन उसने नारंगी कपड़े पहन लिए। लोग बोले कि वह फलां दल में शामिल हो गया है। सरल कुमार ने हैरान और परेशान होकर हरे रंग के कपड़े पहन लिए तो लोग कहने लगे कि देखो, पट्ठा अब ढिकां दल में शामिल हो गया है, दल बदलू कहीं का। सरल कुमार ने बाल छोटे करवा लिए। लोग बोले कि बीमार लग रहे हो। सरल कुमार ने लम्बे बाल कर लिए। लोग बोले क्या लड़कियों जैसा हुलिया बना रखा है। ज्यादा हीरो बनता है। सरल कुमार ने पहले जैसे कर लिए, न बड़े न छोटे। लोग बोले कि साला वोई का वोई रहा। इस की जिंदगी में कभी कोई चेन्ज नहीं आ सकता। सरल कुमार धीमे-धीमे सीधी चाल चला। लोग बोले जनानिया है। सरल कुमार तन के चला। लोग कहने लगे कि साले की अकड़ तो देखो। ऐसी काया और कैसी चाल। एक दिन ठोंक दो ससुर को तब मानेगा।
सरल कुमार ने विनम्रता से बात की। लोग बोले कि घुग्घू है पट्ठा। बिलकुल भौंदू। कुछ नहीं कर पाएगा ज़िन्दगी भर। सरल कुमार ने दबंग आवाज में, स्पष्ट शब्दों में, ईमानदारी और गंभीरता से अपनी बात को कहा। लोग कहने लगे कि कितना क्रैक आदमी है। सनकी पागल। अपना-पराया नहीं देखता। किसी का लिहाज नहीं करता। साला ईमानदारी के गटर में सड़-सड़ के मरेगा। सरल कुमार ने गुस्सा खा कर एक दिन लोगों को खरी-खरी सुना दी। लोग बोले कि देखो कितना दुष्ट है। एकदम लुच्चा और गुण्डा। साफ मुंह पर कह देता है।
सरल कुमार दिन-रात काम में जुट गया। लोग बोले कि पैसे के पीछे पागल है। सरल कुमार ने थोड़ा वक्त मौज-मस्ती के लिए निकालना शुरू कर दिया। लोग बोले कि निकम्मा है, अय्याश है, हरामखाऊ है। सरल कुमार ने एक जगह नौकरी कर ली। लोग बोले कि बेचारा, इतना बोझ तो नहीं था घर वालों पर कि नौकरी को मजबूर कर दिया। सरल कुमार लड़कियों को नहीं देखता था। लोग कहते थे कि झेंपू है, दम निकलता है, पसीने छूटते है। सरल कुमार कन्याओं को घूरने लगा। लोग बोले कि लुच्चा और लफंगा है कमीना। एक नम्बर का शोहदा। सरल कुमार ने कहा शादी नहीं करूंगा। लोगों में से एक बोला कि नामर्द होगा साला। दूसरा बोला ज्यादा ब्रहम्चारी बनता है।
तीसरा बोला समाज-सेवा का भूत चढ़ा है जनाब को। चैथा बोला आज़ाद पंछी है भई। पांचवां बोला कि ऐसे ही काम चला लेता होगा इधर-उधर से। छठा बोला कि नाकाम इश्क का मारा लगता है। सरल कुमार ने घोषणा की कि शादी करूंगा। लोग बोले कि हम तो पहले ही कहते थे। शुरू-शुरू में तो सब नखरे दिखाते हैं। बिना शादी के कुछ करना कोई इस के बस की बात थी?
सरल कुमार अकेला जा रहा था। लोगों ने कहा कि कोई नहीं पूछता साले को। सरल कुमार मित्र-मंडली के साथ घूम रहा था। लोग बोले कि इसका बस यही काम है। हर समय आवारा लोगों के साथ घूमना, मटरगश्ती करना। सरल कुमार ने अपने हक़ के लिए आवाज उठाई। लोग बोले कि बड़ा नेता बनता है। सरल कुमार चुपचाप रहने लगा। लोग बोले नपुंसक कहीं का।
सरल कुमार ने अपना सिर धुन लिया, माथा पीट लिया, करम ठोंक लिए। लोग बोले कि हम तुम्हारे साथ हैं, चिन्ता मत करो। सब ठीक हो जाएगा। सरल कुमार हंस पड़ा। लोग कहने लगे कि कैसा बेशर्म है, दांत फाड़े जा रहा है।
आखिर सरल कुमार करे तो करे क्या कि लोग उससे कुछ न कहें? अगर आप के पास कोई सुझाव हो तो मुझे भेज दें, मैं सरल कुमार तक पहुंचा दूंगा।
इस दौरान यह शेर पढ़िए:
कुछ लोग थे कि वक्त के सांचे में ढल गए!
कुछ लोग हैं कि वक्त के सांचे बदल गए!!
-संजय ग्रोवर
(24 मई, 1996 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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