हम लौट रहे हैं।
No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011
‘दिस इज़ नॉट अ शॉप, दिस इज़ अ मूवमेंट’
हम लौट रहे हैं।
बुधवार, 31 मार्च 2010
परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है.
Sanjay Grover : परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है।
Sat at 12:10pm Friends of Friends • Comment •LikeUnlike
Babykumari Kumari, Vijay Krishna Mishra, Ajay Kumar and 2 others like this.
Arkjesh Kumar कोई उदाहरण ? Sat at 1:13pm
Sanjay Grover : zarur deNge. Sat at 2:47pm •
Ernest Albert : @arkjesh ji,
e.g love is blind
non-alignment is the best policy
'we must consign our dead in ganga ma'
'earn max punnya will get manas chola'
(so much punnya after the firangi left that from 34 crores we have crossed 127 crore mark),
i could go on n on.
Sat at 7:18pm •
Anjule Maurya : हर विचारधारा के साथ ये समस्या है ...जहान उसके चाहने वाले बढ़ते हैं..विचारधरा उनसे और समर्पित होने की मांग करती जाती है...एक दिन वों भी आता है जब आपने आगे किसी और विचारधारा का कुछ भी सुनने से इंकार करदेती है...फिर वहीँ से वों प्रगतिशील विचार धारा rudhwadhi बन जाती है...पता नहीं क्यों लेकिन होता अक्सर यही है..
Sat at 8:05pm •
Aradhana Chaturvedi : @ Sanjay Grover पर मानव मन परिभाषाएँ बनाने से बाज भी तो नहीं आता.
Sat at 10:12pm •
Arkjesh Kumar @ Ernest albert
आपके दिए हुए उदाहरण प्रगतिशीलता के नहीं रुढि के ही हैं ।
कोई भी विचार जब समय और परिस्थति के अनुसार स्वयं को अपडेट नहीं करता तो वह रुढि बन जाता है ।
रुढि बदलाव की और रूढ़िवादी, बदलाव करने वालों के दुश्मन बन जाते हैं ।
हर "वाद" प्रगतिशीलता का दुश्मन होता है ।
प्रगतिशील व्यक्ति के लिए मनुष्य और समाज का हित किसी वाद , सिद्धांत या परंपरा से बड़ा होता है ।
नए फैशन के कपड़े या विचारधारा को पहनने से भी कोई प्रगतिशील नहीं होता ।
प्रगतिशील किसी की दी हुई परिभाषा से नहीं बल्कि स्वविवेक से जीता है ।
उदाहरण अभी भी बाकी है :-)
Sat at 10:27pm
Ajay Kumar : # Great.WELL SAID arkjesh. I liked that.
Sun at 9:24am
Sanjay Grover : आम उदाहरणों से बात करता हूं। जब हम बड़े हो रहे थे चारों तरफ़ यही माना जाता था कि जो अंग्रेजी बोलता है, आधुनिक होता है और तरक्की करता है। तरक्की की बात तो समझ में आती है, हालांकि उसकी भी अपनी-अपनी परिभाषाएं हैं। अगर किसी समाज में चोरी-चकारी को मान्यता और प्रतिष्ठा प्राप्त है और व्यवसाय और नौकरी में भी उसे आवश्यक माना जाता है तो बड़ी संभावना इसी बात की है कि वैसे ही लोग तरक्की करेंगे। लेकिन मैं देखता कि अंग्रेजी बोलने वाले दहेज लेते-देते हैं, मूर्ति को दूध पिलाते हैं, स्त्रियों को सामाजिक मान्यताओं के बाहर जाकर कुछ करने नहीं देना चाहते, बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर, सी.ए....आदि से अलग कुछ बनने नहीं देना चाहते, तो मैं उलझन में पड़ जाता। भाषा सिर्फ माध्यम है, बिना विचार और तर्क के आधुनिकता कैसे आ सकती है ? वहां अंग्रेजी को आधुनिकता के रुप में एक आम स्वीकृति थी। हिंदी के लिए बात करते हुए मुझे हंसी भी उड़वानी पड़ती, अकेला भी पड़ जाना होता था। भीड़ उस वक़्त भी अंग्रेजी के साथ थी। ज़्यादातर लोगों को नहीं मालूम था कि वे अंग्रेजी का समर्थन भीड़ की वजह से करते हैं। अगर फिल्म इण्डस्ट्री में या किसी उद्योगपति की बेटी स्कर्ट पहन ले तो इसमें कोई आधुनिकता नहीं है क्यों वहां तो यह आम चलन है। कोई किसी गांव में जींस पहनना शुरु कर देता है तो इसे हम प्रगतिशीलता इतने तक ही मान सकते हैं कि उसने भीड़ के खिलाफ जाने का साहस किया। अगर जींस पहनने के अलावा उसके तमाम व्यवहार और विचार पहले जैसे हैं तो जींस और धोती में क्या फर्क हुआ ? थोड़े दिन में सारा गांव जींस पहनने लगेगा मगर बाक़ी सब यथावत चलता रहेगा। हिंदुस्तान में आज प्रगतिशीलता के नाम पर यही तो हो रहा है। लड़कियां स्कर्ट पहन रहीं हैं, लड़के प्रेम कर रहे हैं, बुड्ढे इंटरनेट पर बैठ रहे हैं मगर अंधविश्वास ख़त्म नहीं हो रहा, बाबा और बाबाई चैनल बढ़ते जा रहे हैं, न्यूज़ चैनल अंधविश्वासों को हवा दे रहे हैं। करवाचैथ तो छोड़िए, सती प्रथा और बुरके तक की वकालत होने लगी है। बुरका और घूंघट भी किसी के लिए प्रगतिशीलता हो सकती है बशर्ते कि वह इन्हें किसी समाज, भीड़, धर्म और प्रतिष्ठा गिर जाने के डरों या दबावों की वजह से नहीं बल्कि अपनी सुविधा के मद्दे-नज़र अपनाए जा रहे हो। जैसे कि मुझे गर्मियों में जींस, कुर्ता और हवाई चप्पल में सुविधा लगती है तो मैं पूना से लेकर अलीगढ़ तक इन्हीं कपड़ों में घूम आता हूं। मुझे परवाह नहीं कि इनमे से क्या पूरब का है, क्या पश्चिम का है,ं क्या फैशन में है, क्या नहीं है, दोस्त क्या कहेंगे, रिश्तेदार क्या कहेंगे, वगैरह.........
(बाक़ी ब्रेक के बाद....) Sun at 11:00am
Sanjay Grover : @Ernest Albert
mujhe lagta hai aapne sirf paribhashayeN samne rakhi haiN, unke ghalat hote jane ke udaharan ko zyada spasht nahiN kiya. ya to maiN aapki bat nahiN samajh paya ya Arkjesh.
Sun at 11:13am
Aradhana Chaturvedi : @ Sanjay Grover मुझे भी यही लगता है कि आज अंग्रेजीदां लोग ज्यादा रूढ़िवादी होते हैं. मैंने यहाँ दिल्ली की कानवेंट एजुकेटेड लड़कियों को करीब से देखा है, उनका एक ही सपना होता है- किसी अमीर लड़के से शादी करना, और कैनेडा चले जाना. जबकि पहनावा देखो तो ऐसा लगेगा कि इनसे अधिक आधुनिक तो और कोई हो ही नहीं सकता. पूजा-पाठ, व्रत-उपवास और अन्धविश्वास में ये लड़कियाँ यू.पी., बिहार की लड़कियों से दस गुना आगे हैं. कुँवारी लड़कियाँ भी करवा चौथ का व्रत इतनी खुशी-खुशी रखती हैं कि आश्चर्य होता है..हमारे उत्तर प्रदेश की भी कॉनवेंटेड लड़कियों का यही हाल है..हद है. Sun at 11:47am
Arkjesh Kumar @ संजय जी
बढ़िया बता रहे हैं , जारी रहिए ।
हमारा क्लीन शेव होना भी उस समय अपने दायरे में एक प्रगतिशील कदम था । काफी साहसी भी :-) अब लोग मुछमुँडोँ को देखकर उतने असहज नहीं होते गाँवों में भी । लेकिन आज से दस साल पहले लड़के को क्लीन शेव देखकर लोग लानत की द्रिष्टि से देखते थे । भले ही दिलीप कुमार के दीवाने हों ।
इस विषय पर हमने काफी लम्बीँ बहसेँ भी की लोगों से । अब उन तर्कोँ को याद करके हँसी भी आती है ।
Sun at 2:48pm
Arkjesh Kumar @ आराधना
अच्छा उदाहरण है ।
कान्वेन्ट की लड़कियों को अच्छा पति पाने की ख्वाहिश नहीं होनी चाहिए क्या :-)
और रही बात अंग्रेजी की तो वह हमारे सामने ग्यान और विचार का व्यापक फलक खोलती है । अब यह हमारे ऊपर है कि हम किधर आँख बंद करते हैं और किधर खोलते हैं ।
यह कहिए कि सिर्फ कोई भाषा इतनी सक्षम नहीं होती कि वह किसी को प्रगतिशील बना सके ।
Sun at 3:10pm
Aradhana Chaturvedi : @ arkjesh, बात अच्छा पति पाने की नहीं है. एक अच्छा जीवनसाथी सभी को चाहिये होता है. बात सिर्फ़ इसी बात के पीछे पड़े रहना है. जैसे ज़िन्दगी में यही सबसे बड़ी बात यही हो. पालन-पोषण ही ऐसे होता है उनका कि सिर्फ़ दुल्हन बनने के लिये तैयार किया जाता है. हाँ, ये बात हो सकती है--- कोई भाषा इतनी सक्षम नहीं होती कि वह किसी को प्रगतिशील बना सके ।
Sun at 6:35pm
Sanjay Grover : @ arkjesh,आराधना ने अपने कमेंट में अच्छा नहीं अमीर शब्द का इस्तेमाल किया था। ज़रुरी नहीं कि अमीर पति अच्छा भी हो। हां, यह भी ज़रुरी नहीं कि वह बुरा हो।
Sun at 7:49pm
Arkjesh Kumar मेरे कमेँट में भी अच्छा की जगह अमीर पढ़ा जाए
Sun at 10:46pm
Sanjay Grover :-) Yesterday at 8:57am @Anjule Maurya...पता नहीं क्यों लेकिन होता अक्सर यही है..se sahmat.
Yesterday at 12:18pm
Sanjay Grover : अर्कजेश की बात ‘प्रगतिशील स्वविवेक से जीता है’ को बढ़ाते हुए कहूंगा कि जैसे ही प्रगति महज़ भीड़ से संचालित होने लगती है, रुढ़ि बनने लगती है। जैसे कि एक बेटी कल अपनी मां से कहे, ‘‘ मम्मी, आजकल मेरी सारी ही सहेलियां लिव-इन कर रही हैं, मुझे भी कर लेने दो।’’ मां, ‘‘ अच्छा ! हां, कल रिच्चा की मम्मी भी आयी थीं, कह रही थी रिच्चा ने भी किसी से लिव इन कर लिया है। सुनते हो, जब उसकी सारी फ्रेंडस् लिव इन कर रहीं हैं तो एक बार उसको भी कर लेने दो न !’’
‘‘ चल बेटा तेरे पापा को तो मैं मना लूंगी, पर ध्यान रखना, करवाचाौथ कभी मत भूलना....और सुबह उठकर पति के पांव ज़रुर छूना...और बेटा लिव इन के बाद भी पति का घर ही पत्नी का घर होता है.....जहां एक बार लिव इन करने जाओ, अर्थी वहीं से बाहर आनी चाहिए.....
एक पुराना चुटकुला याद आ गया जो बात को और साफ़ करेगा:
गृहस्वामी: पंडजी, वैज लेंगे या नान-वेज ?
पंडजी: नान-वेज चल जाएगा बेटा, पर ध्यान रहे, उसमें प्याज़ नहीं होना चाहिए
Yesterday at 3:02pm
Aradhana Chaturvedi : बिल्कुल, लिव इन भी एक संस्था का रूप लेकर शादी जैसी बन जायेगी, अगर आपने जैसा बताया है, वैसा ही हुआ तो...मतलब लिव इन अब फ़ैशन में आ गया है इसलिये हमें भी करना है... बहरहाल, तो मैं ये देख रही हूँ कि ज्यादातर लोग शादी इसलिये करते हैं क्योंकि तीस के ऊपर होते ही आपके ऊपर सवालों की गोलियाँ ही नहीं लाठी, बम और कट्टे तक चलने लगते हैं, जैसे कि आपने शादी न करके कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. औरतों को ज्यादा झेलना पड़ता है, पर पुरुषों को भी कम नहीं.
Yesterday at 3:03pm
Arkjesh Kumar : इस मकाम पर चर्चा यह ध्वनित कर रही है कि फैशन देखादेखी है या कोई काम इसलिए करना कि ज्यादातर लोग वैसा कर रहे हैं । लिव इन मेँ लिवने के बाद भी यदि कुंडली , दहेज वगैरह की शहीदी प्रक्रिया ही दुहरानी है , तो फिर यह सिर्फ शादी के पहले की सुविधापूर्ण व्यवस्था है । और लिव इन के बाद विवाह का रिश्ता बनावटी होगा ।
Yesterday at 8:40pm
Arkjesh Kumar शादी न करना कोई आलोचनात्मक बात नहीं है । फिर भी इस तथ्य से कौन इंकार करेगा कि स्त्री पुरुष का साथ रहना एक प्राकृतिक आवश्यकता है । इसी के लिए शादी का विधान किया गया था । आज शादी की जटिलताओँ की वजह से लोग शादी को तो इंकार कर रहे हैं । लेकिन शादी से इतर स्त्री पुरुष के साथ रहने को समाज सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा ।
फिर लिव इन मेँ भी वही स्त्री के अधिकार , संबंध विच्छेद , और बच्चे से संबंधित कानूनी पेँच शुरू हो गए हैं ।
तो शादी से आप इंकार कर सकते हैं लेकिन उसके विकल्प की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता ।
और इसके विकल्प की समाज द्वारा स्वीकार्यता गैर शादीशुदा लोगों के लाभार्थ जल्द से जल्द बननी चाहिए ।
Yesterday at 9:06pm
इस विषय में आपके विचार जानना ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा.....
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
कौन है सामाजिक और कौन असामाजिक ?
शायद कहीं एक लघुकथा पढ़ी थी। बाद में उसमें मैंने थोड़ा-सा कुछ अपना भी जोड़ दिया। बज़रिए डार्विन हम इंस कहानी में पहुंचते हैं। शनिवार, 31 जनवरी 2009
टिप्पणी को पोस्ट बनाते हुए स्त्री-विमर्श

Sushant Singhal said...
संवादघर ( www।samwaadghar।blogspot।com) में नारी की दैहिक स्वतंत्रता व सामाजिक उपयोगिता पर जो बहस चल रही है वह रोचक तो है ही, बहुत महत्वपूर्ण भी है । एक ऐसा एंगिल जिससे अभी तक किसी ने इस विषय पर बात नहीं की है, मैं सुधी पाठकों के सम्मुख रख रहा हूं ! बहस को और उलझाने के लिये नहीं बल्कि सुलझाने में मदद हो सके इसलिये ! नारी देह के डि-सैक्सुअलाइज़ेशन (de-sexualization) की दो स्थिति हो सकती हैं । पहली स्थिति है - जहरीला फल चखने से पहले वाले आदम और हव्वा की - जो यौन भावना से पूर्णतः अपरिचित थे और शिशुओं की सी पवित्रता से ईडन गार्डन में रहते थे। ऐसा एक ही स्थिति में संभव है - जो भी शिशु इस दुनिया में आये उसे ऐसे लोक में छोड़ दिया जाये जो ईडन गार्डन के ही समकक्ष हो । वहां यौनभावना का नामो-निशां भी न हो । "धीरे धीरे इस दुनिया से भी यौनभावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना है" - यह भी लक्ष्य हमें अपने सामने रखना होगा ।यदि यह संभव नहीं है या हम इसके लिये तैयार नहीं हैं तो दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि हम न्यूडिस्ट समाज की ओर बढ़ें और ठीक वैसे ही रहें जैसे पशु पक्षी रहते हैं । सुना है, कुछ देशों में - जहां न्यूडिस्ट समाज के निर्माण के प्रयोग चल रहे हैं, वहां लोगों का अनुभव यही है कि जब सब पूर्ण निर्वस्त्र होकर घूमते रहते हैं तो एक दूसरे को देख कर उनमें यौन भावना पनपती ही नहीं । "सेक्स नग्नता में नहीं, अपितु कपड़ों में है" - यही अनुभव वहां आया है । इस अर्थ में वे पशु-पक्षियों की सेक्स प्रणाली के अत्यंत निकट पहुंच गये हैं । प्रकृति की कालगणना के अनुसार, मादा पशु-पक्षी जब संतानोत्पत्ति के लिये शारीरिक रूप से तैयार होती हैं तो यौनक्रिया हेतु नर पशु का आह्वान करती हैं और गर्भाधान हो जाने के पश्चात वे यौनक्रिया की ओर झांकती भी नहीं । पूर्णतः डि-सैक्सुअलाइज़ेशन की स्थिति वहां पाई जाती है । पशु पक्षी जगत में मादा का कोई शोषण नहीं होता, कोई बलात्कार का भी जिक्र सुनने में नहीं आता । मादा या पुरुष के लिये विवाह करने का या केवल एक से ही यौन संबंध रखने का भी कोई विधान नहीं है। उनकी ज़िंदगी मज़े से चल रही है । ये बात दूसरी है कि पशु - पक्षी समाज आज से दस बीस हज़ार साल पहले जिस अवस्था में रहा होगा आज भी वहीं का वहीं है । कोई विकास नहीं, कोइ गतिशीलता नहीं - भविष्य को लेकर कोई चिंतन भी नहीं ।हमारे समाज के संदर्भ में देखें तो कुछ प्राचीन विचारकों, समाजशास्त्रियों का मत है कि यौनभावना का केवल एक उपयोग है और वह है - 'संतानोत्पत्ति' । उनका कहना है कि प्रकृति ने सेक्स-क्रिया में आनन्द की अनुभूति केवल इसलिये जोड़ी है कि जिससे काम के वशीभूत नर-नारी एक दूसरे के संसर्ग में आते रहें और सृष्टि आगे चलती चली जाये । विशेषकर स्त्री को मां बनने के मार्ग में जिस कष्टकर अनुभव से गुज़रना पड़ता है, उसे देखते हुए प्रकृति को यह बहुत आवश्यक लगा कि यौनक्रिया अत्यंत आनंदपूर्ण हो जिसके लालच में स्त्री भी फंस जाये । एक कष्टकर प्रक्रिया से बच्चे को जन्म देने के बाद मां अपने बच्चे से कहीं विरक्ति अनुभव न करने लगे इसके लिये प्रकृति ने पुनः व्यवस्था की - बच्चे को अपना दूध पिलाना मां के लिये ऐसा सुख बना दिया कि मां अपने सब शारीरिक कष्ट भूल जाये । विचारकों का मानना है कि मां की विरक्ति के चलते बच्चा कहीं भूखा न रह जाये, इसी लिये प्रकृति ने ये इंतज़ाम किया है । सच तो ये है कि सृष्टि को आगे बढ़ाये रखने के लिये जो-जो भी क्रियायें आवश्यक हैं उन सभी में प्रकृति ने आनन्द का तत्व जोड़ दिया है। भूख लगने पर शरीर को कष्ट की अनुभूति होने लगती है व भोजन करने पर हमारी जिह्वा को व पेट को सुख मिलता है। अगर भूख कष्टकर न होती तो क्या कोई प्राणी काम-धाम किया करता ! क्या शेर कभी अपनी मांद से बाहर निकलता, क्या कोई पुरुष घर-बार छोड़ कर नौकरी करने दूसरे शहर जाता ?पर लगता है कि हमें न तो ईडन गार्डन की पवित्रता चाहिये और न ही पशु-पक्षियों के जैसा न्यूडिस्ट समाज का आदर्श ही हमें रुचिकर है । कुछ लोगों की इच्छा एक ऐसा समाज बनाने की है जिसमे यौन संबंध को एक कप चाय से अधिक महत्व न दिया जाये । जब भी, जहां पर भी, जिससे भी यौन संबंध बनाने की इच्छा हो, यह करने की हमें पूर्ण स्वतंत्रता हो, समाज उसमे कोई रोक-टोक, अड़ंगेबाजी न करे । यदि ऐसा है तो हमें यह जानना लाभदायक होगा कि ये सारी रोक-टोक, अड़ंगे बाजी नारी के हितों को ध्यान में रख कर ही लगाई गई हैं । आइये देखें कैसे ?पहली बात तो हमें यह समझना चाहिये कि समाज को किसी व्यक्ति के यौन संबंध में आपत्ति नहीं है, निर्बाध यौन संबंध में आपत्ति है और इसके पीछे वैध कारण हैं ! हमारे समाजशास्त्रियों ने दीर्घ कालीन अनुभव के बाद ये व्यवस्था दी कि यौन संबंध हर मानव की जैविक आवश्यकता है अतः हर स्त्री - पुरुष को अनुकूल आयु होने पर यौन संसर्ग का अवसर मिलना चाहिये । चूंकि सेक्स का स्वाभाविक परिणाम संतानोत्पत्ति है, इसलिये दूसरी महत्वपूर्ण व्यवस्था यह की गयी कि संतान के लालन पालन का उत्तरदायित्व अकेली मां का न होकर माता - पिता का संयुक्त रूप से हो । यह व्यवस्था केवल मानव समाज में ही है । बच्चे का लालन पालन करना, उसे पढ़ाना लिखाना, योग्य बनाना क्योंकि बहुत बड़ी और दीर्घकालिक जिम्मेदारी है जिसमें माता और पिता को मिल जुल कर अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करना होता है, इसलिये विवाह संस्था का प्रादुर्भाव हुआ ताकि स्त्री पुरुष के संबंध को स्थायित्व मिल सके, समाज उनके परस्पर संबंध को पहचाने और इस संबंध के परिणाम स्वरूप जन्म लेने वाली संतानों को स्वीकार्यता दे। स्त्री-पुरुष को लालच दिया गया कि बच्चे का लालन-पालन करके पितृऋण से मुक्ति मिलेगी, बच्चे को योग्य बना दोगे तो गुरु ऋण से मुक्ति मिलेगी, ऐसी अवधारणायें जन मानस में बैठा दी गयीं। विवाह विच्छेद को बुरा माना गया क्योंकि ऐसा करने से बच्चों का भविष्य दांव पर लग जाता है । जो स्त्री-पुरुष इस दीर्घकालिक जिम्मेदारी को उठाने का संकल्प लेते हुए, एक दूसरे के साथ जीवन भर साथ रहने का वचन देते हुए विवाह के बंधन में बंधते हैं, उनको समाज बहुत मान-सम्मान देता है, उनके विवाह पर लोग नाचते कूदते हैं, खुशियां मनाते हैं, उनके प्रथम शारीरिक संबंध की रात्रि को भी बहुत उल्लासपूर्ण अवसर माना जाता है । उनको शुभकामनायें दी जाती हैं, भेंट दी जाती हैं । उनके गृहस्थ जीवन की सफलता की हर कोई कामना करता है ।दूसरी ओर, जो बिना जिम्मेदारी ओढ़े, केवल मज़े लेने के लिये, अपने शारीरिक संबंध को आधिकारिक रूप से घोषित किये बिना, क्षणिक काम संतुष्टि चाहते हैं उनको समाज बुरा कहता है, उनको सज़ा देना चाहता है क्योंकि ऐसे लोग सामाजिक व्यवस्था को छिन्न विच्छिन्न करने का अपराध कर रहे हैं ।अब प्रश्न यह है कि ये व्यवस्था व्यक्ति व समाज की उन्नति में, विकास में सहयोगी है अथवा व्यक्ति का शोषण करती है ? दूसरा प्रश्न ये है कि कोई पुरुष बच्चों के लालन-पालन का उत्तरदायित्व उठाने के लिये किन परिस्थितियों में सहर्ष तत्पर होगा ? कोई स्त्री-पुरुष जीवन भर साथ साथ कैसे रह पाते हैं ? जो स्थायित्व और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी की, वात्सल्य की भावना पशु-पक्षी जगत में कभी देखने को नहीं मिलती, वह मानव समाज में क्यों कर दृष्टव्य होती है? जब कोई स्त्री पुरुष एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हुए, एक दूसरे के साथ सहयोग करते हुए, साथ साथ रहने लगते हैं तो उनके बीच एक ऐसा प्रेम संबंध पनपने लगता है जो उस प्यार मोहब्बत से बिल्कुल अलग है - जिसका ढिंढोरा फिल्मों में, किस्से-कहानियों में, उपन्यासों में पीटा जाता है। एक दूसरे के साथ मिल कर घर का तिनका-तिनका जोड़ते हुए, एक दूसरे के सुख-दुःख में काम आते हुए, बीमारी और कष्ट में एक दूसरे की सेवा-सुश्रुषा करते हुए, स्त्री-पुरुष एक दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं । वे एक दूसरे को "आई लव यू" कहते भले ही न हों पर उनका प्यार अंधे को भी दिखाई दे सकता है । यह प्यार किसी स्त्री की कोमल कमनीय त्वचा, सुगठित देहयष्टि, झील सी आंखों को देख कर होने वाले प्यार से (जो जितनी तेज़ी से आता है, उतनी ही तेज़ी से गायब भी हो सकता है) बिल्कुल जुदा किस्म का होता है। इसमे रंग रूप, शारीरिक गुण-दोष कहीं आड़े नहीं आते। इंसान का व्यवहार, उसकी बोलचाल, उसकी कर्तव्य-परायणता, सेवाभाव, समर्पण, निश्छलता, दया-ममता ही प्यार की भावना को जन्म देते हैं। ये प्रेम भावना पहले स्त्री-पुरुष के गृहस्थ जीवन को स्थायित्व देती है, फिर यही प्रेम माता-पिता को अपने बच्चों से भी हो जाता है। यह प्यार बदले में कुछ नहीं मांगता बल्कि अपना सर्वस्व दूसरे को सौंपने की भावना मन में जगाता है। ये सामाजिक व्यवस्था तब तक सफलतापूर्वक कार्य करती रहती है जब तक स्त्री-पुरुष में से कोई एक दूसरे को धोखा न दे । पुरुष को ये विश्वास हो कि जिस स्त्री पर उसने अपने मन की समस्त कोमल भावनायें केन्द्रित की हैं, जिसे सुख देने के लिये वह दिन रात परिश्रम करता है, वह उसके अलावा अन्य किसी भी व्यक्ति की ओर मुंह उठा कर देखती तक नहीं है। स्त्री को भी ये विश्वास हो कि जिस पुरुष के लिये उसने अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया है, वह कल उसे तिरस्कृत करके किसी और का नहीं हो जायेगा । बच्चों का अपने माता - पिता के प्रति स्नेह व आदर भी माता-पिता के मन में अपनी वृद्धावस्था के प्रति सुरक्षा की भावना जगाता है ।"पुरुष भी स्त्री के साथ बच्चे के लालन-पालन में बराबर का सहयोग दे" -इस परिकल्पना, व इस हेतु बनाई गई व्यवस्था की सफलता, इस बात पर निर्भर मानी गयी कि पुरुष को यह विश्वास हो कि जिस शिशु के लालन-पालन का दायित्व वह वहन कर रहा है, वह उसका ही है, किसी अन्य पुरुष का नहीं है। इसके लिये यह व्यवस्था जरूरी लगी कि स्त्री केवल एक ही पुरुष से संबंध रखे । कोई स्त्री एक ही पुरुष की हो कर रहने का वचन देती है तो पुरुष न केवल उसके बच्चों का पूर्ण दायित्व वहन करने को सहर्ष तत्पर होता है, बल्कि उस स्त्री को व उसके बच्चों को भी अपनी संपत्ति में पूर्ण अधिकार देता है। इस व्यवस्था के चलते, यदि कोई पुरुष अपने दायित्व से भागता है तो ये समाज उस स्त्री को उसका हक दिलवाता है ।स्त्री ने जब एक ही पुरुष की होकर रहना स्वीकार किया तो बदले में पुरुष से भी यह अपेक्षा की कि पुरुष भी उस के अधिकारों में किसी प्रकार की कोई कटौती न करे । दूसरे शब्दों में स्त्री ने यह चाहा कि पुरुष भी केवल उसका ही होकर रहे । पुरुष की संपत्ति में हक मांगने वाली न तो कोई दूसरी स्त्री हो न ही किसी अन्य महिला से उसके बच्चे हों ।शायद आप यह स्वीकार करेंगे कि यह सामाजिक व्यवस्था न हो तो बच्चों के लालन पालन की जिम्मेदारी ठीक उसी तरह से अकेली स्त्री पर ही आ जायेगी जिस तरह से पशुओं में केवल मादा पर यह जिम्मेदारी होती है । चिड़िया अंडे देने से पहले एक घोंसले का निर्माण करती है, अंडों को सेती है, बच्चों के लिये भोजन का प्रबंध भी करती है और तब तक उनकी देख भाल करती है जब तक वह इस योग्य नहीं हो जाते कि स्वयं उड़ सकें और अपना पेट भर सकें । बच्चों को योग्य व आत्म निर्भर बना देने के बाद बच्चों व उनकी मां का नाता टूट जाता है । पिता का तो बच्चों से वहां कोई नाता होता ही नहीं ।इसके विपरीत, मानवेतर पशुओं से ऊपर उठ कर जब हम मानव जगत में देखते हैं तो नज़र आता है कि न केवल यहां माता और पिता - दोनो का संबंध अपनी संतान से है, बल्कि संतान भी अपनी जन्मदात्री मां को व पिता को पहचानती है । भारत जैसे देशों में तो बच्चा और भी अनेकानेक संबंधियों को पहचानना सीखता है - भाई, बहिन, ताऊ, ताई, चाचा - चाची, बुआ - फूफा, मामा - मामी, मौसा - मौसी, दादा - दादी, नाना - नानी से अपने संबंध को बच्चा समझता है और उनकी सेवा करना, उनका आदर करना अपना धर्म मानता है । ये सब भी बच्चे से अपना स्नेह संबंध जोड़ते हैं और उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आर्थिक विकास में अपने अपने ढंग से सहयोग करते हैं ।बात के सूत्र समेटते हुए कहा जा सकता है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष सेक्स को "महज़ चाय के एक कप" जैसी महत्ता देना चाहते हैं; उन्मुक्त सेक्स व्यवहार के मार्ग में समाज द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाओं को वह समाज की अनधिकार चेष्टा मानते हैं; यदि उन्हें लगता है कि उनको सड़क पर, कैमरे के सामने, मंच पर नग्न या अर्धनग्न आने का अधिकार है, और उनका ये व्यवहार समाज की चिंता का विषय नहीं हो सकता तो इसका सीधा सा अर्थ है कि वह इस सामाजिक व्यवस्था से सहमत नहीं हैं, इसे शोषण की जनक मानते हैं और इस व्यवस्था से मिलने वाले लाभों में भी उनको कोई दिलचस्पी नहीं है । यदि स्त्री यह विकल्प चाहती है कि वह गर्भाधान, बच्चे के जन्म, फिर उसके लालन-पालन की समस्त जिम्मेदारी अकेले ही उठाए और बच्चे का बीजारोपण करने वाले नर पशु से न तो उसे सहयोग की दरकार है, न ही बच्चे के लिये किसी अधिकार की कोई अपेक्षा है तो स्त्री ऐसा करने के लिये स्वतंत्र है । बस, उसे समाज द्वारा दी जाने वाली समस्त सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देनी होगी । वह समाज की व्यवस्था को भंग करने के बाद समाज से किसी भी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा भी क्यों रखे ? अस्पताल, डॉक्टर, नर्स, दवायें, कपड़े, कॉपी-किताब, स्कूल, अध्यापक, नौकरी, व्यापार आदि सभी सुविधायें समाज ही तो देता है । वह जंगल में रहे, अपना और अपने बच्चे का नीड़ खुद बनाये, उसक पेट भरने का प्रबंध स्वयं करे। क्या आज की नारी इस विकल्प के लिये तैयार है?यदि समाज द्वारा दी जा रही सेवाओं व सुविधाओं का उपयोग करना है तो उस व्यवस्था को सम्मान भी देना होगा जिस व्यवस्था के चलते ये सारी सुविधायें व सेवायें संभव हो पा रही हैं । सच तो ये है कि शोषण से मुक्ति के नाम पर यदि हम अराजकता चाहते हैं तो समाज में क्यों रहें, समाज से, समाज की सुविधाओं से दूर जंगल में जाकर रहें न ! वहां न तो कोई शोषणकर्ता होगा न ही शोषित होगा ! वहां जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना करने आ रहा है ?- सुशान्त सिंहल

